नहजुल बलाग़ा ख़ुत्बा 72-78

ख़ुत्बा-72 [ जब लोगों ने उसमान की बैअत का इरादा किया तो आप ने फ़रमाया।] तुम जानते हो कि मुझे औरों से ज़ियादा ख़िलाफ़त का हक़ पहुंचता है। ख़ु...

ख़ुत्बा-72

[ जब लोगों ने उसमान की बैअत का इरादा किया तो आप ने फ़रमाया।]

तुम जानते हो कि मुझे औरों से ज़ियादा ख़िलाफ़त का हक़ पहुंचता है। ख़ुदा की क़सम! जब तक मुसलमानों के उमूर का नज़्मों नसक़ (शान्ति एंव व्यवस्था) बरक़रार (स्थापित) रहेगा और सिर्फ़ मेरी ही ज़ात (व्यक्तित्व) ज़ुल्मों जौर (अत्याचारों) का निशाना (लक्ष्य) बनती रहेगी मैं ख़ामोशी (मौन) इख़्तियार (धारण) करता रहूंगा ताकि इस सब्र (धैर्य) पर अल्लाह से अज्रो सवाब (पुण्य व पुरस्कार) तलब करूं और इस ज़ेबो ज़ीनत (साज सज्जा) और आराइश (सजावट) ठुकरा दूं जिस पर तुम मिटे हुए हो।

ख़ुत्बा-73

[ जब आप को मअलूम हुआ कि बनी उमैया क़त्ले उसमान में शिर्कत का इलज़ाम (आरोप) आप पर रखते हैं, तो फ़रमाया ]

मेरे बारे में सब कुछ जानने बूझने के बावजूद बनी उमैया मुझ पर इफ़ितरा पर्दाज़ियों (मिथ्यारोपण) से बाज़ नहीं आए। और न मेंरी सब्क़ते ईमानी (ईमान लाने में पहल) और देरीना इसलामी ख़िदमात (पुरानी इसलामी सेवाओं) ने उन जाहिलों को इत्तिहाम (लांछन) लगाने से रोका और जो अल्लाह ने (मिथ्यारोपण के सम्बंध में) उन्हें पन्दो नसीहत (पाठ व उपदेश) की है वह मेरे बयान से कहीं बलीग़ है। मैं (इन) बे दीनों पर हुज्जत लाने वाला और (दीन में) शक व शुब्हा (आशंका) करने वालों का फ़रीक़े मुख़ालिफ़ (प्रतिद्वंद्वी) हूं और क़ुरआन पर पेश होना चाहिये तमाम मुशतबह (सन्देहात्मक) बातों को और बन्दों को जैसी उन की नीयत होगी वैसा ही फल मिलेगा।

ख़ुत्बा-74

ख़ुदा उस शख्स (व्यक्ति) पर रहम (करुणा) करे, जिसने हिक्मत (बुद्धि, बोध) का कोई कलिमा (वचन) सुना तो उसे गिरह (गांठ) में बांध लिया। हिदायत की तरफ़ (अनुदेश की ओर) उसे बुलाया गया तो दौड़ कर क़रीब हुआ। सहीह राहबर (सच्चे मार्ग दर्शक) का दामन थाम कर नजात (मुक्ती) पाई। अल्लाह को हर वक्तत नज़रों (दृष्टि) में रखा, और गुनाहों (पापों) से ख़ौफ़ (भय) खाया। अमले बे रिया (नि :स्वार्थ कर्म) पेश किया। नेक काम (शुभ कार्य) किये। सवाब का ज़ख़ीरा (पुण्य का भंडार) जमअ किया। बुरी बातों से इज्तिनाब (दूरी) बर्ता। सहीह मक़सद (मूल उद्देश्य) को पा लिया। अपना अज्र (उपहार) समेट लिया। ख़्वाहिशों (इच्छाओं) का मुक़ाबिला किया। उम्मीदों (आकांक्षाओं) को झुटलाया। सब्र (संतोष) को नजात (मुक्ती) की सवारी बना लिया। मौत (मृत्यु, अन्तकाल) के लिये तक़वा (पर्हेज़गारी) का साज़ो सामान किया। रौशन राह (प्रकाशमान मार्ग) पर क़दम जमाए। ज़िन्दगी की मोहलत को ग़नीमत जाना, मौत (मृत्यु) की तरफ़ क़दम बढ़ाए और अमल (कर्म) का ज़ाद (यात्रा का खाना) साथ लिया।

ख़ुत्बा-75

बनी उमैया मुझे मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम का विर्सा (उत्तराधिकारी) थोड़ा थोड़ा कर के देते हैं। ख़ुदा की क़सम ! अगर मैं ज़िन्दा रहा, तो उन्हें इस तरह झाड़ फेकूंगा जिस तरह क़साई ख़ाक़ आलूदा (मिट्टी में लुथड़े) गोश्त (मांस) के टुकडड़े से मिट्टी झाड़ देता है।

ख़ुत्बा-76

ऐ अल्लाह ! तू उन चीज़ों को बख्श दे (क्षमा कर दे) जिन्हें तू मुझ से ज़ियादा (अधिक) जानता है। अगर मैं गुनाह की तरफ़ (पाप की ओर) पलटूं, तो तू अपनी मग़फ़िरत (मुक्ति) के साथ पलट। बारे इलाहा ! जिस अमले ख़ैर (शुभ कार्य) के बजा लेने (करने) का मैं ने अपने आप से वअदा किया था, मगर तू ने उसे पूरा होते न पाया, उसे भी बख़्श दे (क्षमा कर दे)। मेरे अल्लाह ! (हे ईशवर) ज़बान (मुख) से निकले हुए वह कलिमे (वचन) जिन से (जिन के द्वारा) तेरा तक़र्रुब (समीप) चाहा था, मगर दिन उन से हमनवा (समर्थक) न हो सका, उन से भी दर गुज़र कर (उन्हें भी क्षमा कर)। पर्वरदिगार ! (पालने वाले) तू आंखों के तंज़िया (कटाक्ष पूर्ण) इशारों (संकेतों) और नाशाइस्ता कलिमों (अभद्र शब्दों) और दिल की बुरी ख़्वाहिशों (इच्छाओं) और ज़बान की हिर्ज़ा सराइयों (मिथ्या भाषियों) में मुआफ़ (क्षमा) कर दे।

[ जब आप ने जंगे ख़वारिज के लिये निकलने का इरादा किया, तो एक शख़्स (व्यक्ति) ने कहा कि या अमीरुल मोमिनीन ! अगर आप इस वक्त निकले तो इल्मे नुजूम (ज्योतिष बिद्या) की रु से मुझे अन्देशा है कि आप अपने मक़सद में कामयाब व कामरान नहीं हो सकेंगे, जिस पर आप ने फ़रमाया। ]

क्या तुम्हारा ख़याल (विचार) है कि तुम उस घड़ी का पता देते हो कि अगर कोई उस में निकले तो उस के लिये कोई बुराई न होगी, और उस लम्हे (क्षण) से ख़बरदार (सतर्क) करते हो, कि अगर उस में कोई निकले तो उसे नुक़सान दरपेश होगा। तो जिस ने इसे सहीह समझा उस ने क़ुरआन को झुटलाया और मक़सद के पाने और मुसीबत (संकट) के दूर करने में अल्लाह की मदद से बे नियाज़ (लापर्वा) हो गया। तुम अपनी इन बातों से यह चाहते हो कि जो तुम्हारे कहे पर अमल (कर्म) करे वह अल्लाह को छोड़ कर तुम्हारे गुन गाए। इस लिये कि तुम ने अपने ख़याल (विचार) में उस साअत (साइत) का पता दिया कि जो उस के लिये फ़ायदे का सबब (कारण) और नुक्सान (हानि) से बचाव का ज़रीआ (साधन) बनी।

[ फिर आप लोगों की तरफ़ मुतवज्जह हुए (ध्यान दिया) और फ़रमाया ]

ऐ लोगों ! नुजूम (ज्योतिष) सीखने से पर्हेज़ करो, मगर इतना कि जिस से खुश्की और तरी में रास्ते मालूम कर सको। इस लिये कि नुजूम सीखना कहानत और ग़ैब गोई (भविष्य वाणी एंव परोक्षवाणी) की तरफ़ ले जाता है और मुनज्जिम (ज्योतिष) हुक्म में मिस्ले काहिन (भविष्य बताने वाला) के है और काहिन मिस्ले साहिर (सादूगर के समान) के है और साहिर (जादूगर) मिस्ले काफ़िर के है और काफ़िर का ठिकाना जहन्नम (नर्क) है। बस अल्लाह का नाम ले कर चल खड़े हो।

जब अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) ने ख़्वारिज की शोरिशों (विद्रोहों) को दबाने के लिये नह्रवान का इरादा किया, तो अफ़ीफ़ इब्ने क़ैस ने आप से अर्ज़ (निवेदान) किया कि यह साअत अच्छी नहीं है। अगर आप इस वक्त रवाना हुए तो फ़त्हो जफ़रमन्दी (विजय व सफ़लता) के बजाय शिकस्त व हज़ीम (पराजय एंव दुर्दशा) उठाना पड़ेगी। मगर हज़रत ने इस बात को दर खुरे एतिना (ध्यान देने योग्य) न समझा और उसी वक्त लश्कर को कूच का हुक्म दे दिया और नतिजे में ख़्वारिज को ऐसी शिकस्ते फ़ाश (बुरी पराजय) हुई कि उन के चार हज़ार जंगजूओं (सूरमाओं) मेंसे सिर्फ़ नौ आदमी भाग कर अपनी जान बचा सके। और बाक़ी (शेष) का सफ़ाया हो गया।

अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) ने नुजूम (ज्योतिष) के ग़लत व ना दुरुस्त होने पर तीन तरह से इसतिदलाल (तर्क) फ़रमाया है। पहले यह कि अगर मुनज्जिम की बातों कों दुरुस्त (सहीह) मान लिया जाय तो क़ुरआन को झुटलाना पड़ेगा। क्योंकि मुनज्जिम सितारों को देख कर ग़ैब (परोक्ष) में छिपी हुई चीज़ों के जानने का इद्दिआ (दअवा) करता है। और क़ुरआन यह कहता है कि :--

“आस्मान व ज़मीन (पृथ्वी व आकाश) में बसने वालों में कोई भी ग़ैब नहीं जानता सिवा अल्लाह के। ”

दूसरे यह कि वह अपने ज़अमे नाक़िस में (ना समझी मेे) यह समझ लेता है कि वह मुस्तक़बिल (भविष्य) के हालात से मुत्तला (सूचित) हो कर अपने नफ़अ व नुक़्सान (लाभ व हानि) को जान सकता है, तो वह अल्लाह कि तरफ़ रुजूउ (आकृष्ट) होने और उस मदद चाहने में अपने को बेनियाज़ (बेपर्वाई) और उस के मुक़ाबिले में खुद एतिमादी (अंह भाव) एक तरह का ज़िन्दिक़ा व इल्हाद (नास्तिकता एंव धर्म से फिर जाना) है। जो अल्लाह से उस के तवक्कोआत ख़त्म (अपेक्षायें समाप्त) कर देता है। तीसरे यह कि अगर वह किसी मक़सद (उद्देश्य) में कामयाब (सफल) होगा तो उस कामयाबी (सफ़लता) को अपने इल्म (ज्ञान) का नतीजा क़रार देगा, जिस से वह अल्लाह के बजाय खुद अपने नफ्स (आत्मा) को सराहेगा, और इस सिलसिले में जिन की राहनुमाई (मार्ग दर्शन) करेगा उन से भी यही चाहेगा कि वह अल्लाह का शुक्र गुज़ार होने के बजाय उस के शुक्र गुज़ार हों। यह तमाम चीज़ें फ़ने नुजूम (ज्योतिष कला) में इस हद तक मुदाखलत (हस्तक्षेप) से नहीं रोकतीं, जिस हद तक नुजूम (ज्योतिष) की तासीर (प्रभाव) को मिन जानिबल्लाह (अल्लाह की ओर से) दवाओं के तबई असर के क़ाबिल (प्राकृतिक प्रभाव के प्रकार) से माना जाय। जिस में क़ुद्रते इलाही फिर भी मवाने (अवरोध) पैदा कर के सद्देराह (रास्ते की दीवार) हो सकती है। हमारे अकसर (अधिकांश) उलमाये इसलाम जो नुजूम (ज्योतिष) में महारत (दक्षता) हासिल किये हुए थे, वह इसी बिना पर सहीह है कि वह उस के नताइज (फलों) को क़तई (अन्तिम) न समझते थे।

ख़ुत्बा-78

[ जंगे जमल (जमल की लड़ाई) से फ़ारिग़ (निवृत्त) होने के बाद औरतों की मज़म्मत (महिलाओं की निन्दा) में फ़रमाया ]

ऐ लोगों ! औरतें (स्त्रियां) ईमान में नाक़िस (अपूर्ण) हिस्सों (भागीदारी) में नाक़िस और अक़्ल में नाक़िस (अपरिपक्क मत) होती हैं। नक्से ईमान का सुबूत (ईमान में अपूर्ण होने रा प्रमाण) यह है कि अय्याम के दौर (मासिक धर्म की अवरिध) में नमाज़ और रोज़ा उन्हें छोड़ना पड़ता है, और नाक़िसुल अक़्ल (अपरिपक्क मत) होने का सुबूत (प्रमाण) यह है कि दो औरतों की गवाही (साक्ष्य) एक मर्द की गवाही के बरारबर होती है। और हिस्सा और नसीब (भाग एंव भाग्य) में कमी यूं (इस प्रकार) है कि मीरास (विरासत) में उन का हिस्सा मर्दों से आधा होता है। बुरी औरतों से डरो, और अच्छी औरतों से भी चौकिन्ना (सतर्क) रहा करो। तुम उन की अच्छी बातें भी न मानों ताकि आगे बढ़ कर वह बुरी बातों के मनवाने पर न उतर आयें।

यह खुत्बा जमल की लड़ाई की विनाश कारियों के बाद इर्शाद फ़रमाया और चुंकि इस युद्ध की विनाशकारियां एक औरत (महिला) के आदेश पर आंख बन्द कर के चल पड़ने का परिणाम थीं इस लिये इस में उन के प्राकृतिक अपरिपक्कता और उन के कारणों एंव साधनों की चर्चा की गई है। अतएव उन की पहली कमज़ोरी यह है कि उन्हें प्रत्येक महीने में कुछ दिनों के लिये नमाज़ व रोज़ा से पृथक होना पड़ता है और यह कर्म से पृथकता उन के ईमान के अपूर्ण होने का प्रमाण है। यद्यपि ईमान के सही अर्थ हार्दिक पुष्टि एंव आन्तरिक विश्वास के हैं, मगर प्रत्यक्ष रूप में कर्म एंव आचरण पर भी इस का क्रियान्वयन होता है। चूंकि कर्म ईमान का दर्पण होते हैं इस लिये कर्मों को भी ईमान का अंश बनाया गया है। चुनांचे इमाम अली इब्ने मूसा (अ.स.) से रिवायत है कि :--

“ईमान ह्रदय से पुष्टि, ज़बान से स्वीकृति तथा अंगों से कर्म करने का नाम है।”

दूसरी कमज़ोरी यह है कि उन की प्राकृतिक क्षमता बुद्धि की क्रियाओं को पूर्ण रुप से स्वीकार करने में असमर्थ होती है। अस्तु उन के कर्म क्षेत्र की विशालता ही के अनुसार प्रकृति ने उन को ज्ञानेन्द्रियां दी हैं जो गर्भ स्त्राव, दूध पिलाने, पालन पोषण और गृह कार्यों में उन का मार्ग दर्शन कर सकें और इसी मान्सिक एंव बौद्धिक कमज़ोरियों के कारण उन के साक्ष्य को पुरुष से साक्ष्य के समकक्ष नहीं रखा गया। जैसा कि अल्लाह सुब्हानहू ने क़ुरआन में कहा है :--

“अपने मर्दों (पुरुषों) में से जिन्हें तुम गवाही (साक्ष्य) के लिये पसन्द करो दो मर्दों (पुरुषों) की गवाही लिया करो और अगर दो मर्द न हों तो एक मर्द और दो औरतें (महिलायें) हों। अगर एक भूल जायेगी तो उन में से एक दूसरे को याद दिलायेगी।”

तीसरी कमज़ोरी यह है कि उन की मीरास (दाय) का हिस्सा मर्द के हिस्सए मीरास से निस्फ़ (आधा) होता है। जैसा कि क़ुरआन में है :--

“ख़ुदा तुम्हारी औलाद के बारे में तुम्हें वसीयत करता है कि लड़के का हिस्सा दो लड़कियों के बराबर होगा।”

इस से औरत की कमज़ोरी का पता यूं चलता है कि मीरास में उस का हिस्सा आधा होने की वजह यह है कि उस की कफ़ालत (भारण पोषण) का बार मर्द पर होता है। तो जब मर्द की हैसियत (स्थिति) एक कफ़ील व निगरां (पोषक व संरक्षक) की क़रार पाई तो निगरानी व सर परस्ती की मोहताज सिन्फ़ अपनी कमज़ोरी की खुद आईनादार होगी।

उन की फ़ितरी (प्राकृतिक) कमज़ोरीयों की तरफ़ इशारा करने के बाद उन की अन्धाधुन्द पैरवी और ग़लत इताअत (आज्ञा पालन) के मफ़ासिद (दोषों) का ज़िक्र करते हैं कि बुरी बात तो खैर बुरी बात होती ही है अगर वह किसी अच्छी बात के लिये भी कहें तो उसे इस प्रकार नहीं करना चाहिये कि उन्हें यह ख़याल होने लगे कि यह उन की खातिर और उन की खुशनूदी हासिल करने के लिये की गई। बल्कि इस तरह की वह यह समझ लें कि इस अच्छे काम को उस के अच्छा होने के कारण किया गया है। इस में उन की इच्छा व रज़ामन्दी को कोई दखल नहीं है।और अगर उन को यह वहम (भ्रम) भी हो गया कि इस में उन की खुशी का खयाल रखा गया है तो वह हाथ पकड़ते हुए पहुंचा पकड़ने पर उतर आयेंगी और यह चाहने लगेंगी कि उन की हर बुरी से बुरी बात के आगे सर झुकाया जाय। जिस का स्वाभाविक परिणाम यह होगा कि सर्वनाश हो जायेगा। अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) के इस कथन के सम्बंध में अल्लामा मोहम्मद अब्दोहू लिखते हैं कि :-

“अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) ने एक ऐसी बात कर दी है जिस की पुष्टि लम्बी शताब्दियों के अनुभव करते हैं ”

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