रमज़ान महीने की आज २१ तारीख़ है। सन ४० हिजरी क़मरी में ६३ वर्ष की आयु में हज़रत अली अलैहिस्सलाम शहीद हुए।

रमज़ान महीने की आज २१ तारीख़ है। सन ४० हिजरी क़मरी में ६३ वर्ष की आयु में हज़रत अली अलैहिस्सलाम शहीद हुए। सन चालिस हिजरी क़मरी ...



रमज़ान महीने की आज २१ तारीख़ है। सन ४० हिजरी क़मरी में ६३ वर्ष की आयु में हज़रत अली अलैहिस्सलाम शहीद हुए।

सन चालिस हिजरी क़मरी में रमज़ान महीने की २१ तारीख़ को इब्ने मुल्जिम मुरादी नाम के अत्यंत क्रूर एवं रूढ़िवादी व्यक्ति ने हज़रत अली अलैहिस्सलाम पर नमाज़ की हालत में प्राणघातक आक्रमण किया था जिसमें उनके पावन सिर पर घातक घाव लगा था और २१ रमज़ान को वे शहीद हो गये। इब्ने मुल्जिम मुरादी ने जिस तलवार से हज़रत अली अलैहिस्सलाम पर हमला किया था वह विषयुक्त थी और वह मस्जिदे कूफ़ा में सुबह की नमाज़ पढ़ा रहे थे। जब उनके सिर के उपचार के लिए वैद्य को बुलाया गया तो वह घाव की गहराई व स्थिति को देखकर निराश हो गया।
अपनी शहादत से पहले हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया था मौत मेरे लिए बिना बुलाये मेहमान की तरह अपरिचित नहीं है, मेरा और मौत का उदाहरण उस प्यासे व्यक्ति की भांति है जो काफी समय के बाद पानी तक पहुंचा हो और उस व्यक्ति की भांति है जो खोई हुई मूल्यवान चीज़ को काफ़ी समय के बाद पा गया हो।“


हज़रत अली अलैहिस्सलाम जो मौत से इतना अधिक प्रेम करते थे उसकी वजह महान ईश्वर से गहरा प्रेम और ईमान था।

मूल रूप से जिस इंसान ने ईश्वरीय आदेश के अनुसार इस दुनिया में जीवन बिताया हो और परलोक की तैयारी कर ली हो वह मौत से न केवल डरेगा नहीं, बल्कि वह जल्द से जल्द अपने पालनहार से भेंट का प्रयास करेगा। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने अपने पावन जीवन में सदैव यह दर्शा दिया कि उन्हें मौत से लेशमात्र भी भय नहीं है। जब पैग़म्बरे इस्लाम मक्का से मदीना पलायन करने वाले थे तो पलायन की रात हज़रत अली अलैहिस्सलाम किसी प्रकार के भय के बिना उनके बिस्तर पर सो गये जबकि हज़रत अली अलैहिस्सलाम को भलिभांति पता था कि यह बहुत ही ख़तरनाक कार्य है परंतु उनके लिए महान ईश्वर की प्रसन्नता प्राप्त करना और पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेही की जान की सुरक्षा महत्वपूर्ण थी। हज़रत अली अलैहिस्सलाम के इस महान परित्याग के बाद पवित्र क़ुरआन के सूरे बक़रा की २०७वीं आयत नाज़िल हुई थी जिसमें महान ईश्वर फ़रमाता है कुछ लोग ईश्वर की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए अपनी जानों को बेच देते हैं और ईश्वर अपने बंदों के प्रति बहुत कृपालु और दयावान है।“


ओहद नामक यद्ध में कुछ मुसलमानों ने लापरवाही बरती जिसकी वजह से अनेकेश्वादियों ने चारों ओर से मुसलमानों पर हमला कर दिया जिसका परिणाम यह हुआ कि पैग़म्बरे इस्लाम के चाचा हज़रत हम्ज़ा सहित बहुत से मुसलमान योद्धा शहीद हो गये। उस युद्ध में हज़रत अली अलैहिस्सलाम और कुछ मुसलमानों ने ही केवल पैग़म्बरे इस्लाम की रक्षा की और उन्हें शत्रुओं के हमलों से मुक्ति दिलाई। इस मध्य आसमान में हज़रत जिब्राईल की यह आवाज़ गूंजी कि अली के अलावा कोई जवान नहीं है और ज़ुलफ़ेक़ार के सिवा कोई तलवार नहीं है परंतु युद्ध के बाद हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने जब यह देखा कि लगभग ७० मुसलमान शहीद हो गये हैं और वे शहीद नहीं हुए तो बहुत दुःखी हुए जबकि वे बहुत घायल हुए थे। पैग़म्बरे इस्लाम जब इस बात को समझ गये तो उन्होंने फरमाया तुम्हें मुबारक हो कि अंत में तुम शहीद होगे।“ कुछ समय के बाद हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने एक बार फ़िर ईश्वर के मार्ग में शहादत के प्रति व्याकुलता प्रकट की और पैग़म्बरे इस्लाम के वचन को याद दिलाया तो पैग़म्बरे इस्लाम ने बड़े ही कृपालु अंदाज़ में जवाब दिया  कि हां निश्चित रूप से ऐसा ही होगा परंतु बताओ मैं जानूं कि उस समय तुम्हारा धैर्य व प्रतिरोध कैसा होगा? हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने उत्तर दिया ऐसा अवसर धैर्य का अवसर नहीं है बल्कि ख़ुशी का अवसर है।“


जैसाकि हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने अपनी शहादत से दो दिन पूर्व जब उन पर इब्ने मुल्जिम ने प्राण घातक हमला किया था कहा था” काबे के ईश्वर की क़सम मैं सफ़ल हो गया।“ जी हां हज़रत अली अलैहिस्सलाम महान ईश्वर के मार्ग में शहादत को सफलता समझते थे इस आधार पर वे शहादत से लेशमात्र भी नहीं डरते थे।

मौत के संदर्भ में हज़रत अली अलैहिस्सलाम की केवल यहीं चिंता थी कि जब मौत आये तो वे सत्य के मार्ग पर रहें। क्योंकि पैग़म्बरे इस्लाम के कुछ अनुयाई ऐसे थे जो पैग़म्बरे इस्लाम के काल में मोमिन थे  और उन्होंने काफ़ी क़ुरबानियां भी दी थीं परंतु उनके स्वर्गवास के बाद उन्होंने दूसरा रास्ता अपनाया था परंतु पैग़म्बरे इस्लाम ने हज़रत अली अलैहिस्सलाम को इस संदर्भ में भी संतोष दिलाया था। जैसाकि पैग़म्बरे इस्लाम ने रमज़ान के पवित्र महीने के आरंभ में इस महीने की श्रेष्ठता व विशेषता के बारे में एक ख़ुत्बा दिया था। उस समय हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपने स्थान से उठे और उन्होंने पूछा हे ईश्वरीय दूत इस महीने में सबसे अच्छा क्या कार्य है? पैग़म्बरे इस्लाम ने उत्तर दिया तक़वा और अवैध व हराम कार्यों से दूरी परंतु जब उन्होंने हज़रत अली अलैहिस्सलाम को देखा तो कोई और विषय याद आ गया जिससे वह दुःखी हो गये और उन्होंने विलाप किया।


हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने पैग़म्बरे इस्लाम के दुःखी होने और रोने का कारण पूछा। पैग़म्बरे इस्लाम ने फ़रमाया हे अली! मेरे रोने का कारण वह अत्याचार है जो तुम पर इस महीने में किया जायेगा। मानो मैं तुम्हें देख रहा हूं कि तुम नमाज़ पढ़ रहे हो और अतीत एवं भविष्य में सबसे दुर्भाग्यशाली जो समूद जाति के ऊंट के हत्यारे का भाई है, तुम्हारे सिर पर तलवार मारेगा कि तुम्हारी दाढ़ी उसकी चोट के ख़नू से रंगीन हो जायेगी।“
हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने किसी प्रकार की परेशानी के बिना केवल इतना पूछा क्या उस समय मेरा धर्म सुरक्षित रहेगा? उस समय पैग़म्बरे इस्लाम ने हज़रत अली अलैहिस्सलाम को सुन्दर वाक्य के साथ अपने उत्तराधिकारी के रूप में याद किया।


पैग़म्बरे इस्लाम ने बारम्बार हज़रत अली अलैहिस्सलाम की शहादत की शुभसूचना दी थी इसलिए वे सदैव महान ईश्वर के मार्ग में शहादत की प्रतीक्षा में थे और अपने जीवन के अंतिम समय में इस प्रकार अमल करते थे कि मानो जानते थे कि प्रतीक्षा की लंबी घड़ी समाप्त होने वाली है परंतु हज़रत अली अलैहिस्सलाम शहादत का शौक रखने के बावजूद सांसारिक कार्यों को अंजाम देने में किसी प्रकार की कमी से काम नहीं लेते थे और इन कार्यों को महान ईश्वर की प्रसन्नता प्राप्त करने का कारण समझते थे। हज़रत अली अलैहिस्सलाम इस बारे में अपना दृष्टिकोण इस प्रकार बयान करते हैं उस व्यक्ति को मैं पसंद नहीं करता हूं जो सांसारिक कार्यों को अंजाम देने में आलस्य से काम लेता और उसकी उपेक्षा करता है क्योंकि जो अपने सांसारिक जीवन के प्रति इस प्रकार है वह अपने परलोक के जीवन में अधिक आलस्य से काम लेगा और सांसारिक कार्यों की अधिक उपेक्षा करेगा।“
इस आधार पर हज़रत अली अलैहिस्सलाम  सांसारिक कार्यों को अंजाम देने में सफल रहे। उन्होंने बहुत सी ज़मीनों को आबाद किया और विभिन्न कुएं खोदे और उन्होंने कभी भी इस प्रकार के कार्यों को अपनी प्रतिष्ठा के विरुद्ध नहीं समझा। प्रसिद्ध सुन्नी विद्वान इब्ने अबिल हदीद इस बारे में इस प्रकार लिखता है” वह अपने हाथों से कार्य करते थे। सदैव खेती करते और ज़मीन की सिंचाई करते थे। खजूर का पेड़ लगाते थे और ज़मीन को आबाद करने के बाद उसे निर्धनों को वक़्फ़ कर देते थे।“


इसी प्रकार हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने बहुत कुएं खोदे और कुएं खोदने के बाद उन्हें मुसलमानों को वक़्फ़ कर देते थे। इस प्रकार हज़रत अली अलैहिस्सलाम इन कार्यों के माध्यम से काफ़ी धन कमा सकते थे परंतु वे निर्धनों को दान कर देते थे। दूसरे शब्दों में अपने इन कार्यों के माध्यम से अपने परलोक को भी आबाद करते थे।

विदित में केवल पांच वर्षों तक हज़रत अली अलैहिस्सलाम ख़लीफ़ा थे परंतु इस दौरान उन्होंने बंदगी और ईश्वरीय आदेशों के पालन को चरम शिखर पर पहुंचा दिया। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने ख़िलाफ़त को इसलिए स्वीकार किया कि वह कमज़ोरों के अधिकारों को दिलाने और न्याय स्थापित करने का माध्यम है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने ख़िलाफ़त स्वीकार करने के बाद कमज़ोरों को उनके अधिकार दिलाने और न्याय स्थापित करने की दिशा में किसी प्रकार के संकोच से काम नहीं लिया। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने जब अपनी ख़िलाफत के दौरान इन उद्देश्यों को व्यवहारिक बनाने के लिए प्रयास आरंभ कर दिया तो जिन लोगों ने अपने हितों को ख़तरे में देखा वे उनके विरोधी हो गये परंतु हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने किसी प्रकार के भय के बिना विशिष्टता चाहने वालों, अवसरवादियों और रुढ़िवादियों का डटकर मुक़ाबला किया। अंततः इन्हीं रूढ़िवादियों में से एक ने हज़रत अली अलैहिस्सलाम को कूफ़ा की मस्जिद में सुबह की नमाज़ पढ़ाते समय शहीद कर दिया।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम की विशेषताओं एवं सदगुणों के बारे में मुसलिम और ग़ैर मुसलिम विद्वानों ने बहुत कुछ कहा व लिखा है परंतु हज़रत अली अलैहिस्सलाम के ज्येष्ठ सुपुत्र हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने जो कहा है वह सबसे अधिक सुन्दर व अच्छा है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम को दफ़्न करने के बाद इमाम हसन अलैहिस्सलाम लोगों के मध्य आये और ऐसी स्थिति में मिम्बर पर गये कि उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे और कहा जो रात गुज़री है इस संसार से ऐसा व्यक्ति चला गया जो इस्लाम के अग्रणी लोगों में से थे और पैग़म्बरे इस्लाम के अलावा कोई भी उससे आगे नहीं था। उसने पैग़म्बरे इस्लाम के साथ मिलकर जेहाद किया और पैग़म्बरे इस्लाम की पताका को ऐसी स्थिति में अपने कांधों पर उठाया कि जिब्रईल और मीकाईल उनका साथ दे रहे थे। वह व्यक्ति ऐसी रात में दुनिया से चला गया जिसमें पैग़म्बरे इस्लाम पर क़ुरआन उतरा था और ईसा बिन मरियम आसमान पर गये और यूशा बिन नून शहीद हुए। मेरे पिता ने इस दुनिया में दिरहम व दीनार नहीं छोड़े है मगर सात सौ दिरहम जो उन्होंने परिवार के लिए छोड़ा है।“



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