माँ बाप का दर्जा

इस्लाम में वालिदैन का मक़ाम ,लेखक .. मौलानाः सैय्यद मज़हर अली नक़वी अमरोहवी क़ुरआन माँ बाप के बारे में कहता हैः- तुम्हारे रब ने फ़...


इस्लाम में वालिदैन का मक़ाम ,लेखक ..मौलानाः सैय्यद मज़हर अली नक़वी अमरोहवी


क़ुरआन माँ बाप के बारे में कहता हैः- तुम्हारे रब ने फ़ैसला कर दिया है कि उस (अल्लाह) के सिवा किसी की बन्दगी न करो और माँ-बाप के साथ अच्छा बरताओ करो। अगर उनमें से कोई एक या दोनों ही तुम्हारे सामने बुढ़ापे की मंज़िल पर पहुँच जाएँ तो उन्हें 'उफ़' तक न कहो और न उन्हें झिड़को, बल्कि उनसे मेहरबानी से बात करो।
क़ुरआने मजीद का यह हुक्म हर मुसलमान के लिये वाजिब है अल्लाह अल्लाह ख़ुदा वन्दे आलम के नज़दीक वालिदैन की यह अज़मत व मंज़िलत है कि उन के सख़्त और तकलीफ़ वाले रवय्ये पर भी औलाद को लफ़्ज़े उफ़ भी कहना उन के मरतबे के ख़िलाफ़ है कहाँ कि उन के साथ बे अदबी और गुस्ताख़ी और बद सुलूकी से पैश आया जाये हालांकि लफ़्ज़े उफ़ कहना कोई बहुत बड़ी बेअहतेरामी नहीं है आम बात चीत में इस लफ़्ज़ को बुरा नहीं समझा जाता लेकिन इस लफ़्ज़ से मिज़ाज के ख़राब होने की बू आती है लिहाज़ा इस को भी ख़ुदा वन्दे आलम ने वालिदैन की शान के ख़िलाफ़ क़रार दिया है।
इस्लाम ने औलाद को माँ बाप के लिए कई हुक्म दिए हैं, जिनको मानना उनके लिए इतना ही ज़रूरी है, जितना कि खुदा के सिवा किसी ओर की इबादत न करना। इस्लाम कहता है, 'अपने माँ बाप के साथ अच्छा सुलूक करो। खुदा से उनके लिए दुआ करो कि वह उनपर वैसा ही करम करे जैसा बचपन मै उसके पेरेन्टस ने उस पर किया। अपने माँ बाप के अहतेराम में कुछ बातें शामिल हैः उनसे सच्चे दिल से मुहब्बत करें। हर वक़्त उन्हें खुश रखने की कोशिश करें। अपनी कमाई दौलत, माल उनसे न छुपाएँ। माँ बाप को उनका नाम लेकर न पुकारें। अल्लाह को खुश करना हो तो अपने माँ बाप को मुहब्बत भरी निगाह से देखो। अपने माँ बाप से अच्छा सुलूक करोगे तो तुम्हारे बेटे तुम्हारे साथ अच्छा सुलूक करेंगे। माँ बाप से अदब से बात करे, डांट डपट करना अदब के खिलाफ है। दुनिया में पूरी तरह उनका साथ दो। माँ बाप की नाफरमानी से बचो, क्योंकि माँ बाप की खुशनूदी में अल्लाह की खुशनूदी है और उनकी नाराज़गी में अल्लाह की नाराज़गी। अगर चाहते हो कि खुदा तुम्हारे काम में फायदा दे, तो अपने माँ बाप से रिश्तेदारों से अच्छा सुलूक बनाए रखे। कभी कभी कब्र पर जाया करे, और उनके लिए दुआ करो। दुआ करो कि 'ये अल्लाह उनपर वैसा ही रहम करना जैसा उन्होंने मेरे बचपन में मेरी परवरिश के वक़्त किया था। आज हम अपनी इन्हीं मज़हबी बातों से भटक गये है, हम अपने माँ बाप को अहतेराम देने के बजाय हम अपनी दुनियावी ख्वाहिशों के लिए उनसे लड़ते झगड़ते हैं, मरने के बाद उनके कब्र की ज्ञियारत तो बहुत दूर की बात है उनके लिए कोई सद्का खैरात तक नहीं करते। बुढापे में उनकी ख़िदमात के बजाय अपने दुनिया के फुजूल कामों में लगे रहते है। अल्लाह से मेरी ये दुआ है कि वो हमें इन गुनाहों से बचाए।


वालिदैन की फ़ज़ीलत रसूले ख़ुदा (स.) के नज़दीक
रसूले ख़ुदा (स.) ने इरशाद फ़रमायाः- माँ बाप की बद दुआ से बचो क्यों कि वोह बादलों को फाड़ कर मक़बूलियत के दरवाज़े तक पहुंचती है और क़बूल होती हैं और वालिदा की बद दुआ तो तलवार से ज़्यादा तेज़ होती है और वालिदा से बदतमीज़ी करने वाला गुनाहे कबीरा का मुरतकिब है जो ऐसा गुनाह है जो माफ़ नहीं किया जायेगा लिखा है कि एक मरतबा रसूले ख़ुदा (स.) से किसी ने मशवेरा किया तो आप ने उस से फ़रमाया कि क्या तेरी माँ ज़िन्दा है उसने कहा हाँ मेरी माँ ज़िन्दा है तो आप ने फ़रमाया उसका अहतेराम और इकराम करो क्यों कि उसके पैर के नीचे जन्नत है।
इमाम जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं कि अपने माँ बाप के साछ ऐसा बरताओ करो जैसा अपने बच्चों के साथ करते हो और दूसरे की औरतों की हिफ़ाज़त करो ताकि वोह तुम्हारी औरतों की हिफ़ाज़त करें और वालिदैन की तरफ़ से आक़ होने से बचो जन्नत ने ख़ुशबू एक साल की दूरी से सूंगी जा सकती है लेकिन वालिदैन का आक़ होने वाला उसे किसी तरह सूंग न सकेगा और वालिदैन के आक़ होने के लिये लफ़्ज़े उफ़ कहना काफ़ी है।
इमाम जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं कि जो लोग अपने वालिदैन की तरफ़ ग़ुस्से से देखें चाहे वोह उन पर ज़्यादती न कर रहे हों ख़ुदा वन्दे आलम उन की नमाज़ क़बूल नहीं करता।
रसूले ख़ुदा (स.) से मालूम किया गया कि माँ बाप के औलाद पर क्या हुक़ूक़ हैं तो आप ने फ़रमायाः उनका नाम न लो उनके आगे न चलो उनके आगे न बैठो उन से बदकलामी न करो।
इमाम जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम से किसी ने पूछा कि वालिदैन के साथ अहसान करने का क्या मतलब है आप ने फ़रमायाः माँ बाप से अच्छा सुलूक करो। मालूम किया गया कि क़ुरआन की इस आयत का क्या मतलब है तो आप ने फ़रमाया उन से अच्छा बरताओ करो उन को जिस चीज़ की ज़रूरत हो उन के बिना मांगे देदो चाहे वोह माल दार ही क्यों न हों फिर पूछ कि इस आयत का क्या मतलब है कि उन में से एक या दोनों बूढ़े हो जायें तो उन से उफ़ भी मत कहो और न कभी उन को डाटो और उनसे शरीफ़ाना बाच चीत करो और अगर वोह तुम को मारें तो तुम उन से यह कहो कि ख़ुदा तुम को बख़्शे और उन की आवाज़ पर अपनी आवाज़ बुलन्द न करो उनके आगे मत चलो और उन से हर हाल में नेक बरताओ करो अगर वोह मर जायें तो उनकी तरफ़ से नमाज़ पढ़ो उनके नाम पर ख़ैरात करो और उन की तरफ़ से हज करो और रोज़े रखो तब भी वालिदैन का हक़ अदा नहीं हो सकता इन तमाम कामों से अल्लाब बे हद ख़ुश होगा और ख़ुदा तुम को इसका अच्छा सिलाह देगा लिहाज़ा लिखा है कि रसूले ख़ुदा (स.) की ख़िदमत में एक शख़्स आया और उसने कहा कि या रसूल अल्लाह (अ.) मैं जेहाद में जाना चाहता हूँ और उसमें शहीद होना चाहता हूँ तो आप ने फ़रमाया जाओ और जेहाद में शहीद हो जाओ अगर जेहाद में शहीद हो गऐ तो गुनाहों से ऐसे पाक हो जाओगे जैसे माँ के पेट से पैदा हुऐ थे और अगर रास्ते में शहीद हो गऐ तो ख़ुदा उसका अज्र व सवाब देगायह सुन कर उस शख़्स ने कहा या रसूल अल्लाह (स.) मेरे माँ बाप बहुत बूढ़े हैं और मुझ से बहुत मौहब्बत करते हैं मेरे बाहार जाने पर बिल्कुल राज़ी नहीं हैं यह सुन कर रसूल अल्लाह (स.) ने इरशाद फ़रमायाः जाओ और अपने माँ बाप के पास रहो और उन की ख़िदमत करो ख़ुदा की क़सम उन की एक रात की ख़िदमत जेहाद से ज़्यादा सवाब रखती है।
रसूले ख़ुदा का इरशाद है कि औलाद का माँ बाप को मौहब्बत भरी नज़रों से देखना एक हज का सवाब रखता है फिर उस शख़्स ने कहा या रसूल अललाह (स.) अगर को शख़्स वालिदैन को एक सौ मरतबा मौहब्बत की निगाह से देखे तो एक सौ हज का सवाब मिलेगा तो आप ने फ़रमायाः उस की रेहमत के ख़ज़ाने में कोई कमी नहीं वोह सवाब को जितना चाहे बढ़ा सकता है। इमाम अली रज़ा असलैहिस्साल फ़रमाते हैः कि माँ बाप की इताअत करनी चाहिये और उन से इज़्ज़त और अहतेराम से पैश आना चाहिये और उन से नर्म लेहजे में बात करनी चाहिये क्यों कि उन की वजह से बैटा पैदा हुआ अगर वोह नहीं होते तो बैटा पैदा नहीं होता।
इमाम जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम इरशाद फ़रमाते हैं कि माँ बाप से अच्छा सुलूक करो क्यों कि यह ख़ुदा को पहचानने की दलील है औलाद की कोई बात माँ बाप से अच्छा सुलूक करने से ज़्यादा ख़ुदा को पसन्द नहीं, इस लिये कि माँ बाप के हुक़ूक़ अल्लाह के हुक़ूक़ से जुड़े हुऐ हैं, फिर फ़रमाते हैं कि जिस शख़्स को यह ख़ाहिश हो कि मौत की मुशकिल से निजात मिले तो उसे वालिदैन के साथ नेक सुलूक करना चाहिये और हर वक़्त उन के साथ अच्छा बरताओ करे ऐसा करने से ख़ुदा वन्दे आलम मौत की सख़्ती आसान कर देता है और ज़िन्दगी में कभी इंसान पैसे से परेशान नहीं होता।
रसूले ख़ुदा (स.) ने फ़रमायाः तीन आदमी ऐसे हैं कि जिन को सज़ा दुनिया में भी मिलती है और आख़ेरत में भी मिलती है पहला वोह शख़्स जिस को वालिदैन ने आक़ कर दिया हो और दूसरा वोह शख़्स जो अपने वालिदैन को मारता पीटता है और तीसरा वोह शख़्स जो अपने ताअल्लुक़ात ख़त्म कर दे। इमाम जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं कि वालिदैन को मारने पीटने वाला शख़्स मलऊन है और वालिदैन का आक़ किया हुआ शख़्स भी मलऊन ने।
रसूले ख़ुदा (स.) ने इरशाद फ़रमायाः कि खुदा फ़रमाता है कि मैं वालिदैन के आक़ किये हुऐ शख़्स को माफ़ नहीं करूंगा चाहे वोह कितना ही अच्छा अमल अंजाम देदे लेकिन वालिदैन के साथ अच्छा बरताओ करने वाले को ज़रूर माफ़ करूँगा।
इमाम मौहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम इरशाद फ़रमाते हैं कि जो औलाद अपने वालिदैन के साथ नेकियां नहीं करती है उन की ज़िन्दगी में या उन के मरने के बाद उन के लिये न दुआ-ए-मग़फ़ेरत करे न रोज़े रखे न उनका क़र्ज़ अदा करे न उन के नाम पर ख़ैरात अदा करे तो ख़ुदा वन्दे आलम ऐसी औलाद को आक़ सुशा औलाद में दाख़िल करता है और अगर उनका क़र्ज़ अद करे और उन के नाम पर ख़ैरात करे तो ख़ुदा वन्दे आलम उन को आक़ शुदा औलाद से निकाल कर उन को माँ बाप का कहना मानने वालों और अच्छे बन्दों में शामिल करता है।
इमाम जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम से किसी ने पूछाः यब्ना रसूल अल्लाह वालिदैन के साथ नेकी करने का क्या मतलब है तो आप ने फ़रमायाः कि उन को किसी चीज़ के मांगने का मौक़ा न दो और उन के आगे न चलो उन की आवाज़ पर अपनी आवाज़ ऊँची न करो और उन को टेहड़निगाह से न देखो अगर वोह तुम को मारें भी तो कहो कि ख़ुदा तुम को माफ़ करे और जब उन के सामने जाओ तो आजिज़ और कमज़ोर शख़्स की तरह जाओ अगर वोह तुम को परेशान भी करें तो तुम उफ़ भी न कहो बस ख़ामौश हो जाओ। लिखा है कि एक शख़्स रसूले ख़ुदा (स.) की ख़िदमत में हाज़िर हुआ और अर्ज़ करने लगा या रसूल अल्लाह मैं हद से ज़्यादा बदकार आदमी हूँ मेंने हर बुरा काम किया है मेरी तौबा क़बूल होने की कोई सूरत नहीं है आप ने फ़रमायाः अगर तेरी वालिदा ज़िन्दा हैं तो उन के साथ नेक बरताओ कर नेक सुलूक कर इस लिये कि वोह काम ख़ुदा की रेहमत के नाज़िल होने की वजह है ख़ुदा की रेहमत के नाज़िल होने का सब से बड़ा ज़रिया है फिर रसूल अल्लाह (स.) ने मालूम किया कि क्या तेरे माँ बाप ज़िन्दा हैं उस ने जवाब दिया मेरा बाप ज़िन्दा है लेकिन माँ मर चुकी हैं तो रसूल अल्लाह ने फ़रमायाः उन के साथ नेक बरताओ कर उस की ख़िदमत कर उसके जाने के बाद आप ने फ़रमाया काश इस की माँ ज़िन्दा होती!
लिखा है कि एक शख़्स रसूले ख़ुदा (स.) की ख़िदमत में हाज़िर हुआ और उसने अर्ज़ किया कि या रसूल अल्लाह (स.) मुझे कोई अमल तालीम किजीये जिस से ख़ुदा की रेहमत के क़रीब हो जाऊँ तो आप ने फ़रमाया कि अगर तेरे माँ बाप ज़िन्दा हों तो उन के साथ अच्छा बरताओ करो और अच्छा सुलूक करो यही ख़ुदा की रेहमत के नाज़िल होने का बहतरीन ज़रीया है।
तारीख़ में लिखा है कि बनी इसराईल का एक लड़का अपने बाप का बहुत ही ख़िदमत गुज़ार था एक रोज़ एक शख़्स उस के पास आया और अपने साथ एक क़ीमती मौती बेचने को लाया उसने उस लड़के से कहा कि मैं इस मौती को बेचना चाहता हूँ उस लड़के ने वोह मौती पचास हज़ार दिरहम में ख़रीद लिया यह सोदा बहुत नफ़े का था उस लड़के ने बेचने वाले से कहा ज़रा थोड़ी देर ठहर जा क़ीमत अभी देता हूँ दुकान की चाबी मेरे बाप के पास है वोह सोया हुआ है उसे जागने दो उसने कहा कि उसे जगा दो और उस से चाबी लेलो उस लड़के ने कहा मैं उन्हें जगा कर तकलीफ़ देना नहीं चाहता तो मौती बेचने वाले ने कहा कि मुझे क़ीमत अभी चाहिये लड़के ने कहा कि मेरे बाप के जागने तक ठहरे रहो तो मैं दस हज़ार दिरहम ज़्यादा दूंगा लेकिन बाप को जगा कर तकलीफ़ नहीं दे सकता। तो बेचने वाले ने कहा कि अगर तुम अपने बाप को जगा दो तो मैं दस हज़ार दिरहम जो तुम ज़्यादा दे रहे हो वोह नहीं लूँगा और जो क़ीमत लगाई है उसी क़ीमत पर दे दूंगा फिर भी उस लड़के ने अपने बाप को नहीं जगाया मौती के इस नफ़े को छोड़ दिया मौती बेचने वाला अपना मौती लेकर चला गया जब उसका बाप उठा तो लड़के ने अपने बाप से सारा वाक़ेआ सुनाया तो लड़के को बाप ने दुआ-ए-ख़ैर दी और उस से कहा कि मैं तुझ को अपनी यह गाए देता हूँ अब तू इसका मालिक है।
रसूले ख़ुदा (स.) ने फ़रमाया यह वोही गाए थी जो बनी इसराईल को उसकी खाल में सोना भर क़ीमत पर बेची गई थी यह बाप की ख़िदमत का सिलाह है।
मनक़ूल है कि इमाम जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम की ख़िदमत में एक शख़्स यहया बिन इब्राहीम नामी आया और कहा यबना रसूल अल्लाह (स.) मेरे साथ मेरी बूढ़ी माँ है जिस की सारी ज़रूरतें में पूरी करता हूँ रात दिन उसकी ख़िदमत में लगा रहता हूँ उसे उठाना, बैठाना, धुलाना, खाना खिलाना, ख़ुलासा यह कि में उनकी हर ज़रूरत पूरी करता हूँ यह बताईये कि क्या मेंने उन की ख़िदमत का हक़ अदा कर दिया या नहीं तो आप ने फ़रमाया कि तूने उसका एक रात का भी हक़ अदा नहीं किया है।
इमाम जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं कि इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम अपने वालिद के साथ खाना खाते थे मगर अपना खाना अलग कर लेते थे लोगों ने उन से मालूम किया कि आप उनके साथ एक ही बरतन में क्यों नहीं खाते फ़रमाया इस बेअदबी से बचने के लिये कि अगर एक ही बरतन में खाऊँ तो मुमकिन है कि जो चीज़ में पसन्द कर के उठाऊँ तो उस को वोह उठाना चाहें तो उन की शान में मुझे यह बात पसन्द नहीं क्यों कि यह बात मेरे लिये उनके वास्ते बेअदबी और बदतमीज़ी हरकत होगी।



माँ की मर्ज़ी और नाराज़गीः-
इमाम मौहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम बयान करते हैं कि एक शख़्स जो बहुत ज़्यादा इबादत करने वाला और मुत्तक़ी और परहेज़गार जिसका नाम ज़रीह था जो हर वक़्त अपनी इबादत में मशग़ूल रहता था एक रोज़ उसकी माँ उसकी इबादत करने की जगह आई और उसको आवाज़ दी लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया और इबादत में ही मशग़ूल रहा फिर वोह वापस चली गई फिर वापस आई और आवाज़ दी मगर उसने फिर भी कोई जवाब नहीं दिया और अपनी इबादत में मशग़ूल रहा फिर तीसरी मर्तबा वोह आई और उसने उसको आवाज़ दी फिर भी उसने कोई जवाब न दिया, माँ ने कहा कि मैं तेरी शिकायत ख़ुदा से करूंगी वोह तुझ को रुसवा करेगा दूसरे दिन एक फ़ाहेशा औरत (गन्दी औरत) उसकी इबादत करने वाली जगह आगई जो एक बच्चा अपनी गोद में लिये हुऐ कह रही थी कि ऐ ज़रीह अपने बच्चे को पाल यह बात तमाम बनी इस्राईल में फैल गई कि जो इबादत गुज़ार लोगों को ज़िना करने पर बुरा कहता था वोह ख़ुद ज़िना कार है। यह बात जब उस वक़्त के बादशाह को मालूम हुई तो उसने ज़िना कारी के जुर्म में उसको फांसी की सज़ा सुना दी बादशाह का हुक्म सुन कर उसकी माँ आबिद के पास आई और उसने उसके मुँह पर तमाचा मारा उसने कहा कि ऐ माँ यह तेरी दुआ का नतीजा है तू मुझे माफ़ कर दे जब बादशाह को यह मालूम हुआ और सारी हक़ीक़त मालूम हुई तो उस औरत को बुलाया और उस से पूछा कि सच बता कि यह बच्चा किस का है तो उस बच्चे ने कहा कि मेरा बाप एक चरवाहा है जो फ़लाँ जगह पर रहता है और फ़लाँ क़बीले का है उस आबिद की माँ के माफ़ करने की वजह से उसको माफ़ कर दिया गया उस आबिद ने क़सम खाई कि अब कभी माँ से बेरुख़ी और उन के हुक्म को नहीं टालूंगा और हमेशा उन के हुक्म की इताअत करूँगा।
बयान किया गया है कि एक नौजवान मौत और ज़िन्दगी के दर्मियान था और उसका दम नहीं निकल रहा था यह देख कर लोगों ने रसूल अल्लाह (स.) को ख़बर दी आप उसके पास तशरीफ़ लाए और उससे फ़रमायाः औकि कलमा पढ़ो लेकिन वोह कलमा नहीं पड़ सका जब रसूले ख़ुदा (स.) ने यह देखा तो कहा कि इस की माँ को बुलाओ लोगों ने कहा कि या रसूल अल्लाह (स.) वोह यह बैठी हुई है तो आप ने उसकी माँ से फ़रमायाः तुम क्या अपने बैटे से नाराज़ हो तो उसने कहा कि हाँ मैं इन से नाराज़ हूँ। आप ने फ़रमायाः इसको माफ़ कर दो और इस से राज़ी हो जाओ उसने जवाब दिया या रसूल अल्लाह (स.) आप के हुक्म को मानते हुऐ मैं इसको माफ़ करती हूँ और मैं इस से राज़ी हो गई माँ की रज़ा मन्दी से उसकी रूह निकल गई और उस जवान को मौत की सख़्ती से निजात मिल गई।




हज़रत यूसुफ़ (अ.) की नस्ल पैग़म्बरी से क्यों मेहरूम रह गईः-
इब्ने इब्राहीम बयान करते हैं कि हज़रत यूसुफ़ की क़मीज़ हज़रत याक़ूब (अ.) के चेहरे पर डालने और उन की आखों का नूर आने के बाद आप अपने बैटों को लेकर हज़रत यूसुफ़ से मुलाक़ात करने की वजह से मिस्र पहुंचे उस वक़्त हज़रत यूसुफ़ शाही ठाठ बाट में बादशाह वाले कपड़े पहने हुऐ अपने तख़्त पर बैठे हुऐ थे ताकि बाप उन को शाही लिबास में तख़्त पर बैठा हुआ देखें और अपने बैटे की शान व शौकत देख कर ख़ुश हों और उन के पास पहुंच कर बहुत अदब और अहतेराम से सलाम करें वोह क़रीब पहुंच कर अल्लाह का शुक्र अदा करने के लिये सज्दे के लिये झुक गऐ लेकिन हज़रत यूसुफ़ बाप की ताज़ीम को न उठे तो हज़रत जिब्राईल नाज़िल हुऐ और फ़रमाया ऐ यूसुफ़ अपना हाथ उठाओ जैसे ही हज़रत यूसुफ़ ने अपने हाथ को उठाया उन के हाथ से एक नूर निकला और ग़ायब हो गया यह देख कर हज़रत यूसुफ़ ने जिब्राईल से मालूम किया कि यह केसा नूर था जिब्राईल ने फ़रमायाः ऐ यूसुफ़ यह नूरे पैग़म्बरी थी जो तुम्हारी नस्ल से ले लिया गया इस लिये कि तुम ने अपने बाप की ताज़ीम में कोताही की है, बाप की ताज़ीम न करने की वजह से हज़रत यूसुफ़ की नस्ल को पैग़म्बरी से मेहरूम कर दिया गया।



असहाबे कैफ़ और अज़मते वालिदैनः-
ज़िक्र किया गया है कि असहाबे कैफ़ जब नींद से उठे तो बहुत से बादशाहों का ज़माना गुज़र चुका था अपने को बाहर निकालने की कोशिश में उन में से हर एक अपनी अपनी नेकियों का हवाला दे कर दरवाज़ा खोलने की दुआ कर रहा था उन में से एक ने इस तरह से दुआ की पालने वाले मेरे माँ बाप बहुत बूढ़े थे एक रोज़ मैं उन के लिये दूध ले कर गया तो उन को सोता हुआ पाया तो उन को तकलीफ़ न देने की वजह से उन को न जगाया और उन के जागने के इंतेज़ार में रात भर दरवाज़े पर खड़ा रहा और अपनी बकरियों की बरबादी का भी कुछ ख़याल न किया ऐ ख़ुदा अगर मेरा यह अमल तेरी बारगाह में क़बूल है तो दरवाज़ा खोल दे उसी वक़्त दरवाज़ा खुल गया और ग़ार (ग़ुफ़ा) में रौशनी फैल गई।




माँ बाप और औलाद के हुक़ूक़ः-
इमाम जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैः कि अपनी औलाद को सात साल तक तरबीयत करो और अपने साथ रखो और उन को अच्छे बुरे की तमीज़ सिखाओ और उनको नेक रास्ते दिखाओ और अगर ऐसा न कर सको तो उन से अच्छाई की उम्मीद रखना बेकार है।
हज़रत अली अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैः कि बच्चों को सात साल तक अपने पास रख कर खूब खिलाओ पिलाओ और उसके बाद सात साल तक अच्छी तरह उन की तरबीयत करो 23 साल से 30 साल तक उन की अक़्ल पूरी तौर पर एक जगह हो जाऐगी उसके बाद की उम्र तजुर्बों में गुज़र जाऐगी फिर फ़रमाते हैं कि लड़के की उम्र के सात साल खैल कूद में और सात साल पढ़ाई लिखाई में और सात साल हलाल और हराम को जानने में गुज़र जाऐंगे।
रसूले ख़ुदा (स.) ने इरशाद फ़रमायाः कि एक शख़्स ने आप से मालूम किया माँ बाप पर औलाद के क्या हक़ हैं आप ने फ़रमाया कि उन के अच्छे नाम रखो और उन की खूब अच्छी तरह से तरबीयत करो, और फ़रमाया ख़ुदा उन वालिदैन पर रेहमत करे जो अपनी औलाद को नेक और दीन दार बनाते हैं। फिर फ़रमाया कि माँ बाप पर औलाद का यह हक़ है कि अगर लड़का है तो उसे अख़लाक़ और तेहज़ीब और अच्छा बरताओ करना सिखाऐं और उसका अच्छा नाम रखें और क़ुरआन की तालीम दें और अगर लड़की है तो उसे प्यार मौहब्बत से पालो और बहुत अच्छा नाम रखो और उसे सूर-ए-नूर पढ़ाओ मगर सूर-ए-यूयुफ़ मत पढ़ाओ और जो शख़्स अपने बच्चों को चूमता है (यानी प्यार करता है) ख़ुदा उस के आमाल में एक नेकी लिखता है और जो अपने बच्चों को ख़ुश रखता है ख़ुदा वन्दे आलम उसे क़याम में ख़ुश रखेगा और जो शख़्स उसे क़ुरआन पढ़ाऐगा क़यामत के दिन ख़ुदा उसे नूराई लिबास पहनाऐगा जिस से जन्नत वालों का चेहरा जगमगा जाऐगा।
फिर फ़रमाते हैं कि वालिदैन को चाहिये कि जब वोह बाज़ार जाऐं तो अपने बच्चों के लिये कोई तोहफ़ा ज़रूर लाऐं वोह क़यामत के दिन ऐसे लोगों में शामिल होंगे जो मोहताजों को सदक़ा देते हैं मगर लड़कों से पहले लड़कियों को दें। फिर फ़रमाते हैं कि जो शख़्स अपनी औलाद में लड़कियों को ख़ुश रखेगा वोह इस तरह की उसने जैसे हज़रत इसमाईल की एक औलाद को आज़ाद कर दिया है, फिर फ़रमाते हैं कि जब बच्चा एक साल का हो जाये तो उसे अलग बिस्तर पर सुलाओ फिर फ़रमाते हैं कि औलाद जिगर का टुकड़ा होती है जब बच्चे होते हैं तो हुकूमत करते हैं और जब बड़े हो जाते हैं तो दुश्मन बन जाते हैं और मर जाते हैं तो उम्र भर का ग़म दे जाते हैं, फिर फ़रमाते हैं कि जब तुम्हारे बच्चे दस साल के हो जायें तो उन्हें नमाज़ सिखाओ बल्कि नौ साल की उम्र में ही मार पीट कर नमाज़ सिखाओ मगर तीन बार से ज़्यादा मत मारना फ़रमाते हैं कि बच्चों का माँ बाप पर यह हक़ है कि उन का अच्छा नाम रखें उन की सही उम्र में शादी करें।
माँ बाप की इताअत अल्लाह की सबसे बड़ी इबादत है। माँ को प्यार से देखने से बड़ा सवाब मिलता है और औलाद के माँ बाप पर 84 हक हैं।
माँ की ममता एक बच्चे की ज़िन्दगी में उस बच्चे का विरसा होती है। माँ की ममता वो बुनियाद का पत्थर होती है जिस पर एक बच्चे के मुसतक़बिल की ईमारत खड़ी होती है । बच्चे की ज़िन्दगी का पहला अहसास ही माँ की ममता होती है । उसका माँ से सिर्फ़ पैदाऐशी ही नही बल्कि सासों का रिशता भी होता है । पहली साँस वो माँ की कोख में जब लेता है तभी से उसकी ज़िन्दगी की डोर माँ से बंध जाती है । माँ बच्चे की ज़िन्दगी की मुकम्मल कामयाबी का मरकज़ होती है।
जैसे बच्चा अपने माँ बाप के लिये सहारा बनता है वैसे ही माँ बच्चे के लिए प्यार की, सुख की वो छाँव होती है जिसके नीचे बच्चा ख़ुद को मेहफ़ूज़ महसूस करता है । सारे जहान के दुख तकलीफ एक पल में हवा बन कर उड़ जाते हैं जैसे ही बच्चा माँ की गोद में सिर रखता है ।माँ अल्लाह का बनाया वो तोहफा है जिसे उसने हर इंसान को दिया है।
मां बाप हैं अल्लाह की बख्शी हुई नेमत
मिल जाएं जो पीरी में तो मिल सकती है जन्नत
लाज़िम है ये हम पर कि करें उन की इताअत
जो हुक्म दें हम को वो बजा लाएं उसी वक्त
हम को वो कभी डांट दें हम सर को झुका लें
नज़रें हों झुकी और चेहरे पे नदामत
खि़दमत में कमी उन की कभी होने न पाए
है दोनों जहां में यही मिफ़्ताहे सआदत
भूले से भी दिल उन का कभी दुखने न पाए
दिल उन का दुखाया तो समझ लो कि है आफ़त
मां बाप को रखोगे हमा वक्त अगर ख़ुश
अल्लाह भी ख़ुश होगा, संवर जाएगी क़िस्मत
दूसरे मज़हबों की तरह इस्लाम में भी अल्लाह के बाद अगर किसी की इज्ज़त की बात की गयी है तो वोह हैं वालदैन (माँ बाप) बावजूद इन सबके यह बुढ़ापे का अकेलापन, सोचने पे मजबूर करता है कि हम कहा जा रहे हैं?
एक शख़्स कामयाबी की सीढियां चढ़ता हुआ कामयाबी की मंज़िल पर पहुंचा जब बहुत ऊंचाई पे पहुँच गया, तो उसको एक दिन अपनी माँ का ख़याल आया। उसने सोचा चलो माँ से पूछते हैं उसको क्या चहिये?उस शख़्स ने माँ से पुछा,ऐ माँ तूने मेरे लिए बहुत क़ुरबानियां दीं,मुझे बड़ी मुहब्बत दी,में तुम्हारा क़र्ज़ उतारना चाहता हूँ।
माँ ने हैरत से बेटे को देखा और कहा तू ऐसा क्यों सोंचता है?तेरी परवरिश तो मेरा फ़र्ज़ था और बेटा माँ का क़र्ज़ तो ऐसा है कि अगर चाहो तो भी उतारा नहीं जा सकता।
बेटे की जिद पे एक दिन माँ ने कहा ठीक है अगर तू यही चाहता है तो आज मेरे साथ जैसे बचपन में सोया करता था आज भी सो जा। बेटा ख़ुशी से तैयार हो गया।
जब बेटा सो गया तो माँ ने एक ग्लास पानी बिस्तर पे डाल दिया,बेटे ने करवट बदली और फिर सो गया,एक घंटे बाद माँ ने उस तरफ भी पानी डाल दिया। अब बेटे को गुस्सा आ गया,बोला माँ तुम यह कैसे सोच सकती हो की मैं इस गीले बिस्तर पे तुम्हारे साथ सो सकूं?
माँ ने कहा बेटा बात तो तुम्हारी सही है, लेकिन जब तू छोटा सा था तो रात भर बिस्तर गीला करता था और मैं तुझे सूखे में सुला के खुद गीले में सो जाया करती थी। तू 2 घंटे भी नहीं सो पाया?
बेटा अगर तू मेरा क़र्ज़ उतारना चाहता है ना,तो केवल एक रात भी इस गीले बिस्तर पे सो सका तो मैं समझूंगी तूने मेरा क़र्ज़ उतार दिया।
मेरी नज़र में माँ बाप की मुहब्बत का दर्जा सबसे ऊपर है। मैंने ज़्यादा माँ बाप को बुढ़ापे में अकेले पन में ही जीते देखा है। जबकि वही माँ बाप जवानी में औलाद के लिए जिया करते थे,जहां औलाद का मुसतक़बिल अच्छा हो वहीं रहा करते थे
माँ मुहब्बत की सबसे बेहतर मिसाल है।
मौत की आगोश में जब थक के सो जाती हैं माँ
तब कही जाकर सुकू थोडा सा पा जाती हैं माँ
फ़िक्र में बच्चों की कुछ इस तरह घुल जाती है माँ।
नौजवान होते हुए बूढी नज़र आती है माँ॥
रूह के रिश्ते की ये गहराईयां तो देखिये।
चोट लगती है हमें और चिल्लाती है माँ॥
कब ज़रुरत हो मेरे बच्चों को इतना सोच कर।
जागती रहती हैं आखें और सो जाती है माँ॥
हुदीयों का रस पिला कर अपने दिल के चैन को।
कितनी ही रातों में खाली पेट सो जाती है माँ॥
जाने कितनी बर्फ़ सी रातों मे ऎसा भी हुआ।
बच्चा तो छाती पे है गीले में सो जाति है माँ॥
जब खिलौने को मचलता है कोई गुअल्लाहत का फूल।
आंसूओं के साज़ पर बच्चे को बहलाती है माँ॥
फ़िक्र के शमशान में आखिर चिताओं की तरह।
जैसी सूखी लकडीयां, इस तरह जल जाती है माँ॥
अपने आंचल से गुलाबी आंसुओं को पोंछ कर।
देर तक गुअल्लाहत पे अपने अश्क बरसाती है माँ॥
सामने बच्चों के खुश रहती है हर इक हाल में।
रात को छुप छुप के अश्क बरसाती है माँ॥
पहले बच्चों को खिलाती है सकूं-औ-चैन से।
बाद मे जो कुछ बचा हो शौक से खाती है माँ॥
माँगती ही कुछ नहीं अपने लिए अल्लाह से।
अपने बच्चों के लिए दामन को फ़ैलाती है माँ॥
गर जवाँ बेटी हो घर में और कोई रिश्ता न हो।
इक नए एहसास की सूलि पे चढ़ जाती है माँ॥
हर इबादत हर मोहब्बत में नहीं है इक ग़र्ज।
बे-ग़र्ज़, बे-लूस, हर खिदमत को कर जाति है माँ॥
बाज़ूओं में खींच के आ जाएगी जैसे कायनात।
अपने बच्चे के लिये बाहों को फैलाती है माँ॥
ज़िन्दगी के सफ़र में गर्दिशों की धूप में।
जब कोई साया नहीं मिलता तो याद आती है माँ॥
प्यार कहते हैं किसे और ममता क्या चीज़ है।
कोई उन बच्चों से पूछे जिनकी मर जाती है माँ॥
सफ़ा-ए-हस्ती पे लिखती है ऊसूल-ए-ज़िन्दगी।
इस लिये एक मक्ताब-ए-इस्लाम कहलाती है माँ॥
इस नई दुनिया को दिये मासूम रहबर इस लिये।
अज़्मतों में सानी-ए-कुरान कहलाती है माँ॥
घर से जब परदेस जाता है कोई नूर-ए-नज़र।
हाथ में कुरान ले कर दर पे आ जाती है माँ॥
दे कर बच्चे को ज़मानत में रज़ा-ए-पाक की।
पीछे पीछे सर झुकाए दूर तक जाती है माँ॥
कांपती आवाज़ से कहती है “बेटा अलविदा”।
सामने जब तक रहे हाथों को लहराती है माँ॥
जब परेशानी में घिर जाते हैं हम कभी परदेस में।
आंसुओं को पोछने ख्वाबों में आ जाती है माँ॥
देर हो जाती है घर आने में अक्सर जब हमें।
रेत पर मचले हो जैसे ऐसे घबराती है माँ॥
मरते दम तक आ सका बच्चा न गर परदेस से।
अपनी दोनों पुतलीयां चौखट पे रख जाती है माँ॥
रज़ा सिरसिवी
प्रतिक्रियाएँ: 

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  1. प्रभावशाली ,
    जारी रहें।

    शुभकामना !!!

    आर्यावर्त

    आर्यावर्त में समाचार और आलेख प्रकाशन के लिए सीधे संपादक को editor.aaryaavart@gmail.com पर मेल करें।

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  2. Bahut sahi farmia hai raja sirsiwi sahab.sabhi logoan ko padna chahie.

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