कुरान तर्जुमा और तफसीर -सूरए आले इमरान 3:187-200

सूरए आले इमरान की आयत नंबर 187  और जब ईश्वर ने (विद्वानों से और) जिन्हें (आसमानी) किताब दी गई थी, यह वचन लिया कि लोगों के लिए (किताब की ...

सूरए आले इमरान की आयत नंबर 187 
और जब ईश्वर ने (विद्वानों से और) जिन्हें (आसमानी) किताब दी गई थी, यह वचन लिया कि लोगों के लिए (किताब की आयतों को) स्पष्ट करो और उसे न छिपाओ तो उन्होंने उस वचन को पीठ पीछे डाल दिया (अर्थात उसकी परवाह नहीं की) और उसे सस्ते दामों बेच दिया तो उन्होंने कितनी बुरी वस्तु ख़रीदी। (3:187)

हर जाति व समुदाय में आम लोग, जो साधारण स्तर के होते हैं, अपने जीवन के मार्ग और धार्मिक आचरण के चयन में अपने विद्वानों और नेताओं का अनुसरण करते हैं अतः भले विद्वान समाज के सुधार का भ्रष्ठ विद्वान समाज की भ्रष्टता का कारण बनते हैं।
विद्वानों, विचारकों और धार्मिक वास्तविकताओं के ज्ञानियों पर ईश्वर ने जो दायित्व डाले हैं उनमें से एक लोगों को वास्तविकताओं से अवगत कराना है। विद्वान न केवल अपने को बल्कि समाज को भी सुधारने के उत्तरदायी हैं अतः ईश्वरीय निशानियों को छिपाना, जिन्हें केवल विद्वान ही समझ सकते हैं, क़ुरआन की दृष्टि में सबसे बड़े पापों में से एक है।
जैसा कि देखा जा रहा है, आजकल ईसाइयों और यहूदियों के विद्वान तौरैत व इंजील में दर्ज पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के आगमन की शुभ सूचना के बारे में चुप्पी साधे हुए हैं और लोगों को वास्तविकता से अवगत नहीं कराते बल्कि वे अपने पद व स्थान की रक्षा के लिए आसमानी किताब की आयतों पर थोड़े से सांसारिक माल से समझौता करने पर तैयार हो जाते हैं।
इस आयत से हमने सीखा कि न केवल यह कि अनुचित बात बल्कि अनुचित मौन पर भी दंड दिया जाएगा। वास्तविकता को छिपाना ऐसा पाप है जिसका ख़तरा हर जाति के विद्वानों को लगा रहता है और इसके परिणाम कभी कभी शताब्दियों तक बाक़ी रहते हैं।
विद्वानों व ज्ञानी लोगों के मार्गदर्शन व ज्ञान के प्रति ज़िम्मेदार हैं।
संसार का मोह रखने वाले विद्वान, समाज की भलाई के स्थान पर उसके पतन या पथभ्रष्टता का कारण बनते हैं।




 सूरए आले इमरान की आयत नंबर 188 की तिलावत सुनें।
कदापि यह न सोचो कि जो लोग अपने किए पर प्रसन्न होते हैं और यह चाहते हैं कि जो कुछ उन्होंने नहीं किया है उस पर उनकी प्रशंसा की जाए तो कदापि यह न सोचो कि उन्हें दंड से मुक्ति मिल जाएगी बल्कि उनके लिए कड़ा दंड है। (3:188)
संसार में तीन प्रकार के लोग होते हैं। एक गुट ऐसे लोगों का है जो काम करते हैं और यह नहीं सोचते कि ईश्वर के अतिरिक्त कोई और जाने, यहां तक कि दान-दक्षिणा करते समय भी वे नहीं चाहते कि कोई उन्हें पहचाने। दूसरा गुट ऐसे लोगों का है जो अपनी प्रशंसा करवाने के लिए भले कर्म करते हैं, ऐसे लोग दिखावा करने वाले हैं। तीसरा गुट ऐसे लोगों का है जो बिना कुछ किए ही प्रशंसा प्राप्त करना चाहते हैं या दूसरों के कामों को अपने करवाना चाहते हैं। यह गुट जिसकी ओर आयत संकेत करती है, उन अनपढ़ लोगों की भांति है जो यह चाहते हैं कि लोग उन्हें विद्वान समझें या उन डरपोकों की भांति है जो स्वयं को वीर समझ कर प्रसन्न होते हैं। चूंकि इस प्रकार के व्यवहार का आधार धोखा व कपट होता है अतः ऐसे लोगों को कदापि कल्याण प्राप्त नहीं हो सकेगा।
इस आयत से हमने सीखा कि बिना काम किए प्रशंसा की आशा रखना बेकार है जो मनुष्य के पतन का मार्ग प्रशस्त करता है।
बिना कर्म के प्रशंसा की आशा रखने से अधिक ख़तरनाक, लोगों का यह दृष्टिकोण है कि वे सोचते हैं कि बड़ी-बड़ी उपाधियों वाले परंतु अंदर से ख़ाली लोग जो उन पर शासन करते हैं, मोक्ष व कल्याण प्राप्त कर लेंगे।
हर प्रकार की चापलूसी वर्जित है क्योंकि इसके कारण बिना कर्म के प्रशंसा प्राप्त करने की भावना फैलती है।
संभव है कि पापी अपने पाप पर लज्जित हो और तौबा कर ले परंतु घमंडी लोग तौबा भी नहीं करते अतः उनकी मुक्ति की कोई संभावना नहीं है।




 सूरए आले इमरान की आयत नंबर 189 और 190
आकाशों और धरती का शासन ईश्वर के लिए विशेष है और ईश्वर हर बात में सक्षम है। (3:189) निःसंदेह आकाशों और धरती की सृष्टि तथा रात-दिन के आने जाने में बुद्धिमानों के लिए (ईश्वर की स्पष्ट) निशानियां हैं। (3:190)
क़ुरआन की विशेषताओं में से एक मनुष्य को सृष्टि व प्रकृति में विचार करने के लिए निमंत्रण देना है। यद्यपि हर वह व्यक्ति जो क़ुरआने मजीद पर विश्वास रखता है, वास्तव में ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करता है परंतु वह ईमान मूल्यवान है जो ज्ञान व ईश्वर की सही पहचान के आधार पर हो। एक मुसलमान व्यक्ति को न केवल धरती बल्कि आकाश के बारे में भी यह सोचना चाहिए और सृष्टि की आश्चर्यजनक व्यवस्था के बारे में भी विचार करना चाहिए।
संसार व सृष्टि की सबसे सरल व आम बात, यहां तक कि रात व दिन के आने जाने को भी महत्वहीन नहीं समझना चाहिए बल्कि साल भर में घंटों का परिवर्तन व रात-दिन का सुव्यवस्थित ढंग से आना जाना भी मनुष्य के लिए ईश्वर को समझने का एक पाठ है। इस मार्ग से वह ईश्वर की अनंत शक्ति को भी समझ सकता है और यह भी जान सकता है कि इस संसार पर ईश्वर के अतिरिक्त किसी का भी शासन नहीं है।
क़ुरआने मजीद की व्याख्या की पुस्तकों में वर्णित है कि एक रात पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम अपने घर में आराम कर रहे थे। अभी वे लेटे ही थे कि उठ खड़े हुए और वुज़ू करके नमाज़ पढ़ने लगे। नमाज़ में वे इतना रोए कि उनका वस्त्र और धरती आंसुओं से गीली हो गई। जब उनसे इतना अधिक रोने का कारण पूछा गया तो उन्होंने कहा कि कल रात मुझ पर कुछ आयतें उतरीं जिनमें सृष्टि पर विचार का निमंत्रण दिया गया था। कितना बुरा हाल होगा उसका जो इन आयतों को पढ़े और विचार न करे। इसी कारण अत्यधिक सिफ़ारिश की गई है कि रात्रिकालीन नमाज़ से पूर्व इन आयतों को जो सूरए आले इमरान की 190 से 194 तक की आयतें हैं, पढ़ा जाए।
इन आयतों से हमने सीखा कि धरती और उससे संबंधित मामले जैसे धन और पद इत्यादि हमें लुभाएं नहीं क्योंकि धरती अपनी पूरी महानता के बावजूद आकाशों के मुक़ाबले में कुछ भी नहीं है। धरती के एक टुकड़े पर राज कहां और पूरे ब्रह्मांड पर ईश्वर का अनंत शासन कहां?
सृष्टि व उसके रहस्यों की पहचान, ईश्वर व उसकी शक्ति की गहरी पहचान की भूमिका है। भौतिक विज्ञान, ईश्वर की पहचान व लोगों के ईमान को सुदृढ़ बनाने में सहायक सिद्ध हो सकता है।
ईश्वर की पहचान के लिए सृष्टि के बारे में विचार करना बुद्धिमत्ता की और बिना रचयिता की पहचान के सृष्टि से लाभ उठाना बुद्धिहीनता की निशानी है।

सूरए आले इमरान की आयत नंबर १९१ 
बुद्धिमान लोग वे हैं जो (हर हाल में चाहे) खड़े हों, बैठे हों और लेटे हों, ईश्वर को याद करते हैं और आकाशों और धरती की सृष्टि के बारे में सोचते रहते हैं (और कहते हैं) हे हमारे पालनहार तूने इस (ब्रह्माण्ड) की सृष्टि अकारण नहीं की है, तू (बेकार व फ़ालतू कार्यों से दूर व) पवित्र है, तो हमें नरक के दण्ड से सुरक्षित रख। (3:191)
 पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि आकाश, धरती और अन्य सभी रचनाएं, ईश्वर के अस्तित्व की निशानियां हैं। यह आयत कहती है कि बुद्धिमान वे लोग हैं जो ब्रह्माण्ड की सृष्टि के बारे में चिन्तन करते हैं और रचनाओं को देखकर सृष्टि के सार्थक एवं उद्देश्यपूर्ण होने को समझते हैं और जान लेते हैं कि इस संसार का न केवल यह कि कोई रचयिता भी है बल्कि उसने एक निर्धारित कार्यक्रम व लक्ष्य के अन्तर्गत इस संसार की रचना की है।
 साधारण लोग भी जब कोई घर बनाते हैं तो उसका कोई निर्धारित लक्ष्य हुआ करता है। वे एक विशेष नक्शे और योजना के आधार पर कमरों इत्यादि का निर्माण करते हैं। तो क्या यह स्वीकार किया जा सकता है कि सृष्टि के रचयिता ने बिना किसी लक्ष्य और पूर्व योजना के इस महान ब्रह्माण्ड की रचना की है।
 और यदि हमने यह स्वीकार कर लिया कि संसार की रचना का कोई लक्ष्य व उद्देश्य है तो फिर हमें यह देखना चाहिए कि इस पूरे प्रकरण में हमारा क्या स्थान है? और इस संसार व प्रकृति से हम जो लाभ उठा रहे हैं उसके मुक़ाबले में रचयिता व संसार के प्रति हमारा दायित्व क्या है?
 क़ुरआने मजीद के अनुसार वास्तविक बुद्धिमान सदैव इन बातों पर विचार करते रहते हैं अतः वे अपनी ग़लतियों पर लज्जित होते हैं और ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वह उन्हें नरक के दण्ड से मुक्ति दिलाए।
 इस आयत से हमने सीखा कि बुद्धिमत्ता की निशानी, हर स्थिति में ईश्वर की याद करना है। वास्तव में ईश्वर के बारे में विचार करने वाले, उसको सदैव याद रखते हैं।
 उस ईमान का महत्व और मूल्य है जो सोच विचार तथा चिन्तन पर आधारित हो। इसी प्रकार से ईश्वर की वह याद मूल्यवान है जो बुद्धि व सोच के आधार पर हो।
 संसार की रचना सार्थक एवं उद्देश्यपूर्ण है और इसका सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य, ईश्वर का सामिप्य है। हम जितना भी इस लक्ष्य से दूर होते जाएंगे उतना ही नरक के समीप होते जाएंगे।



 सूरए आले इमरान की आयत नंबर १९२ 
हे हमारे पालनहार! जिसे तू नरक में डाल दे तो निःसन्देह तूने उसे अपमानित कर दिया और अत्याचारियों का कोई सहायक नहीं होगा। (3:192)
 यह आयत ईश्वरीय दण्ड के परिणामों की ओर संकेत करते हुए उन्हीं की ज़बान से कहती है कि यद्यपि नरक की आग अत्यंत कड़ी व पीड़ादायक है परन्तु बुद्धिमानों के लिए उससे भी अधिक दुख का विषय, प्रलय में अपमानित होना है कि जो भी नरक में जाएगा वह उसमें फंसेगा। आम लोग नरक की आग से डरते हैं परन्तु बुद्धिमान प्रलय के अपमान से भयभीत रहते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि पवित्र एवं भले लोगों के बीच अपमानित होना नरक की आग में जलने से भी अधिक कड़ा है।
 इस आयत से हमने सीखा कि संसार के बारे में ग़लत दृष्टिकोण रखना और उसे खिलवाड़ समझना स्वयं के ऊपर अत्याचार आध्यात्मिक पूंजी के हाथ से निकल जाने का कारण बनता है।
 प्रलय में अत्याचारियों को ईश्वर के प्रिय बंदों की सिफ़ारिश नहीं मिलेगी।

 सूरए आले इमरान की आयत नंबर १९३ और १९४ 
हे पालनहार हमने! ईमान की ओर उस पुकारने वाले की आवाज़ सुनी जो कह रहा था कि अपने पालनहार पर ईमान लाओ तो, हम ईमान ले आए। हे पालनहार! हमारे पापों को क्षमा कर और हमारी बुराइयों को छिपा दे और हमें अपने भले बंदों के साथ (इस संसार) से उठा। (3:193) हे पालनहार! तूने अपने पैग़म्बरों द्वारा हमसे जिस बात का वाद किया था उसे हमें प्रदान कर और हमें प्रलय में अपमानित न करना कि निःसन्देह तू अपने वचन को नहीं तोड़ता। (3:194)
 विद्वान न केवल यह कि अपनी बुद्धि व प्रकृति के निमंत्रण को स्वीकार करते हैं और सृष्टि पर विचार करके, ईश्वर तक पहुंच जाते हैं बल्कि ईश्वरीय पैग़म्बरों के निमंत्रण का, जो लोगों को ईश्वर पर ईमान की ओर बुलाते हैं, सकारात्मक उत्तर देते हैं और अपने ईमान को प्रकट करते हैं।
 वे अपने छोटे बड़े पापों की क्षमा चाहते हैं और अपने जीवन के भले अंत के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते हैं। वे जानते हैं कि हम अपने भले कर्मों के कारण पारितोषिक के अधिकारी नहीं हैं बल्कि चूंकि ईश्वर ने हमें पारितोषिक का वचन दिया है अतः हम ईश्वरीय दया के पात्र बन गए हैं। इसी कारण बुद्धिमान सदैव ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि अपने वादों को पूरा करे, कि अलबत्ता ईश्वर कभी भी अपने वादे को नहीं तोड़ता।
 इन आयतों से हमने यह सीखा कि सत्य स्वीकार करना, और सत्य बात सुनकर उसे स्वीकार करना बुद्धिमत्ता की निशानी है।
 अपने पापों और ग़लत कर्मों पर ध्यान देना और उनसे तौबा करना ईमान तथा बुद्धि का आवश्यक भाग है।
 भविष्य के बारे में सोचना और भले लोगों के साथ मरना, ईमान वाले बुद्धिमानों की निशानी है।




 सूरए आले इमरान की आयत नंबर १९५ 
तो उनके पालनहार ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और कहा कि निःसन्देह मैं किसी के भी कर्म को चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, व्यर्थ नहीं जाने दूंगा। तुम एक दूसरे से हो तो जिन लोगों ने पलायन किया और जिन्हें उनके घरों से निकाल दिया गया और जिन्होंने मेरे मार्ग में कठिनाइयां झेलीं और जिन्होंने युद्ध किया और मारे गए, निःसन्देह, मैं उनकी ग़लतियों को छिपाऊंगा और उन्हें ऐसे बाग़ों में प्रविष्ट करूंगा कि जिनके नीचे नहरें जारी हैं। यह ईश्वर की ओर से बदला है और ईश्वर के निकट ही सबसे भला बदला है। (3:195)
 पिछली आयतों में हमने बुद्धिमान मोमिन और ईमानदार विद्धानों की पद्धति को समझा कि वे अपने ईमान को चिन्तन व विचार पर आधारित रखते हैं और ईश्वर के निकट नतमस्तक रहते हैं तथा अपनी सामाजिक एवं व्यक्तिगत ग़लतियों की क्षमा चाहते हैं।
 इस आयत में ईश्वर ने उनकी प्रार्थनाओं का सकारात्मक उत्तर देते हुए उनकी प्रार्थनाओं को स्वीकार किया है और बुनियादी क़ानून का वर्णन किया है। यह क़ानून इस प्रकार है कि जो कोई भी इस संसार में भला कर्म करता है तो वह व्यर्थ नहीं जाता तथा नियम में महिलाओं और पुरुषों के बीच कोई अंतर नहीं है।
 इसके पश्चात क़ुरआन इस्लामी समुदाय की मर्यादा व गौरव के एक कारण जेहाद और हिजरत अर्थात पलायन की ओर संकेत करते हुए कहता है कि केवल ईमान पर्याप्त नहीं है बल्कि भला कर्म और वह भी केवल ईश्वर के लिए आवश्यक है ताकि लोक-परलोक में मनुष्य को कल्याण प्राप्त हो जाए।
 इस आयत से हमने यह सीखा कि ईश्वरीय दृष्टि में कोई भी कर्म बिना बदले के नहीं है। इसके लिए शर्त यह है कि वह ईश्वर के लिए किया गया हो।
 मानवीय परिपूर्णताओं को प्राप्त करने में महिला और पुरुष के बीच कोई अंतर नहीं है और ईश्वर की दृष्टि में दोनों ही समान हैं।
जब तक मनुष्य पाप और अपवित्रता से दूर न हो जाए तब तक उसमें पवित्र लोगों के स्वर्ग में प्रवेश करने की क्षमता नहीं होगी।

 सूरए आले इमरान की आयत नंबर १९६ और १९७
नगरों में काफ़िरों की आवाजाही तुम्हें धोखा न दे। (3:196) (इस आवाजाही का परिणाम) बहुत ही तुच्छ माल है। इसके पश्चात उनका स्थाई ठिकाना नरक है कि जो बहुत ही बुरा ठिकाना है। (3:197)
 काफ़िरों की स्थिति, जो प्रायः ऐश्वर्यपूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं तथा ईमान वालों की स्थिति जो कठिनाई भरा जीवन व्यतीत करते हैं, की जब तुलना की जाती है तो मन में यह प्रश्न उठता है कि वे कुफ़्र और अत्याचार के बावजूद क्यों ऐश्वर्य एवं विभूतिपूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं जबकि ईमान वाले अपने भले कर्मों के बावजूद क्यों कठिन जीवन बिताते हैं?
 यही प्रश्न इस्लाम के आरंभिक काल में मोमिनों के मन में भी आया था। मक्के के अनेकेश्वरवादी और मदीने के यहूदी जो व्यापार करते थे, बड़े ही सुख एवं वैभव का जीवन व्यतीत करते थे जबकि मुसलमान जो मक्के से मदीने हिजरत के कारण अपनी धन संपत्ति खो चुके थे और साथ ही अनेकेश्वरवादियों ने उनका आर्थिक परिवेष्टन भी कर रखा था, अत्यंत कड़ा जीवन व्यतीत कर रहे थे।
 इस प्रश्न के उत्तर में क़ुरआने मजीद कहता है कि काफ़िरों की भौतिक स्थिति तुम्हें धोखा न दे क्योंकि प्रथम तो यह कि यह धन व संभावनाएं उसी प्रकार से सीमित हैं और शीघ्र ही समाप्त हो जाने वाली हैं जिस प्रकार से कि तुम्हारी यह स्थिति भी अस्थाई है। दूसरे यह कि कुफ़्र के आधार पर प्राप्त होने वाले उनके सांसारिक वैभव का प्रलय में अत्यंत कड़ा दण्ड होगा। यदि तुम उनकी और अपनी स्थिति की तुलना करना चाहते हो तो उनके और अपने अंत को भी देखो। क्या तुम उनकी भांति जीवन को केवल इसी नश्वर संसार तक सीमित समझते हो जो इस प्रकार का फ़ैसला कर रहे हो?
 अलबत्ता यह बात सदैव ही याद रखनी चाहिए कि जो भी सांसारिक जीवन में गंभीरता तथा लगन से तथा ज्ञान का प्रयोग करके काम करेगा, वह सफल रहेगा चाहे वह मोमिन हो या काफ़िर। इसके विपरीत जो भी ज्ञान और लगन से दूर रहते हुए एकांत में रहेगा वह कठिनाइयों और दुर्भाग्य का शिकार बनेगा चाहे वह मोमिन हो या काफ़िर।
 इस आधार पर काफ़िरों की सफलता का कारण उनका प्रयास है न कि उनका कुफ़्र, जैसा कि मोमिनों की कठिनाई का कारण उनकी सुस्ती और आलस्य है न कि उनका ईमान। इस बात पर सदैव ही ध्यान रखना चाहिए।
 इस आयत से हमने यह सीखा कि काफ़िरों की सांसारिक आर्थिक स्थति और उनकी संपत्ति की चकाचौंध हमको धोखा न देने पाए और हम सांसारिक मान को प्राप्त करने के लिए अपने ईमान को ही छोड़ दें।
 लोगों की तुलना या उनके बारे में निर्णय करते समय उनके लोक एवं परलोक को अलग-२ नहीं बल्कि एक साथ देखना चाहिए।
 सांसारिक वैभव व ऐश्वर्य संसार ही की भांति एक दिन समाप्त होने वाले हैं अतः हमें अनंतकालीन आराम के प्रयास में रहना चाहिए।




 सूरए आले इमरान की आयत नंबर १९८
परन्तु जो लोग अपने पालनहार से डरते हैं उनके लिए ऐसे बाग़ हैं जिनके नीचे से नहरें बहती हैं। वे सदैव वहां रहेंगे। यह ईश्वर की ओर से (आरंभिक) सत्कार है और (इससे भी महत्वपूर्ण सत्कार) जो ईश्वर के पास है वह भले कर्म करने वालों के लिए बेहतर है। (3:198)
 पिछली आयतों में प्रलय में काफ़िरों की दुर्दशा के वर्णन के पश्चात ईश्वर इस आयत में भले कर्म करने वालों तथा पवित्र लोगों के अंत की ओर संकेत करते हुए कहता है कि ईश्वर ने यद्यपि भय और धार्मिक शिक्षाओं व आदेशों के पालन के कारण संसार में कुछ सीमितताएं झेलनी पड़ती हैं और विस्तार वाद तथा धन संपत्ति के भण्डार की अनुमति नहीं मिलती है परन्तु प्रलय के दिन ईश्वर अपने मित्रों का बड़े ही अच्छे ढंग से स्वागत एवं सत्कार करता है।
 स्वर्ग का जीवन तथा पेड़ों और जंगलों में और झरनों के पास बने हुए स्वर्गीय महलों में निवास ईश्वर द्वारा मोमिनों का आरम्भिक सत्कार है और इससे भी महत्वपूर्ण सत्कार वह वे भौतिक एवं आत्मिक अनुकंपाए हैं जो मोमिन को ईश्वर की ओर से मिलेंगी।
 इस आयत से हमने सीखा कि ईमान तथा कर्मों के स्वीकार किये जाने की शर्त ईश्वर से भय है। ईश्वर से न डरने वाले व्यक्ति का भला कर्म समाज के लिए तो लाभदायक है किंतु उसके लिए नहीं।
 ईमान वाले प्रलय के दिन ईश्वर के अतिथि होंगे और ईश्वर उनका मेज़बान तथा स्वर्ग उनका सबसे पहले सत्कार होगा, ठीक उस शर्बत की भांति जो अतिथि के घर में आते ही उसकी सेवा में प्रस्तुत किया जाता है।




 सूरए आले इमरान की आयत नंबर १९९ 
और निसन्देह ईश्वरीय किताब रखने वालों में से कुछ एसे भी हैं जो ईश्वर पर और जो कुछ तुम पर उतारा गया है उसपर तथा जो कुछ उनपर उतारा गया है उसपर ईश्वर के समक्ष नतमस्तक रहते हुए विश्वास रखते हैं और ईश्वरीय निशानियों को सस्ते दामों नहीं बेचते। यही वे लोग हैं जिनका बदला उनके पालनहार के पास है और जान लो कि ईश्वर बहुत ही जल्दी हिसाब करने वाला है। (3:199)
 पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम द्वारा मक्के से मदीने की ओर हिजरत के पश्चात मदीना नगर तथा उसके समीप रहने वाले यहूदी और ईसाई इस्लाम से परिचित हुए और उनमें से कुछ पैग़म्बर सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम पर ईमान ले भी आए। यहां तक कि हब्शा अर्थात वर्तमान तत्कालीन अफ़्रीका के एक क्षेत्र के शासक नज्जाशी ने भी इस्लाम स्वीकार कर लिया। जब उसका निधन हुआ तो तो पैग़म्बर सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने दूर से उसकी नमाज़े जनाज़ा पढ़ी और उसके लिए ईश्वर से क्षमा की प्रार्थना की। उस समय कुछ मिथ्याचारियों ने कहा कि पैग़म्बर ने एक एसे काफ़िर की नमाज़ पढ़ी जिसे उन्होंने देखा तक नहीं तो ईश्वर ने उनके उत्तर में यह आयत भेजी।
 इस आयत से हमने सीखा कि ग़ैर मुस्लिमों के साथ व्यवहार में न्याय से काम लेना चाहिए और उनके अच्छे लोगों की सराहना करनी चाहिए।
 वह ईमान मूल्यवाद है जो ईश्वर से भय के साथ तथा हर प्रकार के अहंकार व घमण्ड से दूर हो।




सूरए आले इमरान की अन्तिम आयत नंबर २०० 
हे ईमान लाने वालो! (बाहरी संकटों और आंतरिक इच्छाओं के समक्ष) डटे रहो और धैर्य रखो तथा (शत्रु के समक्ष भी) संयम बरतो तथा सीमाओं की रक्षा करो और ईश्वर से डरते रहो। शायद तुम्हें कल्याण प्राप्त हो जाए। (3:200)
 इस आयत में, जो सूरए आले इमरान की अन्तिम आयत है, चार आदेश दिये गए हैं। इन आदेशों का उद्देश्य, व्यक्तिगत एवं सामाजिक कार्यों में संयम व दृढ़ता से काम लेना तथा ईश्वरीय आदेशों का गंभीरता से पालन करना है। चूंकि इस आयत का संबोधन ईमान वालों से है अतः यह बात स्पष्ट हो जाती है कि ईमान की शर्त, धैर्य व संयम तथा दृढ़ता है। कटु घटनाओं तथा व्यक्तिगत एवं पारिवारिक कठिनाइयों में सयंम, बाहरी शत्रुओं के मुक़ाबले में दृढ़ता और इससे भी महत्वपूर्ण वैचारिक व आस्था संबन्धी सीमाओं की तथा देश की रक्षा में दृढ़ता एवं धैर्य। अलबत्ता यह संयम और यह दृढ़ता उसी स्थिति में लाभदायक है कि जब यह ईश्वर से भय की छाया में हो और केवल इसी स्थिति में यह लोक व परलोक में मोक्ष व कल्याण का कारण बनेगी।
 इस आयत से हमने सीखा कि यदि शत्रु अपने ग़लत मार्ग पर डटा हुआ है तो हम क्यों ईश्वर के मार्ग और उसके धर्म की रक्षा के लिए दृढ़ता से काम न करें।
 संयम और दृढ़ता उसी स्थिति में मूल्यवान है कि जब वह ईश्वर के लिए और उसके भय के मार्ग में हो अन्यथा सांप्रदायिकता और अनुचति हठ का कारण बनती है।

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