मेरे भाई गुस्सा मत करना.

नफ्स की बीमारियों मैं ग़ुस्सा बहुत अहम है और यह एक ऐसी बीमारी है जिसके बारे मैं हज़रत अली (अ.स) ने फ़रमाया की यह शुरू होता है पागलपन से और इस...

angerनफ्स की बीमारियों मैं ग़ुस्सा बहुत अहम है और यह एक ऐसी बीमारी है जिसके बारे मैं हज़रत अली (अ.स) ने फ़रमाया की यह शुरू होता है पागलपन से और इसका अंत है पछतावा.

ग़ुस्सा कमज़ोर इंसान की पहचान है और सबसे मज़बूत वही इंसान होता है जिसे अपने गुस्से  पे काबू करना आता  है.

इंसान की जिंदगी में सबसे खराब मोड़ वह होता है जब वह अचानक किसी बात पर गुस्से में आ जाता है और ऐसा काम कर बैठता है कि जिससे अचानक फितना (फसाद) खड़ा हो जाता है। जो कभी छोटा होता है तो कभी बड़ा. कभी-कभी यह फसाद नस्लों तक चलता है. ऐसे में इंसान अपने गुस्से पर काबू कर ले तो बहुत सी तबाहियों से बच सकता है. तमाम धर्मो में प्रार्थना और इबादत इसी मकसद को पूरा करने के लिए भी है. मसलन हर रोज मुसलमान पांच दफा नमाज पढ़ता है तो यह एक ऐसा अंतराल होता है जिसमें वह अपनी किसी भी रूह की बीमारियों जैसे अपने गुस्से को नियंत्रित कर सकता है.इसलिए की इस्लाम मैं ग़ुस्सा हराम (मना) है गुस्सा पाप है और रोज़े मैं तो गुस्सा करने से रोज़ा भी ख़तम हो  जाया करता है.


मुसलमान जब नमाज़ ए सुबह पढता है और अपने दुनावी काम अंजाम देता है तो दिल मैं यह ख्याल भी रहता है किया भी दोपहर मैं फिर अल्लाह के पास जाना है (नमाज़ ए जुहर) और इस ख्याल से की उस वक़्त अल्लाह को अपने गुनाह के बारे मैं क्या जवाब देगा , इंसान खुद को गुनाहों से रोक लेता है.'


इसी तरह वह साल के 30 दिन रोजे रखता है तो उसमें भी उसे जरूरी बात बतायी जाती है कि गुस्सा किया तो रोजा खत्म. इस तरह माहे रमजान इंसान को इस बात का अभ्यास कराता है कि वह गुस्से से अलग रहकर समाज के लिए एक नेक इंसान बने.
जब किसी इंसान को ग़ुस्सा आ ही जाए तो उसको चाहिए की वो अगर खड़ा है तो बैठ जाए और उसके दोस्तों को चाहिए की जिसे गुस्सा आया है उसके हाथ और सर पे प्यार से हाथ फेर के उसे समझें ऐसा करने से गुस्सा फ़ौरन ख़त्म हो जाता है.

जब रमजान खत्म होता है तो मुसलमान ईद की तैयारियों में मशगूल हो जाता है. तो उस दिन भी वह रोज की पांच नमाजे नहीं छोड़ सकता.यानि ईद की नमाज पढ़कर कोई नया काम नहीं करता. ईद वही है जिसमें बगैर किसी धर्म के भेदभाव से सभी जानने वाले इस खुशी में शरीक हों. मुसलमान होकर गैर मुस्लिम लोगों से गले मिले. नये कपड़े पहनने, मिठाई या सेवई खाने से ईद नहीं होती है बल्कि उसके इखलाक में आये बदलाव से ईद होती है. कोई मुसलमान ईद के दिन यह नहीं कहेगा के ईद की खुशी हमारे लिए है इसमें सिर्फ मुसलमान ही शरीक होंगे कोई और नहीं. ऐसा इसलिए कि रोजे मुसलमान ने रखे, नमाज मुसलमान ने पढ़ी मगर ईद में बगैर किसी धर्म के भेदभाव सबको शरीक क्यों करते हैं और सब ईद में शरीक क्यों होते हैं. सिर्फ इसलिए कि तुमने 30 दिन तक अल्लाह के सामने इसका अभ्यास किया है कि तुम एक अच्छे इंसान बने हो और साल भर ऐसे ही रहने की कोशिश करोगे. रमजान का पैगाम सिर्फ रमजान महीने के लिए नहीं है बल्कि एक रमजान से दूसरे रमजान तक पहुंचने के बीच के 11 महीने अच्छी और सच्ची बात का अमल करने का पैगाम देता है. यह माह ए रमजान इंसान की रूह की हर बिमारीयों से दूर करने की दवा है.

कल ज़िक्र होगा हमारे रूह की खतरनाक बीमारी"  रिया " Pretending Virtuousness या कह लें ऐसा दिखावा  करना ,जैसे बहुत बड़े नेक और पुण्य करने वाले हैं .

प्रतिक्रियाएँ: 

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  1. हमने तो ग़ुस्सा करना अब बहुत कम कर दिया है।
    चाहें तो आप देख भी सकते हैं
    एक तन्हा औरत का दर्द

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  2. ये बात तो सोलह आने सही है कि गुस्सा सिर्फ़ और सिर्फ़ नुक़सान ही कराता है}

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  3. ईद वही है जिसमें बगैर किसी धर्म के भेदभाव से सभी जानने वाले इस खुशी में शरीक हों. मुसलमान होकर गैर मुस्लिम लोगों से गले मिले.
    kaash sabhi samaj jaye is baat ko ,
    badhai sarthak post ke liye

    ReplyDelete
  4. आपकी पोस्ट " ब्लोगर्स मीट वीकली {३}"के मंच पर सोमबार ७/०८/११को शामिल किया गया है /आप आइये और अपने विचारों से हमें अवगत करिए /हमारी कामना है कि आप हिंदी की सेवा यूं ही करते रहें। कल सोमवार को
    ब्लॉगर्स मीट वीकली में आप सादर आमंत्रित हैं।

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  5. आपकी पोस्ट "ब्लोगर्स मीट वीकली {३}" के मंच पर शामिल की गई है /आप वहां आइये और अपने विचारों से हमें अवगत कराइये/ हमारी कामना है कि आप हिंदी की सेवा यूं ही करते रहें। कल सोमवार०८/०८/11 को
    ब्लॉगर्स मीट वीकली में आप सादर आमंत्रित

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