नहजुल बलाग़ा ख़ुत्बा-12-13

ख़ुत्बा-12 जब ख़ुदा वन्दे आलम ने आप को जमल वालों पर ग़बा अता किया (विजय प्रदान की) तो उस मौके (अवसलर) पर आप के एक सहाबी (साथी) ने आप से अर्...

ख़ुत्बा-12

जब ख़ुदा वन्दे आलम ने आप को जमल वालों पर ग़बा अता किया (विजय प्रदान की) तो उस मौके (अवसलर) पर आप के एक सहाबी (साथी) ने आप से अर्ज़ किया कि मेरे फुलां (अमुक) भाई भी यहां पर मौजूद होता तो वोह भी देखता कि अल्लाह ने आप को दुशमन पर कैसी फ़त्हो कामरानी अता फ़रमाई है, तो हज़रत ने फ़रमाया कि, क्या तुम्हारा भाई हंम को दोस्त रखता है ? उस ने कहा कि जी हाँ, तो आप ने फ़रमाया कि वोह हमारे पास मौजूद था बल्कि हमारे इस लशकर (सेना) में वोह अशखास भी मौजूद थे जो अभी मर्दों के सुल्ब (शुक्राणु) और औरतों (स्त्रियों) के शिकम (गर्भाशय) में हैं । अनकरीब (शीध्र ही) ज़माना (समय) उन्हें ज़ाहिर (प्रकट) करेगा और उन से ईमान को तकवीयत (शक्ति) पहुंचेगी ।

अगर कोई शख्स असबाबो ज़राए (साधनों) के होते हुए किसी अमले खैर (शुभ कार्य) में कोताही (शिथिलता) कर जाए, तो यह कोताही व बे इलतिफ़ाती (शिथिलता एवं अवरुचि) उस की नीयत की कमज़ोरी की आईनादीर (द्दोतक) होगी। अगर अमल (कार्य) में कोई माने (अवरोध) सद्देराह (मार्ग में बाधा) हो जाए या ज़िन्दगी वफ़ा (जीवन साथ न दे) न करे जिस की वजह से अमल तशनए तकमील (अपूर्ण) रह जाए तो उस सूरत में अल आमालो बिन्नीयात, की बिना (आधार) पर अल्लाह उसे अज्र व सवाब (पुरस्कार व पुण्य) से मेहरूम (वंचित) न करेगा। क्यों कि उसकी नियत तो बहरहाल अमल के बजा लाने की थी। लिहाज़ा किसी हद तक वह सवाब (पुण्य) का मुस्तहक (पात्र) भी होगा।
अमल (क्रिया) में तो मुमकिन (सम्बव) है कि सवाब से महरूम हो जाए इस लिए कि अमल में ज़ाहिर दारी (प्रदर्शन) व रियाकारी (मक्कारी) हो सकती है। मगर नियत तो दिल की गहराईयों में मखफ़ी गुप्त) होती है। उन में न दिखावा हो सकता है न रिया (बनावट) का शाइबा (अंश) आ सकता है। वह खुलूसो सदाकत (नि:स्वार्थता एंव सत्यता) और कमाले सेहत (पुर्ण) सत्य) की जिस पर हद (सीमा) होगी उसी हद पर रहेगी ख़्वाह (चाहे) अमल (कर्म) किसी माने (अवरोध) की वजह से नियत व इरादे की गुंजाइश न भी हो लेकिन दिल में एक वलवला एक तड़प हो तो इनंसान अपने कल्बी कैफ़ीयत की बिना पर अजरो सवाब (पुण्य एवं पुरस्कार) का मुस्तहक ठहरेगा और इसी चीज़ की तरफ़ अमीरुल मोमिनीन ने इस ख़ुतबे में इशारे फ़रमाया है। अगर तुम्हारे भाई को हम से मोहब्बत थी तो वह उन लोगों के सवाब में शरीक होगा जिन्होनें हमारी मईयत (साथ) में जाम शहादत पिया है।

ख़ुत्बा-13

[अहले बसरा (बसरा निवासियों) की मज़म्मत (निन्दा) में ]

तुम एक औरत (स्त्री) की सिपाह (सेना) में और एक चौपाए के ताबे (अधीन) थे। वह बिलबिलाया तो लब्बैक (आ गया आ गया) कहते हुए बढे और वह ज़ख्मी (आहत) हुआ तो तुम भाग खड़े हुए । तुम पस्त अख़लाक (नैतिक रुप से पतित) और अहद शिकन (प्रत्यक्ष) कुछ है और बातिन (अप्रत्यक्ष) कुछ। तुम्हारी सरज़मीन (धरती) का पानी तक शूर (खारी) है। तुम में इकामत (निवास) करने वाला गुनाहों (पापों) के जाल में जकड़ा हुआ है और तुम में से निकल जाने वाला अपने पर्वरदिगार की रहमत को पा लेने वाला है। वह (आने वाला) मंज़र (दश्य) मेरी आखों में फिर रहा है, जब कि तुम्हारी मसजिद यूं नुमायां होगी जिस तरह कश्ती का सीना दरांहालेकि (इस दिशा में कि) अल्लाह ने तुम्हारे शहर पर उस के ऊपर और उस के नीचे से अज़ाब (दण्ड) भेज दिया होगा, और अपने रहने वालों समेत डूब चुका होगा।

[ एक और रिवायत में यूं (इस प्रकार ) है ]

ख़ुदा की कसम, तुम्हारा शहर गर्क हो (डूब) कर रहेगा। इस हद तक कि उसकी मसजिद कश्ती के अगले हिस्से, या सीने के बल बैठे हुए शुतुरमुर्ग की तरह मुझे नज़र आ रही है। (एक और रिवायत में इस तरह है) जैसे पानी के गहराव में परिन्दे (पक्षी) का सीना ।

[ एक और रिवायत में इस तरह है ]

तुम्हारा शहर अल्लाह के सब शहरों से मिटी के लिहाज़ से गंन्दा और बदबूदार है। यह (समुन्दर के) पानी से करीब (निकट) और आसमान (आकाश) से दूर है। बुराई के दस हिस्सों (अंशों) में से नौ हिस्से (नौ अंश) इस में पाए जाते हैं। जो इस में आ पहुंचा वह अपने गुनाहों में असीर (गिरफ्तार) है। और जो इस से निकल गया, अफवे इलाही (अल्लाह की क्षमा) उस के शरीक हाल रहा। गोया में अपनी आखों में इस बसती को देख रहा हूं कि सैलाब (बाढ) ने इसे हद तक ढांप लिया है कि मसजिद के कंगूरों के अलावा कुछ नज़र नहीं आता और वह यूं मालूम होते हैं जैसे समुन्दर के गहराव में परिन्दे (पक्षी) का सीना।

इबने मीसम लिखते हैं कि जब जंगे जमल ख्तम हो गई, तो उस के तिसरे दिन हज़रत ने बसरे की मसजिदे जामे में सुब्ह की नमाज़ अदा की और नमाज़ से फ़ारिग़ (निवृत) हो कर मुसल्लेह की दाहनी जानिब दीवार से टेक लगा कर खड़े हो गए और यह ख़ुतबा इरशाद फ़रमाया, जिस में अहले बसरा (बसरा निवासीयों) की पस्तिए अखलाक (नैतिक पतन) और उन की सुबकिए अकल (भ्रष्ट बुद्दि) का तज़किरा (वर्णन ) किया है कि वह बे सोचे समझे दूसरों के भड़काने पर भडक उठे और एक औरत (स्त्री) के हाथों में अपनी कमान सौंप दी और ऊंट के पीछे लग गए। और बैअत के बाद पैमान शिकनी की और दो रुखी कर के अपनी पस्त किर्दारी (नीच प्रवृत्ति) व बद बातिनी (दुष्ट अन्त:करण) का सुबूत दिया। इस खु़तबे में औरत (स्त्री) से मुराद (अभिप्राय) हज़रत आइशा और चौपाए से वह ऊंट है जिस की वजह से बसरा का मारकाए कारज़ार जंगे जमल के नाम से मशहूर हुआ।

इस जंग की दाग़ बेल यूं पड़ी कि जनाबे आइशा बावजूद इस के कि हज़रत उसमान की ज़िन्दगी में उन की सख्त मुखालिफ़त (विरोध) किया करती थीं। और मुहासिरे (घेराव) में उन को छोड़ कर मदीने से मक्के की तरफ़ रवाना हुई थीं। और इस ऐताबार से उन के कत्ल में उन का काफ़ी हाथ था। जिस की तफ़सील आइन्दा मुनासिब मौकों पर आयेगी। मगर जब आप ने मक्के से मदीने की तरफ़ पलटते हुए अब्दुल्लाह इबने अबी सलमा से यह सुना कि उसमान के बाद अली इबने अबी तालिब खलीफ़ा तसलीम कर लिये गए हैं तो बेसाख्ता आप की ज़बान से निकला, अगर तुम्हारे साथी की बैअत हो गई तो काश यह आसमान ज़मीन पर फट पड़े मुझे अब मक्के की तरफ़ ही जाने दो। चुनांचे आप ने मक्के की वापसी का तहैया कर लिया और फ़रमाने लगीं, ख़ुदा की कसम उसमान मज़लूम मारे गए और में उन के ख़ून का बदला ले कर रहूंगी। अब्दुल्लाह इबने अबी सलमा ने जब यूं ज़मीन व आसमां बदला हुआ देखा तो हैरत से कहा कि यह आप क्या फ़रमा रहीं हैं ? आप तो फ़रमाया करती थीं, उकतुलूहो नअसलन फ़कद कफ़रा, (इस नअसल को कत्ल करो, यह बेदीन हो गया है।)

आप ने फ़रमाया, में क्या सब लोग यह कहा करते थे मगर छोड़ उन बातों को जो अब में कह रही हूं वोह सुन वोह ज़ियादा बेहतर और काबिले तवज्जोह है, भला यह भी कोई बात हुई पहले तो उन से तौबा करने के लिये कहा गया और फ़िर उसका मोका दिये बग़ैर उन्हें कत्ल भी कर दिया जाता है । इस पर इबने अबी सलमा ने आप से मुखातिब हो कर यह शेर पढे :---

आप ही ने पहल की और आप ही ने (मुखालिफ़त के) तूफ़ाने बादो बारां उठाए और अब आप ही अपना रंग बदल रही हैं। आप ही ने खलीफ़ा के कत्ल का हुक्म दिया और हम से कहा कि वह बेदीन हो गए हैं। हम ने माना कि आप का हुक्म बजा लाते हुए यह कत्ल हमारे हाथों से हुआ मगर असली कातिल हमारे नज़दीक वोह है कि जिस ने इस का हुक्म दिया हो। (सब कुछ हो गया मगर) न आस्मान हमारे ऊपर फ़टा, और न चांद सूरज को गहन लगा और लोगों ने उस की बैअत कर ली जो कुव्वतो शिकोह से दुशमनों को हंकाने वाला है, तलवारों को करीब भटकने नहीं देता और (गर्दन कशों के) बल निकाल देता है। और लड़ाई के पूरे साज़ो सामान से आरास्ता रहता है और वफ़ा करने वाला ग़द्दार के मानिन्द नहीं हुआ करता ।

बहर हाल जब आप इनितिकामी जज़बे को लेकर मक्के पहुंच गई तो हज़रत उसमान की मज़लूमीयत के चर्चे कर के लोगों को उन के ख़ून का बदला लेने के लिये उभारना शुरू किया। चुनांचे सब से पहले अब्दुल्लाह इबने आमिरे हज़री ने इस आवाज़ पर लब्बैक कही जो हज़रत उसमान के अहद में मक्के का वाली रह चुका था और साथ ही मर्वार इबने हकम सईद इबने आस और दूसरे बनी उमैया हमनवा बन कर उठ खड़े हुए। उधर तलहा इबने अब्दुल्लाह और ज़ुबैर इबने अवाम भी मदीने से मक्के चले आए। यमन से योली इबने मंबा जो दौरे उसमान में वहां का हुक्मरां था आ पहुंचा और बसरे का साबिक हुक्मरां (भूतपूर्व प्रशासक) अब्दुल्लाह इबने आमिर इबने कुरज़ी भी पहंच गया और आपस में एक दूसरे से गठ जोड़ कर के मन्सूबा बन्दी (योजना बनाने) में लग गए। जंग तो बहरहाल तय थी मगर रज़्मगाह (रणक्षेत्र) की तजवीज़ (प्रस्ताव) में फ़िकरें (बुद्दियां) लड़ रही थीं। हज़रत आइशा की राय थी कि मदीने ही को ताख्तो ताराज का निशाना (लक्ष्य) बनाया जाय मगर कुछ लोगों ने इस की मुखालिफ़त (विरोध) किया और कहा कि अहले मदीना से निपटना मुशकिल है और किसी जगह को मर्कज़ बनाना चाहिये। आख़िर बड़ी रद्दो कदह और सोच विचार के बाद तय पाया कि बसरा की तरफ़ बढ़ना चाहिये, वहां ऐसे लोगों की कमीं नहीं जो हमारा साथ दे सकें। चुनांचे अब्दुल्लाह इबने आमिर की बैपनाह दौलत और योली इबने मंबा की छ : लाख दिर्हम और छ : सौ ऊंटों की पेशकश के सहारे तीन हज़ार की फ़ौज (सेना) तर्तीब देकर बसरे की तरफ़ चल खड़े हुए। रास्ते में मामूली सी रुकावट पैदा हुई जिस की वजह से अम्मुल मोमिनीन ने कुत्तों के भोकने की आवाज़ सुनी तो सरबान से पूछ लिया कि इस जगह का नाम क्या है उसने कहा कि, हौअब। नाम सुनते ही पैग़म्बर की तंबीह (चेतावनी) याद आ गई कि उन्हों ने एक दफ़आ (बार) अज़वाज (पत्नियों) से मुखातिब होकर फ़रमाया था, कुछ पता तो चले कि तुम में से कोन है कि जिस पर हौअब के कुत्ते भोकेंगे। चुनांचे जब आप को मालूम हुआ कि अज़वाज के पर्दे में मैं ही मुखातब थी तो ऊंट को थपकी देकर बिठाया और सफ़र (यात्रा) को मुलतवी (स्थगित) कर देने का इरादा किया। मगर सात वालों की वक्ती सियासत ने बिगड़े काम को संभाल लिया। अब्दुल्लाह इबने ज़ुबैर ने कसम खा कर यकीन दिलाने की कोशिश की कि यह मकाम हौअब नहीं है। तलहा ने भी इस की ताईद की और मज़ीद तशफ़्फ़ी के लिये वहां के चालीस आदमीयों को बुलवा कर उस पर गवाही भी दिलवा दी। अब जहां पूरी कोम का इजमा (एकता) हो वहां एक अकेली राय क्या बना सकती थी, आख़िर उन्हीं की जीत हुई और उम्मुल मोमिनीन फ़िर उसी जोशो खरोश के साथ आगे चल पड़ीं।

अब यह सिपाह मक्के के करीब पहंची, तो उस में उम्मुल मोमिनीन की सवारी देख कर लोगों की आंखें फ़टी की फ़टी रह गई। जारिया इबने किदामा ने आगे बढ़कर कहा कि, ऐ उम्मुल मोमिनीन कत्ले उसमान तो एक मुसीबत थी ही, लेकिन उस से कहीं बढ़ कर यह मुसीबत है कि आप इस मलऊन ऊंट पर बैठ कर निकल खड़ी हों और अपने हाथों से अपना दामने इज़्ज़तो हुर्मत चाक कर डालें। बेहतर यही है कि आप वापस पलट जायें,। मगर जब हौअब का वाकिआ इनांगीर न हो सका और, कर्नाफ़ी बुयूतो कुमा (अपने घरों में टिक कर बेठी रहो) का हुक्म ज़ंजीरे पा न बन सका, तो उन आवाज़ों का क्या असर हो सकता था। चुनांचे आप ने सुनी अन सुनी कर दी।

जब इस लशकर ने शहर में दाखिल होना चाहा तो वालिये बसरा उसमान इबने हुनैफ़ फ़ोज का एक दस्ता लेकर उन की रोक थाम के लिये बढ़े। जब आमना सामना हुआ तो दोनों फ़रीकों ने तलवारें न्यामों से निकाल लीं और एक दूसरे पर टूट पड़े, जब दोनों तरफ़ से अच्छी खासी तादाद में आदमी मारे गए तो हज़रत आइशा ने अपने असर से काम ले कर बीच बचाव करा दिया। और फ़रीकैन इस करार दाद पर सुलह (सन्धि) के लिए आमादा हो गए कि जब तक अमीरुल मोमिनीन अलैहिस्सलाम खुद नहीं आ जाते, मौजूदा नज़मो नसक में कोई तरमीम (परिवर्तन) न की जाए और उसमान इबने हुनैफ़ को ज़दोकोब (मारपीट) करने के बाद उनकी डाढ़ी का एक एक बाल नोच डाला और अपनी हिरासत में लेकर बन्द कर दिया। फिर बैतुलमाल (कोषागार) पर हमला किया और उसे लूटने के साथ बीस आदमी वहीं कत्ल कर डाले और पचास आदमीयों को गिरफ्तार करने के बाद तहे तेग़ किया, फ़िर ग़ल्ले के अंबार पर धावा बोल दिया जिस पर बसरे के एक मुमताज़ सर बर आवुर्दा बुज़ुर्ग हकीम इबने जिबिल्लाह तड़प उठे और अपने आदमीयों के लेकर वहां पहुंच गए। और अब्दुल्लाह इबने ज़ुबैर से कहा कि इस ग़ल्ले में से कुछ अहले शहर के लिये भी रहने दिया जाय, आख़िर ज़ुल्म की भी कोई हद होती है, तुम ने हर तरफ़ खूंरेज़ी और ग़ारत गरी का तूफ़ान मचा रखा है और उसमान इबने हुनैफ़ को कोद में डाल दिया है, खुदा के लिए इन तबाह कारियों से बाज़ आओ, और उसमान इबने हुनैफ़ को छोड़ो। क्या तुम्हारे दिलों में अल्लाह का खौफ़ नहीं। इबने ज़ुबैर ने कहा कि यह खूने उसमान का बदला है। आप ने कहा जिन लोगों को कत्ल किया गया है क्या वोह उसमान के कातिल थे ? खुदा की कसमअगर मेरे पास आवान व अनसार होते तो में इन मुसलमानों के खून का बदला ज़रूर लेता, जिन्हें तुम लोगों ने नाहक मार डाला है। इबने ज़ुबैर ने जवाब दिया कि न तो हम इस ग़ल्ले में से कुछ देगें और न उसमान इबने हुनैफ़ को छोड़ा जायेगा। आखिर उन दोनों फ़रीक में लड़ाई की ठन गई। मगर चन्द आदमी इतनी बड़ी फ़ौज से क्यों कर निपट सकते थे। नतीजा यह हुआ कि हकीम इबने जिबिल्लाह और उनके कबीले के सत्तर आदमी मार डाले गए। ग़रज़ कि हर तरफ़ मार धाड़ और लूट खसोट की गर्म बाज़ारी थी, न किसी की जान महफ़ूज़ थी और न किसी की इज़्ज़तो माल के बचाव की कोई सूरत थी।

जब अमीरुल मोमिनीन को बसरे की खानगी की इत्तिला दी गई तो आप इस पेश कदमी को रोकने के लिये एक फ़ोज के साथ निकल खड़े हुए, इस आलम में कि सत्तर बद्रईन (बद्र वाले) और चार सौ बैअत रिज़वान में शरीक होने वाले सहाबा आप के हम रिकाब (सात) थे। जब मकाम ज़ीकार पर पहुंच कर मनज़िल की तो इमाम हसन अलैहिस सलाम और अम्मार यासिर को कुफ़े रवाना किया कि वहां के लोगों को जिहाद की दावत दें। चुनांचे अबू मूसा अशअरी की रखना अन्दाज़ियों के बावजूद वहां के सात हज़ार नबर्द आज़मा उठ खड़े हुए और अमीरुल मोमिनीन की फ़ौज में मिल गए। यहां से फ़ौज को मुखतलिफ़ सिपह सालारों की ज़ेरे क़ियादत तरतीब देकर दुशमन के तआक़ुब में चल पड़े। देखने वालों का बयान है कि जब यह सिपाह बसरे के क़रीब पहुंची तो सबसे पहले अनसार का एक दस्ता सामने आया जिस का पर्चम अबू अय्यूबे अनसारी के हाथ में था। उस के बाद हज़ार सवारों का एक और दस्ता नमुदार हुआ जिस के सिपाह सालार ख़ुज़ैमा इबने साबित अनसारी थे। फिर एक हज़ार बूढ़े और जवानों का जमघटा दिखाई दिया जिन की पेशानियों पर सजदों के निशान चमक रहे थे, चेहरों पर ख़िशयते इलाही के नकाब पड़े हुए थे। मालूम होता था गोया जमाम किबरिया के सामने मौक़िफ़े हिसाब में खड़े हैं, उन का सिपाह सालार सबज़ घोड़े पर सवार सफ़ैद लिबास में मलबूस और सर पर अमामा बांधे व आवाज़ बलन्द क़ुरआन की तिलावत करता जा रहा था—यह हज़रत अम्मारे यासिर थे। फिर एक दस्ता नज़र आया जिस का अलम (ध्वज) क़ैस इबने सअद िबने इबादह के हाथ में था। फिर एक फ़ौज देखने में आई जिस का काइद सफ़ैद लिबास पहने और सर पर सियाह अमामा बांधे था। और खु़श जमाल इतना कि निगाहें उस के गिर्द तवाफ़ कर रही थीं—यह अब्दुल्लाह इबने अब्बास थे। फ़िर असहाबे पैग़म्बर का एक दस्ता आया जिस के अलम बर्दार कुस्मबने अब्बास थे। फिर चन्द दस्तों के गुज़रने के बाद एक अंबोहे कसीर नज़र आया जिस में नेज़ों की यह कसरत थी कि एक दूसरे में गुथे जा रहे थे और रंगारंग के फरेहरे लहरा रहे थे, उन में एक बलन्दो बाला अलम इमतियाज़ी शान लिये हुए था और उस के पीछे जलालो अज़मत के पहरों में एक सवार दिखाई दिया जिस के बाज़ू भरे हुए थे और निगाहें ज़मीन में गड़ी हुई थीं और हैबतो वकार का यह आलम था कि कोई नज़र उठा कर न देख सकता था—यह असादुल्लाहहिल ग़ालिब अली इबने अबी तालिब (अ.) थे जिन के दायें बायें हसन और हुसैन अलैहिमस सलाम थे । और आगे आगे मोहम्मद इबने हनफ़िया पर्चमे फ़त्हो इक़बाल लिये हुए आहिस्ता आहिस्ता क़दम उठा रहे थे। और पीछे जवानाने बनी हाशिम, असहाबे बद्र और अब्दुल्लाह इबने जाफ़र इबने अबी तालिब थे। जब यह लशकर मकामे ज़ादिया पर पहुंचा तो अमीरुल मोमिनीन घोड़े से उतर नीचे आये और चार रकअत नमाज़ पड़ने के बाद ख़ाक पर रुखसार रख दिये और जब सर उठाया तो ज़मीन आंसुओं से तर थी और ज़बान पर यह अलफ़ाज़ थे, ऐ आसमानों ज़मीन और अर्शे बरीं के पर्वरदिगार यह बसरा है इस की भलाई से हमारा दामन भर और इस के शर से हमें अपनी पनाह में रख।

फिर यहां से आगे बढ़ के मैदाने जमल में उतर पड़े। कि जहां हरीफ़ (दुशमन) पड़ाव ड़ाले हुए था। हज़रत ने सबसे पहले अपने लशकर में एलान किया कि देखो कोई किसी पर हाथ न उठाए और न लड़ाई में पहल करे। यह फरमाकर फौजे मुखालिफ़ के सामने आए और तलहा व ज़ुबैर से कहा कि तुम आइशा से ख़ुदा व रसूल की क़सम देकर पूछो कि क्या में खूने उसमान से बरीउज़ज़िम्मा नही हूँ? और जो कुछ तुम उन के मुतअल्लिक कहा करते थे क्या में भी वही कुछ कहा करता था ? और क्या में ने तुम को बैअत के लिए मजबूर किया था यी तुम ने खुद अपनी रज़ा मन्दी से बैअत की थी ? तलहा तो इन बातों पर चिराग़पा होने लगे मगर ज़ुबैर नर्म पड़ गए और हज़रत इस गुफ्तुगू के बाद पलट आए और मुसलिमें मजाशिई को कुरआन दे कर उन की तरफ़ भेजा ताकि उन्हें कुरआन मजीद का फ़ैसला सुनाएं। मगर उन लोगों ने उन दोनों को तीरों की ज़द (निशाने) पर रख लिया। और उस मर्दे बा खु़दा का जिस्म छलनी कर दिया। फिर अम्मारे यासिर तशरीफ़ ले गए ताकि उन्हें समझायें बुझायें और जंग के नताइज (परिणामों) से आगाह (अवगत) करायें। मगर उन की बातों का जवाब भी तीरों से दिया गया। अभी तक अमीरुल मोमिनीन ने हाथ उठाने की इजाज़त नहीं दी थी, जिस की वजह से दुशमन के हौसले बढ़ते गए और वह लगातार तीर बरसाते गरे। आख़िर चन्द जांबाज़ों के दम तोड़ने से अमीरुल मोमिनीन की फ़ौज में बौखलाहट सी पैदा हो गई। और कुछ लोग चन्द लाशेंलेकर आप के सामने आये और कहा कि या अमीरुल मोमिनीन, आप हमें लड़ने की इजाज़त नहीं देते और वोह हमें छलनी किये दे रहे हैं, भला कब तक हम अपने सीनों को खामोशी से तीरों का हदफ़ (लक्ष्य) बनाते रहेंगे। और उन की ज़ियादतीयों पर हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेंगे। इस मोके पर हज़रत के तेवर बदले, मगर ज़ब्तो हिल्म से काम लिया और उसी हालत में बे ज़िराह व सिलाह उठ कर दुशमन की फ़ौज के सामने आए और पुकार कर कहा ज़ुबैर कहां हैं ? पहले तो ज़ुबैर सामने आने से हिचकिचाए। मगर जब देखा कि अमीरुल मोमिनीन के पास कोई हथियार नहीं है तो वह सामने बढ़ कर आए। हज़रत ने फ़रमाया, क्यों ऐ ज़ुबैर, तुम्हें याद है कि एक दफ़आ रसूल खुदा (स.) ने तुम से कहा था कि या ज़ुबैरो इत्राका तुकातिलो अलीयन व अन्ता लहू ज़ालिम। (ऐ ज़ुबैर तुम अली से एक दिन जंग करोगे और ज़ुल्मों ज़ियादती तुम्हारी तरफ़ से होगी) ज़ुबैर ने कहा, हां फ़रमाया तो था, तो आप ने कहा फ़िर क्यों आऐ हो ? उन्होंने कहा कि ज़हन से उतर गया था और अगर पहले से याद आ गया होता तो कभी इधर का रुख न करता। फ़रमाया अच्छा अब तो याद आ गया है ? उन्होंने कहा हां याद आ गया है, और यह कह कर सीधे अम्मुल मोमिनीन के पास पहुंचे और कहने लगे कि में तो वापस जा रहा हूं। उम्मुल मोमिनीन ने कहा इस की वजह ? कहा अबुल हसन ने एक भूली हुई बात याद दिला दी है, में बे राह हो चुका था, मगर अब राह पर आ गया हूं, और किसी कीमत पर भी अली इबने अबी तालिब से नहीं लडूंगा। उम्मुल मोमिनीन ने कहा कि तुम औलादे अब्दुल मुत्तलिब की तलवारों से डर गए हो। उन्होंने कहा ऐसा नहीं है और यह कह कर बागें मोड़ लीं। बहर हाल सूरत यही ग़नीमत है कि इर्शादे पैग़म्बर का कुछ तो पासो लिहाज़ किया, वरना मकाम हौअब पर तो रसूल (स.) की बात याद आ जाने के बावजूद वक्ती तअस्सुर के अलावा कोई देरपा असर नहीं लिया गया। बहरहाल जब अमीरुल मोमिनीन इस गुफतुगू के बाद पलट कर आए तो देखा दुशमनों ने फ़ौज के दाहिने और बायें बाज़ू पर हमला कर दिया है। हज़रत ने जब यह देखा तो कहा कि बस अब हुज्जत तमाम हो चुकी है। मेरे बेटे मोहम्मद को बुलाओ, वह हाज़िर हुए तो फ़रमाया बेटा अब हमला कर दो। मोहम्मद ने सर झुकाया और अलम (ध्वज) ले कर मेदान की तरफ़ बढ़े। मगर तीर इस कसरत से आ रहे थे कि ठिठक कर खड़े हो गए। अमीरुल मोमिनीन ने जब यह देखा तो पुकार कर कहा कि मोहम्मद आगे क्यों नहीं बढ़ते ? कहा कि बाबा तीरों की बौछार में आगे बढने का कोई रास्ता भी हो, बस इतना तवक्कुफ़ फ़रमाइये कि तीरों का ज़रा ज़ोर थम जाए। फ़रमाया कि नहीं तीरों और सिनानों के अन्दर घुस कर हमला करो। इबने हनफ़िया कुछ आगे बढ़े, मगर तीर अन्दाज़ों ने इस तरह घेरा डा़ला कि क़दम रोक लेने पड़े। यह देख कर अमीरुल मोमिनीन की पेशानी पर बल आ गए। आप ने आगे बढ कर तलवार का दस्ता मोहम्मद की पुश्त पर मारा और फ़रमाया कि यह मादरी रंग का असर है । और यह कह कर अलम उन के हाथ से ले लिया और आसतीनों को चढ़ा कर इस तरह हमला किया कि एक सिरे से लेकर दूसरे सिरे तक फ़ौजे दुशमन में तहलका (हाहाकार) मच गया । जिस सफ़ की तरफ़ मुड़े वही सफ़ खाली थी और जिधर का रुख किया लाशें तड़पते हुए और सर घोड़े के सुमों (टापों) से लुढ़कते हुए नज़र आते थे। जब सफ़ों को तहो बाला कर दिया फ़िर अपने मर्कज़ की तरफ़ पलट कर आए तो इबने हनफ़िया से फ़रमाया कि देख़ो बेटा, इस जंग की जाती है। और यह कह कर फ़िर अलम उन्हें दिया । दुशमन भी नेज़े हिलाते और बरछियां तोलते हुए आगे निकल आए। मगर शेर दिल बाप के जरी बेटे ने सब परे उलट दिये और दूसरे जांबाज़ मुजाहिदों ने भी मैदाने कारज़ार को लाला ज़ार बना दिया और कुसतों के ढेर लगा दिये ।

उधर से भी जांनिसारी का हक़ पूरा अदा किया जा रहा था। लाशों पर लोशें गिर रहीं थीं, मगर ऊंट के गिर्द पर्वानावार जान देते रहे । और बनी ज़िबतह की तो यह हालत थी कि ऊंट की नकेल थामने पर हाथ कोहनियों से कट रहे थे और सीने छिद रहे थे मगर ज़बानों पर मौत का यह तराना गूंजता था :---

हमारे नज़दीक मौत शहद से ज़ियादा शीरीं है। हम ने बनू ज़िबतह, ऊंट के रखवाले, हम मौत के बेटे है, जब मौत आए। हम इबने अफ्फ़ान की सुनानी नेज़ों की ज़बानी सुनाते हैं। हमे हमारा सर्दार वापस पलटा दो (वैसे का वैसा) बस ।

इन बनी ज़िबतह की पस्त किरदारी और दीन से बे ख़बरी का अन्दाज़ा उस वाक़िए से हो सकता है जिसे मदाइनी ने बयान किया है। वह कहते हैं कि में ने बसरे में एक शख्स काकान कटा हुआ तो उस से इस का सबब पूछा। उस ने बताया कि में जंग जमल में कुश्तों का मनज़र देख रहा था कि एक ज़ख्मी नज़र आया जो कभी सर उठाता था और कभी ज़मीन पर दे मारता था में क़रीब हुआ तो उस की ज़बान पर दो शेर थे :----

हमारी मां ने हमें मौत के गहरे पानी में धकेल दिया और उस वक्त तक पलटने का नाम न लिया जब तक हम छक कर सेराब न हो लिये ।

हमने शूमिये किस्मत (दुर्भाग्य) से बनी तैम की इताअत (आज्ञापालन) कर ली, हालांकी उन के मर्द ग़ुलाम और औरतें कनीज़ें हैं ।

में ने उस से कहा कि अब शेर पड़ने का कौन सा मौक़ा है ? अल्लाह को याद करो और कलिमए शहादत पढ़ो । यह कहना था कि उसने मुझे ग़ुस्से की नज़रों से देखा और एक सख्त किस्म की गाली दे कर कहा कि तू मुझ से कहता है कि कलिमा पढ़ू, और आख़िरी वक्त में ड़र जाऊं, और बे सबरी का मुज़ाहरा करूं। यह सुन कर मुझे बड़ी हैरत हुई और मज़ीद (ज़ियादा) कुछ कहना सून्ना मुनासिब न समझा और पलटने का इरादा किया । जब उस ने जाने के लिये मुझे आमादा पायातो कहा कि ठहरो तुम्हारी खा़तिर उसे पढ़ लेता हूं। लेकिन मुझे सिखा दो । में उसे कलिमा पढ़ाने के लिए करीब हुआ तो उस ने कहा और क़रीब आओ, में और क़रीब हुआ तो उस ने मेरा क़ान दांतों में दबा लिया और उस वक्त तक न छोड़ा जब तक उसे जड़ से न काट लिया । में ने सोंचा कि इस मरते हुए पर क्या हाथ उठाऊं, उसे लअन तअन करता हुआ पलटने के लिये तैयार हुआ तो उस ने कहा कि एक बात और सुन लो । में ने कहा वह भी सुना लो ताकि तुम्हारी कोई हसरत न रह जाए। उ ने कहा कि जब अपनी मां के पास जाना और वह पूछे कि यह कान किस ने काटा है, तो कहना कि अमर इबने अहलबे ज़िब्बी ने जो एक ऐसी औरत के भर्रे में आ गया था जो अमीरुल मोमिनीन बनना चाहती थी।

बहर सूरत जब तलवारों की कौंदती हुई बिजलियों ने हज़ारों के खिर्मने हस्ती (अस्तित्व के खलियान) को भस्म कर दिया और बनी अज्द व बनी ज़िब्ह के सैकड़ों आदमी नकेल पकड़ने पर कट मरे, तो हज़रत ने फ़रमाया, एकरुल जमलो फ़इत्रहू शैतानुन । (इस ऊंट को पय करो, यह शैतान है) और यह कह कर ऐसा सख्त हमला किया कि चारों तरफ़ से अलअमान वल हफ़ीज़ (शान्ति-शान्ति, बचाव-बचाव) की सदायें आने लगीं । जब ऊंट के क़रीब पहुंचे तो अशतरे न्खई से कहा कि देखते क्या हो इसे पय करो। चुनांचे अशतर ने ऐसा भरपूर हाथ चलाया कि वह बिलबिलाता हुआ सीने के बल ज़मीन पर गिरा। ऊंट का गिरना था कि फ़ौजे मुखालिफ़ में भगदड़ मच गई और जनाबे आइशा का हौदह यक्का व तन्हा रह गया । असहाबे अमीरुल मोमिनीन ने बढ़ कर हौदह को संभाला और मोहम्मद इबने अबी बकर ने अमीरुल मोमिनीन के हुक्म के मुताबिक हज़रत आइशा को सफ़ीया बिन्ते हारिस के मकान पर पहुंचा दिया । 10 जमादिस सानिया सन् 36 हिजरी को यह मारिका ज़ोहर के वक्त शुरूउ हुआ और उसी दिन शाम को खत्म हो गया। इस में हज़रत अमीरुल मोमिनीन के बाईस हज़ार के लशकर में से सत्तराह हज़ार, दूसरे क़ौल की बिनी पर बीस हज़ार काम आए। और पैग़म्बर खुदा (स.) के इस कौ़ल की तस्दीक़ हो गई कि, वह क़ौम कभी कामरानी मुंह नही देख सकती, जिस की क़ियादत औरत के हाथ में हो । (किताबुल इमामत वससियासत, मुरुजुज़ ज़हब, इक़दुलफ़रीद, तारीखे तबरी)

इबने अबिल हदीद ने लिखा है कि अमीरुल मोमिनीन की इस पेश गोई के मुताबिक़ बसरा दो दफ़आ ग़र्क़ाब हुआ । एक बार क़ादिर बिल्लाह के दौर में और एक दफ़ाआ क़ाइम बे अमरिल्लाह के अहदे हुकूमत में और ग़र्क होने की बिलकुल यही सूरत थी कि शहर तो ज़ेरे आब था और मसजिद के कंगुरे पानी की सतह यूं नज़र आते थे जैसे कोई परिन्दा सीना टेके बैठा हो ।

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