मदीने से चला काफिला पहला सफर

इस बात का ज़िक्र मुहर्रम में हर दिन होता है की कैसे मदीने से चला काफिला कर्बला में लुट के कैसे  मदीने वापस पहुंचा ? आखिर अपने वतन मद...



इस बात का ज़िक्र मुहर्रम में हर दिन होता है की कैसे मदीने से चला काफिला कर्बला में लुट के कैसे  मदीने वापस पहुंचा ? आखिर अपने वतन मदीने को हज़रत मुहम्मद (स.अ व ) के घराने को क्यू छोड़ना पड़ा ।

कर्बला की कहानी ५ सफरों की  भरी कहानी है । 

ये बात २० रजब सन ६० हिजरी की है जब मुआव्विया की मृत्यु हो गयी और यज़ीद  ने खुद को मुसलमानो  का  खलीफा घोषित कर दिया ।

यहां ये बात बताता चलूँ कि जब इस्लाम के पैग़ाम हज़रत मुहम्मद (स.अ व ) लोगो तक पहुंचा रहे थे तो इसी मुआव्विया का बाप अबु सूफियान सबसे अधिक उनको परेशान किया करता था लेकिन बाद में उसने इस्लाम धर्म क़ुबूल कर लिया लेकिन मुआव्विया यमन की तरफ भाग गया और इस्लाम को क़ुबूल नहीं किया लेकिन बाद में उसने भी इस्लाम को क़ुबूल कर लिया ।

लेकिन अपने बाप की तरह हमेशा मुआव्विया भी हज़रत मुहम्मद (स.अ व ) और उनके घराने का दुश्मन रहा ।जब हज़रत अली (अ.स ) खलीफा बने तो मुआव्विया ने शाम से खुद की खिलाफत का ऐलान कर दिया । मुआव्विया को कभी इस्लाम धर्म में दिलचस्पी नहीं रही बल्कि सत्ता हासिल करने के लिए इसका इस्तेमाल किया करता था ।

मुआव्विया की मृत्यु के बाद जब यज़ीद ने खुद को मुसलमानो का खलीफा घोषित किया तो उसके सामने समस्या यह आई की वो हज़रत मुहम्मद (स.अ व ) के घराने के लोगों की सहमति कैसे हासिल करे ? यज़ीद ने वलीद को यह ज़िम्मेदारी सौंपी और २७ रजब को वलीद ने इमाम हुसैन और उनके घराने वालों को बुला भेजा लेकिन वहाँ पे बैयत में मामले में बहस हो गयी और इमाम हुसैन इंकार करके चले आये लेकिन आने के साथ ही अपने घराने वालों से कहा सफर की तैयारी करो ।

इमाम हुसैन (अ.स ) हज़रत मुहम्मद (स.अ व ) के नवासे थे और यह कैसे संभव था कि वो यज़ीद जैसे ज़ालिम और बदकार को खलीफा मान लेते ? इमाम हुसैन ने नेकी की दावत देने और लोगों को बुराई से रोकने के लिए अपना पहला सफर मदीने से मक्का का शुरू करने का फैसला कर लिया ।

पहला सफर 

इमाम हुसैन (अ.स ) मस्जिद ए नबवी  में गयी चिराग़ को रौशन किया और हज़रत मुहम्मद (स.अ व ) की क़ब्र के किनारे बैठ गए और अपने गाल क़ब्र पे रख दिया यह सोंच के की क्या जाने फिर कभी मदीने वापस आना भी हो या नहीं और कहाँ नाना आपने जिस दीन  को फैलाया था उसे उसकी सही हालत में बचाने के लिए मुझे सफर करना होगा । अल्लाह से दुआ कीजेगा की मेरा यह सफर कामयाब हो ।

उसके बाद इमाम हुसैन अपनी माँ जनाब ऐ फातिमा स अ की क़ब्र पे आये और ऐसे आये जैसे कोई बच्चा अपनी माँ के पास भागते हुए आता है और बस चुप चाप बैठ गए और थोड़ी देर के बाद जब वहाँ से जाने लगे तो क़ब्र से आवाज़ आई जाओ बेटा कामयाब रहो और घबराओ मत मैं भी तुम्हारे साथ साथ रहूंगी ।

  अपने नाना हज़रत मुहम्मद (स.अ व ) और माँ जनाब ऐ फातिमा से  विदा लेने के बाद इमाम अपनी बहन जनाब ऐ ज़ैनब के पास पहुंचे और अपने बहनोई अब्दुल्लाह इब्ने जाफर ऐ तैयार इब्ने अबु तालिब से इजाज़त मांगी की ज़ैनब और दोनों बच्चों ऑन मुहम्मद को सफर में साथ जाने की इजाज़त दे दें । जनाब अब्दुल्लाह ने इजाज़त दे दी ।

इधर मर्दो में हज़रत अब्बास ,जनाब ऐ क़ासिम , सब सफर पे जाने की तैयारी करने लगे यहां तक की  ६ महीने के जनाब ऐ अली असग़र का झूला भी तैयार होने लगा । यह सब बिस्तर पे लेटी  इमाम हुसैन की ८ वर्षीय बेटी सुग़रा देख रही थी और इंतज़ार कर रही थी की बाबा हुसैन आएंगे और उसे भी चलने को कहेंगे ।

इमाम हुसैन बेटी सुग़रा के पास आये और कहा बेटी जब तुम पैदा हुयी थी तो तुम्हारा नाम मैंने अम्मा के नाम पे फातिमा रखा था और मेरी माँ साबिर थी तुम भी सब्र करना और यहीं मदीने में उम्मुल बनीन और उम्मे सलमा  के साथ रहना । बीमारी में सफर तुम्हारे लिए मुश्किल होगा और हम सब जैसे ही किसी मक़ाम पे अपना ठिकाना बना पाएंगे वैसे ही तुमको भी बुला लेंगे । बाबा का कहा बेटी कैसे टाल सकती थी बस आँख में आंसू आये और उन्हें पी गयी और चुप रही लेकिन एक आस थी की चाचा अब्बास है शायद उनके कहने से उसे बाबा साथ ले जाएँ ।

हज़रत अब्बास अलमदार और जनाब ऐ अली अकबर सुग़रा से मिलने आये लेकिन सुग़रा को वही जवाब दिया जो इमाम हुसैन ने दिया था और जब हर उम्मीद टूट गयी सुग़रा की तो बोली भैया अली अकबर जब तुम्हारी शादी हो जाय और मैं तुम्हारे मदीने वापस आने पे दुनया से चली जाऊं तो अपनी बीवी के साथ मेरी क़ब्र पे ज़रूर आना ।

हज़रत  अब्बास और जनाब ऐ अली अकबर ने आंसुओं से भरी आँखों से सुग़रा को रुखसत किया ।

काफिला सुबह का सूरज निकलते ही चलने के लिए तैयार हो गया । एक तरफ उम्मे सलमा थी तो दूसरी तरफ उम्मुल बनीन और सुग़रा ने सभी को अलविदा कहा और सुग़रा ने अपने भाई जिसके साथ खेल करती थी उसे भी प्यार किया और अली असग़र माँ लैला के हवाले कर दिया ।

काफिला चल पड़ा सुग़रा सबको मुस्करा के अलविदा कह रही थी और बाबा हुसैन मुड मुड़ के बेटी को देखते जाते थे और अली अकबर तो आंसुओं को कहीं सुग़रा देख ना ले इसलिए मुड़  भी नहीं रहे थे । जब काफिला नज़रों से दूर हो गया और इमाम को सुग़रा के लिए देख सकता मुमकिन ना था बस हुसैन आंसुओं से रो  पड़े उधर अली अकबर के आंसू बने लगे और बेटी को अलविदा कहा । िस्ञ्ा आसान नहीं होता बाप के लिए बेटी को छोड़ के जाना ।

  दिन बीते महीने बीते जनाब ऐ सुग़रा उम्मुल बनीन के पास आती जाती रहती थी फिर रमज़ान भी गया  ऐ मुहर्रम आ गया । एक दिन सुग़रा को रात में प्यास लगी और उसने पानी पीना चाह की पानी में कुछ देखा और चिल्ला के उम्मे सलमा की बाँहों में चली गयी । उम्मे सलमा ने पुछा क्या हुआ बीबी तो सुग़रा ने कहा नानी पानी में मुझे अली असग़र का चेहरा दिखा अपने दोनों हाथों से मेरे पास आना चाह रहा था लेकिन सूखे लबों पे ज़बान फेर के बोला " अल अतश या उक्ति फातिमा " ऐ बहन फातिमा मैं प्यासा हूँ ।


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