जन्नत किसे मिलेगी जानिए कुरान से | सूरए मोमिनून की 10वीं और 14वीं आयत




सूरए मोमिनून, आयतें 8-14,  


और जो लोग अपनी अमानतों और अपनी प्रतिज्ञा का पालन करते हैं।(23:8) और जो सदैव अपनी नमाज़ों की रक्षा करते हैं। (23:9)

 ईमान वाले, अमानतदार होते हैं। वे ईश्वर की अमानतों और लोगों की अमानतों की रक्षा करते हैं। उल्लेखनीय है कि ईश्वर की किताब, पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की सुन्नत या उनका चरित्र और उनके पवित्र परिजन भारी अमानतें हैं। इन अमानतों की रक्षा केवल धार्मिक कर्तव्यों के पालन द्वारा ही संभव है।



इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार लोगों की अमानत की रक्षा के मामले में ईमान वाले और काफ़िर में कोई अंतर नहीं है और अमानत, उसके मालिक तक पहुंचानी ही चाहिए चाहे वह सद्कर्मी हो या भ्रष्ट और अमानत मूल्यवान हो या मूल्यहीन। अमानत की रक्षा और सच्चाई इतनी महत्वपूर्ण है कि पैग़म्बर व उनके परिजनों ने कहा है कि लोगों के अच्छे या बुरे होने की कसौटी उनकी नमाज़, रोज़ा या हज नहीं बल्कि उनकी सच्चाई और अमानतदारी है।





पारिवारिक वचनों व प्रतिज्ञाओं और सामाजिक समझौतों का पालन, ईमान वालों की अन्य विशेषताओं में से है। वचन व प्रतिज्ञा का पालन भी अमानतदारी की भांति ईमान वालों से विशेष नहीं है और काफ़िरों के साथ किए गए समझौतों को एकपक्षीय ढंग से नहीं तोड़ा जा सकता।





ईमान वालों की कुछ विशेषताओं का वर्णन करने के बाद क़ुरआने मजीद आयत के अंत में एक बार फिर नमाज़ की ओर संकेत करता है कि जो सबसे प्रमुख उपासना है। क़ुरआन ईमान वालों से कहता है कि नमाज़, उसके समय और उसके आदेशों पर ध्यान दें। रोचक बात यह है कि ईमान वालों की विशेषताएं, नमाज़ में विनम्रता से आरंभ होती हैं और नमाज़ की रक्षा पर समाप्त होती हैं। इससे मनुष्य की प्रगति व प्रशिक्षण में नमाज़ की मूल भूमिका का पता चलता है।





इन आयतों से हमने सीखा कि धार्मिक क़ानूनों और सामाजिक समझौतों के प्रति कटिबद्धता, ईमान की निशानियों में से है।



धार्मिक आदेशों की रक्षा और उनका सही ढंग से पालन, ईमान की सुदृढ़ता और ईश्वर से मनुष्य के सामिप्य का कारण बनता है।



 सूरए मोमिनून की 10वीं और 11वीं आयत

यही लोग तो वारिस हैं।(23:10) जो स्वर्ग की विरासत पाएँगे (और) वे उसमें सदैव रहेंगे। (23:11)


ये आयतें कहती हैं कि सच्चे ईमान वालों का अंतिम ठिकाना ईश्वर का अमर स्वर्ग है कि जो केवल ईमान वालों को ही विरासत में मिलेगा। रोचक बात यह है कि इन आयतों में मीरास की बात कही गई है और उसे दोहराया भी गया है। शायद इसका कारण यह हो कि यद्यपि ईश्वरीय पारितोषिक मनुष्यों के कर्मों के आधार पर होता है किंतु यह पारितोषिक इतना बड़ा व अतुल्य है कि मनुष्य के तुच्छ कर्मों के मुक़ाबले में उस विरासत की भांति है कि जो बिना किसी कष्ट व प्रयास के मिल गई हो।



इन आयतों से हमने सीखा कि मनुष्य की संपत्ति संसार में दूसरों के लिए विरासत के रूप में छोड़ दी जाती है जबकि उसके कर्म उस विरासत की भांति हैं जो स्वयं उसे प्रलय में मिलेगी।





स्वर्ग, ईमान वालों के लिए ऐसा अमर पारितोषिक है जिसमें कोई परिवर्तन नहीं होगा।



 सूरए मोमिनून की 12वीं, 13वीं और 14वीं आयत


और निश्चय ही हमने मनुष्य की रचना मिट्टी के सत से की।(23:12) फिर हमने उसे (मां की कोख में) एक सुरक्षित स्थान पर टपकी हुई बूँद बना कर रखा। (23:13) फिर हमने उस बूँद को जमे हुए ख़ून का रूप दिया, फिर हमने जमे हुए ख़ून का लोथड़ा बनाया फिर उस लोथड़े से हड्डियों का ढांचा बनाया फिर हमने उन हड्डियों पर मांस चढ़ाया फिर हमने उसे सृष्टि का दूसरा रूप देकर खड़ा किया तो क्या ही बरकत वाला है ईश्वर जो सबसे उत्तम रचयिता है। (23:14)


सूरए मोमिनून की आरंभिक आयतों में ईमान वालों की विशेषताओं का उल्लेख करने के पश्चात इन आयतों में क़ुरआने मजीद मनुष्य को माता की कोख में अपने पलने बढ़ने के चरणों को समझने का निमंत्रण देता है और कहता है कि मनुष्य के अस्तित्व का आधार पानी व मिट्टी है और रचयिता ने अपनी शक्ति से उसमें इतनी योग्यताएं व क्षमताएं रखी हैं कि जिनके माध्यम से वह परिपूर्णता के उच्च चरणों तक पहुंच सकता है।



क़ुरआने मजीद के चमत्कारों में से एक, आज से चौदह शताब्दियों पूर्व माता की कोख में भ्रूण के पलने बढ़ने के चरणों का वर्णन है और जो कुछ उसने कहा है उसमें और नवीन युग की वैज्ञानिक खोजों में कोई अंतर नहीं है। यह ऐसी स्थिति में है कि जिस समय ईश्वर की ओर से पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पास क़ुरआने मजीद भेजा गया तब तक भ्रूण के विकास के चरणों के बारे में ज्ञान प्राप्त करने का कोई साधन नहीं था। यह कार्य हालिया शताब्दियों में विकसित मशीनों के माध्यम से ही संभव हो पाया है और अब मनुष्य इन मशीनों द्वारा भ्रूण के विकास के चरणों के चित्र देख सकता है।



चौदहवीं आयत उस चरण की ओर संकेत करती है जिसे मनुष्य देख नहीं सकता। यह चरण है मानवीय शरीर में प्राण फूंके जाने का जिसे क़ुरआने मजीद ने सृष्टि का दूसरा रूप कहा है। इसी के कारण मनुष्य को अन्य रचनाओं पर प्राथमिकता प्राप्त हुई है और इसी लिए ईश्वर ने अपने आपको सबसे अच्छा रचयिता बताया है।



इन आयतों से हमने सीखा कि मनुष्य की रचना में ईश्वर की शक्ति पर ध्यान देना, उसके सामर्थ्य और तत्वदर्शिता के बारे में सोच-विचार का एक मार्ग है और इससे ईमान सुदृढ़ होता है।



अपने आपको पहचानना, ईश्वर को पहचानने की भूमिका है।




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