जागो मुसलमानों जागो|

जागो मुसलमानों जागो और विश्व को अमन शान्ति से भर दो|--एस एम् मासूम आज मैंने सोंचा कोई जागो इंडिया जागो के नारे से इंडिया को जगा रहा है...

जागो मुसलमानों जागो और विश्व को अमन शान्ति से भर दो|--एस एम् मासूम

302850_507607325940748_324440733_nआज मैंने सोंचा कोई जागो इंडिया जागो के नारे से इंडिया को जगा रहा है, कोई जागो हिन्दू जागो के नारे से हिन्दुओं को जगा रहा है तो क्यूँ ना आज सोये हुए मुसलमानों को भी जगाया जाये ? यदि आप समाज की उन्नति चाहते हैं तो सोये हुए इंसानों को जगाना किसी ऐसे काम के लिए जिस से समाज और इंसानों का भला हो इंसानियत की पहचान है | दुःख की बात यह है की अधिकतर यह नारे जब भी लगाए जाते है तो कहीं ना कहीं नारे लगाने वाले का राजनितिक लाभ इसके पीछे छुपा होता है और नतीजे में ज्ञानी इनसे दूर चला जाता है और अज्ञानी इतना जाग जाता है की झगडे फसाद समाज में करने लगता है | धर्म के नाम पे लोगों को जगाना धर्म पालन के लिए समाज के हित में हुआ करता है लेकिन धर्म के नाम पे जगा के इंसानों को अधर्म की दावत देना इंसानियत और धर्म के खिलाफ हुआ करता है यह सब जानते हैं लेकिन फिर भी ऐसा करने वाले इन नारों से गुमराह करने में बहुत बार कामयाब हो जाया करते हैं |मैंने भी सोंचा की जो नारा इंसानों को जगाने में अधिक कारगर हो और जल्द कामयाबी मिले उसे ही अपनाया जाये इसलिए धर्म के नाम पे दे दिया नारा “ जागो मुसलमानों जागो और विश्व को अमन और शांति से भर दो |बस राजनीति से प्ररित नारों में और मेरे नारे में इतना फर्क है कि उनके जगाने पे अज्ञानी नफरत और फसाद फैलाने लगते हैं लेकिन मुझे आशा है की मेरे जगाने पे ज्ञानी समाज में अमन और शांति का प्रयास करते दिखाई देंगे |
 
 
इस्लाम खतरे में तब कभी नहीं होता जब दुसरे धर्म वाले इसका पालन नहीं करते या इसके खिलाफ बोलते हैं या इस्लाम के विषय पे विवाद करते हैं बल्कि इस्लाम खतरे में तब पड़ता है जब इसको मानने वाले मुसलमान इस्लाम के नाम पे गुमराह किये जाते हैं | बात समझाने के लिए कुछ उदाहरण दे रहा हूँ :
 
1) यदि कोई मुल्ला फतवा देता दिखाई दे की काफ़िर को मारने पे जन्नत मिलेगी तो समझ लें इस्लाम खतरे में हैं क्यूंकि यह फतवा इस्लाम के उसूलों के खिलाफ है |
२) यदि कोई मुल्ला गैर मुसलमानों के धार्मिक स्थानों तो तोड़ने के लिए या उनको उनके धार्मिक कामों को ना करने के लिए फतवे दे तो समझ लें इस्लाम खतरे में है |
३) जब कोई मुल्ला मुसलमानों के आपसी फिरकों को मुद्दा बना के एक दुसरे को काफ़िर कहें और उनको मारने पे जन्नत का वादा करे तो समझ लें इस्लाम खतरे में है |
४) जब कोई आत्मघाती हमले में मुसलमान शरीक मिले और ऐसा करने का कारण किसी मुल्ला द्वारा ज़ारी जन्नत का फतवा बताये तो यहाँ भी इस्लाम खतरे में आता है |
५) जब सेक्स जिहाद के नाम पे महिलाओं को सैनिकों की हवस मिटाने के लिए भेजा जाए और उन महिलाओं को गुमराह किया जाये की ऐसा करने पे तुम्हे जन्नत मिलेगी तो समझ लें इस्लाम खतरे में है |ख़बरों के अनुसार सिरिया में ऐसा किया गया है |
६) जब कोई आतंकवाद की हिमायत में इस्लाम के नाम से फतवे ज़ारी करे या उसे जिहाद का नाम दे तो समझ लें इस्लाम खतरे है |
7) जब कोई मुसलमान गुस्से में तीन बार तलाक कह के ओनी बीवी को तलाक़ दे दे और मुल्ला अपनी गन्दी निगाहें उस औरत पे इस उम्मीद से डालने लगे की अब वापस गयी तो हालाला के नाम पे उसके साथ हमबिस्तर होने का मौक़ा मिलेगा तो समझ लें इस्लाम खतरे में है इत्यादि
यह सारे फतवे कुरान और इस्लाम के कानून के खिलाफ हैं |
 
 
इस्लाम को नुकसान पहुंचाने वाले भी इस बात को समझते हैं इसीलिये बहरूपिये मुल्लाओं द्वारा अनतर्जाल पे ना जाने कितने अजीब अजीब फतवे इस्लाम के नाम पे डाल दिए गए हैं जिनका इस्लाम से कोई वास्ता नहीं बल्कि इस्लाम के उसूलों के खिलाफ वो फतवे हुआ करते हैं | ज्ञानी मुसलमान तो समझ जाता है की यह बहरूपिये हैं लेकिन गैर मुसलमान और कुछ अज्ञानी मुसलमान इन से गुमराह हो जाते है |
 
 
 
आज से १४०० साल पहले भी कुछ ऐसा ही दौर आ चूका है जब मुसलमानों के लिए हलाल और हराम का फर्क करना मुश्किल हो गया था और इतने गुमराह हो चुके थे कि यजीद जैसे बदकिरदार ,ज़ालिम और शराबी को मुसलमानों का खलीफा बना दिया था | उस समय भी यजीद ने बहुत से ऐसे कानून बनाए या ऐसी प्रैक्टिस शुरू की जो इस्लाम के खिलाफ थी और ऐसा करने के कारण इस्लाम खतरे में आ गया | खतरे का मतलब हुआ करता है मुसलमानों का गुमराह होना और ऐसा समय आना की इंसान यह फैसला ना कर सके की कौन सा हुक्म सही है और कौन सा गलत | ऐसे में जिहाद वाजिब हुआ और इमाम हुसैन (अ.स) ने ज़ालिम और बदकिरदार बादशाह यजीद के खिलाफ आवाज़ उठायी और सच्चे इस्लाम को दुनिया के सामने फिर से ला के इस्लाम को बचाया |लेकिन ऐसा करने के लिए उनको अपनी और अपने परिवार ,दोस्तों की कुर्बानी तक देनी पड़ी | कुबानी इस लिए देनी पड़ी कि गुमराह मुसलमान यह भी नहीं पहचान पा रहा था कि इमाम हुसैन (अ.स) जो हजरत मुहम्मद (स.अ.व) के नवासे हैं और अह्लेबय्त में से हैं जिनका ज़िक्र कुरान में किया गया है और जिनके पीछे चलने का हुक्म अल्लाह ने दिया है | यह इमाम हुसैन (अ.स) की कुर्बानी का असर है की आज १४०० साल बाद भी दुनिया का हर मुसलमान इमाम हुसैन (अ.स) को याद करता है , उनकी इज्ज़त करता है और यजीद और यजीद के अपने चलाए झूटे इस्लाम से नफरत करता है |
 
 
 
इस से पहले कि गुमराही के वो दिन फिर से वापस आ जायें दहशतगर्द , आत्मघाती हमले पे जन्नत और सेक्स जिहाद जैसे कानून लाने वाले या बहरूपियों द्वारा इस्लाम के नाम पे दिए गए झूठे और वाहियात फतवे इस्लाम की पहचान बन जायें हर मुसलमान को चाहिए की अपना ज्ञान इस्लाम के बारे में बढाए ,खुद को भी गुमराही से बचाए और दूसरों को भी सही इस्लाम की पहचान करवाते हुए समाज में अमन और शांति कायम करे | आज हर मुसलमान को चाहिए अपना किरदार ऐसा बनाए की उसकी पहचान कुरान और इस्लाम के कानून बनें | कोई जब कुरान पढ़े तो यह ना सवाल करे की ऐसा मुसलमान मिलता कहाँ है जो इन कानूनों पे चलता हो |
कुरान में कुछ लिखा हो और खुद को मुसलमान कहने वाला कुछ और करता दिखाई दे ऐसे विरोधाभास का अंत केवल मुसलमान ही कर सकता है |
























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