दुआ ऐ कुमैल हिंदी तर्जुमा |




दुआए कुमैल हिन्दी अनुवाद के साथ

اللهم إنِّي أَسْأَلُكَ بِرَحْمَتِكَ الَّتي وَسِعَتْ كُلَّ شَيْء، وَ بِقُوَّتِكَ الَّتي قَهَرْتَ بِها كُلَّ شَيْء، وَ خَضَعَ لَها كُلُّ شَيء، وَ ذَلَّ لَها كُلُّ شَيء، وَ بِجَبَرُوتِكَ الَّتي غَلَبْتَ بِها كُلَّ شَيء، وَ بِعِزَّتِكَ الَّتي لا يَقُومُ لَها شَيءٌ، وَ بِعَظَمَتِكَ الَّتي مَلأَتْ كُلَّ شَيء، وَ بِسُلْطانِكَ الَّذي عَلا كُلَّ شَيء، وَ بِوَجْهِكَ الْباقي بَعْدَ فَناءِ كُلِّ شَيء، وَ بِأَسْمائِكَ الَّتي مَلأَتْ أرْكانَ كُلِّ شَيء، وَ بِعِلْمِكَ الَّذي أَحاطَ بِكُلِّ شَيء، وَ بِنُورِ وَجْهِكَ الَّذي أَضاءَ لَهُ كُلُّ شيء، يا نُورُ يا قُدُّوسُ، يا أَوَّلَ الأوَّلِينَ وَ يا آخِرَ الآخِرينَ. اَللّهُمَّ اغْفِرْ لِي الذُّنُوبَ الَّتي تَهْتِكُ الْعِصَمَ، اَللّهُمَّ اغْفِرْ لِي الذُّنُوبَ الَّتي تُنْزِلُ النِّقَمَ، اَللّهُمَّ اغْفِرْ لِي الذُّنُوبَ الَّتي تُغَيِّرُ النِّعَمَ، اَللّهُمَّ اغْفِرْ لي الذُّنُوبَ الَّتي تَحْبِسُ الدُّعاءَ، اَللّهُمَّ اغْفِرْ لِي الذُّنُوبَ الَّتي تُنْزِلُ الْبَلاءَ، اَللّهُمَّ اغْفِرْ لي كُلَّ ذَنْب اَذْنَبْتُهُ، وَ كُلَّ خَطيئَة اَخْطَأتُها. اَللّهُمَّ اِنّي اَتَقَرَّبُ اِلَيْكَ بِذِكْرِكَ، وَ اَسْتَشْفِعُ بِكَ إلى نَفْسِكَ، وَ أَسْأَلُكَ بِجُودِكَ أن تُدْنِيَني مِنْ قُرْبِكَ، وَ أَنْ تُوزِعَني شُكْرَكَ، وَ أَنْ تُلْهِمَني ذِكْرَكَ، اَللّهُمَّ إني أَسْأَلُكَ سُؤالَ خاضِع مُتَذَلِّل خاشِع أن تُسامِحَني وَ تَرْحَمَني وَ تَجْعَلَني بِقِسْمِكَ راضِياً قانِعاً، وَ في جَميعِ الأحوال مُتَواضِعاً. اَللّهُمَّ وَ أَسْأَلُكَ سُؤالَ مَنِ اشْتَدَّتْ فاقَتُهُ، وَ اَنْزَلَ بِكَ عِنْدَ الشَّدائِدِ حاجَتَهُ، وَ عَظُمَ فيما عِنْدَكَ رَغْبَتُهُ. اَللّهُمَّ عَظُمَ سُلْطانُكَ، وَ عَلا مَكانُكَ، وَ خَفِي مَكْرُكَ، وَ ظَهَرَ اَمْرُكَ وَ غَلَبَ قَهْرُكَ، وَ جَرَتْ قُدْرَتُكَ، وَ لا يُمْكِنُ الْفِرارُ مِنْ حُكُومَتِكَ. اَللّهُمَّ لا أجِدُ لِذُنُوبي غافِراً، وَ لا لِقَبائِحي ساتِراً، وَ لا لِشَيء مِنْ عَمَلِي الْقَبيحِ بِالْحَسَنِ مُبَدِّلاً غَيْرَكَ، لا اِلهَ إلاّ أنْتَ، سُبْحانَكَ وَ بِحَمْدِكَ، ظَلَمْتُ نَفْسي، وَ تَجَرَّأْتُ بِجَهْلي، وَ سَكَنْتُ إلى قَديمِ ذِكْرِكَ لي وَ مَنِّكَ عَلَيَّ.

ऐ अल्लाह मै तुझ से इल्तेजा करता हूँ, तुझे तेरी उस रहमत का वास्ता जो हर चीज़ को घेरे हुए है, तेरी उस कुदरत का वास्ता जिस से तू हर चीज़ पर ग़ालिब है, जिस के सबब हर चीज़ तेरे आगे झुकी है और जिस के सामने हर चीज़ आजिज़ है, तेरी इस जब्र्रुत  का वास्ता जिस से तू हर चीज़ पर हावी है, तेरी इस इज्ज़त का वास्ता जिस के आगे कोई चीज़  ठहर नहीं पाती, तेरी उस अजमत का वास्ता जो हर चीज़  से नुमाया है, तेरी उस सल्तनत का वास्ता जो हर चीज़  पर  कायेम है, तेरी उस ज़ात का वास्ता जो हर चीज़ के फ़ना हो जाने के बाद भी बाकी रहेगी, तेरे उन नामो का वासता जिन के असरात ज़र्रे ज़र्रे में तारी  व सारी हैं, तेरे उस इल्म का वास्ता जो हर चीज़ का अहाता किये हुए हैं, तेरी ज़ात के उस नूर का  वास्ता जिस से हर चीज़ रोशन है!

ऐ   हकीकी नूर! ऐ पाक व पाकीज़ा! ए सब पहलों से पहले, ऐ सब पिछलो से पिछले ( ए अल्लाह मेरे सब गुनाह माफ़ कर दे जो अताब का मुस्तहक बनाते हैं! ऐ अल्लाह! मेरे वोह सब गुनाह माफ़ कर दे जिन की वजह से बालाएं आती हैं! ऐ अल्लाह मेरे वोह सब गुनाह माफ़ कर दे जो तेरी नेमतों से महरूमी का सबब बनते हैं! ऐ अल्लाह, मेरे वोह सब गुनाह बख्श दे जो दुआएं कबूल नहीं होने देते! ए अल्लाह, मेरे वोह सब गुनाह माफ़ कर दे जो मुसीबत लाते हैं! ऐ अल्लाह, मेरी इन सारी खाताओं से दर गुज़र कर जो मैंने जान बूझ कर या भूले से की हैं! ए अल्लाह, मैं तुझे याद करके तेरे करीब आना चाहता हूँ! तेरी जनाब में तुझी को अपना सिफारशी ठहराता हूँ, और तेरे करम का वास्ता दे कर तुझ से इल्तेजा करता हूँ के मुझे अपना कुर्ब अता कर) मुझे अदाए शुक्र की तौफीक दे और अपनी याद मेरे दिल में डाल दे!

ऐ अल्लाह, मैं तुझ से खोज़ू व खुशू और गिरया व ज़ारी से अर्ज़ करता हूँ के तू मेरी भूल चूक माफ़ कर, मुझ पर रहम फार्म और तू में मेरा जो हिस्सा मुक़र्रर किया है, मुझे इस पर राज़ी, काने और हर हाल में मुतमईन रख! ए अल्लाह, मै तेरे हजूर में इस शख्स की मानिंद सवाल करता हूँ जिस पर सख्त फाके गुज़र रहे हों, जो मुसीबतों से तंग आकर अपनी ज़रुरत तेरे सामने पेश करे, जो तेरे लुत्फो करम का ज्यादा से ज्यादा खाहिश्मंद हो! ऐ अल्लाह, तेरी सल्तनत बहुत बड़ी है, तेरा रुतबा बहुत बुलंद है, तेरी तदबीर पोशीदा है, तेरा हुकुम साफ़ ज़ाहिर है, तेरा कहर ग़ालिब है, तेरी कुदरत कार फरमा है, और तेरी हुकूमत से निकल जाना मुमकिन नहीं है! ऐ अल्लाह, मेरे गुनाह बख्शने, मेरे ऐब ढाँकने और मेरे किसी बुरे अमल को अच्छे अमल से बदलने वाला तेरे सिवा कोई नहीं है! तेरे इलावा और कोई माबूद नहीं है! तू पाक है, और मै तेरी ही हम्दोसेना  करता हूँ!

मैं  ने अपनी ज़ात पर ज़ुल्म किया और अपनी नादानी के बाएस बेग़ैरत बन गया! मै यह सोच कर मुतमईन हो गया के तू ने मुझे पहले भी याद रखा और अपनी नेमतों से नवाज़ा है! ऐ  अल्लाह,  

اَللّهُمَّ مَوْلاي كَمْ مِنْ قَبيح سَتَرْتَهُ، وَ كَمْ مِنْ فادِح مِنَ الْبَلاءِ اَقَلْتَهُ، وَ كَمْ مِنْ عِثارٍ وَقَيْتَهُ، وَ كَمْ مِنْ مَكْرُوهٍ دَفَعْتَهُ، وَ كَمْ مِنْ ثَناءٍ جَميلٍ لَسْتُ اَهْلاً لَهُ نَشَرْتَهُ. اَللّهُمَّ عَظُمَ بَلائي، وَ اَفْرَطَ بي سُوءُ حالي، وَ قَصُرَتْ بي اَعْمالي، وَ قَعَدَتْ بي اَغْلالي، وَ حَبَسَني عَنْ نَفْعي بُعْدُ اَمَلي، وَ خَدَعَتْنِي الدُّنْيا بِغُرُورِها، وَ نَفْسي بِجِنايَتِها، وَ مِطالي يا سَيِّدي فَأَسْأَلُكَ بِعِزَّتِكَ أن لا يَحْجُبَ عَنْكَ دُعائي سُوءُ عَمَلي وَ فِعالي، وَ لا تَفْضَحْني بِخَفِي مَا اطَّلَعْتَ عَلَيْهِ مِنْ سِرّي، وَ لا تُعاجِلْني بِالْعُقُوبَةِ عَلى ما عَمِلْتُهُ في خَلَواتي مِنْ سُوءِ فِعْلي وَإساءَتي، وَدَوامِ تَفْريطي وَجَهالَتي، وَ كَثْرَةِ شَهَواتي وَ غَفْلَتي، وَ كُنِ اللّهُمَّ بِعِزَّتِكَ لي في كُلِّ الأحوالِ رَؤوفاً، وَ عَلَي في جَميعِ الاُمُورِ عَطُوفاً.

ऐ मेरे मालिक, तू ने मेरी कितनी ही बुराईयों की परदापोशी की, कितनी ही सख्त बालाओं को मुझ से टाला, कितनी ही नाज़िशों से मुझ को बचाया, कितनी ही आफतों को रोका! और मेरी कितनी ही ऐसी खूबियाँ लोगो में मशहूर कर दीं जिन का मै अहल भी ना था! ऐ अल्लाह, मेरी मुसीबत बढ़ गयी है, मेरी बदहाली हद से गुज़र गयी है, मेरे नेक अमाल कम हैं, दुनयावी तालुक्कात के बोझ ने मुझ को दबा रखा है, मेरी उम्मीदों की दराजी ने मुझे नफा से महरूम कर रखा है, दुनिया ने अपनी झूटी चमक दमक से मझे धोका दिया है, और मेरे नफस ने मझे मेरे गुनाहों और मेरी टाल मटोल के बाअस  फरेब दिया है! ऐ मेरे आका अब मै तेरी इज्ज़त का वास्ता दे कर तुझ से इल्तेजा करता हूँ के मेरी बदअमालियाँ और ग़लतकारियां मेरी दुआ के कबूल होने में रुकावट ना बने!

मेरे जिन भेदों से तू वाकिफ है इन की वजह से मुझे रुसवा ना करना, मै ने अपनी तन्हाईयों में जो बदी, बुराई और मुसलसल कोताही की है और नादानी, बढ़ी हुई खाहिशाते नफस और गफलत के सबब जो काम किये हैं मुझे उनकी सजा देने में जल्दी ना करना! ऐ अल्लाह, अपनी इज्ज़त के तुफैल हर हाल में मुझ पर मेहरबान रहना, और मेरे तमाम मामलात में मुझ पर करम करते रहना!

اِلهي وَ رَبّي مَنْ لي غَيْرُكَ أَسْأَلُهُ كَشْفَ ضُرّي، وَ النَّظَرَ في اَمْري، اِلهي وَ مَوْلاي اَجْرَيْتَ عَلَي حُكْماً اِتَّبَعْتُ فيهِ هَوى نَفْسي، وَ لَمْ اَحْتَرِسْ فيهِ مِنْ تَزْيينِ عَدُوّي، فَغَرَّني بِما اَهْوى وَ اَسْعَدَهُ عَلى ذلِكَ الْقَضاءُ، فَتَجاوَزْتُ بِما جَرى عَلَيَّ مِنْ ذلِكَ بَعْضَ حُدُودِكَ، وَ خالَفْتُ بَعْضَ اَوامِرِكَ، فَلَكَ الْحَمْدُ عَلي في جَميعِ ذلِكَ، وَ لا حُجَّةَ لي فيما جَرى عَلَيَّ فيهِ قَضاؤُكَ، وَاَلْزَمَني حُكْمُكَ وَبَلاؤُكَ. وَقَدْ اَتَيْتُكَ يا اِلهي بَعْدَ تَقْصيري وَ اِسْرافي عَلى نَفْسي مُعْتَذِراً نادِماً مُنْكَسِراً مُسْتَقيلاً مُسْتَغْفِراً مُنيباً مُقِرّاً مُذْعِناً مُعْتَرِفاً، لا أجِدُ مَفَرّاً مِمّا كانَ مِنّي، وَ لا مَفْزَعاً اَتَوَجَّهُ إليه في أَمْري، غَيْرَ قَبُولِكَ عُذْري، وَ اِدْخالِكَ اِيّايَ في سَعَة رَحْمَتِكَ. اَللّهُمَّ فَاقْبَلْ عُذْري، وَ ارْحَمْ شِدَّةَ ضُرّي، وَ فُكَّني مِنْ شَدِّ وَثاقي.

ऐ मेरे अल्लाह, ऐ मेरे परवरदिगार, तेरे सिवा मेरा कौन है जिस से मै अपनी मुसीबत को दूर करने और अपने बारे में नज़रे करम करने का सवाल करूँ! ऐ मेरे माबूद और मेरे मालिक, मै ने खुद अपने खिलाफ फैसला दे दिया क्योंके मै हवाए नफस के पीछे चलता रहा और मेरे दुश्मन ने जो मुझे सुनहरे खाव्ब दिखाए मै ने इन से अपना बचाओ नहीं किया, चुनान्चेह इस ने मुझे खाहिशात के जाल में फंसा दिया, इस में मेरी तकदीर ने भी इस की मदद की! इस तरह मै ने तेरी मुक़र्रर की हुई बाज़ हदें तोड़ दीं और तेरे बाज़ अहकाम की नाफ़रमानी की!

बहरहाल तू हर तारीफ़ का मुस्तहक है और जो कुछ पेश आया इस में खता मेरी ही है! इस बारे में तुने जो फैसला किया, तेरा जो हुक्म जारी हुआ और तेरी तरफ से मेरी जो आजमाईश हुई इस के खिलाफ मेरे पास कोई उज्र नहीं है! ऐ मेरे माबूद, मै ने अपनी इस कोताही और अपने नफस पर ज़ुल्म के बाद माफ़ी मांगने के लिए हाज़िर हुआ हूँ! मै अपने किये पर शर्मसार हूँ, दिल शिकस्ता हूँ, मै अपने करतूतों से बाज़ आया, बक्शीश का तलबगार हूँ, पशेमानी के साथ तेरी जनाब में हाज़िर हूँ, जो कुछ मुझ से सरज़द हो चूका, उस के बाद मेरे लिए ना कोई भागने की जगह है और ना कोई ऐसा मददगार जिस के पास मै अपना मामला ले जाऊं! सिर्फ यही है के तू मेरी माज़रत कबूल कर ले, मुझे अपने दामने रहमत में जगह देदे! ऐ मेरे माबूद, मेरी माफ़ी की दरखास्त मंज़ूर कर ले, मेरी सख्त बदहाली पर रहम कर और मेरी गिरह कुशाई फर्मा दे!

يا رَبِّ ارْحَمْ ضَعْفَ بَدَني، وَ رِقَّةَ جِلْدي، وَ دِقَّةَ عَظْمي، يا مَنْ بَدَأَ خَلْفي وَ ذِكْري وَ تَرْبِيَتي وَ بِرّي وَ تَغْذِيَتي هَبْني لاِبْتِداءِ كَرَمِكَ، وَ سالِفِ بِرِّكَ بي. يا اِلهي وَ سَيِّدي وَ رَبّي، اَتُراكَ مُعَذِّبي بِنارِكَ بَعْدَ تَوْحيدِكَ، وَ بَعْدَ مَا انْطَوى عَلَيْهِ قَلْبي مِنْ مَعْرِفَتِكَ، وَ لَهِجَ بِهِ لِساني مِنْ ذِكْرِكَ، وَ اعْتَقَدَهُ ضَميري مِنْ حُبِّكَ، وَ بَعْدَ صِدْقِ اعْتِرافي وَدُعائي خاضِعاً لِرُبُوبِيَّتِكَ، هَيْهاتَ أنْتَ اَكْرَمُ مِنْ أنْ تُضَيِّعَ مَنْ رَبَّيْتَهُ، أوْ تُبَعِّدَ مَنْ أدْنَيْتَهُ، اَوْ تُشَرِّدَ مَنْ آوَيْتَهُ، اَوْ تُسَلِّمَ اِلَى الْبَلاءِ مَنْ كَفَيْتَهُ وَ رَحِمْتَهُ، وَ لَيْتَ شِعْري يا سَيِّدي وَ اِلهي وَ مَوْلايَ، اَتُسَلِّطُ النّارَ عَلى وُجُوه خَرَّتْ لِعَظَمَتِكَ ساجِدَةً، وَ عَلى اَلْسُن نَطَقَتْ بِتَوْحيدِكَ صادِقَةً، وَ بِشُكْرِكَ مادِحَةً، وَ عَلى قُلُوبٍ اعْتَرَفَتْ بِإلهِيَّتِكَ مُحَقِّقَةً، وَ عَلى ضَمائِرَ حَوَتْ مِنَ الْعِلْمِ بِكَ حَتّى صارَتْ خاشِعَةً، وَ عَلى جَوارِحَ سَعَتْ إلى أوْطانِ تَعَبُّدِكَ طائِعَةً، وَ اَشارَتْ بِاسْتِغْفارِكَ مُذْعِنَةً، ما هكَذَا الظَّنُّ بِكَ، وَ لا اُخْبِرْنا بِفَضْلِكَ عَنْكَ.

ऐ मेरे परवरदिगार, मेरे जिस्म की नातवानी, मेरी जिल्द की कमजोरी और मेरी हड्डियों की नाताक़ती पर रहम कर! ऐ वोह ज़ात जिस ने मुझे वजूद बख्शा, मेरा ख्याल रखा, मेरी परवरिश का सामान किया, मेरे हक में बेहतर की और मेरे लिए ग़ज़ा के असबाब फराहम किये! बस जिस तरह तू ने इस से पहले मुझ पर करम किया और मेरे लिए बेहतरी के सामन किये, अब भी मुझ पर वो पहला सा फज़ल व करम जारी रख! ऐ मेरे माबूद, मेरे मालिक, ऐ मेरे परवरदिगार, मै हैरान हूँ के क्या तू मुझे अपनी आतिशे जहन्नम का अज़ाब देगा हालांकि मै तेरी तौहीद का इकरार करता हूँ, मेरा दिल तेरी मार्फ़त से सरशार है, मेरी ज़बान पर तेरा ज़िक्र जारी है, मेरे दिल में तेरी मुहब्बत बस चुकी है और मै तुझे अपना परवरदिगार मान कर सच्चे दिल से अपने गुनाहों का एतेराफ करता हूँ, और गिडगिडा कर तुझ से दुआ मांगता हूँ! नहीं ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि तेरा करम इस से कहीं बढ़ कर है के तू इस शख्स को बेसहारा छोड़ दे जिसे तुने खुद पाला हो या उसे अपने से दूर कर दे जिसे तू ने खुद  अपना कुर्ब बख्शा हो या उसे अपने यहाँ से निकाल दे जिसे तुने खुद पनाह दी हो, या उसे बालाओं के हवाले कर दे जिस का तुने खुद ज़िम्मा लिया हो और जिस पर रहम किया हो, यह बात मेरी समझ में नहीं आती!

ऐ मेरे मालिक, ऐ मेरे माबूद, ऐ मेरे मौला, क्या तू आतिशे जहन्नम को मुसल्लत कर देगा इन चेहरों पर जो तेरी अजमत के बायेस तेरे हजूर में सज्दारेज़ हो चुके हैं, इन ज़बानों पर जो सिद्क़ दिल से तेरी तौहीद का इकरार करके शुक्रगुजारी के साथ तेरी मधा कर चुकी हैं, इन दिलों पर जो वाकई तेरे माबूद होने का ऐतेराफ कर चुके हैं, इन दिमागों पर जो तेरे इल्म से इस कद्र बहरावर हुए के तेरे हुज़ूर में झुके हुए हैं या इन हाथ पाँव पर जो इताअत के जज्बे के साथ तेरी इबादतगाहों की तरफ दौड़ते रहे और गुनाहों के इकरार करके मग्फेरत  तलब करते रहे? ऐ  रब्बे  करीम,  ना तो तेरी निस्बत ऐसा गुमान ही किया जा सकता है और ना ही तेरी तरफ से हमें ऐसी कोई खबर दी गयी है!

يا كَريمُ يا رَبِّ وَ اَنْتَ تَعْلَمُ ضَعْفي عَنْ قَليل مِنْ بَلاءِ الدُّنْيا وَ عُقُوباتِها، وَ ما يَجْري فيها مِنَ الْمَكارِهِ عَلى أهْلِها، عَلى أنَّ ذلِكَ بَلاءٌ وَ مَكْرُوهٌ قَليلٌ مَكْثُهُ، يَسيرٌ بَقاؤُهُ، قَصيرٌ مُدَّتُهُ، فَكَيْفَ احْتِمالي لِبَلاءِ الآخِرَةِ، وَ جَليلِ وُقُوعِ الْمَكارِهِ فيها، وَ هُوَ بَلاءٌ تَطُولُ مُدَّتُهُ، وَ يَدُومُ مَقامُهُ، وَ لا يُخَفَّفُ عَنْ اَهْلِهِ، لاَِنَّهُ لا يَكُونُ إلاّ عَنْ غَضَبِكَ وَ اْنتِقامِكَ وَ سَخَطِكَ، وَ هذا ما لا تَقُومُ لَهُ السَّماواتُ وَ الأرْضُ، يا سَيِّدِي فَكَيْفَ لي وَ أنَا عَبْدُكَ الضَّعيفُ الذَّليلُ الْحَقيرُ الْمِسْكينُ الْمُسْتَكينُ. يا اِلهي وَ رَبّي وَ سَيِّدِي وَ مَوْلايَ لأيِّ الاُْمُورِ اِلَيْكَ اَشْكُو، وَ لِما مِنْها أضِجُّ وَ اَبْكي، لأليمِ الْعَذابِ وَ شِدَّتِهِ، أمْ لِطُولِ الْبَلاءِ وَ مُدَّتِهِ، فَلَئِنْ صَيَّرْتَني لِلْعُقُوباتِ مَعَ أعْدائِكَ، وَ جَمَعْتَ بَيْني وَ بَيْنَ أهْلِ بَلائِكَ، وَ فَرَّقْتَ بَيْني وَ بَيْنَ أحِبّائِكَ وَ أوْليائِكَ، فَهَبْني يا إلهي وَ سَيِّدِي وَ مَوْلايَ وَ رَبّي صَبَرْتُ عَلى عَذابِكَ، فَكَيْفَ اَصْبِرُ عَلى فِراقِكَ، وَ هَبْني صَبَرْتُ عَلى حَرِّ نارِكَ، فَكَيْفَ اَصْبِرُ عَنِ النَّظَرِ إلى كَرامَتِكَ، أمْ كَيْفَ أسْكُنُ فِي النّارِ وَ رَجائي عَفْوُكَ، فَبِعِزَّتِكَ يا سَيِّدي وَ مَوْلايَ اُقْسِمُ صادِقاً لَئِنْ تَرَكْتَني ناطِقاً لاَِضِجَّنَّ إلَيْكَ بَيْنَ أهْلِها ضَجيجَ الآمِلينَ، وَ لأصْرُخَنَّ إلَيْكَ صُراخَ الْمَسْتَصْرِخينَ، وَ لأبْكِيَنَّ عَلَيْكَ بُكاءَ الْفاقِدينَ، وَ لاَُنادِيَنَّكَ اَيْنَ كُنْتْ (كُنْتُ) يا وَلِيَّ الْمُؤْمِنينَ، يا غايَةَ آمالِ الْعارِفينَ، يا غِياثَ الْمُسْتَغيثينَ، يا حَبيبَ قُلُوبِ الصّادِقينَ، وَ يا اِلهَ الْعالَمينَ.

ऐ मेरे पालने वाले तू मेरी कमजोरी से वाकिफ है, मुझ में इस दुनिया की मामूली आज्मायीशों, छोटी छोटी तकलीफों और इन सख्तियों को बर्दाश्त करने की ताब नहीं जो अहले दुनिया पर गुज़रती हैं हालांकि वोह आजमाईश, तकलीफ और सख्ती मामूली होती है और इस की मुद्द्त  भी थोड़ी होती है, फिर भला मुझ से आखेरत की ज़बरदस्त मुसीबत क्योंकर बर्दाश्त हो सकेगी, जब की वहां की मुसीबत तूलानी होगी और इस में हमेशा हमेशा के लिए रहना होगा और जो लोग इस में एक मर्तबा फँस जायेंगे इन के अज़ाब में कभी कमी नहीं होगी क्योंकि वो अज़ाब तेरे गुस्से, इंतकाम और नाराजगी के सबब होगा जिसे ना आसमान बर्दाश्त कर सकता है ना ज़मीन! ऐ मेरे मालिक, फिर ऐसी सूरत में मेरा क्या हाल होगा जबकि मै तेरा एक कमज़ोर, अदना, लाचार, और आजिज़ बंदा हूँ ! ऐ मेरे माबूद, ऐ मेरे परवरदिगार, ऐ मेरे मालिक, ऐ मेरे मौला, मै तुझ से किस किस बात पर नाला व फरयाद और आहोबुका करूँ? दर्दनाक अज़ाब और इसकी सख्ती पर या मुसीबत और इस की तवील मीयाद पर! बस अगर तू ने मुझे अपने दुश्मनों के साथ अज़ाब में झोंक दिया और मुझे इन लोगों में शामिल कर दिया जो तेरी बालाओं के सज़ावार हैं और अपने अहिब्बा और औलिया के और मेरे दरम्यान जुदाई डाल दी तो ऐ मेरे माबूद, ऐ मेरे मालिक, ऐ मेरे मौला, ऐ मेरे परवरदिगार, मै तेरे दिया हुए अज़ाब पर अगर सब्र भी कर लूं तो तेरी रहमत से जुदाई पर क्योंकर सब्र कर सकूंगा? इस तरह अगर मै तेरे आग की तपिश बर्दाश्त भी कर लूं तो तेरी नज़रे करम से अपनी महरूमी को कैसे बर्दाश्त कर सकूंगा और इस के इलावा मै आतिशे जहन्नुम में क्योंकर रह सकूंगा जबके मुझे तो तुझ से माफ़ी की तवक्का है. बस ऐ मेरे आका, ऐ मेरे मौला, मै तेरी इज्ज़त की सच्ची क़सम खा कर कहता हूँ के अगर तू ने वहां मेरी गोयाई सलामत रखी तो मै अहले जहन्नम के दरमियान तेरा नाम लेकर तुझे  इस तरह पुकारूँगा जैसे करम के उम्मेदवार पुकारा करते हैं,  मै तेरे हुज़ूर में इस तरह आहोबुका करूंगा जैसे फरयाद किया करते हैं और तेरी रहमत के फ़िराक में इस तरह रोवूँगा जैसे बिछुड़ने वाले रोया करते हैं! मैं तुझे वहां बराबर पुकारूंगा के तू कहाँ है ऐ मोमिनो के मालिक, ऐ आरिफों की उम्मीदगाह, ऐ फर्यादीयों  के फरयादरस, ऐ सादिकों के दिलों के महबूब,  ऐ इलाहिल आलमीन,  

أفَتُراكَ سُبْحانَكَ يا إلهي وَ بِحَمْدِكَ تَسْمَعُ فيها صَوْتَ عَبْد مُسْلِم سُجِنَ فيها بِمُخالَفَتِهِ، وَ ذاقَ طَعْمَ عَذابِها بِمَعْصِيَتِهِ، وَ حُبِسَ بَيْنَ اَطْباقِها بِجُرْمِهِ وَ جَريرَتِهِ، وَ هُوَ يَضِجُّ إلَيْكَ ضَجيجَ مُؤَمِّل لِرَحْمَتِكَ، وَ يُناديكَ بِلِسانِ أهْلِ تَوْحيدِكَ، وَ يَتَوَسَّلُ إلَيْكَ بِرُبُوبِيَّتِكَ، يا مَوْلايَ فَكَيْفَ يَبْقى فِي الْعَذابِ وَ هُوَ يَرْجُو ما سَلَفَ مِنْ حِلْمِكَ، أَمْ كَيْفَ تُؤْلِمُهُ النّارُ وَ هُوَ يَأْمُلُ فَضْلَكَ وَ رَحْمَتَكَ، اَمْ كَيْفَ يُحْرِقُهُ لَهيبُها وَ أنْتَ تَسْمَعُ صَوْتَهُ وَ تَرى مَكانَه، اَمْ كَيْفَ يَشْتَمِلُ عَلَيْهِ زَفيرُها وَ أنْتَ تَعْلَمُ ضَعْفَهُ، اَمْ كَيْفَ يَتَقَلْقَلُ بَيْنَ اَطْباقِها وَ أنْتَ تَعْلَمُ صِدْقَهُ، اَمْ كَيْفَ تَزْجُرُهُ زَبانِيَتُها وَ هُوَ يُناديكَ يا رَبَّهُ، اَمْ كَيْفَ يَرْجُو فَضْلَكَ في عِتْقِهِ مِنْها فَتَتْرُكُهُ فيها، هَيْهاتَ ما ذلِكَ الظَّنُ بِكَ، وَ لاَ الْمَعْرُوفُ مِنْ فَضْلِكَ، وَ لا مُشْبِهٌ لِما عامَلْتَ بِهِ الْمُوَحِّدينَ مِنْ بِرِّكَ وَ اِحْسانِكَ، فَبِالْيَقينِ اَقْطَعُ لَوْ لا ما حَكَمْتَ بِهِ مِنْ تَعْذيبِ جاحِديكَ، وَ قَضَيْتَ بِهِ مِنْ اِخْلادِ مُعانِدِيكَ، لَجَعَلْتَ النّارَ كُلَّها بَرْداً وَ سَلاماً، وَ ما كانَ لأحَد فيها مَقَرّاً وَ لا مُقاماً، لكِنَّكَ تَقَدَّسَتْ أسْماؤُكَ اَقْسَمْتَ أنْ تَمْلاََها مِنَ الْكافِرينَ مِنَ الْجِنَّةِ وَ النّاسِ اَجْمَعينَ، وَ أنْ تُخَلِّدَ فيهَا الْمُعانِدينَ، وَ أنْتَ جَلَّ ثَناؤُكَ قُلْتَ مُبْتَدِئاً، وَ تَطَوَّلْتَ بِالإنْعامِ مُتَكَرِّماً، اَفَمَنْ كانَ مُؤْمِناً كَمَنْ كانَ فاسِقاً لا يَسْتَوُونَ. إلهي وَ سَيِّدى فَأَسْأَلُكَ بِالْقُدْرَةِ الَّتي قَدَّرْتَها، وَ بِالْقَضِيَّةِ الَّتي حَتَمْتَها وَ حَكَمْتَها، وَ غَلَبْتَ مَنْ عَلَيْهِ اَجْرَيْتَها، أنْ تَهَبَ لي في هذِهِ اللَّيْلَةِ وَ في هذِهِ السّاعَةِ كُلَّ جُرْم اَجْرَمْتُهُ، وَ كُلَّ ذَنْب اَذْنَبْتُهُ، وَ كُلَّ قَبِيح أسْرَرْتُهُ، وَ كُلَّ جَهْل عَمِلْتُهُ، كَتَمْتُهُ أوْ اَعْلَنْتُهُ، أخْفَيْتُهُ أوْ اَظْهَرْتُهُ، وَ كُلَّ سَيِّئَة أمَرْتَ بِاِثْباتِهَا الْكِرامَ الْكاتِبينَ الَّذينَ وَكَّلْتَهُمْ بِحِفْظِ ما يَكُونُ مِنّي، وَ جَعَلْتَهُمْ شُهُوداً عَلَيَّ مَعَ جَوارِحي، وَ كُنْتَ أنْتَ الرَّقيبَ عَلَيَّ مِنْ وَرائِهِمْ، وَ الشّاهِدَ لِما خَفِيَ عَنْهُمْ، وَ بِرَحْمَتِكَ اَخْفَيْتَهُ، وَ بِفَضْلِكَ سَتَرْتَهُ، وَ أنْ تُوَفِّرَ حَظّي مِنْ كُلِّ خَيْر اَنْزَلْتَهُ أوْ اِحْسان فَضَّلْتَهُ، أوْ بِرٍّ نَشَرْتَهُ، أوْ رِزْق بَسَطْتَهُ، أوْ ذَنْب تَغْفِرُهُ، أوْ خَطَأ تَسْتُرُهُ، يا رَبِّ يا رَبِّ يا رَبِّ.

तेरी ज़ात पाक है, ऐ मेरे माबूद, मै तेरी हम्द करता हूँ! मैं  हैरान हूँ की यह क्योंकर होगा की तू इस आग में से एक मुस्लिम की आवाज़ सुने जो अपनी नाफ़रमानी की पादाश में इस के अंदर क़ैद कर दिया गया हो, अपनी मुसीबत की सजा में इस अज़ाब में गिरफ्तार हो और जुर्मो खता के बदले में जहन्नुम के तबकात में बंद कर दिया गया हो मगर वोह तेरी रहमत के उम्मीदवार  की तरह तेरे हुज़ूर में फरयाद करता हो, तेरी तौहीद को मानने वालों की सी जुबान से तुझे पुकारता हो और तेरी जनाब में तेरी रबूबियत का वास्ता देता हो! ऐ मेरे मालिक, फिर वो इस अज़ाब में कैसे रह सकेगा जबके इसे तेरी गुज़िश्ता राफ्त ओ रहमत की आस बंधी होगी या आतिशे जहन्नम उसे कैसे तकलीफ पहुंचा सकेगा जबके उसे तेरी फज़ल और तेरी रहमत का आसरा होगा या इस को जहन्नम का शोला कैसे जला सकेगा जबकि तू खुद इस की आवाज़ सुन रहा होगा और जहाँ वो है तू इस जगह को देख रहा होगा या जहन्नुम का शोर उसे क्योंकर परेशान कर सकेगा, जबकि तू इस बन्दे की कमजोरी से वाकिफ होगा या फिर वो जहन्नुम के तबकात में क्योंकर तड़पता रहेगा जबकि तू इस की सच्चाई से वाकिफ होगा या जहन्नुम की लपटें इस को क्योंकर परेशान कर सकेंगी जबकि वो तुझे पुकार रहा होगा! ऐ मेरे परवरदिगार, ऐसे क्योंकर मुमकिन है के तू वो तो जहन्नुम के निजात के लिए तेरे फज्लो करम की आस लगाये हुए हो और तू उसे जहन्नुम ही में पड़ा रहने दे! नहीं, तेरी निस्बत ऐसा गुमान नहीं किया जा सकता, ना तेरे फज़ल से पहले कभी ऐसी सूरत पेश आयी और ना ही यह बात इस लुत्फो करम के साथ मेल खाती है जो तू तौहीद परस्तों के साथ रवा रखता रहा है, इस लिए मै पुरे यकीन के साथ कहता हूँ के अगर तुने अपने मुन्कीरों  को अज़ाब देने का हुक्म ना दे दिया होता और इनको हमेशा जहन्नुम में रखने का फैसला ना कर लिया होता तो तू ज़रूर आतिशे जहन्नुम को ऐसा सर्द कर देता के वो आरामदेह बन जाती और फिर किसी भी शख्स का ठिकाना जहन्नुम ना होता लेकिन खुद तू ने अपने पाक नामो की क़सम खाई है के तू  तमाम काफिर जिन्नों और इंसान से जहन्नुम भर देगा और अपने दुश्मनों को हमेशा के लिए इसमें रखेगा! तू जो बहुत ज्यादा तारीफ के लायेक है और अपने बन्दों पर एहसान करते हुए अपनी किताब में पहले ही फरमा चुका है : "क्या मोमिन, फ़ासिक़ के बराबर हो सकता है? नहीं, यह कभी बाहम बराबर नहीं हो सकते"! ऐ मेरे माबूद, ऐ मेरे मालिक, मै तेरी इस कुदरत का जिस से तुने मौजूदात की तकदीर बनाई, तेरे इस हतमी फैसले का जो तू ने सादिर किये हैं और जिन पर तू ने इन को नाफ़िज़ किया है इन पर तुझे काबू हासिल है! वास्ता देकर तुझ से इल्तेजा करता हूँ के हर वो जुर्म जिस का मै मुर्तकिब हुआ हूँ और हर वो गुनाह जो मैंने किया हो, हर वो बुराई जो मैंने छुपा कर की हो और हर वो नादानी जो मुझ से सरज़द हुई हो, चाहे मैंने उसे छुपाया हो या ज़ाहिर किया हो, पोशीदा रखा हो या अफशा किया हो इस रात और ख़ास कर इस साअत में बख्श दे. मेरी हर ऐसी बदअमली को माफ़ करदे जिस को लिखने का हुक्म तुने किरामन कातेबीन को दिया हो, जिन को तुने मेरे हर अमल की निगरानी पर मामूर किया है और जिन को मेरे अजा व जवारेह के साथ साथ मेरे अमाल का गवाह मुक़र्रर किया  है, फिर इन से बढ़ कर तू खुद मेरे अमाल के निगरान रहा है और इन बातों को भी जानता है जो इन की नज़र से मख्फी रह गयीं और जिन्हें तुने अपनी रहमत से छुपा लिया और जिन पर तुने अपने करम से पर्दा डाल दिया! ऐ अल्लाह, मै तुझ से इल्तेजा करता हूँ के मुझे ज्यादा से ज्यादा हिस्सा दे हर इस भलाई से जो तेरी तरफ से नाज़िल हो, हर उस एहसान से जो तू अपने फज़ल से करे, हर उस नेकी से जिसे तू फैलाये, हर उस रिजक से जिस में तू वुसअत दे, हर उस गुनाह से जिसे तू माफ़ करदे, हर उस ग़लती से जिसे तू छुपा ले! ऐ मेरे परवरदिगार, ऐ मेरे परवरदिगार, ऐ मेरे परवरदिगार,

يا اِلهي وَ سَيِّدي وَ مَوْلايَ وَ مالِكَ رِقّي، يا مَنْ بِيَدِهِ ناصِيَتي، يا عَليماً بِضُرّي وَ مَسْكَنَتي، يا خَبيراً بِفَقْري وَ فاقَتي، يا رَبِّ يا رَبِّ يا رَبِّ، أَسْأَلُكَ بِحَقِّكَ وَ قُدْسِكَ، وَ اَعْظَمِ صِفاتِكَ وَ اَسْمائِكَ، أنْ تَجْعَلَ اَوْقاتي مِنَ اللَّيْلِ وَ النَّهارِ بِذِكْرِكَ مَعْمُورَةً، وَ بِخِدْمَتِكَ مَوْصُولَةً، وَ اَعْمالي عِنْدَكَ مَقْبُولَةً، حَتّى تَكُونَ أعْمالي وَ أوْرادي كُلُّها وِرْداً واحِداً، وَ حالي في خِدْمَتِكَ سَرْمَداً. يا سَيِّدي يا مَنْ عَلَيْهِ مُعَوَّلي، يا مَنْ اِلَيْهِ شَكَوْتُ أحْوالي، يا رَبِّ يا رَبِّ يا رَبِّ، قَوِّ عَلى خِدْمَتِكَ جَوارِحي، وَ اشْدُدْ عَلَى الْعَزيمَةِ جَوانِحي، وَ هَبْ لِيَ الْجِدَّ في خَشْيَتِكَ، وَ الدَّوامَ فِي الاِْتِّصالِ بِخِدْمَتِكَ، حَتّى أسْرَحَ إلَيْكَ في مَيادينِ السّابِقينَ، وَ اُسْرِعَ إلَيْكَ فِي الْبارِزينَ، وَ اَشْتاقَ إلى قُرْبِكَ فِي الْمُشْتاقينَ، وَ اَدْنُوَ مِنْكَ دُنُوَّ الُْمخْلِصينَ، وَ اَخافَكَ مَخافَةَ الْمُوقِنينَ، وَ اَجْتَمِعَ في جِوارِكَ مَعَ الْمُؤْمِنينَ. اَللّهُمَّ وَ مَنْ اَرادَني بِسُوء فَاَرِدْهُ، وَ مَنْ كادَني فَكِدْهُ، وَ اجْعَلْني مِنْ أحْسَنِ عَبيدِكَ نَصيباً عِنْدَكَ، وَ اَقْرَبِهِمْ مَنْزِلَةً مِنْكَ، وَ اَخَصِّهِمْ زُلْفَةً لَدَيْكَ، فَاِنَّهُ لا يُنالُ ذلِكَ إلاّ بِفَضْلِكَ، وَ جُدْ لي بِجُودِكَ، وَ اعْطِفْ عَلَيَّ بِمَجْدِكَ، وَ احْفَظْني بِرَحْمَتِكَ، وَ اجْعَلْ لِساني بِذِكْرِكَ لَهِجَاً، وَ قَلْبي بِحُبِّكَ مُتَيَّماً، وَ مُنَّ عَلَيَّ بِحُسْنِ اِجابَتِكَ، وَ اَقِلْني عَثْرَتي، وَ اغْفِرْ زَلَّتي، فَاِنَّكَ قَضَيْتَ عَلى عِبادِكَ بِعِبادَتِكَ، وَ اَمَرْتَهُمْ بِدُعائِكَ، وَ ضَمِنْتَ لَهُمُ الإجابَةَ، فَاِلَيْكَ يا رَبِّ نَصَبْتُ وَجْهي، وَ اِلَيْكَ يا رَبِّ مَدَدْتُ يَدي، فَبِعِزَّتِكَ اسْتَجِبْ لي دُعائي، وَ بَلِّغْني مُنايَ، وَ لا تَقْطَعْ مِنْ فَضْلِكَ رَجائي، وَ اكْفِني شَرَّ الْجِنِّ وَ الإنْسِ مِنْ اَعْدائي. يا سَريعَ الرِّضا اِغْفِرْ لِمَنْ لا يَمْلِكُ إلاّ الدُّعاءَ، فَاِنَّكَ فَعّالٌ لِما تَشاءُ، يا مَنِ اسْمُهُ دَواءٌ وَ ذِكْرُهُ شِفاءٌ وَ طاعَتُهُ غِنىً، اِرْحَمْ مَنْ رَأْسُ مالِهِ الرَّجاءُ، وَ سِلاحُهُ الْبُكاءُ، يا سابِغَ النِّعَمِ، يا دافِعَ النِّقَمِ، يا نُورَ الْمُسْتَوْحِشينَ فِي الظُّلَمِ، يا عالِماً لا يُعَلَّمُ، صَلِّ عَلى مُحَمَّد وَ آلِ مُحَمَّد، وَافْعَلْ بي ما أنْتَ اَهْلُهُ، وَ صَلَّى اللهُ عَلى رَسُولِهِ وَ الأَئِمَّةِ الْمَيامينَ مِنْ آلِهِ، وَ سَلَّمَ تَسْليماً كَثيراً "

ऐ मेरे माबूद, ऐ मेरे आका, ऐ मेरे मौला, ऐ मेरे जिस्मो जान के मालिक, ऐ वो ज़ात जिसे मुझ पर काबू हासिल है, ऐ मेरी बदहाली और बेचारगी को जान्ने वाले, ऐ मेरे फिकरो फाका से आगही रखने वाले, ऐ मेरे परवरदिगार, ऐ मेरे परवरदिगार, ऐ मेरे परवरदिगार, मै तुझे तेरी सच्चाई और तेरी पाकीजगी, तेरी आला सेफात और तेरे मुबारक नामो का वासता देकर तुझ से इल्तेजा करता हूँ के मेरे दिन रात के औकात को अपनी याद से मामूर कर दे के हर लम्हा तेरी फरमाबरदारी में बसर हो, मेरे अमाल को कबूल फर्मा , यहाँ तक के मेरे सारे आमाल और अज्कार की एक ही लए हो जाए और मुझे तेरी फरमाबरदारी करने में दवाम हासिल हो जाए! ऐ मेरे आका, ऐ वो ज़ात जिस का मुझे आसरा है और जिस की सरकार में, मै अपनी हर उलझन पेश करता हूँ! ऐ मेरे परवरदिगार, ऐ मेरे परवरदिगार, ऐ मेरे परवरदिगार, मेरे हाथ पाँव में अपनी इताअत के लिए कुवत दे, मेरे दिल को नेक इरादों पर कायेम रहने की ताक़त बख्श, और मुझे तौफीक दे के मै तुझ से करार, वाकई डरता रहूँ और हमेशा तेरी इताअत में सरगर्म रहूँ ताकि मै तेरी तरफ सबक़त करने वालों के साथ चलता रहूँ, तेरी सिम्त बढ़ने वालों के हमराह तेज़ी से क़दम बढाऊँ, तेरी मुलाक़ात का शौक़ रखने वालो की तरह तेरा मुश्ताक रहूँ,  तेरे मुखलिस बन्दों की तरह तुझ से नज़दीक हो जाऊं, तुझ पर यकीन रखने वालों की तरह तुझ से डरता रहूँ, और तेरे हुज़ूर में जब मोमिन जमा हों मै उन के साथ रहूँ! ऐ अल्लाह, जो शख्स मुझ से कोई बदी करने का इरादा करे, तू उसे वैसी ही सज़ा दे और जो मुझ से फरेब करे तू उस को वैसी ही पादाश दे! मुझे अपने उन बन्दों में करार दे जो तेरे यहाँ से सबसे अच्छा हिस्सा पाते हैं जिन्हें तेरी जनाब में सबसे ज्यादा तक़र्रुब हासिल है और जो ख़ास तौर से तुझ से ज्यादा नज़दीक हैं क्योंकि यह रूतबा तेरे फज़ल के बग़ैर नहीं मिल सकता! मुझ पर अपना ख़ास करम कर और अपनी शान के मुताबिक मेहरबानी फर्मा ! अपनी रहमत से मेरी हिफाज़त कर, मेरी ज़बान को अपने ज़िक्र में मशगूल  रख, मेरे दिल को अपनी मुहब्बत की चाशनी अता कर, मेरी दुआएं कबूल करके मुझ पर एहसान कर, मेरी खताएं माफ़ करदे और मेरी नाज़िशें बख्श दे! चूंके तुने अपने बन्दों पर अपनी इबादत वाजिब की है, इन्हें दुआ मांगने का हुक्म दिया है और इनकी दुआएं कबूल करने की ज़िम्मेदारी ली है, इसलिए ऐ परवरदिगार, मै ने तेरी ही तरफ रुख किया है और तेरे ही सामने अपना हाथ फैलाया है! बस अपनी इज्ज़त के सदके में मेरी दुआ कबूल फरमा और मुझे मेरी मुराद को पहुंचा! मुझे अपने फजल ओ करम से मायूस ना कर, और जिन्नों और इंसानों  में से जो भी मेरे दुश्मन हों मुझ को इन के शर से बचा! ऐ अपने बन्दों से जल्दी राज़ी हो जाने वाले, इस बन्दे को बख्श दे जिस के पास दुआ के सिवा कुछ नहीं, क्योंकि तू जो चाहे कर सकता है, तू ऐसा है जिस का नाम हर मर्ज़ की दवा है, जिस का ज़िक्र हर बीमारी से शिफा है, और जिस की इताअत सबे बेनेयाज़ कर देने वाली है, इस पर रहम कर जिस की पूंजी तेरा आसरा और जिस का हथियार रोना है! ऐ नेमतें अता करने वाले, ऐ बलाएँ टालने वाले, ऐ अंधेरों से घबराये हुओं के लिए रोशनी, ऐ वो आलिम जिसे किसी ने तालीम नहीं दी, मुहम्मद (सा) और आले मुहम्मद (सा) पर दरूद ओ सलाम भेज और मेरे साथ वो सुलूक कर जो तेरे शायाने शान हो!



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