इमाम अली (अ) और हमारा समाज

इमाम अली (अ) ने फ़रमायाः हे लोगों हिदायत और नजात के रास्ते में आदेश पालन करने वालों की संख्या की कमी से न डरो (और विरोधियों की अ...




इमाम अली (अ) ने फ़रमायाः हे लोगों हिदायत और नजात के रास्ते में आदेश पालन करने वालों की संख्या की कमी से न डरो (और विरोधियों की अधिक्ता से न डरो) क्योंकि लोग उस दस्तरख़ान पर एकत्र हो गए हैं कि जिसका खाना कम और भूक अधिक है।

(और समाप्त हो जाने वाली दुनिया और उसकी चमक दमक सी चाहत और हक़ का पालन न करने से वह हमेशा बाक़ी रहने वाले अज़ाब में रहेंगे)

2. قال علی علیه السلام:

أَيُّهَا اَلنَّاسُ طُوبَى لِمَنْ شَغَلَهُ عَيْبُهُ عَنْ عُيُوبِ اَلنَّاسِ وَ طُوبَى لِمَنْ لَزِمَ بَيْتَهُ وَ أَكَلَ قُوتَهُ وَ اِشْتَغَلَ بِطَاعَةِ رَبِّهِ وَ بَكَى عَلَى خَطِيئَتِهِ فَكَانَ مِنْ نَفْسِهِ فِي شُغُلٍ وَ اَلنَّاسُ مِنْهُ فِي رَاحَةٍ؛

इमाम अली (अ) ने फ़रमायाः हे लोगों मुबारकबाद है उस व्यक्ति के लिए जिसकी अपनी बुराई और ख़राबी उसको लोगों के ऍबों को देखने और तलाश करने से रोक देती है, और मुबारकबाद है उस व्यक्ति के लिए जो अपने घर में बैठे (फ़साद और बुराई ना फैलाए और ख़ुद को नेक कार्य के करने और बुराई को रोकने के लिए तैयार करे) और अपनी रोज़ी को खाए (दूसरों के माल में लालच न करे) और अपने ख़ुदा की इबादत में व्यस्त रहे और अपने पापों पर रोये (तौबा करे) और अपना काम करे और लोग (उसके हाथ और ज़बान से) उससे आराम और सुकून में रहें (लोगों को सताए नही, ग़ीबत न करे, आरोप और तोहमत न लगाए और अपनी ज़बान से मोमिनों को परेशान न करे)

3.  قال علی علیه السلام:

(فی وصیّته لابنه الحسین (علیه السلام): أي بُنَيَّ ما شرَّ بعدَه الجنةُ بشرٍّ و لا خيرَ بعدَه النار بخيرٍ و كلُّ نعيمٍ دون الجنة محقور و كل بلاءٍ دون النار عافية...

أي بنيَّ عزّ المؤمن غناه عن الناس و القناعة مال لا ينفد. و من أكثر ذكر الموت رضي من الدنيا باليسير و مَن علم أنَّ كلامه من عمله قلَّ كلامُه إلا فيما ينفعُه...

أي بنيَّ العافية عشرة أجزاء تسعة منها في الصَّمت إلاّ بذكر الله و واحدٌ في ترك مجالسة السُّفَهاء.


इमाम अली (अ) अपने बेटे इमाम हुसैन (अ) को की जाने वाली वसीयत के अंतरगत फ़रमाते हैं: हे मेरे प्यारे बेटे हर वह दुख और कठिनाई जिसके बाद जन्नत हो, वह दुख और कठिनाई नहीं है और हर वह ख़ुशी और अच्छाई जिसके पीछे नर्क हो वह ख़ुशी और अच्छाई नहीं है, और हर नेमत जो जन्नत से कम हो कम क़ीमत और हर बला जो नर्क से कम हो सलामती है।

हे मेरे प्यारे बेटे, मोमिन का सम्मान और उसकी इज़्ज़त लोगों से बेनियाज़ी में है (यानी लोगों से आशा न लगा कर रखे) और क़नाअत वह माल है जो कभी समाप्त नहीं होता है, और जो भी मौत को अधिक याद करता है वह दुनिया के थोड़े से माल पर राज़ी रहता है (लालच और जमा करने के चक्कर में नहीं पड़ता है) और जिसको भी यह पता हो कि उसकी बात उसके आमाल और व्यवहार का अंग है वह कम बोलता है सिवाय इसके कि वह उसके लिए लाभदायक हो।

हे मेरे प्यारे बेटे, सलामती के सात भाग हैं नौ भाग ख़ामोशी में है सिवाय ख़ुदा के ज़िक्र के और एक भाग बेअक़्लों और बेवक़ूफ़ों के साथ मेल मिलाप को छोड़ने में है।

4- قال علی علیه السلام:

«خالِطُوا النَّاسَ مُخالَطَةً إن مُتُّم مَعَها بَكَوا عَليكُم و إن عِشتُم حَنُّوا إليكُم»؛


इमाम अली (अ) ने फ़रमायाः लोगों के साथ ऐसा व्यवहार करो कि अगर तुम उनके बीच मर जाओ तो वह तुम पर रोएं और अगर जीवित रहो तो वह तुम्हारे साथ रहना चाहें।

5- قال علی علیه السلام:

الناس ثلاثة: عالم ربانیٌّ و متعلِّمٌ علی سبیل النجاة، و همجٌ رعاعٌ اَتباعُ كلِّ ناعِقٍ، یَمیلون مع كلِّ ریحٍ، لم یستَضیئوا بنُور العلم و لم یلجأوا إلی ركن وثیق.

इमाम अली (अ) ने फ़रमायाः लोग तीन प्रकार के हैं:
1.    ईश्वरीय आलिम (वह आलिम जो ख़ुदा के आदेशों की अवहेलना न करता हो)
2.    वह तालिबे इल्म (विद्यार्थी) जो नजात के रास्ते पर है (जो हक़ के रास्ते पर है और लाभदायक ज्ञान प्राप्त करता है)
3.    और (बाक़ी लोग) उन बिखरे हुए मच्छरों की भाति हैं जो हर आवाज़ और पूकार का अनुसरण करते हैं और हर हवा की तरफ़ चल देते हैं, वह इल्म के प्रकाश में नहीं है कि मार्गदर्शित हो सके और कहीं पहुँच सकें, और किसी स्थिर स्तंभ के संपर्क में नहीं है कि नजात पा सकें।

6- قال علی علیه السلام:

الحكمة ضالّة المؤمن، فخذ الحكمة و لو من أهل النفاق.


इमाम अली (अ) ने फ़रमायाः हिकमत और ज्ञान मोमिन की खोई हुई चीज़ है (सदैव उसकी तलाश में रहना चाहिए) तो उसको ले लो अगरचे वह मुनाफ़िक़ के पास हो।

7- عَنْ أَبِي حَمْزَةَ عَنْ أَبِي إِسْحَاقَ السّبِيعِيّ عَمّنْ حَدّثَهُ قَالَ سَمِعْتُ أَمِيرَ الْمُؤْمِنِينَ يَقُولُ:

أَيّهَا النّاسُ اعْلَمُوا أَنّ كَمَالَ الدّينِ طَلَبُ الْعِلْمِ وَ الْعَمَلُ بِهِ أَلَا وَ إِنّ طَلَبَ الْعِلْمِ أَوْجَبُ عَلَيْكُمْ مِنْ طَلَبِ الْمَالِ إِنّ الْمَالَ مَقْسُومٌ مَضْمُونٌ لَكُمْ قَدْ قَسَمَهُ عَادِلٌ بَيْنَكُمْ وَ ضَمِنَهُ وَ سَيَفِي لَكُمْ وَ الْعِلْمُ مَخْزُونٌ عِنْدَ أَهْلِهِ وَ قَدْ أُمِرْتُمْ بِطَلَبِهِ مِنْ أَهْلِهِ فَاطْلُبُوهُ؛


इमाम अली (अ) ने फ़रमायाः हे लोगों जान लो कि धर्म की पूर्ति ज्ञान प्राप्त करने और उसका पालन करने में है, और जान लो कि ज्ञान प्राप्त करना तुम पर माल प्राप्त करने से अधिक वाजिब है क्योंकि माल तुम्हारे लिए निश्चित हो चुका है और एक आदिल (ख़ुदा ने) उसको तुम्हारे बीच बांटा है और उसकी गारन्टी ली है और वह तुम तक पहुँचाएगा लेकिन ज्ञान को उसके हक़दारों के पास रखा गया है और तुम को आदेश दिया गया है कि उसको प्राप्त करों, इसलिए उसको हासिल करो।

8- قال علىّ علیه السّلام:

جهل المرء بعیوبه من أکبر ذنوبه.


इमाम अली (अ) ने फ़रमायाः इन्सान की अपने ऍबों के प्रति अज्ञानता उसका सबसे बड़ा पाप है।

9- قال على ‏علیه السلام:

«رُبَّ عزیزٍ أذِلَّهُ خُلقُهُ و رُبَّ ذَلیلٍ أعزَّهُ خُلقُهُ».


इमाम अली (अ) ने फ़रमायाः कितने ऐसे सम्मानित और महान लोग हैं जिनके बुरे व्यवहार ने उनको अपमानित किया और कितना संभव है कि अच्छा व्यवहार ज़लील लोगों को सम्मानित बना दे।

10- قال على ‏علیه السلام:

إنَّ لأهلِ الدين علاماتٌ يُعرَفون بها:
صدق الحديث و أداء الأمانة، و وفاء بالعهد وصلة للأرحام و رحمة للضعفاء و قلة مؤاتاة للنساء و بذل المعروف و حُسنُ الخُلق و سعة الحلم، و اتباع العلم، و ما يُقَرِّبُ مِن الله زُلفي، فطوبي لهم و حسن مآب.

इमाम अली (अ) ने फ़रमायाः मोमिनों की निशानियां है जिनसे वह पहचाने जाते हैं:
सच्चाई।
अमानतदारी (अमानत को उसके मालिक तक पहुँचाना)।
वादे को पूरा करना। रिश्तेदारों से सिलहरहमी (संपर्क)
कमज़ोरों पर रहम।
औरतों के साथ कम संपर्क रखना।
एहसान और भलाई करना।
अच्चा व्यवहार रखना।
ज्ञान और इल्म का पालन करना।
और जो चीज़ ख़ुदा से क़रीब करने में सहायक है (उसका पालन करना)
तो मुबारक हो उनके लिए और उनकी अच्छी आख़ेरत के लिए।


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