सूरए निसा; आयतें 24-25 मुताह और कुरान




 सूरए निसा; आयतें 24-25 

और विवाहित महिलाएं भी तुम पर हराम हैं सिवाए उनके जो दासी के रूप में तुम्हारे स्वामित्व में हों। ये ईश्वर के आदेश हैं जो तुम पर लागू किये गये हैं और जिन महिलाओं का उल्लेख हो चुका उनके अतिरिक्त अन्य महिलाओं से विवाह करना तुम्हारे लिए वैध है कि तुम अपने माल द्वारा उन्हें प्राप्त करो। अलबत्ता पवित्रता के साथ न कि उनसे व्यभिचार करो और इसी प्रकार जिन महिलाओं से तुमने अस्थायी विवाह द्वारा आनंद उठाया है, उन्हें उनका मेहर एक कर्तव्य के रूप में दे दो और यदि कर्तव्य निर्धारण के पश्चात आपस में रज़ामंदी से कोई समझौता हो जाये तो इसमें तुम पर कोई पाप नहीं है। नि:संदेह ईश्वर जानने वाला और तत्वदर्शी है। (4:24)
पिछली आयतों के पश्चात यह आयत दो अन्य प्रकार के निकाहों का वर्णन करती है जो ईश्वर के आदेश से वैध हैं तथा यह आयत ईमान वालों को ईश्वरीय सीमाओं के पालन की सिफ़ारिश करती है। आरंभ से लेकर अब तक मानव समाजों की एक कटु वास्तविकता जातीय व धार्मिक युद्ध व झड़पें हैं जिनके कारण दोनों पक्षों के अनेक लोग हताहत और बेघर हो जाते हैं और चूंकि युद्धों का मुख्य भार पुरुषों पर होता है अत: दोनों पक्षों के अनेक परिवार बेसहारा हो जाते हैं। दूसरी ओर चूंकि प्राचीन युद्ध क़ानूनों में युद्धबंदियों की देखभाल के लिए कोई स्थान नहीं होता था अत: बंदी बनाये जाने वाले पुरुषों को दास और महिलाओं को दासी या लौंडी बना लिया जाता था। इस्लाम ने इस क़ानून को एकपक्षीय रूप से समाप्त नहीं किया बल्कि कफ़्फ़ारे अर्थात पाप के प्रायश्चित जैसे क़ानून बनाकर ग़ुलामों और दासियों की धीरे धीरे स्वतंत्रता की भूमि प्रशस्त कर दी। इसी प्रकार उसने बंदी बनाई गई महिलाओं से विवाह को वैध घोषित किया जिसके कारण पत्नी और माता के रूप में बंदी महिलाओं को सम्मान प्राप्त हो गया।
इसमें एकमात्र कठिनाई यह थी कि बंदी बनाई जाने वाली कुछ महिलाएं उस समय विवाहित होती थीं जिनके पति भी बंदी बनाये जा चुके होते थे। इस्लाम ने तलाक़ की भांति बंदी बनाये जाने को उनके बीच जुदाई का कारण बताया तथा महिलाओं के पुन: विवाह के लिए एक अवधि निर्धारित कर दी ताकि पता चल जाये कि वे गर्भवती नहीं हैं और पिछले पति से उनके पेट में कोई बच्चा नहीं है। स्वाभाविक है कि यह बात महिलाओं को उनके हाल पर छोड़ देने और उनकी स्वाभाविक इच्छाओं की उपेक्षा से कहीं बेहतर व तर्कसंगत है।
इसी प्रकार आतंरिक मोर्चे पर भी अनेक मुसलमान शहीद होते थे और उनके परिवार बेसहारा हो जाया करते थे। इस्लाम ने इस समस्या के समाधान के लिए दो मार्ग सुझाए। एक बहुविवाह का क़ानून अर्थात एक विवाहित व्यक्ति चार विवाह कर सकता है और उसे अपनी पत्नियों के साथ भी पहली पत्नी की भांति व्यवहार करना चाहिये तथा उसकी दूसरी पत्नियां भी स्थायी रूप से उसके विवाह में आ जाती हैं। पिछली आयत में इस बात पर चर्चा की गई। इस आयत में दूसरा मार्ग अस्थायी विवाह का बताया गया है। अस्थायी विवाह भी स्थायी विवाह की भांति ही एक ऐसा संबंध है जो ईश्वर के आदेश से वैध है केवल इसकी अवधि सीमित परंतु वृद्धि योग्य है। रोचक बात यह है कि तथाकथित बुद्धिजीवी और पश्चिम से प्रभावित लोग इस्लाम की इस योजना का परिहास करते हुए इसे महिलाओं का अनादर बताते हैं जबकि पश्चिम में पुरुषों और महिलाओं के संबंधों की कोई सीमा नहीं है तथा वहां कई पुरुषों से एक महिला के खुले व गुप्त संबंधों को वैध माना जाता है। उनसे यह पूछना चाहिये कि किस प्रकार बिना किसी नियम के वासना पर आधारित स्त्री और पुरुष के संबंध वैध हैं और यह महिलाओं का अनादर नहीं है परंतु यदि यही संबंध एक निर्धारित और पूर्णत: पारदर्शी नियम के अंतर्गत बिल्कुल स्थायी विवाह की भांति हों तो इसमें महिलाओं का अनादर हो जाता है?
खेद के साथ कहना पड़ता है कि ईश्वरीय आदेशों तथा पैग़म्बरों की परम्परा के प्रति इस प्रकार के मनचाहे व्यवहार इस्लाम के आरंभिक काल में भी होते थे परंतु पैग़म्बर के पश्चात अस्थायी विवाह को प्रतिबंधित घोषित कर दिया गया जिसके कारण गुप्त संबंधों और व्यभिचार की भूमि समतल हो गयी क्योंकि अस्थायी विवाह के आदेश को रोक देने से मानवीय इच्छायें और आवश्यकताएं तो समाप्त नहीं हो जातीं बल्कि ग़लत मार्गों से उनकी आपूर्ति होने लगती है।
इस आयत से हमने सीखा कि सामाजिक व पारिवारिक मामलों के संबंध में हमें वास्तविकतापूर्ण दृष्टि रखनी चाहिये न कि भावनाओं और अपने निजी या किसी गुट के विचारों का अनुसरण करना चाहिये। इस संबंध में सबसे अच्छा मार्ग मनुष्य के सृष्टिकर्ता और मानवीय तथा समाजिक आवश्यकताओं से पूर्णत: अवगत ईश्वर के आदेशों का पालन है।
विवाह, चाहे स्थायी हो या अस्थायी, स्त्री व पुरुष की पवित्रता और उनके सम्मान की रक्षा के लिए एक सुदृढ़ दुर्ग है।
विवाह के मेहर में स्त्री और पुरुष दोनों का राज़ी होना आवश्यक है न कि केवल पुरुष ही उसकी राशि का निर्धारण करे।
सूरए निसा की 25वीं आयत

और तुममें से जिसके पास इतनी आर्थिक क्षमता न हो कि पवित्र व ईमान वाली स्वतंत्र महिला से विवाह कर सके तो उसे उन ईमान वाली दासियों से विवाह करना चाहिये जिनके तुम मालिक हो और ईश्वर तुम्हारे ईमान से सबसे अधिक अवगत है कि तुम ईमान वाले सबके सब एक दूसरे से हो और तुम में कोई अंतर नहीं है तो ईमान वाली दासियों से उनके मालिक की अनुमति से विवाह करो और उनका जो बेहतर व प्रचलित मेहर हो वह उन्हें दो, अलबत्ता ऐसी दासियां जो पवित्र चरित्र की हों न कि व्यभिचारी और गुप्त रूप से अन्य पुरुषों से संबंध रखने वाली। तो जब वे विवाह कर लें और उसके पश्चात व्यभिचार करें तो स्वतंत्र महिला को दिये जाने वाले दंड का आधा दंड उन्हें दिया जायेगा। इस प्रकार का विवाह उन लोगों के लिए है जिन्हें पत्नी न होने के कारण पाप में पड़ने का भय हो परंतु यदि धैर्य रखो यहां तक कि आर्थिक क्षमता प्राप्त करके स्वतंत्र महिला से विवाह कर लो तो यह तुम्हारे लिए बेहतर है और ईश्वर क्षमाशील एवं दयावान है। (4:25)


पिछली आयत में दासियों और युद्ध में बंदी बनाई जाने वाली महिलाओं से विवाह को वैध बताने के पश्चात यह आयत मुस्लिम पुरुषों को, जो भारी मेहर के कारण स्वतंत्र महिलाओं से विवाह की आर्थिक क्षमता नहीं रखते, बंदी महिलाओं से विवाह के लिए प्रोत्साहित करती है ताकि वे सही मार्ग से अपनी शारीरिक आवश्यकताओं की पर्ति कर सकें और समाज में बुराई न फैलने पाये तथा वे महिलाएं भी बिना पति के न रहें। यहां रोचक बात यह है कि क़ुरआने मजीद विवाह की अस्ली शर्त ईमान बताता है चाहे दासी के साथ हो या स्वतंत्र महिला के साथ। इस बात से पता चलता है कि यदि युवा लड़के-लड़की में कोई जान पहचान न हो और सामाजिक दृष्टि से भी वे एक दूसरे के स्तर के न हों परंतु ईमान वाले और धार्मिक आदेशों पर प्रतिबद्ध हों तो सफल व शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत कर सकते हैं परंतु यदि उनमें ईमान न हों तो चाहे वे धन सम्पत्ति, पद और सुन्दरता के उच्च स्तर पर हों तब भी उनके वैवाहिक जीवन के सुखी होने की संभावना नहीं है क्योंकि ये सारी बातें समय के साथ-साथ समाप्त हो जाती हैं।
इस आयत से हमने सीखा कि दासी से विवाह को सहन कर लेना चाहिये परंतु पाप की बेइज़्ज़ती की नहीं।
जो लोग भारी ख़र्चे के कारण विवाह करने में अक्षम हैं उनके लिए इस्लाम में कोई बंद गली नहीं है।
विवाह और उसे दृढ़तापूर्वक बाक़ी रखने की मूल शर्त अवैध संबंधों से दूर रहना तथा एक दूसरे से विश्वास घात न करना है।
बुरे चरित्र के लोगों को, जो समाज में बुराई फैलाते हैं, प्रलय के दण्ड के अतिरिक्त इस संसार में भी दंड देना चाहिये ताकि दूसरों को भी इससे पाठ मिले और स्वयं भी इस प्रकार का काम न करें।




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