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Editorial

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और हम ईश्वर पर भरोसा क्यों न करें जबकि उसी ने (कल्याण के) मार्गों की ओर हमारा मार्गदर्शन किया है और तुम्हारी ओर से दी जाने वाली यातनाओं पर हम धैर्य करेंगे और भरोसा करने वालों को तो केवल ईश्वर पर ही भरोसा करना चाहिए। (14:12)

क़ुरआने मजीद इस आयत में कहता है कि जिस ईश्वर के हाथ में मनुष्य का कल्याण व सौभाग्य है, उसके अतिरिक्त किस पर भरोसा एवं विश्वास किया जा सकता है? अल्बत्ता ईश्वर पर भरोसे का अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य समाज से कट जाए और एकांत में रहने लगे, बल्कि ईश्वर पर भरोसे का अर्थ कठिनाइयों के समक्ष डटे रहना तथा यातनाओं को सहन करना है।
यातनाएं देना और समस्याएं खड़ी करना विरोधियों का काम है तथा सत्य के मार्ग पर डटे रहना, ईमान वालों की शैली है। इस संघर्ष में ईमान वालों को ईश्वर का समर्थन प्राप्त होता है जबकि विरोधी मानवीय समर्थकों पर भरोसा करते हैं कि जो ईश्वरीय संकल्प के मुक़ाबले में टिकने की क्षमता नहीं रखते।
पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पौत्र हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम का कथन है कि ईश्वर पर वास्तविक भरोसे का चिन्ह यह है कि तुम उसके अतिरिक्त किसी अन्य से न डरो, और यही ईमान की कुंजी है।
इस आयत से हमने सीखा कि जो ईश्वर मार्गदर्शन करता है वह सहायता भी करता है, अतः हमें केवल उसी पर भरोसा करना चाहिए।
ईश्वर के मार्ग पर चलने में कठिनाइयां सहन करनी ही पड़ती हैं, विरोधियों की यातनाओं और बाधाओं के कारण अपने ईमान को नहीं छोड़ना चाहिए। सच्चे ईमान वाला किसी भी स्थिति में सत्य पर आस्था और कर्म को नहीं छोड़ता।


ईदे ज़हरा क्या है ?  ‌‌‌लेखक: पैग़म्बर नौगांवी

हमारे समाज में बहुत सी ईदें आती हैं जैसे ईद उल फि़त्र, ईदे क़ुरबान, ईदे मुबाहिला और ईदे ज़हरा वग़ैरह, यह सारी ईदें किसी वाक़ए की तरफ़ इशारा करती हैं।

ईद उल फि़त्रः पहली शव्वाल को एक महीने के रोज़े पूरे करने का शुकराना और फि़तरा निकाल कर ग़रीबों की ईद का सामान फ़राहम करने का ज़रिया है।

ईदे क़ुरबानः 10 जि़लहिज्जा हज़रत इसमाईल को ख़ुदा ने ज़बहा होने से बचा लिया था और उनकी जगह दुंबा ज़बहा हो गया था जिस की याद मुसलमानों पर हर साल मनाना सुन्नत है।

ईदे ग़दीरः 18 जि़लहिज्जा को ग़दीरे क़ुम में मौला ए कायनात हज़रत अली (अ0स0) की ताज पोशी की याद में हर साल मनाई जाती है, इस दिन रसूल अल्लाह ने अपने आख़री हज से वापसी पर ग़दीरे ख़ुम के मैदान में इमाम अली (अ0स0) को सवा लाख हाजियों के दरमियान अल्लाह के हुक्म से अपना जानशीन व ख़लीफ़ा मुक़र्रर किया था।
ईदे मुबाहिलाः 24 जि़लहिज्जा को मनाई जाती है इस रोज़ अहले बैत (अ0स0) के ज़रिये इस्लाम को ईसाइयत पर फ़तह नसीब हुई थी।
ईदे ज़हराः 9 रबी उल अव्वल को मनाई जाती है और इस ईद को मनाने की बहुत सी वजहें बयान की जाती हैं। जैसेः
बाज़ लोग कहते हैं कि 9 रबी उल अव्वल को हज़रत फ़ातेमा (अ0स0) ज़हरा का दुश्मन हलाक हुआ था, लेहाज़ा यह ख़ुशी का दिन है इसी वजह से इस रोज़ को ‘‘ईदे ज़हरा‘‘ के नाम से जाना जाता है।
इस बारे में उलोमा व मुअर्रेख़ीन के दरमियान इख़्तलाफ़ पाया जाता है, बाज़ कहते हैं कि हज़रत उमर इब्ने ख़त्ताब 9 रबीउलअव्वल को फ़ौत हुए और बाज़ दीगर कहते हैं कि इनकी वफ़ात 26 जि़लहिज्जा को हुई।
जो लोग यह कहते हैं कि उमर इब्ने ख़त्ताब 9 रबीउल अव्वल को फ़ौत हुए उनका क़ौल क़ाबिले एतबार नहीं है, अल्लामा मजलिसी इस बारे में इस तरह वज़ाहत फ़रमाते है किः
उमर इब्ने ख़त्ताब के क़त्ल किये जाने की तारीख़ के बारे में शिया और सुन्नी उलोमा में इख़तलाफ़ पाया जाता है (मगर) दोनों के दरमियान यही मशहूर है कि उमर इब्ने ख़त्ताब 26 या 27 जि़लहिज्जा को फ़ौत हुए।
(ज़ादुल मआद, पेज 470)
अल्लामा मजलिसी ने बिहारुल अनवार में भी इब्ने इदरीस की किताब ‘‘सरायर‘‘ के हवाले से लिखा है किः
हमारे बाज़ उलोमा के दरमियान उमर इबने ख़त्ताब की रोज़े वफ़ात के बारे में शुबहात पाए जाते हैं (यानी) यह लोग यह गुमान करते हैं कि उमर इब्ने ख़त्ताब 9 रबीउलअव्वल को फ़ौत हुए, यह नज़रया ग़लत है।
(बिहारुल अनवार , जिल्द 58, पेज 372, बाब 13, मतबुआ तेहरान)
अल्लामा मजलिसी किताब अनीस उल आबेदीन के हवाले से मज़ीद लिखते हैं कि:
अकसर शिया यह गुमान करते हैं कि उमर इब्ने ख़त्ताब 9 रबीउलअव्वल को क़त्ल हुए और यह सही नहीं है ... बतहक़ीक़ उमर 26 जि़लहिज्जा को क़त्ल हुए ... और इस पर साहिबे किताबे ग़र्रह, साहिबे किताबे मोजम, साहिबे किताबे तबक़ात, साहिबे किताबे मसारु उल शिया और इब्ने ताऊस की नस के अलावा शियों और सुन्नियों का इजमा भी हासिल है। (बिहारुल अनवार , जिल्द 58, पेज 372, बाब 13, मतबुआ तेहरान)
अगर यह फर्ज़ भी कर लिया जाए कि वह 9 रबीउल अव्वल को फ़ौत हुए ( जो कि ग़लत है ) तब भी हज़रत फ़ातेमा ज़हरा (अ0स0) की शहादत पहले हुई और आप के दुश्मन एक के बाद एक हलाक हुए ... तो फि़र अपने दुश्मनों की हलाकत से हज़रत फ़ातेमा ज़हरा (अ0स0) किस तरह ख़ुश हुईं... लेहाज़ा ईदे ज़हरा की यह वजह ग़ैर माक़ूल है।
बाज़ लोग यह कहते हैं कि 9 रबीउलअव्वल को जनाबे मुख़्तार ने इमाम हुसैन (अ0स0) के क़ातिलों को वासिले जहन्नम किया ... लेहाज़ा यह रोज़ शियों के लिए सुरुर व शादमानी का दिन है।
हमने मोतबर तारीख़ की किताबों में बहुत तलाश किया लेकिन कहीं यह बात नज़र न आई कि जनाबे मुख़्तार ने 9 रबी उलअव्वल को इमाम हुसैन (अ0स0) के क़ातिलों को वासिले जहन्नम किया था ... लेहाज़ा यह वजह भी ग़ैरे माक़ूल है।
बाज़ लोग यह भी कहते हैं कि जनाब मुख़्तार ने इब्ने जि़याद का सर इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ0स0) की खि़दमत में मदीना भेजा और जिस रोज़ यह सर इमाम की खि़दमत में पहुँचा वह रबीउलअव्वल की 9 तारीख़ थी, इमाम (अ0स0) ने इब्ने जि़याद का सर देख कर ख़ुदा का शुक्र अदा किया और मुख़्तार को दुआऐं दीं और उसी वक़्त से अहलेबैत की ख़्वातीन ने बालों में कंघी और सर में तैल डालना और आँखों में सुरमा लगाना शुरु किया जो वाक़ए कर्बला के बाद से इन चीज़ों को छोड़े हुए थीं।
बिलफ़रज़ अगर सही मान भी लिया जाए तब भी यह ईद जनाबे ज़ैनब (अ0स0) और जनाबे सय्यदे सज्जाद (अ0स0) से मनसूब होनी चाहिए थी न की हज़रत फ़ातेमा ज़हरा (अ0स0) ... और हमें भी इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ0स0) की पैरवी करते हुए जि़यादा से जि़यादा शुक्रे ख़ुदा करना चाहिए था और जनाबे मुख़्तार के लिए दुआए ख़ैर करना चाहिए थी कि उन्होंने इमाम (अ0स0) और उनके चाहने वालों का दिल ठंडा किया, लेकिन यह ईद न तो चैथे इमाम (अ0स0) से मनसूब हुई और ना जनाबे ज़ैनब के नाम से मशहूर है, लेहाज़ा ईदे ज़हरा की यह वजह भी ग़ैर माक़ूल है, अगर इस रिवायत को सही मान लिया जाए तो इस पर यह एतराज़ होता है कि जिनके घर में शरीयत नाजि़ल हुई, जिनके सामने अहकाम नाजि़ल हुए, जो अख़्लाक़े इस्लामी का नमूना थे, जिनहोंने सफ़ाई सुथराइ की बहुत ताकीद की है वह इतने दिन तक किस तरह बग़ैर सर साफ़ किए हुए रहे ? और किस समाज में सर को साफ़ करना या आँखों में सुर्मा डालना ख़ुशी की अलामत समझा जाता है ? जो अहले बैत (अ0स0) ने वाक़ए कर्बला के बाद एक अरसे तक न किया ? लेहाज़ा इस कि़स्से पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
बाज़ उलोमा की तहक़ीक़ के मुताबिक़ 9 रबी उल अव्वल को जनाबे रसूले ख़ुदा (स0अ0) की शादी जनाबे ख़दीजा (स0अ0) से हुई थी और हज़रत फ़ातेमा ज़हरा (स0अ0) हर साल इस शादी की सालगिरह मनाती थीं और जशन किया करती थीं, नए लिबास और तरह तरह के खाने मुहय्या करती थीं, लेहाज़ा आपकी सीरत पर अमल करते हुए शिया ख़्वातीन ने भी यह सालगिरह मनानी शुरु की और यह सिलसिला इसी तरह चलता रहा, आपके बाद यह ख़ुशी आप से मनसूब हो गई और इस तरह 9 रबी उल अव्वल का रोज़ शियों के दरमियान ईदे ज़हरा के नाम से मनसूब हो गया, लेहाज़ा ईदे ज़हरा की यह वजह मुनासिब मालूम होती है, एक शख़्स ने आयतुल्लाह काशेफ़ुल ग़ेता से सवाल किया कि:
मशहूर है कि रबी उल अव्वल की नवीं तारीख़ जनाबे फ़ातेमा ज़हरा की ख़ुशी का दिन था और है और इस हाल में है कि उमर इब्ने ख़त्ताब के 26 जि़लहिज्जा को ज़ख़्म लगा और 29 जि़लहिज्जा को फ़ौत हुए लिहाज़ा यह तारीख़ हज़रत फ़ातेमा ज़हरा (स0अ0) से बाद की तारीख़ है तो फि़र हज़रत फ़ातेमा ज़हरा (स0अ0) (अपने दुश्मन के फ़ौत होने पर ) किस तरह ख़ुश हुईं ?
इसका जवाब आयातुल्लाह काशेफुल ग़ेता ने इस तरह दिया किः
श्यिा पुराने ज़माने से रबीउलअव्वल की नवीं तारीख़ को ईद की तरह ख़ुशी मनाते हैं किताबे इक़बाल में सैय्यद इब्ने ताऊस ने फ़रमाया है कि 9 रबीउलअव्वल की ख़ुशी इस लिए है कि इस तारीख़ में उमर इब्ने ख़त्ताब फ़ौत हुए हैं और यह बात एक ज़ईफ़ रिवायत से ली गयी है जिस को शैख़ सदूक़ ने नक़्ल किया है, लेकिन हक़ीक़ते अमर यह है कि 9 रबीउलअव्वल को शियों की ख़ुशी शायद इस वजह से है कि 8 रबी उल अव्वल को इमाम हसन असकरी (अ0स0) शहीद हुए और 9 रबीउलअव्वल इमामे ज़माना (अ0स0) की इमामत का पहला रोज़ है .....इस ख़ुशी का दूसरा एहतमाल यह है कि 9 और 10 रबी उल अव्वल पैग़म्बरे इस्लाम (स0अ0) की जनाबे ख़दीजा से शादी का रोज़ है और हज़रत फ़ातेमा ज़हरा (स0अ0) हर साल इस रोज़ ख़ुशी मनाती थीं और शिया भी आपकी पैरवी करते हुए इन दिनों में ख़ुशी मनाने लगे, मगर शियों को इस ख़ुशी की यह वजह मालूम नहीं है।
( आयातुल्लाह काशेफ़ूल ग़ेता, सवाल व जवाब, पेज 10 व 11, तरजुमा मौलाना डा0 सै0 हसन अख़तर साहब नौगांवी, मिनजानिब इदारा ए तबलीग़ व इशाअत नौगावां सादात ) इस सिलसिले में बाज़ हज़रात व ख़्वातीन ग़लत बयानी करते हुए कहते हैं कि इस दिन जो चाहें गुनाह करें उस पर अज़ाब नहीं होता और फ़रिश्ते लिखते भी नहीं और यह लोग अल्लामा मजलिसी की किताब बिहारुल अनवार की उस तवील हदीस का हवाला देते हैं जिसको अल्लामा मजलिसी ने सै0 इब्ने ताऊस की किताब ज़वाएदुल फ़वायद से नक़ल किया है ... हां बिहारुल अनवार में एक हदीस ऐसी ज़रुर लिखी हुई है, मगर यह हदीस चन्द वजहों की बिना पर क़ाबिले एतबार नहीं हैः
1- इस हदीस में लिखा है कि 9 रबीउलअव्वल को जो गुनाह चाहें करें उस को फ़रिश्ते नहीं लिखते और न ही अज़ाब किया जाता है।
मगर हम कऱ्ुआने मजीद के सूरा ए ज़लजला की आयत 7 और 8 में पढ़ते हैं किः
यानी जिस शख़्स ने ज़र्रह बराबर नेकी की वह उसे देख लेगा और जिस शख़्स ने ज़र्रह बराबर बदी की है तो वह उसे देख लेगा।
और हमारे सामने रसूले ख़ुदा (स0अ0) की वह हदीस भी है जिस का मफ़हूम यह है किः
जब तुम्हारे पास मेरी कोई हदीस आए तो उसे किताबे ख़ुदा के मेयार पर परखो अगर कऱ्ुआन के मुआफि़क़ है तो उसे क़बूल कर लो और अगर उसके खि़लाफ़ है तो दीवार पर दे मारो (यानी क़बूल न करो)
(मिरज़ा हबीबुल्ला हाशमी, मिनहाजुल बराअत फ़ी, शरह नहजुल बलाग़ा, जिल्द 17, पेज 246, तरजमा हसन ज़ादा आमली, मतबूआ तेहरान )
मज़कूरा रिवायत कऱ्ुआन से टकरा रही है लेहाज़ा क़ाबिले अमल नहीं है। 2- इस हदीस के रावी मोतबर नहीं हैं, इस के बारे में जब मैंने क़ुम में आयातुल्ला शाहरुदी से दरयाफ़्त किया था तो आपने यही फ़रमाया था किः
इस रिवायत को अल्लामा मजलिसी ने किताबे इक़बाल से नक़्ल किया है और इसके रावी मोतबर नहीं हैं ... 9 रबी उल अव्वल का मरफ़ू उल क़लम न होना ( यानी इस दिन भी गुनाह लिखे जाते हैं ) अज़हर मिनश शम्स (यानी बहूत वाज़ेह ) है।
लेहाज़ा यह रिवायत क़ाबिले एतबार नहीं है।


3- इस रिवायत में एक जुमला इस तरह आया हैः
रसूल अल्लाह (स0अ0) ... ने इमाम हसन (अ0स0) और इमाम हुसैन (अ0स0) (जो कि 9 रबीउलअव्वल को आपके पास बैठे थे ) से फ़रमाया कि इस दिन की बरकत और सआदत तुम्हारे लिए मुबारक हो क्योंकि आज के दिन ख़ुदावन्दे आलम तुम्हारे और तुम्हारे जद के दुश्मनों को हलाक करे गा।
रसूले इस्लाम अगर आने वाले ज़माने में रुनुमा होने होने वाले किसी वाक़ए या हादसे की ख़बर दें तो सौ फी़ सद सही , सच, और होने वाला है जिस में किसी शक व शुबह की गुनजाइश नहीं है क्योंकि आप सच्चा वादा करने वाले हैं।

लेकिन मोतबर तारीख़ की किताब में किसी भी दुश्मने रसूल व आले रसूल की हलाकत 9 रबीउलअव्वल के रोज़ नहीं मिलती, लेहाज़ा रिवायत क़ाबिले एतबार नहीं है।


4- इस रिवायत के आखि़र में इमाम अली (अ0स0) के हवाले से 9 रबीउलअव्वल के 57 नाम जि़क्र किए गए हैं जिन में यौमो रफ़इल क़लम (गुनाह न लिखे जाने का दिन), यौमो सबीलिल्लाहे तआला (अल्लाह के रास्ते पर चलने का दिन ) यौमो कतलिल मुनाफि़क़ (मुनाफि़क़ के क़त्ल का दिन ) यौमु ज़्ज़ोहदे फि़ल कबाइरे (गुनाहे कबीरा से बचने का दिन ), यौमुल मौएज़ते (वाज़ व नसीहत का दिन), यौमुल इबादते (इबादत का दिन) भी शामिल हैं जो आपस में एक दूसरे से टकरा रहे हैं यानी 9 रबीउलअव्वल को गुनाह न लिखने का दिन कह कर सब कुछ कर डालने का शौक़ दिलाया है तो यौमे नसीहत व इबादत व ज़ोहोद कह कर गुनाहों से रोका भी गया है और यह तज़ाद कलामे मासूम (अ0स0) से बईद है, इसके अलावाह क़त्ले मुनाफि़क़ का दिन भी कहा गया है जिस की तरदीद आयातुल्लाह काशेफ़ुल ग़ेता और आयातुल्लाह शाहरुदी के हवाले से हम कर ही चुके हैं, लेहाज़ा यह रिवायत मोतबर नहीं कही जा सकती।


5- इस रिवायत में एक जुमला यह भी आया है किः
अल्लाह ने वही के ज़रिए हज़रत रसूल (स0अ0) से कहलाया किः ऐ मुहम्मद (स0अ0) मैंने किरामे कातेबीन को हुकम दिया है कि वह 9 रबी उल अव्वल को आप और आपके वसी के एहतराम में लोगों के गुनाहों और उनकी ख़ताओं को न लिखें।


जबकि दूसरी तरफ़ कऱ्ुआने मजीद में ख़ुदावन्दे आलम इस तरह इरशाद फ़रमाता है किः
यह हमारी किताब (नामा ए आमाल) है जो हक़ के साथ बोलती है और हम इसमें तुम्हारे आमाल को बराबर लिखवा रहे थे।
(सूरा ए जासेया, आयत 29 )
इस से मालूम होता है कि इन्सानों के आमाल ज़रुर लिखे जाते हैं और किसी भी दिन को इस से अलग नहीं किया गया है।

और जब नामाए आमाल सामने रखा जाएगा तो देखोगे देख कर ख़ौफ़ज़दा होंगे और कहेंगे हाय अफ़सोस! इस किताब (नामाए आमाल) ने तो छोटा बड़ा कुछ नहीं छोड़ा है और सब को जमा कर लिया है और सब अपने आमाल को बिलकुल हाजि़र पाऐंगे और तुम्हारा परवरदिगार किसी एक पर भी ज़ुल्म नहीं करता है।
(सूरा ए कहफ़, आयत 49)

इस आयत से भी साफ़ ज़ाहिर होता है कि इनसानों के आमाल बराबर लिखे जाते हैं और कोई भी मौक़ा और दिन इस से अलेहदा नहीं है।


इस रोज़ सारे इनसान गिरोह गिरोह क़ब्रों से निकलेंगे ताकि अपने आमाल को देख सकें फिर जिस शख़्स ने ज़र्रा बराबर नेकी की है वह उसे देखेगा और जिसने ज़र्रा बराबर बुराई की है वह उसे देख लेगा।
( सूरा ए ज़लज़ला, आयत 5 व 18 )
इस आयत से भी ज़ाहिर होता है कि इन्सानों के छोटे बड़े हर कि़स्म के आमाल ज़रुर लिखे जाते हैं।


यह रिवायत कऱ्ुआन से टकरा रही है लेहाज़ा मोतबर नहीं है।
हो सकता है बाज़ हज़रात यह एतराज़ करें कि इतनी मोतबर शख़सियात जैसे अल्लामा इब्ने ताऊस, शैख़ सदूक़ और अल्लामा मजलिसी वग़ैरा ने किस तरह ज़ईफ़ रिवायतों को अपनी किताबों में जगह देदी ?
इसका जवाब यह है कि शिया उलोमा ने कभी भी अहले सुन्नत की तरह यह दावा नहीं किया है कि हमारी किताबों में जो भी लिखा है वह सब सही है, बलकि हमें इनकी छान बीन की ज़रुरत रहती है, क्योंकि जिस ज़माने में यह किताबें मुरततब कि गईं वह पुर आशोब दौर था और शियों की जान व माल, इज़्ज़त व आबरु के साथ साथ कलचर भी ग़ैर महफ़ूज़ था जिसकी मिसालों से तारीख़ का दामन भरा हुआ है, मुसलमान हुकमरान शियों के इलमी सरमाए को नज़रे आतिश करना हरगिज़ न भूलते थे, ऐसे माहौल में हमारे उलमा ए किराम ने हर उस रिवायत और बात को अपनी किताबों मं जगह दी जो शियों से ताअल्लुक़ रखती थी, जिसमें बाज़ ग़ैर मोतबर रिवायात का शामिल हो जाना बाइसे ताअज्जुब नहीं है, चूँकि उस ज़माने में छान फटक का मौक़ा न था इस लिए यह काम बाद के उलोमा ने फ़ुरसत से अन्जाम दिया, इसी लिए तो आयातुल्लाह काशेफ़ुल ग़ेता और आयातुल्लाह शाहरुदी के अलावा दीगर मराजऐ किराम 9 रबीउलअव्वल वाली इस रिवायत को ज़ईफ़ मानते हैं।
हमें चाहिए कि इस दिन भी इसी तरह अपने आप को गुनाहों से दूर रखें जिस तरह दूसरे दिनों में बचाना वाजिब है, हमारे आइम्मा और फ़ुक़हा ए इज़ाम व मराजऐ किराम का यही हुक्म है, जब मेंने इस बारे में मराजऐ किराम आयातुल्लाहिल उज़मा सै0 अली ख़ामनई, आयातुल्लााह मुकारिम शीराज़ी, आयातुल्लाह फ़ाजि़ल लंककरानी,


आयातुल्लाह अराकी और आयातुल्लाह साफ़ी गुलपायगानी से क़ुम में सवाल किया किः
बाज़ लोग आलिम व ग़ैर आलिम इस बात के मोतकि़द हैं कि 9 रबीउलअव्वल से (जो कि ईदे ज़हरा से मनसूब है) 11 रबीउलअव्वल तक इन्सान जो चाहे अनजाम दे चाहे वह काम शरअन नाजायज़ हो तब भी गुनाह शुमार नहीं होगा और फ़रिश्ते उसे नहीं लिखंेगे, बराए मेहरबानी इस बारे में क्या हुक्म है बयान फ़रमाइए।
आयातुल्लाहिल उज़मा सै0 अली ख़ामनई साहब ने इस तरह जवाब दिया किः शरीअत की हराम की हुई वह चीज़ें जो जगह और वक़्त से मख़सूस नहीं हैं किसी मख़सूस दिन की मुनासबत से हलाल नहीं हांेगी बलकि ऐसे मुहर्रेमात हर जगह और हर वक़्त हराम हैं और जो लोग बाज़ अय्याम में इनको हलाल की निसबत देते हैं वह कोरा झूट और बोहतान है और हर वह काम जो बज़ाते ख़ुद हराम हो या मुसलमानों के दरमियान तफ़रक़े का बाइस हो शरअन गुनाह और अज़ाब का बाइस है।

आयातुल्लाह नासिर मकारिम शीराज़ी साहब का जवाब यह थाः

यह बात (कि 9 रबीउलअव्वल को गुनाह लिखे नहीं जाते ) सही नहीं है और किसी भी फ़क़ीह ने ऐसा फ़तवा नहीं दिया है, बलकि इन अय्याम में तज़किया ए नफ़स और अहलेबैत (अ0स0) के अख़लाक़ से नज़दीक होने और फ़ासिक़ व फ़ाजिरों के तौर तरीक़ों से दूर रहने की ज़्यादा कोशिश करनी चाहिए।

आयातुल्लाह फ़ाजि़ल लंककरानी साहब ने यूँ जवाब दिया कि:
यह एतक़ाद (कि 9 रबी उल अव्वल को गुनाह लिखे नहीं जाते ) सही नहीं है, इन दिनों में भी गुनाह जायज़ नहीं है, मज़कूरा ईद (ईदे ज़हरा) बग़ैर गुनाह के मनाई जा सकती है।

आयातुल्लाह अराकी साहब ने तहरीर फ़रमाया कि:
वह काम जिनको शरीअते इस्लाम ने मना किया है और मराजऐ किराम ने अपनी तौज़ीहुल मसाइल में जि़क्र किया है किसी भी वक़्त जायज़ नहीं हैं और यह बातें कि (9 रबीउल अव्वल को गुनाह लिखे नहीं जाते ) मोतबर नहीं हैं।
आयातुल्लाह साफ़ी गुलपायगानी साहब का जवाब यह था किः

यह बात कि (9 रबीउलअव्वल को गुनाह लिखे नहीं जाते ) अदिल्ला ए अहकाम के उमूमात व इतलाक़ात के मनाफ़ी है और ऐसी मोतबर रिवायत कि जो इन उमूमी व मुतलक़ दलीलों को मख़सूस या मुक़य्यद करदे साबित नहीं है बिलफ़र्ज़ अगर ऐसी कोई रिवायत होती भी तो यह बात अक़्ल व शरीअत के मनाफ़ी है और ऐसी मुक़य्यद व मुख़ससिस दलीलें मुनसरिफ़ है ...।

यह बात वाज़ेह होजाने के बाद अब एक सवाल और बाक़ी रह जाता है वह यह कि इस ख़ुशी को किस तरह मनाऐं ... ? इसी तरह जैसे अकसर बसतियों में मनाई जाती है ? या फि़र इसमें तबदीली होनी चाहिए ?
यह ख़ुशी इमामे ज़माना (अ0स0) और हज़रत फ़ातेमा ज़हरा (अ0स0) से मनसूब है तो क्या हमें उन मासूमीन (अ0स0) के शायाने शान इस ख़ुशी को नहीं मनाना चाहिए ?... हमें क्या हो गया है! अपने जि़न्दा इमाम (अ0स0) की ख़ुशी को इस अन्दाज़ से मनाते हैं ? दुनिया की जाहिल तरीन क़ौमें भी अपने रहबर की ख़ुशी इस तरह न मनाती होंगी ...

अफ़सोस! आज कल अगर किसी सियासी व समाजी शख़सीयत के एज़ाज़ में जलसे जलूस मुनअकि़द किए जाते हैं तो उनको उसी के शायाने शान तरीक़े से इख़तताम तक पहुँचाने की कोशिश भी की जाती है।
लेकिन ईदे ज़हरा (अ0स0) जो ख़ातूने जन्नत, जिगर गोशए रसूल (स0अ0), ज़ौजा ए अली ए मुरतज़ा (स0अ0) उम्मुल अइम्मा ज़हरा बतूल (स0अ0) के नाम से मनसूब है उसके  साथ  इन्साफ नहीं  किया जाता |

इसके अलावा आलमे इस्लाम पर जिस तरह ख़तरात के बादल छाए हुए हैं वह अहले नज़र से पोशीदा नहीं है, कितना अच्छा हो अगर ईदे ज़हरा अपने हक़ीक़ी माना में इस तरह मनाई जाए जिस में तमाम मुसलेमीन शरीक हो सकें।

तबर्रा फ़ुरु ए दीन से तअल्लुक़ रखता है और फ़ुरु ए दीन का दारो मदार अमल से है ... अगर कोई मुसलमान सिर्फ़ ज़बान से कहे कि नमाज़, रोज़ा, हज, ज़कात, ख़ुम्स वग़ैरा वाजिब हैं तो यह तमाम वाजेबात जब तक अमाली सूरत में अदा न हो जाऐं गरदन पर क़ज़ा ही रहेंगे ... फ़ुरु ए दीन के वाजिबात वक़्त और ज़माने से मख़सूस हैं, जिस तरह नमाज़ के औक़ात बताए गए हैं इसी तरह रोज़ा, ज़कात, हज और ख़ुम्स वग़ैरा का ज़माना भी मुअय्यन है, लेकिन अम्रबिल मारुफ़, नही अनिल मुनकर, तवल्ला और तबर्रा यह दीन के ऐसे फ़ुरु हैं जिनके लिए कोई वक़्त और ज़माना मुअय्यन नहीं है, बिल ख़ुसूस तवल्ला और तबर्रा से तो एक लम्हे के लिए भी ग़ाफि़ल नहीं रह सकते, यानी हम यह नहीं कह सकते कि एक लम्हे के लिए भी मुहब्बते अहलेबैत (स0अ0) को दिल से निकाल दिया गया है, या एक लमहे के लिए दुश्मनाने अहलेबैत (स0अ0) के दुश्मनों के किरदार को अपना लिया गया है, जब ऐसा है ... तो फिर तबर्रा को 9 रबी उलअव्वल से कियों मख़सूस कर दिया गया ? इसी दिन इसकी क्यांे ताकीद होती है ? बाक़ी दिनों में इस तरह क्यों याद नहीं आता ? वह भी सिर्फ़ ज़बानी ! ...

ज़बान से तबर्रा काफ़ी नहीं है बलकि अमाली मैदान में आकर तबर्रा करें यानी अहले बैत (अ0स0) के दुश्मनों की इताअत व हुक्मरानी दिल से क़बूल न करें और इनके पस्त किरदार को न अपनाऐं। यह कैसे हो सकता है कि कोई शिया जो ख़्ुाम्स न निकालता हो और बेटियों को मीरास से महरुम रखता हो वह ग़ासेबीन पर लानत करे और उस लानत में ख़ुद भी शामिल न होजाए।

वह शिया जो अपने अमले बद से अहले बैत (अ0स0) को नाराज़ करता हो और वह अहलेबैत (अ0स0) को सताने वालों पर लानत करे और उस लानत के दायरे में ख़ुद भी न आ जाए।
याद रखिए ! लानत नाम पर नहीं, किरदार पर होती है इसी लिए उसका दायरा बहुत बड़ा होता है।

HUM 2 MAHINA 8 DIN GHUM MANANEY K BAAD JAB 9 RABILAWWAL AATA HAI JISKO HUM APNI ZUBAN ME EID-E-ZEHRA , EID-E-SHUJA KAHTE HAIN .
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JISKE MUTALLIQ TAREEKHON ME MILTA HAI K KHUN-E-IMAM  KA BADLA LENE K LIYE JANAB-E-MUKHTAR UTH KHADE HUE AUR UNHONE QATILAN-E-IMAM HUSAIN A.S. SE BADLA LENA SHURU KIA.
JISME SAB TO QATL HO GAYE MAGAR HURMULA MALOON JO QATIL-E-HUZRAT ALI ASGHAR THA WO HATH NHI A RAHA THA AKHIR KAAR WO EK DIN PAKDA GAYA AUR JANAB-E-MUKHTAR NE
USKO QATL KARNE K BAAD USKA SIR 4TH IMAM KI KHIDMAT ME PESH KIA.WO DIN 9 RABILAWWAL KA THA . IMAM NE APNI AURTON SE KAHA K APNA SOG (GHUM) KHATM KARO AUR KHUSHIYAN MANAO. AUR KUCH TAREEKHON ME MILTA HAI K 8 RABILAWAL KO HUMARE IMAM HASAN ASKARI A.S. KI SHAHADAT KI TAREEKH HAI AUR 9 RABILAWAL KO HUMARE 12TH IMAM KI TAAJ POSHI KA DIN HAI.

Maqsad e 9 Rabiul Awwal

MASOOMEEN KA IRSHAD HAI K JIS DIN TUMSE KOI GUNAH SAR ZAD NA HO WO DIN TUMHARE LIYE EID KA DIN HAI . AB HUMKO YE JAAN LENA CHAIYE K EID KA MAQSAD HAI APNE APKO GUNAHO SE DUR RAKHNA. NA K GUNAHO ME INVOLVE HONA .  TO AGAR GHAUR KAREN TO DEKHETE HAIN K HUM IS DIN KYA - KYA KARTE HAIN BALKI YUN KAHU K KYA NHI KARTE HAIN KON AISA GUNAH HAI JO HUM IS DIN NHI KARTE . HUM 2 MAHINA 8 DIN K MAJLIS-O-MATAM AUR AZADARI K PAIGHAM KO BHUL KAR GHALAT KAMON KO KAR K SARE SAWAB KO KHAK ME MILA DETE HAIN. HUMARE MUASHREY ME PUTLA BANA KAR US DIN JALANE KA RIWAJ HAI HUM KUCH KAREN YA NA KAREN MAGAR GHAR ME PUTLA ZAROOR JALAYENGE. FAHASH BATEN ZAROOR BAKENGE YE SAB KYA HAI? JAHILIYAT HI TO HAI . ARAY HUM SAB PADHEY LIKHE INSAN HAIN AUR TARAQQI YAFTA DAUR ME ZINDAGI GUZAR RAHE HAIN .HUMARA KAAM ITNA JAHILANA K IN RASOOMAT PAR SHARM A JAI. KYA HUMARE IS KAAM SE AHLULBAIT KHUSH HOTE HAIN? YA RANJIDA HOTE HAIN?  TO DOSTO SUNO PUTLA JALANE KA MAQSAD HAI K HUM APNE ANDAR KI BURAIYON KO JALA RHE HAIN . TO AZEEZON USKO JALANE SE PAHLE APNE ANDAR KI BURAI AUR RUHANI AMRAZ KO JALAO  KHATM KARO. JAISE BEPARDAGI , HASAD , KEENA , GHEEBAT , CHUGHALKHORI WAGHARAH KO APNE ANDAR NA PANAPNE DO. AUR AGAR HAIN TO USKO KHATM KARO AGAR YE CHIZEN HUM ME PAI JATI HAIN TO JO BHI GALI HUM US KHABEES PUTLE KO BANA KAR DE RAHE HAIN TO WO PALAT KAR HUM PAR HI WAPAS AYEGI.  AUR AGAR HUME USKO GALI DENI HI HAI TO KHUD KO US SAY ACHA AUR UNCHA BANAYEN. TAB TO HUME USKO BURA KAHNE KA HUQ HAI WARNA NHI. LOG KAHTE HAIN K UNHONE BIBI KA HUQ GHASB KIA . AUR UNKE PAHLU PE JALTA HUA DARWAZA GIRAYA JIS SAY JANAB-E-MOHSIN KI SHAHADAT WAQEY HUI. ISLIYE HUM UNHE BURA KAHTE HAIN . MAIN LOGON KI IN SAB BATON SE ITTEFAQ RAKHTI HUN . MAGAR FIR BHI YE BAR-BAR KAHUNGI K HUMKO UNHE BURA  KAHNE KA HUQ NHI HAI. IS WASTEY K KYA WAQAI HUM KHUD AHLULBAIT ATHAR KA HUQ ADA KAR RAHE HAIN? JAISE KHUMS , ZAKAT WAGHAIRAH KO NIKAL KAR JO HUM PAR WAJIB HAI ADA KARTE HAIN TO BIBI KHUSH HONGI NA K UNKE DUSHMANO KO GALI DENE SE .IS LIYE HUMARA MAQSAD YE HONA CHAIYE K HUM AHLULBAIT K BATAYE HUE USOOLON PAR CHATE HUE APNI ZINDAGI GUZAREN.
 
Writer : Sister Falaq Zaidi
Sipaah Jaunpur  
कर्बला का पैग़ाम और कर्बला से मिली सीख

1. अमर बिल मारूफ और नही अनिल-मुनकर का महत्त्व
कर्बला का वाक़या हमें सिखाता है की सीधे रास्ते से न हटना और न ही अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ना! आखेरत पर यक़ीन रखना और आखेरत में अपना अंजाम दिमाग में रखनाचाहे दुश्मन कितना ही ताक़तवर हो और चाहे इस से सामना करने के नतीजे कुछ भी हों! हाँ! मगर यह मुकाबला इल्म और शरियत के साथ हो! हिम्मत नहीं हारना और यह न कहना की हम क्या कर सकते हैं चाहे हमारे  दुश्मन (मीडिया और समाज में फैले हुए हों) के सामने हमारी औकात न हो हमें अपना काम करते रहना है और हमें यह हमेशा यक़ीन रखना है की हम इस पर काबू पा सकते हैं और लगातार जंग करते रहना हमारे बस में और ताक़त में है और परीणाम अल्लाह पर छोड़ना है!
2. तक़लीद और आलीम की सुहबत में रहनान की अपनी राये क़ायेम करना
एक बार अपने रहबर और आलिम पर यक़ीन होने के बाद इसकी राये पर अमल करना बगैर किसी झिझक के और बगैर अपनी राये के फ़िक़ह (इस्लामी क़ानून) की अहमियत बीबी ज़ैनब (स:अ) के हवालेहमें इस वाक्य में नज़र आती है के जब खैमे जल रहे थे और इमाम वक़्त (अ:स) से मस-अला पूछा जा रहा था!
3. क़ुरान का महत्व :
हत्ता की इमाम हुसैन (अ:स) का सरे-मुबारक नैज़े पर बुलंद है और तिलावत जारी है,
4. दीनी तालीम का महत्त्व और शरीके हयात क़ा चुनाव :
हमें दो मौकों पर नज़र आता है जब इमाम अली (अ:स) ने उम्मुल-बनीन (स:अ) का चुनाव किया हज़रत अब्बास (अ:स) के लिएऔर दूसरी जगह पर जहाँ इमाम हुसैन (अ:स) ने यजीदी फौजों को मुखातिब किया के यह ईन के पूर्वजों की तरबियत और गलतियों का नतीजा है की इमाम (अ:स) के मुकाबले पर जंग कर रहे हैं!
5. पति और पत्नी का रिश्ता
कर्बला हमें सिखाती है की पत्नीपाती के लिए राहत लायेजैसे इमाम हुसैन (अ:स) की कथनी है की रबाब (स:अ) और सकीना (स:अ) के बगैर मुझे कुछ अच्छा नहीं लगता! पत्नी अपने पती को खुदा का हुक्म मानने से न रोकेजैसे बीबी रबाब (स:अ) ने इमाम हुसैन (अ:स) को न रोका हज़रत असग़र (अ:स) को ले जाने से!  कभी कभार हमारी औरतें अपने पती को अपने बगैर हज पर जाने से रोकती हैं! औरतों को चाहिए की वो अपने पतियों के लिए मददगार बनें और उनकी हिम्मत बढायें हुकूक-अल्लाह (दैविक कर्त्तव्य) और हुकूक-अन्नास (सामाजिक कर्त्तव्य) को पूरा करने में!
6. इल्म (ज्ञान) की अहमियत (महत्त्व):
ताकि जिंदगियां अल्लाह की मर्ज़ी के मुताबिक गुजारी जा सकें! इमाम (अ:स) की कुर्बानी का मकसद ज़्यारत अर-ब'ईन में चार अक्षरों में ब्यान किया गया है के " मैं गवाही देता हूँ के कुर्बानी का मुकम्मल (कुल) मकसद बन्दों को जहालत से बचाना था!
7. इखलास (भगवान् का कर्त्तव्य समझ करभगवान् की राह में अच्छा काम करो) :   
सिर्फ और सिर्फ अल्लाह के लिए अपनी जिम्मेदारियों को अंजाम देनाबगैर किसी रबा (दिखावे) केकयामत पर मुकम्मल यक़ीन ही संसारिक फायदों और आराम को कुर्बान करके आखेरत के लिए हमेशा रहने वाला फायेदा हासिल करवा सकता है!
8. जज़्बात (भावनाओं) पर काबू
जब अल्लाह की ख़ातिर अमल होइस के साथ अपने जज़्बात (भावना) का प्रदर्शन बगैर सुलह के खुदा की ख़ातिर करो!
9. पर्दा का महत्त्व :
ना-महरमों (जो करीबी रिश्तेदार न हों)  से दूर रहना चाहे वोह करीबी रिश्तेदार ना-महरम हों या करीबी खानदानी दोस्त हों!
10. इमाम सज्जाद (अ:स) ने कहा की मेरा मानने वाला गुनाह से बचेदाढ़ी न मुडवाये और जुआ न खेले क्योंकि यह यज़ीदी काम हैं और हमें उस दिन की याद दिलाते हैं!
11. नमाज़ का महत्त्व : यह जंग के बीच में भी पढी गयी
12. अज़ादारी और नमाज़ दोनों मुस्तकिल वाजिब हैंऔर उनका टकराव नहीं जैसा की इमाम सज्जाद (अ:स) खुद सब से बड़े अजादार भी थे और सब से बड़े आबिद (नमाज़ी) भी!
13. ख़ुदा की मर्ज़ी के आगे झुकनाहर वक़्तहर जगह परइमाम (अ:स) ने सजदा-ए शुक्र बजा लाया जब की वोह मुसीबत में थेहमें भी चाहिए की पता करें की खुदा की मर्ज़ी क्या हैइस को माँ लेंऔर इस पर अमल करें!
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का क़ियाम व क़ियाम के उद्देश्य

हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने सन् (61) हिजरी में यज़ीद के विरूद्ध क़ियाम (किसी के विरूद्ध उठ खड़ा होना) किया। उन्होने अपने क़ियाम के उद्देश्यों को अपने प्रवचनो में इस प्रकार स्पष्ट किया कि----

1—
जब शासकीय यातनाओं से तंग आकर हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम मदीना छोड़ने पर मजबूर हो गये तो उन्होने अपने क़ियाम के उद्देश्यों को इस प्रकार स्पष्ट किया। कि मैं अपने व्यक्तित्व को चमकाने या सुखमय जीवन यापन करने या उपद्रव फैलाने के लिए क़ियाम नहीं कर रहा हूँ। बल्कि मैं केवल अपने नाना (पैगम्बरे इस्लाम) की उम्मत (इस्लामी समाज) में सुधार हेतु जारहा हूँ। तथा मेरा निश्चय मनुष्यों को अच्छाई की ओर बुलाना व बुराई से रोकना है। मैं अपने नाना पैगम्बर(स.) व अपने पिता इमाम अली अलैहिस्सलाम की सुन्नत(शैली) पर चलूँगा।

2—
एक दूसरे अवसर पर कहा कि ऐ अल्लाह तू जानता है कि हम ने जो कुछ किया वह शासकीय शत्रुत या सांसारिक मोहमाया के कारण नहीं किया। बल्कि हमारा उद्देश्य यह है कि तेरे धर्म की निशानियों को यथा स्थान पर पहुँचाए। तथा तेरी प्रजा के मध्य सुधार करें ताकि तेरी प्रजा अत्याचारियों से सुरक्षित रह कर तेरे धर्म के सुन्नत व वाजिब आदेशों का पालन कर सके।

3— 
जब आप की भेंट हुर पुत्र यज़ीदे रिहायी की सेना से हुई तोआपने कहा कि ऐ लोगो अगर तुम अल्लाह से डरते हो और हक़ को हक़दार के पास देखना चाहते हो तो यह कार्य अल्लसाह कोप्रसन्न करने के लिए बहुत अच्छा है। ख़िलाफ़त पद के अन्य अत्याचारी व व्याभीचारी दावेदारों की अपेक्षा हम अहलेबैत सबसे अधिक अधिकारी हैं।

4—
एक अन्य स्थान पर कहा कि हम अहलेबैत शासन के उन लोगों से अधिक अधिकारी हैं जो शासन कर रहे है।
इन चार कथनों में जिन उद्देश्यों की और संकेत किया गया है वह इस प्रकार हैं-------

1-
इस्लामी समाज में सुधार।

2-
जनता को अच्छे कार्य करने का उपदेश ।

3-
जनता को बुरे कार्यो के करने से रोकना।

4-
हज़रत पैगम्बर(स.) और हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम की सुन्नत(शैली) को किर्यान्वित करना।

5-
समाज को शांति व सुरक्षा प्रदान करना।

6-
अल्लाह के आदेशो के पालन हेतु भूमिका तैयार करना।
यह समस्त उद्देश्य उसी समय प्राप्त हो सकते हैं जब शासन की बाग़ डोर स्वंय इमाम के हाथो में होजो इसके वास्तविक अधिकारी भी हैं। अतः इमाम ने स्वंय कहा भी है कि शासन हम अहलेबैत का अधिकार है न कि शासन कर रहे उन लोगों का जो अत्याचारी व व्याभीचारी हैं।
 
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के क़ियाम के परिणाम
1-बनी उमैया के वह धार्मिक षड़यन्त्र छिन्न भिन्न हो गये जिनके आधार पर उन्होंने अपनी सत्ता को शक्ति प्रदान की थी।

2-
बनी उमैया के उन शासकों को लज्जित होना पडा जो सदैव इस बात के लिए तत्पर रहते थे कि इस्लाम से पूर्व के मूर्खतापूर्ण प्रबन्धो को क्रियान्वित किया जाये।

3-
कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत से मुसलमानों के दिलों में यह चेतना जागृत हुईकि हमने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की सहायता न करके बहुत बड़ा पाप किया है।
इस चेतना से दो चीज़े उभर कर सामने आईं एक तो यह कि इमाम की सहायता न करके जो गुनाह (पाप) किया उसका परायश्चित होना चाहिए। दूसरे यह कि जो लोग इमाम की सहायता में बाधक बने थे उनकी ओर से लोगों के दिलो में घृणा व द्वेष उत्पन्न हो गया।
इस गुनाह के अनुभव की आग लोगों के दिलों में निरन्तर भड़कती चली गयी। तथा बनी उमैया से बदला लेने व अत्याचारी शासन को उखाड़ फेकने की भावना प्रबल होती गयी।
अतः तव्वाबीन समूह ने अपने इसी गुनाह के परायश्चित के लिए क़ियाम किया। ताकि इमाम की हत्या का बदला ले सकें।

4- 
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के क़ियाम ने लोगों के अन्दर अत्याचार का विरोध करने के लिए प्राण फूँक दिये। इस प्रकार इमाम के क़ियाम व कर्बला के खून ने हर उस बाँध को तोड़ डाला जो इन्क़लाब (क्रान्ति) के मार्ग में बाधक था।

5-
इमाम के क़ियाम ने जनता को यह शिक्षा दी कि कभी भी किसी के सम्मुख अपनी मानवता को न बेंचो । शैतानी ताकतों से लड़ो व इस्लामी सिद्धान्तों को क्रियान्वित करने के लिए प्रत्येक चीज़ को नयौछावर कर दो।

6-
समाज के अन्दर यह नया दृष्टिकोण पैदा हुआ कि अपमान जनक जीवन से सम्मान जनक मृत्यु श्रेष्ठ है।
ख़ुत्बा और बानियाने मजलिस के नाम एक महत्वपूर्ण अनुरोध

यह वोह वक़्त है जब जनता सुनने के लिए तैयार होती है! कर्बला का वाक़िया एक मोएज्ज़ा है! और मुहर्रम वोह वक़्त है जब लोग दीने इस्लाम का पैगाम सुनते हैं! समाज के हर वर्ग और विभाग के लोग अपने मौला इमाम हुसैन (अ:स) की मुहब्बत के लिए मजलिस में शिरकत करते हैं! कोई और मौक़ा ऐसा नहीं होता की लोग मजलिस या धार्मिक व्याख्यान सुनने के लिए इतना वक़्त देते हैं! ज़्याराते अर'बईन में इमाम हुसैन (अ:स) की कुर्बानी का मकसद लोगों को जेहालत से निकालना पाया जाता है! यह हमारी ज़िम्मेदारी है की इस अज़ीम मकसद के हसूल के लिए हम अपनी कोशिशेंजारी  सारी रखें!

ज़्यादातर  लोग ज़िम्मेदारी उठाना नहीं चाहतेबल्कि दुश्मनों की निंदा सुनने में दिलचस्पी लेते हैं और मज़ा उठाते हैं!

यह एक ऐसी मानव प्रकृति है की वो ऐसा कुछ नहीं सुनना चाहते हैं जहाँ इसे सोचने और इसके बाद अपने मिज़ाज के खिलाफ अमल करने की ज़रुरत पड़े! लोग अपने ऊपर ज़िम्मेदारी लेना पसंद नहीं करते हैंखासकर उस वक़्त जिसमे कारवाई करने या परिवर्तन लाने की मांग हो!  दूसरों की निंदा और अपने अकीदे और मान्याताओं की पुष्ठी को सुनना बहुत ही आसान और सुकूँ का काम है!  अलबत्ता इस बात का भी ख्याल रख़ा जाए की किसी भी तरह अनुचित भाषा का उपयोग जबकि वो किसी व्यक्ति विशेष या किसी ख़ास गिरोह के लिए इस्तेमाल की जाती हैवोह समाज में नफरत और हिंसा के इंधन का काम करती है!  यह बात इस्लाम के कमज़ोर होने का कारण भी बनती है! वर्तमान काल में यह आवश्यक है की इस्लाम में मुसलमानों के बीच आपस में शांती एवं एकता  हो! इसके अतिरिक्त बहुत सारे उलटे सीधे तर्क को आसानी से तार्किक चर्चा में मुकाबला करके रद किया जा सकता है! यह बता भी काफी गंभीरता से सोचनी चाहिए की बहुत सारी जगहों पर हमारी बहस नहीं बल्कि हमारी क्रिया और अमल लोगों को प्रभावित करती है! निंदा और ताना देने वाली बातों से  ही किसी अकेले इंसान में और न ही किसी समाज में सुधार लाया जा सकता है! लोग अपने आप को इस्लामी अध्यन करने में अपने वक़्त की बर्बादी समझते हैं! समय की पुकार है की हम अपने आप को और अपने समाज को बदलने की पुरो कोशिश करें! यह शायद संभव हो की अगर कोई खतीब (ज़ाकिर) केवल दूसरों की निंदा करे और लोगों को बदलने या अपना कर्त्तव्य निभाने पर ज़ोर न दे तो उसके मजलिस में मजमा (लोग) भी ज़्यादा होंगे और उसकी तारीफ भी बहुत होगी! परन्तु ईन सब बातों से वो मकसदे अहलेबैत को बढ़ावा देने में सहायक नहीं होगा! 

 अहलेबैत जो हम से चाहते है और उम्मीद रखते हैं - इसका क्या होगा?
इस में कोई शक नहीं है की हम अहलेबैत (अ:स) के माध्यम से ही अपने मोक्ष की उम्मीद करते हैं! अज़ादारी स्वयं अपने आप में एक ज़बरदस्त और बड़ी इबादत है! हमारी मजलिसों में हमारे विश्वास (अकीदा) और अहलेबैत (अ:स) का ज़िक्र होना चाहिए! एतिहासिक बातें भी होनी ज़रूरी हैं ताकि हमारी कौम और हमारे बच्चे अपने प्रशंसनीय इतिहास  को जान सकें और यह समझ सकें की किसी घटनायुद्ध और व्यक्ति विशेष का महत्त्व इस्लाम को बढाने और फैलाने और उजागर करने में क्या रहा है! यह तमाम बातें इस समय लाभदायक होंगी जब हम यह जाँ लेंगे की मजलिस के लिए हमारी जिम्मेदारियां क्या क्या हैं!
हमें मजलिस में अहलेबैत (अ:स) का पैगाम पहुंचाना है! अहलेबैत ने अपना सब कुछ इस्लाम की हिफाज़त में खर्च किया/लुटाया है! ईन की हर समय ताहि कोशिश रही की शरियते इस्लाम यानी सही अकीदे और अहकाम (नियम) जैसे हरामहलालमुस्तहबमकरूह और मोबाह की हिफाज़त हो सके! इन्हों ने हमेशा लोगों के सामने सही इस्लाम का प्रचार और प्रसार किया! तमाम अंबिया और इमामों की यही कोशिश रही है की तमाम मानवजाति अल्लाह की मर्ज़ी को पहचाने और इसके सामने अपनी इच्छाओं को झुकाए और शीश को नमन करे! 
अहलेबैत (अ:स) से मुहब्बत का तरीका है की हम उनका कहना मानेउनके बताये हुए रास्ते पर चलें जो की वास्तविकता में अल्लाह का बताया हुआ रास्ता है! इसके लिए ज़रूरी है की हम इनकी दी हुई शिक्षाओं को समझें! अगर हम अपनी ज़िंदगी इस तरह गुजारेंगे जैसे हम से इस्लाम चाहता है तो यकीनन हमारी दुन्या और आखेरत दोनों कामयाब हो जायेंगी! इसी कारणवश हमारी मजलिसें इस वक़्त कामयाब और लाभदायक होंगी जब हम ज़िक्रे विलायत के साथ साथ आइम्माए-मासूमीन (अ:स) की हम से आशाओं और उम्मीदों का भी तज़किरा करें!

मजलिसों में क्या होना चाहिए ?
हमें अपने आप को और समाज को बेहतर बनाना होगा! इस्लाम ने हमें वो तमाम तरीक़े बताएं हैंजिस से हम अपनी और समाज की संहिता  को बेहतर कर सकते हैं! जैसे बेहतर घरेलू ज़िंदगीगुनाहों से बचनादूसरों की मदद  और इस्लामी दुन्या के हालत से बाखबर रहना इत्यादि! परिवर्तन के लिए कुछ दिनों की मजलिस नाकाफी हैइसलिए मजलिस में आने वालों को यह याद दिलाना ज़रूरी है की इल्म हासिल करने का कार्य साल भर जारी रहना चाहिए! इस सिलसिले में इन्हें चाहिए की किताबोंकैसेटोंसीडीइन्टरनेट इत्यादि का प्रयोग करेंइस से लाभ उठायें जो आजकल आसानी से मिल जाती हैं! इस से निजी व्यक्तित्व और समाज की बढ़ोतरी होती है! जब हमारे इमाम-ज़माना (अ:त:फ) ज़हूर फरमाएंगे तो आप को ऐसे पाक लोगों की ज़रुरत होगी जो बाखबर भी हों और इस्लामी इल्म भी रखते हों! यह एक इस्लामी ज़िम्मेदारी है जाकिरों की भी और समाज का बा-असर लोगों की भी की वो मजलिस के ज़रिये लोगों में यह सारी सलाहियत और खूबी पैदा कर सकें!  यह ज़िम्मेदारी मजलिस में जाने वालों की भी है की वो किस किस्म की मजलिसों को बढ़ावा देते हैं और सराहते हैं!