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कर्बला का पैग़ाम और कर्बला से मिली सीख

1. अमर बिल मारूफ और नही अनिल-मुनकर का महत्त्व
कर्बला का वाक़या हमें सिखाता है की सीधे रास्ते से न हटना और न ही अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ना! आखेरत पर यक़ीन रखना और आखेरत में अपना अंजाम दिमाग में रखनाचाहे दुश्मन कितना ही ताक़तवर हो और चाहे इस से सामना करने के नतीजे कुछ भी हों! हाँ! मगर यह मुकाबला इल्म और शरियत के साथ हो! हिम्मत नहीं हारना और यह न कहना की हम क्या कर सकते हैं चाहे हमारे  दुश्मन (मीडिया और समाज में फैले हुए हों) के सामने हमारी औकात न हो हमें अपना काम करते रहना है और हमें यह हमेशा यक़ीन रखना है की हम इस पर काबू पा सकते हैं और लगातार जंग करते रहना हमारे बस में और ताक़त में है और परीणाम अल्लाह पर छोड़ना है!
2. तक़लीद और आलीम की सुहबत में रहनान की अपनी राये क़ायेम करना
एक बार अपने रहबर और आलिम पर यक़ीन होने के बाद इसकी राये पर अमल करना बगैर किसी झिझक के और बगैर अपनी राये के फ़िक़ह (इस्लामी क़ानून) की अहमियत बीबी ज़ैनब (स:अ) के हवालेहमें इस वाक्य में नज़र आती है के जब खैमे जल रहे थे और इमाम वक़्त (अ:स) से मस-अला पूछा जा रहा था!
3. क़ुरान का महत्व :
हत्ता की इमाम हुसैन (अ:स) का सरे-मुबारक नैज़े पर बुलंद है और तिलावत जारी है,
4. दीनी तालीम का महत्त्व और शरीके हयात क़ा चुनाव :
हमें दो मौकों पर नज़र आता है जब इमाम अली (अ:स) ने उम्मुल-बनीन (स:अ) का चुनाव किया हज़रत अब्बास (अ:स) के लिएऔर दूसरी जगह पर जहाँ इमाम हुसैन (अ:स) ने यजीदी फौजों को मुखातिब किया के यह ईन के पूर्वजों की तरबियत और गलतियों का नतीजा है की इमाम (अ:स) के मुकाबले पर जंग कर रहे हैं!
5. पति और पत्नी का रिश्ता
कर्बला हमें सिखाती है की पत्नीपाती के लिए राहत लायेजैसे इमाम हुसैन (अ:स) की कथनी है की रबाब (स:अ) और सकीना (स:अ) के बगैर मुझे कुछ अच्छा नहीं लगता! पत्नी अपने पती को खुदा का हुक्म मानने से न रोकेजैसे बीबी रबाब (स:अ) ने इमाम हुसैन (अ:स) को न रोका हज़रत असग़र (अ:स) को ले जाने से!  कभी कभार हमारी औरतें अपने पती को अपने बगैर हज पर जाने से रोकती हैं! औरतों को चाहिए की वो अपने पतियों के लिए मददगार बनें और उनकी हिम्मत बढायें हुकूक-अल्लाह (दैविक कर्त्तव्य) और हुकूक-अन्नास (सामाजिक कर्त्तव्य) को पूरा करने में!
6. इल्म (ज्ञान) की अहमियत (महत्त्व):
ताकि जिंदगियां अल्लाह की मर्ज़ी के मुताबिक गुजारी जा सकें! इमाम (अ:स) की कुर्बानी का मकसद ज़्यारत अर-ब'ईन में चार अक्षरों में ब्यान किया गया है के " मैं गवाही देता हूँ के कुर्बानी का मुकम्मल (कुल) मकसद बन्दों को जहालत से बचाना था!
7. इखलास (भगवान् का कर्त्तव्य समझ करभगवान् की राह में अच्छा काम करो) :   
सिर्फ और सिर्फ अल्लाह के लिए अपनी जिम्मेदारियों को अंजाम देनाबगैर किसी रबा (दिखावे) केकयामत पर मुकम्मल यक़ीन ही संसारिक फायदों और आराम को कुर्बान करके आखेरत के लिए हमेशा रहने वाला फायेदा हासिल करवा सकता है!
8. जज़्बात (भावनाओं) पर काबू
जब अल्लाह की ख़ातिर अमल होइस के साथ अपने जज़्बात (भावना) का प्रदर्शन बगैर सुलह के खुदा की ख़ातिर करो!
9. पर्दा का महत्त्व :
ना-महरमों (जो करीबी रिश्तेदार न हों)  से दूर रहना चाहे वोह करीबी रिश्तेदार ना-महरम हों या करीबी खानदानी दोस्त हों!
10. इमाम सज्जाद (अ:स) ने कहा की मेरा मानने वाला गुनाह से बचेदाढ़ी न मुडवाये और जुआ न खेले क्योंकि यह यज़ीदी काम हैं और हमें उस दिन की याद दिलाते हैं!
11. नमाज़ का महत्त्व : यह जंग के बीच में भी पढी गयी
12. अज़ादारी और नमाज़ दोनों मुस्तकिल वाजिब हैंऔर उनका टकराव नहीं जैसा की इमाम सज्जाद (अ:स) खुद सब से बड़े अजादार भी थे और सब से बड़े आबिद (नमाज़ी) भी!
13. ख़ुदा की मर्ज़ी के आगे झुकनाहर वक़्तहर जगह परइमाम (अ:स) ने सजदा-ए शुक्र बजा लाया जब की वोह मुसीबत में थेहमें भी चाहिए की पता करें की खुदा की मर्ज़ी क्या हैइस को माँ लेंऔर इस पर अमल करें!
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का क़ियाम व क़ियाम के उद्देश्य

हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने सन् (61) हिजरी में यज़ीद के विरूद्ध क़ियाम (किसी के विरूद्ध उठ खड़ा होना) किया। उन्होने अपने क़ियाम के उद्देश्यों को अपने प्रवचनो में इस प्रकार स्पष्ट किया कि----

1—
जब शासकीय यातनाओं से तंग आकर हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम मदीना छोड़ने पर मजबूर हो गये तो उन्होने अपने क़ियाम के उद्देश्यों को इस प्रकार स्पष्ट किया। कि मैं अपने व्यक्तित्व को चमकाने या सुखमय जीवन यापन करने या उपद्रव फैलाने के लिए क़ियाम नहीं कर रहा हूँ। बल्कि मैं केवल अपने नाना (पैगम्बरे इस्लाम) की उम्मत (इस्लामी समाज) में सुधार हेतु जारहा हूँ। तथा मेरा निश्चय मनुष्यों को अच्छाई की ओर बुलाना व बुराई से रोकना है। मैं अपने नाना पैगम्बर(स.) व अपने पिता इमाम अली अलैहिस्सलाम की सुन्नत(शैली) पर चलूँगा।

2—
एक दूसरे अवसर पर कहा कि ऐ अल्लाह तू जानता है कि हम ने जो कुछ किया वह शासकीय शत्रुत या सांसारिक मोहमाया के कारण नहीं किया। बल्कि हमारा उद्देश्य यह है कि तेरे धर्म की निशानियों को यथा स्थान पर पहुँचाए। तथा तेरी प्रजा के मध्य सुधार करें ताकि तेरी प्रजा अत्याचारियों से सुरक्षित रह कर तेरे धर्म के सुन्नत व वाजिब आदेशों का पालन कर सके।

3— 
जब आप की भेंट हुर पुत्र यज़ीदे रिहायी की सेना से हुई तोआपने कहा कि ऐ लोगो अगर तुम अल्लाह से डरते हो और हक़ को हक़दार के पास देखना चाहते हो तो यह कार्य अल्लसाह कोप्रसन्न करने के लिए बहुत अच्छा है। ख़िलाफ़त पद के अन्य अत्याचारी व व्याभीचारी दावेदारों की अपेक्षा हम अहलेबैत सबसे अधिक अधिकारी हैं।

4—
एक अन्य स्थान पर कहा कि हम अहलेबैत शासन के उन लोगों से अधिक अधिकारी हैं जो शासन कर रहे है।
इन चार कथनों में जिन उद्देश्यों की और संकेत किया गया है वह इस प्रकार हैं-------

1-
इस्लामी समाज में सुधार।

2-
जनता को अच्छे कार्य करने का उपदेश ।

3-
जनता को बुरे कार्यो के करने से रोकना।

4-
हज़रत पैगम्बर(स.) और हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम की सुन्नत(शैली) को किर्यान्वित करना।

5-
समाज को शांति व सुरक्षा प्रदान करना।

6-
अल्लाह के आदेशो के पालन हेतु भूमिका तैयार करना।
यह समस्त उद्देश्य उसी समय प्राप्त हो सकते हैं जब शासन की बाग़ डोर स्वंय इमाम के हाथो में होजो इसके वास्तविक अधिकारी भी हैं। अतः इमाम ने स्वंय कहा भी है कि शासन हम अहलेबैत का अधिकार है न कि शासन कर रहे उन लोगों का जो अत्याचारी व व्याभीचारी हैं।
 
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के क़ियाम के परिणाम
1-बनी उमैया के वह धार्मिक षड़यन्त्र छिन्न भिन्न हो गये जिनके आधार पर उन्होंने अपनी सत्ता को शक्ति प्रदान की थी।

2-
बनी उमैया के उन शासकों को लज्जित होना पडा जो सदैव इस बात के लिए तत्पर रहते थे कि इस्लाम से पूर्व के मूर्खतापूर्ण प्रबन्धो को क्रियान्वित किया जाये।

3-
कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत से मुसलमानों के दिलों में यह चेतना जागृत हुईकि हमने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की सहायता न करके बहुत बड़ा पाप किया है।
इस चेतना से दो चीज़े उभर कर सामने आईं एक तो यह कि इमाम की सहायता न करके जो गुनाह (पाप) किया उसका परायश्चित होना चाहिए। दूसरे यह कि जो लोग इमाम की सहायता में बाधक बने थे उनकी ओर से लोगों के दिलो में घृणा व द्वेष उत्पन्न हो गया।
इस गुनाह के अनुभव की आग लोगों के दिलों में निरन्तर भड़कती चली गयी। तथा बनी उमैया से बदला लेने व अत्याचारी शासन को उखाड़ फेकने की भावना प्रबल होती गयी।
अतः तव्वाबीन समूह ने अपने इसी गुनाह के परायश्चित के लिए क़ियाम किया। ताकि इमाम की हत्या का बदला ले सकें।

4- 
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के क़ियाम ने लोगों के अन्दर अत्याचार का विरोध करने के लिए प्राण फूँक दिये। इस प्रकार इमाम के क़ियाम व कर्बला के खून ने हर उस बाँध को तोड़ डाला जो इन्क़लाब (क्रान्ति) के मार्ग में बाधक था।

5-
इमाम के क़ियाम ने जनता को यह शिक्षा दी कि कभी भी किसी के सम्मुख अपनी मानवता को न बेंचो । शैतानी ताकतों से लड़ो व इस्लामी सिद्धान्तों को क्रियान्वित करने के लिए प्रत्येक चीज़ को नयौछावर कर दो।

6-
समाज के अन्दर यह नया दृष्टिकोण पैदा हुआ कि अपमान जनक जीवन से सम्मान जनक मृत्यु श्रेष्ठ है।
ख़ुत्बा और बानियाने मजलिस के नाम एक महत्वपूर्ण अनुरोध

यह वोह वक़्त है जब जनता सुनने के लिए तैयार होती है! कर्बला का वाक़िया एक मोएज्ज़ा है! और मुहर्रम वोह वक़्त है जब लोग दीने इस्लाम का पैगाम सुनते हैं! समाज के हर वर्ग और विभाग के लोग अपने मौला इमाम हुसैन (अ:स) की मुहब्बत के लिए मजलिस में शिरकत करते हैं! कोई और मौक़ा ऐसा नहीं होता की लोग मजलिस या धार्मिक व्याख्यान सुनने के लिए इतना वक़्त देते हैं! ज़्याराते अर'बईन में इमाम हुसैन (अ:स) की कुर्बानी का मकसद लोगों को जेहालत से निकालना पाया जाता है! यह हमारी ज़िम्मेदारी है की इस अज़ीम मकसद के हसूल के लिए हम अपनी कोशिशेंजारी  सारी रखें!

ज़्यादातर  लोग ज़िम्मेदारी उठाना नहीं चाहतेबल्कि दुश्मनों की निंदा सुनने में दिलचस्पी लेते हैं और मज़ा उठाते हैं!

यह एक ऐसी मानव प्रकृति है की वो ऐसा कुछ नहीं सुनना चाहते हैं जहाँ इसे सोचने और इसके बाद अपने मिज़ाज के खिलाफ अमल करने की ज़रुरत पड़े! लोग अपने ऊपर ज़िम्मेदारी लेना पसंद नहीं करते हैंखासकर उस वक़्त जिसमे कारवाई करने या परिवर्तन लाने की मांग हो!  दूसरों की निंदा और अपने अकीदे और मान्याताओं की पुष्ठी को सुनना बहुत ही आसान और सुकूँ का काम है!  अलबत्ता इस बात का भी ख्याल रख़ा जाए की किसी भी तरह अनुचित भाषा का उपयोग जबकि वो किसी व्यक्ति विशेष या किसी ख़ास गिरोह के लिए इस्तेमाल की जाती हैवोह समाज में नफरत और हिंसा के इंधन का काम करती है!  यह बात इस्लाम के कमज़ोर होने का कारण भी बनती है! वर्तमान काल में यह आवश्यक है की इस्लाम में मुसलमानों के बीच आपस में शांती एवं एकता  हो! इसके अतिरिक्त बहुत सारे उलटे सीधे तर्क को आसानी से तार्किक चर्चा में मुकाबला करके रद किया जा सकता है! यह बता भी काफी गंभीरता से सोचनी चाहिए की बहुत सारी जगहों पर हमारी बहस नहीं बल्कि हमारी क्रिया और अमल लोगों को प्रभावित करती है! निंदा और ताना देने वाली बातों से  ही किसी अकेले इंसान में और न ही किसी समाज में सुधार लाया जा सकता है! लोग अपने आप को इस्लामी अध्यन करने में अपने वक़्त की बर्बादी समझते हैं! समय की पुकार है की हम अपने आप को और अपने समाज को बदलने की पुरो कोशिश करें! यह शायद संभव हो की अगर कोई खतीब (ज़ाकिर) केवल दूसरों की निंदा करे और लोगों को बदलने या अपना कर्त्तव्य निभाने पर ज़ोर न दे तो उसके मजलिस में मजमा (लोग) भी ज़्यादा होंगे और उसकी तारीफ भी बहुत होगी! परन्तु ईन सब बातों से वो मकसदे अहलेबैत को बढ़ावा देने में सहायक नहीं होगा! 

 अहलेबैत जो हम से चाहते है और उम्मीद रखते हैं - इसका क्या होगा?
इस में कोई शक नहीं है की हम अहलेबैत (अ:स) के माध्यम से ही अपने मोक्ष की उम्मीद करते हैं! अज़ादारी स्वयं अपने आप में एक ज़बरदस्त और बड़ी इबादत है! हमारी मजलिसों में हमारे विश्वास (अकीदा) और अहलेबैत (अ:स) का ज़िक्र होना चाहिए! एतिहासिक बातें भी होनी ज़रूरी हैं ताकि हमारी कौम और हमारे बच्चे अपने प्रशंसनीय इतिहास  को जान सकें और यह समझ सकें की किसी घटनायुद्ध और व्यक्ति विशेष का महत्त्व इस्लाम को बढाने और फैलाने और उजागर करने में क्या रहा है! यह तमाम बातें इस समय लाभदायक होंगी जब हम यह जाँ लेंगे की मजलिस के लिए हमारी जिम्मेदारियां क्या क्या हैं!
हमें मजलिस में अहलेबैत (अ:स) का पैगाम पहुंचाना है! अहलेबैत ने अपना सब कुछ इस्लाम की हिफाज़त में खर्च किया/लुटाया है! ईन की हर समय ताहि कोशिश रही की शरियते इस्लाम यानी सही अकीदे और अहकाम (नियम) जैसे हरामहलालमुस्तहबमकरूह और मोबाह की हिफाज़त हो सके! इन्हों ने हमेशा लोगों के सामने सही इस्लाम का प्रचार और प्रसार किया! तमाम अंबिया और इमामों की यही कोशिश रही है की तमाम मानवजाति अल्लाह की मर्ज़ी को पहचाने और इसके सामने अपनी इच्छाओं को झुकाए और शीश को नमन करे! 
अहलेबैत (अ:स) से मुहब्बत का तरीका है की हम उनका कहना मानेउनके बताये हुए रास्ते पर चलें जो की वास्तविकता में अल्लाह का बताया हुआ रास्ता है! इसके लिए ज़रूरी है की हम इनकी दी हुई शिक्षाओं को समझें! अगर हम अपनी ज़िंदगी इस तरह गुजारेंगे जैसे हम से इस्लाम चाहता है तो यकीनन हमारी दुन्या और आखेरत दोनों कामयाब हो जायेंगी! इसी कारणवश हमारी मजलिसें इस वक़्त कामयाब और लाभदायक होंगी जब हम ज़िक्रे विलायत के साथ साथ आइम्माए-मासूमीन (अ:स) की हम से आशाओं और उम्मीदों का भी तज़किरा करें!

मजलिसों में क्या होना चाहिए ?
हमें अपने आप को और समाज को बेहतर बनाना होगा! इस्लाम ने हमें वो तमाम तरीक़े बताएं हैंजिस से हम अपनी और समाज की संहिता  को बेहतर कर सकते हैं! जैसे बेहतर घरेलू ज़िंदगीगुनाहों से बचनादूसरों की मदद  और इस्लामी दुन्या के हालत से बाखबर रहना इत्यादि! परिवर्तन के लिए कुछ दिनों की मजलिस नाकाफी हैइसलिए मजलिस में आने वालों को यह याद दिलाना ज़रूरी है की इल्म हासिल करने का कार्य साल भर जारी रहना चाहिए! इस सिलसिले में इन्हें चाहिए की किताबोंकैसेटोंसीडीइन्टरनेट इत्यादि का प्रयोग करेंइस से लाभ उठायें जो आजकल आसानी से मिल जाती हैं! इस से निजी व्यक्तित्व और समाज की बढ़ोतरी होती है! जब हमारे इमाम-ज़माना (अ:त:फ) ज़हूर फरमाएंगे तो आप को ऐसे पाक लोगों की ज़रुरत होगी जो बाखबर भी हों और इस्लामी इल्म भी रखते हों! यह एक इस्लामी ज़िम्मेदारी है जाकिरों की भी और समाज का बा-असर लोगों की भी की वो मजलिस के ज़रिये लोगों में यह सारी सलाहियत और खूबी पैदा कर सकें!  यह ज़िम्मेदारी मजलिस में जाने वालों की भी है की वो किस किस्म की मजलिसों को बढ़ावा देते हैं और सराहते हैं!
हुज्जतुल इस्लाम मौलाना अहमद अली आबेदी साहब के मुंबई खोजा जामा मस्जिद के तारीखी ख़ुत्बे  के बाद उम्मत ए तशय्यो में एक ज़िम्मेदाराना बदलाव देखने में आ रहा है. लोग कई बातो पर इल्मी बहस करते दिखाई दिए और सोशल नेटवर्क साइट्स पर भी एक ज़िम्मेदाराना गुफ्तगू का आग़ाज़ हुआ है।

ज़्यादातर लोग क़ुम के ओलमा की अंजुमन “जामे मुदर्रिसीन” के बारे में इल्म हासिल करने की कोशिश करते दिखे वही पर लोग ओलमा की तरफ से शाया दीनी मरजा की फेहरिस्त पर भी गुफ्तगू करते दिखाई दिए।

अल्लाह के फ़ज़लो करम से मौलाना के ख़ुत्बे ने तक़लीद और मरजईयत को हिंदुस्तान में, ख़ुसूसन मुंबई में, एक नया जोश और रास्ता दिया है।

अभी तक लोग इस बात से ग़ाफ़िल थे कि  हमारे ओलमा इस तरह का इज्तेमाई फैसला भी लेते है और ऐसी कोई ओलमा की अंजुमन भी है जो अवाम के बारे में इतना सोचती है और उसके मुताबिक़ फैसले भी लेती है।

अल्हम्दुलीलाह मौलाना ने अपने ख़ुत्बे  में इस बात को वाज़ेह तौर पर ज़ाहिर कर के लोगो को सोचने और इस सिम्त में आगे बढ़ने का एक नया रास्ता दिया है। इस चीज़ से ख़ुसूसन क़ौम के नौजवान काफी जोश और जज़्बे के साथ इल्मी गुफ्तगू में आगे दिखाई दे रहे है।

एक तरफ जहाँ क़ौम को मरजईयत से दूर ले जाने की कोशिश की जा  रही है और साथ में कई सारे शक  और शुबे नौजवानो के ज़हन में डाले जा रहे है, मसलन:

  • एक मुजतहिद जिसे जामे मुदर्रिसीन ने मरजा का दर्जा दिया है, उसे मुजतहिद न समझना
  • दूसरे मुजतहिद जिन्हे जामे मुदर्रिसीन ने मरजा की फेहरिस्त में शामिल नहीं किया है उनकी तक़लीद करना
  • अगर किसी आम इंसान को समझ नहीं आ रहा है कि आलम कौन है, तो  वह इंसान किसी भी मुजतहिद की तक़लीद करे
  • और बहोत से सवलात

लेकिन अल्लाह के फज़ल से, मौलाना आबेदी ने अपने जुमे के ख़ुत्बे में इन सब बातो को एक बुनियादी बात से रद्द कर दिया कि मरजा कोई भी मुजतहिद नहीं बन सकता, जब तक जामे मुदर्रिसीन उस मुजतहिद को मरजा की फेहरिस्त में शामिल नहीं कर लेती।

अब सवाल ये उठता है कि लोग अपनी मनघडत बातो को दीन का हिस्सा कैसे बना लेते है? और इन गलत फ़हमियों को कैसे दूर किया जाए?

जिस तरह से मौलाना अहमद अली आबेदी साहब ने आगे बढ़ कर क़ौम के दर्द और ज़रूरत को समझा और एक अहम मसला लोगो के सामने पेश किया, ओलमा को चाहिए कि वो भी इसी तरह अवामुन्नास के ज़रूरी मसाइल को समझ कर खुलके बात करे।

हालांके मौलाना आबेदी साहब ने अपने ख़ुत्बे के आखरी हिस्से में चंद  दीगर मुजतहिद के नाम भी लिए थे, जो की क़ाबिले एहतेराम मुजतहिद और ओलमा है, लेकिन जामे मुदर्रिसीन ने उन्हें मरजा की फेहरिस्त में शामिल नहीं किया है।

ये आज अहम चीज़ है की हम इस मसले की अहमियत को समझे और बारीकी से इसका मुतालेआ करे कि क्या किसी ग़ैर मुजतहिद को ये हक़ बनता है कि वो मरजा का अपने मन से ऐलान करे? क्या किसी राह चलते आम आदमी को ये इख्तियार है कि वो जिसे चाहे अपना मरजा मान ले और दुसरो को भी उसे मानने को कहे?

ऐसी कई चीज़े है जो क़ौम को आगे बढ़कर सीखनी होगी और आगे आने वाली नस्लों तक तक़लीद की अज़ीम नेमत पहुचानी  होगी।

एक और मसला आजकल कुछ लोग आम कर रहे है वो ये है कि ऐसे मुजतहिद की तक़लीद करो जिसके मसले मेरे मन से ज़्यादा मिलते है। मसलन अगर मै चाहता हु कि बैंक का सुद (interest) इस्तेमाल करू और फ़र्ज़ करे की आलम उसे हराम जानता है, तो मै किसी ऐसे मुजतहिद को तलाश करू जो उसे जायज़ जाने और फिर मै उसकी तक़लीद करू। ये हरकत बिलकुल गलत है और असलन फिकरे मरजईयत के खिलाफ है।

अस्ल में हमें चाहिए कि आलम को तलाश करे और उसके मसाइल के हिसाब से अपनी ज़िन्दगी बसर करे।

अल्लाह का करम और अहसान है की उसने हमें ज़िम्मेदार और बबसीरत ओलमा से नवाज़ा है जो क़ौम की ज़रूरत समझ कर मसाइल को पेश करते है।

अल्लाह हमें अपने  ओलमा की पैरवी करने की तौफ़ीक़ अता करे और हमारे मुज्तहेदीन ओ ओलमा की हमेशा हिफाज़त करे। 
 

जैसा के हम सब जानते है के आज कल हिंदुस्तान के शिओ में तक़लीद को  ले कर काफी सारी फ़िक्रे उभर रही है, इस को हल करने की कोशिश आली जनाब हुज्जतुल इस्लाम मौलाना सय्यद अहमद अली आबेदी साहब ने अपने पिछले हफ्ते (28/11/2014)  खोजा मस्जिद, डोंगरी, मुंबई के जुमे के ख़ुत्बे में की. 

मौलाना आबेदी ने अपने ख़िताब का आग़ाज़ में लोगो को ईरान के शहर, क़ुम में मौजूद बुज़ुर्ग ओलमा की अंजुमन, “जामा ए मुदर्रिसीन”, से आश्ना कराया और इस बात पर ज़ोर दिया की ये रस्ते पर चलने वाले लोगो की नहीं बल्कि हक़ीक़तन बुज़ुर्ग ओलमा की जमाअत है. 
मौलाना आबेदी साहब के बक़ौल, जामे मुदर्रिसीन क़ुम में मौजूद बुज़ुर्ग ओलमा जिसमे आयतुल्लाह मकरेम शिराज़ी, आयतुल्लाह सफी गुलपैगानी, आयतुल्लाह नूरी हमदानी, आयतुल्लाह ख़ामेनई और  दीगर  मुज्तहेदीन की जमात है. इस जमात का एक अहम काम है कि सारी दुनिया के लिए “आलम” का इन्तेखाब है.


आलमकौन होता है? और क्या हमें उसे जान कर मानना ज़रूरी है?

फ़िक्रे मरजईयत के मुताबिक़ हर शिया के लिए दीनी कामियाबी के तीन राहे हल है:

  1. खुद इज्तिहाद करे और मुजतहिद बने (दिनी पढाई कर के)
  2. एहतियात पर अमल करे (ये काफी मुश्किल अमल है जिसमे हमे सारे बुज़ुर्ग मुजतहिद के फतवो को सामने  रखते हुए सबसे मुश्किल फतवे पर अमल करना होता है)
  3. ऐसे शख्स की तरफ रुजू करे (तक़लीद करे) जो दिनी लिहाज़ से सबसे ज़्यादा  इल्म रखता हो

यहाँ पर हमे इस बात की तरफ ध्यान देने की ज़रूरत है की अवाम कैसे जान सकती  कि सबसे ज़्यादा  इल्म किस आलिम के पास है?

इस सवाल को हल करने के लिए जामे मुदर्रिसीन काम करती है. क़ौम के बुज़ुर्ग ओलमा एक साथ जमा हो कर फैसला करते है कि कौन कौन  मुजतहिद मरजा बनने के दर्जे पर फ़ाइज़ होते है.  फिर इन ओलमा के नामो का  अवाम में ऐलान किया जाता है.

जामे मुदर्रिसीन ने जो फेहरिस्त आज अवाम को दी है उनमे इन मुज्तहेदीन के नाम है:

  1. आयतुल्लाह सीस्तानी (द अ)
  2. आयतुल्लाह ख़ामेनई (द अ)
  3. आयतुल्लाह मकारेम शिराज़ी (द अ)
  4. आयतुल्लाह नूरी हमदानी (द अ)
  5. आयतुल्लाह ज़न्जानी (द अ)
  6. आयतुल्लाह साफी गुलपैगानी (द अ)
  7. आयतुल्लाह वहीद खोरासानी (द अ)

इस फेहरिस्त को तैयार करते वक़्त बहोत सारे मुज्तहेदीन के नामो पर गौरोफिक्र की जाती  है और काफी बहसों तज़्कीरे के बाद फैसला लिया जाता है; ताकि शिया क़ौम अपने “आलम” को पहचान कर सही शख्स की तक़लीद कर सके.

यहाँ एक और सवाल उठता है, क्या हम इस फेहरिस्त से हट कर किसी और की तक़लीद कर सकते है?

ये सवाल करने से पहले हमे सोचना चाहिए कि जिस शख्स को हम तक़लीद के लायक समझते है उनका नाम भी जामे मुदर्रिसीन के पास गया होगा जिस पर बहसों तज़्कीरे के बाद उसे रद्द किया गया हो. जामे मुदर्रिसीन किसी अहल को उस मक़ाम पर पहुचने से नहीं रोकती इसलिए हमें चाहिए कि  हम इस ओलमा की जमात  (जामे मुदर्रिसीन) पर अपना भरोसा क़ायम रखे और इनके दिए हुए मराजेइन की फेहरिस्त में से किसी मरजा की तक़लीद करे.

अगर हमारे पास किसी और मुजतहिद की जानकारी और हम समझते है की वो मरजा होने के लायक है तो ये हमारा फ़रीज़ा है कि इसकी इत्तेला हम जामे मुदर्रिसीन को दे और ये साबित करे कि उस मुजतहिद का इल्मी  मेयार काफी बुलंद है; जो जामे की नज़रो से छुपा रह गया; जिसके बाद जामे  मुदर्रिसीन उस नाम पर फिर से गौरोफिक्र कर सकती है. अपने मन से किसी  मुजतहिद का इंतेखाब करके जामे ओलमा की दी हुई फेहरिस्त को नज़रअंदाज़ करना गलत काम होगा.

इसके साथ ही मौलाना आबेदी ने एक अहम पहलु की तरफ भी हमे आगाह कराया की अगर  किसी मसले में हमारा मरजा कोई फतवा  सादिर नहीं करता है, तो इस जगह हम किसी भी मुजतहिद  की बात नहीं मान सकते; बल्कि जिन मुज्तहेदीन की फेहरिस्त जामे मुदर्रिसीन ने दी उन्ही में से किसी / दूसरे दर्जे के मुजतहिद की बात पर अमल करना ज़रूरी होगा।

अल्लाह हम सब को इन ज़रूरी बातो पर अमल करने की तौफ़ीक़ अता करे ताकि हमारा ज़रूरी अमल  “तक़लीद” अच्छी तरह से मुकम्मल हो सके.

अल्लाह पूरी शिया क़ौम को अपने बुज़ुर्ग ओलमा ए दीन पर मुकम्मल भरोसा   करने की और उनके दीनी फरमान पर अमल करने की तौफ़ीक़ अता फर्माए.

अल्लाह हमें एक बनकर उसके दीन पर मुकम्मल तौर पर अमल पैरा होने की ताक़त और क़ूवत दे ताकि हम अपने ज़माने की इमाम के  जल्द ज़हूर के लिए काम कर सके.

इन सब का सिला अल्लाह हमें अपने वली-ए-हुज्जत वली-ए-अम्र इमाम महदी (अ) के ज़हूर की शक्ल में अता फर्माए.