कुरान तर्जुमा और तफसीर -सूरए आले इमरान 3:54-76

  सूरए आले  इमरान की आयत संख्या ५४ तथा ५५ इस प्रकार है। (ईसा मसीह के शत्रुओं ने उनकी हत्या की) योजना बनाई और ईश्वर ने भी (उन्हें बचाने...

 सूरए आले इमरान की आयत संख्या ५४ तथा ५५ इस प्रकार है।


(ईसा मसीह के शत्रुओं ने उनकी हत्या की) योजना बनाई और ईश्वर ने भी (उन्हें बचाने की) युक्ति की और ईश्वर सबसे अच्छा युक्ति करने वाला है। (3:54) जब ईश्वर ने कहा, हे ईसा! मैं तुम्हें (यहूदियों) के चंगुल से छुड़ाने वाला और अपनी ओर ऊपर लाने वाला हूं और तुम्हें ऐसे लोगों से पवित्र करने वाला हूं जिन्होंने इन्कार किया तथा मैं तुम्हारा अनुसरण करने वालों को, तुम्हारा इन्कार करने वालों पर प्रलय तक के लिए वरीयता देने वाला हूं। तो जान लो कि तुम सबकी वापसी मेरी ही ओर है और मैं उन बातों का फ़ैसला करूंगा जिसमें तुम्हारे बीच मतभेद था। (3:55)
 पिछले कार्यक्रमों में हमने कहा था कि हज़रत ईसा मसीह की ओर से अनेक ईश्वरीय चमत्कार प्रस्तुत किये जाने के बावजूद कुछ लोगों ने उनका इन्कार किया और उनकी बातों को स्वीकार नहीं किया। इन आयतों में उनकी ओर से हज़रत ईसा की हत्या के षड्यंत्र की सूचना देते हुए कहा गया है कि काफ़िरों के मुखिया, इस पैग़म्बर की आवाज़ को दबाने और उनकी हत्या के लिए योजनाएं बना रहे हैं।
 उन लोगों ने हज़रत ईसा और उनके साथियों की गिरफ़्तारी पर बड़ा भारी इनाम रखा और इस प्रकार उन्हें मारने की भूमिका समतल की परन्तु ईश्वर ने उनके षड्यंत्रों को विफल बनाते हुए हज़रत ईसा मसीह को बचा लिया। ईसाइयों के विश्वास के अनुसार यहूदियों ने हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को सूली पर लटका दिया, यहां तक कि उनकी मृत्यु हो गई। उसके पश्चात उन्हें दफ़न कर दिया गया और फिर ईश्वर ने उन्हें मरे हुए लोगों के बीच से निकालकर आकाशों तक पहुंचा दिया। परन्तु क़ुरआन की आयतों, विशेषकर सूरए निसा की १५७वीं आयत से ऐसा प्रतीत होता है कि यहूदियों ने हज़रत ईसा के स्थान पर उनकी ही जैसी सूरत वाले एक अन्य व्यक्ति को सूली पर लटका कर मार दिया था और ईश्वर ने अपनी शक्ति से हज़रत ईसा को उस वातावरण से निकाल कर आकाशों तक पहुंचा दिया जैसा कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को भी अल्पावधि के लिए मेराज पर ले जाया गया था और वे आकाशों की बातों से अवगत हुए थे।
 आगे चलकर यह आयत ईसाइयों को शुभ सूचना देती है कि ईसा मसीह का अनुसरण करने वालों को सदैव उनके धर्म का इन्कार करने वालों अर्थात यहूदियों पर वरीयता प्राप्त रहेगी और यह पवित्र क़ुरआन कह एक भविष्यवाणी है जो १४०० वर्षों से लेकर अब तक सिद्ध होती आई है।
 इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर का इरादा और उसकी इच्छा मनुष्य की हर युक्ति और कोशिश से ऊपर है अतः हमें ईश्वरीय इरादे के समक्ष बहाना नहीं बनाना चाहिए।
 पैग़म्बरों का अनुसरण, विजय और वरियता प्राप्त कोने का कारण है जबकि कुफ़्र, पतन और अंत का कारण बनता है।



सूरए आले इमरान की आयत संख्या ५६, ५७ तथा ५८ इस प्रकार है।
तो काफ़िर हो जाने वाले गुट को मैं लोक व परलोक में कड़ा दण्ड दूंगा और कोई उनका सहायक नहीं होगा। (3:56) परन्तु जो लोग ईमान लाए और भले कर्म करते रहे, ईश्वर उन्हें उनका बदला बिना किसी कमी के देगा और वह अत्याचारियों को पसंद नहीं करता। (3:57) हे पैग़म्बर! हम तुम्हारे लिए जिस चीज़ की तिलावत करते हैं वह ईश्वरीय आयतें और तत्वदर्शी नसीहतें हैं। (3:58)
 हज़रत ईसा मसीह की हत्या का षडयंत्र रचने के कारण ईश्वर ने बनी इस्राईल को एक भारी संकट और अभिशाप में फंसा दिया। इतिहास में वर्णित है कि लगभग ४० वर्षों तक रोम का एक शासन उन पर राज करता रहा और उसने उनके हज़ारों लोगों की हत्या कराई या उन्हें कै़द कर दिया, यहां तक कि उसने कुछ क़ैदियों को भूखे दरिन्दों के सामने फिंकवा दिया अलबत्ता ईश्वर किसी पर भी अत्याचार नहीं करता बल्कि उसका बदला स्वयं हमारे कर्मों के आधार पर होता है। कुफ़्र, शत्रुता, द्वेष और हठधर्मी का परिणाम अत्याचारियों के चुंगल में फंसने और सौभाग्य व कल्याण के मार्ग से दूर हो जाने के अतिरिक्त कुछ अन्य नहीं होता। जैसा कि ईमान और भले कर्मों का संसार व प्रलय में भौतिक व आध्यात्मिक विभूतियों के अतिरिक्त कुछ और बदला नहीं हो सकता।
 इन आयतों से हमने सीखा कि यद्यपि ईश्वरीय परंपरा, कर्मों का बदला प्रलय तक के लिए रोके रखने की है परन्तु कभी-कभी वह इस संसार में भी दण्ड देता है।
 ईश्वरीय कोप से संसार की कोई भी शक्ति नहीं बचा सकती अतः हमें अपने कार्यों के परिणामों के बारे में विचार करना चाहिए।



सूरए आले इमरान की आयत संख्या ५९ तथा ६० इस प्रकार है।
निःसन्देह, ईश्वर के समीप ईसा (की सृष्टि) का उदाहरण, आदम (की सृष्टि) की भांति है। ईश्वर ने उसे मिट्टी से बनाया फिर उससे कहा कि हो जा तो वह हो गया। (3:59) हे पैग़म्बर! सत्य वही है जो तुम्हारे पालनहार की ओर से है अतः संदेह करने वालों में से न हो जाना। (3:60)
 मदीना नगर के यहूदियों का एक गुट पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की सेवा में पहुंचा। अपनी बात-चीत में उस गुट के लोगों ने पैग़म्बर से, बिना पिता के हज़रत ईसा मसीह के जन्म को, उनके ईश्वर होने का प्रमाण बताया। उस समय ईश्वर की ओर से यह आयत आई जिसमें उत्तर में कहा गया कि यदि बिना पिता के हज़रत ईसा का जन्म उनके ईश्वर होने का प्रमाण है तो हज़रत आदम की सृष्टि तो इससे भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वे तो बिना माता-पिता के पैदा हुए थे तो तुम लोग उन्हें ईश्वर या ईश्वर का पुत्र क्यो नहीं कहते?
 इसके पश्चात ईश्वर पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम और अन्य मुसलमानों को संबोधित करते हुए कहता है कि सत्य और ठोस बात, ईश्वर की बात है कि जो सभी वास्तविकताओं का स्रोत है और उन्हें पूर्ण रूप से जानता है। दूसरे लोगों की बातों के विपरीत जो अज्ञान व ग़लती के आधार पर बात करते हैं या साम्प्रदायिक्ता या स्वार्थ के कारण। अतः केवल ईश्वर की बात पर ध्यान दो और दूसरों की बातें ईश्वरीय वाणी में तुम्हारे संदेह का कारण न बनें।
 इन आयतों से हमने सीखा कि कुछ पैग़म्बरों की सृष्टि में जो चमत्कार हुए है या उनके हाथों से जो चमत्कार हुए हैं वे ईश्वर की शक्ति के चिन्ह हैं न कि मनुष्यों के ईश्वर होने के।
 सत्य व सत्यता केवल ईश्वरीय क़ानूनों में ही मिलती है अतः यदि हमें सत्य की खोज है तो हमें ईश्वरीय क़ानूनों का अनुसरण करना चाहिए।

सूरए आले इमरान; आयतें ६१-६४
सूरए आले इमरान की आयत संख्या ६१ इस प्रकार है।
तो (हे पैग़म्बर) जो कोई भी (ईश्वरीय संदेश वहि द्वारा) तुम्हारे पास आने वाले ज्ञान के पश्चात तुमसे (ईसा मसीह के बारे में) बहस और विवाद करे तो उससे कह दो कि हम अपने पुत्रों को लाएं और तुम अपने पुत्रों को, हम अपनी स्त्रियों को लाएं, तुम अपनी स्त्रियों को लाओ, हम अपने आत्मीय लोगों को और तुम अपने आत्मीय लोगों को लाओ तो फिर हम ईश्वर के समक्ष प्रार्थना करें और एक-दूसरे को अभिशाप करें तथा झूठ बोलने वालों के लिए ईश्वरीय लानत अर्थात अभिशाप निर्धारित करें। (3:61)
 इतिहास में वर्णित है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने यमन के नजरान क्षेत्र में इस्लाम के प्रचार के लिए एक गुट भेजा था। इसके जवाब में नजरान के ईसाइयों ने पैग़म्बर से वार्ता के लिए एक गुट मदीना नगर भेजा। उस गुट ने हज़रत ईसा मसीह के बारे में पैग़म्बरे इस्लाम की बातें स्वीकार नहीं कीं। ईश्वर के आदेश पर पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम उनसे मुबाहेला करने अर्थात सत्य की पहचना के लिए एक दूसरे पर ईश्वर की ओर से लानत भेजने के लिए तैयार हुए। आपने उन ईसाइयों से कहा कि तुम अपने बच्चों, स्त्रियों और सबसे अधिक आत्मीय लोगों का एक गुट लाओ और हम भी ऐसा ही करेंगे उसके पश्चात एक स्थान पर एकत्रित होकर ईश्वर से प्रार्थना करेंगे कि हम दोनों में से जो भी गुट सत्य पर नहीं है उसे तू अपनी दया व कृपा से दूर कर दे और उसे इसी समय दंडित कर।
 नजरान के ईसाइयों ने जब पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का यह प्रस्ताव सुना तो उनसे इस बारे में निर्णय करने हेतु आपस में परामर्श करने के लिए कुछ समय मांगा। ईसाइयत के बड़े-बड़े महत्वपूर्ण लोगों ने उनसे कहा कि यह प्रस्ताव स्वीकार कर लो किंतु यदि तुम यह देखो कि पैग़म्बरे इस्लाम भारी भीड़ लाने के स्थान पर अपने प्रियजनों का एक छोटा सा गुट ला रहे हैं तो फिर उनसे मुबाहेला न करना बल्कि किसी भी प्रकार से उनसे संधि कर लेना।
 मुबाहेला के निए निश्चित किया गया दिन आ गया। ईसाइयों ने देखा कि पैग़म्बर सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम अपने साथ केवल चार लोगों को ही लाए हैं। उनकी पुत्री फ़ातेमा, उनके दामाद अली इब्ने अबी तालिब और उन दोनों के दो पुत्र हसन और हुसैन। ईसाई गुट के नेता ने कहा कि मैं ऐसे चेहरों को देख रहा हूं जो यदि प्रार्थना करें तो पहाड़ अपने स्थान से हट जाएं और यदि हमें शाप दें तो हमसे से एक व्यक्ति भी बाक़ी नहीं बचेगा। अतः ईसाइयों ने मुबाहेला करने से इन्कार कर दिया।
 इस आयत से हमने सीखा कि प्रश्न का ठोस तथा तर्कपूर्ण उत्तर देना चाहिए परन्तु सत्य के मुक़ाबले में हठधर्मी, शत्रुता और द्वेष का उत्तर ईश्वरीय कोप के अतिरिक्त कुछ नहीं होता है।
 हम यदि ईश्वरीय धर्म में आस्था रखते हैं तो हमें डट कर खड़े रहना चाहिए और जानना चाहिए कि असत्य पर होने के कारण शत्रु अवश्य पीछे हटेगा। पैग़म्बर के परिजनों की प्रार्थना भी, पैग़म्बर की भी भांति अवश्य ही स्वीकार होती है। पैग़म्बर ने अपने व्यवहार द्वारा हज़रत हसन और हजरत हुसैन को अपने पुत्र और हज़रत अली अलैहिस्सलाम को अपनी आत्मा बताया।
 अपनी सामान्य योग्यताओं को प्रयोग करने के पश्चात ईश्वर से सहायता मांगनी चाहिए। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने पहले प्रचार और वार्ता की और उसके बाद मुबाहेला तथा प्रार्थना के लिए हाथ उठाए।



सूरए आले इमरान की आयत संख्या ६२ तथा ६३ इस प्रकार है।
निःसन्देह (ईसा मसीह के जीवन) की सच्ची कहानी यही है और ईश्वर के अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं है और निःसन्देह, ईश्वर प्रभुत्वशाली और तत्वदर्शी है। (3:62) फिर यदि वे लोग सत्य की ओर से मुंह मोड़ लें तो जान लो कि ईश्वर बुरे कर्म करने वालों को भलि भांति जानने वाला है। (3:63)
 मुबाहेला की घटना के पश्चात ईश्वर अपने पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम से कहता है कि ईसा मसीह के बारे में हमने जो कुछ तुम्हें बताया है वही उनके जीवन की सच्ची कहानी है जिसे ईश्वर के अतिरिक्त कोई भी पूर्ण रूप से नहीं जानता। और जो लोग ईसा मसीह के बारे में यह सोचते हैं कि वे ईश्वर के पुत्र हैं तो यह झूठ के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है क्योंकि ईश्वर के अतरिक्त कोई भी पूज्य नहीं है तो जो लोग सत्य स्वीकार नहीं करते वे जान लें कि ईश्वर उनके कर्मों को और उनको दिये जाने वाले दण्ड से भलि भांति अवगत है।
 लोगों के बीच जो कहानियां प्रचलित हैं वे मूल रूप से दो ही प्रकार की होती हैं। प्रथम एसी कहानियां जो पूर्ण रूप से काल्पनिक होती हैं तथा उनका सत्य से कोई लेना-देना नहीं होता है। ऐसी कहानियां केवल एक कहानीकार की काल्पनिक शक्ति का ही परिणाम होती हैं। दूसरी वे कहानियां हैं जो इतिहास के आधार पर लिखी गई हैं किंतु उन्हें रोचक बनाने के लिए कुछ झूठी बातें भी उनमें मिला दी गई हैं।
 पवित्र क़ुरआन के क़िस्से वास्तविकता के आधार पर हैं न कि कल्पना के आधार पर और दूसरे यह सारे क़िस्से सत्य हैं और इन्हें वास्तविकता स्पष्ट करने के लिए बयान किया गया है अतः इनमें कमी-बेशी नहीं है।
 इन आयतों से हमे यह पता चलता है कि यदि क़ुरआन न होता तो हम हज़रत ईसा मसीह और अनेक पैग़म्बरों तथा राष्ट्रों के वास्तविक स्वरूप से अवगत नहीं हो पाते।
 सत्य को स्वीकार न करना और उससे द्वेष रखना, बुराई का एक उदाहरण है जो मनुष्य तथा समाज को पतन की ओर ले जाता है।
 इस बात पर यदि हम ध्यान दें ध्यान दें कि ईश्वर हमारे सभी कर्मों को देख रहा है तो हम अपने कार्यों के प्रति सचेत हो जाएंगे।



सूरए आले इमरान की आयत संख्या ६४ इस प्रकार है।
(हे पैग़म्बर!) कह दो कि हे (आसमानी) किताब वालो! उस बात की ओर आओ जो हमारे और तुम्हारे बीच समान रूप से मान्य है। यह कि हम ईश्वर के अतिरिक्त किसी और की उपासना न करें और किसी को उसका समकक्ष न ठहराएं और हम में से कुछ, कुछ दूसरों को ईश्वर के स्थान पर पालनहार न मानें। तो यदि उन्होंने इस प्रस्ताव को स्वीकार न किया तो (हे मुसलमानो!) कह दो कि गवाह रहो कि हम मुस्लिम और ईश्वर के प्रति समर्पित हैं। (3:64)
 पिछली आयतों में क़ुरआन ने पहले तो ईसाइयों को तर्क के आधार पर इस्लाम स्वीकार करने का निमंत्रण दिया था परन्तु जब उन्होंने स्वीकार नहीं किया तो उन्हें मुबाहेला करने को कहा गया लेकिन वे लोग मुबाहेला करने के लिए भी तैयार नहीं हुए। इस आयत में ईश्वर अपने पैग़म्बर से कहता है कि उनसे कहो कि यदि तुम इस्लाम स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हो तो आओ कम से कम अपनी संयुक्त आस्थाओं और विश्वासों पर हम एकता कर लें और कुफ़ तथा अनेकेश्वरवाद का मुक़ाबला मिलकर करें। यद्यपि तुम तस्लीस अर्थात तीन ईश्वरों पर विश्वास रखते हो परन्तु उनमें तुम एकेश्वरवाद से कोई अंतर नहीं देखते अतः तुम तस्लीस में एकता को मानते हो अतः आओ और एक संयुक्त विश्वास के रूप में एकेश्वरवाद को आधार मान कर हम एकत्रित हो जाएं और उसे ग़लत व्याख्यानों से दूर रखें जिनका परिणाम अनेकेश्वरवाद है।
 ईसाइयों के कुछ विद्वान ईश्वर द्वारा हराम या हलाल बातों का आदेश अपनी ओर से परिवर्तित कर देते थे, जबकि इसका अधिकार तो केवल ईश्वर को ही है। अतः क़ुरआन कहता है कि आओ ऐसे लोगों का अनुसरण न करो जो क़ानून बनाने में स्वयं को ईश्वर का शरीक या समकक्ष समझते हैं। अंत में यह आयत मुसलमानों को संबोधित करते हुए कहती है कि यदि तुमने ईश्वरीय धर्म वालों को एकता का आहृवान किया और उन्होंने उसे स्वीकार न किया तो तुम लोग ढ़ीले मत पड़ जाओ और दृढ़तापूर्वक घोषणा करो कि हम केवल ईश्वर के प्रति समर्पित हैं और तुम्हारा इन्कार ईश्वर की उपासना में हम पर कोई प्रभाव नहीं डालेगा।
 इस आयत से हमने सीखा कि क़ुरआन हमें संयुक्त विश्वासों के आधार पर ईश्वरीय किताब रखने वालों से एकता का निमंत्रण देता है अतः मुसलमानों के बीच किसी भी प्रकार का मतभेद उत्पन्न करना इस्लाम तथा क़ुरआन के विरुद्ध है।
 सभी मनुष्य बराबर हैं और किसी को भी दूसरे पर शासन करने का अधिकार प्राप्त नहीं है सिवाए ईश्वर के आदेश के।
 आसमानी किताब वालों को इस्लाम का निमंत्रण देने में मुसलमानों को पहल करनी चाहिए और इस मार्ग में यदि वे अपने सही लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकते तो कुछ थोड़े ही लक्ष्य प्राप्त करने के प्रयास में उन्हें कमी नहीं करनी चाहिए।


सूरए आले इमरान की आयत संख्या ६५ तथा ६६ इस प्रकार है।

हे (आसमानी) किताब के मानने वालो! तुम लोग इब्राहीम के बारे में क्यों विवाद करते हो? (और उन्हें अपनी-अपनी किताब का अनुसरणकर्ता कहते हो) जबकि तुम जानते हो कि तौरेत और इंजील उनके बाद उतारी गई हैं, क्या तुम चिन्तन नहीं करते? (3:65) तुम वही लोग तो हो कि (हज़रत ईसा और) जो कुछ (उनके जन्म व जीवन से संबंधित था उसके बारे में) ज्ञान होने के बावजूद तुमने आपस में विवाद किया। तो अब (इब्राहीम और) उस चीज़ के बारे में क्यों लड़ते हो जिसके बारे में तुम्हें ज्ञान नहीं है जबकि ईश्वर जानता है और तुम नहीं जानते। (3:66)
 पूरे इतिहास में सदैव ही ईश्वरीय धर्मों के मानने वालों के बीच अपनी सत्यता को लेकर विवाद और झगड़ा रहा है। यद्यपि सारे पैग़म्बर एक ही ईश्वर की ओर से आए हैं और उनकी किताबें एक दूसरे से समन्वित हैं परन्तु जातीय या धार्मिक साम्प्रदायिकता इस बात का कारण बनी है कि कुछ ईमान वाले, तर्क द्वारा लोगों को ईश्वरीय धर्म की ओर आमंत्रित करने के स्थान पर निराधार और बेकार बातों पर लड़ें-झगड़ें।
 हज़रत ईसा मसीह अलैहिस्सलाम के आने के पश्चात, हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के अनुयाइयों का कर्तव्य था कि वे उनका अनुसरण करें परन्तु उन्होंने घमण्ड और सामंप्रादायिक्ता के आधार पर इस बात को स्वीकार नहीं किया। यहां तक कि उन्होंने हज़रत इब्राहीम को भी जो हज़रत मूसा से पूर्व थे, अपने धर्म का अनुयायी बताया जबकि इतिहास की दृष्टि से यह बात कदापि स्वीकार्य नहीं है अतः ईश्वर इसाइयों और यहूदियों को संबोधित करते हुए कहता है कि तुम्हारे इस धार्मिक विवाद का स्रोत जातीय द्वेष व हठधर्मी है क्योंकि तुमने ईसा मसीह के जीवन व जन्म के बारे में ज्ञान रखने के बाद भी एक दूसरे से बहस की और अब तुम हज़रत इब्राहीम के बारे में बहस कर रहे हो जिनके धर्म के बारे में तुम्हें कुछ भी पता नहीं है। जब तुम ज्ञान व स्पष्ट बातों से सहमत नहीं हो सकते तो ऐसे मामले में क्यों पड़ते हो जिसके बारे में तुम्हें कुछ भी पता नहीं है।
 इन आयतों से हमने सीखा कि धर्म की सत्यता, तर्क व बौद्धिक प्रमाणों द्वारा सिद्ध करनी चाहिए न कि उसके व्यक्ति विशेष से संबन्धित होने या अन्य धर्मों से प्राचीन होने के आधार पर।
 वह बहस और वार्ता लाभदाय है जो सत्य तक पहुंचने के उद्देश्य से हो अन्यथा वह मतभेद का कारण बनती है।



सूरए आले इमरान की आयत संख्या ६७ और ६८ आयत इस प्रकार है।
इब्राहीम न तो यहूदी थे और न ही ईसाई बल्कि वे तो सत्यप्रेमी और ईश्वर के प्रति समर्पित रहने वाले थे तथा कदापि अनेकेश्वरवादी न थे। (3:67) निःसन्देह हज़रत इब्राहीम के सबसे अधिक निकट वे लोग हैं जिन्होंने उनका अनुसरण किया और यह पैग़म्बर तथा ईमान वाले लोग। और ईश्वर ईमान लाने वालों का संरक्षक तथा मित्र है। (3:68)

 इस आयत में हज़रत इब्राहीम को सत्यप्रेमी तथा वास्तविकता का खोजी बताया गया है जो हर प्रकार के अनेकेश्वरवाद से दूर तथा ईश्वर के प्रति समर्पित है। इस प्रकार से यह आयत इस बात की ओर संकेत करती है कि ईसा तथा मूसा के अनुयाइयों तुम लोग भी धार्मिक सांप्रदायिक्ता के स्थान पर सत्य और वास्तिवक्ता की खोज में रहो और केवल स्य के प्रति समर्पति न रहो। तुम्हारे बीच मतभेद का स्रोत अंहकार है न कि ईश्वर की उपासना, यह सबसे बड़ा अनेकेश्वरवाद है।
 तुम स्वयं को यदि हज़रत इब्राहीम के समीप करना चाहते हो ताकि उनकी लोकप्रियता से अपने धर्म का प्रचार कर सको तो जान लो कि धर्म का पालन केवल ज़बान और दावे से नहीं होता। हज़रत इब्राहीम से सबसे निकट व्यक्ति वह है जो उनकी प्रिय पद्धति का अनुसरण करे और उसे व्यावहारिक बनाए। जैसे कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम व उनके साथी थे। उन्होंने हज़रत इब्राहीम को अपने धर्म का अनुसरणकर्ता समझने के बजाए स्वयं को उनका अनुयाई बताया।
 वैचारिक तथा धार्मिक रिश्ते, जातीय और सांसारिक रिश्तों पर वरीयता रखते हैं। एकसमान विचार रखने वाले लोगों का चाहे आपस में कोई रिश्ता न हो परन्तु फिर भी वे आपस में उन लोगों के मुक़ाबले अधिक समीप हैं जो रिश्तेदार तो होते हैं परन्तु समान विचार व विश्वास नहीं रखते।
 नेता व अनुयायी का एक ही जाति से होना आवश्यक नहीं है। ईमान का आधार, विचारधारा है न कि भाषा व जाति। जैसा कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने सलमान फ़ारसी के बारे में, जो अरब मूल के नहीं थे, कहा है कि सलमान हम में से हैं।



सूरए आले इमरान की आयत संख्या ६९, ७० तथा ७१ इस प्रकार है।
आसमानी किताब वालों का एक गुट इच्छा करता है कि काश तुम लोगों को पथभ्रष्ट कर सकता। जबकि वे अपने आप के अतिरिक्त किसी और को भटका नहीं रहे हैं परन्तु वे (यह बात) नहीं समझते हैं। (3:69) (हे पैग़म्बर! उन लोगों से कह दो) हे किताब वालों, क्यों ईश्वर की आयतों (तथा पैग़म्बरे इस्लाम के ईश्वरीय दूत होने की निशानियों) का इन्कार करते हो जबकि तुम स्वयं (उसके सही होने की) गवाही देते हो। (3:70) हे किताब वालो! क्यों जान-बूझ कर सत्य को असत्य से गड-मड करते हो और जानने के बावजूद सत्य को छिपाते हो? (3:71)
 यह आयतें धर्म और सत्य के शत्रुओं के मन और सोच पर से पर्दा उठाते हुए कहती हैं कि जो लोग स्वयं को ईश्वर का उपासक व ईश्वरीय किताब रखने वाला कहते हैं उनका एक गुट यह इच्छा रखता है कि तुम मुसलमानों को भी अपनी ही भांति पथभ्रष्ट कर दें। वे लोग यह जानने के बाद भी कि उन्हें पैग़म्बरे इस्लाम के आने के पश्चात, कि जिनकी निशानियों को स्वयं उन्होंने तौरेत तथा इंजील में पढ़ा है, उनपर ईमान लाकर इस्लाम को स्वीकार करना चाहिए परन्तु जातीय व धार्मिक द्वेष इस बात का कारण बनता है कि वे केवल न यह कि असत्य पर बाक़ी रहते हैं बल्कि उन वास्तविकताओं को भी छिपाते हैं जनका उन्हें ज्ञान है या उन्हें इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं कि लोग उनके असत्य की ओर न जाएं। अतः यह आयत मुसलमानों के लिए एक चेतावनी है कि अन्य धर्म के लोगों के साथ संपर्क में वे उनके साथ न मिल जाएं तथा मुसलमानों को पथभ्रष्ट करने के उनके कार्यक्रमों व उद्देश्यों से अवगत रहें।
 इन आयतों से हमने सीखा कि शत्रु की पहचान व उसके षड्यंत्रों का ज्ञान संभावित ख़तरों से बचे रहने का कारण बनता है। हमें सदैव सतर्क रहना चाहिए तथा अपने युवाओं को पथभ्रष्ट लोगों से मिलने से रोकना चाहिए।
 जो लोग दूसरों को पथभ्रष्ट करने का प्रयास करते हैं वे सबसे पहले अपनी पथभ्रष्टता में सहायता करते हैं क्योंकि द्वेष, कपट और छल का परिणाम, पथभ्रष्टता के अतिरिक्त कुछ नहीं निकलता।
 ईमान वाले व्यक्ति को सदैव असत्य से सत्य को अलग पहचानने का प्रयास करना चाहिए ताकि शत्रु, मामले को उसके लिए संदिग्ध बनाकर अपनी इच्छाएं पूरी न कर सके।

सूरए आले इमरान की आयत संख्या ७२ इस प्रकार है।
आसमानी किताबें रखने वालों में से एक गुट ने (आपस में ) कहा, जो कुछ मुसलमानों पर उतारा गया है, उसपर दिन के आरंभ में ईमान ले आओ और दिन के अंत में उसका इन्कार कर दो, शायद (इसी हथकण्डे से) वे लोग (इस्लाम से) पलट जाएं। (3:72)
 पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि काफ़िरों ने मुसलमानों के ईमान को दुर्बल बनाने के लिए विभिन्न षड्यंत्र रचे थे जिनमें सबसे महत्वपूर्ण असत्य को सत्य के साथ मिलाकर सत्य को संदिग्ध बनाना था। यह आयत शत्रुओं के एक अन्य षडयंत्र का पर्दा चाक करते हुए कहती है कि काफ़िरों के नेता अपने कुछ अनुयाइयों को आदेश देते हैं कि वे, लोगों को धोखा देते हुए दिखावे के लिए क़ुरआन व पैग़म्बरे इस्लाम के अनुयायी के रूप में स्वयं को परिचित कराएं और इस प्रकार मुसलमानों के बीच अपना प्रभाव बना लें। जब कुछ अवधि बीत जाए तो इस्लाम को छोड़ दें और ईमान वालों से कहें कि हमसे ग़लती हो गई थी, हमारा धर्म तो तुम्हारे धर्म से बेहतर है अतः हम उसी की ओर वापस पलट रहे हैं। स्वभाविक है कि यह बात मुसलमानों की भावना को कमज़ोर बनाएगी और वे अपने धर्म की सत्यता के बारे में संदेह करने लगेंगे। इसके अतिरिक्त अन्य काफ़रों को भी मुसलमान होने की प्रेरणा नहीं मिलेगी।
 इस आयत से हमने सीखा कि मुसलमानों को भोला नहीं होना चाहिए और शीघ्र ही किसी की बात पर भरोसा नहीं करना चाहिए बल्कि होशियार होना चाहिए ताकि मिथ्याचारी उन्हें धोखा न दे सकें।
 शत्रु न केवल यह कि मुसलमानों के काफ़िर होने की लालसा रखाता है बल्कि अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए सदैव षडयंत्र रचता रहता है अतः मुसलमानों को भी शत्रु के सांस्कृतिक हो-हल्ले का मुक़ाबला करने के लिए सदैव ही तैयार रहना चाहिए।



सूरए आले इमरान की आयत संख्या ७३ और ७४ इस प्रकार है।
(आसमानी किताब रखने वाले नेताओं ने अपने अनुयाइयों से कहा) उन लोगों के अतिरिक्त किसी पर भरोसा न करो जो तुम्हारे धर्म के अनुयाई हैं। वे लोग कहते हैं कि कहीं ऐसा न हो कि जैसी चीज़ तुम्हें दी गई है वैसी ही किसी और को भी दे दी जाए या वे तुमसे तुम्हारे पालनहार के समक्ष तर्क दे सकें। (हे पैग़म्बर!) कह दो कि कृपा तो केवल ईश्वर के ही हाथ में है। वह जिसे चाहता है प्रदान कर देता है और ईश्वर बहुत समाई वाला तथा जानने वाला है। (3:73) वह जिसे चाहता है अपनी दया के लिए विशेष कर देता है और ईश्वर महान कृपा का अधिकारी है। (3:74)
 पिछली आयत की व्याख्या में हमने देखा कि यहदियों के नेताओं ने यह षड्यंत्र रचा कि मुसलमानों में ईमान को कमज़ोर करने के लिए वे पहले तो पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम पर ईमान ले आएं और फिर उनका इन्कार कर दें। यह आयत उनके षड्यंत्र को इस प्रकार स्पष्ट करती है कि उन्होंने एक दूसरे से कहा कि यह षड्यंत्र पूर्ण रूप से गोपनीय रहे और इस संबंध में हमें केवल अपने धर्म वालों पर ही विश्वास रखना चाहिए। यहां तक कि अन्य अनेकेश्वरवादियों को भी इसकी भनक नहीं पड़ने देना चाहिए नहीं तो यह रहस्य फाश हो जाएगा। परन्तु ईश्वर ने इन आयतों में उनको अपमानित किया और अपने पैग़म्बर को आदेश दिया कि उनसे कह दें कि मार्गदर्शन केवल ईश्वर की ओर से है तथा किसी विशेष मूल या जाति तक सीमित नहीं है। इसके अतिरिक्त जिन लोगों को ईश्वर का मार्गदर्शन प्राप्त हो गया है उनपर इन षड्यंत्रों का कोई प्रभाव नहीं होने वाला है अतः बेकार में प्रयास मत करो।
 यह आयत यहूदियों के नेताओं के कथनों को इस प्रकार से उद्धरित करती है कि उन्होंने कहा कि यह मत सोचो कि किसी को वह गौरव और आसमानी किताब प्राप्त हो जाएगी जो तुम्हारे पास है, या कोई प्रलय के दिन ईश्वर के समक्ष तुमसे बहस करके, तुमसे जीत जाएगा। तुम संसार की सबसे श्रेष्ठ जाति व मूल के हो, तथा सर्वश्रेष्ठ ईश्वरीय प्रतिनिधत्व व बुद्वि तुम्हारे पास है।
 इन निराधार बातों के उत्तर में ईश्वर कहता है कि सभी विभूतियों एवं अनुकंपाएं, चाहे वह ईश्वरीय प्रतिनिधित्य हो या तर्क प्रस्तुत करने की बौद्धिक शक्ति हो सब की सब ईश्वर की ओर से है और वह इन्हे उसको देता है जिसमें योग्यता व क्षमता होती है। उसकी अनुकंपा व्यापक है, क्योंकि वह सबकी योग्यताओं और क्षमताओं से भलि भांति अवेत है अतः तुम लोग बेकार में धार्मिक द्वेष न रखो और ईश्वर पर केवल अपना अधिकार मत समझो।
 इन आयतों से हमने यह सीखा कि ईश्वरीय विभूतियां व अनुकंपाएं किसी भी विशेष गुट तक सीमित नहीं हैं। जो भी योग्यता रखता हो और उनके लिए प्रयास करे वह उन्हें प्राप्त कर सकता है।
 आसमानी किताब रखने वालों के नेता अपने अनुयाइयों को इस्लाम की ओर रुझान से चिन्तित हैं अतः वे इससे बचाव के लिए सदैव योजना बनाते रहते हैं।



सूरए आले इमरान की आयत संख्या ७५ और ७६ इस प्रकार है।
आसमानी किताब वालों में ऐसे लोग भी हैं कि यदि तुम धन-दौलत का एक ढेर भी उनकी अमानत में दे दो तो वे तुम्हारे (मांगते ही) उसे तुम्हें लौटा देंगे और उनमें से ऐसे भी हैं यदि एक दीनार भी उनकी अमानत में दे दो तो वे उसे तुम्हें नहीं लौटाएंगे सिवाए इसके कि तुम निरंतर उसका तक़ाज़ा करते रहो। यह (विश्वासघात) इसलिए है कि वे कहते हैं कि जिनके पास आसमानी किताब नहीं है उनके साथ हम जो भी करें हम पर कोई पाप नहीं है। वे जान-बूझ कर ईश्वर पर झूठ बांधते हैं। (3:75) हां! जो लोग अपनी प्रतिज्ञा और वादे को पूरा करें और ईश्वर से डरते रहें तो निःसन्देह ईश्वर अपना भय रखने वालों से प्रेम करता है। (3:76)
 यह आयत मुसलमानों को अपने विरोधियों के साथ भी न्याय के साथ काम लेने की सीख देते हुए कहती है कि आसमानी किताब रखने वालों के बीच भी भले और अमानतदार लोग मौजूद हैं जिनके पास तुम जो चीज़ भी रखोगे उसे वे तुम्हें लौटा देंगे। परन्तु विशिष्टता प्राप्ति व साम्प्रदायिकता की विचारधार इस बात का कारण बनती है कि कुछ लोग यह विचार करें कि ग़ैर यहूदियों की संपत्ति का कोई सम्मान नहीं है और यहूदी, दूसरों को अमानत स्वयं रख सकते हैं।
 विचित्र बात यह है कि इस ग़लत विचारधार को उनके यहां धार्मिक रंग दे दिया गया था और वे कहते थे कि ईश्वर ने उन्हें अनुमति दी है कि वे ग़ैर यहूदियों का माल हड़प सकते हैं।
 आगे चलकर क़ुरआन कहता है कि मुसलमानों को अपना अधिकार प्राप्त करने में ढिलाई नहीं बरतनी चाहिए बल्कि उन्हें अतिग्रहणकारी के मुक़ाबले में डट जाना तथा शक्ति का प्रयोग करके उससे अपना अधिकार लेना चाहिए। आज भी जातिवादी यहूदियों ने फ़िलिस्तीन का अतिग्रहण करके इस्राईल नामक एक शासन बना लिया है। वे किसी भी मानवीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय क़ानून पर प्रतिबद्ध नहीं हैं और प्रतिदिन इस्लामी देशों की नई भूमियों को हड़पने का प्रयास करते रहते हैं अतः मुसलमानों को चाहिए कि वे अपने अधिकार को प्राप्त करने के लिए संघर्ष करें और ज़ायोनियों को उनके सही स्थान पर पहुंचा दें।
 इन आयतों से हमने यह सीखा कि हमें अपने शत्रु के बारे में भी न्याय करना चाहिए और सबको विश्वासघाती या बुरा नहीं समझना चाहिए।
 अमानतदारी अच्छी आदत है चाहे वह शत्रु के पास ही क्यों न हो और विश्वासघात बुरा है चाहे वह शत्रु के साथ ही क्यों न किया जाए।
 पाप करने से भी बुरा कार्य उस पाप का औचित्य दर्शाना है। यहूदी, लोगों का माल हड़प जाया करते थे। वे अपने इस घृणित कार्य को ईश्वर से जोड़कर उसका औचित्य दर्शाते थे।
 अमानतदारी तथा व्यक्तिगत व सामाजिक प्रतिज्ञाओं और वादों का सम्मान मनुष्य की पवित्रता व ईश्वर से उसके भय की निशानी है जो ईश्वर की दृष्टि में उसे प्रिय बनाने का कारण है।

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