जानिये अज़ान का इतिहास और मस्जिद से अज़ान देने का कारण |




आज कल अज़ान बहुत चर्चा में है क्यूँ की ये अज़ान आज हर मस्जिद से पांच वक़्त या तीन वक़्त दी जाती है और बहुत सी मस्जिद में ये अज़ान लाउड स्पीकर के इस्तेमाल से दी जाती है जिसे हर धर्म के लोग सुनते हैं इसलिए इसपे चर्चा भी होनी है जो की उचित भी  है |

सबसे पहले तो ये समझना पड़ेगा की अज़ान क्यूँ दी जाती है और अज़ान में क्या कहा जाता है ?

मदीना में जब सामूहिक नमाज़ पढ़ने के मस्जिद बनाई गई तो इस बात की जरूरत महसूस हुई कि लोगों को नमाज़ के लिए किस तरह बुलाया जाए, उन्हें कैसे सूचित किया जाए कि नमाज़ का समय हो गया है। मोहम्मद साहब ने जब इस बारे में अपने साथियों सहाबा से राय मश्वरा किया तो सभी ने अलग अलग राय दी। किसी ने कहा कि प्रार्थना के समय कोई झंडा बुलंद किया जाए। किसी ने राय दी कि किसी उच्च स्थान पर आग जला दी जाए। बिगुल बजाने और घंटियाँ बजाने का भी प्रस्ताव दिया गया, लेकिन मोहम्मद साहब को ये सभी तरीके पसंद नहीं आए।

रवायतों के अनुसार जिब्रील द्वारा अल्लाह ने इस अज़ान को हज़रत मुहम्मद (स.अ.व ) को एक वही के द्वारा सिखाया और कुछ जगह यह भी मिलता है की जब हज़रत मुहम्मद (स.अ.व ) मीराज पे गए तो रास्ते में एक जगह अल बेत अल मामूर जगह पडी जहां नमाज़ का वक़्त हो गया था तो फरिश्तों के सरदार जिब्रील ने यह अज़ान दी और उसके बाद नमाज़  हज़रत मुहम्मद (स.अ.व ) ने पढ़ी और उनके पीछे फरिश्तों ने पढ़ी |

इस अज़ान को सीखने के बाद  हज़रत मुहम्मद (स.अ.व )  ने हुक्म  दिया की  हज़रत बिलाल को अज़ान इन्ही  शब्‍दों में पढ़ने की हिदायत कर दो, उनकी आवाज़ बुलंद है इसलिए वह हर नमाज़ के लिए इसी तरह अज़ान दिया करेंगे। इस तरह हज़रत बिलाल रज़ियल्लाहु अन्हु इस्लाम की पहली अज़ान कही। यह अज़ान मदीने में मस्जिद ऐ नबवी की मीनार से और मक्का में खान ऐ काबा की छत से हज़रत बिलाल दिया करते थे |

अज़ान एक घोषणा है जिसमे कहा जाता है की अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर -ईश्वर सब से महान है।

अश-हदू अल्ला-इलाहा इल्लल्लाह-मैं गवाही देता हूं कि ईश्वर के अतिरिक्त कोई दूसरा इबादत के योग्य नहीं।

अश-हदू अन्ना मुहम्मदर रसूलुल्लाह-मैं गवाही देता हूं कि मुहम्मद सल्ल. ईश्वर के अन्तिम संदेष्टा हैं।

ह्या 'अलास्सलाह, ह्या 'अलास्सलाह-आओ नमाज़ की तरफ़। और इसी प्रकार अज़ान की अह्मियात को बताते हुए यह अज़ान ईश्वर सब से महान है और ईश्वर के सिवाए कोई माबूद (पालने वाला ) नहीं। के साजो थ ख़त्म हो जाती है |

इस अज़ान को सुन के लोगों को यह पता चलता है की अल्लाह की इबादत (पांच वक़्त की नमाज़ ) का समय हो गया है चलो नमाज़ पढ़ी जाय | आप कह सकते हैं की 


मस्जिद में लोगों को नमाज़ के लिए बुलाने के लिए अज़ान दी जाती है। अज़ान का भावार्थ है ‘पुकारना या घोषणा करना‘ और यह अल्लाह के पैगम्बर हज़रत मुहम्मद (स.अ.व ) द्वारा सिखाई गयी और हज़रत बिलाल द्वारा सबसे पहले पढ़ी गयी |

आज यही अज़ान लाउड स्पीकर से इसलिए दी जाती है की इतना शोर रहता है सब तरफ की अगर लाउड स्पीकर से ना दी जाय तो लोगों तक यह आवाज़ नहीं पहुँच पायगी | हमारे भारतवर्ष में लाउड स्पीकर के इस्तेमाल की आजादी हर धर्म के लोगों को दी गयी है और कुछ जगहों पे रात १० बजे के बाद इसकी इजाज़त नहीं है | पहली अज़ान सुबह ५ से  ६ बजे होती है और अंतिम शाम ५-६ बजे तक हुआ करती है |
लेकिन यदि किसी देश के कानून में लाउड स्पीकर के इस्तेमाल पे पाबन्दी है तो इस्लाम कहता है देश के कानून को मानते हुए जीवन गुजारो |

अज़ान के बारे में एक बात और कहता चलूँ की एक दोहा कबीर के नाम से मशहूर है जो कबीर का कहाँ हुआ नहीं है | कांकर पाथर जोरि कै मस्जिद लई बनाय । ता चढ़ि मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय ॥
अज़ान नमाज़ पढने वालों को बुलाने के लिए की गयी घोषणा का नाम है अल्लाह को सुनाने के लिए नहीं dee जाती और यह बात कबीर दास जैसा ग्यानी जानता था इसलिए यह दोहा उनका नहीं हो सकता |

एक अज़ान का समाज केवल २-३ मिनट का हुआ करता है इसलिए इस्पे किसी तरह की आपत्ति का कोई अर्थ नहीं है उस समय तक जब तक अपने देश में लाउड स्पीकर की इजाज़त है | जिस देश में लाउड स्पीकर पे दिन भर गाने और क़वालियाँ, भजन कीर्तन, हर धर्म वालों के प्रवचन की इजाज़त आराम से dee जाय वहाँ 2-३ मिनट की अज़ान पे आपत्ति का कोई अर्थ नहीं है |

नोइस पोल्लुशन अपने आप में एक समस्या है जिस पे चर्चा होनी चाहिए |

ध्वनि प्रदूषण पे चर्चा की जगह केवल अज़ान पे चर्चा समस्या का हल नहीं |



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