इस्लाम की नज़र में बच्चे का गोद लेना और उसको अपनी सम्पति देना |

इस्लाम के कानून के अनुसार यतीम को पालने और उनकी मदद करने की बहुत ज्यादा अहमियत है | यहाँ तक कहा गया है कि यतीम को इस तरह पालो की अपने ब...


इस्लाम के कानून के अनुसार यतीम को पालने और उनकी मदद करने की बहुत ज्यादा अहमियत है | यहाँ तक कहा गया है कि यतीम को इस तरह पालो की अपने बच्चों और उसके दरमियान कोई फर्क न हो| हजरत मुहम्मद (स.अ.व) ने कहा कि अगर तुम्हारा बच्चा खड़ा हो और एक यतीम तो पहले यतीम के सर पे हाथ रखो और अगर संभव हो तो यतीम के सामने अपने बच्चे को प्यार ना करो क्यूँ की यतीम को यह देख एहसास अपनी यतीमी का एहसास होता और तकलीफ पहुंचेगी | यतीम का हक मारना अपने पेट में जहन्नम आग डालने के बराबर है | इस्लाम में यह कहा गया है कि यतीमो की परवरिश करो और अगर किसी मुल्क के लोग इस काबिल ना हों की यतीम की मदद कर सकें तो उस मुल्क की सरकार का यह फ़र्ज़ है की यतीमो की मदद करे |

इस्लाम में जैसे की हर काम के करने का अपना एक तरीका है वैसे ही बच्चा गोद लेने का भी एक अपना तरीका है जिसपे चलते हुए यतीमों की मदद की जाती है | वेस्ट में जब किसी यतीम को गोद लेते हैं तो उसके पीछे केवल उसकी मदद करना नहीं होता बल्कि उसे अपना नाम भी दे दिया जाता है और संपत्ति में से भी हक दिया जाता है | ऐसे में अब उसके नयी माता पिता ,भाई बहन वो होते हैं जिनसे उसका खून का कोई रिश्ता नहीं होता |

इस्लाम में बावजूद इसके की यतीम का घ्यान अपनी औलाद से अधिक दिया जाए उस बच्चे के साथ पिता का नाम नहीं लगाया जा सकता और ना ही जिनसे उसका खून का रिश्ता ना हो उन्हें माता , भाई बहन बनाया जा सकता है |

इस्लाम अनुसार किसी भी महिला और  मर्द की आपसी स्थिति दो तरह की होती हैं एक महरम और दूसरा ना-महरम|  सामान्यत: ना-महरम वह होते हैं जिनके सामने परदे की आवश्यकता होती है (अर्थात मुंह और हाथ को छोड़ कर शरीर के सभी अंगो को ढकना आवश्यक होता है) और यह ना महरम वो हैं जिनसे खून का सीधा रिश्ता नहीं हुआ करता | ना-महरम उस श्रेणी में आते हैं जिनसे विवाह जायज़ होता है|
जिनसे खून अथवा दूध का सीधा रिश्ता होता है वह महरम की श्रेणी में आते हैं, और उनसे वैवाहिक सम्बन्ध नहीं बनाए जा सकते हैं|  जैसे कि माता-पिता, बुआ ,मौसी ,सास-ससुर, बेटे-बेटियां, पति के बेटे-बेटियां, भाई-बहन, भतीजे-भतीजियाँ, भांजे-भांजियां इत्यादि|


कुरान की सूरा ऐ नूर में इसे इस प्रकार समझाया गया है “अपना श्रृंगार किसी पर प्रकट न करे सिवाह अपने पति के या अपने पिता के या अपने पति के पिता के या अपने बेटों के अपने पति के बेटों के या अपने भाइयों के या अपने भतीजों के या अपने भांजो के या अपने मेल-जोल की स्त्रियों के या जो उनकी अपनी मिलकियत में हो उनके, या उन अधीनस्थ पुरुषों के जो उस अवस्था को पार कर चुकें हो, जिसमें स्त्री की ज़रूरत होती है,.या उन बच्चो के जो औरतों के परदे की बातों से परिचित ना हो. ..............[सुर: अन-नूर, 24:31]

एक तो महरम मर्द और औरत वो हैं जिनके  बारे में सुर: अन-नूर, 24:31 में बताया  गया है दूसरा तरीका यह है कि किसी बच्चे को उस समय गोद लिया जाए जब वो दो वर्ष का या उससे कम हो और गोद लेने वाली माता उसे एक दिन और एक रात उसे अपना दूध पिलाये या 15 बार लगातार दूध पिलाये | ऐसी हालत में वो बच्चा बड़ा होने पे अपनी माता एयर भाई बहनों का महरम वैसे ही होता है जैसे सगी माता पिता और भाई बहन |


आप कह सकते हैं की इस्लाम के अनुसार "माना हुआ" जैसे किसी रिश्ते की क़ानूनी मान्यता नहीं है बल्कि खून या दूध के रिश्ते को ही कानूनी मान्यता दी गयी है | इसलिए बच्चा जब भी गोद लिया जायेगा तो बालिग़ होने पे वो  उसकी स्थिति वैसी ही होगी जैसी किसी बाहरी मर्द या औरत की जिनके सामने पर्दा करना अनिवार्य हुआ करता है | किसी यतीम की परवरिश करने के लिए यह आवश्यक नहीं की उसके साथ अपना नाम भी लगाया जाए और उसे महरम भी बनाया जाए |  क्यूँ की किसी भी इंसान के पैदा होते ही उसके खून के रिश्ते और माता पिता तय हो जाते हैं जिन्हें बाद में नहीं बदला जा सकता | यह तर्क संगत भी है और यह देखा भी गया है की जहां खून का या दूध का रिश्ता नहीं होता बल्कि माना हुआ या मुह बोला रिश्ता होता है वहाँ चोरी छुपे उन रिश्तों की आड़ में पाप भी हुआ करते है  |


हजरत मुहम्मद (स.अ.व) ने हज़रत ज़ैद (र.) को अपने मुंहबोले बेटे का दर्जा भी दिया और अपनी गुलामी से आज़ाद कर दिया |  अल्लाह ने कुरान की आयात [सुर: अल-अहज़ाब 33:4] में कहा  ..... और ना उसने तुम्हारे मुंह बोले बेटों को तुम्हारे वास्तविक बेटे बनाए| ये तो तुम्हारे मुँह की बातें हैं. किन्तु अल्लाह सच्ची बात कहता है और वही मार्ग दिखता है| [33:5] उन्हें (अर्थात मुँह बोले बेटों को) उनके बापों का बेटा कहकर पुकारो|
इसीलिये हजरत मुहम्मद (स.अ.व) के मुह बोले बेटे को जायद बिन मुहम्मद नहीं कहा गया बल्कि जायद बिन हरिथ कहा गया क्यूँ की हरिथ उसके बाप का नाम था |

अब दूसरा सवाल यह है की क्या किसी बच्चे को गोद लेने पे उसे अपनी संपत्ति में से कुछ दिया जा सकता है या उसे बच्चे के मुह्बोले पिता के मरने के बाद उसकी संपत्ति में बच्चे का अधिकार होता है ?

इस्लाम में जब भी किसी बच्चे को गोद लिया जाता है तो यदि वो यतीम ना हो और उसके असली माता पिता जीवित हों तो उसका अधिकार अपने असल माता पिता की संपत्ति में बना रहता है | और जिहोने उसे गोद लिया है उसकी संपत्ति पे उसका अधिकार नाहीं होता | कुरान ( 8:75 ) के अनुसार “किसी की संपत्ति, विरासत केवल उसके खून के या जन्म के रिश्तेदार ही पा सकते हैं |” गोद लिया बच्चा तभी संपत्ति पा सकता है जब किसी के वारसी जीवित न हों |

लेकिन यदि कोई अपने गोद लिए बच्चे को अपनी संपत्ति में से अपने जीवन काल में देना चाहे तो अपनी संपत्ति का एक तिहाई दे सकता है और इसके साथ साथ यदि गोद लिया बच्चा यतीम है तो उसकी मदद के लिए अपने धन में से जितना चाहे उसे रहने और खान पान पे खर्च कर सकता है |

आप कह सकते है की इस्लाम में किसी  को गोद लेने का मकसद  उसकी परवरिश करना , उसे प्यार देना और उसकी सहूलियतों का ध्यान रखना हुआ करता है ना की उस से खून के रिश्ते बनाना हुआ करता है जो की संभव भी नहीं है और मुह बोले रिश्तों को इस्लाम अहमियत नहीं देता क्यूँ की इंसान  खुद भी ऐसे मुह बोले रिश्तों में इमानदार हमेशा रहे यह संभव नहीं होता |

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  1. किसी यतीम की परवरिश करने के लिए यह आवश्यक नहीं की उसके साथ अपना नाम भी लगाया जाए .

    Nice post.

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