मुफ्त में लुत्फ़ के चक्कर में जहन्नम न खरीदें |

इंसानो की पहचान आसान है मुश्किल नहीं | इंसान एक सामाजिक प्राणी है और समाज के लोगों से मिलना जुलना उसकी आदत भी है बहुत बार मज़बूरी भी...

इंसानो की पहचान आसान है मुश्किल नहीं |
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इंसान एक सामाजिक प्राणी है और समाज के लोगों से मिलना जुलना उसकी आदत भी है बहुत बार मज़बूरी भी है ऐसे में यह मुश्किल सामने आती है की आखिर समाज के अलग अलग मिज़ाज के लोगों को कैसे पहचाना जाय की कोई कैसा इंसान है ? ध्यान से देखे पे पता यह चलता है की हर इंसान अपने जैसों में उठना बैठना पसंद करता है | जैसे जाहिल को जाहिलों के बीच उठना बैठना पसंद तो अमीरों को अमीर के साथ वगैरह बड़े उदाहरण है |
इस्लाम ने इस बात को महसूस किया की इंसान के इस अपने जैसों के साथ उठने बैठने से तरक़्क़ी के आसार नहीं नज़र आते क्यों की जब कोई जाहिल यह पसंद करे की किसी जाहिल के पास बैठो तो इल्म में इज़ाफ़ा मुमकिन नहीं होगा इसलिए हिदायत यह दी की बैठना हो आलिम के पास बैठो जिस से इल्म हासिल हो और गरीब के पास बैठो जिस से तुम्हरे दिल में उनकी मदद का जज़्बा पैदा हो लेकिन ज़्यादातर लोग ऐसा नहीं कर पाते और अगर कोई करता भी है तो कभी कभी और मौक़ा मिलते ही अपने जैसों के बीच पहुँच जाता है | इसलिए मौला अली ने मश्विरा दिया किसी इंसान को पहचानना हो तो यह देखो की वो किन लोगों के साथ उठता बैठता है |  

एक गुनाह इतना आम हो गया है कि कोई इसको गुनाह भी नहीं समझ रहा है और वो है गीबत ( पीठ पीछे किसी की बुराई ) । हम गपशप करते हैं, और हमारी ये गपशप धीरे धीरे किसी की बुराई करने में कब बदल जाती है हमें पता ही नहीं चलता | हम किसी के पर्सनल मामलात की जासूसी करते हैं और उनके बारे में जो मुंह में आता है बोल देते हैं। अगर ऐसी ही बात हमारे बारे में की जा रही होती तो हमें बुरा लगता ।

आज के समाज की सबसे बड़ी बुराई दूसरों की बुराई करने और सुनने का लुत्फ़ उठाना है या कह लें की ग़ीबत करना है और ऐसा करने वाला सिर्फ खुद के लिए जहन्नम नहीं खरीद रहा होता बल्कि बल्कि जिसके साथ बैठ के ग़ीबत, तोहमत, बुराई किसी की किया करता है उसे भी जहन्नम के क़रीब कर देता है |

बहुत से लोग यह समझ ही नहीं पाते की सामने वाला जो उनसे किसी की बुराई कर रहा है , किसी के लिए ऐसी बातें कह रहा है जिसका न कोई सुबूत है न दलील यह सब उसे भी जहानम की तरफ ले जा रहा है | वे तो बस सुनते हैं क्यों की उन्हें ऐसा करने में लुत्फ़ आ रहा है और कमाल यह की यह भी कहते हैं की देखो कितना कमीना इंसान है एक नेक बन्दे पे तोहमत लगा रहा था और यह कहते हुए पूरे समाज में उन बातों को फैला देते हैं और यह भूल जाते हैं की उसकी बातें सुनके आपने बता दिया की मज़ा तो आपको भी आ रहा था | ऐसा इसलिए हुआ क्यों की सुनने वाला भी उसी ग़ीबत खोर , तोहमत लगाने वाले जैसा ही था बस शराफत का नक़ाब ओढ़े हुए था |

ग़ीबत कहते किसी है इसे दो लव्ज़ों में समझाना आसान तो नहीं लेकिन यह समझ लें किसी के बारे में उसके पीठ पीछे ऐसी बातें करना जो वो सुन ले तो उसे तकलीफ हो चाहे वो बातें सच ही क्यों न हों और जो शख्स सुन रहा है वो भी इस गुनाह का बराबर से शरीक होता है | इसी बुराई में अगर सामने वाला झूट बोल रहा है तो यह तोहमत हुआ करती है | मसलन किसी ने अपने किसी मोमिन भाई के लिए अफवाह फैलाई की वो नमाज़ पढता या जहां जाता है फसाद फैलता है और उसकी बातें बड़े शौक़ से आपने सुनी भी और दूसरों तक पहुँचाया भी तो उसे साथ साथ आप भी जहन्नमी हो गए क्यों की यह सारा इलज़ाम बिना किसी दलील सुबूत के उस शख्स के पीठ पीछे लगाया जा रहा था | जब फुलाने साहब कहीं झगड़ा लगा रहे थे जो वहाँ न उनपे इलज़ाम लगाने वाला मौजूद था ना सुनने वाला |

इस हथियार का शिकार ज़्यादातर वो शख्स होता है जो ज़िंदगी में उस से ज़्यादा सलाहियत और इल्म रखता है जिसकी बुराई यह सामने वाला जलन और हसंद में कर रहा है |

अगर आप उस ग़ीबतखोर जैसे नहीं है और जहन्नम की आग में बेवजह जलना नहीं चाहते तो ऐसे लोगों को फ़ौरन जवाब दें भाई मुझे इस से दूर रखें और अगर आप जाते हैं की सामने वाला झूठे इलज़ाम लगा रहा है या ग़ीबत कर रहा है तो उसका साथ दें जिसकी बुराई की जा रही हैं |

जब तुम उस (झूठ बात) को एक दूसरे से (सुन कर) अपनी ज़बानों पर लाते रहे और अपने मुँह से वह कुछ कहते रहे जिसके विषय में तुम्हें कोई ज्ञान ही न था और तुम उसे एक साधारण बात समझ रहे थे जबकि ईश्वर के निकट वह एक भारी बात है। (24:15) और क्यों जब तुमने उस (आरोप) को सुना तो यह नहीं कहा कि हमारे लिए उचित नहीं कि हम ऐसी बात ज़बान पर लाएँ। (अल्लाह ) तू (हर ग़लतीसे) पवित्र है। यह तो एक बड़ा लांछन है? (24:16) सूरा ऐ नूर

क़ुरआन की इस आयात को समझये |

मदीने के झूट फैलाने वाले मुनाफ़िक़ों के एक गुट ने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की एक पत्नी पर बड़ा आरोप लगाया और मुसलमानों ने भी इस प्रकार का आरोप लगाने और अफ़वाह फैलाने वालों के साथ कड़ा व्यवहार करने के बजाए, इस बात को दूसरों तक पहुँचाया किया। इससे पैग़म्बर और उनकी पत्नी को बहुत अधिक दुख हुआ। अल्लाह इन आयतों में कहता है कि जब तुम्हें उस बात का यक़ीन नहीं था तो तुमने क्यों उसे एक दूसरे को बताया और दूसरों के सम्मान के साथ खिलवाड़ किया? क्या तुम्हें पता नहीं था कि दूसरों के बारे में जो बातें तुम सुनते हो उन्हें बेवजह दूसरों को नहीं बताना | यह आयत दो महत्वपूर्ण सामाजिक दायित्वों की ओर संकेत करती है, प्रथम तो यह कि जो कुछ तुम सुनते हो उसे अकारण स्वीकार न कर लिया करो ताकि समाज में अफ़वाहें फैलाने वालों को रोका जा सके क्योंकि संभव है कि इससे कुछ लोगों की इज़्ज़त ख़तरे में पड़ जाए कि यह इस्लाम की दृष्टि में बड़ा निंदनीय कार्य है। इन आयतों से हमने सीखा कि जो बात लोगों की ज़बान पर होती है उसे बिना जांचे परखे स्वीकार नहीं कर लेना चाहिए। आरोपों को दूसरों तक पहुंचना और किसी के सम्मान को मिट्टी में मिलाना बड़ा सरल कार्य है किंतु ईश्वर की दृष्टि में यह अत्यंत बुरा व निंदनीय है। दूसरों के सम्मान की रक्षा, समाज के सभी सदस्यों का दायित्व है। सुनी हुई बातों को फैलाने के बजाए, अफ़वाह फैलाने वाले के साथ कड़ा व्यवहार करना चाहिए। दूसरों पर आरोप लगाना, जिसका मुख्य कारण उनके बारे में बुरे विचार हैं, ईमान की कमज़ोरी का चिन्ह है।

इसी तरह सुरा  हुजरात ,सूरा ऐ अल हमजा ,सूरा ऐ अन निसा में इसके सख्त अज़ाब का भी ज़िक्र है | 

मौला अली ने मश्विरा दिया किसी इंसान को पहचानना हो तो यह देखो की वो किन लोगों के साथ उठता बैठता है |  

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