नहजुल बलाग़ा ख़ुत्बा 91-94

खुत्बा-91 ऐ लोगों ! मैं ने फित्ना व शर (उपद्रव व दुष्कृत्य) की आख़ें फोड़ डाली हैं और जब उस की तारीकियां (अंधकार) मौज़ो की तरह (लहरों के समा...

खुत्बा-91

ऐ लोगों ! मैं ने फित्ना व शर (उपद्रव व दुष्कृत्य) की आख़ें फोड़ डाली हैं और जब उस की तारीकियां (अंधकार) मौज़ो की तरह (लहरों के समान) तहो बाला (नीचे ऊपर) हो रही थीं और दीवाने कुत्तों की तरह उस की दीवांगी (पागलपन) ज़ोरों पर थी, तो मेरे अलावा किसी एक में जुरअत न थी कि वह उस की तरफ़ बढ़ता। अब, मौक़ा है, (अवसर है) जो चाहो मुझ से पूछ लो पेशतर इस के (इस से पहले) कि मुझे न पाओ। उस ज़ात (ख़ुदा) की क़सम ! जिस के क़ब्ज़ए क़ुद्रत में मेरी जान है, तुम उस वक्त से ले कर क़ियामत (प्रलय) तक दरमिलानी अरसे (मध्यान्तर) की जो बात मुझ से पूछोगे, मैं बताऊंगा। और किसी ऐसे गुरोह के मुतअल्लिक़ दर्याफ़्त करोगे कि जिस ने सौ को हिदायत (मार्गदर्शन) की हो और सौ को गुमराह (पथभ्रष्ट) किया हो तो मैं उस के ललकारने वाले और उसे आगे से खींचने वाले और पीछे से ढ़केलने वाले और उस की सवारियों की मंज़िल और उस के साज़ो सामान से लदे हुए पालानों (काठियों) के उतरने की जगह तक बता दूंगा। और यह कि कौन उन में क़त्ल किया जायेगा, और कौन अपनी मौत मरेगा। और जब मैं न रहूंगा और न खुशगवार चीज़ें (अप्रिय वस्तुयें) और सख़्त मुशकिलें पेश आयेंगी तो, देख लेना, कि बहुत से पूछने वाले परीशानी से सर नीचे डाल देंगे, और बताने वाले आजिज़ व दरमांदा (असमर्थ एवं विवश) हो जायेंगे। यह उस वक्त होगा कि जब तुम पर लड़ाइयां (युद्ध) ज़ोर से टूट पड़ेंगी और उस की सख़्तियां नुमायां (कठिनाइयां प्रकट) हो जायेंगी, और दुनिया इस तरह तुम पर तंग हो जायेगी कि मुसीबतों के दिनों को तुम यह समझने लगोगे कि वह बढ़ते ही जा रहे हैं। यहां तक कि ख़ुदावन्द तुम्हारे बाक़ीमांदा (बचे कुचे) लोगों को फ़त्हो कामरानी (विजय एवं सफ़लता) देगा। फ़ित्नों (उपद्रवों) की यह सूरत (आकृति) होती है कि जब वह आते हैं, तो इस तरह अंधेरे में डाल देते हैं कि हक़ व बातिल (सत्य व असत्य) का इमतियाज़ (पहचान) नहीं होता और पलटते हैं तो होशियार (सतर्क) कर के जाते हैं। जब आते हैं तो शनाख्त (पहचान) नहीं होती, पीछे हटते हैं तो पहचाने जाते हैं। वह हवाओं की तरह चक्कर लगाते हैं, किसी शहर को अपनी ज़द (परिधि, निशाने) पर रख लेते हैं और कोई उन से रह जाता है। मेरे नज़दीक सब फ़ित्नों (उपद्रवों) से ज़ियादा ख़ौफ़नाक (अधिक भयावह) तुम्हारे लिये बनी उमैया का फ़ित्ना है, जिसे न ख़ुद क़ुछ नज़र आता है और न उस में कोई चीज़ सुझाई देती है। इस के असरात तो सब को शामिल (सम्मिलित) हैं, लेकिन ख़ुसूसीयत (विशेष रूप) से इस की आफ़तें (आपत्तियां) ख़ास ही अफ़राद (विशेष व्यक्तियों) के लिये हैं। जो उस में हक़ (धर्म) को पेशे नज़र (दृष्टिगत) रखेगा उस पर मुसीबतें आयेंगी, और जो आंखें बन्द रखेगा वह उन से बचा रहेगा। ख़ुदा की क़सम ! मेरे बाद तुम बनी उमैया को अपने लिये बद तरीन हुक्मरान (शासक) पाओगे। वह तो उस बूढ़ी और सरकश (अवज्ञाकारी) ऊंटनी के मानिन्द (समान) है जो मुंह से काटती हो और इधर उधर हाथ पैर मारती हो और वह दुहने वाले पर टांगें चलाती हो, और दूध देने से इन्कार कर देती हो। वह बराबर तुम्हारा क़लाक़मा करते रहेंगे यहां तक कि सिर्फ़ उसे छोड़ेंगे जो उन के मुफ़ीदे मतलब (उद्देश्य हेतु लाभप्रद) हो या कम से कम उन के लिये नुक़सान रसां (हानिकारक) न हो। और उन की मुसीबत इसी तरह घेरे रहेगी कि उन से दाद ख्वाही (न्याय पाना) ऐसी ही मुश्किल हो जायेगी कि जिस से डर लगने लगेगा और ज़मानए जाहिलीयत (इसलाम पूर्व) की मुख़तलिफ़ हालतों (विभिन्न स्थितियों) को लिये होगा। न उस में हिदायत के मीनार नस्ब (स्थापित) होंगे और न रास्ता दिखाने वाला कोई निशान नज़र आयेगा। हम (अहले बैते रसूल (अ.स.) इन फ़ितना अंगेज़ियों के गुनाह से बचे होंगे और उन की तरफ़ लोगों को बुलाने में हमारा कोई हिस्सा (योगदान) न होगा। फिर एक दिन वह आयेगा कि अल्लाह उस शख़्स के ज़रिए जो उन्हें ज़िल्लत (अपमान) का मज़ा चखाए और सख़्ती से हंकाए और मौत के तल्ख़ जाम (कड़वे घूंट) पिलाए और उन के सामने तलवार रखे और ख़ौफ़ (भय) उन्हें चिमटा दे। इन फ़ित्नों से इस तरह अलायहदा कर देगा जिस तरह ज़बीहा से खाल अलग की जाती है। उस वक्त कुरैश दुनिया व माफ़ीहा के बदले में यह चाहेंगे कि वह मुझे सिर्फ़ इतनी देर कि जितनी ऊंट के ज़ब्ह होने में लगती है कहीं एक दफ़ा न देख लें ताकि में उस चीज़ को क़बूल कर लूं कि जिस का आज कुछ हिस्सा भी तलब करने के बावजूद देने के लिये तैयार नहीं होते।

अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) ने यह ख़ुत्बा जंगे नह्रवान के बाद इर्शाद फ़रमाया। इम में फ़ित्ने से मुराद वह जंगें हैं जो बसरा, सिफ्फ़ीन और नह्रवान में लड़ी गईं। चूंकि उन की नौईयत (पद्धति) पैग़मबर (स.) की जंग़ों से जुदागाना (पृथक) थी, क्योंकि वहां मद्दे मुक़ाबिल (प्रतिद्वन्द्वी) क़ुफ्फ़ार होते थे, और यहां मुक़ाबिला उन लोगों से था जो चेह्रों पर इसलाम की नक़ाब डाले हुए थे, इसलिये लोग अहले क़िब्ला (काबा को अपना क़िब्ला मानने वालों) से जंग करने के लिये मुतरद्दिद (चिन्तित) थे और यहां कहते थे कि जो लोग अज़ानें देते हैं, नमाज़ें पढ़ते हैं उन से क़िताल (युद्ध) कैसा ? चुनांचे ख़ुज़ैमा इब्ने साबिते अन्सारी जैसे बुज़ुर्ग उस वक्त तक सिफ्फ़ीन में शरीके जंग नहीं हुए, जब तक अम्मारे यासिर की शहादत ने शामियों का गुरोहे बाग़ी (विद्रोही) होना साबित न कर दिया। यूं ही (इसी प्रकार) बसरा में उम्मुल मोमिनीन के हमराह अशरए मुबश्शिरा में शुमार होने वाले तल्हा व ज़ुबैर ऐसे सहाबा की मौजूदगी और नेह्रवान में खवारिज की पेशानियों के घट्टे और उन की नमाज़ें और इबादतें ज़ेहनों में खलफ़िशार पैदा किये हुए थीं। इन हालात में उन के सामने शमशीर बकफ़ (हाथ में तलवार ले कर) खड़े होने की जुरअत वही कर सकता था जो उन के दिल के हाल से वाक़िफ़ (अवगत) और उन के ईमान की हक़ीक़त (वास्तविकता) से आशना (परिचित) हो। और यह अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) ही की बसीरते खास व ईमानी जुरअत का काम था। कि उन के मुक़ाबिले में उठ ख़ड़े हुए और पैग़मबर (स.) के इस इर्शाद (वचन) की तस्दीक़ (पुष्टि) फ़रमा दी, ऐ अली ! तुम मेरे बाद बैअत तोड़ने वालों (असहाबे जमल), ज़ुल्म ढ़ाने वालों (अहले शाम) और दीन से बे राह होने वालों (खवारिज) से जंग करोगे।

पैग़मबरे अकरम (स.) के बाद कोई मुतनफ्फ़िस (प्राणी, जीवधारी) अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) के अलावा यह दावा न कर सका कि जो पूछना चाहो पूछ लो। चुनांचे इब्ने हजर ने सवाइक़े मोहरिक़ा में लिखा है कि सहाबा में से कोई एक भी यह दअवा न कर सका कि जो पूछना चाहो हम से पूछ लो सिवा इब्ने अबी तालिब के। अलबत्ता सहाबा के अलावा तारीख़ में चन्द नाम ऐसे नज़र आते हैं जिन्हों ने ऐसा दअवा करने की जुरअत की जैसे इबराहीम इब्ने हिशाम, मक़ातिल इब्ने सुलैमान, क़तादह, सिब्त इब्ने जौज़ी और मोहम्मद इब्ने हदरीसे शाफ़ेई वग़ैरा। मगर इन में से हर शख़्स सवाल के मौक़े पर रुसवा (अपमानित) और अपने इस दअवे को वापस लेने पर मजबूर हुआ। यह दअवी वही कर सकता है जो हक़ायक़े आलम (संसार के यथार्थ) से वाक़िफ़ (अवगत) और मुस्तक़बिल (अविष्य) के वाक़िआत से आगाह (अवगत) हो। चुनांचे अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) वह दर कुशाए उलूमे नुबुव्वत थे जो किसी मौक़े पर किसी सवाल के जवाब से आजिज़ होते हुए नज़र आते। यहां तक कि हज़रत उमर को भी कहना पड़ता था, “मैं उस मुश्किल से अल्लाह की पनाह मांगता हूं जिस के हल करने के लिये अबुल हसन (अमीरुल मोमिनीन अ.स.) न हों। यूं ही (इसी प्रकार) मुस्तक़बिल के मुतअल्लिक़ जो पेशीन गोइयां (भविष्यवाणीयां) आप ने कीं वह हर्फ़ बहर्फ़ (अक्षरश :) पूरी हो कर आप की वुस्अते इल्मी (विशाल ज्ञान) की आईनादार (प्रत्यक्ष प्रमाण) हैं। वह बनी उमैया की तबाह कारियों के मुतअल्लिक़ हों या खवारिज की शोरिश अंगेज़ियों (उपद्रवी कृत्यों) के मुतअल्लिक़ वह तातारियों की ताख्त व ताराज के बारे में हो या जंगियों की हमला आवरयों के मुतअल्लिक़, वह बसरा की ग़र्क़ाबी के बारे में हो या कूफ़ा की तबाही के मुअल्लिक़। ग़रज़ जब यह वाक़िआत तारीखी हैसियत से मुसल्लमा हैसियत रखते हैं, तो कोई वजह नहीं कि आप के इस दअवे पर तअज्जुब किया जाए।

ख़ुत्बा-92

बा बरकत (विभूतिवाला) है वह ख़ुदा जिस की ज़ात तक बलन्द पर्वाज़ (ऊंची उड़ान वाली) हिम्मतों की रसाई (पहुंच) नहीं। और न अक़्ल व फ़हम (बुद्धि एवं विवेक) की क़ुव्वतें (शक्तियां) उसे पा सकती हैं। वह ऐसा अव्वल है कि जिस के लिये न कोई नुक़्तए इबतिदा (आरम्भिक बिन्दु) है कि वह महदूद (सीमित) हो जाए और न कोई उस का आख़िर (अन्त) है कि वहां पहुंच कर खत्म (समाप्त) हो जाए।

[ इसी ख़ुत्बे के ज़ैल (तारतम्य) में फ़रमाया ]

उस ने उन (अंबिया) को बेह्तरीन सौंपे जाने की जगहों में रखा, और बेह्तरीन ठिकानों में ठहराया। वह बलन्द मर्तबा सुल्बों (शुक्राणुओं) से शिकमों (गर्भों) में मुन्तक़िल (स्थानान्तरित) होते रहे। जब उन में से कोई गुज़र जाने वाला गुज़र गया, दुसरा दीने ख़ुदा को लेकर खड़ा हो गया। यहां तक कि यह इलाही शरफ़ मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम तक पहुंचा जिन्हें ऐसे मअदिनों (ख़ानों) से जो फलने फूलने के एतिबार से बेह्तरीन (सर्वोत्तम), और ऐसी असलों (मूलों) से जो नश्वो नुमा (उगाव एवं विकास) के लिहाज़ से बहुत बावक़ार (प्रतिष्ठित) थीं, पैदा किया। उसी शज्रे (वंशावली) से, कि जिस से अंबिया पैदा किये और जिस में से अपने अमीन (प्रतिभूति) मुन्तख़ब फ़रमाए (चयन किये)। उनकी इज़्ज़त बेह्तरीन इज़्ज़त (सर्वोत्तम प्रतिष्ठा) और क़बीला (वंश) बेह्तरीन क़बीला और शजरा (वंशावली) बेह्तरीन शजरा है। जो सर ज़मीने हरम पर उगा और बुज़ुर्गी के साये में बढ़ा। जिस की शाख़ें दराज़ (शाख़ायें लम्बी) और फल दस्तरस (पहुंच) से बाहर हैं। वह पर्हेज़गारों के इमाम, हिदायत हासिल करने वालों के लिये चश्मए बसीरत हैं। वह ऐसा चिराग़ हैं, जिस की रौशनी लौ देती है, और ऐसा रौशन सितारा जिस का नूर ज़िया पाश, और ऐसा चक़माक़ (अग्रि प्रस्तर) जिसकी ज़ौ (प्रकाश) शोला फ़िशां है। उन की सीरत (आचरण) सीधी राह पर चलना और सुन्नत हिदायत करना है। उन का कलाम हक़ो बातिल का फ़ैसला करने वाला और हुक्म ऐने अद्ल है। अल्लाह ने उन्हें उस वक्त भेजा कि जब रसूलों की आमद का सिलसिला रुका हुआ था, बद अमली फ़ैली हुई थी और उम्मतों पर ग़फ़लत छाई हुई थी। अल्लाह तुम पर रहम करे। रौशन निशानों पर जम कर अमल करो, रास्ता बिलकुल सीधा है। वह तुम्हें सलामतीयों के घर, जन्नत (स्वर्ग) की तरफ़ बुला रहा है और अभी तुम ऐसे घर में हो कि जहां तुम्हें इतनी मोहलत व फ़राग़त है कि उस की ख़ुशनूदियां हासिल कर सको। अभी मौक़ा है। चूंकि अअमाल नामे खुले हुए हैं। क़लम चल रहे हैं, बदन (शरीर) तन्दुरुस्त व तवाना (स्वस्थय व हृष्टपुष्ट) हैं। ज़बान आज़ाद है, तौबा (प्रायश्चित) सुनी जा सकती है और अअमाल क़बूल किये जा सकते हैं।

ख़ुत्बा-93

पैग़मबर (स.) को उस वक्त में भेजा कि जब लोग हैरत व परीशानी के आलम में गुम कर्दा राह (पथभ्रष्ट) थे और फ़ित्नें (उपद्रवों) में हाथ पैर मार रहे थे। नफ़्सानी ख़्वाहिशात (काम वासना) ने उन्हें भटका दिया था और भर पूर जाहिलीयत (अज्ञान) ने उन की अक़्लें (बुद्धियां) खो दी थीं, और हालात के डांवाडोल होने और जिहालत (अज्ञान) की बलाओं की वजह से हैरान व परीशान थे। चुनांचे नबी सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम ने उन्हें समझाने बुझाने का पूरा हक़ अदा किया। ख़ुद सीधे रास्ते पर जमे रहे और हिकमत व दानाई (बुद्धि एवं विवेक) और अच्छी नसीहतों (उपदेशों) की तरफ़ उन्हें बुलाते रहे।

ख़ुत्बा-94

तमाम हम्द (समस्त प्रशंसा) अल्लाह के लिये है जो अव्वल (प्रथम) है और कोई शय (वस्तु) उस से पहले नहीं, और आख़िर है और कोई चीज़ उस के बाद नहीं। वह ज़ाहिर (प्रत्यक्ष) है और कोई चीज़ उस से बालातर नहीं, और बातिन (परोक्ष) है और कोई चीज़ उस से क़रीब नहीं।

[इसी ख़ुत्बे के ज़ैल में रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम का ज़िक्र फ़रमाया ]

बुज़ुर्गी और शराफ़त (प्रतिष्ठा एवं श्रेष्ठता) के मअदिनों (खानों) और पाकीज़गी (पवित्रता) की जगहों पर उन का मक़ाम (स्थान) बेह्तरीन मक़ाम (सर्वोत्तम जन्मभूमि) है। उन की तरफ़ नेक लोगों के दिल झुका दिये गए हैं और निगाहों के रुख मोड़ दिये गए हैं। ख़ुदा ने उन की वजह से फ़ित्ने (उपद्रव) दबा दिये और अदावतों के (शत्रुता के) शोले बुझा दिये। भाइयों में उल्फ़त (स्त्रेह) पैदा की और जो कुफ़्र (नास्तिकता में) इकट्ठे थे उन्हें अलायहदा अलायहदा (पृथक पृथक) कर दिया। इस्लाम की पस्ती व ज़िल्लत (नीचता व अपमान) को इज़्ज़त (सम्मान) बख्शी (प्रदान की), और कुफ़्र की इज़्ज़त व बलन्दी को ज़लील (अपमानित) कर दिया। उन का कलाम (वचन) शरीअत का बयान और सुकूत (मौन) अहकाम (आदेशों) की ज़बान थी।

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