लुक़मा ऐ हराम मोमिन को मुनाफ़िक़ और इमामत का क़ातिल तक बना सकता है |

इमाम हुसैन ने आशूर के दिन शहादत के कुछ पहले खुत्बा दिया जिसमे उन्होंने कोशिश की कि यह लश्कर ऐ यज़ीद राह ऐ हक़ पे आ जाय लेकिन जब इमाम ख...



इमाम हुसैन ने आशूर के दिन शहादत के कुछ पहले खुत्बा दिया जिसमे उन्होंने कोशिश की कि यह लश्कर ऐ यज़ीद राह ऐ हक़ पे आ जाय लेकिन जब इमाम खुत्बा देते लश्कर ढोल बजने लगते जिस से ना वे सुनें खुत्बा और न लश्कर के सिपाही सुन सकें |

आखिर में इमाम हसैन ने खुत्बा देना बंद यह कह के किया की :-

मैं जानता हूँ तुम मेरी बात क्यों नहीं सुनते | मैं जानता हूँ तुम मेरी बात सुन के भी क्यों नहीं मानते |  क्यूंकि तुम्हारे शिकम पे पेट में लुक़मा ऐ हराम मजूद है और जिस शिकम में लुक़मा ऐ हराम मौजूद  हो उसका पहला असर यही होता है की उसके कान दावत ऐ इलाही को सुनना बंद कर देते हैं | लुक़मा ऐ हराम हक़ की मुख़लेफ़त करने वाला और बातिल का हिमयती और उनका साथी बना देता है |

इमाम हुसैन शहादत के पहले यह बेमिसाल खुत्बा दे के चले गए लकिन यह खुत्बा उस दौर से ले के ता क़यामत तक के लिए आइना बन गया जिसमे देख के हम यह समझ सकते हैं की क्यों बहुत से लोग आज भी हज़ारों मजलिसें सुनते हैं , क़ुरान पढ़ते है उलेमा के ख़ुत्बे सुनते हैं , इमाम अस की हदीसें पढ़ते हैं लेकिन जब अमल की बात आती है तो हक़  को नज़र अंदाज़ करते नज़र आते हैं और कोई उनके सामने हदीस और क़ुरान से हक़ बात रख दे तो तो उसी के खिलाफ अफवाहें और तोहमतें ठीक वैसे ही शुरू कर देते हैं जैसे लश्कर ऐ यज़ीद के लोग इमाम हुसैन के ख़ुत्बे के वक़्त ढोल और ढाल बजाते थे और इस तोहमत और इल्ज़ामात का मक़सद भी वही होता है की हक़ बात लोगों तक नहीं पहुंचे |

लुक़मा ऐ हराम मोमिन को मुनाफ़िक़ और इमामत का क़ातिल तक बना सकता है |


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