कर्बला के बाद बनी उमय्या की हुकूमत में शियों के हालात।



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सन 60 हिजरी में मुआविया की मौत के बाद उसका बेटा यज़ीद जिसे ख़ुद मुआविया ने अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था और लोगों से उसकी बैअत भी ली थी, इस्लामी दुनिया का शासक बन बैठा। उसने मदीना वासियों ख़ास कर कुछ बड़ी हस्तियों, विद्वानों व बुद्धिजीवियों से बैअत लेने का फ़ैसला किया जिनमें इमाम हुसैन अ.ह भी शामिल थे। इमाम अ. ने बैअत करने से इंकार कर दिया और मदीने को छोड़ कर मक्के की ओर कूच कर गए|

सन 60 हिजरी में मुआविया की मौत के बाद उसका बेटा यज़ीद जिसे ख़ुद मुआविया ने अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था और लोगों से उसकी बैअत भी ली थी, इस्लामी दुनिया का शासक बन बैठा। उसने मदीना वासियों ख़ास कर कुछ बड़ी हस्तियों, विद्वानों व बुद्धिजीवियों से बैअत लेने का फ़ैसला किया जिनमें इमाम हुसैन अ.ह भी शामिल थे। इमाम अ. ने बैअत करने से इंकार कर दिया और मदीने को छोड़ कर मक्के की ओर कूच कर गए। कुछ महीने मक्के में रहे लेकिन जब आपको यह सूचना मिली कि यज़ीद और उसके नौकर गुप्त रूप से हज के बीच आपको क़त्ल करके अपने अवैध हितों के रास्ते से सबसे बड़ी रूकावट को हटा देना चाहते हैं तो इमाम अ. ने मक्के को छोड़ कर कूफ़े की ओर जाने का इरादा किया। कूफ़े के चयन का कारण यह था कि वहाँ शिया बहुमत में थे और कूफ़ा वासियों ने इमाम अ. को दावत दी थी और हज़ारों चिठ्ठियां भेज कर आपकी वफ़ादारी और यज़ीद से दूर रहने का ऐलान किया था।
लेकिन यज़ीद की ओर से नियुक्त कूफ़ा के गवर्नर “उबैदुल्लाह इब्ने ज़ियाद” की मक्कारियों, डर और लालच के कारण अधिकांश लोग अपने वादे से पीछे हट गए और इसी लिए कर्बला की घटना घटित हुई और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम अपने वफ़ादार साथियों के साथ बहुत ज़्यादा  ज़ुल्म व अत्याचार के साथ परदेस में शहीद कर दिये गये, आपकी औरतों और बच्चों को यज़ीदियों ने बंदी बना लिया।
कर्बला की घटना में अगरचे देखने में यज़ीद और अमवी शासन को जीत मिली और इमाम हुसैन अ. और उनके साथियों को हार का सामना करना पड़ा लेकिन सच्चाई इसके विपरीत है, कर्बला की घटना इस्लामी इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय बन गई और उसके नतीजे में इस्लामी दुनिया में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। मुसलमानों के सोई हुई अंतरात्माएं जाग उठीं। बनी उमय्या की नीचता, इस्लाम से दुश्मनी और इमाम हुसैन अ. की महानता व सच्चाई पूरी दुनिया के लिये स्पष्ट हो गई। इस महान आंदोलन ने मुआविया और उसके नौकरों की ओर से हज़रत अली अ. के परिवार का नाम मिटाने और शिया समुदाय को ग़लत व असत्य दीन बताने की बीस वर्षीय कोशिशों और षड़यंत्रों को मिट्टी में मिला दिया।
सभी शिया व सुन्नी इतिहासकारों ने इस बात को स्वीकार किया है कि कर्बला की घटना ने एक ओर यज़ीद और अमवी शासन के विरूद्ध मुसलमानों के दिलों को घृणा व तिरस्कार से भर दिया तो दूसरी ओर लोगों के दिल पैग़म्बर के अहलेबैत अ. की ओर खिंचने लगे और उनकी लोकप्रियता में कई गुना बढ़ोत्तरी हुई।
इतिहासकार लिखते हैं कि कर्बला की घटना के बाद जब उबैदुल्लाह बिन ज़ियाद ने बिगड़ती स्थिति और अमवी शासन की उखड़ती सांसों को देखा तो उसके नतीजे से घबरा कर उमर इब्ने साद से वह ख़त वापस मांगा जिसमें इब्ने ज़ियाद ने उमर सअद को इमाम हुसैन अ. को शहीद करने का आदेश दिया था लेकिन उमर साद ने वह ख़त वापस देने से इंकार कर दिया और जब इब्ने ज़ियाद की ज़िद्द बढ़ी तो उमर साद ने कहा “वह ख़त मैंने मदीना भेज दिया है ताकि लोगों को पढ़ कर सुना दिया जाए और मदीनावासी समझ जाएं कि मै इस अत्याचार को अंजाम देने पर मजबूर था। उमर साद ने यह भी कहाः अल्लाह की क़सम मैंने तुम्हें पहले ही इस काम के बुरे नतीजे से अवगत कर दिया था और इस बारे में तुमसे इस निष्ठा से बात की थी कि अगर ऐसी वार्ता अपने बाप से करता तो उसका हक़ अदा कर चुका होता। उबैदुल्लाह के भाई उस्मान ने उमर साद की बातों का समर्थन किया और कहाः ऐ काश ज़ियाद की संतान क़यामत तक अपमान की ज़िंदगी बिताती लेकिन हुसैन अ. के क़त्ल में शामिल न होती।
(तारीख़े तबरी भाग 6 पेज 268, तारीख़ुश्शिया पेज 29)
इब्ने असीर लिखते हैं कि जब इब्ने ज़ियाद ने इमाम हुसैन अ. का सिर यज़ीद के सामने लाया गया तो यज़ीद ख़ुश हुआ और इब्ने ज़ियाद का सम्मान किया लेकिन कुछ ही समय बाद जब माहौल यज़ीद के विरूद्ध हो गया और लोग यज़ीद पर धिक्कार करने लगे तो यज़ीद भी पश्चाताप व शर्मिंदगी का ऐलान करने लगा और इब्ने ज़ियाद की निंदा करने लगा। यज़ीद कहा करता था कि हुसैन अ. की हत्या में इब्ने ज़ियाद का ही हाथ है इसलिए कि हुसैन अ. ने तो इब्ने ज़ियाद से कहा था कि मुझसे यज़ीद की बैअत की बात न करो और मुझे किसी दूसरे इलाक़े में जाने दो लेकिन इब्ने ज़ियाद ने हुसैन अ. की  बात न सुनी और उन्हें क़त्ल कर दिया और इस तरह लोगों को मुझसे नाराज़ कर दिया।
(तारीख़े इब्ने असीर भाग 2 पेज 57)
यज़ीद की ओर से पश्चाताप व शर्मिंदगी वास्तविक हो या केवल दिखावटी, लेकिन इस वास्तविकता से इंकार सम्भव नहीं है कि इमाम हुसैन अ. के आंदोलन, आपकी और आपके साथियों की शहादत, औरतों व बच्चों को बंदी बनाए जाने ने लोगों के सामने सच्चाई को स्पष्ट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है यहाँ तक कि सीरिया जहाँ वर्षों हज़रत अली अ. और उनके परिवार के विरूद्ध ज़हरीला प्रोपेगंडा किया गया था, वह जगह जो मुआविया और यज़ीद की राजधानी थी उस जगह पर भी सार्वजनिक रूप से बनी उमय्या के विरूद्ध और अहलेबैत अ. के हक़ में माहौल बन गया था।
अब तक अमवी शासन इमाम हुसैन अ. और उनके साथियों को इस्लाम से ख़ारिज और पैग़म्बर के ख़लीफ़ा का बाग़ी कहा करता था और इस धोखे वाले नारे द्वारा अलवियों और शियों को गिरफ़्तार करने, बंदी बनाने और तरह तरह की यातनाएं देने में व्यस्त रहता था लेकिन इमाम हुसैन अ. ने अम्र बिल मअरूफ़ व नहि अनिल मुनकर, बिदअत और अमवी शासन की बुराईयों से मुक़ाबले और उम्मत के सुधार का न केवल यह कि नारा दिया बल्कि अपनी जान की क़ुर्बानी और अहलेबैत की गिरफ़्तारी के बल पर उस युग के मुसलमानों के रग रग में यह भावना भर दी कि जिसके बाद आज़ादी के लिये लड़ने वालों के लिए अमवियों के विरूद्ध उठ खड़े होने व जेहाद का दरवाज़ा खुल गया, न केवल यह कि शियों की ओर से एक के बाद एक आंदोलन हुये बल्कि क़दरिया और मोतज़ेला जैसे दूसरे संप्रदायों ने भी अमवियों के विरूद्ध आंदोलन किया।
सुलैमान बिन सुरद ख़ुज़ाई के नेतृत्व में कूफ़ा के शियों का आंदोलन, मुख़्तार और ज़ैद शहीद का आंदोलन सबके दृष्टिगत कर्बला की ही घटना थी और यह सब कर्बला के पदचिन्ह पर चल रहे थे।
सारांश यह कि कर्बला की घटना के बाद हिम्मत व बहादुरी, आज़ादी व शहादत की भावना मुसलमानों विशेष कर शियों में जाग गई और उसके बाद से उन्होंने अमवी शासकों को चैन की नींद नहीं सोने दिया हालांकि नतीजे में उन्हें गिरफ़्तारियों की कठिनाईयां और कोड़ों की तकलीफ़ सहन करना पड़ी और अल्लाह के रास्ते में शहादत को गले लगाना पड़ा। इस बीच भी बहुत से उतार चढ़ाव आये जिनको यहां बयान करने का अवसर नहीं है।
इस अवधि में एक और सच्चाई पर ध्यान देने और अनुसंधान की ज़रूरत है कि उन हालात में अहलेबैत अ. ने एक ओर अमवी शासन से मुक़ाबले और दूसरी ओर इस्लामी समाज की बौद्धिक, समाजिक और शैक्षणिक और प्रशिक्षणिक नेतृत्व के लिए किस शैली और तरीक़े का चयन किया? इमाम ज़ैनुल आबेदीन अ., इमाम हुसैन अ. की शहादत के बाद 35 साल तक इमामत के पद पर पदासीन रहे, आपने भी बनी उमय्या के साथ संघर्ष का सिलसिला जारी रखा लेकिन आपके मुक़ाबले की शैली भिन्न थी, आपकी कोशिश यह थी कि कर्बला की घटना लोगों की निगाह में अमर रहे, लोग इस घटना को भूलने न पायें ताकि लोगों के दिलों में बनी उमय्या के विरूद्ध आक्रोश और घृणा का लावा पकता रहे इसी लिए आप हर अवसर पर कर्बला के ह्रदयविदारक घटना को याद करके आंसू बहाते थे दूसरी ओर आप दुआवों के सहारे इस्लामी समाज में उच्च इस्लामी शिक्षा का प्रसार व प्रचार करते रहे। आपकी दुआएं ज्ञान व विज्ञान, शुद्धिकरण व स्व-शोधन, समाजिक व्यवहार व कर्तव्य के साथ साथ अत्याचार से मुक़ाबले जैसी बातों पर आधारित होती थीं। इस तरह अमवी शासन को एहसास भी नहीं हुआ और आप इस्लामी समाज का वास्तविक नेतृत्व व इमामत की भूमिका बेहतरीन शैली में अदा करते रहे। कर्बला की घटना के बाद इस्लामी समाज को इमाम मासूम के सशस्त्र आंदोलन और खुल्लम खुल्ला आपत्ति जताने की कोई ज़रूरत नहीं थी, इस कर्तव्य को इमाम हुसैन अ. बेहतरीन शैली से अदा कर चुके थे। उस ज़माने में इस्लामी समाज की मौलिक ज़रूरत यह थी कि इमाम हुसैन अ. के आंदोलन से इस्लाम व मुसलमानों के हितों के लिए भरपूर तरीक़े से फ़ायदा उठाया जाए और इमाम सज्जाद अ. ने यह काम बहुत अच्छे तरीक़े से अंजाम दिया।
इमाम सज्जाद (अ.ह) ने कर्बला की घटना को जिंदा रखने, दुआ की शक्ल में इस्लाम की वास्तविक शिक्षाओं को बयान करने के अतिरिक्त ऐसे शिष्यों और चेलों का भी प्रशिक्षण किया जो इस्लामी समाज की थेअलोजी, धर्मशास्त्र और क़ुरआन की तफ़सीर व व्याख्या से सम्बंधित ज़रूरतओं को पूरा कर सकें। जिस ज़माने में बनी उमय्या और अब्दुल्लाह इब्ने ज़ुबैर हुकूमत के मुद्दे में एक दूसरे से उलझे हुए थे, इमाम (अ.ह) ने अवसर का पूरा फ़ायदा उठाया।
(यज़ीद की मौत के बाद अब्दुल्लाह इब्ने ज़ुबैर ने मक्के बग़ावत का ऐलान कर दिया और सत्ता पर क़ब्ज़ा कर लिया। यमन, हेजाज़, इराक़ और ख़ुरासान के लोगों ने उसकी बैअत कर ली लेकिन सीरिया और मिस्र के लोगों ने यज़ीद के बेटे मुआविया  की बैअत  की लेकिन मुआविया  इब्ने यज़ीद की हुकूमत ज़्यादा दिनों तक जारी नहीं रह सकी और सीरिया व मिस्र के लोगों ने भी अब्दुल्लाह  इब्ने ज़ुबैर की ही बैअत कर ली। उसकी हुकूमत का सिलसिला नौ साल तक जारी रहा और अनंततः  37 हिजरी में  हज्जाज के हाथों क़त्ल हुआ और अब्दुल मलिक इब्ने मरवान हुकूमत की बागडोर अपने हाथ में ले  ली। तारीख़ुल ख़ुल्फ़ा पेज 312)
इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.) के ज़माने में ग़ैर शिया फ़ुक़्हा (धर्मशास्त्री) अपने दृष्टिकोण के अनुसार इस्लामी हुक्म बयान करते थे इमाम अ. के ऐसे शिष्य भी थे जो इमाम अ. के दृष्टिकोण तो बयान करते लेकिन अपने शिया होने का पता नहीं चलने देते थे। क़स्साम बिन मुहम्मद बिन अबू बक्र और सईद बिन मुसय्यब ऐसे ही शिष्यों में से हैं।
(तारीख़ुश्शिया पेज 38)
इल्मे कलाम (थेअलोजी) के मशहूर शिया मुतकल्लिम क़ैस इब्ने मासिर ने इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.) से ही इल्म हासिल किया था।
(उसूले काफ़ी भाग 1 किताबुल हुज्जा, बाबुल एज़तेरार इलल हुज्जा, हदीस 4।)
जाबिर बिन अब्दुल्लाह अंसारी, आमिर बिन वासेला केनानी, सईद बिन मुसय्यब, सईद बिन जहान केनानी, इमाम ज़ैनुल आबेदीन  के सहाबियों और शिष्यों में से हैं जबकि सईद बिन जुबैर, मुहम्मद बिन जुबैर बिन मतअम, अबू ख़ालिद काबुली, क़स्साम बिन औफ़, इस्माईल बिन अब्दुल्लाह बिन जाफ़र, मुहम्मद बिन हनफ़िया के बेटे इब्राहीम व हसन, हबीब इब्ने अबी साबित, अबू यहिया असदी, सलमा बिन दीनार और अबू हाज़िम आरज की गिनती आपके शिष्यों में होती है।
(मनाक़िबे इब्ने शहर आशोब भाग 4 पेज 174)
शेख़ तूसी (र.ह) ने अपनी इल्मे रेजाल (1) की किताब में इमाम सज्जाद (अ.) से रिवायत बयान करने वालों को वर्णमाला के क्रमानुसार बयान किया है और उनकी  संख्या  571 बताई है जिनमें से कुछ सहाबी और कुछ ताबेई (2) थे।
(रेजाले शेख़ तूसी पेज 81-101)
(1)    इल्मे रिजाल वह इल्म है कि जिसमें रावियों के हालात पर चर्चा की जाती है कि उनके कथन को स्वीकार किया जा सकता है या स्वीकार नहीं किया जा सकता और छानबीन की जाती है कि उसका चरित्र कैसा है वह झूठ बोलता है सच।
(2)    ताबेई उस इंसान को कहा जाता है जो रसूले इस्लाम स.अ के दौर में न रहा हो या उस समय मुसलमान न हुआ हो लेकिन रसूल स.अ. के किसी सहाबी के साथ रहने का अवसर मिला हो।
इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ.) के बाद आपके बेटे अबू जाफ़र मुहम्मद इब्ने अली (अ.) ने जिनकी उपाधि बाक़िर थी इमामत की बागडोर संभाली और 114 हिजरी में हेशाम इब्ने अब्दुल मलिक के हाथों शहीद होने तक शियों का नेतृत्व व  पथप्रदर्शन करते रहे। पिछले इमामों के युग के विपरीत आपके ज़माने में राजनीतिक हालात कुछ मुनासिब थे इसी लिए आम लोगों और ख़ास कर उल्मा व हदीस के विशेषज्ञों का आपसे सम्पर्क बना रहता था और रावियों ने आपके हवाले से बहुत सी रिवायतें बयान की हैं। जाबिर इब्ने अब्दुल्लाह अंसारी की रिवायत के अनुसार पैग़म्बरे इस्लाम अ.स. ने आपके जन्म की ख़बर दी थी और रसूले इस्लाम स.अ. ही ने आपको बाक़िर की उपाधि दी थी।
इमाम मुहम्मद बाक़िर अ. ने हाथ आए अवसर को भला जानते हुए ज्ञानात्मक व सांस्कृतिक क्रांति की नींव डाल दी और यह क्रांति आपके बाद इमाम जाफ़र सादिक़ अ. द्वारा अपने चरम पर पहुँच गई। जाबिर इब्ने यज़ीद जअफ़ी ने पचास हज़ार और मुहम्मद इब्ने मुस्लिम ने तीस हज़ार हदीसें इमाम मुहम्मद बाक़िर अ. के हवाले से बयान की हैं। शेख़ तूसी र.ह की रेजाल की किताबों के अनुसार इमाम बाक़िर अ. से हदीस बयान करने वाले सहाबी व ताबेईन की संख्या 466 है। आपके ज़माने में इस्लामी दुनिया के बहुत से धार्मिक व कलामी संप्रदाय भी वुजूद में आए। इमाम उनसे वाद विवाद और बहस भी करते रहे, इन बहसों के कुछ उदाहरण अल्लामा तबरसी र.ह ने अपनी किताब ”अल-एहतेजाज“ में बयान किए हैं।
(अल-फ़ुसूलुल मुहिम्मा पेज 210-221, अल-इरशाद पेज 157-168, तारीख़ुश्शिया पेज 42-43, आयानुश्शिया भाग 1 पेज 650-659,  अल-एहतेजाज भाग 2 पेज 321-331)
संक्षेप में यह कहा जाए कि इमाम हुसैन (अ.) के आंदोलन और इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम के दौर में आने वाले परिवर्तनों और अमवी शासन के विरूद्ध शियों के आंदोलनों तथा दूसरे संप्रदायों के विद्रोहों ने कर्बला की घटना से पहले इस्लामी समाज पर तारी घुटन के माहौल को ख़त्म कर दिया और बौद्धिक चर्चा व बहस के नतीजे में बहुत से समुदाय दूसरे सम्प्रदाय वुजूद में आ गए चूँकि इमाम बाक़िर (अ.) इल्म व ज्ञान के मैदान में अपने ज़माने की सबसे बड़ी इल्मी हस्ती थे इसलिए इस्लामी दुनिया के मुहद्देसीन (हदीस के विशेषज्ञ), फ़ुक़्हा (धर्मशास्त्री) और बुद्धिजीवियों के विचार और दृष्टिकोण आपके दृष्टिकोण से प्रभावित होते, इस तरह इमाम को इस्लाम की वास्तविक शिक्षा आम करने का अवसर मिला। ऐसी स्थिति में स्पष्ट रूप से पिछले दौर के मुक़ाबले में शियों को राजनीतिक तौर पर कम मुश्किलों का सामना था। मगर फिर भी अमवी हुकूमत जिसकी नींव ही अली इब्ने अबी तालिब अ. के परिवार पर अत्याचार व ज़ुल्म पर डाली गई थी, अपने स्वभाव के अनुसार शियों या दूसरे आज़ाद इंसानों पर अत्याचार का कोई भी अवसर हाथ से नहीं जाने देती थी।
114 हिजरी में हेशाम इब्ने अब्दुल मलिक के हाथों इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम की शहादत के साथ इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.) की इमामत का सिलसिला शुरू हुआ। आपने अपने वालिद के हाथों शुरू की गई ज्ञानात्मक व सांस्कृतिक क्रांति को शीर्ष की चोटी तक पहुंचा दिया। हेशाम इब्ने अब्दुल मलिक की गिनती अमवी सम्राटों के सबसे अधिक शक्तिशाली और कठोर स्वभाव के सम्राटों में होती है। हेशाम अमवी शासन के विरूद्ध किसी भी तरह के आंदोलन या विद्रोह को कुचलने के लिए विरोधियों विशेष कर शियों के साथ सख़्त रूख अपनाता था, इसीलिए उसने इमाम मुहम्मद बाक़िर अ. और इमाम जाफ़र सादिक़ अ. पर हमेशा सख्ती के साथ नज़र रखी, वास्तव में वह इन दोनों इमामों के आध्यात्मिक प्रभाव से बहुत भयभीत रहता था कि कहीं मुसलमान इन महान हस्तियों की आध्यात्मिकता से प्रभावित न हो जाएं।
121 हिजरी में ज़ैद इब्ने अली (अ.) के आंदोलन और हेशाम के आदेश से उसके नौकरों द्वारा जनाबे ज़ैद की शहादत से हेशाम और अमवी शासन के विरूद्ध मुसलमानों के ग़ुस्से और घृणा में बहुत ज्यादा बढ़ोत्तरी हुई। इसी बीच ख़ुरासान के लोगों ने भी विद्रोह कर दिया, यह लोग बनी उमय्या के अत्याचार बयान करते और उनकी निंदा करते थे।
(तारीख़े याक़ूबी भाग 2 पेज 255-258)
इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.) को जनाबे ज़ैद इब्ने अली (अ.) की शहादत की सूचना से बहुत दुख पहुँचा और आपने जनाब ज़ैद और उनके साथ शहीद होने वालों के घर वालों की मदद की। अबू ख़ालिद वास्ती के कथन के अनुसार इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.) ने एक हज़ार दीनार उन्हें दिए ताकि वह यह दीनार जनाब ज़ैद के आंदोलन में शहीद होने वालों के घरों तक पहुँचा दें।
(अल-इरशाद भाग 2 पेज 173)
125 हिजरी में हेशाम इब्ने अब्दुल मलिक की मौत के बाद बनी उमय्या की हुकूमत के पतन की निशानियां साफ़ दिखने लगी थीं, 125 हिजरी से 132 हिजरी में अमवी शासन के अंत तक केवल सात साल की अवधि में चार शासकों ने हुकूमत की।
(उनके नाम वलीद इब्ने यज़ीद इब्ने अब्दुल मलिक, यज़ीद इब्ने वलीद, इब्राहीम इब्ने वलीद और मरवान इब्ने मुहम्मद हैं।)
इस बीच अमवी शासन को अंदर से कमज़ोर और खोखले होने के अतिरिक्त अबू मुस्लिम ख़ुरासानी के आंदोलन और अब्बासियों के विद्रोह का भी सामना था अनंततः अंतिम अमवी शासक अब्बासियों के हाथों क़त्ल हुआ और अमवी शासन का काला अध्याय हमेशा के लिए बंद हो गया।
(अल-इमामः वस्सियासः भाग 2 पेज 110-117, तारीख़ुल ख़ुल्फ़ा पेज 250-255, अल-कामिल फ़ित् तारीख़ भाग 3 पेज 448-486)
अमवी शासन की कमज़ोरी और राजनीतिक उथल पथल के कारण शियों के लिए माहौल अच्छा हो गया था और इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.) ने वास्तविक इस्लाम की शिक्षाओं के प्रचार के लिए इस अवसर से भरपूर फ़ायदा उठाया। इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.) की इमामत की अवधि 34 साल थी (114 हिजरी से 148 हिजरी) जिसमें से अट्ठारह साल  (114 हिजरी से 132 हिजरी) अमवी शासन के दौर में गुज़रे। इस ज़माने में विशेष कर अंतिम कुछ वर्षों में अमवी शासन के पास कोई विशेष राजनीतिक व समाजिक ताक़त नहीं थी ऐसे राजनीतिक हालात के नतीजे में इल्मी और कल्चरल के लिए  हालात बहुत अच्छे थे चाहे वह शासन प्रणाली के विरूद्ध संघर्ष ही क्यों न हो। इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.) द्वारा शिया सिद्धांत व विश्वास के प्रचार और महत्वपूर्ण शिष्यों के प्रशिक्षण के कारण शिया समुदाय, मज़हबे जाफ़री (जाफ़री सम्प्रदाय) के नाम से मशहूर हो गया।
इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.) से हदीसें लेने वाले मुहद्देसीन (हदीसों के विशेषज्ञों) व रावी (हदीस बयान करने वाले) केवल शिया ही नहीं थे बल्कि दूसरे संप्रदायों और मज़हबों के मुहद्देसीन भी आपसे हदीसें लेते और बयान करते थे, इब्ने सब्बाग़ मालेकी कहते हैं कि बहुत सी बड़ी हस्तियों ने इमाम सादिक़ (अ.) से हदीसें ली और बयान की हैं जिनमें से यहिया इब्ने  सईद, इब्ने जुरैह, मालिक इब्ने अनस, सुफ़यान सौरी, अबू ऐनीयेह, अबू हनीफ़ा, अबू अय्यूब सजिस्तानी आदि हैं।
(अल-फ़ुसूलुल मुहिम्मा पेज 222)
इतिहासकारों के अनुसार इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.)  के शिष्यों की संख्या चार हज़ार है।

(अल-इरशाद भाग 2 पेज 179, अल-इमाम सादिक़ वल मज़ाहिबुल अरबआ भाग 1 पेज 67)



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