कुरान की चालीस हिदायतें |

१.    हमेशा सही बात करो। ( 7-  सूरह. 33) २. जब तुम पर कोई मुसीबत पड़े तो यक़ीन जानो के उसका बायस (कारण) तुम ख़ुद हो। ( 79-  ...





१.  हमेशा सही बात करो। (7- सूरह.33)
२. जब तुम पर कोई मुसीबत पड़े तो यक़ीन जानो के उसका बायस (कारण) तुम ख़ुद हो। (79- सूरह. 4)
३. ज़ालिमों की नुसरत (सहायता) करने वाला कोई नहीं। (192- सूरह. 3)
४. कभी माँगने वाले को झिड़को नहीं। (10- सूरह. 3)
५. वह बात क्यों कहते हो जो कर नहीं सकते। (2- सूरह. 61)
६. कभी किसी की टोह में मत रहा करो। (14- सूरह. 49)
७. जिस चीज़ का तुमको इल्म (ज्ञान) नहीं उसके बारे में कुछ न कहो क्योंकि कानआँख और सब के सब क़यामत के दिन जवाब देह (उत्तरदायी) होगें। (36- सूरह. 49)
८. फ़साद (झगड़े) करते न फिरो। (56- सूरह. 7)
९. तुम उन लोगों से दूर रहो जिन्होंने दीन को खेल तमाशा बना रखा है। (69- सूरह. 7)
१०. ख़्वाहेशात नफ़सानी (आत्मइच्छाओं) की पैरवी मत करो वरना राहे ख़ुदा से हट जाओगे। (26- सूरह. 83)
११. लग़ो (व्यर्थ) बातों से बचो। (4- सूरह. 44)
१२. मुनाफ़क़ीन (जिनका बाहरी व आंनतरिक एक न हो) की एक अलामत (चिन्ह) यह है के जब वह नमाज़ के लिये ख़ड़े होते हैं तो बे-दिली के साथ। (142- सूरह. 3)
१३. तुम अल्लाह के बाज़ अहकामात (आज्ञाओं) पर ईमान रखते हो और बाज़ से इन्कार कर देते हो – उसकी सज़ा दुनिया में तुम्हारी रूस्वाई है और आख़रत (परलोक) में शदीद अज़ाब (सज़ा) हैं। (85- सूरह. 4)
१४. अपने ओमूर (कार्य) में लोगों से मशविरा करो और जब कोई बात तय कर लो तो फिर अल्लाह पर भरोसा रखो क्योंकि अल्लाह इस बात को पसन्द करता है। (159- सूरह. 3)
१५. क़ाबिले मुबारकबाद हैं वो लोग जो ग़ौर से बाते सुनते हैं और उनमें से अच्छी बातों को अपनातें हैं। (18- सूरह. 39)
१६. अहकामे इलाही (ईशवरीय आज्ञाओं) के नेफ़ाज़ (लागू) में किसी क़िस्म की रू- रेआयत नहीं बर्तनी चाहिये। (2- सूरह. 24)
१७. अपनी ख़ैरात को एहसान जता कर और साएल को कबिदा ख़ातिर (रंजीदा) करके बर्बाद न करो। (264- सूरह. 2)
१८. ग़ैरों को भी अपना राज़दार न बनाओ। (76- सूरह.3)
१९. मोमिन ख़ुदा की राह में जेहाद करता है -- काफ़िर माद्दी (दुनियावी) ताक़तों की बहीली के लिये अपनी जान देता है -- तुम शैतान के साथियों से मुक़ाबला करो -- और शैतान के हरबे तो यक़ीनन कमज़ोर हैं। (76- सूरह.4)
२०. सुस्ती न करो और परेशान ख़ातिर न हो -- अगर तुम मोमिन हो तो तुम्हीं सरबलन्द रहोगे। (139- सूरह.3)
२१. किसी नाफ़रमान की बात पर बग़ैर तहक़ीक़ किये ऐतेबार न करो वरना हो सकता है कि बाद में तुम्हें नादिम (पछतावा) होना पड़े। (6- सूरह.49)
२२. एक दूसरे को बूरे अल्क़ाब (अपशब्द) से मत नवाज़ो। (11- सूरह.49)
२३. जो इलाही अहकामात (ईशवरीय आज्ञाओं) के मुताबिक़ अमल (कार्य) नहीं करते – वही काफ़िर हैं वही ज़ालिम हैं – वही फ़ासिक़ हैं। (45- सूरह.5)
२४.     आपस में झगड़ा न करो वरना तुम्हारी हिम्मतें पस्त हो जायेगीं और रोब व दबदबा ख़त्म हो जाएगा। (46- सूरह.8)
२५.     अगर तुम शुक्र बजा लाओगे तो हम तुम्हारी नेमतों में इज़ाफ़ा कर देंगे. (7- सूरह.14)
२६. नमाज़े शब पढ़ा करो यह तुम्हारे लिये फ़ज़ीलत है ताकि ख़ुदा तुम्हें मक़ामे महमूद (पुनीत कक्ष) अता करे। (79- सूरह.17)
२७.     हर शख़्स अपने फ़ेल (कार्य) का ज़िम्मेदार है -- और रोज़े हिसाब (क़यामत) कोई किसी का बार (बोझ) नहीं उठायेगा। (165- सूरह.6)
२८. जो लोग हमारी राह में जेहाद (संघर्ष) करते हैं उनको हम दीनी राह ख़ुद बताते हैं। (69- सूरह.29)
२९. तुम अपने अहद व पैमान (वचन) की हमेशा वफ़ा (पूरा) करो। (1- सूरह.5)
३०. दरगुज़र से काम लोअच्छी बातों का हुक्म दो और जाहिलों से किनारा कश (दूर) रहो। (199- सूरह.7)
३१. नेकियों और अच्छाईयों में एक दूसरे का हाथ बटाओ लेकिन गुनाह व सरकशी में किसी का साथ न दो। (2- सूरह.5)
३२. ख़ुदा तुम्हें हुक्म देता है के अमानतें उनके मालिकों तक पहुँचाओ और जब लोगों के दरमियान फ़ैसला करो तो इन्साफ़ से काम लो। (58- सूरह.4)
३३. ख़ुदा किसी भी ख़यानतकार को दोस्त नहीं रखता है। (38- सूरह.22)
३४.     लोग क़ुरआन के मतालिब (मतलब का बहु) पर ग़ौर क्यों नहीं करतेक्या उनके दिलों पर ताले पड़े होते हैं। (24- सूरह.47)
३५.     तुम अपने माँबाप और अपने भाई बहनों को अपना ख़ैर ख़ा (अच्छाई करने वाला) न समझो अगर वह ईमान पर ग़लत बातों को तरजीह (प्राथमिकता) देते हैं। (23- सूरह.9)
३६. अगर तुम्हें अपने अज़ीज़अपना ख़ानदानअपना माल व मता अपनी तेजारत (व्यवसाय) अपने पसन्दीदा मकानात -- अल्लाह और उसके रसूल और उसकी राह में जेहाद करने से ज़्यादा अज़ीज़ (प्यारे) हैं -- तो अल्लाह के अज़ाब का इन्तेज़ार (प्रतिक्षा) करो। (24- सूरह.9)
३७.     जो लोग माल व दौलत जमा करते हैं और अल्लाह की राह (मार्ग) में सर्फ़ (ख़र्च) नहीं करते तो उन्हें दर्दनाक अज़ाब से बा-ख़बर कर दो। (34- सूरह.9)
३८. शराबजुआबुतपाँसे नजिस और शैतानी खेल हैं अगर आख़ेरत (परलोक) की कामयाबी चाहते हो तो इन चीज़ों से बचो। (90- सूरह.5)
३९. जो शख़्स ईमान के साथ नेक आमाल (कार्य) भी अन्जाम देगा हम उसकी दुनिया व आख़ेरत (परलोक) दोनो सँवार देंगे। (88- सूरह.18)
४०. तो (ऐ गिरोह जिन व इन्स (जिन्नात और मनुष्य)) तुम दोने अपने परवरदिगार (ईश्वर) की कौन कौन सी नेमत को ना मानोगे। (13- सूरह. 97)



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