नवरोज़ मनायेंगे और बनायेंगे पूरे साल को खुशहाल |

नवरोज़' यानी नया दिन नामक यह त्यौहार उस दिन पड़ता है, जब वसन्तकाल में दिन और रात बराबर होते हैं। रोज़, प्रकृति के उदय, प्रफुल्लता, ...


नवरोज़' यानी नया दिन नामक यह त्यौहार उस दिन पड़ता है, जब वसन्तकाल में दिन और रात बराबर होते हैं। रोज़, प्रकृति के उदय, प्रफुल्लता, ताज़गी, हरियाली और उत्साह का मनोरम दृश्य पेश करता है। नवरोज़ केवल पारसी नव वर्ष की शुरुआत का प्रतीक नहीं है बल्कि प्राचीन परंपराओं व संस्कारों के साथ नौरोज़ का उत्सव न केवल ईरान ही में ही नहीं बल्कि बहुत से  अन्य देशों में भी मनाया जाता है। नौरोज़ का उत्सव, मनुष्य के पुनर्जीवन और उसके हृदय में परिवर्तन के साथ प्रकृति की स्वच्छ आत्मा में चेतना व निखार पर बल देता है। हर क़ौम और समुदाय के कुछ विशेष त्योहार, उत्सव और प्रसन्नता व्यक्त करने के दिन होते हैं। उस दिन उस क़ौम के लोग अपने रीति-रिवाजों के अनुसार अपनी हार्दिक प्रसन्नता व्यक्त करते हैं। इस्लाम के आगमन से पहले अरबों के यहां ईद का दिन ‘यौमुस सबाअ’ कहलाता था। मिस्र में कुब्ली ‘नवरोज़’ को ईद मनाते थे। उस समय  दो धार्मिक त्योहार नवरोज़ और मीरगान थे, जो बाद में मौसमी त्यौहार बन गए। नवरोज़ बसंत के मौसम में मनाया जाता था, जबकि मीरगान सूर्य देवता का त्यौहार था और पतझड़ में मनाया जाता था। पारसियों के इस त्यौहार का प्रभाव कुछ मुगल शहंशाहों पर भी रहा, जो बड़े जोशो-ख़रोश से नवरोज़ का आयोजन करते थे।

मुसलमानों में भी इस नवरोज़ की बड़ी अहमियत है और इसे भी ईद का दिन माना जाता है|  अल्लामा मजलिसी  अपनी किताब जाद अल माद में लिखते हैं की मुल्ला इब्ने जानिस कहते हैं की एक बार नवरोज़ के दिन उनका साथ इमाम जाफ़र इ सादिक (अ.स) का था तो इमाम (अ.स) ने पुछा क्या तुम जानते तो इस दिन की अहमियत क्या है ? इमाम ने कहा सुनो यह वो दिन हैं जैम अल्लाह ने दुनिया में सारे इंसानों को भेजने से पहले उनकी रूहों को पहचनवाया की देखो अल्लाह एक है और उसमे किसी को शरीक करना शिर्क है | यह वो दिन भी है जब हजरत नूह के वक़्त में आया तूफ़ान रुक गया था और उनकी नाव जूद्दी नामक पहाड़ पे रुक गयी थी |यह वो भी दिन हैं जब हजरत अली (अ.स) की विलायत का एलान हुआ था जिसे ईद इ गदीर भी कहा जाता है | इस दिन मुसलमान दुआएं मांगते हैं अल्लाह के एक होने का एलान करते हैं और क़सम खाते हैं की हम उस खुदा के बन्दे हैं जिसका कोई शरीक नहीं हैं जो वाहिद है |

२० मार्च से 21 मार्च के बीच एक वक़्त आता है जिसे तहवील वक़्त कहा जाता है जिस समय दिन और रात एक बराबर हो जाते हैं |इस वर्ष २०१४ में यह वक़्त lucknow में २० मार्च की शाम 9 बजके 15 मिनट है | इस वक़्त पढने के लिए कुछ नमाजें और अमाल इस प्रकार हैं  | “ तहवील वक़्त” मुसलमानों के खलीफा हजरत अली (अ.स) की नजर दिलाई जाती है जो इस आल ज़र्द रंग की मिठाई पे दिलाई जाएगी |  वैसे तो इसका नजर और नियाज़ से कोई रिश्ता नहीं है लेकिन यह आम है की   हर साल का एक रंग होता है और एक जानवर होता है जो तहवील के वक़्त ज़ाहिर हुआ करता है | इस साल का रंग ज़र्द है और जानवर घोडा | यह भी माना जाता है की यदि एक पानी की थाली में गुलाब का फूल रख दें तो वक़्त ऐ तहवील यह फूल यदि थार हो तो चलने लगता है |


 प्रेम से कांटे फूल बन जाते हैं।  सगे संबंधियों से मिलना दिल में प्रेम के बीज बोता है और हर बार उनसे मिलना इस बीज की सिंचाई के समान है, यहां तक कि यह प्रेम व मित्रता का वृक्ष मज़बूत और तनावर होता है। दूसरी ओर सगे संबंधियों से भेंट, द्वेष व इर्ष्या को दूर कर देते हैं और पारिवारिक संबंधों के सुदृढ़ होने का कारण बनते हैं। मैं खुशी के इस मौके पर दुआ करता हूं कि हम सब के  जीवन में शांति, प्रगति और खुशी आए।”
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