दूसरों की सहायता और सेवा सबसे बड़ी इबादत

इन्सान की उत्कृष्ट भावनाओं में से एक अन्य इन्सानों की सेवा करना और सहायता करना है। इन्सान पत्थर की तरह बेजान नहीं है, इसी लिए वह अन्य इन...

इन्सान की उत्कृष्ट भावनाओं में से एक अन्य इन्सानों की सेवा करना और सहायता करना है। इन्सान पत्थर की तरह बेजान नहीं है, इसी लिए वह अन्य इन्सानों के प्रति उदासीन नहीं रह सकता। सहायता की यह कोमल भावना महान लोगों में अधिक प्रकट होती है। वे हमेशा दूसरों की चिंता करते हैं और दिल में दूसरों की सहायता करने की इच्छा रखते हैं। हज़रत इमाम सज्जाद (अ) जन सेवा के लोक एवं परलोक में परिणाम और उसमें बहुत अधिक पुण्य होने के दृष्टिगत, हमेशा दुआ के लिए हाथ उठाते थे और और अल्लाह से जन सेवा का अवसर प्राप्त होने की दुआ मांगते थे। वे फ़रमाते थे कि हे अल्लाह, मोहम्मद और उनके परिजनों पर दुरूद भेज, और मेरे हाथों से लोगों के लिए भले काम करा और मुझ पर अनुग्रह करते हुए उसे रद्द न कर, हे पालनहार मुझे अतिव्यय से सुरक्षित रख और व्यय में संतुलन के साथ निर्धनों को दान देने का मार्ग मुझ पर प्रशस्त कर। हे अल्लाह, ग़रीबों के साथ उठना बैठना मेरे लिए प्रिय बना दे और उनके साथ उठने बैठने और धैर्य रखने में मेरी सहायता कर।

लोगों की सेवा, इस्लाम की शिक्षाओं में सर्वश्रेष्ठ इबादत है। क़ुरान और पैग़म्बरे इस्लाम (स) के कथनों के अनुसार लोगों की सेवा और अल्लाह के निटक लोकप्रियता में घनिष्ठ संबंध है। क़ुराने मजीद में दूसरों को ध्यान रखने को इतना महत्वपूर्ण माना गया है कि आत्मिक मार्गदर्शन के लिए दान देने और दूसरों की समस्याओं का समाधान निकालने को महत्वपूर्ण शर्त माना गया है। क़ुरान के सूरए बक़रा की आयत 2 और 3 में उल्लेख है, यह महान किताब है जिसमें आशंका की कोई गुंजाईश नहीं है और धर्म में गहरी आस्था रखने वालों के मार्गदर्शन का कारण है। यह वे लोग हैं कि जो परलोक पर विश्वास रखते हैं और नमाज़ अदा करते हैं और जो कुछ अनुकंपाएं हमने उन्हें प्रदान की हैं उन्हें ख़र्च करते हैं।

इन आयतों के आधार पर अल्लाह उन लोगों का मार्गदर्शन करता है और उन लोगों को अपनी वास्तविकताओं की मिठास चखाता है कि जो परलोक पर ईमान के साथ नमाज़ पढ़ते हैं और दूसरों को दान देते हैं।

जन सेवा के संदर्भ में पैग़म्बरे इस्लाम (स) का अद्भुत कर देने वाला कथन है, हज़रत फ़रमाते हैं कि लोग अल्लाह का परिवार हैं, अल्लाह के निकट सबसे लोकप्रिय वह व्यक्ति है जो अल्लाह के परिवार को लाभ पहुंचाए।

दूसरी ओर, जिस तरह इन्सान को अपने पालनहार से संपर्क स्थापित करने की ज़रूरत है, उसी तरह लोगों से भी संबंध स्थापित करने की आवश्यकता है। हम में से कोई भी जीवन बिताने के लिए अकेले अपनी ज़रूरतें पूरी नहीं कर सकता। यही वजह है कि अपनी योग्यता और बल के अनुसार, दूसरों की ज़रूरतों के एक भाग को पूरा करते हैं ताकि इसके बदले में वे भी हमारी कुछ ज़रूरतों को पूरा करें। शहीद मुर्तज़ा मुतहरी समेत कुछ मुस्लिम विचारधारकों का मानना है कि इन्सान के अस्तित्व में दूसरे इन्सानों के साथ भलाई करने की प्रशंसनीय भावना पाई जाती है, तथा अन्य भावनाओं की तरह इसका भी ध्यान रखना ज़रूरी होता है। निःसंदेह, इस काम में विफलता से अनचाहे रूप से इन्सान पर निराशा छा जाती है। वर्तमान समय में टैकनोलजी एवं उद्योग के विकास के कारण यद्यपि अनेक सुविधाएं उपलब्ध हो गई हैं लेकिन इन्सान में जन सेवा की भावना कम हो गई है। इस दृष्टिकोण के अनुसार, वर्तमान शताब्दि में इन्सान की निराशा के एक मूल कारण, अपने व्यक्तित्व के बारे में सोचना और दूसरों की सेवा नहीं करना है।

ईरान के महान कवि सादी ने बहुत ही सुन्दर शब्दों में उन लोगों को कि जो दूसरों की सेवा की भावना नहीं रखते कठोर पत्थर बताया है। सादी का मानना है, पत्थर और लोहे से कुछ लाभ होता है कि जिसका ऐसे लोगों में अभाव होता है।

इस्लाम के अनुसार, इन्सानों के एक दूसरे पर अधिकार हैं। हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ) अधिकारों के बारे में इन अधिकारों का उल्लेख करते हैं और विभिन्न समूहों के अधिकारों को बयान करते हैं, जैसे कि नेतृत्व करने वाले, उनके मातहत काम करने वाले, रिश्तेदार, भलाई करने वाले, पड़ोसी, दोस्त, सहयोगी, मांगने वाले और निर्धन और यहां तक कि जानवरों के अधिकारों का भी उल्लेख करते हैं। वास्तव में इस्लाम इस सही दृष्टिकोण द्वारा लोगों की सेवा को इन्सानों का दायित्व क़रार देता है। इस्लाम का मानना है कि लोग आपस में एक दूसरे के सेवक होने चाहिए इसलिए कि उनका एक दूसरे पर अधिकार है। यह अधिकार कभी इतना स्पष्ट होता है कि लोगों को जवाबदही के लिए मजबूर करता है जैसे कि पिता, मां, शिक्षक आदि का अधिकार, और कभी गोपनीय अधिकार होता है और लोग उसकी उपेक्षा करते हैं जैसे कि निर्धनों, अनाथों और मातहतों का अधिकार। समाज में ध्यान पूर्वक रहकर स्वयं के प्रति उनके अधिकारों को पहचाना जा सकता है, और इस स्थिति में उनकी सेवा की आवश्यकता को भी समझा जा सकता है।

एक व्यक्ति ने इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ) से क़ुरान के सूरए मेराज की 24 और 25 वीं आयत में ज्ञात अधिकार के बारे में सवाल किया। आयत इस प्रकार है कि और वे कि जिनकी दौलत एवं सम्पत्ति में निर्धनों के लिए ज्ञात अधिकार है। इमाम (अ) ने जवाब दिया, ज्ञात अधिकार वह चीज़ है कि जो व्यक्ति अपनी दौलत से अलग करता है और वह ज़कात एवं सदक़े से अर्थात धर्म के मार्ग में निर्धारित अनिवार्य दान देने के अतिरिक्त है। उस व्यक्ति ने पूछा, इस धन का वह क्या करता है? इमाम (अ) ने फ़रमाया, उस धन को रिश्तेदारों पर ख़र्च करता है और कमज़ोर लोगों की सहायता करता है और उनके दुखों को दूर करता है या अपने धार्मिक भाईयों से लगाव पैदा करता है और उनकी समस्याओं का समाधान करता है। ब्रितानी लेखक विलियम शेक्सपीयर कहता है, दूसरों पर दया और कृपा, अनुकंपा की बारिश की तरह है कि जो आसमान से ज़मीन पर बरसती है और आशीर्वाद एवं वरदान का कारण है। इसलिए कि सेवक का कल्याण करती है और दूसरे पक्ष के लिए भी आशीर्वाद एवं वरदान का कारण बनती है।

इस्लामी शिक्षाओं में जन सेवा का महत्व इतना है और उसकी इतनी प्रशंसा की गई है कि उसके संबंध में काफ़ी आयतें एवं रिवायतें हैं। यहां तक कि हदीसों में दूसरों की सहायता करने और लोगों की समस्याओं को दूर करने में कुछ उपासना कार्यों जैसे कि हज और उमरे से अधिक पुण्य है। महान विद्वान कुलैनी काफ़ी में इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) की हदीस का उल्लेख करते हैं कि जो वास्तव में अद्भुत करने वाली है। आबान बिन तग़लब कहते हैं,


मैंने इमाम सादिक़ (अ) से सुना कि जो फ़रमाते हैं, जो कोई भी व्यक्ति अल्लाह के घर काबे का तवाफ़ करता है अल्लाह उसके लिए 6000 पुण्य लिखता है और उसके 6000 पापों को क्षमा कर देता है और 6000 दर्जे प्रदान करता है और 6000 इच्छाओं को पूरा करता है। उसके बाद फ़रमाया, किसी मोमिन की समस्या को दूर करने में इस तवाफ़ से दस गुना अधिक पुण्य है।

एक बार मक्के की ओर जाने वाले मुसलमानों के एक काफ़िले ने मक्के और मदीने के मध्य पड़ाव डाला ताकि काफ़िले में शामिल लोग कुछ दिन आराम कर सकें। इस पड़ाव के दौरान एक व्यक्ति इस क़ाफ़िले से जुड़ गया ताकि मक्का जा सके। काफ़िले वालों से बातचीत के दौरान उस व्यक्ति का ध्यान एक ऐसे व्यक्ति की ओर गया कि जिसका चेहरा मोहरा भले लोगों वाला था और वह बहुत ही ख़ुशी एवं प्रसन्नता से काफ़िले वालों की सेवा एवं उनकी ज़रूरतें पूरी करने में व्यस्त था। उस व्यक्ति ने पहली ही निगाह में उस व्यक्ति को पहचान लिया और बहुत ही आश्चर्य से क़ाफ़िले वालों से पूछा, इस व्यक्ति को कि जो तुम्हारी सेवा में व्यस्त है पहचानते हो? उन्होंने कहा, नहीं हम उसे नहीं पहचानते। यह व्यक्ति मदीने से हमारे क़ाफ़िले में शामिल हुआ है, और यह बहुत ही भला एवं अच्छा व्यक्ति है। हमने उससे अपने किसी काम के लिए नहीं कहा है, लेकिन वह स्वयं दूसरों के काम करना चाहता है और उनकी सेवा करना चाहता है। उस व्यक्ति ने कहा, पता है तुम उसे नहीं पहचानते हो, अगर पहचानते तो इस प्रकार साहस नहीं करते और कभी भी इस बात की अनुमति नहीं देते कि वह सेवकों की तरह तुम्हारे काम अंजाम दे। उन्होंने पूछा लेकिन यह व्यक्ति कौन है? उसने कहा, यह इमाम हुसैन (अ) के पुत्र इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ) हैं।

लोग घबरा कर उठे और क्षमा मांगने के लिए पैग़म्बरे इस्लाम (स) के पौत्र इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ) के पास गए। उन्होंने लज्जा से इमाम (अ) से कहा, काश आप अपना परिचय करा देते। ख़ुदा न करे कहीं हम आपका अपमान कर बैठते और बड़े पाप में ग्रस्त हो जाते। इमाम (अ) ने फ़रमाया, मैंने जान बूझकर तुम लोगों का चयन किया क्योंकि तुम मुझे नहीं पहचानते थे, इसलिए कि जो लोग मुझे पहचानते हैं अगर उनके साथ यात्रा करता हूं तो वे पैग़म्बरे इस्लाम (स) से संबंध होने के कारण मुझ पर अधिक महरबान रहते हैं और मुझ पर दया करते हैं और वे इस बात की अनुमति नहीं देते कि मैं उनकी सेवा करूं। इसीलिए मैं ऐसे सहयात्रियों का चयन करता हूं जो मुझे नहीं जानते ताकि मुझे उनकी सेवा का सुअवसर प्राप्त हो सके। 
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