लोगों को धर्म के नाम पे एक जगह जमा ना करें और ना जाएँ क्यों की कोरोना के खतरे के कारण यह ख़ुदकुशी है |

मुंबई से आया मेरा दोस्त "दूर "से सलाम करो | साथ में न घूमो फिरो बोलो घर में आराम करो |  कोरोना को हलके में न लीजे और ना जज़्बा...


मुंबई से आया मेरा दोस्त "दूर "से सलाम करो | साथ में न घूमो फिरो बोलो घर में आराम करो | 


कोरोना को हलके में न लीजे और ना जज़्बात से काम लीजे यह हर मुसलमान का फ़र्ज़ है की अक़्ल का इस्तेमाल करे क्यों आपकी हलकी सी लापरवाही आप की और आपके परिवार आस पदों जान पहचान वालों की जान ले सकती है | 

जिस तरह से अब कोरोना के मामले तेज़ी से आने लगे हैं उसमे आपके पास बस एक तरीक़ा है की आप मास्क पहनिए और एक दूसरे से दूरी बना के रखिये और अति आवश्यक होने पे ही आप घरों से बाहर निकालिये | मुश्किल उस समय होती है की जब हम सभी एहतियात करने के बावजूद दूसरों की लापरवाही के कारण हमें इस बीमारी के शिकार हो जाने का खतरा पैदा हो जाता है या फिर हम धर्म के नाम पे जज़्बाती हो के बेवकूफी करने लगते हैं | 

कुछ लोग बिना सोंचे समझे ऐसे समय में भी किसी के घर आ धमकते हैं और यक़ीनन मेहमान की इज़्ज़त करने के कारण हम कुछ बोल भी नहीं पाते लेकिन आज जिन हालत में हम गुज़र रहे हैं उसमे आपको किसी के घर आना जाना भी नहीं चाहिए और अगर कोई आ जाय तो उससे साफ़ साफ़ कह दें दूर रह के घर के बाहर से बात कर दोनों के हित में होगा | रिश्ते और ताल्लुक़ात तो फिर भी बन जाएंगे लेकिन जान इस बिमारी से चली गयी तो वापस नहीं आएगी | 

मनोविज्ञानी बताते हैं की आज के इंसान की मानसिकता यह है की अगर मेरा कोई नुकसान हो रहा है तो दूसरे भी बचने ना पाएं और इस्लामी जज़रीये से यह सोंच जहन्नम का सीधा रास्ता है क्यों की अगर आपकी वजह से किसी को बिमारी लग गयी या जान चली गयी तो आप की सजा वही है जो किसी बेगुनाह का क़त्ल करने की सजा हुआ करती है | 

अब दुष्ट इंसानो की मासिकता जिस समाज में ऐसी हो उस समाज में अगर जीना है तो आपको खुद यह एहतियात करना होगा और न खुद किसी के घर आये जाए और अगर कोई आपके  तो साफ़ साफ़ मना कर दें और ज़रूरी होने पे दूर से ही बात करें , हाथ ना मिलाये और लें दें ना करे | 

अब दूसरा मसला है धर्म के  जज़्बाती होने का तो भाई धर्म के नाम पे किसी जगह लोग जमा नहीं हों इस बात का ध्यान रखें | मस्जिदों में कोई एक शख्स जा के अज़ान दें और अगर नमाज़ पढ़नी है तो अपना मुसल्ला तस्बीह सिजदेगाः अलग रखें क्यों की एक ही मुसल्ले पे हर शख्स नमाज़ अगर पढ़ेगा तो संक्रमण का खतरा बहुत अधिक बढ़ जायगा | यह बात कभी ना भूलियेगा की अल्लाह उसकी मदद करता है जो खुद अपनी मदद करता है | नमाज़ ऐ जमात, अमाल , मजलिस या  ईद की नमाज़ के नाम पे  लोगों को किसी जगह जमा ना करें  क्यों की अगर संक्रमण का जान का खतरा है तो इस्लाम इसकी इजाज़त नहीं देता और यह वो इबादतें है जिन्हे आप घरों से उस वक़्त तक अंजाम दे सकते हैं जब तक करों का खतरा टल ना जाय | 

अल तिर्मिज़ी ने एक रवायत नक़ल की है क़ि एक बार हज़रत मुहम्मद (स) ने देखा की एक खानाबदोश अपने ऊँट को खुला छोड़ के उमरा करने  जा रहा है  तो हज़रत ने उस से पुछा भाई क्यों अपने ऊँट को बांधते नहीं या कही चला गया तो क्या करोगे ? उस शख्स का जवाब था मैं उम्र करने जा रहा हूँ मुझे अल्लाह पे भरोसा है | 

हज़रत मुहम्मद (स) ने कहा तुम पहले अपने ऊँट को बाँध के रखो और उसके बाद अल्लाह पे भरोसा रखो वो इसकी हिफाज़त करेगा |  इस से साफ़ है की हज़रत मुहम्मद (स) ने इस बात को ज़ाहिर किया की पहले तुम खुद सावधानियां करो उसके बाद अल्लाह से दुआ करो तो ही वो मदद करेगा | 

एक बार हज़रत मुहम्मद (स) के समय में महारी प्लेग फैल गयी तो हज़रत ने फ़रमाया जिस गाँव में यह महामारी फैले वहाँ ना जाना और अगर यह महामारी उस इलाक़े में है जहां तुम रहते हो तो उस इलाक़े को छोड़ के दुसरी जगह ना जाना क्यों की ऐसा करने से तुम उसे स्वस्थ  लोगों तक पहुंचा दोगे | 


आज कोरोना के मामले में भी यही सावधानी बतायी जा रही है जिसे हमको सख्ती से मानना चाहिए की आप अगर ऐसे इलाके में हैं जहा यह फैली है तो अन्य इलाक़ों में जहां यह नहीं पहुंची ना जाएँ और दूसरों तक इसके फैलने से रोके और अगर आप ऐसे इलाक़े में हैं जहा लोग स्वस्थ है तो ऐसे इलाक़े से ऐसी महफ़िलों में ना जाएँ जहां से इसके आपको या आपसे दूसरों को लग जाने का खतरा हो | 

इसलिए हम सबको यह समझ लेना चाहिए की अल्लाह और उसके रसूल के बताय रास्ते पे चलते हुए कोरोना जैसे दुश्मन से लड़िये |  पहले खुद इसे फैलने से रोकिये सफाई पे ध्यान दीजे और आवश्यकता पड़ने पे दवाओं का इस्तेमाल करें और उसके साथ साथ अल्लाह से दुआ करें | 

केवल अल्लाह से दुआ करते रहना और इस्लामिक महफ़िलों इत्यादी की भीड़ में चले जाना बिना किसी सावधानी के उचित नहीं और इस्लाम के उसूलों के खिलाफ है 
एस एम मासूम 

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