नहजुल बलाग़ा ख़ुत्बा 60-61-62-63-64

ख़ुत्बा-60 [ जब आप को अचानक (अकस्मात) क़त्ल (बध) किये जाने का ख़ौफ़ (भय) दिलाया गया, तो आप ने फ़रमाया ] मुझ पर अल्लाह की एक मोहकम सिपर (दृढ़...

ख़ुत्बा-60

[ जब आप को अचानक (अकस्मात) क़त्ल (बध) किये जाने का ख़ौफ़ (भय) दिलाया गया, तो आप ने फ़रमाया ]

मुझ पर अल्लाह की एक मोहकम सिपर (दृढ़ ढाल) है। जब मौत का दिन आयेगा, तो वह मुझे मौत (मृत्यु) के हवाले कर के मुझ से अगर हो जायेगी। उस वक्त न तीर ख़ता करेगा (चूकेगा) न ज़ख़्म (घाव) भर सकेगा।

ख़ुत्बा-61

तुम्हें मअलूम होना चाहिये कि दुनिया ऐसा घर है जिस के अवाक़िब (यातनाओं) से बचाव का साज़ो सामान इसी में रह कर किया जा सकता है। और किसी ऐसे काम से जो सिर्फ़ इसी दुनिया के ख़ातिर किया जाए, नजात (मुक्ती) नहीं मिल सकती. लोग इस दुनिया में आज़माइश (परीक्षण) में डाले गए हैं। लोगों ने इस दुनिया से जो दुनिया के लिये हासिल (प्राप्त) किया होगा, उस से अलग कर दिये जायेंगे और उस पर उन से हिसाब लिया जायेगा। और जो इस दुनिया से आख़िरत (परलोक) के लिये कमाया होगा, उसे आगे पहुंच कर पा लेंगे और उसी में रहें सहेंगे। दुनिया अक़्लमन्दों (बुद्धिमानों) के नज़दीक़ (की नज़र में) एक बढ़ता हुआ साया है। जिसे अभी बढ़ा हुआ और फैला हुआ देख रहे थे कि देखते ही देखते वह घट कर और सिमट कर रह गया।

ख़ुत्बा-62

अल्लाह के बन्दों ! अल्लाह से डरो, और मौत से पहले अपने आमाल (कर्मों) का ज़ख़ीरा (भंडार) फ़राहम (संचित) कर लो और दुनिया की फ़ानी (नाशवान) चीज़ें देकर बाक़ी (शेष) रहने वाली चीज़ें ख़रीद लो। चलने का सामान करो क्योंकि तुम्हें तेज़ी से ले जाया जा रहा है। और मौत के लिये आमादा (तैयार) हो जाओ कि वह तुम्हारे सरों पर मंडला रही है। तुम लोगों को ऐसा होना चाहिये कि जब पुकारा गया तो जाग उठे और यह जान लेने पर कि दुनिया उन का घर नहीं है, उसे आख़िरत (परलोक) से बदल लिया हो। इस लिये कि अल्लाह ने तुम्हें बेकार पैदा नहीं किया और न उस ने तुम्हें बे क़ैदो बन्द (बिना बंधन) छोड़ दिया है। मौत तुम्हारी राह में हाइल (बाधक) है। उस के आते ही तुम्हारे लिय जन्नत (स्वर्ग) है या दोज़ख (नर्क) है। वह मुद्दते हयात (जीवन काल) जिसे हर गुज़रने वाला लहज़ा (क्षण) कम कर रहा हो और हर साअत (पल) उसकी इमारत (भवन) को ढाह (गिरा) रही हो, कम ही समझी जाने के लाइक़ (योग्य) है। और वह मुसाफ़िर (यात्री) जिसे हर नया दिन और हर नई रात लगातार खींचे जा रही हो, उस का मंज़िल तक पहुंचना जल्द ही समझना चाहिये। और वह अज़ीमे सफ़र (यात्रा का इरादा रखने वाला) जिस के सामने हमेशा की कामरानी (सफ़लता) या नाकामी (असफ़लता) का सवाल (प्रशन) है, उसे अच्छे से अच्छा ज़ाद (रास्ते का भोजन) मुहैया (संचित) करने की ज़रुरत है। लिहाज़ा (अस्तु) इस दुनिया में रहते हुए इस से इतना तोशए आख़िरत (परलोक के लिये सामान) ले लो जिस के ज़रीए (द्वारा) कल अपने नफ़्सों (आत्माओं) को बचा सको। जिस की सूरत यह है कि बन्दा (दास) अपने अल्लाह से डरे, अपने नफ़्स (आत्मा) के साथ ख़ैर ख्वाही (शुभ चिन्तन) करे, मरने से पहले तौबा (प्रायश्चित) करे, अपनी ख़्वाहिशों (इच्छाओं) पर क़ाबू (वश) रखे। चूंकि मौत (मृत्यु) उस की निगाह (दृष्टि) से ओझल है, और उम्मीदें (आशायें) फ़रेब (कपट) देने वाली हैं और शैतान उस पर छाया हुआ है, जो गुनाहों (पापों) को साज कर उस के सामने लाता है कि वह उस में मुब्तला (ग्रस्त) हो और तौबा की ढारस बंधाता रहता है कि वह उसे तअवीक़ (विलम्ब) में डालता रहे। यहां तक की मौत ग़फ़्लत व बे ख़बरी की हालत (अचेतना की अवस्था) में उस पर अचानक (अकस्मात) टूट पड़ती है। वा हसरता (हाय अफ़्सोस) ! कि उस ग़फ़िलो बेख़बर (अचेत व अनभिज्ञ) की मुद्दाते हयात (जीवन काल) ही उस के ख़िलाफ़ (विरुद्ध) एक हुज्जत (तर्क) बन जाए और उस की ज़िन्दगी (जीवन) का अंजाम (परिणाम) बद बख्ती (दुर्भाग्य) की सूरत (दशा) में हो। हम अल्लाह सुब्हानहू से सवाल करते हैं कि वह हमे और तुम्हें ऐसा कर दे, कि दुनिया की नेमतें सरकश (विद्रोही) व मुतमर्रिद (अंहकारी) न बना दें और किसी मंज़िल पर इताअते पर्वरदिगार (अल्लाह की आज्ञाओं के पालन) से दरमांदा व आजिज़ (थके व ऊबे) न हों और मरने के बाद न शर्मसारी (लज्जा) उठाना पड़े और न रंजो ग़म (शोक व दुख) सहना पड़े।

खुत्बा-63

तमाम हम्द (प्रशंसा, आराधना) उस अल्लाह के लिये है जिस की एक सिफ़त (गुण) से दूसरी सिफ़त (गुण) को तक़द्दुम (प्रथमता) नहीं कि वह आख़िर (अन्तिम) होने से पहले अव्वल (प्रथम) और ज़ाहिर (प्रत्यक्ष) होने से पहले बातिन (परोक्ष) रहो हो। अल्लाह के अलावा (अतिरिक्त) जिसे भी एक कहा जायेगा,वह क़िल्लत (अल्पता) व कमीं में होगा। उस के सिवा हर बाइज़्ज़त (प्रतिष्ठित) ज़लील (अपमानित) और हर क़वी (प्रत्येक शक्तिशाली) कमज़ोर व आजिज़ (निर्बल एंव असमर्थ) और हर मालिक (प्रत्येक स्वामी) मम्लूक (दास) और हर जानने वाला सिखने वाले की मंज़िल (स्थिति में है। उस के अलावा (अतिरिक्त) हर क़ुद्रत व तसल्लुत (प्रत्येक सामथर्य एंव आधिपत्य) वाला कभी क़ादिर (समर्थ) होता है और कभी आजिज़ (धीमे स्वरों) के सुनने से क़ासिर (असमर्थ) होता है और बड़ी आवाज़ें (भारी स्वर) उसे बहरा कर देती हैं और दूर की आवाज़ें उस तक पहुंचती नहीं हैं और उस के मासिवा (अतिरिक्त) हर देखने वाला (प्रत्येक दर्शक) मख़्फ़ी रंगों (गुप्त रंगों) और लतीफ़ जिस्मों (मृदुल शरीरों) के देखने से नाबीना (अंधा) होता है। कोई ज़ाहिर (प्रत्यक्ष) नहीं हो सकता। उस ने अपनी किसी मख़्लूक़ (सृष्टि) को इस के लिये पैदा (उत्पत्र) नहीं किया कि वह अपने इक़तिदार (सत्ता) की बुनियादों (आधारों) को मोह्कम (दृढ़) करे या ज़माने (काल) के अवाक़िब व नताइज (यातनाओं एंव परिणामों) से उसे कोई ख़तरा था। या किसी बराबर वाले के हमला आवर (आक्रमणकारी) होने या कसरत (बहुसंख्या) पर इतराने वाले शरीक (साझेदार) या बलन्दी (उच्चता) में टकराने वाले मद्दे मुक़ाबिल (प्रतिद्वन्द्वी) के ख़िलाफ़ (विरुद्ध) उसे मदद हासिल (सहायता प्राप्त) करनी थी। बल्कि यह सारी मख़ूलूक़ (उत्पत्ति) उसी के क़ब्ज़े (अधिकार) में हैं और सब उसके आजिज़ (असमर्थ) व नातवां (निर्बल) बन्दे (दास) हैं। वह दूसरी चीज़ों (वस्तुओं) में समाया हुआ (व्याप्त) नहीं है। कि यह कहा जाए कि वह उन के अन्दर है और न उन चीज़ों से दूर है कि यह कहा जाए कि वह उन चीज़ों से अलग (पृथक) है। ईजादे ख़ल्क़ व तदबीरे आलम ने उसे ख़स्ता व दरमान्दा (थका कर चूर) नहीं किया। और (इच्छानुसार) चीज़ों के पैदा करने से इज्ज़ (असमर्थता) उसे दामनगीर (व्याप्त) हुआ है और न उसे अपने फ़ैसलों (निर्णयों) और अन्दाज़ों (अनुमानों) में शुब्हा (शंका) लाहिक़ (उत्पत्र) हुआ है। बल्कि उस के फ़ैसले मज़बूत (निर्णय दृढ़) इल्म मोहकम (ज्ञान दृढ़) और अहकाम (आदेश) क़तई (अन्तिम) हैं। मुसीबत (संकट) के वक्त भी उसी की आस रहती है और नेमत (पुरस्कार प्राप्त करते समय भी) के वक्त भी उसका डर लगा रहता है।

खुत्बा-64

[ सिफ्फ़ीन के दिनों में अपने असहाब (साथियों) से फ़रमाया करते थे ]

ऐ गुरोहे मुसलिमीन ! ख़ौफ़े ख़ुदा (अल्लाह का भय) को अपना शिआर (आचरण) बनाओ, इत्मीनान व वक़ार (विश्वास एंव गंभीरता) की चादर ओढ़ लो और अपने दांतों को भींच लो, इस से तलवारें सरों से उचट जाया करती हैं। ज़िरह (लोहे जालदार वस्त्र) की तकमील (पूर्ति) करो (उस के साथ ख़ोद अर्थात कवच व जौशन भी पहन लो) , और तलवारों को खींचने से पहले न्यामों में अच्छी तरह हिला जुला लो और दुश्मन को तिर्छी नज़रों से देखते रहो, और दायें बायें (दोनों ओर) नेज़ों (भालों) के वार करो, और दुश्मन को तलवारों की बाढ़ पर रख लो और तलवारों के साथ साथ क़दमों को आगे बढ़ाओ, और यक़ीन (विश्वास) रखो कि तुम अल्लाह के रुबरु (साक्षात) रसूल (स.) के चचाज़ाद भाई के साथ हो। बार बार हमला करो और भागने से शर्म (लज्जा) करो, इस लियें कि यह पुश्तों (पीढ़ियों) तक के लिये नंगो आर (लज्जा) और रोज़े महशर (प्रलय के दिन) जहत्रम (नर्क) की आग का बाइस (कारण) है. खुशी से (सहर्ष) अपना जानें अल्लाह को दे दो और पुर इतमीनान रफ़्तार के (संतोष पूर्ण चाल) से मौत की जानिब (मृत्यु का ओर) पेशक़दमी करो (अग्रसर हो), और शामियों की इस बड़ी जमाअत (समूह) और तनाबों से खिंचे हुए ख़ैमे को अपने पेशे नज़र (दृष्टिगत) रखो और उस के वस्त (मध्य) पर हमला (आक्रमण) के लिये हाथ बढ़ाया हुआ है और दूसरी तरफ़ (ओर) भागने के लिये क़दम पीछे हटा रखा है। तुम मज़्बूती (दृढ़ता) से अपने इरादे पर जमे रहो यहां तक कि हक़ (यथार्थ) सुब्ह के उजाले की तरह ज़ाहिर (प्रकट) हो जाए। (फलस्वरुप) तुम ही ग़ालिब (विजयी) हो और खुदा तुम्हारे साथ है वह तुम्हारे अअमाल (कर्म) को ज़ाए व बर्बाद (नष्ट) नहीं होने देगा।

ख़ुत्बा-65

[ पैग़म्बर सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम की रेहलत (देहान्त) के बाद जब सक़ीफ़ए बनी साइदा की ख़बरें अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) तक पहुंचीं, तो आप ने दर्याफ़्त फ़रमाया (पूछा) कि अन्सार क्या कहते थे ? लोगों ने कहा कि वह कहते थे कि एक हम में से अमीर हो जाए और एक तुम में से, हज़रत ने फ़रमाया कि ]

तुम ने यह दलील (तर्क) क्यों न पेश (प्रस्तुत) की कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम ने वसीअत फ़रमाई थी कि अन्सार में जो अच्छा हो उस के साथ अच्छा बर्ताव किया जाए और जो बुरा हो उस से दर गुज़र (क्षमा) किया जाए. लोगों ने कहा कि इस में उन के खिलाफ़ (विरुद्ध) क्या सुबूत (प्रमाण) है ? आप ने फ़रमाया कि अगर हुकूमत व इमारत (सत्ता व समृद्धि) उन के लिये होती तो फिर उन के बारे में दूसरों को नसीहत क्यों की जाती ? फिर हज़रत ने पूछा कि क़ुरैश ने क्या कहा ? लोगोंने कहा कि उन्हों ने शजरए रसूल (स.) से होने की वजह से अपने इस्तेह्क़ाक़ (पात्रता) पर इस्तेद्लाल (तर्क) किया, तो हज़रत ने फ़रमाया कि उन्हों ने शज्रा एक होने से तो इस्तेद्लाल किया लेकिन उस के फलों को ज़ाए (नष्ट) कर दिया।

सक़ीफ़ए बनी साइदा के वाक़िआत (घटनाओं) से यही ज़ाहिर (स्पष्ट) होता है कि अन्सार के मुक़ाबिले में मुहाजिरीन (शरणार्थियों) की सब से बड़ी दलील और वजहे कामरानी (सफलता का कारण) यही चीज़ थी कि क़ुरैश चूंकि पैग़म्बर (स.) के हम क़ौम व हम क़बीले हैं लिहाज़ा उन के होते हुए कोई ग़ैर खिलाफ़त का हक़दार (अधिकारी) नहींहो सकता और इसी बिना (आधार) पर अन्सार का जम्मे ग़फ़ीर (जनसमूह) तीन मुहाजिरीन के सामने हथियार डालने को तैयार हो गया और वह नस्ली इमतियाज़ को पेश कर के ख़िलाफ़ त की बाज़ी जीतने में कामयाब हो गए। चुनांचे इतिहासकार तबरी वाक़िआते सक़ीफ़ा के सिलसिले में तहरीर करते हैं कि जब अन्सार ने सक़ीफ़ए बनी साइदा में सअद इब्ने इबादह के हाथ पर बैअत करने के लिये इजतिमाअ किया, तो हज़रत अबू बक्र, हज़रत उमर और अबू उबैदा इब्ने जर्राह भी सुन गुन पाकर वहां पहुंच गए। इस मौक़े (अवसर) के लिये हज़रत उमर ने पहले से ही कुछ सोच लिया था जिसे कहने के लिये उठे मगर हज़रत अबू बक्र ने उन्हें रोक दिया और ख़ुद खड़े हो गए और अल्लाह की हम्दो सना और मुहाजिरीन की हिजरत और सब्क़ते ईमानी (ईमान लाना में पहल) का तज़किरा (चर्चा) करने के बाद फ़रमाया :--

“यह वही हैं जिन्हों ने सब से पहले ज़मीन में (पृथ्वी पर) अल्लाह की परस्तिश की और सब से पहले अल्लाह व रसूल (स.) पर ईमान लाए। यही पैग़म्बर (स.) के दोस्त और उन के कुंबे वाले हैं और यही सब से ज़ायद (अधिक) ख़िलाफ़त के हक़दार हैं जो इन से टकरायेगा वह ज़ालिम होगा।”

जब हज़रत अबू बक्र अपना बयान खत्म कर चुके तो हबाब इब्ने मुनज़िर खड़े हुए और अन्सार से मुखातिब हो कर फ़रमाया, ऐ गुरोहे अन्सार ! तुम अपनी बाड डोर दूसरों के हाथ में न दो, दुनिया तुम्हारे साये में बस रही है, तुम इज़्ज़त व सर्वत (सम्मान व समृद्धि) वाले क़बीले और जत्थे वाले हो। अगर मुहाजिरीन को बअज़ (कुछ) चीज़ों में तुम पर फ़ज़ीलत (वरीयता) है, तो तुम्हें भी बअज़ चीज़ों में उन पर फ़ौक़ीयत (वरीयता) हासिल है। तुम ने उन्हें अपने घरों में पनाह (शरण) दी। तुम इसलाम के बाज़ूए शमशीर ज़न (तलवार चलाने वाले हाथ) हो तुम्हारी वजह से इसलाम अपने पैरों पर खड़ा हुआ। तुम्हारे शहरों में आज़ादी से अल्लाह की नमाज़ें क़ायम हुई। तुम तफ़रिक़ा व इनतिशार (मतभेद व बिखराव) से अपने को बचाओ और अपने हक़ (अधिकार) पर यकजेह्ती (एकता) से जमे रहो। और अगर मुहाजिरीन तुम्हारा हक़ तस्लीम न करें तो फिर उन से कहो कि एक अमीर तुम में से होगा और एक अमार हम में से होगा।

हबाब यह कह कर बैठे ही थे कि हज़रत उमर खड़े हो गए और फ़रमाया :--

“ ऐसा नहीं हो सकता कि एक वक्त में दो हुक्मरान जमअ हो जाएं। खुदा की क़सम ! अरब कभी इस पर राज़ी न होंगे कि तुम्हें अमीर बनायें, जब कि नबी (स.) तुम में से नहीं हैं। अलबत्ता अरब को इस में ज़रा पसो पेश (झिझक) न होगा कि खिलाफ़त उस के हवाले करें कि जिस के घराने में नुबुव्वत हो और साहिबे अम्र भी उन्हीं में से हो। और इन्कार करने वाले के सामने इस से हमारे हक़ में खुल्लम खुल्ला दलील और वाज़ेह बुर्हान (स्पष्ट तर्क) लाई जा सकती है। जो हम से मोहम्मद (स.) की इमारत (अमीरी) में टकरायेगा वह बातिल (अधर्म) की तरफ़ झुकने वाला, गुनाह का मुर्तकिब और वर्तए हलाकत (मृत्यु के भंवर) में गिरने वाला है।

हज़रत उमर के बाद हबाब फिर खड़े हुए और अन्सार से कहा देखो ! अपनी बात पर डटे रहो। और इस की और इस के साथियों की बातों में न आओ यह तुम्हारे हक़ को दबाना चाहते हैं। अगर यह लोग नहीं मानते तो इन्हें अपने शहरों से निकाल बाहर करो और खिलाफ़त को संभाल लो, भला तुमसे ज़ियादा इस का कौन हक़दार हो सकता है ? हबाब खामोश हुए तो हज़रत उमर ने उन्हें सख्त सुस्त (बुरा भला) कहा। उधर से भी कुछ तल्ख कलामी (कड़वी बातें) हुईं और बअज़ (सभा) का रंग बिगड़ने लगा। अबू उबैदा ने जब यह देखा तो अन्सार को ठंडा करने और अपने ढर्रे पर लाने के लिये कहा कि ऐ गुरोहे अन्सार ! तुम वही लोग हो जिन्हों ने हमें सहारा दिया, हमारी हर तरह मदद इमदाद की। अब अपनी रविश को न बदलो, और अपने तौर तरीक़ों को न छोड़ो। मगर अन्सार इन बातों में न आए और वह सअद के अलावा किसी की बैअत करने को तैयार न थे और उन की तरफ़ लोग बढ़ा ही चाहते थे कि सअद के क़बीले का एक आदमी बशीर खज़्रजी खड़ा हुआ और कहने लगा कि बेशक हम ने जिहाद में क़दम बढ़ाया, दीन को सहारा दिया, मगर उस से हमारी ग़रज़ सिर्फ़ अल्लाह की रज़ामन्दी और उस के रसूल (स.) की इताअत थी। हमारे लिये यह मुनासिब नहीं कि तफ़व्वुक़ (बर्तरी) जतलायें और खिलाफ़त में झगड़ा करें। मोहम्मद (स.) क़ुरैश में से थे लिहाज़ा उन की नियाबत व विरासत का हक़ भी उन्हीं की क़ौम को पहुंचता है। बशीर का यह कहना था कि अन्सार में फूट पड़ गई और उस का मक़्सद भी यही था। चूंकि वह अपने कुंबे (कुटुम्ब) के एक आदमी को बढ़ते हुए न देख सकता था। लिहाज़ा मुहाजिरीन ने अन्सार की इस फूट से पूरा पूरा फ़ाइदा उठाया और हज़रत उमर और अबू उबैदा ने हज़रत अबू बक्र के हाथ पर बैअत का तहैया (निशचय) कर लिया। अभी वह बैअत के लिये बढ़े ही थे कि बशीर ने सब से पहले बढ़ कर अपना हाथ हज़रत अबू बक्र के हाथ पर रख दिया और फिर हज़रत उमर और अबू उबैदा ने बैअत की, और फिर बशीर के क़ौम क़बीले वाले बढ़े और बैअत की और सअद इब्ने इबादा को पैरों तले रौंद कर रख दिया।

अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) इस मौक़े पर पैग़म्बर (स.) के ग़ुस्ल व कफ़न में मसरूफ़ (व्यस्त) थे। बाद में जब सक़ीफ़ा के इजतिमाअ (सम्मेलन) के बारे में सुना और उन्हें यह मालूम हुआ कि मुहाजिरीन ने अपने को पैग़म्बर (स.) का क़ौम व क़बीला कह कर अन्सार से बाज़ी जीत ली है तो यह लतीफ़ जुमला (मृदुल वाक्य) फ़रमाया कि शजरा एक होने से तो दलील लाए हैं और उस के फ़लों को ज़ाए (नष्ट) कर दिया है कि जो पैग़म्बर (स.) के अहले बैत हैं। यअनी अगर शजरए रसूल (स.) से होने की बिना पर उन का हक़ माना गया है, तो जो उस शजरए रिसालत के फ़ल हैं, वह क्यों कर नज़र अन्दाज़ किये जा सकते हैं। हैरत है कि हज़रत अबू बक्र जो सातवीं पुश्त पर, और हज़रत उमर जो नवीं पुश्त (पीढ़ी) पर रसूल (स.) से जाकर मिलते हैं वह तो पैग़म्बर (स.) का क़ौमो क़बीला बन जाएं और जो इब्ने अम (चचाज़ाद भाई) था उस के भीई होने से भी इन्कार कर दिया जाता है।

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