कुमार विश्वास का इमाम हुसैन (अ.स) के मातम का मजाक बनाना निंदनीय और माफी ना मुकम्मल |

कुमार विश्वास का इमाम हुसैन (अ.स) के मातम का मजाक बनाना निंदनीय और माफी ना मुकम्मल | आज कल कुमार विशवास की एक विडियो बहुत चर्चा ...

कुमार विश्वास का इमाम हुसैन (अ.स) के मातम का मजाक बनाना निंदनीय और माफी ना मुकम्मल |





आज कल कुमार विशवास की एक विडियो बहुत चर्चा में है जिसमे उसने जुलुस ऐ इमाम हुसैन (अ.स) के मातम करने वालों के उदाहरण से किसी मुशायरे में हंसी का माहौल बनाने की कोशिश की जो निंदनीय है | इमाम हुसैन (अ.स) जैसी शाक्सियत का ग़म मानाने वालों के दिलों को ठेस पहुंचाने का गुनाह कुमार विशवास से हुआ है | कुमार विशवास साहब ने माफ़ी भी अपनी गलती के लिए मांग ली है |


 मैं कुमार विशवास साहब से निवेदन करूँगा मुशायरे में माहौल को खुशगवार अवश्य बनाएं लेकिन लोगों की आस्था और विशवास को नुकसान पहुंचाए बिना | कुमार जी आप इतना तो समझ ही सकते थे की यह अज़ादार किसी का ग़म मना रहे हैं ऐसे में क्या कोई इंसान मज़ाक बना के चुटकुले सुनाता है ? यह तो इंसानियत के भी खिलाफ है ?

आप ना तो हुसैन (अ.स) को जान सके और ना उनका ग़म मनाने वाले अजादारों को ?


हाय  हुसैन हम न हुए कह के इमाम हुसैन (अ.स) के चाहने वाले अपनी मुहब्बत का और इमाम हुसैन (अ.स) के लिए  अपनी जान देने का एलान करते हैं | ऐसी मुहब्बत जो १४०० साल बाद भी शिया  ऐ इमाम हुसैन (अ.स) में देखी जाती है अपने आप में एक मिसाल है | अजादारों की इस मुहब्बत और इस जज्बे को आप क्यूँ नहीं महसूस कर सके ?

कुमार विशवास साहब इमाम हुसैन (अ.स) और सद्दाम हुसैन में बहुत बड़ा फर्क  है | केवल नाम ऐ हुसैन रखने से कोई हुसैनी नहीं हो जाता बल्कि उसका किरदार भी इमाम हुसैन (अ.स) जैसा होना चाहिए | सद्दाम हुसैन एक ज़ालिम बादशाह था जिसने इमाम हुसैन (अ.स) के चाहने वालों पे बहुत ज़ुल्म किया था | उनके मारने पे आप पूछते हैं शियों ने क्या कर लिया ? जनाब शियों के अल्लाह का शुक्र अदा किया कि एक ज़ालिम दुनिया से गया |


मैं कुमार विश्वास साहब का शुक्र गुज़ार भी हूँ की उन्होंने एक अँगरेज़ का जोक सुनाया जिसमे उसने आज के ग़म मनाते हुसैनियों को देख कहा बहुत देर में इनको पता चला | ख़ुशी इसलिए की उस अँगरेज़ को भी ऐसा लगा की ग़म तो ऐसे मना  रहे हैं जैसे आज ही  इमाम हुसैन (अ.स) को शहीद किया गया है |यही हुसैनियों की पहचान है की १४०० साल बाद भी इमाम हुसैन (अ.स) की कुर्बानियों को याद करते हैं और ऐसे ग़म मनाते हैं जैसे की आज का ही वाकया  हो और इंशाल्लाह ज़हूर ऐ इमाम ऐ ज़मान (अ.स) तक ऐसे ही मनाते रहेंगे | आपका यह चुटकुला महारी फतह की निशानी है लेकिन आप के लिए शर्म की बात कि आपने किसी का ग़म मनाने वाले का मज़ाक उड़ाया वो भी कुछ वाह वाही के लिए |


कुमार  विशवास साहब आप क्या जानें इमाम हुसैन (अ.स) पे हुए ज़ुल्मो को और उसके कारणों को ? यदि जानते तो हंसने के लिए इस नाम का इस्तेमाल नहीं करते | नाम ऐ हुसैन लोगों की आँखों में आंसू लाता  है चेहरों पे हंसी लाने के लिए इसका इस्तेमाल न काबिल ऐ माफी है |



आपकी माफ़ी ना  मुकम्मल है क्यूँ की आपको माफी उस हुसैन (अ.स) की माँ जनाब ऐ फातिमा (स.अ) से मांगनी चाहिए जिसके दिल को आपने तकलीफ पहुंचाई है | फिर भी हम माफ़ करते हैं क्यूंकि आपने कहा की आप को अपनी ग़लती का एहसास है और मुसलमान माफ़ करना जानता है केवल इस शर्त पे की आगे से ऐसी ग़लती नहीं हो| उम्मीद है आगे से आप ऐसी गलतियों से बचेंगे |


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