रिश्तेदारों के अधिकार ..सूरए नूर की आयत नंबर 60 -64

 सूरए नूर की आयत नंबर 60  और जो वृद्ध स्त्रियाँ जिन्हें विवाह की आशा न रह गई हो, उन पर कोई दोष नहीं कि वे अपने कपड़े (अर्थात आ...



 सूरए नूर की आयत नंबर 60 



और जो वृद्ध स्त्रियाँ जिन्हें विवाह की आशा न रह गई हो, उन पर कोई दोष नहीं कि वे अपने कपड़े (अर्थात आवरण) उतार कर रख दें, इस शर्त के साथ कि वे अपने श्रृंगार का प्रदर्शन न करें। फिर भी यदि वे इससे बचें तो यह उनके लिए बेहतर है। और ईश्वर सुनने वाला और जानकार है। (24:60)



महिलाओं के हिजाब या आवरण के संबंध में मूल आदेश इस सूरे की 31वीं आयत में बयान किया गया है। यह आयत वृद्ध महिलाओं को उस आदेश से अलग करते हुए कहती है कि जो महिलाओं अधिक आयु के कारण विवाह में रुचि नहीं रखतीं और इसी प्रकार कोई पुरुष भी उनसे विवाह नहीं करना चाहता उन्हें इस बात की अनुमति है कि वे नामहरम अर्थात परपुरुष के सामने भी अपना आवरण या चादर उतार दें। अल्बत्ता यह केवल उसी स्थिति में वैध है जब उनके सिर या गर्दन में कोई आभूषण न हो और उन्होंने श्रृंगार न कर रखा हो।


स्वाभाविक है कि इस प्रकार की महिलाओं में यौन आकर्षण नहीं रह जाता और उनके द्वारा पर्दा न करने से समाज में किसी प्रकार की बुराई फैलने की आशंका नहीं होती। अलबत्ता यदि ये महिलाएं भी, हिजाब के क़ानून का सम्मान करते हुए, अन्य महिलाओं की भांति ही पर्दा करें तो यह पवित्रता के अधिक निकट है और स्वयं उनके लिए भी अधिक प्रिय है।

यह आयत भली भांति यह दर्शाती है कि हिजाब का वास्तविक तर्क, महिलाओं की नैतिक पवित्रता की रक्षा करना है और निश्चित रूप से यह स्वयं उनके ही हित में है। इस्लाम की दृष्टि में उसी पहनावे को हिजाब समझा जाता है जो पुरुषों को उत्तेजित न करता हो।

इस आयत से हमने सीखा कि इस्लाम के क़ानून लचकदार और वास्तविकताओं एवं आवश्यकताओं के अनुकूल हैं अतः लोगों की स्थितियों के परिवर्तित होने के साथ उनमें भी परिवर्तन आता है जैसा कि यह आयत, वृद्ध महिलाओं के लिए हिजाब को सरल बनाती है।

महिलाओं के लिए श्रृंगार किए हुए चेहरे के साथ परपुरुषों के बीच उपस्थित होना वैध नहीं है।



 सूरए नूर की आयत नंबर 61 



अंधे, लँगड़े और रोगी के लिए कोई हरज नहीं है और स्वयं तुम्हारे लिए इस बात में कोई हरज नहीं है कि तुम अपने घरों में से खाओ या अपने पिताओं के घरों से या अपनी माताओं के घरों से या अपने भाइयों के घरों से या अपनी बहनों के घरों से या अपने चाचाओं के घरों से या अपनी फूफियों के घरों से या अपने मामाओं के घरों से या अपनी मौसियों के घरों से या जिन घरों की कुंजियां तुम्हारे अधिकार में हों या अपने मित्र के घर से। तुम्हारे लिए इसमें भी कोई हरज नहीं कि तुम मिल कर खाओ या अलग-अलग और अकेले। तो जब भी किसी घर में जाया करो तो एक दूसरे को सलाम किया करो, ईश्वर की ओर सेबरकत वाला और अत्यधिक पवित्र अभिवादन। ईश्वर इस प्रकार अपनी आयतों को तुम्हारे लिए स्पष्ट करता है कि शायद तुम बुद्धि से काम लो। (24:61)



इस आयत के तीन भाग हैं, पहला भाग साधारण रोगियों और अंधे व लंगड़े जैसे शारीरिक रूप से अपंग लोगों के बारे में है। इसमें कहा गया है कि ईश्वर ने उन्हें हर उस कार्य से माफ़ कर दिया है जो उनके लिए कठिन हो तथा नमाज़, रोज़े, हज व जेहाद जैसी अनिवार्य उपासनाओं में भी उन्हें छूट दी है अतः पारिवारिक एवं सामाजिक मामलों में भी उन्हें विशेष छूट दी जानी चाहिए।




आयत का दूसरा भाग ख़ूनी रिश्तेदारों के बारे में है। आयत कहती है कि माता-पिता, बहन-भाई, फूफी, चाचा, मौसी व मामा इत्यादि के घर से खाने पीने के लिए अनुमति की आवश्यकता नहीं है और यदि वे घर में न हों तब भी तुम उनके घर में मौजूद खाना खा सकते हो, इसके लिए अनुमति लेना आवश्यक नहीं है और ईश्वर ने तुम्हें इस बात की इजाज़त दे रखी है कि तुम प्रचलित ढंग से उनके घर में मौजूद भोजन में से खा सकते हो। मित्र व परिचित लोग जिनके यहां तुम्हारा आना जाना है या जिन्होंने अपने घर की चाबी तुम्हें दे रखी है ताकि उनकी अनुपस्थिति में तुम उनके घरों की देख भाल करो, इस आदेश में शामिल हैं और उनके घर से भी खाने पीने के लिए अनुमति की आवश्यकता नहीं है।




आयत का तीसरा भाग, घर में प्रविष्ट होने के संबंध में एक मूल एवं सार्वजनिक आदेश है, चाहे वह अपना घर हो या दूसरों का। आदेश यह है कि घर में प्रविष्ट होते समय घर वालों को पूरी आत्मीयता से सलाम किया जाए क्योंकि ईश्वर ने मुसलमानों का अभिनंदन एक दूसरे को सलाम करने में रखा है कि जो शांति व सुरक्षा की कामना है और इससे घर वालों पर से कठिनाइयाँ व संकट दूर होते हैं।



इस आयत से हमने सीखा कि लोगों और इस्लामी सरकार के अधिकारियों को हर उस चीज़ को समाप्त करना चाहिए जो रोगियों और अपंगों के लिए कठिनाई का कारण हो, चाहे वह उपचार व उसके ख़र्चों से संबंधित हो, चाहे कार्यस्थल व उसकी परिस्थितियों के बारे में हो या फिर जीवन व उसकी संभावनाओं के बारे में हो।

ख़ूनी रिश्तेदारों के एक दूसरे पर कुछ अधिकार होते हैं जिनमें से एक यह है कि वे प्रचलित मात्रा में एक दूसरे का खाना खा सकते हैं।

इस्लाम में मित्रों के अधिकारों को परिजनों के अधिकारों के समान ही रखा गया है।

सलाम करना, एक पवित्र शिष्टाचार है तथा जीवन में विभूति और बरकत का कारण बनता है।

सूरए नूर, आयतें 62-64,


ईमान वाले तो बस वही हैं जो ईश्वर और उसके पैग़म्बर पर पूरा ईमान रखते हैं और जब भी किसी सामूहिक मामले में उनके साथ हों तो जब तक कि उनसे (जाने की) अनुमति न ले लें, नहीं जाते। (हे पैग़म्बर!) जो लोग (आवश्यकता पड़ने पर) आपसे अनुमति ले लेते है, वही लोग ईश्वर और उसके पैग़म्बर पर ईमान रखते हैं, तो जब वे किसी काम के लिए आपसे अनुमति चाहें तो उनमें से जिसे चाहिए (आवश्यकता के अनुसार) अनुमति दे दिया कीजिएऔर उन लोगों के लिए ईश्वर से क्षमा की प्रार्थना कीजिए कि निःसंदेह ईश्वर अत्यंत क्षमाशील औरदयावान है। (24:62)


इससे पहले मुसलमानों के बीच एक दूसरे से मेलजोल की शैली का वर्णन किया गया। यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के साथ मुसलमानों के व्यवहार की शैली के बारे में कहती है कि ईश्वर पर ईमान की एक निशानी उसके पैग़म्बर का आज्ञापालन है। समाज के महत्वपूर्ण मामलों में उनकी अनुमति के बिना कोई काम नहीं किया जाना चाहिए और यदि महत्वपूर्ण मामलों में सार्वजनिक उपस्थिति आवश्यक हो और तुम उनके साथ हो तो जब तक वे अनुमति न दे दें कहीं न जाओ।

अलबत्ता यह आयत केवल पैग़म्बर के काल से विशेष नहीं है बल्कि जो कोई भी अपनी योग्यता के आधार पर इस्लामी समाज का नेतृत्व कर रहा हो, ईमान वालों को उसका अनुसरण करना चाहिए तथा सामाजिक मामलों में लोगों की ओर से उसकी इच्छा के बिना कोई काम नहीं होना चाहिए।

स्वाभाविक है कि धर्म के नेता व्यक्ति व समाज के हितों के आधार पर निर्णय करते हैं और उनका आदेश या अनुमति, ईश्वरीय दायित्वों के पालन के परिप्रेक्ष्य में होती है। अतः जो लोग उनसे कहीं जाने की अनुमति चाहते हैं वे उनके लिए ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वह उनके पापों को क्षमा कर दे।

क़ुरआने मजीद की तफ़सीर अर्थात व्याख्या की किताबों में वर्णित है कि हन्ज़ला नामक एक व्यक्ति की शादी की रात ही पैग़म्बरे इस्लाम व मुसलमानों को उहद नामक युद्ध के लिए मदीना नगर से निकलना था। उसने पैग़म्बर से अनुमति ली कि वह विवाह के समारोह में भाग लेकर सुबह मुसलमानों के साथ आ मिलेगा। शादी की अगली सुबह वह जेहाद में भाग लेने के लिए इतना आतुर था कि बिना नहाए हुए ही घर से निकल पड़ा। उहद नामक स्थान पर जहां युद्ध हो रहा था वह मुसलमानों से जा मिला और फिर जेहाद में शामिल हो गया। अंततः उस युद्ध में वह शहीद हुआ जिसके बाद पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने कहा कि आकाश के फ़रिश्तों ने उसे नहलाया और स्वर्ग में ले गए।

इस आयत से हमने सीखा कि सामाजिक ज़िम्मेदारियों में, एकजुटता बनाए रखने और लक्ष्य की प्राप्ति के लिए संगठनात्मक अनुशासन का पालन आवश्यक है।

सार्वजनिक कार्यों में जो समरसता व परामर्श के आधार पर किए जाते हैं, एकपक्षीय फ़ैसले नहीं किए जाने चाहिए।

इस्लामी समाज को सदैव ही अपने नेता के आदेशों का पालन करना चाहिए और उसकी अनुमति के बिना कोई दायित्व नहीं छोड़ना चाहिए।

इस्लामी समाज के नेताओं को अपनी नीतियों को लागू करते समय लचक का प्रदर्शन करना चाहिए और लोगों की कठिनाइयों को समझते हुए दया से काम लेना चाहिए।


 सूरए नूर की आयत नंबर 63 और 64



(हे ईमान वालो!) अपने बीच पैग़म्बर के बुलाने को तुम आपस में एक दूसरे को बुलाने जैसा न समझना। ईश्वर उन लोगों को भली-भाँति जानता है जो तुममें से ऐसे हैं कि (एक-दूसरे की) आड़ लेकर चुपके से (उनके पास से) हट जाते है। तो उन्हें,जो उनके आदेश की अवहेलना करते हैं, डरना चाहिए कि कहीं (संसार में ही) उन पर कोई परीक्षा आ पड़े या उन पर कोई कड़ा दंड ही आ जाए। (24:63) जान लो! आकाशों और धरती में जो कुछ भी है, ईश्वर ही का है। वह जानता है तुम जिस (नीति) पर हो। और जिस दिन वे उसकी ओर पलटेंगे, तो जो कुछ उन्होंने किया होगा, वह उन्हें बता देगा। ईश्वर तो हर चीज़ का ज्ञानी है। (24:64)



पिछली आयत के क्रम को जारी रखते हुए, जिसमें कहा गया है कि ईमान वालों को, पैग़म्बर की अनुमति के बिना कोई कार्य नहीं छोड़ना चाहिए, यह आयत कहती है कि जब भी पैग़म्बर तुम्हें किसी काम के लिए बुलाएं तो उससे बचने के लिए स्वयं को उनकी नज़रों से छिपाने का प्रयास न करो और वहां से धीरे से हट न जाओ। जान लो कि पैग़म्बर की बात का विरोध और उनके आदेश की अवहेलना का लोक परलोक में तुम्हारे लिए बड़ा बुरा परिणाम निकलेगा। संसार में व्यक्तिगत व सामाजिक समस्याएं व कठिनाइयां तुम पर आ पड़ेंगी और तुम कड़ी परीक्षाओं में ग्रस्त हो जाओगे जबकि पैग़म्बर के विरोध के कारण प्रलय में कड़ा दंड तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा होगा।

आगे चल कर आयत कहती है कि तुम लोग पैग़म्बर के आदेश को अन्य लोगों के आदेशों की भांति क्यों समझते हो और उसका विरोध करते हो या उससे बचने का प्रयास करते हो? यदि तुम अपनी चालों के माध्यम से स्वयं को पैग़म्बर की नज़रों से छिपा भी लो तो, ईश्वर से किस प्रकार बच पाओगे जो हर चीज़ का जानने वाला है? ईश्वर सदैव तुम पर दृष्टि रखता है और वह तुम्हारे भीतर व बाहर की हर बात से अवगत है। वह न केवल तुम पर बल्कि संपूर्ण सृष्टि पर प्रभुत्व रखता है और कोई भी चीज़ उसकी नज़रों से ओझल नहीं है। वही ईश्वर प्रलय में न्याय करने वाला है और तुम्हारा कर्मपत्र तुम्हारे हवाले करके तुम्हारी स्थिति को स्पष्ट कर देगा।




सूरए नूर की अंतिम आयत मनुष्यों के कर्मों के संबंध में ईश्वर के ज्ञान पर तीन बार बल देती है ताकि कोई यह न सोचे कि वह गुप्त रूप से कोई काम कर सकता है या ऐसे स्थान पर जा सकता है जो ईश्वर की नज़रों से ओझल हो। स्वाभाविक है कि जिसे इस बात पर विश्वास हो कि ईश्वर, सृष्टि को अपने घेरे में लिए हुए है तथा वह अपने बंदों के सभी कर्मों को देख रहा है तो वह कभी भी पाप नहीं करेगा क्योंकि यह आस्था एक मज़बूत प्रतिरोधक के रूप में उसे पापों व पथभ्रष्टताओं से रोके रखती है।

इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर के पैग़म्बर और अन्य प्रिय बंदे, पवित्र और सम्मानीय हस्तियां हैं जिनके सम्मान की रक्षा हर स्थिति में होनी चाहिए। उनका नाम सम्मान से लिया जाना चाहिए, उनके निमंत्रण को अन्य लोगों के निमंत्रण के समान नहीं समझना चाहिए बल्कि उत्तम ढंग से उनका उत्तर देना चाहिए।

ईश्वर के आदेश या पैग़म्बर की इच्छा के विरोध का परिणाम लोक-परलोक में समस्याओं के रूप में सामने आता है। संसार और प्रलय में शांति व संतोष, धार्मिक आदेशों के पालन में निहित है।

इस बात पर ईमान कि ईश्वर, मनुष्य के विचारों व कर्मों से अवगत है, व्यक्ति को बुराइयों व पापों से रोके |





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