कठिनाइयों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है यह मजलिसें ,नमाज़ और हज |

हममें से हर व्यक्ति नाना प्रकार की समस्याओं में गस्त है। दूसरे शब्दों में हममें से कोई भी एसा नहीं है जो किसी न किसी समस्या में गिरफ्ता...


हममें से हर व्यक्ति नाना प्रकार की समस्याओं में गस्त है। दूसरे शब्दों में हममें से कोई भी एसा नहीं है जो किसी न किसी समस्या में गिरफ्तार न हो बस अंतर केवल इतना है कि कोई किसी समस्या में गिरफ्तार है तो कोई किसी में। इंसान के जीवन में कठिनाइयां और समस्याएं एसी वास्तविकताएं हैं जिनसे भागना संभव नहीं है और हम चाहें या न चाहें हमें उनमें ग्रस्त होना ही है परंतु महत्वपूर्ण बात यह है कि हम किस प्रकार समस्याओं व कठिनाइयों का सामना करें और सही ढंग से इन समस्याओं का समाधान करें। आज के संसार में हर इंसान और विभिन्न धर्मों व पंथों के लोग बहुत सी समस्याओं का अलग अलग हल बताते हैं किन्तु इनमें से कोई भी विशेष प्रभावी नहीं रहे हैं जबकि धार्मिक शिक्षाएं इंसान को यह बताती हैं कि वह नाना प्रकार की समस्याओं से मुकाबले में प्रतिरोध की अपनी क्षमता को किस प्रकार अधिक कर सकता है। आज के कार्यक्रम में हम कुछ उन मार्गों की समीक्षा व चर्चा करेंगे कि समस्याओं के समाधान और उनके मुकाबले के लिए ईश्वरीय धर्म इस्लाम ने क्या सुझाव दिये हैं।      


कठिनाइयों के मुकाबले में एक चीज़ जो इंसान की प्रतिरोधक क्षमता को अधिक करती है धार्मिक शिक्षाओं पर विश्वास है। स्पष्ट है कि महान व सर्वसमर्थ ईश्वर पर ईमान और भरोसा इंसान के अंदर प्रतिरोध की क्षमता को अधिक करता है। समस्त ईश्वरीय दूतों के निमंत्रण में पहली चीज़ महान ईश्वर पर ईमान था। ईश्वर पर ईमान रखने का एक चिन्ह यह है कि इंसान कठिनाइयों में महान ईश्वर पर भरोसा करे। जिस इंसान को इस बात का विश्वास हो कि समूचा ब्रह्मांड महान ईश्वर के नियंत्रण में है और वह हर कार्य करने में पूर्ण सक्षम है और वही उपासना के योग्य है तो वह कभी भी स्वयं को इस बात की अनुमति नहीं देगा कि वह ईश्वर को छोड़कर किसी और से सहायता मांगे बल्कि हमेशा वह अपने पालने और पैदा करने  वाले पर विश्वास व भरोसा करेगा और केवल उससे सहायता मांगेगा। उदाहरण स्वरूप अगर कोई इंसान बीमार है तो वह अपना उपचार कराने का प्रयास करता है परंतु उसका वास्तविक ईमान यह होता है कि महान ईश्वर ही उसे ठीक करेगा और जब वह किसी मुसीबत में फंसा होता है तो वह केवल अपने पालनहार से यह आशा करता है कि वह उसकी समस्या को दूर कर सकता है। महान ईश्वर सूरे आलेइमरान की 122वीं आयत में ईश्वर पर भरोसे को मोमिन व ईमानदार व्यक्तियों की विशेषता बताते हुए कहता है” केवल ईमानदार व्यक्ति ही ईश्वर पर भरोसा करते हैं”


स्पष्ट है कि महान ईश्वर पर भरोसा रखने वाले व्यक्तियों को उस पर भरोसा रखने के कारण शांति मिलती है और वे कठिनाइयों से नहीं डरते हैं।
एक दूसरी चीज़ जो कठिनाइयों के मुकाबले में इंसान की प्रतिरोधक क्षमता को अधिक करती है, धार्मिक कार्यक्रमों में उपस्थिति है। जैसे सामूहिक रूप से पढ़ी जाने वाली नमाजों में उस्थिति या हज करने के लिए जाना। यह वह चीज़ें हैं जिनका मनुष्य के जीवन में अत्यधिक प्रभाव है और ये चीज़ें दूसरे इंसानों के साथ सामाजिक संबंधों को मज़बूत करती हैं और मनुष्य के अंदर यह भावना उत्पन्न होती है कि वह कठिनाइयों के मुकाबले में अकेला नहीं है और दूसरे भी हैं जो समय पड़ने पर उसकी सहायता करेंगे। दूसरे मुसलमान भी कुरआन और इस्लाम के आदेशानुसार दूसरों की कठिनाइयों के समाधान में स्वयं को जिम्मेदार समझें  और यथासंभव उनके समाधान के लिए प्रयास करें।

मज़बूत पारिवारिक संबंध भी वह चीज़ है जिससे समस्याओं से मुकाबले में इंसान की प्रतिरोधक क्षमता अधिक हो सकती है। अगर इंसान का पारिवारिक संबंध मजबूत हो तो परिवार के सदस्य दूसरों की अपेक्षा एक दूसरे की समस्याओं को अधिक बेहतर ढंग से समझते और उनका समाधान कर सकते हैं। पारिवारिक संबंधों को मज़बूत करने का एक तरीक़ा यह है कि परिवार के लोग एक दूसरे से झूठ न बोलें एक दूसरे के साथ सच्चाई से पेश आयें। स्पष्ट है कि जब पारिवारिक संबंध मजबूत होगा तो परिवार के सदस्य एक दूसरे की समस्या सुनेंगे और उसके समाधान का प्रयास करेंगे।


कठिनाइयों का सही प्रबंधन और उनका नियंत्रण लोगों में आशा के समाप्त न होने का कारण बनता है। जब पारिवारिक संबंध मजबूत होते हैं तो कोई भी सदस्य व्यक्तिगत हित के बजाये पारिवारिक के हित के बारे में सोचता है। यही नहीं जब पारिवारिक संबंध मज़बूत होते हैं तो कठिनाई और ग़ैर कठिनाइ के समय परिवार के सदस्य एक दूसरे से विचार विमर्श करते हैं और मामले के समाधान का प्रयास करते हैं।

ईश्वरीय धर्म इस्लाम परिवार के सदस्यों से सिफारिश करता है कि वे एक दूसरे से प्रेम करें। क्योंकि परिवार से प्रेम ईश्वरीय उपहार है और परिवार के सदस्यों का एक दूसरे से प्रेम ईश्वरीय कृपा का कारण बनता है। पैग़म्बरे इस्लाम ने अपने एक अनुयाई को संदेश भेजा कि सचमुच हमारी जान, माल और हमारा परिवार ईश्वरीय उपहार है” यहां पर इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि महान ईश्वर ने जान, माल और संतान की जो नेअमत हमें दी गयी हैं वह सीमित समय के लिए है और कुछ समय के बाद वह हमसे वापस ले ली जायेंगी।


परिवार के सदस्यों का एक दूसरे के प्रति जिम्मेदारी का एहसास वह चीज़ है जो नैतिक विशेषताओं व मूल्यों के मजबूत होने का कारण बनता है। स्पष्ट है कि जिस परिवार में नैतिक मूल्य मजबूत होंगे और समस्त लोग एक दूसरे के प्रति अपने दायित्वों का आभास करेंगे वे कठिनाई व समस्या के समय एक दूसरे की सहायत करेंगे और सुख-दुःख की घड़ी में एक दूसरे के साथ होते हैं। महान ईश्वर सूरे तहरीम की आयत नंबर ६ में कहता है हे ईमान लाने वालों स्वयं को और अपने परिजनों को उस आग से बचाओ जिसके ईंधन लोग और पत्थर हैं” एक व्यक्ति ने पैग़म्बरे इस्लाम से पूछा कि  किस प्रकार अपने परिवार को नरक की आग से बचायें? आपने फरमाया अच्छा कार्य अंजाम दो और उसे अपने परिजनों को भी सिखाओ और ईश्वरीय आदेशों के अनुसार  उनकी प्रशिक्षा करो”


समस्याओं से मुकाबले के लिए एक चीज़ सिलहे रहम अर्थात ,निकट परजनों व सगे संबंधियों के साथ अच्छा व्यवहार है। सिलये रहम लोगों के मध्य संबंधों को मजबूत करता है। इस प्रकार के परिवार समय पड़ने पर शीघ्र ही एक दूसरे की सहायता करके समस्या का समाधान करने का प्रयास करते हैं। सिलये रहम के बारे में यही बस है कि पैग़म्बरे इस्लाम ने इसके लिए समस्त मुसलमानों से सिलये रहम की सिफारिश की है और चाहे लोगों को इस दिशा में काफी समस्या का भी सामना क्यों न हो और एक दूसरे का रास्ता एक दूसरे के घर से बहुत दूर ही क्यों न हो। पैगम्बरे इस्लाम ने फरमाया है” अपने उपस्थित व अनुपस्थित अनुयाइयों से यहां तक प्रलय तक के लोगों से सिफारिश करता हूं कि वे सिलये रहम करें। यद्यपि एक दूसरे की ओर रास्ते की दूरी एक वर्ष ही क्यों न हो क्योंकि सिलये रहम धर्म की सिफारिश है”

सिलये रहम का एक फायदा उम्र का अधिक होना, व्यवहार का अच्छा होना, आत्मा की शुद्धि, द्वेष का समाप्त हो जाना, मुसीबतों का खत्म हो जाना और पूंजी का अधिक हो जाना है।


अगर हम यह चाहते हैं कि व्यक्तिगत और सामाजिक मुसीबतों से दूर रहें तो बेहरीन मार्ग सिलये रहम है। हजरत इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम फरमाते हैं सिलये रहम कार्यों को शुद्ध करता है धन को बहुत अधिक करता है मुसीबतों को दूर करता है कर्मों के हिसाब को सरल कर देता है और मौत को पीछे कर देता है”

जब निकट संबंधी और परिवार के लोग एक दूसरे को देखने के लिए जायें और निकट से एक दूसरे को देंखे और उनके मध्य संबंध स्थापित रहे तो उनके मध्य प्रेम और निष्ठा अधिक होगी और जब किसी एक के लिए कोई समस्या पेश आ जायेगी तो दूसरे उनकी सहायता के लिए जायेंगे।


एक दूसरे को उपहार देने से भी एक दूसरे के प्रति प्रेम बढ़ता है और यह वह कार्य है जो विभिन्न अवसरों पर होता है और इससे उपहार देने और लेने वालों के मध्य संबंध मजबूत होता है। पैगम्बरे इस्लाम फरमाते हैं” एक दूसरे को उपहार दो क्योंकि उपहार मनमोटाव को दूर कर देता है और द्वेष और शत्रुता को समाप्त कर देता है”

स्पष्ट है कि कठिनाइ के समय लोगों को एक दूसरे की अधिक आवश्यकता होती है और उनके मध्य मज़बूत संबंध इस बात का कारण बनता है कि कठिन घड़ी में वे एक दूसरे के साथ रहते हैं।    

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