कुरान तर्जुमा और तफसीर सूरए निसा ४:89-128

 सूरए निसा की आयत संख्या 89 की तिलावत सुनते हैं। (हे ईमान वालो!) यह मिथ्याचारी चाहते हैं कि तुम भी उन्हीं की भांति काफ़िर हो जाओ और सब ...


 सूरए निसा की आयत संख्या 89 की तिलावत सुनते हैं।
(हे ईमान वालो!) यह मिथ्याचारी चाहते हैं कि तुम भी उन्हीं की भांति काफ़िर हो जाओ और सब एक समान हो जाएं, तो देखों उनमें से किसी को मित्र न बनाना जब तक कि वे (तौबा करके) ईश्वर के मार्ग में हिजरत न करें। तो यदि उन्होंने इन्कार किया (और काफ़िरों से सहयोग करते रहे) तो वे जहां भी मिलें पकड़ कर उनकी हत्या कर दो और कभी भी उनमें से मित्र व सहायक न बनाना। (4:89)


 पिछले कार्यक्रमों में हमने यह बताया था कि कुछ भोले मुसलमानों ने मिथ्याचारियों को क्षमा करने की सिफ़ारिश करते हुए उनका समर्थन किया था। ये आयत कहती है कि मिथ्याचारी इतनी बुरी प्रवृत्ति के हैं कि ने केवल वे स्वंय काफ़िर हैं बल्कि तुम्हें भी अपनी ही भांति काफ़िर बनाना चाहते हैं। इनमें तुमसे मित्रता की योग्यता नहीं है और तुम्हें, इन लोगों को अपना मित्र नहीं बनाना चाहिए जब तक कि यह अपनी इस पद्धति को छोड़ न दें और कुफ़्र व मिथ्या के केन्द्र से, इस्लाम के केन्द्र की ओर पलायन न कर लें।
 और यदि इन्होंने ऐसा न किया तो जान लो कि इन्होंने कुफ़्र को नहीं छोड़ा है और चूंकि यह लोग इस्लाम के नाम से ग़लत लाभ उठा रहे हैं अतः यह तुम्हें जहां भी मिलें इन्हें बंदी बना लो और यदि आवश्यक हो तो इनकी हत्या कर दो।
 रोचक बात यह है कि क़ुरआन की दृष्टि में इस्लामी शासन में जीवन व्यतीत करने वाले यहूदी और ईसाई पूर्ण रूप से सम्मान और समर्थन के पात्र हैं और किसी को भी उनसे भिड़ने का अधिकार नहीं है, परन्तु इस्लाम के भेस में छिपे हुए मिथ्याचारी जो क्षति पहुंचाने के चक्कर में रहते हैं, सबसे बड़े दण्ड के पात्र हैं।
 इस आयत से हमने सीखा कि मिथ्याचारियों के ख़तरों की ओर से निश्चेत रहना चाहिए और उनसे मित्रता नहीं करनी चाहिए क्योंकि वे काफ़िर शत्रु से भी अधिक बुरे हैं।
 वास्तविक ईमान की निशानी, ईश्वर के मार्ग में हिजरत या पलायन है। जो धर्म के मार्ग में हिजरत के लिए तैयार नहीं है वह वास्वतिक मोमिन नहीं है।
 हर पाप की तौबा, उसी पाप की क्षतिपूर्ति करके होती है, हिजरत न करने की तौबा हिजरत न करना है।

 सूरए निसा की आयत संख्या 90 की तिलावत सुनते हैं।
सिवाए उन मिथ्याचारियों के जो किसी ऐसी जाति से मिल गए हैं, जिसके और तुम्हारे बीच कोई संधि है, या वे लोग जो तुम्हारे पास ऐसी दशा में आते हैं कि उनके सीने अर्थात हृदय तुमसे या अपनी जाति से युद्ध करने से तंग आ गए हों (और वे किसी से भी युद्ध करना न चाहते हों) और यदि ईश्वर चाहता तो उन्हें तुम्हारे ऊपर ला खड़ा करता और वे तुमसे युद्ध करते, तो यदि वे तुमसे अलग रहें और तुमसे युद्ध न करें और शांति का प्रस्ताव दें तो ईश्वर ने तुम्हारे लिए उनके ऊपर कोई मार्ग नहीं रखा है। (4:90)


 इस आयत ने मिथ्याचारियों के साथ कड़े बर्ताव में उनके दो गुटों को अपवाद बताया है। एक वह गुट जो मुसलमानों के साथ संधि करने वाली जातियों से संपर्क रखता है और उनसे संधि कर चुका है। और दूसरा वह गुट जो मूल रूप से युद्ध और लड़ाई से अलग हो गया है यहां तक कि शांति का प्रस्ताव भी देता है।
 स्पष्ट है कि पहला गुट संधि और समझौते के कारण अपवाद है जबकि दूसरे गुट ने चूंकि निष्पक्षता की घोषणा कर दी है, अतः उसे छेड़ना या दण्डित करना न्याय तथा साहस के विरुद्ध है।
 इस आयत से हमने सीखा कि अपने राजनैतिक या सैनिक समझौतों का सम्मान करना चाहिए, चाहे वह काफ़िर के साथ ही क्यों न हों, सिवाए इसके कि दूसरा पक्ष समझौतों का उल्लंघन कर दे।
 इस्लाम में जेहाद और संघर्ष प्रतिशोध या वरचस्व के लिए नहीं है। यदि शत्रु संधि या शांति समझौते को स्वीकार करके, युद्ध समाप्त कर दे तो किसी को भी उसपर चढ़ाई का अधिकार नहीं है।


सूरए निसा की आयत संख्या 91 
शीघ्र ही तुम मिथ्याचारियों के एक अन्य गुट को पाओगे जो (इस्लाम प्रकट करके) तुमसे भी सुरक्षित रहना चाहता है और (कुफ़्र व्यक्त करके) अपनी जाति से भी सुरक्षित रहना चाहता है। जब भी यह लोग बिगाड़ की ओर पलटते हैं तो उसमें औंधे मुंह गिर पड़ते हैं तो यदि यह तुमसे अलग न हों जाएं और तुम्हें शांति प्रस्ताव न दें तथा हाथ न रोकें तो इन्हें गिरफ़्तार कर लो और जहां पाओ इनकी हत्या कर दो और यही वह लोग हैं जिनपर हमने तुम्हें स्पष्ट प्रभुत्व दिया है। (4:91)
 मक्के के लोगों का एक गुट जब भी पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पास आता था तो वह मिथ्यापूर्ण ढंग से स्वयं को मुसलमान प्रकट करता था, परन्तु जब मक्के से पलटकर जाता तो मूर्तिपूजा करता और काफ़िरों के साथ होने की घोषणा करता था ताकि उसे उनकी ओर से यातनाएं न मिलें। इस प्रकार वो दोनों गुटों के हितों से लाभान्वित होता था और दोनों पक्षों के ख़तरों से सुरक्षित था।
 अलबत्ता हृदय से वह काफ़िरों के ही साथ था और मुसलमानों के विरुद्ध उनके षड्यंत्रों में शामिल रहता था। यह आयत आई और इसने इस गुट के प्रति कड़े व्यवहार का आदेश दिया क्योंकि इस प्रकार के लोग शत्रु के घुसपैठियों की भांति मुसलमानों के मोर्चे में हैं और इनका ख़तरा उन काफ़िरों से कहीं अधिक है जिन्होंने खुल्लम-खुल्ला युद्ध की घोषणा कर दी है।
 यह गुट उस गुट के विपरीत, जिनसे संधि का आदेश पिछली आयत में दिया गया है, अत्यंत धूर्त, षड्यंत्रकारी और धोखेबाज़ है जो न केवल यह कि निष्पक्षता की घोषणा नहीं करता बल्कि युद्ध की आग भी भड़काना है। इसी कारण इस गुट का दण्ड, उस गुट के दण्ड से अलग है, और इस गुट के लोग जहां मिलें उन्हें बंदी बना लेना चाहिए और प्रतिरोध की स्थिति में उनकी हत्या कर देनी चाहिए।
 इस आयत से हमने सीखा कि मुसलमानों को अपने विभिन्न प्रकार के शत्रुओं को पहचान कर हरएक के साथ उचित बर्ताव करना चाहिए।
 जो लोग इस्लामी सरकार का तख़्ता उलटना चाहते हैं या उसके विरुद्ध षड्यंत्र करते हैं, उनके साथ अत्यंत कड़ा और दमनकारी व्यवहार करना चाहिए।
 मिथ्याचारी की निशानी यह है कि वह अपने ईमान व आस्था की रक्षा के बजाए केवल जीवन के ऐश्वर्य और आराम के चक्कर में रहता है।

सूरए निसा की आयत संख्या 92 
और किसी भी ईमान वाले को यह अधिकार नहीं है कि वह दूसरे किसी ईमान वाले की हत्या कर दे, सिवाए इसके कि ग़लती से हो, और जिस किसी ने किसी ईमान वाले की ग़लती से हत्या कर दी हो तो उसे चाहिए कि वह एक ईमान वाला दास स्वतंत्र करे और मृतक के वारिसों को हर्जाना दे, सिवाए इसके कि मृतक के वारिस हरजाने को माफ़ कर दें। फिर यदि मृतक ऐसी जाति से है जो तुम्हारी शत्रु है परन्तु वह स्वयं ईमान वाला है तो केवल एक ईमान वाला दास स्वतंत्र करना चाहिए और यदि मृतक किसी ऐसी जाति का है जिससे तुम्हारी संधि है तो उसके वारिसों को हर्जाना देना होगा और एक ईमान वाला दास भी स्वतंत्र करना होगा। फिर यदि (स्वतंत्र करने के लिए दास या उसे ख़रीदने के लिए पैसा) न मिले तो निरंतर दो महीने तक रोज़ा रखना होगा। यही ईश्वर की ओर से तौबा का मार्ग है। और ईश्वर जानने वाला भी है और तत्वदर्शी भी। (4:92)

 इस्लामी इतिहास में वर्णित है कि मक्के में वर्षो तक कुछ अनेकेश्वरवादियों की ओर से यातनाएं सहन करने वाले एक मुस्लिम व्यक्ति को मदीने पलायन के पश्चात, मदीना नगर में उनमें से एक व्यक्ति दिखाई दिया। इस बात से अनभिज्ञ कि वह भी मुसलमान हो चुका है, इस व्यक्ति ने उसकी यातनाएं देने वाले के रूप में हत्या कर दी। इस बात की सूचना जब हज़रत मुहम्मद सल्ललाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को मिली तो ईश्वर की ओर से उनके पास वहि भेजी गई।
 जैसाकि हमने पिछले कार्यक्रम में कहा था कि इस प्रकार के काफ़िर व अत्याचारी लोगों के संबंध में आदेश यह है कि उन्हें बंदी बना लिया जाए और यदि आवश्यक हो तो उनकी हत्या कर दी जाए परन्तु स्पष्ट है कि यह कार्य छानबीन के पश्चात और इस्लामी समाज के शासन की देख-रेख में होना चाहिए न यह कि हर कोई अपनी मर्ज़ी और विचार से किसी की भी हत्या कर दे। अतः उस मुस्लिम व्यक्ति का काम भी ग़लत था और उसे उसका दण्ड भुगतना होगा अर्थात हत्या का हर्जाना देना होगा। अलबत्ता कुछ विशेष आदेशों और परिस्थितियों के साथ जिनका वर्णन इस आयत में किया गया है। एक महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि मनुष्य के परिजन और वारिस, इस्लाम के शत्रु हों तो उनको हर्जाना नहीं दिया जाएगा ताकि शत्रु का आर्थिक आधार सुदृढ़ न होने पाए। हां यदि शत्रु ने मुसलमानों के साथ शांति की संधि कर रखी है तो एसी स्थिति में मृतक के वारिसों को हर्जाना दिया जाएगा।
 मृतक के वारिसों को हर्जाना दिये जाने के कई परिणाम हैं। उदाहरण स्वरूप हत्या के कारण उत्पन्न होने वाली आर्थिक कठिनाइयों की कुछ क्षतिपूर्ति हो जाती है। इसके अतिरिक्त लोगों की लापरवाही को रोकने का एक मार्ग है कि हर कोई यह न कर सके कि मैंने ग़लती से हत्या कर दी। इसी प्रकार से लोगों की जान और सामाजिक सुरक्षा के प्रति सम्मान को भी दर्शाता है।
 इस आयत से हमने सीखा कि लोगों का ख़ून बहाना, ईश्वर पर ईमान से मेल नहीं खाता और यदि कोई ग़लती से भी यह काम कर बैठे तो उसे भारी बदला चुकाना होगा।
 इस्लाम ने न केवल यह कि दास प्रथा का प्रचार नहीं किया बल्कि उसने दासों की स्वतंत्रता के लिए अनके मार्ग भी खोल रखे हैं। जैसाकि एक मनुष्य का जीवन छीनने के कारण हत्यारे को एक अन्य मनुष्य को दासता से स्वतंत्र करवाकर उसे नया जीवन देना चाहिए।
 इस्लाम में केवल उपासना के ही आदेश नहीं हैं बल्कि उसमे समय के सही संचालन और न्याय व सुरक्षा की स्थापना के लिए दण्ड और हर्जाने के क़ानून भी हैं, जिनका एक उदाहरण इस आयत में वर्णित आदेश है।
 सूरए निसा की आयत संख्या 93 
और जिस किसी ने जान-बूझ कर किसी ईमान वाले की हत्या की, उसका बदला नरक हैं जिसमें वह सदैव रहेगा। ईश्वर उस पर कोप और लानत करता है तथा उसने ऐसे व्यक्ति के लिए अत्यंत कड़ा दण्ड तैयार कर रखा है। (4:93)

इस्लामी इतिहास में वर्णित है कि ओहद के युद्ध में एक मुसलमान ने निजी शत्रुता के चलते दूसरे मुसलमान व्यक्ति की हत्या कर दी थी। ईश्वर के विशेष संदेश वहि द्वारा पैग़म्बरे इस्लाम सल्ललाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को इस बात का पता चल गया और ओहद से वापसी के मार्ग में उन्होंने हत्यारे को मृत्युदण्ड देने का आदेश दिया और उसकी क्षमायाचना पर कोई ध्यान नहीं दिया।
 पिछली आयत में ग़लती से की गई हत्या के आदेश के वर्णन के पश्चात यह आयत जान-बूझ कर की गई हत्या के बदले का उल्लेख करती है कि हत्यारा ईश्वरीय कोप का पात्र बनकर सदा के लिए नरक की आग में चला जाता है। अलबत्ता, इस अपराध का सांसारिक दण्ड क़ेसास अर्थात मृत्युदण्ड है जो दूसरी आयतों में वर्णित है और उनका उल्लेख हम पहले कर आए हैं।
 इस आयत से हमने यह सीखा कि अपराधियों को दण्डित करने में ग़लती से अपराध करने वालों और जान बूझकर अपराध करने वालों में अंतर है।
 समाज में बुराई तथा अशान्ति को रोकने का एक मार्ग, अपराधों पर कड़े दण्ड देने के क़ानून बनाना है।
सूरए निसा की आयत संख्या 94 
हे ईमान वालो! जब तुम ईश्वर के मार्ग में (जेहाद के लिए) क़दम उठाओ तो (शत्रु के बारे में पूर्णतः) जांच-पड़ताल कर लो और जो तुम्हारे समक्ष इस्लाम प्रकट करे उससे मत कहो कि तू ईमान वाला नहीं है कि इस प्रकार तुम सांसारिक जीवन की थोड़ी सी पूंजी प्राप्त करना चाहते हो जबकि ईश्वर के पास अत्यधिक लाभ है। (आख़िर) तुम भी तो पहले ऐसे ही काफ़िर थे तो ईश्वर ने तुम पर उपकार किया (कि तुम्हारे इस्लाम को स्वीकार कर लिया) तो तुम (कार्यवाही से पहले) जांच करो कि तुम जो कुछ करते हो, ईश्वर उससे अवगत है। (4:94)
 इस्लामी इतिहास की पुस्तकों में वर्णित है कि मुसलमानों तथा मदीने के समीपवर्ती यहूदियों के बीच होने वाले ख़ैबर नामक युद्ध के पश्चात पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने कुछ मुसलमानों को क्षेत्र के एक देहात में भेजा ताकि वे वहां के लोगों को इस्लाम या इस्लामी सरकार को स्वीकार करने का निमंत्रण दें। इस्लामी सेना के आगमन का समाचार पाकर एक यहूदी अपनी संपत्ति और परिवार को एक पहाड़ के समीप छोड़कर मुसलमानों के स्वागत के लिए आया। एक मुसलमान ने यह सोचकर कि वह भय के कारण इस्लाम स्वीकार कर रहा है उसकी हत्या कर दी और उसकी संपत्ति पर क़ब्ज़ा कर लिया। उसी समय यह आयत उतरी और इसने उस मुसलमान के ग़लत कार्य की निंदा की और आदेश दिया कि इस्लाम में हथियार उठाने का लक्ष्य सांसारिक धन या माल की प्राप्ति नहीं है बल्कि वास्तविक लक्ष्य इस्लाम का निमंत्रण देना या मुसलमानों और काफ़िरों के बीच शांति एवं सुरक्षा स्थापित करना है।
 इस आयत से हमने सीखा कि युद्ध और जेहाद, शत्रु के उद्देश्यों और स्थिति की पूरी जानकारी और सूचना के आधार पर होना चाहिए न कि भावनाओं, संसारमोह या धन प्राप्ति के लिए।
 जो लोग इस्लाम व्यक्त करते हैं उनका खुले दिल से स्वागत करना चाहिए, सिवाए इसके कि उनका झूठ या धोखा सिद्ध हो जाए।
 सत्ता में आने के पश्चात अपनी शक्ति का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए और अकारण ही विरोधी लोगों की संपत्ति ज़ब्त करने या उनकी हत्या का आदेश नहीं देना चाहिए।
 संसार मोह का ख़तरा उन लोगों के लिए भी मौजूद है जो अपनी जान पर खेलकर युद्ध के अग्रिम मोर्चे पर जाते हैं अतः अपनी भावनाओं और प्रेरणाओं का ध्यान रखना चाहिए।
 दूसरों के बारे में बुरे विचार नहीं रखने चाहिए। उनकी बातों को आंख मूंदकर मान भी नहीं लेना चाहिए। हर स्थिति में संतुलन और उदारवाद का पालन करना चाहिए, चाहे सामने वाला हमारा शत्रु ही क्यों न हो।

 सूरए निसा की आयत संख्या 95 और 96 
शारीरिक रूप से अपंग लोगों के अतिरिक्त जो ईमान वाले जेहाद के लिए नहीं जाते और घर में बैठे रहते हैं वे कदापि उन लोगों के समान नहीं हो सकते जो ईश्वर के मार्ग में अपनी जान औन अपने माल से जेहाद करते हैं। निःसन्देह, ईश्वर ने अपने माल तथा अपनी जान से जेहाद करने वालों को बैठे रहने वालों पर श्रेष्ठता के दर्जे दिये हैं यद्यपि ईश्वर ने हर एक (मोमिन) से भले बदले का वादा किया है और ईश्वर ने जेहाद करने वालों को बैठ रहने वालों के मुक़ाबले में महान बदला दिया है।(4:95)

ईश्वर की ओर से मिलने वाले दरजों तथा उसकी ओर से क्षमा व दया के साथ बड़ा बदला है और निःसन्देह, ईश्वर अतयंत क्षमाशील और दयावान है। (4:96)
 पिछली आयतों में ईश्वर, ईमान वालों को शत्रुओं के संबंध में हर प्रकार की जल्दबाज़ी से रोकने के पश्चात इस आयत में उन्हें शत्रु के साथ जेहाद के मैदान में व्यापक और सक्रिय उपस्थिति का आहृवान करता है तथा डरपोक या आराम पसंद मोमिनों को प्रोत्साहित करने के लिए आरंभ में कहता है कि मोर्चों पर लड़ने वाले मुजाहिदों तथा घर में बैठ कर केवल नमाज़ व प्रार्थना करने वालों का स्थान एक नहीं है। फिर वह कहता है कि जेहाद करने वालों के लिए श्रेष्ठ दर्जे हैं तथा आयत के अंत में ईश्वर कहता है कि न केवल श्रेष्ठ दर्जे बल्कि अत्यंत महान बदला और पारितोषिका भी उनकी प्रतीक्षा में है जो ईश्वर की विशेष दया व कृपा के साथ होगा।
 अलबत्ता यहां पर यह बात भी उल्लेखनीय है कि ईश्वर किसी भी मनुष्य पर इसके सामर्थ्य व क्षमता से अधिक बोझ नहीं डालता अतः जिन लोगों के साथ कोई शारीरिक समस्या है उन्हें रणक्षेत्र न जाने की छूट है और यदि वे अपने धन या ज़बान से मुजाहिदों का दें तो वे भी उनके बदले व पारितोषिक में शामिल होंगे।
 यद्यपि इस आयत में तीन बार, घर बैठे रहने वालों पर जेहाद करने वालों की श्रेष्ठता की घोषणा की गई है परन्तु इसका अर्थ अन्य लोगों की सेवाओं की उपेक्षा नहीं है, इसी कारण आयत बल देकर कहती है कि ईश्वर ने सभी ईमान वालों से भले बदले का वादा किया है। जेहाद करने वालों की श्रेष्ठता अपने स्थान पर, किंतु अन्य लोगों की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए।
 इन आयतों से हमने सीखा कि इस्लामी समाज में न्याय का अर्थ सभी ईमान वालों को समान समझना नहीं है बल्कि जेहाद में उपस्थिति जैसी मान्यताएं श्रेष्ठता का मानदण्ड हैं तथा अधिकारियों और जनता को इनका पालन करना चाहिए। अलबत्ता मुजाहिदों को भी अनुचित आशाएं नहीं रखनी चाहिए।
 ईश्वरीय दया व कृपा से लाभान्वित होने की शर्त पवित्र होना और पवित्र रहना है। ईश्वर ने पहले क्षमा की बात कही है फिर दया व कृपा की बात।
 यद्यपि ईश्वर क्षमाशील और दयावान है परन्तु उसकी क्षमा और दया से लाभान्वित होना स्वयं मनुष्य के हाथों में और उसके कर्मों पर निर्भर है।

 सूरए निसा की आयत संख्या 97 

जिन लोगों ने अपने आप पर अत्याचार किया जब फ़रिश्ते उनकी जान लेते हैं तो उनसे पूछते हैं, तुम किस स्थिति में थे? वे कहते हैं, हमें अपनी धरती में कमज़ोर बना दिया गया था। फ़रिश्ते उनसे कहेंगे, क्या ईश्वर की धरती फैली हुई और व्यापक नहीं थी कि तुम उसमें पलायन कर जाते? निःसन्देह, ऐसे लोगों का ठिकाना नरक है और वह कितना बुरा ठिकाना है! (4:97)

 इस्लामी इतिहास की पुस्तकों में वर्णित है कि मक्के में रहने वाले कुछ मुसलमान अपनी जान के भय से कभी-कभी काफ़िरों का साथ देते थे यहां तक कि कुछ युद्धों में काफ़िरों की ओर से मुसलमानों के विरुद्ध लड़ते थे और मारे जाते थे। ईश्वर ने यह आयत भेजकर उन्हें ग़लती पर और पापी बताया। आयत में शत्रु के सहयोग के लिए राष्ट्रीयता की भावना के औचित्य को भी अस्वीकार्य बताते हुए धर्म की रक्षा को मूल आधार कहा गया है चाहे उसके लिए एक स्थान से दूसरे स्थान तक पलायन ही करना पड़े।
 यहां पर रोचक बात यह है कि इस आयत के अनुसार मृत्यु के समय मनुष्य, ईश्वर के फ़रिश्तों को देखता है और वे मनुष्य से बातें करते हैं तथा बुरे कर्मों पर उसकी आलोचना करते हैं।
 इस आयत से हमने सीखा कि न केवल ईश्वर बल्कि फ़रिश्ते भी मनुष्य के कर्मों से अवगत हैं।
 कुफ़्र व पाप के वातावरण में पलायन, अनिवार्य व आवश्यक है जैसाकि कुफ़्र की सेना का भाग बनाना वर्जित है।
 जीवन का मूल सिद्धांत ईश्वर प्रेम है न कि देशप्रेम। ग़लत वातावरण को या तो परिवर्तित कर देना चाहिए या फिर वहां से पलायन कर जाना चाहिए।
सूरए निसा की आयत संख्या 98 और 99 
सिवाए उन कमज़ोर महिलाओं, पुरुषों और बच्चों के, जिनके अधिकार में कोई युक्ति न थी और न वे अपनी मुक्ति का कोई मार्ग निकाल सकते थे। (4:98) तो यही लोग हैं जिन्हें ईश्वर क्षमा कर देगा कि वह अत्यंत क्षमाशील और दयावान वाला है। (4:99)
 पिछली आयत में धर्म की रक्षा के लिए हिजरत या पलायन को आवश्यक बताने के पश्चात इस आयत में ईश्वर, उन ईमान वालों को अपवाद बताता है जिनमें पलायन की क्षमता न हो और जिन्हें अपनी मुक्ति का कोई मार्ग नहीं मिल रहा हो। ईश्वर एसे लोगों पर एसा कोई दायित्व नहीं डालता जिसमें वे सक्षम न हों।
 मूल रूप से इस्लाम में धार्मिक आदेशों के पालन की शर्त सामर्थ्य है और क्षमता। और जिन लोगों में शारीरिक या मानसिक क्षमता नहीं होती उनपर ईश्वरीय दायित्व लागू नहीं होते, जैसाकि इस आयत में ऐसे पुरुषों और महिलाओं को बच्चों की श्रेणी में रखा गया है और उन्हें कमज़ोर बताया गया है।
 इन आयतों से हमने सीखा कि हिजरत या पलायन केवल पुरूषों के लिए नहीं है बल्कि परिवार के सभी सदस्यों के लिए है, चाहे वे महिलाएं हों या बच्चे आवश्यक है। सिवाए इसके कि उनमें क्षमता ही न हो।
 ईश्वर के दरबार में वास्तविक औचित्य स्वीकार है न कि झूठे बहाने। {jcomments on}
सूरए निसा की आयत संख्या 104 
(हे ईमान वालो! रणक्षेत्र में) शत्रु का पीछा करने में ढिलाई न करो कि यदि तुम्हें तकलीफ़ और पीड़ा होती है तो उन्हें भी उसी प्रकार से पीड़ा और तकलीफ़ होती है, और तुम ईश्वर से वह आशाएं रखते हो जो उन्हें प्राप्त नहीं हैं, और ईश्वर अत्यधिक जानकार भी है और तत्वदर्शी भी। (4:104)
 इतिहास में वर्णित है कि ओहद के युद्ध में मुसलमानों की पराजय के पश्चात मक्के के अनेकेश्वरवादियों ने मदीना नगर पर आक्रमण करके बचे हुए मुसलमानों की हत्या करने और इस्लाम को समाप्त करने का निर्णय किया। परन्तु इस आयत के आने के पश्चात पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने सभी मुसलमानों को युद्ध के लिए तैयार होने का आदेश दिया, यहां तक कि युद्ध में घायल हुए लोग भी प्रतिरक्षा के लिए तैयार हो गए। यह तैयारी देखकर मदीने के अनेकेश्वरवादी, मदीने पर आक्रमण करने के अपने निर्णय से पीछे हट गए।
 यह आयत जिस महत्वपूर्ण बात की ओर संकेत करती है वह यह है कि युद्ध में दोनों पक्षों के लोग घायल होते हैं, बंदी बनाए जाते हैं या मारे जाते हैं, परन्तु लक्ष्य और परिणाम बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। इस्लामी सेना को ईश्वरीय सहायता की आशा रहती है परन्तु कुफ़्र की सेना को ऐसी कोई आशा नहीं रहती। घायल होने या मरने वाले मुसलमान सैनिकों को स्वर्ग जैसा महान पारितोषिक मिलता है परन्तु प्रलय पर विश्वास न रखने वाले काफ़िर सैनिकों का काई ठिकाना नहीं होता है।
 इस आयत से हमने सीखा कि शत्रु के मुक़ाबले में एकाध पराजय को उससे मुक़ाबला करने में ठिलाई कारण नहीं बनना चाहिए। मुसलमानों की भावनाएं सदैव ही ईश्वर पर भरोसे और उसकी दया की आशा के कारण प्रबल रहनी चाहिए।
 ईश्वरीय कृपा की आशा, मुस्लिम योद्धा की सबसे बड़ी पूंजी है। इसी कारण शहादत और विजय दोनों ही उसके लिए कल्याण का साधन हैं।
 धार्मिक कर्तव्यों के पालन में हम जो कठिनाइयां उठाते हैं, उन्हें भुलाया नहीं जा सकता।
 सूरए निसा की आयत संख्या 105 तथा 106
(हे पैग़म्बर!) निःसन्देह, हमने यह किताब सत्य के साथ आप पर उतारी है ताकि आप लोगों के बीच उस आधार पर फ़ैसला करें, जो कुछ ईश्वर ने आपको दिखाया और सिखाया है, तथा कभी भी विश्वासघात करने वालों की ओर से शत्रुता न करें। (4:105) और ईश्वर से क्षमा चाहते रहें कि निःसन्देह, ईश्वर क्षमाशील और दयावान है। (4:106)
 इस्लामी इतिहास की पुस्तकों में वर्णित है कि एक मुसलमान ने किसी की कवच चोरी कर ली, जब उसे पकड़े जाने का भय हुआ तो उसने कवच को एक यहूदी के घर में फेंक दिया और अपने मित्रों से कहा कि तुम गवाही दो कि यहूदी चोर है। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने उन लोगों की गवाही के आधार पर मुसलमान व्यक्ति को बरी और यहूदी व्यक्ति को आरोपित किया। उसी समय ईश्वर ने यह आयत भेज कर पैग़म्बर को वास्वतिकता से अवगत करवाया।
 न्याय करने में पंच और न्यायाधीश का कर्तव्य है कि वह दोनो पक्षों से ठोस तर्क तथा प्रमाण प्राप्त करे तथा एसा मार्ग अपनाए कि अपराधी, क़ानून से ग़लत लाभ न उठा सके। इस घटना में यह मार्ग पैग़म्बर पर ईश्वरीय संदेश अर्थात वहयि का उतरना तथा ईश्वरीय सहायता का आना था ताकि पैग़म्बरे इस्लाम की पैग़म्बरी तथा ईश्वर से उनके संपर्क का एक प्रमाण भी हो तथा किसी निर्दोष को दण्ड भी न दिया जाए चाहे वह एक यहूदी ही क्यों न हो।
 इन आयतों से हमने सीखा कि क़ुरआने मजीद सत्य के आधार पर तथा सभी वास्वतिक्ताओं और वास्तविक मानवाधिकारों के आधार के रूप में उतरा है, अतः फ़ैसले करने में उसी को आधार बनाना चाहिए।
 लोगों का दण्डित होना, उन पर आरोप लगाने का तर्क नहीं बन सकता बल्कि यदि किसी निर्दोष काफ़िर तक पर आरोप लगाया जाए तो उसकी ओर से प्रतिरोध करना चाहिए।
 सूरए निसा की आयत संख्या 107, 108 तथा 109 
(हे पैग़म्बर!) उन लोगों का समर्थन न कीजिएगा जो अपने आप से विश्वासघात करते हैं। निःसन्देह, ईश्वर विश्वासघात करने वाले अपराधियों को पसंद नहीं करता। (4:107) वे लोगों से अपने विश्वासघात को छिपाते हैं किंतु वे उसे ईश्वर से नहीं छिपा सकते जबकि वह उस समय भी उनके साथ रहता है जब वे रातों को अप्रिय बातें (और षड्यंत्र) करते हैं और जो कुछ वे करते हैं, ईश्वर उससे भलि भांति अवगत है। (4:108) यदि मान भी लिया जाए कि तुम लोगों ने सांसारिक जीवन में उन विश्वासघातियों का समर्थन किया परन्तु प्रलय के दिन ईश्वर के समक्ष कौन उनका साथ देगा या कौन उनका वकील बनेगा? (4:109)
 इन तीन आयतों में ईश्वर तीन गुटों को सावधान करता है। क़ाज़ी अर्थात पंच या न्यायाधीश से कहता है कि वह फ़ैसला करने में विश्वासघात करने वालों का समर्थन न करे और सत्य की सीमा से आगे न बढ़े। वह यह न सोचे कि कोई उसके काम से अवगत नहीं है। ईश्वर उसके सभी कामों को देखता है।
 इसके कारण विश्वासघात करने वालों के समर्थकों और अपराधियों को संबोधित करते हुए कहता है कि यदि संसार में तुम्हारी चालें सफल हो भी जाएं तब भी प्रलय में वे कुछ काम न आएंगी।
 एक रोचक बात यह है कि १०७वीं आयत में ईश्वर कहता है कि विश्वासघाती, अन्य लोगों के साथ विश्वासघात करने से पूर्व स्वयं अपने से विश्वासघात करता है और अपने ऊपर अत्याचार करता है क्योंकि प्रथम तो वह ईश्वर द्वारा प्रदान की गई पवित्र भावना से वंचित हो जाता है और दूसरे यह कि अपने व्यवहार द्वारा स्वयं अपने ऊपर दूसरों के अत्याचार और विश्वासघात की भूमि समतल कर देता है।
 इन आयतों से हमने सीखा कि क़ुरआनी संस्कृति में समाज के सभी सदस्य, एक शरीर के अंगों की भांति हैं। दूसरों के साथ विश्वासघात स्वयं के साथ विश्वासघात के समान है।
 ईश्वर से भय का सबसे महत्वपूर्ण तत्व, उसके ज्ञान और हमारे सभी कर्मों से उसके अवगत होने पर ईमान अर्थात विश्वास रखना है।
 यदि न्यायाधीश, विदित प्रमाणों के आधार पर, विश्वासघाती को बरी कर दे तो ईश्वर वास्तविकताओं के आधार पर प्रलय में उसे दण्ड देगा। अत्याचारग्रस्त को भी यह विश्वास रखना चाहिए कि यदि संसार में वह अपना अधिकार सिद्ध न कर सका और उसे प्राप्त न कर सका तो प्रलय में ईश्वर अवश्य ही उसके साथ न्याय करेगा।

 सूरए निसा की आयत संख्या 110 की तिलावत सुनते हैं।
और जो कोई बुरा कर्म करे या अपने आप पर अत्याचार करे और फिर ईश्वर से क्षमा चाहे तो वह ईश्वर को अत्यन्त क्षमाशील और दयावान पाएगा। (4:110)


 पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि ईश्वर ने सभी ईमान वालों को हर प्रकार के विश्वासघात, षड्यंत्र और विश्वासघातों के समर्थन करने से रोका है तथा उन्हें, प्रलय के कड़े दण्ड से अवगत कराया है। यह आयत उन पर तौबा अर्थात प्रायश्चित का द्वार खोलते हुए कहती है। जो कोई दूसरों के साथ बुराई करे, या पाप करके स्वयं को क्षति पहुंचाए तो यदि वह ईश्वर के दरबार में आए तो ईश्वर उसे क्षमा करके उसे अपनी दया की छाया में ले आता है। और इसमें पाप के बड़े या छोटे होने में कोई अंतर नहीं है क्योंकि ईश्वर की दृष्टि में, पाप पर लज्जित होने की स्थिति ही महत्पवूर्ण है जो ईश्वरीय दया व कृपा का कारण बनती है।
 अलबत्ता स्पष्ट है कि यदि कोई पाप दूसरों की जानी या माली क्षति का कारण बना हो तो उसकी क्षतिपूर्ति तौबा स्वीकार होने की शर्त है और उसके बिना कोई तौबा स्वीकार्य नहीं है।
 इस आयत से इमने सीखा कि पाप वास्वत में स्वयं पर अत्याचार है और मनुष्य को अपने आप पर भी अत्याचार करने का अधिकार नहीं है।
 ईश्वर न केवल यह कि बुराइयों को क्षमा कर देता है बल्कि तौबा करने वालों को पसंद करता है और उसके प्रति दयावान है।
 सूरए निसा की आयत संख्या 111 तथा 112 
और जो कोई पाप करे तो वास्तव में उसने अपने ही विरुद्ध काम किया है और ईश्वर जानने वाला तथा तत्वदर्शी है। (4:111) और जो कोई, कोई ग़लती या पाप करे और फिर उसे किसी निर्दोष के सिर डाल दे तो निसन्देह, वह बहुत बड़े आरोप और खुले हुए पाप का भार उठा लेता है। (4:112)
 यह आयत पाप के बुरे परिणामों की ओर संकेत करते कहती है कि पापी व्यक्ति दूसरों और समाज को क्षति पहुंचाने से अधिक स्वयं को घाटा पहुंचाता है क्योंकि वह अपनी पवित्र प्रवृत्ति को अपवित्र कर देता है तथा अपने हृदय व आत्मा की उज्जवलता को खो देता है और यह स्वयं बहुत बुरा घाटा है।
 इसके अतिरिक्त ईश्वर की सामाजिक परंपाराओं के अंतर्गत, लोगों पर हर प्रकार के अत्याचार का परिणाम जल्दी या देर में स्वयं अत्याचारी तक पहुंचता है और वह इसी संसार में अपने अत्याचार के कुपरिणामों में ग्रस्त हो जाता है।
 इन आयतों से हमने सीखा कि पाप, समाप्त होने वाली वस्तु नहीं है बल्कि उसके परिणाम मनुष्य की आत्मा और मानस में बाक़ी रहते हैं।
 दूसरों पर आरोप लगाने वाला, पाप का बहुत वज़नी भार अपने कांधों पर ढोता है, क्योंकि उसने लोगों के सम्मान को निशाना बनाया है।
 सूरए निसा की आयत संख्या 113 
(हे पैग़म्बर!) यदि आप पर ईश्वर की दया व कृपा न होती तो उनके एक गुट ने आपको बहकाने का इरादा कर लिया था और यह अपने आप के अतिरिक्त किसी और को पथभ्रष्ट नहीं कर सकते और न आप को कोई क्षति पहुंचा सकते हैं। और ईश्वर ने आप पर किताब तथा तत्वदर्शिता उतारी है और आपको उन सभी बातों का ज्ञान दे दिया है जो आप नहीं जानते थे और आप पर ईश्वर की बड़ी कृपा है। (4:113)
 इस्लामी इतिहास की पुस्तकों में वर्णित है कि अनेकेश्वरवादियों का एक गुट पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पास आया और कहने लगा कि हम दो शर्तों के साथ आपका धर्म स्वीकार कर लेंगे और आपके प्रति वचनबद्ध हो जाएंगे। प्रथम यह कि हम अपने हाथों से अपनी मूर्तियों को नहीं तोड़ेंगे और दूसरे यह कि अगले एक वर्ष तक "उज़्ज़ा" नामक मूर्ति की पूजा करते रहेंगे।
 इसी समय ईश्वर की ओर से यह आयत आई और इसने पैग़म्बरे इस्लाम को संबोधित करते हुए कहा कि यह लोग स्वयं को मार्गदर्शित करने के स्थान पर तुमको पथभ्रष्ट करना और बहकाना चाहते हैं परन्तु ईश्वर ने तुम्हें क़ुरआन का समस्त ज्ञान दिया है और तत्वदर्शिता दी है और उसने अपनी कृपा से तुम्हें हर प्रकार की पथभ्रष्टता से सुरक्षित रखा है।
 इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर ने पैग़म्बरों को हर प्रकार की ग़लती और पथभ्रष्टता से सुरक्षित रखा है।
 ईश्वर स्वयं, पैग़म्बर का शिक्षक है और स्वाभाविक है कि इस शिक्षा में कोई ग़लती नहीं होगी।
 सूरए निसा की आयत संख्या 114 
उनकी अधिकांश गोष्ठियां और गुप्त बातों में कोई भलाई नहीं है, सिवाए उन लोगों की बातों के जो दान-दक्षिणा, भले कर्म या लोगों के बीच सुधार का आदेश देते हैं और जो कोई भी ईश्वर की मर्ज़ी और प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए ऐसा करे तो हम शीघ्र ही उसे महान बदला देंगे। (4:114)
 यह आयत एक अशिष्ट बात अर्थात चोरी-छिपे बात करने की ओर संकेत करते हुए कहती है कि सिवाए कुछ अवसरों के कि जहां पर गुप्त रूप से बात करना आवश्यक है, मुंह घुमा कर बातें करना बुरा काम है।
 वह स्थान या अवसर जहां पर गुप्त रूप से बात करने को यह आयत उचित बताती है वह यह है कि वंचित लोगों की आर्थिक सहायता की अन्य आयतों में भी गुप्त आर्थिक सहायता की सिफ़ारिश की गई है।
 भलाई का आदेश देना, एसे अवसरों पर जहां उसके गुप्त होने के कारण उसका अधिक प्रभाव होता है।
 और सबसे महत्वपूर्ण लोगों और परिवारों के बीच सुधार, कि जिसका लोगों के सम्मान की रक्षा के लिए, गोपनीय होना आवश्यक है।
 इन आयतों से हमने सीखा कि समाजिक मामलों में, मूल बात लोगों के सम्मान की रक्षा करना है।
 निष्ठा ही कर्मों का वास्वतिक मूल्य है तथा भले कर्मों में गोपनीयता निष्ठा से अधिक समीप है।

 सूरए निसा की आयत संख्या 115 की तिलावत सुनते हैं।
और जो कोई स्वयं के लिए मार्गदर्शन का रास्ता स्पष्ट होने के पश्चात, पैग़म्बर का विरोध करे और ईमान वालों के मार्ग के अतिरिक्त किसी और मार्ग पर चले तो हम उसे उसी ओर मोड़ देंगे जिसका उसने रुख़ किया है और उसे नरक में डाल देंगे कि जो बहुत बुरा ठिकाना है। (4:115)
 जो ख़तरे ईमान वालों को सदैव लगे रहते हैं, उनमें से एक अपने धर्म को छोड़ना तथा ईश्वरीय नेताओं व उनके सच्चे मार्गदर्शनों और आदेशों का जानबूझकर विरोध करना है। यद्यपि हमारे काल में पैग़म्बर मौजूद नहीं है कि कोई उनका विरोध कर सके किंतु मुसलमानों के समूह का विरोध जो उनके बीच मतभेद और विरोध का कारण बने, इस आयत के संबोधन में से एक है कि जो पैग़म्बर से शत्रुता के समान है और जिसका परिणाम संसार में ग़लत शासनों की स्वीकृति और प्रलय मे नरक का कड़ा दण्ड है।
 इस आयत से हमने सीखा कि इस्लामी समाज का विरोध तथा उसके सच्चे नेताओं के अनुसरण से बाहर निकलना, पैग़म्बर के विरोध के समान है।
 ईश्वर किसी को भी तर्क और मार्गदर्शन के बिना नरक में नहीं डालेगए, बल्कि उसने आरंभ से ही सबसे मार्गदर्शन की भूमिक समतल कर दी है।
 सूरए निसा की आयत संख्या 116 और 117 
निसन्देह, ईश्वर किसी को उसका समकक्ष ठहराने (के पाप) को क्षमा नहीं करता और इसके अतिरिक्त जो पाप हो उसे वह जिसके लिए चाहे क्षमा कर देता है, और जिसने भी (किसी को) ईश्वर का समकक्ष ठहराया तो निःसन्देह, वह पथभ्रष्टता से दूर तक चला गया है। (4:116) यह लोग ईश्वर को छोड़कर महिलाओं को पुकारते हैं और यह उद्दंड शैतान के अतिरिक्त किसी और को नहीं पुकारते। (4:117)
 इस्लाम के उदय के समय में मक्का नगर के अनेकेश्वरवादी एसी मूर्तियों की पूजा करते थे जिनके नाम उन्होंने महिलाओं के नाम पर रखे थे। जैसे लात, मनात और उज़्ज़ा आदि। इसी के साथ उनका यह भी विश्वास था कि फ़रिश्ते ईश्वर की बेटियां हैं और संसार के सारे मामले उन्हीं के हाथ में हैं, अतः वे एक प्रकार से फ़रिश्तों की पूजा करते थे।
 यह आयत इस प्रकार के अंधविश्वासों को रद्द करते हुए कहती है कि वे वास्तव में अपने ग़लत व शैतानी विचारों का अनुसरण करते हैं और इस प्रकार के अनेकेश्वरवादी विश्वासों का पथभ्रष्टता के अतिरिक्त और कोई परिणाम नहीं है।
 यह बात भी स्पष्ट है कि जब तक कोई अनेकेश्वरवादी अपने इस विश्वास को छोड़कर एकेश्वरवादी नहीं बन जाएगा तब तक उसके पाप की क्षमा की कोई संभावना नहीं है। परन्तु ईमान वाला व्यक्ति, जिसके विचार और विश्वास बिल्कुल ठीक हैं, कभी कोई ग़लती या पाप कर बैठे तो चूंकि उसने अपने भीतर ईश्वरीय दया व कृपा की भूमि समतल कर रखी है, अतः ईश्वर उसे क्षमा कर देगा। अलबत्ता यह ईश्वरीय क्षमा, लोगों की योग्यता और ईश्वरीय तत्वदर्शिता के आधार पर होती है।
 इन आयतों से हमने सीखा कि सबसे बड़ा पाप, किसी को ईश्वर का समकक्ष ठहराना है, जो ईश्वरीय दया की संभावना को समाप्त कर देता है।
 सभी ग़लत मार्ग एक ही रास्ते पर जाकर मिलते हैं कि जो शैतान का मार्ग है और सत्य से भागने वालों के पास शैतान के अतिरिक्त कोई ठिकाना नहीं है।
 ईश्वर के अतिरिक्त किसी की भी उपासना वास्तव में शैतान की पूजा है।
सूरए निसा की आयत संख्या 118 तथा 119 
ईश्वर ने शैतान पर लानत अर्थात धिक्कार की जिसने कहा कि मैं अवश्य ही तेरे बंदों में से एक निश्चित भाग लेकर रहूंगा (अर्थात एक गुट को बहका कर रहूंगा) (4:118) और उन्हें पथभ्रष्ट करूंगा उन्हें कामनाओं (के मायाजाल) में फंसाऊंगा और उन्हें आदेश दूंगा तो वे चौपायों के कान चीरेंगे (और उन्हें अपने देवताओं के लिए निशानी बनाएंगे) और मैं उन्हें आदेश दूंगा तो वे ईश्वर की रचना में परिवर्तन करेंगे। (तो हे लोगो! जान लो कि) जिसने ईश्वर के स्थान पर शैतान को अपना संरक्षक व मित्र बनाया निःसन्देह वह स्पष्ट घाटे में पड़ गया।) (4:119)
 अनेकेश्वरवादी न केवल मूर्तियों की पूजा करते थे और उन्हें अपने ईश्वर तथा धरती पर उसके दूतों के बीच माध्यम भी समझते थे बल्कि अपनी फ़सलों और जानवरों के एक भाग को भी मूर्तियों के लिए विशेष करते थे तथा चौपायों के कान काट कर उन पर निशानी लगाते थे ताकि वे उन पर सवार न हो सकें और न ही उनका मांस खाया जाए।
 इन आयतों में ईश्वर इस प्रकार के अंधविश्वासी विचारों को शैतान के कार्यक्रम बताते हुए कहता है कि शैतान ने सौगंध खाई है कि वह ईश्वर के बंदों को पथभ्रष्ट करेगा और उनकी पथभ्रष्टता का मार्ग प्रशस्त करेगा अतः वह और उसके अनुयायी ईश्वरीय दया से वंचित हो गए हैं।
 लोगों को पथभ्रष्ट करने के दो शैतानी कार्यक्रम, जिसकी ओर इस आयत में संकेत किया गया है, बेकार की कल्पनाएं तथा ईश्वरीय सृष्टि में परिवर्तन है। स्पष्ट है कि अंधविश्वास तथा ईश्वर के अतिरिक्त किसी से भी मोक्ष की आशा, ऐसी कामनाओं को जन्म देती है जिनका कोई आधार नहीं होता। इसी प्रकार से ईश्वरीय सृष्टि या क़ानूनों में किसी प्रकार का परिवर्तन, लोगों को उनकी पवित्र प्रवृत्ति से विचलित करने और शैतानी कार्यक्रमों को स्वीकार कराने के प्रतिदिन के शैतानी मार्गों में से है।
 इस आयतों से हमने सीखा कि, शैतान मनुष्य का पुराना शत्रु है अतः हमें इससे सचेत रहना चाहिए कि उसके जाल में फंसकर ईश्वरीय दया से कहीं दूर न हो जाएं।
 ईश्वर द्वारा हलाल की गई वस्तुओं को हराम करना तथा हराम वस्तुओं को हलाल करना शैतानी कार्यक्रम में से है।

सूरए निसा की आयत संख्या 120 और 121 
शैतान सदैव उनसे वादे करता है और उन्हें कामनाओं में उलझाता है (परन्तु जान लो कि) शैतान धोखे के अतिरिक्त उनसे कोई वादा नहीं करता। (4:120) यह वे लोग हैं जिनका ठिकाना, नरक है और उससे बचने का उन्हें कोई मार्ग नहीं मिलेगा। (4:121)
 पिछली आयतों में लोगों को पथभ्रष्ट करने में शैतान के कार्यक्रमों का वर्णन करने के पश्चात सूरे निसा की १२०वीं आयत में ईश्वर कहता है कि लोगों को पथभ्रष्ट करने हेतु शैतान का एक अन्य मार्ग उनसे झूठे वादे करना और उन्हें बड़ी-बड़ी कामनाओं में फंसाना है।
 पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम व उनके पवित्र परिजनों के कथनों में आया है कि जब ईश्वर की ओर से लोगों को क्षमा करने संबंधी आयतें आईं तो इब्लीस अर्थात शैतान ने अपने साथियों को एकत्रित किया और उनसे कहने लगा कि यदि मनुष्य ने तौबा कर ली तो हमारा सारा परिश्रम ही बेकार हो जाएगा। उसके एक साथी ने कहा जब कभी कोई तौबा करना चाहेगा तो हम उसे कामनाओं में फंसा देंगे ताकि वह तौबा को टालता रहे और फिर तौबा कर ही न सके।
 इन आयतों से हमने सीखा कि लंबी-लंबी कामनाओं से दिल बांधे रहना, शैतान के जाल में फंसने का कारण है।
 दूसरों, यहां तक कि बच्चों से भी झूठे वादे करना शैतानी काम है।
 सूरए निसा की 122वीं आयत 
और जो लोग ईमान लाए और अच्छे कर्म करते हैं उन्हें हम शीघ्र ही (स्वर्ग के ऐसे) बाग़ों में प्रविष्ट कर देंगे जिनके नीचे से नहरें बहती होंगी, जहां वे सदैव रहेंगे। यह ईश्वर की सच्चा वादा है और कथन में ईश्वर से बढ़कर कौन सच्चा हो सकता है? (4:122)
 पिछली आयतों में हमने कहा था कि शैतान मनुष्य को झूठी कामनाओं में मग्न कर देता है और सदैव उससे ऐसे वादे करता रहता है जिनमें से कोई सच्चा नहीं होता, बल्कि उसके सारे वादे झूठ और धोखे पर आधारित होते हैं।
 इस आयत में ईश्वर कहता है कि शैतान के विपरीत उसके वादे सदैव ही सच होते हैं। उसने तुमसे स्वर्ग का वादा किया है और वह अपने वादों पर प्रतिबद्ध है। वह कामनाओं के स्थान पर तुमसे कर्म और प्रयास चाहता है और वह भी ऐसे भले कर्म जो दूसरों की भी भलाई का कारण बनें। ऐसे भले कर्म जो पवित्र व भली भावना से किये गए हों ताकि व्यक्ति की प्रगति का कारण बनें।
 इस आयत से हमने सीखा कि ईमान और भले कर्म एक दूसरे के लिए अपरिहार्य हैं और कभी एक-दूसरे से अलग नहीं होते। बिना कर्म का मोमिन नहीं हो सकता।
 ईश्वर के वादों पर भरोसा करना चाहिए क्योंकि हम किसी को उससे अधिक सच्चा नहीं जानते और वह भी ऐसे स्वर्ग का वादा जिसके खोने की कोई चिंता नहीं है।
सूरए निसा की 123वीं आयत की तिलावत 
तुम्हारी या आसमानी किताब वालों की कामनाओं का बदला नहीं है बल्कि कोई बुराई करे, उसे उसका बदला दिया जाएगा और वह अपने लिए ईश्वर के अतिरिक्त कोई अभिभावक व सहायक नहीं पाएगा। (4:123)
 शैतान, पापी लोगों के भीतर जो कामनाएं उत्पन्न करता है उनमें से एक यह है कि चूंकि तुम मुसलमान या ईसाई हो अतः ईश्वर तुम्हें दण्डित नहीं करेगा बल्कि दण्ड तो दूसरे धर्म के अनुयाइयों के लिए है। इस ग़लत विचार द्वारा वह पाप की भूमि भी प्रशस्त करता है और पापियों के लिए तौबा अर्थात प्रायश्चित का द्वार भी बंद कर देता है।
 इसी कारण इस आयत में कहा गया है कि इस प्रकार की ग़लत आशाओं से स्वयं को धोखा मत दो और यह न सोचो कि ईश्वर ने तुम्हें छूट दे रखी है और तुम्हें दण्ड से मुक्त कर रखा है, नहीं ऐसा नहीं है बल्कि जो कोई भी पाप करेगा चाहे, वह जिस जाति व मूल का हो और जिस किसी भी धर्म का अनुयायी हो उसे दण्ड अवश्य ही दिया जाएगा।
 इतिहास में वर्णित है कि कुछ मुसलमानों को आशा थी कि उनके और अन्य धर्मों के बीच मतभेद में पैग़म्बर उनका समर्थन करेंगे जबकि मूल आधार न्याय है न कि समर्थन, क़ानून है न कि संबंध।
 इस आयत से हमने सीखा कि विशिष्टता वे श्रेष्ठता प्राप्त की इच्छा तथा अनुचित आशाएं, लोगों को बहकाने के लिए शैतान के हथकण्डे हैं।
 इस्लाम और उसके आदेश वास्तविकताओं पर आधारित हैं न कि कल्पनाओं और लोगों की रुचियों पर।
 ईश्वरीय क़ानून के सामने सब बराबर हैं। धर्म के नाम से ग़लत लाभ उठाना वर्जित है।
 सूरए निसा की 124वीं आयत 
और जो कोई भी भले कर्म करे, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, यदि वह ईमान वाला है तो केवल ऐसे ही लोग स्वर्ग में जाएंगे और उन पर बाल बराबर भी अत्याचार नहीं होगा। (4:124)
 पिछली आयत में ईश्वरीय दण्ड के मूल आधार का वर्णन करने के पश्चात यह आयत प्रलय में मिलने वाले पारितोषिक के मूल आधार का इस प्रकार उल्लेख करती है कि जो कोई ईश्वर व प्रलय पर ईमान रखता हो, चाहे स्त्री हो या पुरुष, यदि भले कर्म करेगा तो उसे प्रलय में ईश्वर का स्वर्ग प्राप्त होगा और उसके पारितोषिक में कोई कमी नहीं होगी।
 महत्वपूर्ण बात यह है कि इस आयत व अन्य आयतों से भले कर्मों की स्वीकृति की शर्त, ईश्वर पर ईमान है तथा अन्य लोगों के भले कर्म स्वीकार्य नहीं हैं और यह स्पष्ट सी बात है क्योंकि जिसे प्रलय और प्रलय में मिलने वाले इनाम पर विश्वास नहीं होगा तो ईश्वर से प्रलय में पारितोषिक की आशा ही नहीं रखेगा। हां, यह संभव है कि ईश्वर अपनी दया व कृपा से उसे स्वर्ग में ले जाए परन्तु यह इनाम की आशा और उसके अधिकार से अलग की बात है।
 इस आयत से हमने सीखा कि स्वर्ग में जाने का कारण, ईमान व भले कर्म हैं न कि आशाएं और दावे। ईश्वरीय दया से लाभान्वित होने में सभी लोग समान हैं।
 आध्यात्मिक परिपूर्णताओं तक पहुंचने में स्त्री एवं पुरुष समान हैं। परिपूर्णता के मार्ग पर अग्रसर होने में उनके लिए कोई सीमा नहीं है।
 कर्मों की स्वीकृति की शर्त ईमान है। ईश्वर पर ईमान न रखने वाले लोगों की सेवाओं का बदला इसी संसार में दे दिया जाएगा।

सूरए निसा की आयत संख्या 125 और 126 
और किसका धर्म उससे बेहतर है जिसने स्वयं को ईश्वर के समक्ष नतमस्तक कर रखा हो और जो अच्छे कर्म करने वाला हो तथा सत्यवादी इब्राहीम के धर्म का अनुयायी हो? और ईश्वर ने इब्राहीम को अपनी मित्रता के लिए चुन लिया। (4:125) और जो कुछ आकाशों और धरती में है, सब ईश्वर का है और हर वस्तु पर ईश्वर का नियंत्रण है। (4:126)
 पिछली आयतों में हमने जाना था कि ईश्वरीय पारितोषिक से लाभान्वित होने की शर्त ईमान व भले कर्म हैं। यह आयतें भले व ईमान वाले व्यक्ति की आंतरिक प्रेरणाओं की ओर संकेत करते हुए कहती हैं कि वही ईमान संपूर्ण व मूल्यवान है जो ईश्वर के प्रति निष्ठा व समर्पण पर आधारित हो। एसे ईमान का कोई लाभ नहीं है जिसमें केवल ज़बान से ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार किया जाए परन्तु मनुष्य का हृदय, ईश्वर के समक्ष नतमस्तक न रहे।
 इस आधार पर भले कर्म उसी स्थिति में ईश्वर के दरबार में स्वीकार होंगे कि जब उन्हें पवित्र व शुद्ध भावनाओं के अन्तर्गत तथा भलाई की नियत से किया गया हो न कि छलकपट या भौतिक हितों की प्राप्ति के लिए। इस संबंध में क़ुरआने मजीद ने एसे मनुष्य का सच्चा व संपूर्ण उदाहरण, हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को बताया है और उनके अनुसरण को, जो क़ुरआन के शब्दों में ईश्वर की मित्रता के चरण तक पहुंच चुके हैं, संपूर्ण कल्याण व मोक्ष की शर्त घोषित किया है।
 ईश्वर के निकट हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम का वह स्थान है कि पैग़म्बरे इस्लाम को भी उनके सत्यवादी धर्म के अनुसरण के लिए कहा गया है। अतः इस्लाम, हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के धर्म का अनुयायी है जिसे इन आयतों में सबसे बेहतर धर्म कहा गया है।
 इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वरीय धर्मों का मूल सिद्धांत ईश्वर के प्रति समर्पित रहना और लोगों के साथ भलाई करना है।
 ईमान तथा कर्म एक-दूसरे के लिए अपरिहार्य हैं। एक के बिना दूसरा अधूरा तथा प्रभावहीन है।
 ईश्वर ने यद्यपि लोगों को ईमान व कर्म का निमंत्रण दिया है परन्तु उसे इसकी कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि वह तो धरती और आकाशों का स्वामी है और सभी वस्तुएं उसके नियंत्रण में हैं।

 सूरए निसा की आयत संख्या 127 
(हे पैग़म्बर!) यह लोग आपसे महिलाओं (के अधिकारों) के बारे में प्रश्न करते हैं, इनसे कह दीजिए कि ईश्वर इस बारे में तुम्हारा उत्तर देगा जैसा कि (विधवा स्त्रियों और) अनाथ लड़कियों, जिनका अधिकार तुम उन्हें नहीं देते और उनसे निकाह (करके उनका माल रोक लेना) चाहते हो, तथा कमज़ोर बच्चों के बारे में ईश्वर की सिफ़ारिशें इनके लिए तिलावत की जा चुकी हैं (और ईश्वर सदैव सिफ़ारिश करता है कि) अनाथों के साथ न्याय करो और जान लो कि तुम जो भी भला कर्म करते हो, ईश्वर उससे अवगत है। (4:127)

 सूरए निसा की आरंभिक आयतों में महिलाओं के विवाह और उनके मीरास के आदेशों का वर्णन करने के पश्चात ईश्वर इस आयत में कहता है कि हे पैग़म्बर, आप पुरुषों से कह दीजिए कि महिलाओं के अधिकारों के बारे में जिन आदेशों का वर्णन हुआ है, सब ईश्वर की ओर से हैं और उनमें, पैग़म्बर होने के बावजूद मेरी कोई भूमिका नहीं है। न केवल विधवा महिलाओं बल्कि अनाथ अभिभावक न रखने वाली लड़कियों और लड़कों के बारे में जो भी आदेश हैं वे ईश्वर की ओर से आए हैं और क़ुरआन की विभिन्न आयतों में वर्णित हैं।
 यह आयत इस महत्वपूर्ण बात का उल्लेख करती है कि हर प्रकार के व्यवहार विशेषकर अनाथों और वंचितों के साथ बर्ताव में मूल मानदण्ड न्याय है जिसके के लिए महिलाओं और बच्चों के आर्थिक व पारिवारिक अधिकारों का सम्मान आवश्यक है और न केवल उनके अनिवार्य अधिकारों की पूर्ति बल्कि उनके साथ भलाई करने पर भी क़ुरआने मजीद ने बल दिया है। 
 इस आयत से हमने सीखा कि इस्लाम एसे समय में महिलाओं, बच्चों और अनाथों के अधिकारों का रक्षक था जब उन्हें परिवार और समाज में कोई अधिकार प्राप्त नहीं था।
 इस्लाम के क़ानून ईश्वर ने बनाए हैं और पैग़म्बर पर केवल उन्हें बयान करने का दायित्व सौंपा गया था।

 सूरए निसा की आयत संख्या 128 
और यदि किसी महिला को अपने पति की ओर से बुरे व्यवहार या बेरुख़ी का भय हो तो उन दोनों के लिए वैध है कि वे किसी प्रकार एक-दूसरे से समझौता कर लें। निःसन्देह समझौता बेहतर है परन्तु कंजूसी और संकीर्ण दृष्टि, लोगों में घर कर गई है। जान लो कि यदि तुम भलाई करोगे और ईश्वर से डरोगे तो जो कुछ तुम करते हो ईश्वर उससे अवगत है। (4:128)

 पिछली आयत में लोगों को महिला अधिकारों का सम्मान करने की सिफ़ारिश करने के पश्चात ईश्वर इस आयत में महिलाओं को संबोधित करते हुए कहता है कि यद्यपि पारिवारिक अधिकारों और उनसे संबंधित आदेशों का पालन करना चाहिए परन्तु परिवार की सुरक्षा उससे महत्वपूर्ण है और जब भी इन मामलों पर ध्यान देने से पारिवारिक व्यवस्था के बिगड़ने का ख़तरा हो तो बेहतर यह है कि दोनों पक्ष लचक दिखाएं ताकि परिवार टूटने न पाए।
 यह आयत सिफ़ारिश करती है कि इससे पूर्व कि पारिवारिक समस्याएं तलाक़ का कारण बनें, उनको रोकना चाहिए और समझौते व लचक द्वारा अधिकार संबंधी अपने मतभेदों का समाधान करना चाहिए। इस प्रकार से आंतिरक इच्छाओं, कंजूसी व संकीर्ण दृष्टि को पति व पत्नी के बीच जुदाई डालने की अनुमति नहीं देनी चाहिए बल्कि एक दूसरे के साथ भलाई करके अपने पुराने रिश्तों को सुदृढ़ बनाना चाहिए।
 इस आयत से हमने सीखा कि परिवार के आधार की रक्षा के लिए पति और पत्नी दोनों के भीतर क्षमा की भावना को सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
 इस्लाम इस बात पर बल देता है कि पारिवारिक समस्याओं को यथासंभव दूसरों के हस्तक्षेप के बिना और केवल पति पत्नी के प्रयासों से समाप्त किया जाए।
 इस्लाम की आधिकारिक व्यवस्था उसकी शिष्टाचारिक व्यवस्था के साथ है। परिवार के अधिकारों के साथ ही सुधार और भलाई की ओर संकेत किया गया है।
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