नमाज़ी के लिबास की शर्तें

अयातुल्लाह सीस्तानी  806. नमाज़ पढ़ने वाले के लिबास की छः शर्तें हैं। 1.पाक हो। 2.मुबाह हो। 3.मुर्दार के अज्ज़ा से न बना हो। 4.हर...


अयातुल्लाह सीस्तानी 

806. नमाज़ पढ़ने वाले के लिबास की छः शर्तें हैं।
1.पाक हो।
2.मुबाह हो।
3.मुर्दार के अज्ज़ा से न बना हो।
4.हराम गोश्त जानवर के अज्ज़ा से न बना हो।
5.अगर नमाज़ पढ़ने वाला मर्द हो तो सका लिबास ख़ालिस रेशम का न हो।
6. अगर नमाज़ पढ़ने वाला मर्द हो तो सका लिबास ज़रदोज़ी का न हो।
इन शर्तों की तफ़्सील आने वाले मसलों में ब्यान की जायेगी।
पहली शर्त
807. नमाज़ पढ़ने वाले के लिबास का पाक होना ज़रूरी है। अगर कोई इंसान इख़्तियार की हालत में नजिस बदन या नजिस लिबास के साथ नमाज़ पढ़े तो उसकी नमाज़ बातिल है।
808. अगर कोई इंसान अपनी कोताही की वजह से यह न जानता हो कि नजिस लिबास व नजिस जिस्म के साथ नमाज़ पढ़ना बातिल है, और नजिस जिस्म या लिबास के साथ नमाज़ पढ़े तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर उसकी नमाज़ बातिल है।
809. अगर कोई इंसान मसला न जानने की बिना पर कोताही की वजह से किसी नजिस चीज़ के बारे में न जानता हो कि यह नजिस है, मसलन यह न जानता हो कि काफ़िर का पसीना नजिस है, और उस पसीने के साथ नमाज़ पढ़ले तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर उसकी नमाज़ बातिल है।
810. अगर किसी इंसान को यह यक़ीन हो कि उसका बदन या लिबास, नजिस नही है और वह उसी हालत में नमाज़ पढ़ले और नमाज़ के बाद पता चले कि उसका जिस्म या लिबास नजिस था तो उसकी नमाज़ सही है।
811. अगर कोई इंसान यह भूल जाये कि उसका बदन या लिबास नजिस है और उसे नमाज़ पढ़ते वक़्त या नमाज़ के बाद याद आये तो अगर उसने अपनी लापरवाई और अहमियत न देने की वजह से भुला दिया था तो एहतियाते लाज़िम यह है कि वह उस नमाज़ को दोबारा पढ़े और अगर वक़्त गुज़र चुका हो तो उसकी क़ज़ा करे। इस सूरत के अलावा ज़रूरी नही है कि वह नमाज़ को दोबारा पढ़े (यानी अगर लापरवाई और कोताही की बिना पर न भुलाया हो तो नमाज़ सही है।) लेकिन अगर नमाज़ के दौरान याद आये तो ज़रूरी है कि उस हुक्म पर अमल करे जो इसके बाद वाले मसले में बयान किया जायेगा।
812. अगर कोई इंसान नमाज़ पढ़ रहा हो और नमाज़ के लिए वक़्त काफ़ी हो और उसे नमाज़ के दौरान पता चले कि उसका बदन या लिबास नजिस है और उसे यह एहतेमाल हो कि नमाज़ शुरू करने के बाद नजिस हुआ है तो इस सूरत में अगर बदन या लिबास पाक करने या लिबास तबदील करने या लिबास उतार देने से नमाज़ न टूटे तो नमाज़ के दौरान ही बदन या लिबास पाक करे या लिबास तबदील करे या अगर उसकी शर्म गाह किसी और चीज़ से छुपी है तो लिबास उतार दे। लेकिन अगर बदन या लिबास पाक करने या लिबास बदलने से नमाज़ टूटती हो या लिबास उतारने की सूरत में बरैहना (नंगा) होना ज़रूरी हो तो एहतियाते लाज़िम यह है कि पाक लिबास के साथ दोबारा नमाज़ पढ़े।
813. अगर कोई इंसान तंग वक़्त में नमाज़ पढ़ रहा हो और नमाज़ के दैरान उसे पता चले कि उसका लिबास नजिस है और उसे यह एहतेमाल हो कि यह नमाज़ शुरू करने के बाद नजिस हुआ है तो इस सूरत में अगर लिबास पाक करने या तबदील करने या उतारने से नमाज़ न टूटती हो और वह लिबास उतार सकता हो तो ज़रूरी है कि लिबास को पाक करे या लिबास तबदील करे या अगर किसी और चीज़ ने उसकी शर्म गाह को छुपा रखा हो तो लिबास उतार दे और नमाज़ ख़त्म करे लेकिन अगर किसी और चीज़ ने उसकी शर्मगाह को न छुपा रखा हो और वह न लिबास पाक कर सकता हो और न उतार सकता हो तो ज़रूरी है कि उसी नजिस लिबास के साथ नमाज़ को तमाम करे।
814. अगर कोई इंसान तंग वक़्त में नमाज़ पढ़ रहा हो और नमाज़ के दौरान उसे पता चले कि उसका बदन नजिस है और उसे यह एहतेमाल हो कि यह नमाज़ शुरू करने के बाद नजिस हुआ है तो अगर सूरत यह हो कि बदन पाक करने से नमाज़ न टूटती हो तो बदन को पाक करे और अगर नमाज़ टूटती हो तो उसी हालत में नमाज़ को तमाम करे, उसकी नमाज़ सही है।
815. अगर कोई इंसान अपने बदन या लिबास के नजिस होने में शक करे और छान-बीन के बाद कोई चीज़ न पाकर नमाज़ शुरू कर दे और नमाज़ के बाद पता चले कि उसका बदन या लिबास नजिस था तो उसकी नमाज़ सही है, लेकिन अगर उसने नमाज़ से पहले छान बीन न की हो तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर ज़रूरी है कि नमाज़ दोबारा पढ़े और अगर वक़्त ख़त्म हो चुका हो तो उसकी क़ज़ा करे।
816. अगर कोई इंसान अपना लिबास धोये और उसे यक़ीन हो जाये कि लिबास पाक हो गया है और वह उसे पहन कर नमाज़ पढ़ले और नमाज़ के बाद पता चले कि लिबास पाक नही हुआ था तो उसकी नमाज़ सही है।
817. अगर कोई इंसान अपने बदन या लिबास पर खून देखे और उसे यक़ीन हो कि यह नजिस खूनों में से नही है, मसलन उसे यक़ीन हो कि यह मच्छर का ख़ून है और वह उसी हालत में नमाज़ पढ़ले और नमाज़ के बाद पता चले कि वह ख़ून नजिस है तो उसकी नमाज़ सही है।
818. अगर किसी इंसान को यक़ीन हो कि उसके बदन या लिबास पर जो ख़ून लगा है वह ऐसा ख़ून है कि उसके साथ नमाज़ पढ़ना सही है, मसलन उसे यक़ीन हो कि यह ज़ख़्म या फोड़े का ख़ून है और वह उसी हालत में नमाज़ पढ़ले और नमाज़ के बाद पता चले कि वह ऐसा ख़ून है जिसके साथ नमाज़ बातिल है तो उसकी नमाज़ सही है।
819. अगर कोई इंसान किसी चीज़ के नजिस होने के बारे में भूल जाये और गीला बदन या लिबास उस चीज़ से छू जाये और इसी भूल के आलम में वह उसके साथ नमाज़ पढ़ले और नमाज़ के बाद उसे याद आये तो उसकी नमाज़ सही है। लेकिन अगर उसका गीला बदन उस चीज़ को छू जाये जिसकी निजासत के बारे में वह भूल गया है और अपने आपको पाक किये बग़ैर ग़ुस्ल करके नमाज़ पढ़े तो उसका ग़ुस्ल और नमाज़ दोनों बातिल हैं। लेकिन अगर ग़ुस्ल करने से बदन भी पाक हो जाये तो इस सूरत में नमाज़ और ग़ुस्ल दोनों सही हैं और अगर वुज़ू के हिस्सों में से कोई हिस्सा उस चीज़ से छू जाये जिसकी निजासत के बारे में वह भूल गया था तो और वह उस हिस्से को पाक किये बग़ैर वुज़ू करके नमाज़ पढ़ले तो उसका वुज़ू और नमाज़ दोनों बातिल हैं। लेकिन अगर वुज़ू करने से वुज़ू के हिस्से भी पाक हो जायें तो वुज़ू और नमाज़ दोनों सही हैं।
820. जिस इंसान के पास सिर्फ़ एक लिबास हो अगर उसका बदन व लिबास दोनों नजिस हो जायें और उसके पास उनमें से सिर्फ़ एक ही को पाक करने के लिए पानी हो, तो एहतियाते लाज़िम यह है कि बदन को पाक करे और नजिस लिबास के साथ नमाज़ पढ़े, लिबास को पाक करके नजिस बदन के साथ नमाज़ पढ़ना जाइज़ नही है। लेकिन अगर लिबास की निजासत बदन की निजासत से बहुत ज़्यादा हो या लिबास की निजासत बदन की निजासत के लिहाज़ से ज़्यादा शदीद हो, तो उसे इख़्तियार है कि लिबास और बदन में से जिसे चाहे पाक करे।
821. जिस इंसान के पास नजिस लिबास के अलावा, दूसरा कोई लिबास न हो, उसके लिए ज़रूरी है कि नजिस लिबास के साथ ही नमाज़ पढ़े, उसकी नमाज़ सही है।
822. जिस इंसान के पास दो लिबास हों और वह यह जानता हो कि इनमें से एक नजिस है, लेकिन यह न जानता कि कौन सा नजिस है तो अगर उसके पास वक़्त हो तो ज़रूरी है कि दोनो के साथ नमाज़ पढ़े (यानी एक बार एक लिबास पहन कर और दूसरी बार दूसरा लिबास पहन कर वही नमाज़ पढ़े), मसलन अगर वह ज़ोह्र और अस्र की नमाज़ पढ़ना चाहे तो ज़रूरी है कि हर एक लिबास से एक नमाज़ ज़ोह्र की और एक नमाज़ अस्र की पढे। लेकिन अगर वक़्त तंग हो तो जिस लिबास के साथ भी नमाज़ पढ़े काफ़ी है
दूसरी शर्त
823. नमाज़ पढ़ने वाले का लिबास मुबाह होना ज़रूरी है। अगर कोई ऐसा इंसान जो जानता हो कि ग़स्बी लिबास पहनना हराम है या कोताही की वजह से मस्अला का हुक्म न जानता हो और जान बूझ कर उस लिबास में नमाज़ पढ़ तो एहतियात की बिना पर उसकी नमाज़ बातिल है। लेकिन अगर लिबास में वह चीज़ें शामिल हों जो तन्हा शर्मगाह को न ढक सकती और इसी तरह वह चीज़ें जिनसे शर्मगाह को तो ढाँपा जा सकता हो, लेकिन नमाज़ पढ़ने वाले ने उन्हे हालते नमाज़ में न पहन रखा हो, मसलन बड़ा रूमाल यो लंगोटी जो जेब में रखी हो और इसी तरह वह चीज़ें जिन्हें नमाज़ी ने पहन रखा हो लेकिन शर्मगाह को मुबाह कपड़े से छुपा रखा हो तो, ऐसी तमाम सूरतों में उन (इज़ाफ़ी) चीज़ों के ग़स्बी होने से नमाज़ पर कोई फ़र्क़ नही पड़ता, अगरचे एहतियात यह है कि उन्हें अलग कर दिया जाये।
824. जो इंसान यह जानता हो कि ग़स्बी लिबास पहनना हराम है, लेकिन यह न जानता हो कि ग़स्बी लिबास में नमाज़ पढ़ने से नमाज़ बातिल हो जाती है, तो अगर वह ग़स्बी लिबास में नमाज़ पढ़े तो एहतियात की बिना पर उसकी नमाज़ बातिल है, जैसा कि इससे पहले मस्अले में तफ्सील से बताया जा चुका है।
825. अगर कोई इंसान यह न जानता हो कि उसका लिबास ग़स्बी है या उसके ग़स्बी होने को भूल जाये और उस लिबास में नमाज़ पढ़े तो उसकी नमाज़ सही है। लेकिन अगर वह इंसान ख़ुद उस लिबास को ग़स्ब करे और फिर भूल जाये कि उसने ग़स्ब किया है और उसी लिबास में नमाज़ पढ़े तो एहतियात की बिना पर उसकी नमाज़ बातिल है।
826. अगर किसी इंसान को मालूम न हो या भूल जाये कि उसका लिबास ग़स्बी है और वह उस लिबास में नमाज़ पढ़ने लगे और नमाज़ के दौरान उसे पता चले या याद आये कि यह लिबास ग़स्बी है तो अगर उसकी शर्मगाह किसी दूसरी चीज़ से ढकी हुई हो और वह फ़ौरन या नमाज़ का तसल्सुल तोड़े बग़ैर ग़स्बी लिबास उतार सकता हो तो ज़रूरी है कि फौरन उस लिबास को उतार दे और अगर उसकी शर्मगाह किसी दूसरी चीज़ से ढकी हुई न हो या वह ग़स्बी लिबास को फ़ौरन न उतार सकता हो या अगर लिबास उतारने से नमाज़ का तसल्सुल टूटता हो तो अगर उसके पास एक रकअत पढ़ने के बराबर वक़्त भी हो तो ज़रूरी है कि नमाज़ को तोड़ दे और मुबाह लिबास पहन कर नमाज़ पढ़े और अगर इतना वक़्त न हो तो ज़रूरी है कि नमाज़ की हालत में ही लिबास उतार दे और "बरैहना लोगों की नमाज़ के हुक्म के मुताबिक़" नमाज़ को तमाम करे।
827. अगर कोई इंसान अपनी जान की हिफ़ाज़त के लिए ग़स्बी लिबास में नमाज़ पढ़े या मिसाल के तौर पर ग़स्बी लिबास में इसलिए नमाज़ पढ़े कि चोरी न हो सके तो उसकी नमाज़ सही है।
828. अगर कोई इंसान उस रक़्म से लिबास ख़रीदे जिसका ख़ुम्स अदा न किया गया हो तो उस लिबास के साथ नमाज़ पढ़ने का वही हुक्म है, जो ग़स्बी लिबास के साथ नमाज़ पढ़ने का हुक्म है।
तीसरी शर्त
829. ज़रूरी है कि नमाज़ पढ़ने वाले का लिबास (यहाँ तक कि वह चीज़ें भी जो तन्हा शर्मगाह को न छुपा सकती हों) एहतियाते लाज़िम की बिना पर ख़ून जहिन्दादार[1], मुर्दा जानवर के अज्ज़ा से न बनी हो, बल्कि अगर लिबास ग़ैरे ख़ूने जहिन्दादार[2] मुर्दा जानवर, मसलन मछली और साँप के अजज़ा से भी तैयार किया जाये, तो एहतियाते मुस्तहब की बिना पर उसमें भी नमाज़ न पढ़ी जाये।
830. अगर नजिस मुरदार की कोई ऐसी चीज़ जिसमें रूह होती है, मसलन गोश्त और खाल, नमाज़ पढ़ने वाले के साथ हो तो उसकी नमाज़ का सही होना बईद नही है।
831. अगर हलाल गोश्त मुरदार की कोई ऐसी चीज़ जिसमें रूह नही होती, मसलन बाल और रुवा, नमाज़ पढ़ने वाले के साथ हो या उन चीज़ों से बनाये गये लिबास में नमाज़ पढ़े तो उसकी नमाज़ सही है।
चौथी शर्त
832. ज़रूरी है कि नमाज़ पढ़ने वाले का लिबास (उन चीज़ों के अलावा जो तन्हा शर्मगाह को न छुपा सकती हों, जैसे जुराब) दरिन्दों के अज्ज़ा से तैयार किया हुआ न हो, बल्कि एहतियाते लाज़िम की बिना पर हर उस जानवर के अज्ज़ा से बना हुआ न हो जिसका गोश्त खाना हराम है। इसी तरह ज़रूरी है कि नमाज़ पढ़ने वाले का लिबास और बदन हराम गोश्त जानवर के पेशाब, पख़ाने, पसीने, दूध और बाल से आलूदा न हो, लेकिन अगर हराम गोश्त जानवर का एक बाल उसके लिबाल पर लगा हो तो कोई हरज नही है। अगर नमाज़ गुज़ार के साथ इनमें से कोई चीज़ डिबीया या बोतल वग़ैरह में बंद रखी हो तो तब भी कोई हरज नही है।
833. अगर हराम गोश्त जानवर के मुँह या नाक का पानी या कोई दूसरी रतुबत नमाज़ पढ़ने वाले के बदन या लिबास पर लगी हो और तर हो तो नमाज़ बातिल है। लेकिन अगर वह ख़ुश्क हो चुकी हो और उसका ऐन जुज़ ख़त्म हो गया हो तो नमाज़ सही है।
834. अगर किसी का बाल या पसीना या थूक नमाज़ पढ़ने वाले के बदन या लिबास पर लगा हो तो कोई हरज नही है। इसी तरह मर्वारीद, मोम और शहद लगे कपड़े या बदन के साथ भी नमाज़ जाइज़ है।
835. अगर किसी को शक हो कि लिबास हलाल गोश्त जानवर से तैयार किया गया है या हराम गोश्त जानवर से तो चाहे वह उसी शहर में तैयार किया गया हो या दूसरी जगह से मंगाया गया हो उसके साथ नमाज़ पढ़ना जाइज़ है।
836. चूंकि मालूम नही है कि सीपी हराम गोश्त जानवर के अज्ज़ा में से है, लिहाज़ा सीप के बटन वग़ैरह के साथ नमाज़ पढ़ना जाइज़ है।
837. समूर का लिबास (mink fur) और इसी तरह गिलहरी की पोस्तीन पहन कर नमाज़ पढ़ने में कोई हरज नही है, लेकिन एहतियाते मुस्तहब यह है कि गिलहरी की पोस्तीन के साथ नमाज़ न पढ़ी जाये।
838. अगर कोई इंसान ऐसे लिबाल में नमाज़ पढ़े, जिसके बारे में न जानता हो या भूल गया हो कि यह हराम गोश्त जानवर से तैयार हुआ है तो एहतियाते मुस्तहब की बिना पर उस नमाज़ को दोबारा पढ़े।
पाँचवी शर्त
839. ज़रदोज़ी (सोने के तारो से कढ़े हुआ) का लिबास पहनना मर्दों के लिए हराम है और उसमें नमाज़ पढ़ना बातिल है, लेकिन औरतों के लिए नमाज़ में या नमाज़ के अलावा उसके पहनने में कोई हरज नही।
840. सोना पहनना मसलन सोने की ज़जीर गले में पहनना, सोने का अंगूठी हाथ में पहनना, सोने की घड़ी कलाई पर बाँधना और सोने की ऐनक लगाना मर्दों के लिए हराम है और इन चीज़ों के साथ नमाज़ पढ़ना बातिल है। लेकिन औरतों के लिए नमाज़ में और नमाज़ के अलावा इन चीज़ों के इस्तेमाल में कोई हरज नही है।
841. अगर कोई इंसान न जानता हो या भूल गया हो कि उसकी अंगूठी या लिबास सोने का है या उसके बारे में शक हो और उसके साथ नमाज़ पढ़े तो उसकी नमाज़ सही है।
छटी शर्त
842. नमाज़ पढ़ने वाले मर्द का लिबास, यहाँ तक कि एहतियाते मुस्तहब की बिना पर टोपी और इज़ारबंद भी, ख़ालिस रेशम का नही होना चाहिए और नमाज़ के अलावा भी ख़ालिस रेशम पहनना मर्दों के लिए हराम है।
843. अगर लिबास का तमाम अस्तर या उसका कुछ हिस्सा ख़ालिस रेशम का हो तो मर्द के लिए उसका पहनना हराम और उसके साथ नमाज़ पढ़ना बातिल है।
844. जब किसी लिबास के बारे में यह इल्म न हो कि ख़ालिस रेशम का है या किसी और चीज़ का बना हुआ है तो उसका पहनना जाइज़ है और उसके साथ नमाज़ पढ़ने में भी कोई हरज नही है।
845. रेशमीन रूमाल या उसी जैसी कोई दूसरी चीज़ मर्द की जेब में हो तो कोई हरज नही है और वह नमाज़ को बातिल नही करती।
846. औरत के लिए नमाज़ में या उसके अलावा रेशमीन लिबास पहनने में कोई हरज नही है।
847. मजबूरी की हालत में ग़स्बी, ख़ालिस रेशमी और ज़रदोज़ी का लिबास पहनने में कोई हरज नही है। जो इंसान लिबास पहनने पर मजबूर हो और उसके पास इनके अलावा और कोई लिबास न हो तो वह इन लिबासों में नमाज़ पढ़ सकता है।
848. अगर किसी इंसान के पास ग़स्बी लिबास के अलावा दूसरा कोई लिबास न हो और वह यह लिबास पहनने पर मजबूर न हो तो उसे चाहिए कि उन अहकाम के मुताबिक़ नमाज़ पढ़े जो बरैहना लोगों के लिए बताये गये हैं।
849. अगर किसी के पास दरिन्दे के अज्ज़ा से बने हुए लिबास के अलावा और कोई लिबास न हो और वह उस लिबास को पहनने पर मजबूर हो तो उस लिबास के साथ नमाज़ पढ़ सकता है और अगर लिबास पहनने पर मजबूर न हो तो उसे चाहिए कि उन अहकाम के मुताबिक़ नमाज़ पढ़े जो बरैहना लोगों के लिए बताये गयें हैं और अगर उसके पास ग़ैरे शिकारी हराम जानवरों के अज्ज़ा से तैयार शुदा लिबास के अलावा दूसरा लिबास न हो और वह उस लिबास को पहनने पर मजबूर न हो तो एहतियाते लाज़िम यह है कि दो दफ़ा नमाज़ पढ़े, एक बार उसी लिबास के साथ और एक बार उस तरीक़े के मुताबिक़ जिसका ज़िक्र बरैहना लोगों की नमाज़ में बयान हो चुका है।
850. अगर किसी मर्द के पास ख़ालिस रेशमी या ज़रदोज़ी लिबास के अलावा दूसरा कोई लिबास न हो और वह उस लिबास को पहनने पर मजबूर न हो तो ज़रूरी है कि उन अहकाम के मुताबिक़ नमाज़ पढ़े जो बरहैना लोगों के लिए बताये गये हैं।
851. अगर किसी के पास ऐसी कोई चीज़ न हो जिससे वह अपनी शर्मगाहों को नमाज़ में ढाँप सके तो वाजिब है कि ऐसी चीज़ किराये पर ले या ख़रीदे। लेकिन अगर इस काम के लिए उसे अपनी हैसियत से ज़्यादा ख़र्च करना पड़ता हो, या सूरत यह हो कि पैसे लिबास पर ख़र्च करने से उसकी हालत ख़राब होती हो, तो उन अहकाम के मुताबिक़ नमाज़ पढ़े जो बरैहना लोगों के लिए बताये गये हैं।
852. जिस इंसान के पास लिबास न हो अगर उसे कोई दूसरा इंसान उसे लिबास बख़्श दे या उधार दे दे, तो अगर लिबास क़बूल करना उस पर गराँ न गुज़रता हो तो ज़रूरी है कि उसे क़बूल करे, बल्कि अगर उधार लेना या बख़्शिश के तौर पर तलब करना उसके लिए तकलीफ़ का बाइस न हो तो ज़रूरी है कि जिसके पास लिबास हो, उससे उधार माँगे या बख़्शिश के तौर पर तलब करे।
853. अगर कोई इंसान ऐसा लिबास पहनना चाहे जिसका कपड़ा, रंग या सिलाई रिवाज के मुताबिक़ न हो, अगर उसका पहनना उसकी शान के ख़िलाफ़ और तौहीन का बाइस हो, तो उसका पहनना हराम है। लेकिन अगर वह उस लिबास के साथ नमाज़ पढ़े और उसके पास शर्मगाह छिपाने के लिए फ़क़त वही लिबास हो तो उसकी नमाज़ सही है।
854. अगर मर्द ज़नाना लिबास पहने और औरत मर्दाना लिबास पहने और उसे अपनी ज़ीनत क़रार दे तो एहतियात की बिना पर उसका पहनना हराम है, लेकिन उस लिबास में नमाज़ पढ़ना हर सूरत में सही है।
855. जिस इंसान को लेटकर नमाज़ पढ़नी चाहिए अगर उसका लिहाफ़ दरिन्दे के अज्ज़ा से बल्कि एहतियात की बिना पर हराम गोश्त जानवर के अज्ज़ा से बना हो या नजिस हो या रेशमी हो और उसे पहनना कहा जा सके, तो उससे भी नमाज़ जाइज़ नही है। लेकिन अगर उसे महज़ अपने ऊपर डाल लिया जाये तो इसमें कोई हरज नही है और इससे नमाज़ बातिल नही होगी। अलबत्ता गद्दे के इस्तेमाल में किसी भी हालत में कोई बुराई नही है इसके अलावा कि उसका कुछ हिस्सा इंसान अपने ऊपर लपेट ले और उसे उर्फ़े आम में पहनना कहा जाये, तो इस सूरत में उसका वही हुक्म है जो लिहाफ़ का है।
वह सूरतें जिन में नमाज़ी का बदन और लिबास पाक होना ज़रूरी नहीं है।
856. तीन सूरतों में, जिनकी तफ़सील नीचे बयान की जा रही है, अगर नमाज़ पढ़ने वाले का बदन या लिबास नजिस भी हो तो उसकी नमाज़ सही है:
1- उसके बदन पर ज़ख़्म, जराहत या फोड़ा होने की वजह से उसके लिबास या बदन पर ख़ून लग जाये।
2- उसके बदन या लिबास पर दिरहम (जिसकी मिक़दार तक़रीबन हाथ के अंगूठे के ऊपर वाले पोरवे के बराबर है) की मिक़दार से कम ख़ून लगा हो।
3- वह नजिस बदन या लिबास के साथ नमाज़ पढ़ने पर मजबूर हो। इसके अलावा एक और सूरत में अगर नमाज़ पढ़ने वाले का लिबास नजिस भी हो तो उसकी नमाज़ सही है और वह सूरत यह है कि उसका छोटा लिबास, मसलन मोज़ा और टोपी नजिस हो।
इन चारो सूरतों के मुफ़स्सल अहकाम आईन्दा मसअलों में बयान किये जायेगें।
857. अगर नमाज़ पढ़ने वाले के बदन या लिबास पर ज़ख्म या जराहत या फोड़े का ख़ून हो तो वह उस ख़ून के साथ उस वक़्त तक नमाज़ पढ़ सकता है जब तक ज़ख्म या जराहत या फोड़ा ठीक न हो जाये, और अगर उसके बदन या लिबास पर ऐसी पीप हो जो ख़ून के साथ निकली हो या ऐसी दवा हो जो ज़ख़्म पर लगाई गयी हो और नजिस हो गयी हो, तो उसके लिए भी यही हुक्म है।
858. अगर नमाज़ पढ़ने वाले के बदन या लिबास पर ऐसी ख़राश या ज़ख़्म का ख़ून लगा हो जो जल्दी ठीक हो जाता हो और जिसका धोना आसान हो तो उसकी नमाज़ बातिल है।
859. अगर बदन या लिबास की ऐसी जगह, जो ज़ख्म से फ़ासिले पर हो, ज़ख़्म की रतूबत से नजिस हो जाये तो उसके साथ नमाज़ पढ़ना जाइज़ नही है। लेकिन अगर लिबास या बदन की वह जगह जो आम तौर पर ज़ख़्म की रुतूबत से गीली हो जाती है, उस ज़ख़्म की रूतूबत से नजिस हो जाये तो उसके साथ नमाज़ पढ़ने में कोई हरज नही है।
860. अगर किसी इंसान के बदन या लिबास पर, उस बवासीर से जिसके मस्से बाहर न हों या उस ज़ख़्म से जो मुँह और नाक वग़ैरह के अन्दर हो, ख़ून लग जाये तो ज़ाहिर यह है कि वह उसके साथ नमाज़ पढ़ सकता है। अलबत्ता जिस बवासीर के मस्से बाहर हों उसके ख़ून के साथ नमाज़ पढ़ना बिला इशकाल जाइज़ है।
861. अगर कोई ऐसा इंसान जिसके बदन पर ज़ख़्म हो अपने बदन या लिबास पर ऐसा ख़ून देखे जो दिरहम से ज़्यादा हो और यह न जानता हो कि यह ख़ून ज़ख़्म का है या कोई और ख़ून है, तो एहतियाते वाजिब यह है कि उस ख़ून के साथ नमाज़ न पढ़े।
862. अगर किसी इंसान के बदन पर चंद ज़ख़्म हों और वह एक दूसरे के इस क़दर नज़दीक हों कि एक ज़ख़्म शुमार होते हों तो जब तक वह ज़ख़्म ठीक न हो जायें, उनके ख़ून के साथ नमाज़ पढ़ने में कोई हरज नही है,लेकिन अगर वह एक दूसरे से इतने दूर हों कि उनमें से हर ज़ख़्म एक अलैहदा ज़ख़्म शुमार होता हो तो जो ज़ख़्म ठीक हो जाये, नमाज़ के लिए अपने बदन और लिबास को उस ज़ख़्म के ख़ून से पाक करे।
863. अगर नमाज़ पढ़ने वाले के बदन या लिबास पर सुईँ की नोक के बराबर भी हैज़ का ख़ून लगा हो तो उसकी नमाज़ बातिल है और एहतियात की बिना पर नजिस जानवर, मुर्दार, हराम गोश्त जानवर और निफास व इस्तेहाज़ा के खून का भी यही हुक्म है। लेकिन अगर किसी दूसरे ख़ून छींटें (मसलन इंसान या हलाल गोश्त जानवर के ख़ून की छींटें) बदन के कई हिस्सों पर लगी हो और वह सब मिला कर एक दिरहम से कम हों तो उसके साथ नमाज़ पढ़ने में कोई हरज नही है।
864. जो ख़ून बग़ैर अस्तर के कपड़े पर गिरे और दूसरी तरफ़ पहुँच जाए, वह एक ख़ून शुमार होता है। लेकिन अगर कपड़े की दूसरी तरफ़ अलग से ख़ून कोई ख़ून लग जाये तो उनमें से हर एक को अलैहदा ख़ून शुमार किया जायेगा। बस वह ख़ून जो कपड़े की दोनों तरफ़ लगा है, अगर कुल मिला कर एक दिरहम से कम हो तो उसके साथ नमाज़ सही है और अगर उससे ज़्यादा हो तो उसके साथ नमाज़ बातिल है।
865. अगर अस्तर वाले कपड़े ख़ून गिरे और उसके अस्तर तक पहुच जाये या अस्तर पर गिरे और कपड़े कर पहुच जाये तो ज़रूरी है कि हर ख़ून को अलग शुमार किया जाये। लेकिन अगर कपड़े का ख़ून और अस्तर का ख़ून इस तरह मिल जाये कि लोगों के नज़दीक एक ख़ून शुमार हो तो अगर कपड़े का ख़ून और अस्तर का ख़ून मिलाकर एक दिरहम से कम हो तो उसके साथ नमाज़ सही है और अगर ज़्यादा हो तो नमाज़ बातिल है।
866. अगर बदन या लिबास पर एक दिरहम से कम ख़ून लगा हो और कोई रतूबत उस ख़ून से मिल जाये और उसके अतराफ़ को गीला कर दे तो उसके साथ नमाज़ बातिल है, चाहे वह ख़ून और जो रतूबत उससे मिली है एक दिरहम के बराबर न हो, लेकिन अगर रतूबत सिर्फ़ ख़ून से मिले और उसके अतराफ़ को गीला न करे तो ज़ाहिर यह है कि उसके साथ नमाज़ पढ़ने में कोई हरज नही है।
867. अगर बदन या लिबास पर ख़ून न हो, लेकिन रतूबत लगने की वजह से ख़ून से नजिस हो जायें, तो अगर नजिस होने वाला हिस्सा एक दिरहम से कम भी हो तो उसके साथ नमाज़ नही पढ़ी जा सकती।
868. अगर बदन या लिबास पर मौजूद ख़ून एक दिरहम से कम हो और उससे कोई दूसरी निजासत आ लगे, मसलन पेशाब का एक क़तरा उस पर गिर जाए और बदन या लिबास से लग जाए तो उसके साथ नमाज़ पढ़ना जाइज़ नही है। बल्कि अगर बदन और लिबास तक न भी पहुँचे तब भी एहतियाते लाज़िम की बिना पर उसमें नमाज़ पढ़ना सही नही है।
869. अगर नमाज़ पढ़ने वाले का कोई ऐसा छोटा लिबास (मसलन टोपी और मोज़ा) जिससे शर्मगाह को न ढाँपा जा सकता हो, नजिस हो जाये और एहतियाते लाज़िम की बिना पर वह नजिस मुर्दार या नजिसुल ऐन जानवर, मसलन कुत्ते के अज्ज़ा से न बना हो, तो उसके साथ नमाज़ सही है। इसी तरह अगर नजिस अंगूठी पहन कर भी नमाज़ पढ़ी जाये तो कोई हरज नही।
870. नमाज़ी का अपने साथ किसी नजिस चीज़, मसलन नजिस रुमाल, चाबी या चाक़ू को रखना जाइज़ है। अगर कोई पूरा नजिस लिबास भी उसके पास हो (जो उसने पहन न रखा हो) तो भी बईद नही कि उसकी नमाज़ को कोई ज़रर पहुँचाए।
871. अगर कोई जानता हो कि जो ख़ून उसके लिबास या बदन पर लगा है, वह एक दिरहम से कम है, लेकिन उसे इस बात का एहतेमाल हो कि यह उस ख़ून में से है, जो मुआफ़ नही है, तो उसके लिए उस ख़ून के साथ नमाज़ पढ़ना जाइज़ है और उसका धोना ज़रूरी नही है।
872. अगर किसी इंसान के लिबास या बदन पर मौजूद ख़ून एक दिरहम से कम हो और उसे यह मालूम न हो कि यह उन ख़ूनों में से है जो मुआफ़ नही है और वह उसी हालत में नमाज़ पढ़ ले और फिर उसे पता चले कि यह उन ख़ूनों में से था, जो मुआफ़ नही है, तो उसके लिए दोबारा नमाज़ पढ़ना ज़रूरी नही है। इसी तरह अगर कोई यह समझे कि ख़ून एक दिरहम से कम है और उसी हालत में नमाज़ पढ़ ले और बाद में पता चले कि उसकी मिक़दार एक दिरहम या उससे ज़्यादा थी तो इस सूरत में भी दोबारा नमाज़ पढ़ना ज़रूरी नही है।
वह चीज़ें जो नमाज़ी के लिबास में मुस्तहब हैं
873. कुछ चीज़ें नमाज़ी के लिबास में मुस्तहब है, जैसे- अम्मामे का तहतुल हनक लटकाना, अबा ओढ़ना, सफ़ेद लिबास पहनना, साफ़ लिबास पहनना, ख़ूशबू लगाना और अक़ीक़ की अंगूठी पहनना।
वह चीज़ें जो नमाज़ी के लिबास में मकरूह हैं
874. कुछ चीज़ें नमाज़ी के लिबास में मकरूह हैं, जैसे- स्याह, मैला और तंग लिबास पहनना, शराबी का लिबास पहनना या उस इंसान का लिबास पहनना जो निजासत से परहेज़ न करता हो और ऐसा लिबास पहनना जिस पर चेहरे की तस्वीर बनी हो। इसके अलावा लिबास के बटनों का ख़ुला होना और ऐसी अंगूठी पहनना भी मकरूह है, जिस पर चेहरे की तस्वीर बनी हो ।

[1] ख़ूने जहिन्दादार जानवर, वह होते हैं, जिनकी रगे काटने पर उनके अन्दर से ख़ून छल कर निकलता है, जैसे भेड़, बकरी, भैंस.....
[2] ग़ैरे ख़ूने जहिन्दादार जानवर, वह होते हैं, जिन्हें काटने पर उनके अन्दर से ख़ून उछल कर नही निकलता है, जैसे मच्छर, मक्ख़ी, साँप, मछली.......

























































































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