नहजुल बलाग़ा ख़ुत्बा 66-71

ख़ुत्बा-66 [ मोहम्मद इब्ने अबी बक्र को जब हज़रत ने मिस्र की हुकूमत सिपुर्द की और नतीजे में उन के खिलाफ़ ग़लबा हासिल (आधिपत्य प्राप्त) कर लि...

ख़ुत्बा-66

[ मोहम्मद इब्ने अबी बक्र को जब हज़रत ने मिस्र की हुकूमत सिपुर्द की और नतीजे में उन के खिलाफ़ ग़लबा हासिल (आधिपत्य प्राप्त) कर लिया गया और वह क़त्ल कर दिये गए तो हज़रत ने फ़रमाया ]

मैं ने तो चाहा था कि हाशिम इब्ने अत्बा को मिस्र का वाली (शासक) बनाऊँ और अगर उसे हाकिम बना दिया होता, तो वह कभी दुशमनों के लिये मैदान ख़ाली न करता, और न उन्हें मोहलत देता। इस से मोहम्मद इब्ने अबी बक्र की मज़म्मत (निन्दा) मक़्सूद (अभिप्राय) नहीं वह तो मुझे बहुत महबूब (प्रिय) और मेरा पर्वरदा (पालक) था।

मोहम्मद इब्ने अबी बक्र की वालिदए गिरामी (माता जी) अस्मा बिन्ते उमैस थीं। जिन से अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) ने हज़रत अबू बक्र के इन्तिक़ाल (देहावसान) के बाद अक़्द (विवाह) कर लिया था। चुनांचे मोहम्मद ने आप ही के ज़ेरे साया (संरक्षण में) तअलीम व तरबियत (शिक्षा व दीक्षा) हासिल (प्राप्त) की और आप ही के तौर तरीक़ों (रंग ढंग) को अपनाया। अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) भी उन्हें बहुत चाहते थे और बमंज़िलह अपने फ़र्ज़न्द के (पुत्र समान) समझते थे। और कहा करते थे मोहम्मद मेरा बैटा है अगरचे अबू बक्र के सुल्ब से है। सफ़रे हिज्जतुल विदाअ (अन्तिम हज यात्र) में पैदा हुए और सन 38 हिजरी में 28 वर्ष की उम्र में शहादत पाई।

अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) ने मस्न्दे ख़िलाफ़त पर आने के बाद क़ैस इब्ने इबादह को मिस्र का हुक्मरान मुन्तखब (शासक चयनित) किया था। मगर कुछ हालात (परिस्थितियां) ऐसे पैदा हो गए कि उन्हें मअज़ूल (पदच्यूत) कर के मोहम्मद इब्ने अबी बक्र को वहां का वाली (शासक) मुक़र्रर (नियुत्त) करना पड़ा। क़ैस इब्ने सअद की रविश (चलन) यहां पर यह थी कि वह उसमानी गुरोह के खिलाफ़ मुतशद्दिदाना (दमनात्मक) क़दम उठाना मसालेह के खिलाफ़ (नीति के विरुद्ध) समझते थे। मगर मोहम्मद का रवैया इस से मुख्तलिफ़ (भित्र) था। उन्होंने एक महीना गुज़रने के बाद उन्हें कहलवा भेजा कि अगर तुम हमारी इताअत (आज्ञापालन) न करोगे तो तुम्हारा यहां रहना मुश्किल (कठिन) हो जायेगा। इस पर उन लोगों ने इन के खिलाफ़ एक महाज़ (मोर्चा) बना लिया और चुपके चुपके रेशादवानियां (षडयंत्र) करते रहे। मगर तहकीम की क़रार दाद (प्रस्ताव) के बाद पुर्ज़े निकाले और इन्तिक़ाम (प्रतिशोध) का नारा लगा कर शर व फ़साद (आतंक एंव विद्रोह) फैलाने लगे और मिस्र की फ़ज़ा (वातावरण) को मुकद्दर (दूषित) कर के रख दिया। अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) को जब इन बिगड़े हुए हालात का इल्म (ज्ञान) हुआ तो आप ने मालिक इब्ने हारिसे अशतर को मिस्र की इमारत (अमीरी) दे कर उधर रवाना किया ताकि वह मुख़ालिफ़ अनासिर (विद्रोही तत्वों) को दबाकर नज़्मो नसक़ (क़ानून एंव व्यवस्था) को बिगड़ने न दें। मगर उमवी कारिन्दों की दसीसा कारियों (शरारतपूर्ण कार्यवाहियों) से न बच सके और रास्ते ही में शहीद कर दिए गए और मिस्र की हुकूमत मोहम्मद ही के हाथों में रही।

उधर तहकीम के सिलसिले में अमर इब्ने आस की कार कर्दगी ने मुआविया को अपना वादा याद दिलाया। चुनांचे उस ने छ : हज़ार जंग आज़मा (युद्ध अनुभवी) उस के सिपुर्द कर के मिस्र पर धावा बोलने के लिए उसे रवाना किया। मोहम्मद इब्ने अबी बक्र ने जब दुश्मन की बढ़ती हुई यलग़ार को देखा, तो अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) को कुमक के लिये लिखा। हज़रत ने जवाब दिया कि तुम अपने आदमियों को जमअ करो मैं मज़ीद (अग्रेतर) कुमक तुम्हारे लिये रवाना करना चाहता हूं। चुनांचे मोहम्मद ने चार हज़ार आदमियों को अपने पर्चम (झण्डे) के नीचे जमअ किया और उन्हें दो हिस्सों पर तक़सीम कर दिया। एक हिस्सा अपने पास रखा और एक हिस्से का सिपह सालार बशर इब्ने किनाना को बना कर दुश्मन की रोक थाम के लिये आगे भेज दिया। जब यह फ़ौज दुश्मन के सामने पड़ाव डाल कर उतर पड़ी, तो उन की मुख्तलिफ़ (विभिन्न) टोलियों ने इन पर छापे मारने शुरु कर दिये जिन्हें यह अपनी जुरअत व हिम्मत से रोकते रहे। आखिर मुआविया इब्ने खदीजे किन्दी ने पूरी फ़ौज के साथ हमला कर दिया। मगर इन सर फ़रोशोंने तलवारों से मुंह न मोड़ा और दुश्मन का डट कर मुक़ाबिला करते हुए शहीद हो गए। इस शिकस्त का असर (पराजय का प्रभाव) यह हुआ कि मोहम्मद इब्ने अबी बक्र के साथी हिरासां (निराश) हो गए और उन का साथ छोड़ कर चलते बने। मोहम्मद ने जब अपने को अकेला पाया तो भाग कर एक खराबे (खण्डहर) में पनाह ली। मगर दुश्मनों को एक शख्स के ज़रीए उन का पता मिल गया। और उन्हों ने इस हालत में इन्हें आ लिया कि यह प्यास से क़रीब ब हलाकत पहुंच चुके थे। मोहम्म्द ने पानी की ख़्वाहिश (इच्छा) की तो उन संगदिलों ने पानी देने से इन्कार कर दिया, और उसी तशनगी (प्यास) के आलम में उन्हें शहीद कर दिया और उन की लाश को एक मुर्दा गधे के पेट में रख कर जला दिया।

कूफ़े से मालिक इब्ने कअबे अर्हबी दो हज़ार आदमियों को ले कर निकल चुके थे, मगर उन के पहुंचने से पहले ही दुश्मन मिस्र पर क़ब्ज़ा कर चुका था।

[ अपने अस्हाब (साथियों) की मज़म्मत (निन्दा) में फ़रमाया ]

कब तक मैं तुम्हारे साथ ऐसी नर्मी और रू रिआयत करता रहूंगा, जैसी उन ऊँटों से की जाती है जिन की कोहानें अन्दर से खोखली हो चुकी हों, और उन फटे पुराने कपड़ों की तरह कि जिन्हें एक तरफ़ से सिया जाए तो दूसरी तरफ़ से फट जाते हैं। जब भी शामियों के हरावल दस्तों में से कोई दस्ता तुम पर मंडलाता है तो तुम सब के सब (अपने घरों के) दरवाज़े बन्द कर लेते हो और इस तरह अन्दर दबक जाते हो जिस तरह गोह अपने सूराख़ में और बिज्जू अपने भट में। जिस के तुम्हारे जेसे मददगार (सहायक) हों, उसे तो ज़लील (अपमानित) ही होना है, और जिस पर तुम (तीर के समान) फेंके जाओ तो गोया उस पर ऐसा तीर फेंका गया जिस पर सूफ़ार (तीर की चुटकी) भी शिकस्ता (टूटा) और पैकान (भाल) भी टूटा हुआ है। खुदा की क़सम ! (घरों के) सहन में तो तुम बड़ी तअदाद (संख्या) में नज़र आते हो, लेकिन झन्डों के नीचे थोड़े से। मैं अच्छी तरह जानता हूं कि किस चीज़ से तुम्हारी इस्लाह (सुधार) और किस चीज़ से तुम्हारी कज रवी (टेढ़ी चाल) को दूर किया जा सकता है। लेकिन मैं अपने नफ्स (आत्मा) को बिगाड़ कर तुम्हारी इस्लाह (सुधार) करना नहीं चाहता। ख़ुदा तुम्हारे चेहरों को बे आबरु करे, और तुम्हें बद नसीब (दुर्भाग्यशाली) करे। जैसी तुम बातिल (अधर्म) से शनासाई (पहचान) रखते हो, वैसी हक़ (धर्म) से तुम्हारी जान पहचान नही, और जितना हक़ को मिटाते हो, बातिल उतना तुम से नहीं दबाया जाता।

ख़ुत्बा-68

[ ये फ़िक़रे (वाक्य) आपने शबे ज़र्बत (आधात की रात) की सहर (सुब्ह) को इर्शाद फ़रमाये ]

मैं बैठा हुआ था, कि मेरी आंख लग गई। इतने में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम मेरे सामने जलवा फ़र्मा (प्रकट) हुए। मैं ने कहा या रसूलल्लाह ! मुझे आप की उम्मत के हाथों कैसी कज रवीयां और दुश्मनीयों से दो चार होना पड़ा है। तो रसूलुल्लाह ने फ़रमाया कि तुम उन के लिये बद दुआ करो तो मैं ने (सिर्फ़ इतना) कहा, कि अल्लाह मुझे उन के बदले में उन से अच्छे लोग अता (प्रदान) करें, और उनको मेरे बदले में कोई बुरा अमीर (शासक) दे।

ख़ुत्बा-69

[ अहले इराक़ (इराक़ वालों) की मज़म्मत (निन्दा) में फ़रमाया ]

ऐ अहले इराक़ ! तुम उस हामिया औरत के मानिन्द (गर्भवती के समान) हो जो हामिला (गर्भवती) होने के बाद जब हम्ल (गर्भ) के दिन पूरे करे तो मरा हुआ बच्चा गिरा दे। और उस का शौहर (पति) भी मर चुका हो और (क़रीबी न होने की वजह से) दूर के अज़ीज़ (सम्बंधी) उस के वारिस (उत्तराधिकारी) हों। बख़ुदा मैं तुम्हारी तरफ़ बख़ुशी (सहर्ष) नहीं आया, बल्कि मजबूर (विवश) हो कर आ गया। मुझे यह ख़बर पहंची है कि तुम कहते हो कि अली (अ.स.) किड़्ब बयानी करते हैं (झूट बोलते हैं)। ख़ुदा तुम्हें हलाक (आहत) करे। (बताओ) मैं किस पर झूट बांध सकता हूं ? क्या अल्लाह पर ? तो मैं सब से पहले उस पर ईमान लाने वाला हूं। या उस के नबी (स.) पर ? तो मैं सब से पहले उन की तस्दीक़ (पुष्टि) करने वाला हूं। ख़ुदा की क़सम ! ऐसा हरगिज़ (कदापि) नहीं। बल्कि वह एक ऐसा कलाम था जो तुम्हारे समझने का न था। और न तुम में उस के समझने की अहलीयत थी। ख़ुदा तुम्हें समझे ! मैं तो बग़ैर किसी एवज़ (प्रतिफल) के इल्मी जवाहिर रेज़े नाप नाप कर दे रहा हूं। काश की उन के लिये किसी ज़र्फ़ (पात्र) में समाई होती। (ठहरो) कुछ देर बाद तुम भी उस की हक़ीक़त (यथार्थ) को जान लोगे।

तहकीम के बाद जब इराक़ियों ने मुआविये के ताबड़ तोड़ हमलों का जवाब देने में सुस्ती व बद दिली का मुज़ाहरा (प्रदर्शन) किया, तो उन की मज़म्मत व तौबीख (निन्दा व भर्त्सना) के सिलसिले में यह ख़ुत्बा इर्शाद फ़रमाया जिस में सिफ्फ़ीन के मौक़े पर उन की फ़रेब ख़ुर्दगी (धोका खाने) और जंग से दस्तबरदारी की तरफ़ इशारा है। और उन की हालत को उस औरत से तशबीह (उपमा) दी है जिस में यह पांच वस्फ़ (गुण) हों—वह हामिला (गर्भवती) हो, इस से मुराद (अभिप्राय) यह है कि यह लोग लड़ने भिड़ने की पूरी पूरी सलाहीयत व इस्तेदाद (योग्यता एंव सामर्थ्य) रखते थे, उस बांझ औरत के मानिन्द (समान) न थे कि जिस से कोई उम्मीद नहीं रखी जा सकती। मुद्दते हम्ल (गर्भ की अवधि) पूरी कर चुकी हो। यअनी कठिन और दुशवार गुज़ार मंज़िलों को तय कर के फ़त्हो कामरानी (विजय एंव सफलता) के क़रीब पहुंच चुके थे। अज़ खुद (स्वयं ही) हम्ल को साक़ित (गर्भ की अवधि) कर दिया हो, यअनी फ़त्ह (विजय) के क़रीब पहुंच कर सुल्ब (संधि) पर उतर आए और दामने मुराद भरने के बजाय नामुरादियों (असफलताओं) को समेट लिया। उस के रंडापे की मुद्दत (अवधि) दराज़ (लम्बी) हो यअनी उन की हालत ऐसी हो गई हो जैसे उन का कोई सर परस्त (संरक्षक) व निगरां (निरीक्षक) न हो और वह बेवाली व वारिस भटक रहे हों। बेगाने उस के वारिस हों यअनी अहले शाम उनके इमलाक (सम्पत्ति) पर क़ब्ज़ा व तसल्लुत (आधिपत्य) जमा रहे हैं कि जो उन से कोई लगाव नहीं रखते।

ख़ुत्बा-70

[ इसमें आप ने पैग़म्ब (स.) पर सलवात (दुरूद) भेजने का तरीक़ा (ढंग) बताया है।]

ऐ अल्लाह ! ऐ फ़र्शे ज़मीन के बिछाने वाले, और ऐ आस्मानों को (बिना सहारे के) रोकने वाले, अपनी पाकीज़ा रहमतें (पवित्र दया) और बढ़ने वाली बर्कतें (वृद्धियां) क़रार दे अपने अब्द (बन्दे) और रसूल मोहम्मद (स.) के लिये जो पहली (नुबुव्वतों के) ख़त्म करने वाले और बन्द (दिलों के) खोलने वाले और हक़ (धर्म) के ज़ोर से एलाने हक़ (धर्म की घोषणा) करने वाले, बातिल की तुग़यानियों (अधर्म के तूफ़ानों) को दबाने वाले, और ज़लालत (अंधकार व जिहालत) के हमलों को कुचलने वाले थे। जैसा उन पर ज़िम्मेदारी (उत्तरदायित्व) को बोझ आइद (डाला) किया गया था उस को उन्हों ने उठाया और तेरी ख़ुशनूदियों (प्रसन्नता) की तरफ़ बढ़ने के लिये मज़बूती(दृढ़ता) से जम कर खड़े हो गए। न आगे बढ़ने से मुंह मोड़ा, न इरादे में कमज़ोरी को राह दी। वह तेरी वह्इ के हाफ़िज़ और तेरे पैमान (प्रण) के मुहाफ़िज़ (संरक्षक) थे और तेरे हुक्मों (आदेशों) के फैलाने की धुन में लगे रहने वाले थे। यहां तक कि उन्होंने रौशनी (प्रकाश) ढूंढने वाले के लिये शोले भड़का दिये और अंधेरे में भटकने वाले के लिये रास्ता रौशन (प्रकाशमान) कर दिया। फ़ित्नों फ़सादों (विद्रोहों एंव आतंकों) में सरगर्मियों (सक्रियता) के बाद दिलों ने आप की वजह (कारण) से हिदायत (अनुदेश) पाई। उन्हों ने राह दिखाने वाले निशानात (चिन्ह) क़ाइम किये (स्थापित किये), रौशन व ताबिन्दा (प्रकाशमान एंव उज्जवल) अह्काम (आदेश) जारी (निर्गत) किये। वह तेरे अमीन, मोअतमद (विश्वस्त) और तेरे इल्मे मख्फ़ी (गुप्त ज्ञान) के ख़ज़ीनादार (कोषाधिकारी) थे और क़ियामत (प्रलय) के दिन तेरे गवाह (साक्षी) और तेरे पैग़म्बरे बर हक़ (सच्चे दूत) और ख़ल्क़ की तरफ़ फ़रिस्तादा (भेजे गए) रसूल (स.) थे। ख़ुदाया ! उन की मंज़िल को अपने ज़ेरे साया (अपनी छत्रछाया में) वसीइ व कुशादा (विस्तृत एंव विशाल) बना और अपने फ़ज़्ल (दया) से दोह्रे हसनात (नेकियां) अता (प्रदान) कर। ख़ुदावन्दा ! तमाम बुनियाद क़ायम (आधार स्थापित) करने वालों की इमारत (भवन) पर उन की बिना कर्दा (उनके द्वारा स्थापित) इमारत (भवन) को फ़ौक़ीयत (वरीयता) अता (प्रदान) कर और उन्हें बाइज़्ज़त मर्तबे (सम्मानपूर्ण श्रेणी) से सरफ़राज़ (शोभायमान) कर। और उन के नूर (प्रकाश) को पूरा पूरा फ़रोग़ (प्रगति) दे, और उन्हें रिसालत के सिले (पुरस्कार) में शहादत की क़बूलीयत (साक्ष्य को मान्यता) व पज़ीराई (स्वीकृति) और क़ौल व सुख़्न (कथन व वचन) की पसन्दीदगी (रोचकता) अता कर, जब कि आप की बातें सरापा अद्ल (पूर्ण न्याय) और फैसले (निर्णय) हक़ व बातिल (धर्म व अधर्म) को छांटने वाले हैं। ऐ अल्लाह ! हमें भी उन के साथ ख़ुश गवार व पाकीज़ा ज़िन्दगी (सुखद व पवित्र जीवन) और मंज़िले नेमात में यकजा (वर्दानों की श्रेणी में एकत्र) कर और मर्ग़ूब व दिलपसन्द ख़्वाहिशों और लज़्ज़तों (रुचिकर व मनोवांछित इच्छाओं एंव स्वादों) और आसाइश व फ़ारिग़ुलबाली (सुख समृद्धि) और शरफ़ व करामत के तोह्फ़ों (प्रतिष्ठा एंव चमत्कार के उपहारों) में शरीक (सम्मिलित) बना।

ख़ुत्बा-71

[ जमल के मौक़े (अवसर) पर जब मर्वान बिन हकम गिरफ्तार किया गया तो उस ने इमामे हसन (अ.स.) व इमामे हुसैन (अ.स.) से ख़्वाहिश की कि वह अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) से उस की सिफ़ारिश (संस्तुति) करें। चुनांचे उन दोनों हज़रात ने अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) से उस के बारे में बातचीत की, और हज़रत ने उसे रिहा कर दिया। फिर दोनों शहज़ादों ने कहा कि या अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) ! यह आप की बैअत करना चाहता है। तो हज़रत ने उस के मुतअल्लिक़ फ़रमाया। ]

क्या इस ने उस्मान के क़त्ल होने जाने के बाद मेरी बैअत नहीं की थी ? अब मुझे इस की बैअत की ज़रुरत नहीं है। यह यहूदी क़िस्म का हाथ है। अगर इस हाथ से बैअत करेगा, तो ज़लील तरीक़े (अभद्र ढंघ) से तोड़ भी देगा। तुम्हें मअलूम होना चाहिये कि यह भी, उतनी देर कि कुत्ता अपनी नाक चाटने से फ़ारिग़ (निवृत्त) हो, हुकूमत (शासन) करेगा, और के चार बेटे भी हुक्मरां (शासक) होंगे, और उम्मत इस के और इस के बेटों (पुत्रों) के हाथों से सख़्तियों के दिन देखेगी।

मर्वान इब्ने हकम हज़रत उसमान का भतीजा और दामाद था। और इकहरा जिस्म और लम्बा क़द होने की वजह से खैते बातिल (अधर्म का डोरा) के लक़ब (उपाधि) से याद किया जाता था। चुनांचे अब्दुल मलिक इब्ने मर्वान ने जब अमर इब्ने सईदे अशदक़ को क़त्ल कर दिया तो उस के भाभ यह्या इब्ने सईद ने कहा :--

“ ऐ ख़ैते बातिल की औलाद ! तुम ने अमर से ग़द्दारी की और तुम्हारे ऐसे लोग ग़द्दारी की ही बुनियादों पर अपने इक़तिदार (सत्ता) की इमारतें (भवन) खड़ी किया करते हैं।”

इस का बाप हकम गो (यद्दापि) फ़त्हे मक्का के मौक़े पर इस्लाम लाया था। मगर उस के तौर तरीक़े (रंग ढंग) ऐसे थे कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.) के लिये इन्तिहाई अज़ीयत का बाइस (अत्यन्त दुखदायी) होते थे। चुनांचे पैग़म्बर (स.) ने उस पर और उस की औलाद पर लअनत की और फ़रमाया “ इसकी औलाद के हाथों मेरी उम्मत तबाही का दिन देखेगी।” (असदुल ग़ाबह) आख़िर पैग़म्बर (स.) ने उस की बढ़ती हुई साज़िशों (षडयंत्रों) के पेशे नज़र (दृष्टिगत) उसे वादिये वज (तायफ़ में एक स्थान) की तरफ़ निकलवा दिया और मर्वान भी उस के साथ चलता बना। और फिर पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने ज़िन्दगी भर इन दोनों को मदीने न आने दिया। हज़रत अबू बक्र और हज़रत उमर ने भी ऐसा ही किया। लेकिन हज़रत उसमान ने अपने अह्द में उन दोनों को वापस बुलवा लिया और मर्वान को तो इस उरूज (उन्नति) पर पहुंचाया कि गोया (जैसे) ख़िलाफ़त की बागडोर उसी के हाथ में है। और फिर उस के हालात ऐसे साज़गार (अनुकूल) हुए कि मुआविया इब्ने यज़ीद के मरने के बाद खलीफ़तुल मुसलिमीन बन गया। लेकिन अबी नौ महीने अट्ठारह दिन ही हुकूमत करते हुए गुज़रे थे कि 3 रम्ज़ान 65 हिजरी में 63 वर्ष की उम्र में क़ज़ा (मौत) ने इस तरह आ घेरा कि उस की बीवी उस के मुंह पर तकिया रख कर बैठ गई और उस वक्त तक अलग न हुई जब तक उस ने दम न तोड़ दिया।

उसके जिन चार बेटों की तरफ़ अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) ने इशारा किया है वह अब्दुल मलिक इब्ने मर्वान के चार बेटे :- वलीद, सुलैमान, यज़ीद और हिशाम हैं कि जो अब्दुल मलिक के बाद यके बाद दिगरे (एक के बाद एक) तख्ते ख़िलाफ़त पर बैठे और अपनी खंचकां (रक्तयुक्त) दास्तानों (कहानियों) से सफ़हाते तारीख (इतिहास के पन्ने) रंगीन कर गए और बअज़ (कुछ) शरेहीन (व्याख्ता कर्ताओं) ने खुद उस के सुल्बी बेटे मुराद (ताप्पर्य) लिये हैं। जिन के नाम हैं :- अब्दुल मलिक, अब्दुल अज़ीज़, बशर और मोहम्मद। इन में से अब्दुल मलिक तो खलीफ़ा हो गया और अब्दुल अज़ीज़ मिस्र का, बशर इराक़ का और मोहम्मद जज़ीरे का वाली क़रार पाया

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