अज़ान व इक़ामत

हर मर्द और औरत के लिए मुस्तहब है कि रोज़ाना की वाजिब नमाज़ों से पहले अज़ान व इक़ामत कहे। इनके अलावा दूसरी वाजिब और मुस्तहब नमाज़ों स...


हर मर्द और औरत के लिए मुस्तहब है कि रोज़ाना की वाजिब नमाज़ों से पहले अज़ान व इक़ामत कहे। इनके अलावा दूसरी वाजिब और मुस्तहब नमाज़ों से पहले अज़ान व इक़ामत कहना मशरूअ नही है। लेकिन अगर ईदे फ़ित्र और ईदे क़ुरबान की नमाज़ जमाअत के साथ पढ़ी जा रही हो तो मुस्तहब है कि नमाज़ से पहले तीन बार अस्सलात कहे।
मुस्तहब है कि बच्चे की पैदाइश के पहले दिन या नाफ़ उखड़ने से पहले उसके दाहिने कान में अज़ान और बायें कान में इक़ामत कही जाये।

अज़ान

अल्लाहु अकबर,
अल्लाहु अकबर,
अल्लाहु अकबर,
अल्लाहु अकबर,
अशहदु अन ला इलाहा इल्लल्लाह,
अशहदु अन ला इलाहा इल्लल्लाह,
अशहदु अन्ना मुहम्मदर रसूलुल्लाह,
अशहदु अन्ना मुहम्मदर रसूलुल्लाह,
हय्या अलस्सलात,
हय्या अलस्सलात,
हय्या अलल फ़लाह,
हय्या अलल फ़लाह,
हय्या अला ख़ैरिल अमल,
हय्या अला ख़ैरिल अमल,
अल्लाहु अकबर,
अल्लाहु अकबर,
ला लाहा इल्लल्लाह,
ला लाहा इल्लल्लाह, 
 

 इक़ामत


अल्लाहु अकबर,
अल्लाहु अकबर,
अशहदु अन ला इलाहा इल्लल्लाह,
अशहदु अन ला इलाहा इल्लल्लाह,
अशहदु अन्ना मुहम्मदर रसूलुल्लाह,
अशहदु अन्ना मुहम्मदर रसूलुल्लाह,
हय्या अलस्सलात,
हय्या अलस्सलात,
हय्या अलल फ़लाह,
हय्या अलल फ़लाह,
हय्या अला ख़ैरिल अमल,
हय्या अला ख़ैरिल अमल, 
क़द क़ा-मतिस्सलात,
क़द क़ा-मतिस्सलात,
अल्लाहु अकबर,
अल्लाहु अकबर
ला इलाहा इल्लल्लाह,
929. ज़रूरी है कि अज़ान व इक़ामत के जुमलों के बीच ज़्यादा फ़ासला न दिया जाये, अगर उनके जुमलों के बीच मामूल से ज़्यादा फ़ासला दे दिया जाये, तो ज़रूरी है कि अज़ान व इक़ामत दोबारा पढ़ी जाये।
930. अगर अज़ान व इक़ामत में आवाज़ को गले में इस तरह घुमाये कि ग़िना हो जाये, यानी अज़ान व क़ामत इस तरह कहे जैसे गाने बजाने और खेल कूद की महफ़िलों में आवाज़ निकालने का रिवाज है, तो यह हराम है और अगर ग़िना न हो तो मकरूह है।
931. जब दो नमाज़ों को मिलाकर पढा जा रहा हो तो अगर पहली नमाज़ के लिए अज़ान कही हो तो बाद वाली नमाज़ के लिए अज़ान साक़ित है। चाहे दो नमाज़ों को मिलाकर पढ़ना बेहतर हो या न हो, मसलन अर्फ़े के दिन (नवीं ज़िलहिज) ज़ोह्र व अस्र की नमाज़ों को मिला कर पढ़ना और ईदे क़ुरबान की रात में मग़रिब व इशा की नमाज़ को मिला कर पढ़ना उस इंसान के लिए जो मशअरिल हराम में मौजूद हो इन सूरतों में अज़ान के साक़ित होने के लिए शर्त है कि दोनों नमाज़ों के बीच कोई फ़ासला न हो या फ़ासला बहुत कम हो, लेकिन नमाज़े नाफ़िला और ताक़ीबात से कोई फ़र्क़ नही पड़ता। एहतियाते वाजिब यह है कि इन सूरतों में अज़ान मशरूइय्यत की नियत से न कही जाये, बल्कि आख़िरी दो सूरतों में अज़ान कहना मुनासिब नही है, चाहे वह मशरूइय्यत की नियत से भी न हो।
932. अगर नमाज़े जमाअत के लिए अज़ान व इक़ामत कही जा चुकी हो तो जो इंसान जमाअत के साथ नमाज़ पढ़ रहा हो, उसके लिए ज़रूरी नही है कि वह अपनी नमाज़ के लिए अज़ान व इक़ामत कहे ।
933. अगर कोई इंसान नमाज़ के लिए मस्जिद में जाये और देखे कि नमाज़े जमाअत ख़त्म हो चुकी है तो जब तक सफ़े टूट न जाये और लोग इधर उधर न हो जाये वह अपनी नमाज़ के लिए अज़ान व इक़ामत न कहे यानी इन दोनों का कहना इमुस्तहबे ताकीदी नही है। बल्कि अगर वह अज़ान कहना चाहे तो बेहतर यह है कि बहुत आहिस्ता कहे और अगर दूसरी नमाज़े जमाअत क़ायम करना चाहता हो तो हर गिज़ अज़ान व इक़ामत न कहे।
934. जिस जगह पर कोई नमाज़े जमाअत ताज़ा ख़त्म हुई हो, अगर वहाँ पर कोई इंसान सफ़ें टूटने और लोगों के इधर उधर होने से पहले, अपनी फुरादा नमाज़ पढ़ना चाहे या किसी दूसरी ऐसी नमाज़े जमाअत में शरीक होना चाहे जो अभी बरपा हो रही हो, तो उससे इन छः शर्तों के साथ अज़ान व इक़ामत साक़ित है।
  1. नमाज़े जमाअत मस्जिद में हो। अगर मस्जिद में न हो तो अजद़ान व क़ामत का साक़ित होना मालूम नही।
  2. उस नमाज़ के लिए अज़ान व इक़ामत कही जा चुकी हो।
  3. नमाज़े जमाअत बातिल न हो।
  4. उस इंसान की नमाज़ और नमाज़े जमात एक ही जगह पर हो। लिहाज़ा अगर नमाज़े जमाअत मस्जिद के अन्दर पढ़ी जाये और वह इंसान फ़ुरादा नमाज़ मस्जिद की छत पर पढ़ना चाहे तो मुस्तहब है कि वह अज़ान व इक़ामत कहे।
  5. नमाज़े जमाअत अदा हो। लेकिन यह शर्त नही है कि ख़ुद उसकी नमाज़ भी अदा हो।
  6. उस इंसान की नमाज़ और नमाज़े जमाअत का वक़्त मुशतरक हो मसलन दोनों नमाज़े ज़ोह्र या नमाज़े अस्र पढ़ें। या नमाज़े ज़ोह्र जमाअत से पढ़ी जा रही हो और वह नमाज़े अस्र पढ़े या वह नमाज़े ज़ोह्र पढ़े और जमाअत की नमाज़, नमाज़े अस्र हो, लेकिन अगर नमाज़े जमाअत अस्र की हो और वह आखिरी वक़्त में चाहे कि नमाज़े मगरिब अदा पढ़े तो उससे अज़ान व इक़ामत साक़ित नही होगी।
935. जो शर्तें इससे पहले मस्अले में बयान की गई हैं अगर कोई इंसान उनमें से तीसरी शर्त के बारे में शक करे यानी उसे शक हो कि नमाज़े जमाअत सही थी या नही तो उससे अज़ान व इक़ामत साक़ित है। लेकिन अगर इसके अलावा बाक़ी पाँच शर्तों के बारे में शक करे तो बेहतर है कि रजा–ए- मतलूबियत की नियत से अज़ान व इक़ामत कहे।
936. अगर कोई इंसान किसी दूसरे की अज़ान जो एलान या जमाअत की नमाज़ के लिए कही जाए सुने तो मुस्तहब है कि उसका जो हिस्सा सुने उसे ख़ुद भी आहिस्ता आहिस्ता दोहराए।
937. अगर किसी इंसान ने किसी दूसरे् की अज़ान व इक़ामत सुनी हो तो चाहे वह ुसने उन जुमलो को दोहराया हो या न दोहराया हो तो अगर अज़ान व इक़ामत और ुस नमाज़ के बीच जो वह पढ़ना चाहता है ज़्यादा फ़ासिला न हुआ हो तो वह अपनी नमाज़ के लिए अज़ान व इक़ामत कह सकता है।
938. अगर कोई मर्द औरत की ्ज़ान को लज़्ज़त के क़स्द से सुने तो उसकी अज़ान साक़ित नही होगी, बल्कि ्गर मर्द का िरादा लज़्ज़त हासिल करना न भी हो तब भी उसकी अज़ान साक़ित होना मुशकिल है।
939. ज़रूरी है कि नमाज़े जमाअत की अज़ान व िक़ामत मर्द कहे, लेकिन औरतों की नमाज़े जमाअत में अगर औरत अज़ान व इक़ामत कहे तो काफ़ी है।
940. ज़रूरी है कि इक़ामत अज़ान के बाद कही जाये, िसके अलावा इक़ामत में यह भी मोतबर है कि खड़े हो कर और हदस से पाक हो कर (यानी वुज़ू या ग़ुस्ल या तयम्मुम की हालत में) कही जाये।
941. अगर कोई िंसान अज़ान व इक़ामत के जुमले तरतीब के बग़ैर कहे मसलन हय्या अलल फ़लाह को हय्या अलस्सलः से पहले कहे तो ज़रूरी है कि जहँ से तरतीब बिगड़ी हो वहाँ से दुबारा कहे।
942. ज़रूरी है कि अज़ान व िक़ामत के बीच फ़ासिला न हो और अगर उन दोनों के बीच इतना फ़ासिला हो जाये कि जो अज़ान कही जा चुकी हो, उसे उस इक़ामत की अज़ान शुमार न किया जासके तो दोबारा अज़ान कहना मुस्तहब है। इसके अलावा अगर अज़ान व इक़ामत और नमाज़ के बीच इतना फ़ासिला हो जाये कि वह अज़ान व इक़ामत उस नमाज़ की अज़ान व िक़ामत न कही जा सके तो उस नमाज़ के लिए दोबारा अज़ान व इक़ामत कहना मुस्तहब है।
943. अज़ान व िक़ामत का सही अर्बी में कहना ज़रूरी है। लिहाज़ा अगर कोई िंसान ुन्हें ग़लत अरबी में कहे या एक हर्फ़ की जगह कोई दूसरा हर्फ़ कहे या इउनका तर्जमा उर्दू या हिन्दी में कहे सही नही है।
944. ज़रूरी है कि अज़ान व इक़ामत को नमाज़ का वक़्त दाख़िल हो जाने के बाद कहा जाये। अगर कोई िंसान जान बूझ कर या भूल चूक की बिना पर अज़ान व िक़ामत को वक़्त से पहले कहे तो बातिल है। लेकिन अगर ऐसी सूरत हो कि वक़्त नमाज़ के दरमियान दाख़िल हो तो वह नमाज़ सही होगी, इसको मसला न. 752 में बयान किया जा चुका है।
945. अगर कोई िंसान इक़ामत कहने से पहले शक करे कि अज़ान कही है या नही तो ज़रूरी है कि पहले अज़ान कहे और ्गर इक़ामत कहने में मशग़ूल हो जाए और शक करे कि अज़ान कही है या नही तो अज़ान कहना ज़रूरी नही है।
946. अगर अज़ान व इक़ामत कहते वक़्त कोई शक करे कि इससे पहला जुमला कहा है या नही तो जिस जुमले के बारे में उसे शक हो वह जुमला कहे , लेकिन अगर उसे अज़ान व इक़ामत का कोई जुमला कहते हुए शक हो कि उसने इससे पहले वाला जुमला कहा है या नही तो उस जुमले का कहना ज़रूरी नही है।
947. अज़ान कहते वक़्त मुस्तहब है कि इं्सान वुज़ू से हो, किबला रुख़ खड़ा हो, दोनों हाथों को कानों पर रखे और ूँची आवाज़ में अज़ान कहे, दो जुमलों के बीच थोड़ा फ़ासिला रखे और दो जुमलों के बीच बाते न करे।
948. इक़ामत कहते वक़्त मुस्तहब है कि इंसान का बदन साकिन हो और इक़ामत को अज़ान के मुक़ाबले में आहिस्ता कहा जाये और उसके दो जुमलों को स में न मिलाया जाये। लेकिन दो जुमलों के बीच फ़ासिला नही देना चाहिए जितना अज़ान के जुमलों के बीच दिया जाता है।
949. अज़ान कहने के बाद और इक़ामत कहने से पहले एक क़दम आगे बढ़ना या थोड़ी देर के लिए बैठना या सजदा करना या अल्लाह का ज़िक्र करना या दुआ पढ़ना या थोड़ी देर के लिए साकित हो जाना या कोई बात कहना या दो रकत नमाज़ पढ़ना मुस्तहब है। लेकिन सुबह की अज़ान व इक़ामत के बीच कलाम करना और नमाज़े मग़रिब की अज़ान व िक़ामत के बीच दो रकत नमाज़ पढ़ना मुस्तहब नही है।
950. मुस्तहब है कि जिस इंसान को अज़ान देने पर मुक़र्रर (नियुक्त) किया जाये वह आदिल और वक़्त की पहचान रखने वाला हो यह भी मुस्तहब है कि वह उँची जगह खड़ा हो कर बलन्द आवाज़ में अज़ान कहे।
























































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