नहजुल बलाग़ा ख़ुत्बा 95-97

ख़ुत्बा-95 अगर अल्लाह ने ज़ालिम (अत्याचारी) को मोहलत दे रखी है तो उस की गिरफ़्त (पकड़) सो तो वह हरगिज़ नहीं निकल सकता। और वह उस की गुज़रगाह ...

ख़ुत्बा-95

अगर अल्लाह ने ज़ालिम (अत्याचारी) को मोहलत दे रखी है तो उस की गिरफ़्त (पकड़) सो तो वह हरगिज़ नहीं निकल सकता। और वह उस की गुज़रगाह और गले में हड्डी फंसने की जगह मौक़े का मुन्तज़िर (प्रतिक्षक) है। उस ज़ात की क़सम ! जिसके क़बज़ए क़ुदरत में मेरी जान है, यह क़ौम (शाम वाले) तुम पर ग़ालिब आ कर रहेगी, इस लिये नहीं कि इन का हक़ (अधिकार) तुम पर फ़ाइक़ (प्रमुख) है बल्कि इस लिये कि वह अपने साथी (मुआविया) की तरफ़ बातिल पर होने के बावजूद तेज़ी से लपकते हैं, और तुम मेरे हक़ पर होने के बावजूद सुस्ती करते हो। रईयतें अपने हुक्मरानों (प्रजा अपने शासकों) के ज़ुल्मों और (अत्यचार व ज़ियादती) से डरा करती थीं और मैं अपनी रईयत (प्रजा) से डरता हूं। मैं ने तुम्हें जिहाद के लिये उभारा, लेकिन तुम अपने घरों से न निकले। मैं ने तुम्हें कारआमद बातों को सुनाना चाहा मगर तुम ने एक न सुनी। मैंने पोशीदा (गुप्त रुप से) भी और अलानिया (प्रत्यक्ष रुप से) भी तुम्हें जिहाद के लिये पुकारा और ललकारा, लेकिन तुम ने एक न मानी। और समझाया बुझाया, मगर तुम ने मेरी नसीहतें (उपदेशों को) क़बूल न कीं। क्या तुम मौजूद रहते हुए भी ग़ायब (अनुपस्थित) रहते हो। हल्क़ा बगोश (अनुयायी) होते हुए गोया (जैसे) ख़ुद मालिक (स्वयं स्वामी) हो। मैं तुम्हारे सामने हिकमत और दानाई (बुद्धि और विवेक) की बातें बयान करता हूं और तुम उन से भड़कते हो। तुम्हें बलन्द पाया नसीहतें (उच्चकोटि के उपदेश) करता हूं और तुम परागन्दा ख़ातिर (तितर बितर) हो जाते हो। मैं उन बाग़ियों (विद्रोहियों) से जिहाद करने के लिये तुम्हें आमादा करता हूं, तो अभी मेरी बात ख़त्म भी नहीं होती कि मैं देखता हूं कि तुम औलादे  “सबा” की तरह तितर बितर हो गए। अपनी नशिस्तगाहों (निवास स्थानों) की तरफ़ वापस चले जाते हो और इन नसीहतों (उपदेशों) से ग़ाफ़िल (उचेत) हो कर दूसरे के चकमे में आ जाते हो। सुब्ह को मैं तुम्हें सीधा करता हूं और शाम को जब आते हो तो (वैसे के वैसे) कमान की पुश्त की तरह टेढ़े। सीधा करने वाला आजिज़ आ गया, और जिसे सीधा किया जा रहा है वह ला इलाज साबित हुआ। ऐ वह लोगो !  जिन के जिस्म तो हाज़िर हैं और अक़्लें ग़ायब और ख़्वाहिशें (इच्छायें) जुदा जुदा हैं। इन पर हुकूमत (शासन) करने वाले आज़माइश (परीक्षण) में पड़े हुए हैं। तुम्हारा हाकिम (शासक) अल्लाह की इताअत करता है, मगर वह उस की इताअत (आज्ञापालन) करते हैं। ख़ुदा की क़सम ! मैं यह चाहता हूं कि मआविया तुम में से दस मुझ से ले ले और बदले में अपना एक आदमी मुझे दे दे, जिस तरह दीनार का तबादला दिरहमों से होता है। ऐ अहले कूफ़ा ! मैं तुम्हारी तीन और उन के अलावा दो बातों में मुब्तला (ग्रस्त) हूं, पहले तो यह कि तुम कान रखते हुए बहरे हो, और बोलने चालने के बावजूद गूंगे हो, और आंखे होते हुए अंधे हो। और फिर यह कि न तुम जंग के मौक़े पर सच्चे जवां मर्द हो, और न क़ाबिले एतिमाद (विश्वस्त) भाई हो। ऐ सभी ऊंटो की चाल चलने वालो ! कि जिनके चर्वाहे गुम हो चुके हों और उन्हें एक तरफ़ से घेर कर लाया जाता है तो दूसरी तरफ़ से बिखर जाते हैं। ख़ुदा की क़सम ! जैसा कि मेरा तुम्हारे बारे में ख़याल है गोया यह मंज़र (दृश्य) मेरे सामने है कि अगर जंग शिद्दत इख़तियार कर ले और मैदाने कारज़ार गर्म हो जाए तो तुम इब्ने अबी तालिब से ऐसे शर्मनाक तरीक़े पर अलायहदा (पृथक) हो जैसे औरत बिलकुल बरहना (नंगी) हो जाए। मैं अपने पर्वरदिगार की तरफ़ से रौशन दलील और अपने नबी (स.) के तरीक़े और शाहराहे हक़ पर हूं। जिसे मैं बातिल के रास्तों में से ढूंढ ढूंढ कर पाता रहता हूं। अपने नबी (स.) के अहले बैत को देखो ! उन की सीरत (आचरण) पर चलो, और उन के नक़्शे क़दम (पद्चिन्हों) की पैरवी (अनुसरण) करो। वह तुम्हें हिदायत (अनुदेश) से बाहर नहीं होने देंगे। और न गुमराही व हलाकत (मृत्यु) की तरफ़ पलटायेंगे। अगर वह कहीं ठहरें तो तुम भी ठहर जाओ, और अगर वह उठें तो तुम भी उठ खड़े हो। उन से आगे न बढ़ जाओ, वर्ना गुमराह हो जाओगे। और न उन्हें छोड़ कर पीछे रह जाओ, वर्ना तबाह हो जाओगे। मैं ने मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम के ख़ास ख़ास असहाब (साथी, मित्र) देखे हैं। मुझे तो तुम में से एक भी ऐसा नज़र नहीं आता जो उन के मिस्ल (समान) हो। वह इस आलम (दशा) में सुब्ह किया करते थे कि उन के बाल बिखरे हुए और चेहरे ख़ाक़ (धूल) से अटे होते थे। जब कि रात को वह सुजूद और क़ियाम में काट चुके होते थे, इस आलम में कि कभी पेशानियां सज्दे में रखते थे और कभी रुख़सार, और हशर (प्रलय) की याद से इस तरह बेचैन रहते थे कि जैसे अंगारों पर ठहरे हुए हों, और लम्बे सज्दों की वजह से उन की आंखों के दरमियान (मध्य) पेशानियों पर बकरों के घुटनों ऐसे घट्टे पड़े हुए थे। जब भी उन के सामने अल्लाह का ज़िक्र आ जाता था तो उन की आंखें बरस पड़ती थीं, यहां तक कि उन के गरेबानों को भिगो देती थीं। वह इस तरह कांपते रहते थे जिस तरह तेज़ झक्कड़ वाले दिन दरख़्त थर्थराते हैं, सज़ा के ख़ौफ़ (दण्ड के भय) और सवाब (पुण्य) की उम्मीद में।

पैग़मबर (स.) के बाद जो फ़ज़ा (वातावरण) पैदा कर दी गई थी उस में अहले बैत के लिये गोशा नशीनी के अलावा कोई चारा न था। जिस की वजह से दुनिया उन के असली खदो खाल (रंग रुप) से बेगाना (अनभिज्ञ) और उन के उलूम व कमालात (ज्ञान भण्डार एवं चमत्कारों) से ना आश्ना (अपरिचित) हो कर रह गई और उन्हें नज़रों से गिराना, और इक़तिदार (सत्ता) से अलग रखना ही इसलाम की सब से बड़ी ख़िदमत (सेवा) तसव्वर (कल्पित) कर लिया गया। अगर हज़रत उसमान की ख़ल्लम खुल्ला बदउनवानियां (अनियमिततायें) मुसलमानों को कर्वट लेने और आंख खोलने का मौक़ा न देतीं, तो उन के बाद भी अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) की बैअत का कोई सवाल पैदा न होता था। बल्कि इक़तिदार (सत्ता) जिस रुख़ (दिशा) पर बढ़ रहा था उसी रुख पर बढ़ता रहता। लेकिन जिन लोगों का इस सिलसिले में नाम लिया जा सकता था वह अपने दामने बन्दो क़बा को देख कर आगे बढ़ने की जुरअत न करते थे। और मुआविया मर्कज़ (केन्द्र) से दूर अपनी राजधानी में बैठा हुआ था। इन हालात (परिस्थितियों) में अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) के सिवा कोई ऐसा न था जिस की तरफ़ नज़रें उठतीं। चुनांचे निगाहें आप के गिर्द तवाफ़ (परिक्रमा) करने लगीं और वही अवाम जो सैलाब के बहाव और हवा का रुख देख कर दूसरों की बैअत करते रहे थे, आप के हाथों पर बैअत के लिये टूट पड़े। लेकिन यह बैअत इस हैसियत से न थी कि वह आप की ख़िलाफ़त को मिनजानिब अल्लाह (अल्लाह की तरफ़ से) और आप को इमामे मुफ़तरिज़ुत्ताअत (इमाम जिस की आज्ञाओं का पालन अनिवार्य हो) समझ रहे हों बल्कि उन्हीं के क़रार दाद : उसूल के मातहत (उन्हीं द्वारा पारित नियमों के अन्तर्गत) थी जिसे जमहूरी व शुराई क़िस्म (प्रजातांत्रिक एवं मतसंग्रह पद्धति) के नामों से याद किया जाता था। अलबत्ता एक गुरोह ऐसा था जो आप की ख़िलाफ़त को नस्सी (क़ुरआन द्वारा प्रमाणित) समझते हुए दीनी फ़रीज़े (धार्मिक कर्त्तव्य) की हैसियत से बैअत कर रहा था। वर्ना अकसरीयत (बहुसंख्यक) तो आप को दूसरे ख़ुलफ़ा की तरह से एक फरमां रवा (शासक) और बलिहाज़े फ़ज़ीलत (विद्वता के आधार पर) चौथे दरजे पर या ख़ुलफ़ाए सलासा (तीन ख़ुलफ़ा) के बाद आम (साधारण) सहाबा की सत्ह पर समझती थी, और चूंकि रईयत (प्रजा) फौज (सेना) और उहदेदार (पदाधिकारी) साबिक़ा हुक्मरानों (भूतपूर्व शासकों) के अक़ायद व अअमाल (विश्वास एवं कर्मों) से मुतअस्सिर (प्रभावित) और उन के रंग में रंग हुए थे, इस लिये जब कोई बात अपनी मन्शा (इच्छा) के ख़िलाफ़ (विरुद्ध) पाते तो बिगड़ते, उलझते, जंग (युद्ध) से जी चुराते, और सरकशी व नाफ़रमानी (अवज्ञा एवं विद्रोह) पर उतर आते थे। और फ़िर भी जिस तरह पैग़मबर (स.) के साथ शरिके जिहाद होने वाले कुछ दिनिया के तलबगार थे और कुछ आखिरत के उसी तरह यहां भी दुनिया परस्तों की कमी न थी। जो बज़ाहिर (प्रत्यक्ष में) अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) से मिले हुए थे और दर पर्दा मुआविया से साज़ बाज़ (षडयंत्र) रखते थे, जिस ने उन में से किसी के मन्सब (पद) का वअदा कर रखा था, और किसी की दौलत का लालच दे रखा था।

इन लोगों की शीअयाने अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) क़रार दे कर शीईयत को मौरिदे इलज़ाम (आरोपों का पात्र) ठहराना हक़ायक़ से चश्मपोशी करना (वास्तविकता से आख़ं चुराना) है। जब कि उन लोगों का मसलक (मत) वही हो सकता है जो अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) को चौथे दरजे पर समझने वालों का होना चाहिये। चुनांचे इब्ने अबिल हदीद उन लोगों के मसलक व मज़हब पर वाशिग़ाफ़ लफ़्ज़ों (मत एवं धर्म पर स्पष्ट शब्दों) मैं रौशनी (प्रकाश) डालते हैं :---

“जो शख़्स (व्यक्ति) अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) के ज़मानए ख़िलाफ़त के वाक़िआत (कार्यकाल की घटनाओं) को गहरी नज़र से देखेगा, वह वह इस बात को जान लेगा कि अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) मजबूर और बेबस (विवश) बना दिये गए थे। क्योंकि आप की हक़ीक़त मंज़िले (वास्तविक प्रतिष्ठा) के पहचानने वाले बहुत कम थे और सवादे अअज़म आप के बारे में वह एतिक़ाद (श्रद्धा) न रखता था जो एतिक़ाद (श्रद्धा) आप के मुतअल्लिक़ रखना वाजिब (अनिवार्य) व ज़रूरी (आवश्यक) था। वह पहले खुलफ़ा को आप पर फ़ज़ीलत (प्रधानता) देते थे। और यह खयाल करते थे कि फ़ज़ीलत का मेयार (प्रतिष्ठा का मापदण्ड) खिलाफ़त है, और इस मसअले (प्रकरण) में बाद वाले अगलों की तक़लीद व पैरवी (अनुसरण) करते थे और यह कहते थे कि अगर पहले लोगों को यह इल्म (ज्ञान) न होता कि पहले खुल्फ़ा आप पर फ़ज़ीलत (प्रधानता) रखते थे, तो वह आप पर उन्हें मुक़द्दम (प्रमुख) न करते। और यह लोग तो आप को एक ताबे (अधीन) और उन की रईयत (प्रजा) की हैसियत से जानते पहचानते थे। और जो लोग आप के साथ शरीक होकर जंग (युद्ध) करते थे उन में से अकसर (अधिकांश) हमीयत और अरबी असबीयत (मर्यादा एवं अरबी कटुता) के पेशे नज़र (दृष्टिगत) शरीके जंग होते थे, न दीन और अक़ीदा (धर्म और विशवास की आधार पर) की बिना पर।

सबा इब्ने यशजुब इब्ने यअरुब इब्ने क़हतान की औलाद क़बीलए सबा के नाम से मौसूम (संज्ञित) है। जब इन लोगों ने अंबिया को झुटलाना शुरुऊ किया तो क़ुदरत ने उन्हें झिंझोड़ने के लिये उन पर पानी का सैलाब मुसल्लत कर दिया। जिस से उन के बाग़ात तहे आब हो गए, और वह खुद घर बार छोड़ कर मुखतलिफ़ (विभिन्न) शहरों में बिखर गए। इस वाक़िए (घटना) से यह मसल चल निकली और जहां कहीं लोग इस तरह जुदा (अलग) हो जायें कि फिर मुजतमअ (एकत्र) होने की तवक़्क़ो (आशा) न रहे तो यह मसल इस्तेमाल (प्रयोग) की जाती है।

                                     ख़ुत्बा-96

खुदा की क़सम ! वह हमेशा यूंही ज़ुल्म ढ़ाते रहेंगे, और कोई अल्लाह की हराम की हुई चीज़ ऐसी न होगी, जिसे वह हलाल न समझ लेंगे, और एक भी अह्दो पैमान (प्रतिज्ञा व प्रण) ऐसा न होगा जिसे वह तोड़ न डालेंगे। यहां तक कि कोई ईंट पत्थर का घर और ऊन का खेमा उन के ज़ुल्म की ज़द से महफ़ूज़ न रहेगा और उन की बुरी तरज़ें निगहदाश्त (संरक्षण विधि) से लोगों का घरोंमें रहना मुश्किल हो जायेगा, और यहां तक कि दो क़िस्म (प्रकार) के रोने वाले खड़े हो जायेंगे, एक दीन (धर्म) के लिये रोने वाला और एक दुनिया के लिये। और यहां तक कि तुम में से किसी एक का उनमें से किसी एक से दाद ख्वाही करना ऐसा ही होगा जैसे ग़ुलाम का अपने आक़ा से कि वह सामने इताअत (आज्ञा पालन) करता है और पीछे बुराई करता और दिल की भड़ास निकालता है। और यहां तक नौबत पहुच जायेगी कि तुममें से जो अल्लाह का ज़ियादा एतिक़ाद (विश्वास) रखेगा उत्ना ही वह ज़हमत व मुशक़्क़त (कष्ट एवं परिश्रम) में बढ़ा चढ़ा होगा। इस सूरत में अगर अल्लाह तुम्हें अम्न व आफ़ीयत में रखे, तो उस का शुक्र करते हुए उसे क़बूल करो। और अगर इब्तिला व आज़माइश (विपत्ति व परीक्षण) मे डाले जाओ तो सब्र (संतोष) करो इस लिये कि अच्छा अंजाम (परिणाम) परहेज़गारों के लिये है।

                                    खुत्बा-97

जो हो चुका उस पर हम अल्लाह की हम्द (प्रशंसा) करते हैं और जो होगा उस के मुक़ाबिले में उस से मदद चाहते हैं। जिस तरह उस से जिस्मों की सेहत (शरीरों के स्वास्थ्य) का सवाल (याचना) करते हैं, उसी तरह दीन व ईमान की सलामती के तलबगार हैं।

ऐ अल्लाह के बन्दों! मैं तुम्हें इस दुनिया के छोड़ने की वसीयत करता हूं जो तुम्हें छोड़ देने वाली है हालांकि तुम उसे छोड़ना पसन्द नहीं करते, और वह तुम्हारे जिस्मों (शरीरों) को कोहना व बोसीदा (पुराना व जीर्णशीर्ण) बनाने वाली है। हालांकि तुम उसे तरो ताज़ा रखने ही की कोशिश करते हो। तुम्हारी और इस दुनिया की मिसाल ऐसी है जैसे चन्द मुसाफिर किसी राह पर चलें और चलते ही मंज़िल तय कर लें और किसी बलन्द निशान (उच्च चिन्ह) का क़स्द करें और फ़ौरन (तत्काल) वहां तक पहुंच जायें। कितना ही थोड़ा वक़्फ़ा (अन्तराल) है, उस घोड़ा दौड़ाने वाले का, कि जो उसे दौड़ा कर इन्तिहा की मंज़िल तक पहुंच जाए और उस शख्स (व्यक्ति) की बक़ा (स्थिरता) ही क्या है जिस के लिये एक ऐसा दिन हो कि जिस से वह आगे नहीं बढ़ सकता। और दुनिया में एक तेज़ गाम तलब करने वाला (तीव्र गति मांगने वाला) उसे हंका रहा हो। यहां तक कि वह इस दुनिया को छोड़ जाए। दुनिया की इज़्ज़त और इस में फ़ख़रो सरबलन्दी (गर्व एवं प्रतिष्ठा) की ख्वाहिश (इच्छा) न करो, और न उस की आराइशों और नेमतों (सजावटों एवं वर्दानों) पर खुश हो, और न उस की सख्तियों और तंगियों (कठिनाइयों और कष्टों) पर बेसब्री (असंतोष एवं गर्व) दोनों मिट जाने वाले हैं, और इस की आराइशें व नेमतें ज़ायल (नष्ट) हो जाने वाली हैं और इस की सख्तियां और तंगियां आखिर खत्म हो जायेंगी। इस की हर मुद्दत का नतीजा इख्तिताम (अन्त) और हर ज़िन्दा (जीवित) का अन्जाम फना होना (परीणाम विनाश) है। क्या पहलों के लोगों के वाक़िआत (घटनाओं) में तुम्हारे लिये काफ़ी तंबीह (पर्यापत चेतावनी) का सामान नहीं ? और क्या तुम्हारे गुज़रे हुए आबा व अजदाद (मृतक पूर्वजों) के हालात (जीवनियों) में तुम्हारे लिये इबरत और बसीरत (शिक्षा और नेत्र प्रकाश) नहीं ?  अगर तुम सोचो समझो। क्या तुम गुज़रे हुए लोगों को नहीं देखते कि वह पलट कर नहीं आते और उन के बाद बाक़ी रहने वाले भी ज़िन्दा (जीवित) नहीं रहते। तुम दुनिया वालों पर नज़र नहीं करते कि जो मुख्तलिफ़ हालतों (विभिन्न परिस्थितियों) में सुब्ह व शाम करते हैं। कहीं कोई मैयित (शव) है जिस पर रोया जा रहा है, और कहीं किसी को ताज़ियत दी जा रही है। कोई आजिज़ व ज़मीनगीर (निस्सहाय व धाराशायी) मुब्तलाये मरज़ (रोग ग्रस्त) है, और कहीं कोई अयादत (उपचार) करने वाला अयादत कर रहा है। कहीं कोई दम तोड़ रहा है। कोई दुनिया तलाश करता फिरता है और मौत उसे तलाश कर रही है। और कोई ग़फ़लत (अचेत अवस्था) में पड़ा है लेकिन मौत उस से ग़ाफिल नहीं है। गुज़र जाने वालों के नक़्शे क़दम (पद चिन्हों) पर ही बाक़ी रह जाने वाले चल रहे हैं।

मैं तुम्हें मुतनब्बेह (सचेत) करता हूं कि बद अअमालियों (दुराचरण) के इरतेकाब (करने) के वक्त ज़रा मौत को भी याद कर लिया करो कि जो तमाम लज़्ज़तों (स्वादों) को मिटा देने वाली और तमाम नफसानी मज़ों (काम सम्बंधी आनन्द) को किरकिरा कर देने वाली है। अल्लाह के वाजिबुल अदा हुक़ूक़ अदा करने और उस की अनगिनत नेमतों और ला तअदाद एह्सानों का शुक्र बजा लाने के लिये उस से मदद मांगते रहो।

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