रोज़े का महत्वपूर्ण उद्देश्य आत्म प्रशिक्षण है |

पवित्र माहे रमज़ान का महीना ईश्वर के भक्तों के लिए धैर्य तथा शुभ सूचना का महीना है। माहे रमज़ान ईश्वरीय विभूतियों में डिबो देने वाला महीन...

पवित्र माहे रमज़ान का महीना ईश्वर के भक्तों के लिए धैर्य तथा शुभ सूचना का महीना है। माहे रमज़ान ईश्वरीय विभूतियों में डिबो देने वाला महीना है। हम इस बात की आशा करते हैं कि आप इस पवित्र महीने के प्रत्येक क्षण से लाभ उठा रहे होंगे।

जैसाकि आप जानते हैं कि मनुष्य के लिए भौतिक तथा आध्यात्मिक दृष्टि से रोज़े के बहुत लाभ हैं। रोज़े का महत्वपूर्ण उद्देश्य आत्म प्रशिक्षण है। धार्मिक मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि सबसे अधिक बुरा प्रभुत्व, मानव के असितत्व पर उसकी इच्छाओं का नियंत्रण है। रोज़ा मानव को आंतरिक इच्छाओं के बंधन से मुक्त करवाने में सक्षम है। रोज़े का प्रशिक्षणात्मक कार्यक्रम मनुष्य के लिए यह अवसर उपलब्ध करवाता है कि वह दिन और रात के निर्धारित समय में अपने शरीर तथा आत्मा को अपनी बहुत सी आंतरिक इच्छाओं को नियंत्रित करे। यह समय अनियंत्रित आंतरिक इच्छाओं को नियंत्रित करने का अच्छा अवसर है। रोज़ा मनुष्य की इच्छा शक्ति को मज़बूत करने में सहायक सिद्ध होता है। पैग़म्बरे इस्लाम का कथन है कि माहे रमज़ान का महीना, धैर्य का महीना है और धैर्य का बदला स्वर्ग है।

इस्लामी शक्षाओं में धैर्य को मानवीय विशेषताओं में से एक महत्वपूर्ण विशेषता के रूप में प्रस्तुत किया गया है और धैर्य करने वालों का सम्मान किया गया है। वे लोग जो संसार में ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए धैर्य का सहारा लेते हैं वे मोक्ष प्राप्त करते हैं और स्वर्ग तक पहुंचने के योग्य हो जाते हैं। सूरए रअद की आयत संख्या 24 में आया है कि तुम पर सलाम है। यह तुम्हारे सब्र का बदला है। तो क्या ही अच्छा है "आख़िरत के" घर का परिणाम।

परिपूर्णता के मार्ग पर चलने के लिए आवश्यक है कि मनुष्य की आंतरिक क्षमताएं और योग्यताएं सामने आएं। समस्याओं के सामने आते समय निश्चित रूप से धैर्य, मनुष्य की योग्यताओं और क्षमताओं को उजागर करने का सबसे उचित साधान है। इस आधार पर धैर्य के माध्यम से प्रगति तथा कल्याण के मार्ग को प्रशस्त किया जा सकता है। जैसाकि हमने बताया कि रोज़े का सबसे महत्वपूर्ण लाभ, मनुष्य की इच्छा शक्ति का सुदृढ़ होना और उसकी इच्छाओं को नियंत्रित होना है। आंतिरक इच्छाओं का मुक़ाबला करने में जिन लोगों की प्रतिरोधक क्षमता कम होती है वे उस वृक्ष की भांति हैं जो नहर के किनारे या किसी बाग़ की दीवार के निकट लगा हुआ है। एसे वृक्षों की प्रतिरोधक क्षमता कम होती है। यदि कुछ दिनों तक इनकी सिंचाई न की जाए तो यह मुरझा जाएंगे। इसके विपरीत वे वृक्ष जो जंगलों में उगते हैं उनकी प्रतिरोधक क्षमता भी अधिक होती है। रोज़ा भी मनुष्य की आत्मा के साथ कुछ एसा ही कार्य करता है। यह निर्धारित समय के लिए कुछ प्रतिबंध लगाकर मनुष्य की इच्छा शक्ति को मज़बूत तथा समस्याओं के मुक़ाबले में प्रतिरोध क्षमता को बहुत बढ़ा देता है। क्योंकि रोज़े और धैर्य से मनुष्य की अनियंत्रित इच्छाएं नियंत्रित हो जाती हैं, रोज़ा रखने वाले का मन और उसकी भावनाएं स्वच्छ तथा प्रकाशमई हो जाती हैं।

पैग़म्बरे इस्लाम का कथन है कि जो भी ईश्वर के लिए गर्मी में रोज़ा रखे और उसे बहुत तेज़ प्यास लगे तो ईश्वर हज़ार फ़रिश्तों को नियुक्त करता है कि वे उसके मुख को छुएं और उसको शुभसूचना दें यहां तक कि वह इफ़तार करे। ईश्वर कहता है कि हे फ़रिश्तों, मैं शहादत देता हूं कि मैंने उसको क्षमा कर दिया है।

स्वस्थ लोगों की विशेषताओं में से स्पष्ट विशेषता, समस्याओं के समय उनसे उचित ढ़ंग से निबटना है। वर्तमान समय में संसार में एसे लोग पाए जाते हैं जिनमें व्यक्तिगत तथा समाजिक जीवन जीने के लिए आवश्यक क्षमताएं ओर योग्यताएं पाई जाती हैं। इन लोगों में समन्वय की उचित शक्ति पाई जाती है। सकारात्मक विचारधारा वाले लोगों में यह शक्ति अधिक पाई जाती है। यदि हम धार्मिक शिक्षाओं पर दृष्टि डालें तो इस बात को स्वीकार करेंगें कि यह ईश्वरीय शिक्षाएं मनुष्य को भविष्य के प्रति आशान्वित करते हुए एक सार्थक जीवन की ओर बढ़ाती हैं। धार्मिक शिक्षाओं का मूलतः उददेश्य समाज तथा व्यक्ति को प्रगति के लिए प्रेरित करना तथा कल्याण के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करना है। धार्मिक शिक्षाओं में महत्वपूर्ण तत्व जो मानव के मनोस्वास्थय को बहुत अधिक प्रभावित करता है वह मनुष्य को ईश्वरीय अनुकंपाओं से निराश न होने देना है। क्योंकि ईश्वर की कृपा और उसकी अनुकंपाओं से निराशा मनुष्य की बहुत सी आध्यात्मिक तथा मानसिक समस्याओं की जड़ है। सूरए ज़ोमर की 53वी आयत में आया है कि ईश्वर की कृपा से कदापि निराश न हो।

एक ईरानी मनोचिकित्सक डाक्टर बुर्जअली कहते हैं कि ख़तरों तथा नकारात्म विचारधारा के मुक़ाबले में हमारा समर्थन करने वाला सबसे महत्वपूर्ण तत्व, ईश्वर तथा प्रलय पर भरोसा है। हमको शक्तशाली, शक्तिवर्धक तथा आशा बढ़ाने वाले स्रोतो की तलाश में रहना चाहिए। इसका कारण यह है कि हमारे पास जितनी अधिक आध्यात्मिक शक्ति होगी हम उतने अधिक आशावान होंगे। इस्लामी शिक्षाओं में निराशा की बहुत अधिक भर्तस्ना की गई है। सूरए यूसुफ़ की आयत संख्या 87 में कहा गया है कि ईश्वर की अनुकंपा से निराश न हो, केवल काफ़िर ही ईश्वर की अनुकंपा से निराश होते हैं।

एकेश्वरवादी विचारधारा में आशा एक एसा बहुमूल्य पुरूस्कार है जो जीवन के चक्र को चलाता है। यही आशा, प्रयास और सक्रियता को तेज़ कर देती है। आशा को नाव के नाविक की संज्ञा दी जा सकती है। जिस प्रकार नाव बिना नाविक के उफनती नदी में अनियंत्रित हो जाएगी। मनुष्य भी आशा के बिना इस संसार में परेशान हो जाएगा। आशा जीवन में इस शर्त के साथ बहुत से सार्थक परिवर्तनों का कारण है कि मनुष्य काल्पनिक विचारों के मायाजाल में न फंस जाए। जीवन में आशा तथा सकारात्मक विचारधारा, मनुष्य में सकारात्मक विचारों का कारण बनती है। सकारात्मक विचारधारा भी उत्साहवर्धन करती है।

धार्मिक विचारधारा जीवन की कठिनाइयों के संबन्ध में मनुष्य के दृष्टिकोण को पूर्ण रूप से परिवर्तित कर देती है। हममें से अधिकांश लोग सामानयतः जीवन में आने वाली कठिनाइयों का स्वागत नहीं करते और उनका मुक़ाबला करते हुए डरते हैं। हालांकि वास्तविकता यह है कि कठिनाइयां उतनी असहनीय नहीं हैं जितनी हम सोचते हैं। कभी-कभी एसा भी होता है कि जीवन की यह कठिनाइयां और समस्याएं मानव के भीतर छिपी हुई योग्यताओं और क्षमताओं के विकसित होने का कारण बनती हैं। कहा जाता है कि सकारात्मक विचारधारा रखने वाले लोग कठिनाइयों का डट कर मुक़ाबला करते हैं। इसके विपरीत निराशावादी विचारधारा वाले लोग अवसरों से लाभ नहीं उठा पाते और उन्हें अपने हाथों से गंवा देते हैं। कठिनाइयों के बिना कोई भी आराम प्राप्त नहीं कर सकता। वे लोग जो कठिनाइयों और समस्याओं को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करते हैं और उनके सामने असमर्थता दर्शाते हैं एसे लोग अधिक्त निराशा का शिकार होते हैं। हालांकि मनुष्य का जीवन कुछ इस प्रकार है जिसमें समस्याएं और आसानियां दोनों साथ-साथ हैं। सख़तियों के बाद आसानियां भी आती हैं।
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  1. 1- रोजे के दौरान सिर्फ भूखे-प्यासे ही न रहें बल्कि आंख, कान और जीभ का भी गलत इस्तेमाल न करें यानी न बुरा देखें, न बुरा सुनें और न ही बुरा कहें।

    - हर मुसलमान के लिए जरुरी है कि वह रोजे के दौरान सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त के बीच के समय में खान-पान न करे। यहां तक कि कुछ गलत सोचे भी नहीं।

    - रोजे की सबसे अहम परंपराओं में सेहरी बहुत लोकप्रिय है। सेहरी शब्द सेहर से बना है जिसका शाब्दिक अर्थ है सुबह। जिसका नियम है कि सूर्य के उदय होने से पहले उठकर रोजेदार सेहरी खाते हैं। इसमें वह खाने और पीने योग्य पदार्थ लेते हैं। सेहरी करने के बाद सूर्य अस्त होने तक खान-पान छोड़ दिया जाता है। इसके साथ-साथ मानसिक आचरण भी शुद्ध रखते हुए पांच बार की नमाज और कुरान पढ़ी जाती है। सूर्यास्त के समय इफ्तार की परंपरा है।

    - इस्लाम धर्म में बताए नियमों के अनुसार पांच बातें करने पर रोजा टूट जाता है- पहला झूठ बोलना, दूसरा बदनामी करना, तीसरा किसी के पीछे बुराई करना,चौथा झूठी कसम खाना और पांचवां लालच करना।

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  2. उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवार के चर्चा मंच पर ।।

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  3. जानकारी से भरी पोस्ट आभार

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  4. रोजे रखने के उद्देश्य बताता एक अच्छा लेख !

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