हुसैन आज भी अकेले हैं!!!

इन्सान आज भी जब इतिहास में झांक कर देखता है तो उसे दूर तक रेगिस्तान में दौड़ते हुए घोड़ें की टापों से उठती हुई धूल के बीच खिंची हुई तलवा...

इन्सान आज भी जब इतिहास में झांक कर देखता है तो उसे दूर तक रेगिस्तान में दौड़ते हुए घोड़ें की टापों से उठती हुई धूल के बीच खिंची हुई तलवारों, टूटी हुए ढालों और टुकड़े टुकड़े लाशों के बीच में टूटी हुई तलवार से टेक लगाकर बैठा हुआ एक ऐसा व्यक्ति दिखाई देता, जिसकी पुकार और सहायता की आवाज़ चारों तरफ़ फैली हुई शत्रु की सेना के सीने को चीर कर पूरी दुनिया के दिल और जिगर में उतर रही है।

चौदर सौ वर्ष बीत गए, मारने वाले उसे मार रहे हैं, कोई ज़बान से घाव लगा रहा है, कोई तीर मार रहा है, कोई तलवार के वार कर रहा है, कोई पत्थर मार रहा है कोई....

लेकिन कोई नहीं, कोई नहीं... जो उसकी आवाज़ पर आवाज़ दे, जो उसकी पुकार को सुने, जो चौदह सदियों से इन्सानी इतिहास के पन्नों में
अकेला है, अकेला है

यू तो उसके घर की हर चीज़ 10 मोहर्रम को लूट ही गई थी लेकिन उसका सर कटने के बाद उस पर जो अत्याचार किए गए उन्हें किसी इतिहासकार ने नहीं लिखा है, किसी लेखक ने उस पर क़लम नहीं उठाया है और किसी शायर ने उसके शेर में नहीं पढ़ा है, यह ऐसा मज़लूम है जिसके माल और सम्पत्ती को शत्रुओं ने लूटा और जिसके, दर्द, दुख, सोंच, ज्ञान इज़्ज़त और सम्मान और क्रांति के पैग़ाम को अपनों ने लूट लिया।

किसी ने उसके ग़म को व्यापार बना लिया, तो किसी ने उसके मातम के प्रसिद्धी का माध्यम, तो किसी ने उसकी क्रांति के लेबिल को अपनी कामियाबी का ज़ीना बना लिया, तो किसी ने उसके दीन को अपना पेट पालने का सहारा।

यह वह मज़लूम है जिसकी सिसकियाँ आज भी हवाओं में सुनाई दे रही है और जिसके गोश्त के चीथड़ें बाज़ारों में बिक रहे हैं, मगर कोई नहीं है जो इस अत्याचार के विरुद्ध उठ खड़ा हो जो इस अत्याचार पर प्रदर्शन करे, कोई नहीं है जो इस बर्बर्ता के विरुद्ध अपनी ज़बान खोले , कोई नहीं है जो रियाकारी (केवल दिखाने के लिए किया जाने वाला कार्य), झूठी दीनदारी और धोखा देने वाली क्रांति के विरुद्ध अपना क़लम उठाए,

कोई नहीं है.... कोई नहीं है

हुसैन आज भी अकेले हैं...

प्रिय पाठकों अपनी आत्मा को पवित्र किए बिना समाज के सुधार के नारे लगाना हुसैनियत नहीं है, दीन के नाम पर पैसे बटोरना, कोठियाँ  खड़ी करना, गाड़ियाँ जायदाद बनाना भी हुसैनियत नहीं है

हुसैनियात तो यह है कि इन्सान सबसे पहले अपने आप को पवित्र करे, अपनी आत्मा को पवित्र करे और ख़ुदा की राह में सबसे पहले अपना घर क़ुर्बान कर दे फिर दूसरों को उसका निमंत्रण दे।

अब प्रश्न यह उठता है कि अगर हुसैनी होने के लिए यह सब चीज़ें शर्त है तो क्या किसी है हुसैनी बनना संभव है?

इस प्रश्न के उत्तर के लिए हम आपको इतिहास को देखने का निमंत्रण नहीं देंगे बल्कि आज के युग में अपने इर्द गिर्द नज़ दौड़ा लें यही काफ़ी होगा।

क्या आप ने बाक़िर अल सदर का नाम सुना है, उनकी शहादत और उनकी बहन की शहादत की घटनाओं को जानते हैं?

क्या आपने ग़ुलाम अस्करी का नाम सुना है, उनके द्वारा हिन्दुस्तान के घर घर में जनाए जाने वाले ज्ञान के दिए को देखा?

क्या आपने ईरानी क्रांति के लीडर सैय्यद अली ख़ामेनाई का नाम सुना है? उनके ज्ञान, तक़वे और राजनीतिक सक्रियता के बारे में कुछ जानते हैं?

क्या आपने हिन्दुस्तान के महान मुज्तहिद अल्लामा नक़्क़न का नाम सुना है? क्या आप उनके इल्मी कारनामों को जानते हैं?

क्या आपने हिज़्बुल्लाह के लीडर हसन नसरुल्लाह का नाम सुना है, क्या आप उनके बेटे हादी नसरुल्लाह की शहादत के बारे में कुछ जानते हैं?

हां यहीं लोग सच्चे हुसैनी हैं।

और हुसैनी ऐसे ही होते हैं, जब कोई इन्सान साफ़ नियत के साथ मैदान में आता है तो वह ट्रस्टों के पदों, अंजुमों के चंदों और पोस्टरों के चक्कर में नहीं पड़ता है

फिर वह दीन को ग़रीब बना कर, मुसलमानों को फ़क़ीर बनाकर प्रस्तुत नहीं करता है, फिर वह हुसैन की भाति अच्छाइयों को फैलाने और बुराईयों को रोकने के लिए एकेला ही मैदान में उतर जाता है और हज़रत इमाम ख़ुमैनी की तरह यह कहता हुआ दिखाई देता हैः

अगर यह जंग बीस साल भी चलती रहे तो हम नहीं थकेंगे।

इस बार मोहर्रम का महीन उस समय आया है जब पूरी दुनिया विशेषकर अरब दुनिया में इस्लामी क्रांति की लहर दौड़ रही है हमें आज अपनी अज़ादारी को इस प्रकार अंजाम देना चाहिए कि इस बेदारी को दिखाती हो

हमें पता होना चाहिए कि आज जिस इस्लामी क्रांति को हम देख रहे हैं यह वास्तव में ईरान की इस्लामी क्रांति का ही नतीजा है

हमें आशा है कि जिस प्रकार ईरान से साम्राज्य का जनाज़ा निकल गया उसी प्रकार दूसरे इस्लामी देश चाहे वह मिस्र हो या मराकिश या कोई और देस उससे भी इन्शाअल्लाह साम्राज्य के बदबूदार जनाज़े को निकाल फेकेंगे।

आज के युग में इमाम हुसैन (अ) की आवाज़ पर लब्बैक करने के लिए ज़रूरी है कि हम आत्मा की पवित्रता के साथ और सच्चे दिल से इमाम ख़ुमैनी और इस्लामी बरादरी की हर संभव सहायता करें और इस इस्लामी क्रांति के प्रभावी और लाभदायक बनाएं।
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