बरज़ख़ का सवाब ओं अज़ाब क़ुरआन में|





बरज़ख़ का सवाब ओ अज़ाब क़ुरआन में

(1).अन्नारो यारेजूना अलैहा--------- इल्ला आख़िर सूराः- 40, आयतः- 49, यानी वो सुब्ह शाम आग के ऊपर पेश किये जाऐगें और जिस रोज़ क़यामत बरपा होगी (तो हुक्म होगा की) आले फ़िरऔन को सख़्त तरीन अज़ाब में दाख़िल करो मिन जुमला उन आयात के जो क़ुराने मजीद में अज़ाबे बरज़ख़ पर दलालत करती हैं ये आयऐ शरीफ़ा भी है जो फ़िरऔन वालों के बारे में हैं।
जब फ़िरऔन के साथी दरियाऐ नील में ग़र्क होकर हलाक हुए उसी वक़्त से हर सुब्ह शाम आग के ऊपर पेश किये जाते हैं यहाँ तक कि क़यामत क़ायम हो और वो सख़्त तरीन अज़ाब में दाख़िल किये जाऐं। इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ.स) का इरशाद है कि क़यामत में सुब्ह शाम नहीं है ये बरज़ख़ के बारे में है और हज़रते रसूले ख़ुदा (स.अ.व.व)  से मरवी है कि जहन्नम में उसे उसकी जगह उसे बरज़ख़ में हर सुब्ह ओ शाम दिखाई जाती है अगर वो अज़ाब पाने वालों में से हैं और अगर अहले बहिश्त में से हैं तो बहिश्त में उसकी जगह की निशानदही की जाती है और कहा जाता है कि ये है तुम्हारी क़यामगाह क़यामत में।
(2). फ़अम्मल लज़ीना शक़्वा फ़िन्नार -------------------- इला आख़िर (सूराः- 11, आयतः- 105 से 108). यानी जो लोग बदबख़्ती और शक़ावत वाले हैं वो जब तक ज़मीन ओ आसमान बरक़रार रहे आग में रहेंगेउनके लिये सख़्त फ़रियाद और आह ओ नाला है सिवा इसके कि जो तुम्हारा परवरदिगार चाहे दर हक़ीक़त तुम्हारा परवरदिगार जो चाहता है करता है लेकिन जो लोग नेक बख़्त हैं जब तक आसमान और ज़मीन बरक़रार है वो बहिश्त में रहेंगे........... इमाम (अ.स) फ़रमाते हैं ये आयत बरज़ख़ के बारे में है और यहाँ बरज़ख़ी अज़ाब ओ सवाब मुराद है वरना क़यामत में तो कोई आसमान नहीं है "इज़ा समाऐ इन्शक़्क़त" और ज़मीन भी बदल दी जाऐगी फिर ये ज़मीन बाक़ी न रहेगी "यौमा तब्बदिल्लुल अर्ज़ ग़ैरूल अर्ज़ वस्समावात वा बरज़ुल्लाहअल वाहिदुल क़हहार"।
(3).क़ीला अदख़ुलल जन्नता क़ाला या लैता.................... इला आख़िर (सूरा- यासीन आयतः- 26 वा 27). ये आयते मुबारक हबीबे नज्जार मोमिने आले फ़िरऔन के बारे में है जब उन्होंने अपनी क़ौम को पैग़म्बरों की पैरवी करने की तरफ़ दावत दी तो लोगो ने उन्हें डराया धमकाया (जैसा कि तफ़्सीरे सूरा ऐ यासीन में है) और बिल आख़ीर उन्हें सूली पर चढ़ाया और क़त्ल कर दिया यहाँ तक कि वो सवाबे इलाही में पहुँचे और मरने के बाद कहा कि काश मेरी क़ौम वाले जान लेते कि मेरे परवरदिगार ने मुझे बख़्श दिया और बलन्द मरतबा लोगों में क़रार दिया है इस मक़ाम पर ख़ुदा का इरशाद है कि उनसे कहा गया कि बहिश्त में दाख़िल हो जाओ इमाम (अ.स) फ़रमाते हैं "यानी बरज़ख़ जन्नत में है" और दूसरी रवायत में जन्नते दुनियावी (यानी बहिशते क़यामत से पस्त जन्नत) से ताबीर फ़रमाई है और फ़िल जुमला आयते मुबारक का ज़ाहिर ये है कि जब मोमिने आले फ़िरऔन शहीद हुए तो बिला फ़ासला बहिश्ते बरज़ख़ी में दाख़िल हुए और चूँकि उनकी क़ौम अभी दुनिया में थी लिहाज़ा उन्होंने कहा कि काश मेरी क़ौम जानती कि ख़ुदा ने मुझे कैसी नेमतें और अतियात इनायत फ़रमाऐं हैं तो वो तौबा कर लेती और ख़ुदा की तरफ़ रूजू करती।
(4).वमन आरज़ा मिन ज़िक्री.................. इला आख़िर (सूराए ताहा आयतः- 124) जिसने यादे ख़ुदा से रूर्गदानी की यक़ीनन उसके लिये सख़्त और अज़ीयत नाक ज़िन्दगी है और हम उसे क़यामत के रोज़ औंधा महशूर करेंगे- ज़्यादा तर मुफ़स्सरीन का क़ौल है कि मइशते ज़न्क से अज़ाबे क़ब्र और अज़ाबे बरज़ख़ की तरफ़ इशारा है और ये मतलब इमाम ज़ैनुल आबिदीन (अ.स) से मरवी है।
(5).हत्ता इज़ा जाआ........................ इला याबेसून (सूराए मोमिनून आयतः- 100) यानी यहाँ तक कि उनमें (यानी कुफ़्फ़ार में) से किसी फ़र्द की मौत आती है तो वो अर्ज़ करता है कि परवरदिगार ! मुझे दुनिया में वापस कर दे ताकि मैंने जो परवोगुज़ाश्त की है उसमें कोई नेक अमल बजा लाऊँ तो उसके जवाब में कहा जाता है कि ऐसा नहीं होगा (यानी तुम वापस नहीं जा सकते हो)। वो दरअस्ल ऐसी बात कहता है जिसका कोई फ़ायदा नहीं है और उन लोगों के पीछे आलमे बरज़ख़ है उस रोज़ तक जब वो उठाए जाऐंगे लाज़मी तौर से ये आयत इस बात पर बख़ुबी दलालत कर रही है कि दुनयावी ज़िन्दगी के बाद और हयाते आख़िरत और क़यामत से पहले इन्सान एक और ज़िन्दगी रखता है जो इन दोनों ज़िन्दगीयों के दरमियान हद्दे फ़ासिल है और उसे आलमे बरज़ख़ या आलमे क़ब्र का नाम दिया जाता है फ़ी जुमला मज़कूरा आयत और दीगर आयतों में मजमूई तौर से ग़ौर और तद्दबुर के बाद यह बात साबित और वाजेह होती है कि रूहे इन्सीनी एक ऐसी हक़ीक़त है जो बदन के अलावा है और रूह का बदन के साथ एक तरह का इत्तेहाद है जो इरादे और शऊर के ज़रिये बदन का इन्तेज़ाम चलाती है और इन्सान की शख़्सियत रूह से है बदन से नहीं कि वो मौत के बाद ख़त्म हो जाए और अज्ज़ाए बदन के मुन्तशिर हो जाने के साथ वो भी फ़ना हो जाए बल्कि इन्सान की हक़ीक़त और शख़्सियत (रूह) बाक़ी रहती है और एक सआदत ओ हयाते जावेदानी या शक़ावते अब्दी में बसर करती है इस आलम में उसकी सआदत ओ शक़ावत मलकात और इस दुनियामें उसके आमाल से वाबस्ता है न कि उसके जिस्मानी पहलूओं और इज्तेमाई ख़ुसूसियात से हुक्माऐ इस्लाम ने भी ये साबित करने के लिये कि रूह जिस्म के अलावा है और मौत से निस्त ओ नाबूद नहीं होती और उसके अहकाम जिस्म के अहकाम से जुदागाना हैंअक़्ली दलीलें क़ायम की हैं लेकिन ख़ुदा और रसूल और आइम्माऐ ताहिरीन (अ.स) के अक़वाल के बाद हमें उनकी एहतियाज नहीं है और ये मतलब हमारे लिये आफ़ताब से भी ज़्यादा रौशन है।
(6).बरज़ख़ी जन्नत के बारे में जो आयतें नाज़िल हुईं मिन्जुमला उनके सुराऐ फ़ज्र का आख़िरी हिस्सा भी है जिसमें इरशादे ख़ुदा वन्दे आलम है कि "या अय्यो हतुल नफ़सुल मुतमइन्ना इरजई इला रब्बेका राज़ियतुन मरज़िया फ़दख़्ली फ़ी इबादी वा अदख़्ली जन्नती"।
इसमें नफ़्से मुतमईन रखने वाले से मौत के वक़्त ख़िताब होता है कि "दाख़िले बहिश्त हो जाओ" यहाँ बरज़ख़ी जन्नत के साथ ताबीर की गई है और इसी तरह "मेरे बन्दों (के ज़ुमरे) में दाख़िल हो जा" यानी मोहम्मद ओ आले मोहम्मद (अ.स) की ख़िदमत में हाज़िर हो जा इनके अलावा दीगर आयतें भी हैं जिनमें सरीहन या कनायेतन बरज़ख़ी बहिशत या जहन्नम के बारे में ज़िक्र हुआ है लेकिन इस क़दर काफ़ी है।


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