कुरान तर्जुमा और तफसीर -सूरए आले इमरान 3:105-131-फूट मत डालो एक रहो |

सूरए आले इमरान की १०५वीं आयत (हे मुसलमानो!) उन लोगों की भांति न हो जाना जो ईश्वरीय धर्म के बारे में भ्रमित हो गए और उनमें फूट पड़ गई हा...


सूरए आले इमरान की १०५वीं आयत
(हे मुसलमानो!) उन लोगों की भांति न हो जाना जो ईश्वरीय धर्म के बारे में भ्रमित हो गए और उनमें फूट पड़ गई हालांकि उनके लिए स्पष्ट तर्क और नीतियां आ चुकी थीं। और ऐसे ही लोगों के लिए कड़ा दण्ड है। (3:105)
 जातीय व सांप्रदायिक मतभेदों या ऐतिहासिक समस्याओं के आधार पर फूट डालने वाली बातों की प्रस्तुति वह ख़तरा है जो ईश्वरीय धर्मों के अनुयाइयों को सदैव लगा रहता है। पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि ईश्वर ने सभी ईमान वालों को एकता व सहहृदयता का निमंत्रण देते हुए उन्हें एक-दूसरे का भाई बताया है। इस आधार पर ईश्वर में आस्था रखने वालों के बीच एक वैचारिक संबन्ध और संपर्क पाया जाता है तथा भौगोलिक सीमाएं उन्हें एक-दूसरे से अलग नहीं कर सकतीं। जैसाकि सामयिक सीमाएं भी अतीत के एकेश्वरवादियों को भविष्य के एकेश्वरवादियों से अलग नहीं कर सकतीं। पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने आज से शताब्दियों पूर्व कहा था कि मेरे भाई वे लोग हैं जो भविष्य में आने वाले हैं। उन्होंने मुझको नहीं देखा परन्तु वे मुझपर ईमान लाएंगे। वे मेरे वास्तविक भाई हैं।
 जी हां, ईश्वर पर ईमान तथा आस्था, एकता का दृढ़तम घ्रुव है और इसे सभी धर्मों के अनुयाइयों, विशेषकर मुसलमानों के बीच सहहृदयता का कारण बनना चाहिए। बड़े खेद के साथ कहना पड़ता है कि भौतिक हित या फिर राजनैतिक उद्देश्य इस बात का कारण बन गए हैं कि कभी मोमिनों के बीच एसा भीष्ण युद्ध हुआ कि एसा युद्ध कभी उनके तथा ईश्वरीय धर्म के शत्रुओं के बीच भी नहीं हुआ होगा। यह आयत सबको सावधान करते हुए कहती है कि इन मतभेदों का परिणाम लोक तथा परलोक में बहुत ही कड़ा दण्ड है।
 इस आयत से हमने यह सीखा कि बहुत से मतभेदों का स्रोत, अज्ञानता नहीं है। कुछ लोग तो सत्य को समझने के बावजूद अपने हितों तथा इच्छाओं की पूर्ति के लिए सत्य के साथ युद्ध करते हैं और ईमान वालों के बीच फूट डालने का प्रयास करते हैं।
 अतीत के लोगों के इतिहास से हमे पाठ सीखना चाहिए। फूट और मतभेद फैलाने वाली जातियों को क्या कल्याण प्राप्त हो सका, या फिर उनको जो एकदूसरे के साथ एकता एवं सहहृदयता के साथ रहे।




सूरए आले इमरान की आयत संख्या १०६ और १०७
प्रलय के दिन कुछ चेहरे सफेद और प्रकाशमई होंगे जबकि कुछ चेहरे काले और अंधकारमय होंगे। तो जिनके चेहरे काले हो गए होंगे उनसे यह पूछा जाएगा कि तुम ईमान लाने के पश्चात फिर क्यों काफ़िर हो गए थे? लो अब अपने कुफ़्र के कारण ईश्वरीय दण्ड का स्वाद चखो। (3:106) और जिन लोगों के चेहरे सफ़ेद होंगे वे ईश्वर की दया व कृपा की छाया में होंगे जहां वे सदैव रहेंगे। (3:107)

 संसार में हम जो भी काम करते हैं चाहे वह अच्छा हो या बुरा उसके दो स्वरूप होते हैं। परोक्ष और अपरोक्ष। इस कार्य का अपरोक्ष और विदित स्वरूप तो वहीं होता है जो हम देखते और सुनते हैं जबकि उसका परोक्ष स्वरूप वह प्रभाव है जो उस कार्य के कारण हमारी आत्मा, मानस और व्यवहार पर पड़ता है।
 जिस प्रकार से संसार अपरोक्ष और विदित है तथा प्रलय उसका परोक्ष रूप है उसी प्रकार से कर्मों का विदित रूप संसार में दिखाई देता है परन्तु उनका परिणाम प्रलय में सामने आएगा। अतः प्रलय के दिन मनुष्य के कार्यों का स्वरूप उसके विदित स्वरूप के अनुकूल साक्षात होगा और मनुष्य का परोक्ष स्पष्ट हो जाएगा।
 यह आयतें प्रलय के दिन उपस्थित लोगों के चेहरों के काले या सफ़ेद होने का वर्णन करती हैं जो उनके परोक्ष कर्मों के स्वरूप का परिचायक हैं। संसार में सत्य का इन्कार या उसे छिपाना मनुष्य के चेहरे या फिर उसके व्यवहार से ईमान के प्रकाश को समाप्त करके उसके चेहरे पर अंधकार और कालिख़ पोत देता है। इससे बढ़कर कड़ा दण्ड और क्या होगा कि मनुष्य का आंतरिक कूरूप अन्य लोगों के सामने आ जाए जैसाकि प्रलय में ईमान वालों का उज्जवल व प्रकाशमई चेहरा उनके पवित्र तथा सुन्दर व्यवहार का परिचायक है जो उनके लिए ईश्वर की असीम दया व कृपा को लिए हुए है।
 इन आयतों से हमने यह सीखा कि यदि हम संसार में सत्यवादी और अत्याचारग्रस्त चेहरों के साथ अन्य लोगों के विश्वास और आश्वासन को अपनी ओर आकृष्ट कर लें तो फिर प्रलय के दिन हमारा चेहरा वही होगा जो आज हमारा व्यवहार है।
 हमें अपने आज के ईमान पर घमण्ड नहीं करना चाहिए क्योंकि मोमिनों को भी काफ़िर होने का ख़तरा लगा रहता है।




 सूरए आले इमरान की आयत संख्या १०८ तथा १०९ 
ये ईश्वरीय किताब की आयते हैं जिन्हें हम सत्य के साथ तुम्हारे लिए तिलावत करते हैं और ईश्वर संसार वालों में से किसी पर भी अत्याचार का इरादा नहीं रखता। (3:108) (क्योंकि) जो कुछ आकाशों और धरती में है वह सबका सब केवल ईश्वर का ही है और हर वस्तु और हर बात की वापसी ईश्वर ही की ओर है। (3:109)
 यह आयत पैग़म्बर और मुसलमानों को संबोधित करते हुए इस्लाम के एक महत्वपूर्ण विश्वास की ओर संकेत करती है और वह है ईश्वरीय न्याय। इस विश्वास के अनुसार ईश्वर, मनुष्य की क्षमता व शक्ति से अधिक उसपर कोई बात अनिवार्य नहीं करता और न ही अच्छे कर्मों का फल और बुरे कर्मों का दण्ड देने में उसपर कोई अत्याचार करता है।
 यदि प्रलय के दिन कुछ लोगों का चेहरा सफ़ेद और कुछ का काला होगा तो यह न तो ईश्वर की इच्छा है और न ही मनुष्य की विवश्ता बल्कि यह संसार में किये गए उसके कार्य हैं जो प्रलय के दिन इस रूप में दिखाई देंगे। प्रलय के दिन यदि कोई नरक में जाएगा तो ईश्वर ने उसपर अत्याचार नहीं करना चाहा है बल्कि अपने बुरे कर्मों के कारण स्वयं उसने नरक की इच्छा व्यक्त की है।
 मूलरूप से अन्य लोगों पर अत्याचार करने का कारण अज्ञान है या विवश्ता और आवश्यकता या फिर अपनी शक्ति का प्रदर्शन और प्रतिशोध। ईश्वर जो आकाशों, असीमित गृहों और नक्षत्रों तथा धरती के अनगिनत जीवों का स्वामी है, उसे मनुष्यों के एक गुट पर अत्याचार करने या उनके समक्ष अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने की क्या आवश्यकता है?
 वह जो हमें दूसरों के अत्याचारों से बचाता है, किस प्रकार संभव है कि स्वयं हमारे ऊपर वह अत्याचार करे। वह जो बुराई, अपवित्रता और अत्याचार से सबसे अधिक अवगत है, किस प्रकार से एक चींटी पर अत्याचार कर सकता है? वह जिसने दया व कृपा के आधार पर हमारी सृष्टि की रचना की है किस प्रकार अपनी ही रचनाओं पर अत्याचार करेगा?
 इन आयतों से हमने यह सीखा कि जिस ईश्वर पर हम आस्था रखते हैं वह सृष्टि, बंदों पर कर्तव्य निर्धारण और कर्मों का फल देने में न्याय करता है और उसे अत्याचार की कोई आवश्यकता नहीं है।
 जिस प्रकार से सृष्टि का आरंभ ईश्वर की ओर से है उसी प्रकार से सृष्टि का अंत भी उसी की ओर है। संसार उसकी शक्ति या उसके शासन क्षेत्र से बाहर नहीं है। जो कुछ हम इस संसार में करते हैं वह बाक़ी रहने वाला है, चाहे विदित रूप से समाप्त ही क्यों न हो जाए।

 सूरए आले इमरान की ११०वीं आयत
तुम उत्तम समुदाय हो जो लोगों के लिए प्रकट किये गए हो। (क्योंकि) तुम भलाई का आदेश देते हो, बुराइयों से रोकते हो तथा ईश्वर पर ईमान रखते हो। और यदि आसमानी किताब रखने वाले (भी ऐसे ही धर्म पर) ईमान ले आएं तो उनके लिए बेहतर है, उनमें कुछ ही लोग ईमान वाले हैं जबकि अधिकांश अवज्ञाकारी हैं। (3:110)
 बहुत से लोग यह सोचते हैं कि धर्म, ईश्वर से मनुष्य के संपर्क के संबन्ध में उपासनाओं के कुछ शुष्क आदेशों का संग्रहमात्र है और इसी कारण वे धर्म को नमाज़, रोज़े, प्रार्थना और क़ुरआन तक ही सीमित रखते हैं जबकि धर्म के अधिकांश आदेश, मनुष्य के समाजिक पहलू और समाज के अन्य सदस्यों के साथ उसके संबन्धों को बताते हैं। यहां तक कि धर्म की दृष्टि में उस नमाज़ का महत्व अधिक है जो अन्य लोगों के साथ मिलकर पढ़ी जाए।
 इस्लामी समाज को हर प्रकार की बुराई व अपवित्रता से सुरक्षित रखने हेतु धर्म के महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में से एक, भलाई का आदेश देने और बुराई से रोकने का कर्तव्य है। जैसाकि हमने पिछले कार्यक्रम में कहा था कि यह कर्तव्य दो चरणों में पूरा होता है। पहला चरण एक विशेष गुट द्वारा जो समाजिक व्यवहारों की देखभाल और उनके नियंत्रण का उत्तरदायी होता है। इसकी चर्चा इसी सूरे की आयत संख्या १०४ में की जा चुकी है। दूसरा चरण एक सार्वजनिक कर्तव्य के रूप में सभी मुसलमानों के लिए अनिवार्य है जिसकी ओर इस आयत मे संकेत किया गया है।
 यह ईश्वरीय आदेश बताता है कि मनुष्य केवल अपने सुधार का ही उत्तरदायी नहीं है बल्कि समाज में सुधार और उसकी प्रगति के प्रति भी उसका कर्तव्य बनता है। उसे भलाई और प्रेम के आधार पर समाजिक बुराइयों की समाप्ति और भलाइयों के विस्तार के लिए प्रयासरत रहना चाहिए। यदि ऐसा हो गया तो फिर सबसे उत्तम समुदाय उभर कर सामने आएगा और एक अच्छे आदर्श के रूप में अन्य समाजों के सामने भी प्रस्तुत किया जा सकेगा।
 इस आयत से हमने यह सीखा कि बुराइयों का मुक़ाबला किये बिना, भलाई के आदेश का बहुत अच्छा परिणाम नहीं निकलेगा अतः भलाई के आदेश के साथ ही बुराई से रोकने को भी कहा गया है।
 दूसरों को भलाई का आदशे देने में आयु, शिक्षा, धन और पद की कोई भूमिका नहीं होती है। हर व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को चाहे वह जिस पद पर हो भलाई का आदेश दे सकता है और बुराई से रोक सकता है।
 लोगों के चयन और उन्हें वरीयता देने का मानदण्ड, भलाई का आदेश देने और बुराई से रोकने के कर्तव्य का पालन है। समाज में कोई भी पद ऐसा ही व्यक्ति ग्रहण कर सकता है जो लोगों की भलाई का इच्छुक हो और उनसे प्रेम करता हो।
 सबसे उत्तम समुदाय बनने के लिए ईमान और कर्म दोनों ही आवश्यक होते हैं और वे भी समाज में सुधार के मार्ग में, न कि अपने व्यक्तिगत कर्तव्यों की पूर्ति के लिए किया गया कर्म।



सूरए आले इमरान की १११वीं और ११२ वीं आयत
(हे मुसलमानों जान लो कि शत्रु) थोड़ी सी यातना के अतिरिक्त तुम्हें कोई नुक़सान नहीं पहुंचा सकेंगे और जब वे तुमसे युद्ध करेंगे तो तुम्हे पीठ दिखाकर भाग खड़े होंगे और फिर उनकी कोई सहायता नहीं होगी। (3:111) (क्योंकि) वे जहां कहीं भी पाए जाएंगे उनके ऊपर अपमान का ठप्पा लगा रहेगा, सिवाय इसके कि वे ईश्वर और लोगों की रस्सी को थाम लें। वे ईश्वरीय प्रकोप में फंस गए हैं और उनपर असहाय होने का ठप्पा लगा दिया गया है। यह इसलिए है कि वे ईश्वरीय आयतों का इनकार करते हैं और अकारण ही पैग़म्बरों की हत्या करते हैं। इसका कारण यह है कि उन्होंने अवज्ञा की है और (ईश्वर द्वारा निर्धारित) सीमा से आगे बढ़ गए हैं। (3:112)
 यह आयतें मुसलमानों के लिए शुभ सूचना हैं कि यदि तुम अपने ईमान में दृढ़ रहोगे और एकता व समरस्ता के साथ अच्छाई का आदेश देकर और बुराई से रोककर समाज को सुधारने का प्रयास करोगे तो तुम शत्रु की ओर से सुरक्षित रहोगे और फिर तुम्हें कोई भी ख़तरा नहीं होगा बल्कि यह शत्रु हैं जो तुम्हारे मुक़ाबले में घाटा उठाकर अपमानित होंगे। यह आयतें जो यहूदी जाति के बारे में हैं, पवित्र क़ुरआन की उन भविष्यवाणियों में से हैं जो अब तक पूरी हो रही हैं क्योंकि यहूदी जाति सदैव ही तुच्छ, हीन और अपमानित रही है और इसे कभी भी लोकप्रियता व सम्मान प्राप्त नहीं हो सका है।
 यहां तक कि आज भी जब संसार की अर्थव्यवस्था का प्रचार तंत्र यहूदी धनवानों के नियंत्रण में है संसार का एक ही स्वतंत्र देश यहूदी धर्म के आधार पर नहीं चलाया जाता और एक अतिग्रहणकारी सरकार के रूप में इज़राईल पूरे संसार की घृणा का पात्र बना हुआ है। एक डाकू तथा अपराधी की भांति जो लोगों में भय उत्पन्न करता है और कभी-कभी उसे बहुत अधिक धन भी मिल जाता है परन्तु कभी भी उसे सम्मान प्राप्त नहीं होता और लोग उससे घृणा करते हैं और द्वेष रखते हैं।
 इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर पर ईमान एक ऐसा मज़बूत दुर्ग है जो शत्रु को भीतर नहीं आने देता और उसकी पराजय व पलायन का कारण बनता है।
 सम्मान का रहस्य दो बातों में है। एक ईश्वर से मज़बूत संपर्क और दूसरे लोगों से अच्छे संबन्ध। यह दोनों रिश्ते यदि मज़बूत रहें तो कोई ही शक्ति समाज में घुसपैंठ करने में सक्षम नहीं होगी।
 अपराध व अतिक्रमण, अपमानित और असहाय होने का सबसे बड़ा कारण है।



 सूरए आले इमरान की ११३वीं ११४वीं और ११५वीं आयत
आसमानी किताब रखने वाले सारे के सारे एक समान हैं। उनमें से कुछ लोग ईश्वर की उपासना और आज्ञा पालन के लिए उठ खड़े होते हैं, मध्य रात्रि में वे ईश्वर की आयतों की तिलावत करते हैं और सज्दा करते हैं। (3:113) यह लोग ईश्वर और प्रलय पर ईमान रखते हैं, भलाई का आदेश देते हैं, बुराई से रोकते हैं, भले कार्य करने में तेज़ी दिखाते हैं। यही लोग (ईश्वर के) भले (बंदे) हैं। (3:114) और यह लोग जो भी भले कर्म करते हैं उसे कदापि अनदेखा नहीं किया जाएगा और ईश्वर, अपने से भय रखने वालों की दया से भलि भांति अवगत है। (3:115)
 पिछली आयतों में आसमानी किताब रखने वाले एक गुट द्वारा ईमान वालों को पथभ्रष्ट करने के षड्यंत्रों का पर्दाफ़ाश करने के पश्चात ईश्वर इन आयतों में आसमानी किताब वालों में उपस्थित भले लोगों की ओर संकेत करते हुए कहता है कि यह मत सोचो कि वे सभी एक समान हैं बल्कि उनमें से बहुत से लोग तुम मुसलमानों की ही भांति ईश्वर की उपसना करते हैं और रातों को जागकर सज्दे और रूकू करते हैं। वे लोग ईश्वर पर भी ईमान रखते हैं और प्रलय पर भी। वे समाज में भलाइयों के प्रसार के लिए भी प्रयासरत रहते हैं और स्वयं एक समाज से बराइयों को समाप्त करने की चेष्टा भी करते हैं। भले कर्म करने में वे सदैव अगुवा बने रहते हैं।
 स्वाभाविक है कि ईश्वर ऐसे लोगों के भले कर्मों की अनदेखी नहीं करेगा और वे उनकी दया व कृपा के पात्र बन जाते हैं क्योंकि ईमान तथा अच्छा कर्म जिसकी ओर से भी हो ईश्वर उसे स्वीकार करेगा।
 आसमानी किताब रखने वालों के बारे में क़ुरआन का यह दृष्टिकोण और उनके बारे में न्यापूर्ण रवैया, ग़ैर मुस्लिमों के साथ व्यवहार में मुसलमानों के लिए आदर्श होना चाहिए। यदि हम भी क़ुरआन की भांति न्यायप्रिय होंगे तो स्वयं हमारा व्यवहार लोगों को इस्लाम की ओर आकृष्ट करने का उत्तम मार्ग होगा और बहुत अधिक प्रचार की आवश्यकता नहीं होगी।
 इन आयतों से हमने यह सीखा कि अच्छाई और परिपूर्णता को, चाहे जिसकी ओर से भी हो, स्वीकार करना चाहिए। दूसरों की आलोचना करते समय उनकी अच्छाइयों की अनदेखी नहीं करनी चाहिए।
 ईश्वर की उपासना और उसकी प्रार्थना का उत्तम समय रात है जब सारे लोग सो रहे होते हैं।
 रात की व्यक्तिगत उपासना भी आवश्यक है और समाज के सुधान के लिए दिन में लोगों को भलाई का आदेश देना भी।
भलाई का आदेश देना और बुराई से रोकना केवल इस्लाम से विशेष नहीं है बल्कि यह आदेश अन्य धर्मों में भी मौजूद है।
 भले कामों में एक-दूसरे से आगे बढ़ना, उसके मूल्य को बढ़ा देता है।
 पवित्र क़ुरआन ने भलाइयों के आदेश को बुराइयों से रोकने से पहले उल्लेख किया है क्योंकि यदि लोगों के बीच भलाई के द्वार खुल जाएं तो बुराई के द्वार स्वयं ही बंद हो जाएंगे।

 सूरए आले इमरान की ११६वीं और ११७वीं आयत
निःसन्देह, जो लोग काफ़िर हुए उन्हें उनकी धन-संपत्ति और बाल-बच्चे, ईश्वर के मुक़ाबले, आवश्यकतामुक्त नहीं कर सकते। वे लोग नरक के वासी हैं और वे अनंत काल तक वहीं पर रहेंगे। (3:116) इस संसार में वे जो दान दक्षिणा करते हैं वह उस गर्म हवा की भांति है जो उस समुदाय के खेतों पर चले जिन्होंने स्वयं अपने ऊपर अत्याचार किया और वह हवा उनके खेतों को नष्ट कर दे। ईश्वर ने उनपर अत्याचार नहीं किया है बल्कि वे स्वयं अपने ऊपर अत्याचार करते हैं। (3:117)
 कुफ़्र अर्थात ईश्वर से इन्कार का एक कारण, धन व शक्ति होने की स्थिति में ईश्वर से आवश्यकतामुक्त होने का आभास है। कुछ लोग यह सोचते हैं कि धन-संपत्ति और बच्चों के पश्चात ईश्वर की कोई आवश्यकता नहीं है और यदि कोई ईश्वर है भी तो उन्हें उसकी कोई आवश्यकता नहीं रह गई है। यह आयत उनकी इस ग़लत धारणा को रद्द करते हुए कहती है कि यदि यह मान भी लिया जाए कि इस संसार में धन और बच्चे उनकी रक्षा करेंगे तो प्रलय के दिन वे क्या करेंगे? उस दिन उनका भीतरी कुफ़्र नरक की भड़कती हुई आग में प्रकट होगा और उन्हें सदा के लिए नरक में डाल देगा।
 ११७वीं आयत दान-दक्षिणा जैसे काफ़िरों के कुछ अच्छे कर्मों की ओर संकेत करते हुए कहती है कि इस मार्ग में वे जो कुछ भी ख़र्च करते हैं वह उन बीजों की भांति है जिन्हें अनुचित भूमि में बोया जाए। ऐसी धरती जिसे सदैव ही तेज़ हवाओं, तूफ़ान और सर्दी तथा गर्मी का सामना रहता है और उसमें कोई भी फ़सल नहीं उगती।
 कुफ़्र तथा ग़ैर ईश्वरीय इच्छाएं ऐसा तूफ़ान हैं जो काफ़िरों के भले कर्मों के खेतों पर चलता है और जो कुछ उन्होंने बोया है उसे नष्ट कर देता है। किसी भी कार्य का वास्तविक मूल्य उसे करने की वास्तविक प्रेरणा और लक्ष्य के कारण होता है न कि उसके विदित स्वरूप से। जिसने कुफ़्र जैसे पाप के कारण स्वयं ही अपने भले कर्मों को तबाही के ख़तरे में डाल दिया हो उसपर ईश्वर ने कोई अत्याचार नहीं किया है बल्कि यह तो स्वयं वही व्यक्ति है जिसने अपने अस्तित्व की योग्यताओं से पूर्व खेत पर अत्याचार किया।
 इन आयतों से हमने यह सीखा कि अपने माल तथा दौलत और बच्चों पर घमण्ड तथा ईश्वर से आवश्यकता मुक्त होने का आभास, एक प्रकार से कुफ़्र वे अकृतज्ञता की निशानी है।
 इस्लाम में दान-दक्षिणा का उद्देश्य, केवल भूखों का पेट भरना ही नहीं है बल्कि दान करने वाले की प्रवृति व परिपूर्णता भी दृष्टिगत है और कुफ़्र मनुष्य की आध्यात्मिक प्रगति में रुकावट डालता है।
 ईश्वरीय प्रकोप स्वयं हमारे ही कर्मों की प्रतिक्रिया है न कि ईश्वर की ओर से किसी प्रकार का अत्याचार।


सूरए आले इमरान की आयत संख्या ११८
हे ईमान लाने वालो! अपनों के अतिरिक्त किसी अन्य पर अपने रहस्य न खोलो, वे तुम्हारी तबाही में कोई कसर नहीं छोड़ेगे वे तुम्हारे दुखों और कठिनाइयों को पसंद करते हैं। द्वेष और शत्रुता उनकी बातों से स्पष्ट है और जो कुछ उन्होंने अपने हृदय में छिपा रखा है वह और भी बड़ा है। निःसन्देह, हम (शत्रुओं के षड्यंत्रों का पर्दा फ़ाश करने वाली) आयतें तुम्हारे लिए बयान करते हैं यदि तुम मंथन करो। (3:118)

 इस्लामी समाजों को सदैव जो खतरे लगे रहते हैं उनमें से एक, सरकार के महत्वपूर्ण एवं संवेदनशील केन्द्रों में अपरिचित व दूसरे लोगों की इस प्रकार से घुसपैठ है कि वे मुसलमानों के रहस्यों और उनकी सूचनाओं से अवगत हो जाएं क्योंकि यदि विदित रूप से भी वे मित्रता एवं सहयोग की घोषणा करें तो आंतरिक रूप से वे इस्लाम को पसंद नहीं करते और मुसलमानों की प्रगति को नहीं देख सकते बल्कि इसके विपरीत वे मुसलमानों को कमज़ोर बनाने और उन्हें तबाह करने का भरसक प्रयास करते हैं और यहां तक कि अपने द्वेष और शत्रुता को भी नहीं छिपाते।
 इस आयत से हमने सीखा कि मोमिन को भोला नहीं होना चाहिए और किसी की भी बातों पर तुरन्त विश्वास नहीं कर लेना चाहिए बल्कि अपनी बुद्धि को प्रयोग करते हुए शत्रु के समक्ष होशियार रहना चाहिए।
 इस्लामी देशों में विदेशी बलों की उपस्थिति वर्जित है क्योंकि इससे मुसलमानों के रहस्य अन्य लोगों तक पहुंच जाएंगे।
 काफ़िरों के साथ यद्यपि शांतिपूर्ण संबन्ध रखना सही है परन्तु हमें यह जान लेना चाहिए कि इस्लाम और कुफ़्र के बीच कभी भी मित्रता नहीं हो सकती।



सूरए आले इमरान की आयत संख्या ११९ और १२० 
हे मुसलमानों तुम उनसे मित्रता व्यक्त करते हो जबकि वे तुम्हें पसंद नहीं करते। तुम समस्त आसमानी किताबों पर ईमान रखते हो (जबकि वे तुम्हारी किताब पर ईमान नहीं लाते) वे जब भी तुमसे मिलते हैं तो कहते हैं कि हम ईमान ले आए हैं किंतु जब वे (अपने जैसे लोगों से) एकांत में मिलते हैं तो तुम्हारे प्रति उनके हृदय में जो द्वेष है उसके कारण वे क्रोध मे अपनी उंगलियों को दातों से काट लेते हैं। (हे पैग़म्बर) उनसे कह दो कि अपने क्रोध में मर जाओ कि ईश्वर तुम्हारे हृदय में जो कुछ है उससे अवगत है। (3:119) (हे मुसलमानो! जान लो कि) यदि तुम तक कोई भलाई पहुंचती है तो उन्हें बुरा लगता है और यदि तुम्हें कोई बुराई आ लेती है तो वे प्रसन्न हो जाते हैं। परन्तु यदि तुम दृढ़ रहो और धैर्य करो तथा ईश्वर से भयभीत रहो तो उनका छल व कपट तुम्हें कोई हानि नहीं पहुंचा सकता क्योंकि वे जो कुछ भी करते हैं ईश्वर उससे अवगत है। (3:120)
 ये आयतें मुसलमानों के प्रति शत्रु की गंदी भावना और उसके विचारों का पर्दा फ़ाश करते हुए कहती है, यह मत सोचो कि यदि तुमने स्वयं को उनके समीप कर लिया है और उनसे प्रेम व मित्रता व्यक्त करते हो तो वे भी तुमसे प्रेम करने लगें हैं और तुम्हारे बारे में उनके विचार बदल गए हैं।
 यदि वे दिखावे के तौर पर ईमान प्रकट करते हैं तो जान लो कि दिल में वे तुम्हारे प्रति क्रोध और द्वेष रखते हैं, क्योंकि यदि तुम्हें कोई प्रगति प्राप्त होती है तो वे क्रोधित होते हैं और जब कोई कठिनाई या मुसीबत तुम पर आ पड़ती है तो वे प्रसन्त होते हैं।
 अतः एकमात्र मार्ग यह है कि तुम शत्रु के वादों पर भरोसा मत करो और पूर्ण रूप से ईश्वरीय आदेशों का पालन करो और यदि दृढ़ता से तुमने इन दो बातों का पालन किया तो तुम्हारे विरुद्ध शत्रु के षड्यंत्र कभी भी व्यवहारिक नहीं हो सकेंगे और वे तुम्हे क्षति नहीं पहुंचा सकेंगे।
 इन आयतों से हमने यह सीखा कि ग़ैर इस्लामी देशों से राजनैतिक एवं आर्थिक संबन्ध पारस्परिक सम्मान के आधार पर होने चाहिए अन्यथा यह मुसलमानों के अनादर का कारण बन जाएंगे।
 हमें किसी की भी बातों पर तुरंत विश्वास नहीं करना चाहिए और न ही शत्रु की ओर से मित्रता की घोषणा पर संतोष व्यक्त करना चाहिए।
 जहां पर शत्रु अपने द्वेष और ईर्ष्या को नहीं छिपाता वहां पर हमें भी कड़े स्वर में उससे घृणा की घोषणा करनी चाहिए।
 शत्रु के प्रभाव और उसकी घुसपैठ का मार्ग या तो उसके प्रति हमारा भय और लालच है या ईश्वर से हमारा भयभीत न रहना है। हम यदि धैर्य एवं संयम रखें तो शत्रु के ये दोनों ही मार्ग बंद हो सकते हैं।

सूरए आले इमरान की १२१वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।
(हे पैग़म्बर! याद करो) जब तुम ईमान वालों को युद्ध के लिए तैयार करने हेतु सुबह तड़के अपने घर से बाहर आए। और ईश्वर (तुम्हारी हर बात और कर्म को) सुनने और जानने वाला है। (3:121)



 यह आयत उन आयतों का आरंभ है जिनमें ओहद नामक युद्ध और उसकी कठिनाइयों का वर्णन किया गया है। दूसरी हिजरी शताब्दी में मक्के के समीप होने वाले बद्र नामक युद्ध के पश्चात, जिसमें कई अनेकेश्वरवादी मारे या बंदी बना लिए गए थे, मक्के के अनेकेश्वरवादियों के मुखिया अबू सुफ़यान ने कहा कि जब तक मैं मुसलमानों से अपना प्रतिशोध न ले लूं चैन से नहीं बैठूंगा। अतः अगले ही वर्ष मक्के के काफ़िरों ने एक बहुत बड़े लश्कर तथा बहुत अधिक अस्त्रों और शस्त्रों के साथ मदीने पर चढ़ाई कर दी। शत्रु के आगे बढ़ने की सूचना जब पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को मिली तो उन्होंने एक बैठक बुलाई और मुसलमानों से शत्रु का मुक़ाबला करने की पद्धति के बारे में परामर्श किया। मदीने के वृद्ध लोगों ने कहा कि हम लोग नगर में ही रहें और अपने घरों को ही मोर्चा बनाएं परन्तु उत्साही युवाओं ने कहा कि मदीने से बाहर निकल कर साहसपूर्ण ढंग से शत्रु का मुक़ाबला किया जाए।
 पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने मतदान करवाया जिसमें युवाओं की राय को बहुमत मिल गया। यद्यपि पैग़म्बर स्वयं भी नगर में रुक कर ही शत्रु का मुक़ाबला करना चाहते थे किंतु युवाओं की पवित्र भावनाओं के सम्मान में उन्होंने अपनी व्यक्तिगत राय की अनदेखी कर दी। इसके पश्चात आपने नमाज़े जुमा के ख़ुत्बे में लोगों को शत्रु के आक्रमण से अवगत करवाया। नमाज़ के पश्चात एक हज़ार लोगों को अपने साथ लेकर वे आगे बढ़े। मार्ग से ही कुछ लोग, जो मदीना नगर से बाहर निकलने के पक्ष में नहीं थे, वापस लौट गए जिससे मुसलमानों की संख्या घटकर ७०० रह गई।
 इस बीच शत्रु मदीना नगर के समीप पहुंच चुका था। दोनों सेनाएं ओहद नामक पर्वत के आंचल में एक-दूसरे के सामने आईं। इस प्रकार युद्ध आरंभ हुआ। मुसलमानों के ताबड़-तोड़ आक्रमण के कारण क़ुरैश की सेना में खलबली मच गई और उन्होंने भागना आरंभ कर दिया। कुछ मुसलमानों ने यह सोचकर कि शत्रु को पराजय हो गई है अपने महत्वपूर्ण मोर्चों को छोड़ दिया और वे शत्रु द्वारा छोड़ी हुई वस्तुओं को एकत्रित करने में लग गए। इस अवसर का लाभ उठाकर शत्रु ने अचानक ही पीछे से आक्रमण कर दिया।
 मुसलमानों की इस निश्चेतना और अवज्ञा का परिणाम उनमें से कई के शहीद, घायल और फ़रार होने के रूप में सामने आया। इस बीच पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के शहीद होने की अफ़वाह ने मुसलमानों के बीच अधिक खलबली मचा दी और वे भागने लगे। इस प्रकार ओहद के युद्ध में, जिसमें मुसलमानों को विजय निश्चित दिखाई पड़ रही थी, उन्हें पराजय का मुंह देखना पड़ा। यह पराजय सदा के लिए उनके लिए शिक्षा सामग्री बन गई।
 इस आयत से हमने सीखा कि पैग़म्बर सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम पर केवल ईश्वरीय आदेशों को पहुंचाने का दायित्व नहीं है बल्कि उन्हें लागू करना तथा धर्म के शत्रुओं से मुक़ाबला करना भी उनके कर्तव्यों में शामिल है। मुसलमानों पर भी केवल अपने व्यक्तिगत कर्तव्यों के पालन का दायित्व नहीं है बल्कि धर्म और इस्लामी समाज की सुरक्षा भी हर मुसलमान का कर्तव्य है।
 यद्यपि घर चलाना और बच्चों की देखभाल एक महत्वपूर्ण कार्य है परन्तु धर्म की रक्षा इससे भी महत्वपूर्ण है।



सूरए आल इमरान की १२२वीं और १२३वीं आयत
(याद करो उस समय को) जब तुम में से दो गुटों ने सुस्ती की (और युद्ध से भागना चाहा) परन्तु ईश्वर ने उनकी सहायता की और उन्हें इस विचार से रोके रखा। और ईमान वालों को केवल ईश्वर पर ही भरोसा करना चाहिए। (3:122) और निःसन्देह, बद्र (के युद्ध) में ईश्वर ने तुम्हारी सहायता की जबकि तुम हर दृष्टि से अक्षम और दुर्बल थे। तो ईश्वर से डरते रहो कि शायद तुम (उसकी विभूतियों के प्रति) कृतज्ञ हो सको। (3:123)

 औस तथा ख़ज़रज नामक दो क़बीलों के लोगों ने, जो पैग़म्बर के साथ आए थे, जब शत्रु की विशाल सेना को देखा तो वे भयभीत हो गए और इस बहाने के साथ कि परामर्श के समय उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया रणक्षेत्र से भागना चाहा किंतु ईश्वर की कृपा और पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के समझाने से उन्होंने अपना यह निर्णय त्याग दिया और वे शैतान के इस जाल में नहीं फ़ंसे।
 यह आयत उन्हें तथा अन्य मुसलमानों को संबोधित करते हुए कहती है कि तुम लोग जो बद्र के युद्ध में ईश्वरीय सहायता को देख चुके हो कि किस प्रकार से सैनिक एवं अन्य संभावनाएं कम होने के बाद भी ईश्वर ने तुम्हें मज़बूत शत्रु के मुक़ाबले में विजय प्रदान की, तो फिर इस युद्ध में तुम लोग क्यों सुस्ती कर रहे हो? तुम लोग अपने धर्म की रक्षा में क्यों सुदृढ़ नहीं हो? तुम लोग शत्रु से नहीं बल्कि ईश्वर की अवज्ञा से डरो। केवल ईश्वर पर ही भरोसा करो। इस दशा में तुम वास्तव में ईश्वर और उसकी कृपा तथा विभूतियों के कृतज्ञ रहोगे।
 इन आयतों से हमने सीखा कि ईमान वालों को ईश्वर, उनके हाल पर नहीं छोड़ देता बल्कि अपनी शक्ति द्वारा वह शत्रुओं से उनकी सुरक्षा करता है।
 युद्ध से डरना, युद्ध से सुस्ती और भागने का कारण बनता है। इस समस्या का उपचार केवल ईश्वर पर ईमान और भरोसा है।
 ईश्वर न केवल हमारे कर्मों बल्कि हमारी आंतरिक इच्छा और भावनाओं से भी अवगत है। इन आयतों में वह अपने पैग़म्बर को, कुछ मुसलमानों के युद्ध से भागने के निर्णय की सूचना देता है।
 ईश्वरीय सहायताओं के प्रति कृतज्ञता, उससे भयभीत रहकर प्रकट करनी चाहिए अन्यथा यह घमण्ड और युद्ध में पराजय का कारण बनती है।



 सूरए आले इमरान की १२४वीं और १२५वीं आयत
(हे पैग़म्बर! याद करो उस समय को) जब तुमने ईमान वालों से कहा था कि क्या तुम्हारे लिए यह पर्याप्त नहीं है कि ईश्वर तीन हज़ार फ़रिश्तों को उतार कर तुम्हारी सहायता करे? (3:124) क्यों नहीं, यदि तुम संयम रखो और ईश्वर से डरते रहो। और जब भी शत्रु तीव्रता के साथ क्रोध में तुमपर आक्रमण करेगा तो तुम्हारा पालनहार अपने पांच हज़ार विशेष फ़रिश्तों द्वारा तुम्हारी सहायता करेगा। (3:125)

 ईश्वरीय सहायता का उल्लेख करने वाली यह आयतें काफ़िरों से जेहाद में ईश्वर के विशेष फ़रिश्तों की उपस्थिति की ओर संकेत करती है। वास्तविकता यह है कि हम भौतिक मनुष्य, फ़रिश्तों को पहचानने की क्षमता नहीं रखते परन्तु क़ुरआन पर हमारा विश्वास इस बात का कारण बनता है कि हम उनके अस्तित्व को स्वीकार करलें। ओहद के युद्ध में फ़रिश्तों की उपस्थिति जो, मुस्लिम योद्धाओं की भावनाओं को मज़बूत बनाने के लिए थी, इस्लाम के लश्कर में वृद्धि और शत्रु के मध्य भय उत्पन्न होने का कारण बन गई।
 इन आयतों से हमने यह सीखा कि मोमिन को केवल ईश्वर पर ही भरोसा करना चाहिए क्योंकि फ़रिश्तों सहित पूरी सृष्टि, उसकी समर्थक है और इसी प्रकार से शत्रुओं को भी इस्लाम से नहीं टकराना चाहिए क्योंकि इस स्थिति में उनका मुक़ाबला इस्लाम से नहीं बल्कि ईश्वर से होता है।
 ईश्वरीय विचारधारा में मनुष्यों का जीवन फ़रिश्तों के संपर्क में है। संघर्षकर्ताओं द्वारा संयम और प्रतिरोध की दशा में ही ईश्वर की ओर से गुप्त सहायता मिलती है।
 ईश्वरीय आदेशों का पालन, रणक्षेत्र में भी आवश्यक है। मुस्लिम योद्धा को हर दशा में ईश्वर से भयभीत रहना चाहिए और उसके आदेशों का पालन करते रहना चाहिए

 सूरए आले इमरान की १२६वीं और १२७वीं आयत
और ईश्वर ने (शत्रु के साथ युद्ध में फ़रिश्तों को) तुम्हें शुभसूचना देने के लिए उतारा ताकि तुम्हारे हृदय इससे शांत हो जाएं (और तुम जान लो कि) सहायता और विजय केवल प्रभुत्वशाली और तत्वदर्शी ईश्वर की ओर से ही है। (3:126) और ताकि कुछ काफ़िरों की जड़ कट जाए या (कम से कम) वे पराजित हो जाएं और वे निराशा के साथ वापस लौट जाएं। (3:127)



 जैसा कि हमने इससे पिछले कार्यक्रमों में यह कहा था कि युद्ध के समय रणक्षेत्र में ईश्वरीय सहायताओं में से एक, फ़रिश्तों का उतरना है। फ़रिश्ते केवल पैग़म्बर के पास नहीं आते बल्कि दृढ़ संकल्प रखने वाले मोमिनों के पास भी आते हैं ताकि उनके हृदयों को मज़ूबूत बनाएं और उन्हें आशान्वित एवं प्रभुल्लित करें और जिस प्रकार से शैतान सदैव काफ़िरों और असत्य से मुक़ाबले में ईमान वालों को निराश करने का प्रयास करता रहता है, फ़रिश्ते भी उसी प्रकार ईमान वालों के हृदयों को शांत व संतुष्ट करते हैं ताकि वे केवल ये कि युद्ध से न थकें बल्कि और अधिक जोश के साथ शत्रु पर आक्रमण करें और उन्हें जड़ से उखाड़ भेकें या कम से कम उन्हें पराजय का स्वाद चखाकर अगले आक्रमणों से रोक दें।
 इन आयतों से हमने यह सीखा कि हर वह कथन या लेख जो इस्लाम के योद्धाओं को सुस्त या निराश करने का कारण बने वह शैतान की आवाज़ है और हर वह बात या कार्य जो उन्हें शांति पहुंचाने या शुभसूचना देने का कारण बने वह ईश्वरीय वाणी है। 
 यद्यपि ईश्वर हर दशा में मुसलमानों को विजयी बनाने में सक्षम है परन्तु वह तत्वदर्शिता के आधार पर काम करता है अतः यदि मुसलमान सुस्ती व ढिलाई करें तो उन्हें पराजय का मुंह देखना पड़ेगा।
 मुसलमानों की एकता, शक्ति और साहस को ऐसा होना चाहिए कि शत्रु उन पर नियंत्रण करने की ओर से निराश हो जाए।



 सूरए आले इमरान की १२८वीं और १२९वीं आयत
(हे पैग़म्बर! काफ़िरों को दण्ड देने या क्षमा करने के) मामले की कोई बात तुम्हारे हाथ में नहीं है (केवल ईश्वर है जो) या तो अपनी कृपा उन पर लौटा देता है (और उन्हें मुक्ति प्राप्त हो जाती है) या उन्हें दण्डित करता है कि वे अत्याचारी हैं। (3:128) (क्योंकि) जो कुछ आकाशों और जो कुछ धरती में है वह केवल ईश्वर का ही है और वह जिसे चाहता है, क्षमा कर देता है और जिसे चाहता है दण्ड देता है और वह बड़ा ही क्षमाशील तथा दयावान है। (3:129)
 क़ुरआन की व्याख्या की पुस्तकों में वर्णित है कि ओहद के युद्ध में शत्रु की ओर से फेंके गए पत्थरों से पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का दांत टूट गया था और उनके माथे पर भी चोट आई तो आपने कहा था कि इन लोगों को किस प्रकार से मुक्ति प्राप्त होगी? उस समय ईश्वर की ओर से यह आयत उतरी और पैग़म्बर से कहा गया कि हे पैग़म्बर! आप पर लोगों की मुक्ति का दायित्व नहीं है। आप केवल लोगों तक ईश्वरीय संदेश पहुंचाने के लिए भेजे गए हैं, जो चाहे स्वीकार करे और मुक्ति पा जाए और ज चाहे अस्वीका करे। जो लोग ईश्वरीय संदेशों को स्वीकार नहीं करते, ईश्वर उन्हें या तो अपनी दया से क्षमा कर देता है या उन्हें दण्डित करेगा।
 पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम और पवित्र क़ुरआन की सत्यता की निशानियों में से एक, यही आयत है जिसमें लोगों को दण्ड या पुरस्कार देने के संबन्ध में पैग़म्बर के किसी भी प्रकार के उत्तरदायित्व को नकारा गया है। यदि वे वास्तव में ईश्वरीय पैग़म्बर न होते तो ऐसी बात न कहते और यदि वे अपनी पैग़म्बरी में सच्चे न होते तो इस प्रकार की आयतें लोगों को न सुनाते बल्कि ऐसी आयतों को वे छिपाते, क्योंकि यह आयतें लोगों के प्रति उनके उत्तरदायित्व को सीमित करती हैं।
 इन आयतों से हमने यह सीखा कि पैग़म्बर और उनके पश्चात आने वाले धर्म के नेता, अपने उत्तरदायित्व के पालन के प्रति प्रतिबद्ध हैं न कि परिणाम के उत्तरदायी। उन्हें सत्य बात लोगों तक पहुंचा देनी चाहिए परन्तु लोग उनकी बात स्वीकार करते हैं या नहीं या ईश्वर उनके साथ किस प्रकार का व्यवहार करता है यह सब बातें उनके ज़िम्मे नहीं हैं।
 तौबा अर्थात प्रायश्चित का द्वार कभी भी और किसी भी स्थिति में किसी पर बंद नहीं है यहां तक कि युद्ध से भाग जाने वाले और युद्ध में भाग लेने वाले काफ़िर भी तौबा करें तो ईश्वर उसे स्वीकार कर लेगा।
 क्षमा करना या दण्ड देना ईश्वर से विशेष है यहां तक कि उसके प्रिय बंदों की सिफ़ारिश भी उसकी अनुमति के बाद ही होती है।
 ईश्वरीय दण्ड का कारण, स्वयं लोगों का अत्याचार, कुफ़्र व अकृतज्ञता है। 




सूरए आले इमरान की १३०वीं और १३१वीं आयत
हे ईमान वालो! ब्याज न खाओ (कि जो अस्ल पूंजी से) कई गुना अधिक (है) और ईश्वर से डरते रहो ताकि तुम्हें कल्याण प्राप्त हो जाए। (3:130) और उस आग से डरते रहो जो काफ़िरों के लिए भड़काई गई है। (3:131)
 इस्लाम में युद्ध और जेहाद, सामाजिक व आर्थिक मामलों से अलग नहीं है। इसी कारण ओहद नामक युद्ध से संबन्धित आयतों के बीच ब्याज के विषय का वर्णन किया गया है जो मानव समाज की बड़ी समस्याओं में से एक है। ब्याज देने और लेने से विभिन्न शब्दों और प्रसंगों में रोका गया है। आयत के आरंभ में ईमान वालों को संबोधित किया गया है कि ब्याज ईमान से मेल नहीं खाता। ब्याज से रोकने के पश्चात ईश्वर कहता है कि ईश्वर से डरते रहो, इसका अर्थ यह है कि ब्याज ईश्वर के भय से भी मेल नहीं खाता। आयत के अंत में कहा गया है कि ब्याज से दूर रहो ताकि तुम्हें कल्याण प्राप्त हो जाए अर्थात तुम्हारा लोक-परलोक का कल्याण ब्याज से दूरी पर ही निर्भर है।
 ब्याज विभिन्न प्रकार का होता है जिसे धर्मगुरूओं ने पूर्ण रूप से स्पष्ट किया है। इस आयत में जिस बात से रोका गया है वह पूंजी की छाया में हर प्रकार का विस्तारवाद है। अर्थात अपनी मूल पूंजी से अधिक वापस मांगना जो कुछ लोगों के पास अधिक मात्रा में धन एकत्रित होने का और कुछ लोगों के अधिक निर्धन होने का कारण बनता है।
 निष्कर्ष यह निकलता है कि शत्रु से मुक़ाबले में ऐसा समाज ही विजयी रहता है जिसके सदस्य निष्ठा रखने तथा बलिदान करने वाले हों न कि कंजूस और मायामोही।
 इन आयतों से हमने यह सीखा कि ईश्वर से भय केवल उपसना संबन्धी मामलों में ही आवश्यक नहीं है बल्कि आर्थिक मामलों में भी ईश्वर से डरना अति आवश्यक है। 
 स्वस्थ अर्थव्यवस्था की प्राप्ति, ईमान, ईश्वर से भय और उसके आदेशों के पालन से ही संभव होती है।
 मोक्ष व कल्याण, धन तथा संपत्ति से प्राप्त नहीं होता बल्कि लोगों के अधिकारों के सम्मान से प्राप्त होता है।
 ब्याज खाना एक प्रकार का कुफ़्र है। यह कार्य ईश्वर के प्रति अकृतज्ञता है और ब्याज लेने वाला मुसलमान, अधर्मी काफ़िर की भांति नरक के दण्ड में फंसेगा।

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