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अज़ादारी

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Editorial

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1) अज़ादारी क्या है ?

मुसलमानों का एक  फिरका है शिया ऐ अहलेबय्त जो कर्बला में इमाम हुसैन (अ.स) (अहलेबय्त) के क़त्ल पे दुःख प्रकट करता है और उनका ग़म मनाता है और दुनिया वालों को भी बताता है की कर्बला में क्या हुआ था और क्यूँ हुआ था ? इस से मकसद सिर्फ इतना है की यह फिरका हजरत मुहम्मद (स.अ.व) से अपनी मुहब्बत का इज़हार करता है और कहता है या रसूल ऐ खुदा (स.अ.व) हम आपके नवासे के क़त्ल पे दुखी हैं और उनके कातिल यज़ीद को ज़ालिम और मुजरिम मानते हैं |और अल्लाह से कहता है ऐ अल्लाह तूने जिन अहलेबय्त के एहतेराम का हुक्म दिया था उसे भूखा प्यासा यजीद के हुक्म के उसके लश्कर के क़त्ल कर दिया हम ऐसे ज़ालिम यजीद के साथी नहीं हैं और अहलेबय्त पे हुए ज़ुल्म पे दुखी हैं |ऐसा करने के लिए अपनी अकीदत पेश करने के लिए वो अज़ादारी करता है| अज़ादारी के तरीकों में नौहा करना, मर्सिया करना , अलम ताजिया तुर्बत , ज़ुल्जिनाह के जुलुस निकालके लोगों को बताना की क्या हुआ था कर्बला  में और ज़ालिम यजीद ने कितना ज़ुल्म किया था अहलेबय्त पे ,शामिल है | इनमे से कोई ही  तरीका न तो बिद्दत है ना हराम  और न ही शिर्क क्यूँ की अहलेबय्त के चाहने वालों से ऐसा कोई तसव्वुर करना ही गलत होगा |

हकीकत में यजीद एक ज़ालिम बादशाह था जिसे डर से मुसलमानों ने खलीफा बना दिया था और उसने हजरत मुहम्मद (स.अ.व) के घराने (अहलेबय्त) पे जूम किया और जब मुसलमानों में बगावत होने लगी सत्य जान के तो उनको क़ैद से आज़ाद कर दिया | उस समय यजीद ने यह बहुत चाहा की उसके इस ज़ुल्म की कहानी कर्बला और कूफे की दीवारों में दफन ही जाये और इसकी नाकाम कोशिश उसने की लेकिन आजादी की खबर सुनते ही हजरत अली (अ.स) की बेटी जनाब ऐ जैनब ने सबसे पहले उसी यजीद से एक जगह मांगी और कहा कर्बला में उनके घराने वालों की शहादत के बाद ज़ालिम फ़ौज ने उन्हें उनपे रोने भी नहीं दिया इसलिए वो एक जगह चाहती हैं जहाना वो उनपे रो सकें और यजीद ने उन्हें एक जगह दे दी | यही ग़म ऐ हुसैन में पहली मजलिस थी और पहली अज़ादार जनाब ऐ जैनब  थीं | इस मजलिस का हिस्सा थे हुसैन और उनके परिवार में हुए ज़ुल्म को बनाय करते हुए नौहा करना और मसायब पढना |

आज भी यजीद की उस कोशिश की उसके ज़ुल्म के बारे में दुनिया ना जान सके पे चलने वाले लोग मौजूद हैं | इनमे से कुछ ऐसे हैं जो यजीद की साजिश उसका जुर्म छुपाने की समझ नहीं सके और अनजाने में अज़ादारी के खिलाफ बोलते और इसे रोकने की कोशिश करते हैं और कुछ ऐसे भी हैं जो जानते हैं लेकिन उनके दिलों में ज़ालिम यजीद की मुहब्बत है और अहलेबय्त से नफरत और इसी वजह से वो अज़ादारी के खिलाफ बोला करते हैं |यहाँ यह बताता चलूँ की यजीद का कहना था की न कोई वही हजरत मुहम्मद (स.अ.व० ) पे आयी थी और न की कोई अहलेबय्त की अफ्ज़लियत की बात थी यह सब अहलेबय्त का फैलाया ढोंग था और इसी बात को आज कुछ मुसलमान  आज भी मानते है |यह गिनती में कम अवश्य हैं लेकिन सौदिया में इनकी तादात अधिक है जिसकी वजह से यह गुमराह करने में अक्सर कामयाब हो जाया करते हैं |

मेरे इस लेख का मकसद सिर्फ दुनिया के सारे मुसलमानों को यह समझाना है की पहचान लो कौन है वो जो अहलेबय्त से मुहब्बत करने वालों का दुश्मन है और उनके दुःख में होने वाली अज़ादारी का दुश्मन है उअर इन अज़दारो के लिए कभी बिद्दत, कभी शिर्क कभी ताजिया देखने पे निकाह टूटने इत्यादि के फतवे देता रहता है | आज भी वो अपनी कौम को हिदायत देता है की अहलेबय्त के चाहने वालों से अज़ादारी करने वालों से बात मत करो क्यूँ की यजीद वाका डर आज भी उसके दिलों में मौजूद है की कहीं यजीद की जालिमाना हरकत दुनिया को पता ना लगने पाए लेकिन हक का और मजलूम का साथ अल्लाह देता है और आज सिर्फ मुसलमान ही नहीं गैर मुसलमान भी यजीद का नाम नफरत से और हुसैन (अहलेबय्त) का नाम इज्ज़त से लेता है |

आज जो लोग इस अज़ादारी , अलम ताजिये , तुर्बत ,नौहा , सोग ,मर्सिया को बिद्दत , शिर्क ,हराम  बताते हैं हैं वो इसे उनके मुल्लाओं के फतवे से ही साबित करते हैं | कुरान या हजरत मुहम्मद (स.अ.व) की अहादीस से वो कभी साबित नहीं कर पाते |  और जब भी यह इसे कुरान के खिलाफ बताने की कोशिश करते हैं तो वैसे ही नाम होते हैं जैसे यजीद हुआ था | जब अहलेबय्त को कैदी बना के दरबार ऐ यजीद  में लाया गया तो यजीद ने हजरत अली (अ.स) की बेटी जनाब ऐ जैनब से कहा की देखो अल्लाह कुरान में फरमाता है “ मैं जिसे चाहे इज्ज़त देता हूँ और जिसे चाहे ज़िल्लत “ और देखो मैं बादशाह के तख़्त पे इज्ज़त से बैठा हूँ और तुम कैदी हो | ज़ाहिरी तौर पे देखने में यह सही भी लगता था लेकिन हकीकत में जिसने अल्लाह की राह में कुराबी दी उसी को इज्ज़त मिलती है और जिसने ज़ुल्म किया उसे बेईज्ज़ती | आज नाम ऐ यजीद नफरत से लिया जाता है और वो ज़लील है और नाम ऐ हुसैन (अ.स) इज्ज़त से लिए जाता है जो हकीकत में कुरान की उस आयात की तफसीर है जिसे यजीद ने अपने हक में इस्तेमाल करने की भूल की थी |

यजीद और इमाम हसन (अ.स० ) के फर्क को जाने के लिए किताब शहीदे करबला और यज़ीद लेखकः मौलाना क़ारी तैयब साहब रह., पूर्व मोहतमिम दारूल उलूम देवबन्द अवश्य पढ़ें | शहीदे करबला और यज़ीद’ नामक किताब एक सुन्नी आलिम की लिखी हुई किताब है। दारूल उलूम देवबन्द के संस्थापक मौलाना क़ासिम नानौतवी साहब रह. का क़ौल भी इसके पृष्ठ 85 पर दर्ज है। जो उनके एक ख़त (क़ासिमुल उलूम, जिल्द 4 मक्तूब 9 पृष्ठ 14 व 15) से लिया गया है। इसमें मौलाना क़ासिम साहब रह. ने ‘यज़ीद पलीद’ लिखा है। आलिमों की अक्सरियत ने यज़ीद को फ़ासिक़ माना है और जिन आलिमों पर यज़ीद की नीयत भी खुल गई। उन्होंने उसे काफ़िर माना है। इमाम अहमद बिन हम्बल रहमतुल्लाह अलैहि एक ऐसे ही आलिम हैं। सुन्नी समुदाय में उनका बहुत बड़ा रूतबा है। इस किताब के पृष्ठ 109 पर इस बात का भी तज़्करा है। इमाम हुसैन शिया और सुन्नी के लिए ही इमाम (मार्गदर्शक) नहीं हैं बल्कि हरेक इंसान के लिए मार्गदर्शक हैं।

‘...और क़त्ले हुसैन और उनके साथियों के क़त्ल के बाद उसने मुंह से निकाला कि मैंने (हुसैन वग़ैरह से) बदला ले लिया है जो उन्होंने मेरे बुज़ुर्गों और रईसों के साथ बदर में किया था।’
-शहीदे करबला और यज़ीद, पृष्ठ 109, लेखकः मौलाना क़ारी तैयब साहब रह., पूर्व मोहतमिम दारूल उलूम देवबन्द,


‘तो ज़ैद (बिन अरक़म) रोने लगे तो इब्ने ज़ियाद ने कहा ख़ुदा तेरी आंखों को रोता हुआ ही रखे। ख़ुदा की क़सम अगर तू  बुड्ढा न होता जो सठिया गया हो और अक्ल तेरी मारी गई न होती तो मैं तेरी गर्दन उड़ा देता, तो ज़ैद बिन अरक़म खड़े हो गए और यहां से निकल गए, तो मैंने लोगों को यह कहते हुए सुना। वे कह रहे थे अल्लाह, ज़ैद बिन अरक़म ने एक ऐसा कलिमा कहा कि अगर इब्ने ज़ियाद उसे सुन लेता तो उन्हें ज़रूर क़त्ल कर देता। तो मैंने कहा, क्या कलिमा है जो ज़ैद बिन अरक़म ने फ़रमाया। तो कहा कि ज़ैद बिन अरक़म जब हम पर गुज़रे तो कह रहे थे कि ऐ अरब समाज! आज के बाद समझ लो कि तुम ग़ुलाम बन गए हो। तुमने फ़ातिमा के बेटे को क़त्ल कर दिया और सरदार बना लिया इब्ने मरजाना (इब्ने ज़ैद) को। जो तुम में के बेहतरीन लोगों को क़त्ल करेगा और बदतरीन लोगों को पनाह देगा।’
-शहीदे करबला और यज़ीद, पृष्ठ 101 लेखकः मौलाना क़ारी तैयब साहब रह., पूर्व मोहतमिम दारूल उलूम देवबन्द


हज़रत ज़ैद बिन अरक़म रज़ि. ने जो कहा था। वह हरफ़ ब हरफ़ सच साबित हुआ। इसी किताब के पृष्ठ 106 पर मशहूर अरबी किताब ‘अल-बदाया वन्-निहाया’ जिल्द 8 पृष्ठ 191 के हवाले से क़ारी तैयब साहब ने लिखा है कि जब इमाम हुसैन रज़ि. के क़त्ल पर इब्ने ज़ियाद ख़ुश हो रहा था। तब उसे हज़रत अब्दुल्लाह बिन अफ़ीफ़ अज़दी ने टोक दिया। इब्ने ज़ियाद ने उसे वहीं फांसी दिलवा दी।

आज उनके लिए जो हक की तलाश में रहते हैं मैं यह बताने की कोशिश कर रहा हूँ की इमामबाडा , अज़ादारी, मर्सिया, नौहा, अलम , ताजिया , तुर्बत क्या है और क्या है यह अज़ादारी का जुलूस क्या है ? जिस से मुसलमान गुमराही से बच सकें और अल्लाह की रहमत के करीब रहे |

२) इमामबाडा क्या है ?


इमामबाडा कर्बला में इमाम हुसैन (अ.स) के रौज़े की नकल है ठीक उसी तरह जिस तरह मस्जिदों बनती हैं जो मस्जिद इ नबवी या मस्जिद ऐ अक्सा की नकल हैं | बस इन इमामबाड़ों में हर कौम के इंसानों को आने की इजाज़त है जिस से वो जान सकें इस्लाम क्या था, ज़ुल्म और ज़ालिम इस्लाम का हिस्सा नहीं और क्यूँ यजीद से मुसलमान नफरत  करता है और हुसैन (अ.स) से मुहब्बत ? अहलेबय्त -इमाम हुसैन (अ.स) से मुहब्बत और ज़ालिम से नफरत अल्लाह का हुक्म भी है और रसूल ए खुदा (स.अ.व) की सुन्नत भी है ,जिसके इज़हार के लिए इमामबाड़े हैं और इसलिए  इबादतगाह भी माना गया है क्यूँ की अल्लाह और रसूल (स.अ.व) के हुक्म और उनकी सुन्नत पे चलना इबादत है |
जौनपुर का शार्की समय का इमामबाडा इमाम पुर 
lucknow का छोटा इमामबाडा
lucknow का बड़ा इमामबाडा .

अगले लेख का इंतज़ार करें जिसमे आप सभी को बताऊंगा कि अलम, ताज़ा ,तुर्बत और ज़ुल्जिनाह क्या है ? यदि मिसी समझदार मुसलमाना भाई को इसमें से कुछ हराम , बिद्दत, शिर्क लगे तो अवश्य बताएं ?
 इरान में एक हत्यारे पे अपने दोस्त की हत्या का आरोप था और उसे फँसी की सजा सुनायी गयी | जिस समय हत्यारे को फँसी की सजा दी जा रही थी | हत्यारे के अब बचने का कोई रास्ता नहीं केवल इसके की पीड़ित की परिवार वाले जैसे माता पिता उसे माफ़ कर दें | इस्लाम के कानून में हत्या की सजा मौत है और पीड़ित के पास यह अधिकार होता है की वो चाहे तो उसे माफ़ कर दे |

अचानक पीड़ित की माँ वहाँ आयी और उसने हत्यारे को पहले एक कसकर थप्पड़ मारा और उसके बाद उसके गले से फंदा निकाल दिया  और उसे माफ़ कर दिया क्यूंकि हत्यारा उसके पुत्र का मित्र था और पीड़ित  की माँ को ऐसा लगा की हत्या जोश में हो गयी वरना हत्यारा अपने मित्र की हत्या नहीं करना चाहता था |

इसे कहते हैं इन्साफ और माफ़ करने की बेहतरीन मिसाल |



सूरए बक़रह की आयत नंबर २२८ इस प्रकार है।

और तलाक़ पाने वाली स्त्रियां तीन बार मासिक धर्म आने तक स्वयं को प्रतीक्षा मे रखें और यदि वे ईश्वर तथा प्रलय पर ईमान रखती हें तो उनके लिए वैघ नहीं है कि वे (किसी और से विवाह करने के लिए) जिस वस्तु की ईश्वर ने उनके गर्भाशयों में सृष्टि की है, उसे छिपाएं अलबत्ता इस अवधि में उनके पति उन्हें लौटा देने का अधिक अधिकार रखते हैं यदि वे सुधार का इरादा रखते हों और (पुरुषों को जान लेना चाहिए कि) जितना दायित्व महिलाओं पर है उतना ही उनके लिए अच्छे अधिकार हैं, और (महिलाओं को जान लेना चाहिए कि घर चलाने में) पुरुषों को उन पर एक वरीयता प्राप्त है और ईश्वर प्रभुत्वशाली तथा तत्वदर्शी है। (2:228)


 परिवार और बच्चों की सुरक्षा के लिए यह आयत कहती है कि तलाक़ की दशा में महिला तीन महीनों तक धैर्य करे और किसी से निकाह न करे ताकि प्रथम तो यदि उसके गर्भ में बच्चा हुआ तो इस अवधि में स्पष्ट हो जाएगा और शिशु के अधिकारों की रक्षा होगी और शायद यही बच्चा दोनों की जुदाई को रोकने की भूमि समतल कर दे और दूसरे यह कि इस बात की भी संभावना पाई जाती है कि पति-पत्नी को अलग होने के अपने निर्णय पर पश्चाताप हो और वे पुनः संयुक्त जीवन बिताना चाहें कि स्वाभाविक रूप से इस दशा में पति को अन्य लोगों पर वरीयता प्राप्त है।
 अंत में यह आयत पति-पत्नी के बीच कटुता समाप्त करने तथा भलाई उत्पन्न करने के मार्ग के रूप में एक महत्वपूर्ण बात बताती है और वह यह है कि पहले पुरुषों से कहती है कि यद्यपि घर और परिवार के बारे में महिलाओं का कुछ दायित्व बनता है परन्तु उतना ही वे अपने बारे में तुम पर मानवीय अधिकार रखती हैं जिन्हें तुम्हें बेहतर ढंग से पूरा करना चाहिए।
 इसके पश्चात यह आयत महिलाओं को संबोधित करते हुए कहती है कि घर चलाना तथा उससे संबन्धित अन्य बातों की व्यवस्था पुरुषों के ज़िम्मे है और इस मार्ग में वे बेहतर ढंग से काम कर सकते हैं। अतः इस संबन्ध में उन्हें तुमपर वरीयता प्राप्त है।


सूरए बक़रह की आयत संख्या २२९ इस प्रकार है।

(हर पुरूष के लिए अपनी पहली पत्नी के पास लौटने और) तलाक़ (देने का अधिकार) दो बार है अतः (हर स्थिति में या तो) अपनी पत्नी को भले ढंग से रोक लेना चाहिए या भले ढंग से उसे छोड़ देना चाहिए और (तुम पुरूषों के लिए) वैध नहीं है कि जो कुछ तुम अपनी पत्नियों को दे चुके हो वो (उनपर कड़ाई करके) वापस लेलो, सिवाए इसके कि दोनों को भय हो कि वे ईश्वरीय आदेशों का पालन न कर सकेंगे तो यदि तुम भयभीत हो गए कि वे दोनों ईश्वरीय सीमाओं को बनाए न रख सकेंगे तो इस बात में कोई रुकावट नहीं है कि तलाक़ का अनुरोध पत्नी की ओर से होने की दशा में वे इसका बदला दें और अपना मेहर माफ़ कर दे। यह ईश्वरीय देशों की सीमाए हैं इनसे आगे न बढ़ो, और जो कोई ईश्वरीय सीमाओं से आगे बढ़े, तो ऐसे ही लोग अत्याचारी हैं। (2:229)


 पिछली आयत में कहा गया था कि तलाक़ के पश्चात पत्नी को तीन महीने तक किसी अन्य व्यक्ति से विवाह नहीं करना चाहिए ताकि यदि वह गर्भवती हो तो स्पष्ट हो जाए और यदि पति को तलाक़ पर पछतावा हो तो पत्नी को वापस बुलाने की संभावना रहे। उसके पश्चात यह आयत कहती है कि अलबत्ता पति केवल दो बार ही अपनी पत्नी को तलाक़ देने और उससे "रुजू" करने अर्थात उसके पास वापस जाने की अधिकार रखता है और यदि उसने अपनी पत्नी को तीसरी बार तलाक़ दिया तो फिर रुजू की कोई संभावना नहीं है।
इसके पश्चात यह आयत पुरूषों को घर चलाने के लिए एक अति आवश्यक सिद्धांत बताते हुए कहती है कि या तो जीवन को गंभीरता से लो और अपनी पत्नी के साथ अच्छे ढंग से जीवन व्यतीत करो और यदि तुम उसके साथ अपना जीवन जारी नहीं रख सकते तो भलाई और अच्छे ढंग से उसे स्वतंत्र कर दो। अलबत्ता तुम्हें उसका मेहर देना पड़ेगा।
 इसी प्रकार यदि पत्नी तलाक़ लेना चाहती है तो उसे अपना मेहर माफ़ करके तलाक़ लेना होगा परन्तु हर स्थिति में पति को यह अधिकार नहीं है कि वह अपनी पत्नी को सता कर उसे मेहर माफ़ करने और तलाक़ लेने पर विवश करे।

सूरए बक़रह की आयत संख्या २३०, २३१ और २३२ इस प्रकार है।

यदि (पति ने दो बार रुजू करने के पश्चात तीसरी बार अपनी पत्नी को) तलाक़ दे दी तो फिर वह स्त्री उसके लिए वैध नहीं होगी जब तक कि वह किसी दूसरे व्यक्ति से विवाह न कर ले, फिर यदि दूसरा पति उसे तलाक़ दे दे तो फिर इन दोनों के लिए एक दूसरे की ओर पलट आने में कोई दोष नहीं होगा। अलबत्ता उस स्थिति में, जब उन्हें आशा हो कि वे ईश्वरीय सीमाओं का आदर कर सकेंगे। यह अल्लाह की सीमाएं हैं जिन्हें वह उन लोगों के लिए बयान कर रहा है जो जानना चाहते हैं। (2:230) और जब तुम स्त्रियों को तलाक़ दो और वे "इद्दत" अर्थात अपने नियत समय की सीमा (के समीप) पहुंच जाए तो या तो उन्हें भले ढंग से अपने ही पास रोक लो या फिर अच्छे ढंग से उन्हें विदा और स्वतंत्र कर दो। उन्हें सताने के लक्ष्य से न रोको कि उनपर अत्याचार करो और जिसने भी ऐसा किया वास्तव में उसने स्वयं पर ही अत्याचार किया और ईश्वर की आयतों का परिहास न करो बल्कि सदैव याद करते हरो उस विभूति को जो ईश्वर ने तुम्हें दी है और किताब तथा हिकमत को जिसके द्वारा वह तुम्हें नसीहत करता है और ईश्वर से डरते रहो और जान लो कि वह हर बात का जानने वाला है। (2:231) और जब तुम अपनी स्त्रियों को तलाक़ दे चुको और वे अपनी "इद्दत" पूरी कर लें तो उन्हें अपने पुराने पतियों से पुनः विवाह करने से न रोको जबकि वे अच्छे ढंग से आपस में राज़ी हों। ईश्वर के इन आदेशों द्वारा तुम में से उन लोगों की नसीहत होती है जो ईश्वर और प्रलय पर ईमान रखते हैं। यह आदेश (तुम्हारी आत्मा की) पवित्रता के लिए अधिक प्रभावशाली तथा (समाज को पाप से) साफ़ करने के लिए अधिक लाभदायक है। ईश्वर (तुम्हारे भले को) जानता है और तुम नहीं जानते। (2:232)


 चूंकि इस्लाम वैध और स्वाभाविक इच्छाओं का सम्मान करता है और पति-पत्नी के एक-दूसरे के पास वापस आने और उनकी छाया में बच्चों के प्रशिक्षण व प्रगति का स्वागत करता है अतः उसने इस बात की अनुमति दी है कि यदि पत्नी ने किसी अन्य व्यक्ति से विवाह कर लिया और बाद में उससे भी अलग हो गई तथा पुनः अपने पहले पति के साथ जीवन बिताने पर सहमत हो गई तो वे पुनः विवाह कर सकते हैं। इस बात की बहुत अधिक संभावना है कि उनका जीवन आनंदमयी हो जाए। स्पष्ट सी बात है कि इस स्थिति में पति-पत्नी के अभिभावकों या अन्य लोगों को ये अधिकार नहीं है कि वे इस विवाह में बाधा डालें, बल्कि पुनः पति-पत्नी की सहमति ही विवाह के लिए पर्याप्त है।

आइए अब देखते हैं कि इन आयतों से हमने क्या सीखा।
पत्नी के मानवाधिकारों के साथ ही साथ उसके आर्थिक अधिकारों की भी रक्षा होनी चाहिए तथा पति को यह अधिकार नहीं है कि वह पत्नी की संपत्ति या उसके मेहर को अपने स्वामित्व में ले ले।
 आवश्यकता पड़ने पर यदि तलाक़ हो तो उसे भलाई के साथ होना चाहिए न कि द्वेष और प्रतिरोध के साथ।
 सौभाग्यपूर्ण परिवार वह है जिसके सदस्यों के संबन्ध ईश्वरीय आदेशों पर आधारित हों परन्तु यदि वे पाप के आधार पर जीवन जारी रखना चाहते हों तो बेहतर है कि वे तलाक ले लें।
पति के चयन में महिला की राय आवश्यक और सम्मानीय है तथा मूल रूप से विवाह का आधार अच्छे ढंग से दोनों पक्षों की आपस में सहमति है।
लोग कहते हैं इस्लाम १४०० साल पुराना धर्म है इसके कानून में आज तरक्की के युग में बदलाव होना चाहिए जबकि सच्चाई यह है  की इस्लाम के कानून परिस्थितियों के अनुसार खुद बदलते रहते हैं |अक्सर होता यह है कि लोग इस्लाम धर्म को समझे बिना इसके कानून पे सख्ती से अमल करने वाले को कट्टरवादी या  संकीर्ण मानसिकता का प्रतीक मानते  हैं | जब कि यह सारी बातें केवल एक फरेब हैं| यह सच है की अल्लाह के हुक्म के आगे मुसलमान किसी की नहीं सुनता और यही मुसलमान की खूबी है | इस्लाम धर्म  के कानून इंसानों को फायदा पहुंचाते हैं नुकसान नहीं फिर आज के युग का हवाल दे के इसे बदलने की बातो का क्या मतलब है ? मैं यह मानता हूँ की यदि किसी भी धर्म के कोई कानून समाज में बेईज्ज़त का कारण बने या हंसी का कारण बने या समाज को किसी तरह का नुकसान पहुंचाए तो उस पे अड़ियल रवैया सही नहीं और इस्लाम के कानून भी यही पैगाम देते हैं | आज बात करेंगे ऐसे कुछ कानून की जिनका सहारा ले के लोग कुरान में परिवर्तन का मशविरा दिया करते हैं|

सवाल : क्या इस्लाम परिवार नियोजन के खिलाफ है ?
जवाब : नहीं इस्लाम परिवार नियोजन के खिलाफ नहीं बल्कि भ्रूण हत्या के खिलाफ है | हाँ इस्लाम इसकी इजाज़त तब देता है जब परिवार नियोजन ना करने से कोई नुकसान हो रहा हो |

सवाल २: क्या इस्लाम में तलाक देने का तरीका तीन बार तलाक कह के पत्नी से छुटकारा पा लेना है |
जवाब : नहीं केवल तीन बार तलाक कह देने से तलाक़ नहीं हो जाता बल्कि इसका एक लम्बा तरीका है जिसे आप मेरे इस लेख में पढ़ सकते हैं |

सवाल ३: क्या इस्लाम में मांसाहार आवश्यक है ?
जवाब ४) इस्लाम में मांसाहार मना नहीं है लेकिन इसकी अधिकता को ठीक नहीं समझा जाता और हर जानवर भी खाया नहीं जा सकता | कुछ ही जानवर ऐसे हैं जिनको खाने की इजाज़त दी गयी है| कौन जानवर मना है और कौन खाया जा सकता है इसके कारण भी बताये गए हैं |

सवाल 5) क्या इस्लाम में परदे का मतलब होता है काले लिबास में सर से लेकर पैर तक महिला को छुपा के रखना और घर से बहार ना जाने देना |
जवाब ) इस्लाम में चेहरे का पर्दा नहीं है और महिला तथा पुरुष दोनों का एक दुसरे से अपना शरीर छुपाने का हुक्म है जिसे पर्दा कहते हैं | यह काम ढीली शलवार कमीज़ पहन के भी महिलाएं कर सकती हैं और सारी में आँचल से सर छुपा के भी किया जा सकता है | काला नकाब या चेहरे का छिपाना इलाकाई  दस्तूर है जो पुरुष प्रधान कानून के चलते बनाया गया है | इस्लाम और कुरान में ऐसा कोई हुक्म नहीं है |

सवाल 6) क्या इस्लाम में बालविवाह की इजाज़त है ?
जवाब ) इस्लाम में उस समय तक विवाह नहीं हो सकता जब तक लड़का और लड़की दोनों बालिग़ ना हो जायें या ऐसा कह लें गर्भधारण के काबिल ना हो जाएँ |शादी लड़के और लड़की की मर्जी के खिलाफ नहीं की जा सकती या कहलें माता पिता की केवल मर्जी से शादी संभव नहीं है |

सवाल7) इस्लाम क्या मुसलमानों को दुसरे धर्म के लोगों से मिलने जुलने पे कोई पाबन्दी लगाता है ?
जवाब) नहीं ऐसी कोई पाबन्दी नहीं है बल्कि दुसरे धर्म के लोगों से मिलने जुलने पे और अच्छे व्यवहार को पुण्य मानता है |

सवाल 8) क्या इस्लाम में कुरान के कानून के खिलाफ जाने वाले मुसलमान पे किसी प्रकार की ज़बरदस्ती करने का हुक्म है ?
जवाब ) नहीं इस्लाम में ज़बरदस्ती मना है और सजा देने वाला सिर्फ अल्लाह है | हाँ उन जुर्म की सजा अवश्य है जो किसी दुसरे इंसान को नुकसान पहुंचा रहा हो | जैसे चोरी, बलात्कार इत्यादि लेकिन यह सजा भी इस्लाम के कानून का जानकार मुजतहिद या क़ाज़ी  ही दे सकता है ,आम इंसानों को ऐसा करने की मनाही है |


आज विश्व के सारे मुसलमान इन्ही कानून को मानते हैं  | मैंने यहाँ उनका ज़िक्र नहीं किया है जहां कुरान और मुसलमान के व्यवहार में विरोधाभास हो और कोई यह कहे की भाई कुरान में क्या लिखा है यह अहमियत नहीं रखता बल्कि मुसलमान क्या करता है यह अहम् है | मैं खुद इस बात से सहमत हूँ |

आज हम जिस युग में जी रहे हैं वहाँ शराब और शबाब को धनी लोगों का शौक माना जाता है और यह आज आसानी से उपलभ्द भी है| महिलाओं और पुरुषों का अपना शारीरिक प्रदर्शन आज फैशन बन गया है| इस्लाम इस शारीरिक प्रदर्शन के और धन की लालच में स्त्री पुरुष के शारीरिक सम्बन्ध के खिलाफ है | आप कह सकते हैं की इंसानों का  जंगल के जानवरों की तरह व्यवहार के इस्लाम खिलाफ है | इस्लाम अनैतिक और छुप के शार्रीरिक संबंधों के खिलाफ है और आपसी सहमती से कुछ कानून का पालन करते हुए स्त्री पुरुष आपस में शारीरिक सम्बन्ध बना सकते हैं| इस्लाम आजादी में बाधा नहीं डालता बल्कि इस बात पे जोर देता है की धोका और फरेब पति पत्नी एक दुसरे से ना करें और जो करें समाज में इज्ज़त के साथ करें | जुआ , शराब , अनैतिक संबधों और ऐसे हर नशे के इस्लाम खिलाफ है जिसे करने से इंसान होश खो दे या जिसकी लत लग जाए |

इस्लाम के कानून परिस्थितियों के अनुसार बदलते भी रहे हैं जैसे आप सवाल करें की आपके बच्चे को facebook की लत लग गयी है और इतनी अधिक है की वो अपनी दिनचर्या , पढाई या व्यवसाय के काबिल भी नहीं रहा तो इस्लाम का कानून इसे हराम कह देगा और यदि यही आदत केवल एक शौक है और इसे आपके बच्चे की दिनचर्या पे कोई अंतर नहीं पड़ रहा तो यही सही कहा जायेगा | या आप पूछें क्या पुरुष का स्त्री से बात करना या ऑनलाइन चैट करना या दफ्तरों में एक साथ काम करना मना है? तो जवाब आएगा नहीं कोई हर्ज नहीं यदि ऐसा करने से आप को अनैतिक संबंधों के बनने का डर नहीं | इस्लाम आपको चार शादी की इजाज़त देता है लेकिन यदि इस से समाज में इज्ज़त कम होती हो या पत्नी इसकी इजाज़त नहीं दे रही या आप सभी पत्नियों के साथ एक जैसा व्यवहार नहीं रख सकते हैं तो ऐसा करना मना है |


इस्लाम इंसान को जीने का सलीका सिखाता है | आपके लिए कब सोना सही है कब जागना सही है ? क्या खाना सही है या क्या पहनना सही है ? कैसे लोगों से मिलना जुलना चाहिए कैसे उठाना बैठना चाहिए ? सभी कुछ इस्लाम में मौजूद है बस आवश्यकता है तो इंसानों के समझने की के इस्लाम है क्या ? यह इंसानों को इंसानियत सीखाता है , समूह में मिल जुल के रहना सिखाता है | आज का मुसलमान यदि इस्लाम के कानून के खिलाफ कुछ करता है तो वो धन दौलत और शोहरत की लालच में करता है | और जो गुनाह करता है वो है झूट बोलना, पीठ पीछे बुराई करना, बेपर्दा महिलाओं का घूमना ,अनैतिक सम्बन्ध बना लेना इत्यादि और यह वही बुराईयाँ है जो हर धर्म का इंसान  अपने अपने धर्म के कानून को तोड़ते हुए लालच में किया करता है |

जिन लोगों ने अपने अपने धर्म की किताबों को बदल लिया है वो आज इश्वर के बताये कानून पे चलने वाले नहीं रह गए है | और बदलाव वही हुआ है जो आज के इंसान की पसंद हैं |ऐसा कर  के इंसान ने खुद अपना ही एक धर्म बना लिया है बस नाम पुराने धर्म का ही चला रहा है | अल्लाह का कोई भी कानून ऐसा नहीं जो इंसान के लिए कोई समस्या पैदा कर दे | यदि किसी पाठक  को कम से कम इस्लाम का कोई कानून ऐसा लगता हो जो आज के युग में जीवन गुज़ारने में बाधक हो तो अवश्य उसका ज़िक्र करें | आपको जवाब मिलेगा और देखेंगे की इस्लाम में हर समस्या का समाधान मौजूद हैं क्यूँ की अल्लाह वो है जिसने दुनिया बनाई, जीव जंतु और इंसान बनाये और वो सब जानता है आने वाले दिनों में इनके सामने कैसी कैसी समस्याएं आ सकती हैं और उनका हल क्या होगा ? 

नोट: मेरा पिछले सप्ताह का लेख था "जो परिवर्तनशील हो वो धर्म नहीं हो सकता |" और आज का यह लेख है "इस्लाम के कानून परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तनशील हैं |" कुछ लोगों को इसमें विरोधाभास नज़र आ रहा है जबकि ऐसा है नहीं | धर्म यदि अल्लाह का बनाया है तो इसमें बदलाव लाना इंसान के वश की बात नहीं और यदि ऐसा होगा तो नतीजा गलत ही आएगा |यह मेरे महले वाले लेख का सन्देश था और इस्लाम अल्लाह का दिया धर्म है जो यह जानता है की आने वाले समय में कैसी परिस्थितियां हो सकती है और कैसे बदलाव की आवश्यकता पद सकती है | इसीलिये तो उसे अल्लाह कहते हैं | ऐसे में इस्लाम धर्म के कानून में परिस्थितियों के अनुसार बदलाव का प्राविधान है | अल्लाह की किताब में परिवर्तन केवल अल्लाह का अधिकार है | यह मेरे अभी के लेख का सन्देश है | 
इमाम हुसैन का ज़िक्र करने वालों का नाम फ़ातेमा ज़हरा की लिस्ट में
किताबे " चेहरये दरख़शाँ हुसैन इबने अली अलैहिमस्सलाम " के पेज न0 227 और 230 पर इस तरह लिखा है महान आलिम हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लमीन जनाब हाज मुर्तज़ा मुज्तहेदी सीस्तानी इस तरह बयान करते हैः
मेरे चाचा जनाब सय्यद इब्राहीम मुज्तहेदी सीस्तानी इमाम-ए-रज़ा अलैहिस्सलाम के पुराने ज़ाकरीन में से थे. मेरे स्वर्गीय चाचा ने एक सपने मे सिद्दीक़ए कुबरा हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाहे अलैहा को देखा कि एक सूची उन के सामने रखी है जो खुली हुई है मैं ने उन इस बारे में पूछा कि यह किस की सूची है ?

सिद्दीक़ए कुबरा हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाहे अलैहा ने फ़रमायाः मेरे बेटे हुसैन की मजलिस पढ़ने वालों का नाम इस सूची में है।
मेरे स्वर्गीय चाचा ने देखा कि कुछ मजलिस पढ़ने वालों का नाम उस सूची में है और वह पैसा कि जो उन को मजलिस पढ़ने का उस मोहर्रम में दिया गया था वह भी उस सूची में लिखा है।
मेरे स्वर्गीय चाचा ने अपना भी नाम उस सूची में देखा और यह भी देखा कि उन के नाम के आगे लिखा था 30 तूमान (ईरानी पैसे को तूमान कहते हैं।)
नींद से जागे तो जो सपना उन्हों ने देखा था बहुत आश्चर्यचकित हुए क्योंकि 30 तुमान उस ज़माने में एक मजलिस का बहुत ज़्यादा पैसा था मगर दो महीने और ज़्यादा मजलिसों के कारण इत्ना पैसा हो सकता था लेकिन संजोग से उसी वर्ष वह बीमार हो गए यहाँ तक कि घर से निकलने की भी ताक़त नही थी और उन की बीमारी हर दिन बढ़ती ही जा रही थी यहाँ तक कि मोहर्रम और सफ़र को महीना ख़तम होने का था। इस दो महीने में सिर्फ़ एक दिन उन की हालत कुछ ठीक हुई और सिर्फ़ एक ही मजलिस में जा सके मजलिस के बाद जिसने मजलिस करवाई थी उस ने उन को एक पैकेट दिया कि जिस में 30 तूमान था ।
इस बात से उन के सपने को सच होना सिध्द है और यह भी सिध्द होता है कि सिद्दीक़ये कुबरा हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाहे अलैहा मजलिस पढ़ने वालों पर कृपा करती हैं और सब कुछ उस महान हस्ती के कन्टरोल में है ।
मजलिस पढ़ने वालों का सिद्दीक़ये कुबरा हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाहे अलैहा की नज़र में क्या पद है और वह लोग कित्ने महान है उन की नज़र में, इस बात का पता इमाम-ए-जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम की इस बात से चलता हैः
कोई भी ऐसा नहीं है कि जो इमाम-ए-हुसैन अलैहिस्सलाम पर आंसू बहाये और रोये मगर यह कि उस का रोना सिद्दीक़ये कुबरा हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाहे अलैहा तक पहुँचता है और सिद्दीक़ये कुबराहज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाहे अलैहा इमाम-ए-हुसैन अलैहिस्सलाम पर रोने वालों की सहायता करती हैं, और उस का रोना रसूले ख़ुदा तक भी पहुंचता है और वह इन आंसूओं की क़ीमत अदा करते हैं।

एक दूसरी रेवायत मे भी इमाम-ए-हुसैन अलैहिस्सलाम पर रोने के सिलसिले में इमाम-ए-जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम से वारिद हुआ है कि आप ने फ़रमायाः
जो कोई इमाम-ए-हुसैन अलैहिस्सलाम पर रोता है इमाम उस को देखते हैं और उस के लिए इस्तिग़फ़ार करते हैं और हज़रत अली अलैहिस्सलाम से भी कहते हैं कि वह भी रोने वालों के लिए इस्तिग़फ़ार करें और रोने वालों से कहते हैः

अगर तुम लोगों को मालूम हो जाये कि इश्वर ने तुम लागों के लिए क्या तय्यार किया है तो तुम जित्ना ज़्यादा दुखी होते उस से ज़्यादा उस के लिए ख़ुश होते और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम उस के लिए इस्तिग़फ़ार करते हैं हर उस गुनाह के लिए जो उस ने किया है।

इमामे हुसैन अलैहिस्सलाम के दुख में एक बूंद आँसु सारे गुनाह को ख़त्म कर देता है रेवायतों में आया है कि जो भी व्यक्ति इमाम-ए-हुसैन अलैहिस्सलाम की मजलिस में आता है उस को चाहिए कि उन के सम्मान का ध्यान रखे।

एक अहम बात यह है कि जो कोई इमाम-ए-हुसैन अलैहिस्सलाम कि मजलिस में रोता है उस को चाहिए कि वह इमाम-ए-ज़माना आज्जल्लाहू फ़रजहुश्शरीफ़ के ज़हूर के लिए दुआ करे और ईश्वर से यह दुआ करे कि वह इमाम के ज़हूर में जल्दी करे ताकि इमाम-ए-ज़माना की दुआ का मुस्तहेक़ हो।

एक जगह इमाम-ए-ज़माना आज्जल्लाहू फ़रजहुश्शरीफ़ ने फ़रमायाः
मैं हर उस व्यक्ति के लिए दुआ करता हूँ जो इमाम-ए-हुसैन अलैहिस्सलाम की मजलिस मे मेरे लिए दुआ करता है।

इस्लाम में नशा कोई भी हो हराम है या कह दें मना है | अक्सर लोग पूछते हैं क्या सिगरेट भी मना है क्या तम्बाकू और गुटका भी मना है ? भाई जिस चीज़ से नशा हो या  इंसान के शरीर के लिए जान के लिए घातक हो  वो सब हराम है या  मना है |

अल्लाह ने हमें बनाया और हमारी हिदायत के लिए समय समय पे आसमानी किताबें भेजी और उसे हमें समझाने के लिए उनपे चल के दिखाने के लिए नबी ,रसूल और इमाम भेजे| जिनमे से आखिरी किताब कुरान थी और आखिर नबी हजरत मुहम्मद (स.अ.व). हजरत मुहम्मद (स.अ.व) जाते समय कह गए मैं जा रहा हूँ और तुम्हारे बीच कुरान और अह्लेबय्त (हजरत मुहम्मद (स.अ.व) के घर वाले ) छोड़े जा रहा हूँ | इनका दामन  पकडे रहना ,कभी गुमराह नहीं होगे |

और अब तो मुसलमानों को देख के लगता है की उन्होंने अल्लाह और कुरान से भी आजादी पाने की कोशिश शुरू कर दी है | कोई बे हिजाब हुआ जा रहा है तो कोई जालिमो का साथ दे रहा है तो कोई जादू टोन के चक्कर में मुल्ला पंडित के दर पे खड़ा है तो कोई डिस्को में लगा है | इनमे से जो इन्तहा पसंद हैं वो आतंकवाद फैला रहे हैं और बे गुनाहों   की जान लेने को इस्लाम बता रहे हैं | यह और बात है की यह बिमारी आज धर्म वालों को लगी है और वो अब धर्म को और उसके उसूलों को बहुत अधिक अहमियत नहीं देते बल्कि जब परेशान होते हैं तब मथ्था टेकने चले जाते हैं |

जब हजरत मुहम्मद (स.अ.व) की वफात हो गयी तो अधिकतर मुसलमानों ने सबसे पहले अह्लेबय्त (हजरत मुहम्मद (स.अ.व) के घर वाले ) से आज़ादी ले ली और जब अह्लेबय्त  ने कुरान दिखाई , हजरत मुहमद (स.अ.व) की हदीस दिखाई तो उनपे ज़ुल्म किया और कहने लगे कुरान काफी है और ऐसा कह के हजरत मुहम्मद (स.अ.व) से भी खुद को आज़ाद कर लिया | यहीं से फिरके बनने शुरू हो गए किसी ने अह्लेबय्त से आज़ादी ली वो अलग फिरका किसी ने अह्लेबय्त  से तो आज़ादी ली लेकिन हजरत मुहम्मद (स.अ.व) का दमन पकडे रहे वो अलग फिरका लेकिन वो फिरका जिसने हजरत मुहम्मद (स.अ.व) की अहादीस को वैसे माना जैसा उनका हुक्म था और न अह्लेबय्त का दम छोड़ा , न हजरत मुहम्मद (स.अ.व) का दमन छोड़ा और कुरान पे वैसे चले जैसे अह्लेबय्त ने चल के दिखाया वो सही राह पे रहे क्यों की अल्लाह सूरा ए रूम में फरमाता है जो लोग अपनी इच्छाओं या दूसरे कारणों से अल्लाह और रसूल पर सबक़त करते हैं उनके पास ईमान और तक़वा नही है।

आज भी वो मुसलमान जिसने अल्लाह उसके रसूल हजरत मुहम्मद (स.अ.व) और उनके घराने वालों का साथ नहीं छोड़ा दहशतगर्दी में कभी शरीक नहीं मिलते बल्कि दहशतगर्दी और आतंकवाद का शिकार हो जाया करते हैं | यह दो बातें साबिक करता है की इस्लाम का सही पैग़ाम अमन और शांति है जो अल्लाह उसके रसूल हजरत मुहम्मद (स.अ.व) और उनके घराने वालों का साथ  पकड़ने वालों का पैग़ाम है और दुसरे यह की अल्लाह का सही पैग़ाम देने वालों पे हजरत मुहम्मद (स.अ.व) की हदीस पे वैसे अमल करने वालों पे जैसा उन्होंने कहा था ,पहले भी ज़ुल्म हुआ और आज भी वही ज़ुल्म का शिकार होते है |

यह ज़ुल्म वही करते हैं जो खुद को मुसलमान कहते हैं लेकिन  अल्लाह उसके रसूल हजरत मुहम्मद (स.अ.व) और उनके घराने वालों  से आजादी ले चुके हैं | आपने सुना होगा की ऐसे भी मुसलमान हैं जो हजरत मुहम्मद (स.अ.व) की निशानियों को मक्का और मदीने में भी मिटा रहे हैं और आपने यह भी सुना होगा की हजरत मुहम्मद (स.अ.व) के घराने पे ज़ुल्म हुआ कभी  उनकी बेटी फातिमा (स.अ.व) का घर जला, कभी कर्बला में उनके नवासे इमाम हुसैन (अ.स) का क़त्ल हुआ | यह भी एक फिरका है जो कल भी ज़ालिम था आज भी ज़ालिम है | और आपने यह भी देखा होगा की एक फिरका ऐसा है जो हजरत मुहम्मद (स.अ.व) के घराने पे हुए ज़ुल्म पे आंसू बहता है , उसके खिलाफ आवाज़ उठता है |यह काभी दहशत गर्द नहीं होता क्यूँ की यह असल इस्लाम को मानता है जहां दहशतगर्दी हराम है और ऐसा गुनाह है जो कभी माफ़ नहीं होता |


यह आज़ादी भी एक नशा है जो हराम है क्यूँ की यह गुमराही का एक बड़ा कारण है |

जी हाँ यह अजीब सा ज़रूर लगता है लेकिन सच हैं की हम उस दौर से गुज़र रहे हैं जहां एक भाई दुसरे भाई से दूरी रखने में और गैरों से दोस्ती में यकीन ज्यादा रखता है | रिश्तेदारों में बीच में ना इत्तेफाकियाँ बढती जा रही हैं और इन्तहा यह है बहुत बार यह भे देखा गया है की गैरों से ही अपने रिश्तेदार, भाई को बे इज्ज़त लोग करवा देते हैं | गैरों से दोस्ती इस्लाम में बहुत अहमियत रखती है लेकिन पहला हक आपके रिश्तेदार , भाई बहत माता पिता का होता है दूसरा पडोसी का चाहे वो किसी भी धर्म का हो और उसके बाद सामाजिक ताल्लुकातों का |

यह गुनाह आज हर दुसरे घर में फ़क्र के साथ अंजाम दिया जा रहा है बना इस गुनाह का अंजाम जाने | अब देखिए अल्लाह सुबह ओ ताला कुरान में क्या फरमाता है ?

सूरए निसा में 176 आयतें हैं और यह सूरा मदीना नगर में उतरा है। चूंकि इस सूरे की अधिकांश आयतें परिवार की समस्याओं और परिवार में महिलाओं के अधिकारों से संबंधित हैं इसलिए इसे सूरए निसा कहा गया है जिसका अर्थ होता है महिलाएं।

अल्लाह के नाम से जो अत्यन्त कृपाशील और दयावान है। हे लोगो! अपने पालनहार से डरो जिसने तुम्हें एक जीव से पैदा किया है और उसी जीव से उसके जोड़े को भी पैदा किया और उन दोनों से अनेक पुरुषों व महिलाओं को धरती में फैला दिया तथा उस ईश्वर से डरो जिसके द्वारा तुम एक दूसरे से सहायता चाहते हो और रिश्तों नातों को तोड़ने से बचो (कि) नि:संदेह ईश्वर सदैव तुम्हारी निगरानी करता है। (4:1)




 यह सूरा, जो पारीवारिक समस्याओं के बारे में है, ईश्वर से भय रखने के साथ आरंभ होता है और पहली ही आयत में यह सिफारिश दो बार दोहराई गई है क्योंकि हर व्यक्ति का जन्म व प्रशिक्षण परिवार में होता है और यदि इन कामों का आधार ईश्वरीय आदेशों पर न हो तो व्यक्ति और समाज के आत्मिक व मानसिक स्वास्थ्य की कोई ज़मानत नहीं होगी।  ईश्वर मनुष्यों के बीच हर प्रकार के वर्चस्ववाद की रोकथाम के लिए कहता है कि तुम सब एक ही मनुष्य से बनाये गये हो और तुम्हारा रचयिता भी एक है अत: ईश्वर से डरते रहो और यह मत सोचो कि वर्ण, जाति अथवा भाषा वर्चस्व का कारण बन सकती है, यहां तक कि शारीरिक व आत्मिक दृष्टि से अंतर रखने वाले पुरुष व स्त्री को भी एक दूसरे पर वरीयता प्राप्त नहीं है क्योंकि दोनों की सामग्री एक ही है और सबकी जड़ एक ही माता पिता हैं।

 क़ुरआने मजीद की अन्य आयतों में ईश्वर ने माता-पिता के साथ भलाई का उल्लेख अपने आदेश के पालन के साथ किया है और इस प्रकार उसने मापा-पिता के उच्च स्थान को स्पष्ट किया है परंतु इस आयत में न केवल माता-पिता बल्कि अपने नाम के साथ उसने सभी नातेदारों के अधिकारों के सममान को आवश्यक बताया है तथा लोगों को उन पर हर प्रकार के अत्याचार से रोका है।
 इस आयत से हमने सीखा कि इस्लाम एक सामाजिक धर्म है। अत: वह परिवार तथा समाज में मनुष्यों के आपसी संबंधों पर ध्यान देता है और ईश्वर ने भय तथा अपनी उपासना का आवश्यक भाग, अन्य लोगों के अधिकारों के सम्मान को बताया है।
 मानव समाज में एकता व एकजुटता होनी चाहिये क्योंकि लोगों के बीच वर्ण, जाति, भाषा व क्षेत्र संबंधी हर प्रकार का भेद-भाव वर्जित है। ईश्वर ने सभी को एक माता पिता से पैदा किया है। सभी मनुष्य एक दूसरे के नातेदार हैं क्योंकि सभी एक माता-पिता से हैं। अत: सभी मनुष्यों से प्रेम करना चाहिये और अपने निकट संबंधियों की भांति उनका सम्मान करना चाहिये।  ईश्वर हमारी नीयतों व कर्मों से पूर्ण रूप से अवगत है। अत: न हमें अपने मन में स्वयं के लिए विशिष्टता की भावना रखनी चाहिये और न व्यवहार में दूसरों के साथ ऐसा रवैया रखना चाहिये।

(वास्तविक बुद्धिजीवी) वे लोग हैं जो ईश्वरीय प्रतिज्ञा पर कटिबद्ध रहते हैं और वचनों को नहीं तोड़ते। (13:20) और वे ऐसे हैं कि ईश्वर ने जिन संबंधों को जोड़ने का आदेश दिया है वे उन्हें जोड़ते हैं, अपने पालनहार से डरते हैं और बुरे हिसाब का उन्हें भय लगा रहता है। (13:21)

पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि क़ुरआने मजीद ने ईमान वालों और काफ़िरों को देखने वालों तथा नेत्रहीनों की संज्ञा देते हुए ईमान वाले को बुद्धिमान तथा चितन करने वाला बताया था। यह आयतें बुद्धिमानों की विशेषताओं का वर्णन करते हुए कहती हैं कि वचनों विशेषकर ईश्वरीय प्रतिज्ञा का पालन उनकी सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता है। वे कभी भी ईश्वरीय प्रतिज्ञा का उल्लंघन नहीं करते, चाहे वे सत्य प्रेम और न्याय प्रेम जैसी सैद्धांतिक प्रतिज्ञाएं हों, ईश्वर तथा प्रलय पर आस्था जैसी बौद्धिक प्रतिज्ञाएं हों अथवा ईश्वर द्वारा वर्जित की गई वस्तुओं से दूर रहने की धार्मिक प्रतिज्ञाएं हों।

अलबत्ता सबसे महत्त्वपूर्ण ईश्वरीय प्रतिज्ञा भ्रष्ट शासकों से संघर्ष और पवित्र नेताओं का अनुसरण है। ईश्वर ने कहा है कि इमामत अर्थात ईश्वरीय नेतृत्व केवल पवित्र और न्यायप्रेमी लोगों को ही प्राप्त हो सकेगा और यह पद अत्याचारियों को कभी भी नहीं मिलेगा। पवित्र क़ुरआने मजीद के सूरए बक़रह की आयत संख्या 124 में कहा गया है कि ईश्वर का पद अर्थात इमामत अत्याचारियों को प्राप्त नहीं होगा।

बुद्धिमान तथा ईमान वालों की एक अन्य विशेषता धार्मिक व पारिवारिक संबंधों को सुरक्षित रखना है जिसकी ईश्वर ने अत्यधिक सिफ़ारिश की है। जैसे ईमान वालों के साथ संबंधों की रक्षा जिन्हें ईश्वर ने उनका ईमानी भाई बताया है और अपने सगे संबंधियों के साथ संबंधों की रक्षा जो एक प्रकार से उनकी भावनात्मक तथा आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। इसी कारण पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के पौत्र हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने अपने स्वर्गवास के समय आदेश दिया था कि उनके सभी परिजनों को चाहे उन्होंने उनके साथ अनुचित व्यवहार ही क्यों न किया हो, कोई न कोई भेंट दी जाए।
ईमान वालों की अंतिम विशेषता ईश्वर से डरते रहना है। बुद्धिमान लोगों के भीतर ईश्वर की गहन पहचान के बाद उसका भय पैदा होता है जो ईश्वर की महानता के समक्ष उनके नतमस्तक रहने को दर्शाता है।
इन आयतों से हमने सीखा कि सामाजिक संधियों और समझौतों का सम्मान, ईमान वाले तथा बुद्धिमान व्यक्ति की विशेषताओं में से एक है।

पारिवारिक संबंधों और आवाजाही को जारी व सुरक्षित रखना और परिजनों की समस्याओं का समाधान करने पर धर्म में बहुत अधिक बल दिया गया है।