कुरान तर्जुमा और तफसीर -सूरए बक़रह 2:89-107, जादू टोना और यहूदी

सूरए बक़रह की ८९ नवासीवीं आयत इस प्रकार है। और जब ईश्वर की ओर से उनके लिए क़ुरआन नामक किताब आई (जो उन निशानियों के अनुकूल थी जो उनके पा...

सूरए बक़रह की ८९ नवासीवीं आयत इस प्रकार है।

और जब ईश्वर की ओर से उनके लिए क़ुरआन नामक किताब आई (जो उन निशानियों के अनुकूल थी जो उनके पास थीं) और इससे पूर्व वे काफ़िरों पर विजय की शुभ सूचना दिया करते थे, तो जब उनके पास वे वस्तुएं आ गईं जिन्हें वे पहचान चुके थे, तो उन्होंने उनका इन्कार कर दिया तो इन्कार करने वालों पर ईश्वर की धिक्कार हो। (2:89)
 पिछले कार्यक्रमों में हम ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम तथा तौरेत के आदेशों के समक्ष बनी इस्राईल के इन्कार और हठ के कुछ उदाहरण प्रस्तुत किये थे। ये आयत इस्लाम के उदय के समय के यहूदियों से संबंधित है कि जो तौरेत में आने वाली पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की निशानियों के आधार पर उनके आने की प्रतीक्षा कर रहे थे और इसी कारण वे अपना देश और अपनी धरती छोड़ कर हेजाज़ अर्थात आज के सऊदी अरब आ गए थे।
 मदीना नगर तथा उसके समीप रहने वाले यहूदी, मदीने के अनेकेश्वरवादियों से कहते थे कि शीघ्र ही मोहम्मद नाम का एक पैग़म्बर आएगा और हम उसपर ईमान लाएंगे और वो अपने शत्रुओं पर विजयी होगा।
 परन्तु जब पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने मदीने की ओर हिजरत की तो वहां के अनेकेश्वरवादी उनपर ईमाल ने आए किन्तु यहूदियों ने संसारप्रेम और हठ के कारण उनका इन्कार कर किया और वास्तव मे उन्होंने तौरेत की भविष्यवाणियों का इन्कार किया।
 ये आयत बताती है कि केवल ज्ञान और पहचान पर्याप्त नहीं है बल्कि सत्य स्वीकार करने और उसके समक्ष झुकने की भावना भी आवश्यक है। यद्यपि यहूदी और विशेषकर उनके विद्वान, पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को पहचान चुके थे परन्तु सत्य को स्वीकार करने और उसके समक्ष झुकने के लिए तैयार नहीं थे।
सूरए बक़रह की ९०वीं आयत इस प्रकार है।
उन्होंने कितनी बुरी वस्तु के बदले में स्वयं को बेच दिया कि ईष्या के कारण उसका इन्कार करने पर तैयार हो गए जिसे ईश्वर ने उतारा था, क्योंकि ईश्वर अपनी दया से अपने बन्दों में से जिस पर भी चाहे अपनी आयतें उतारता है, तो वे ईश्वर के निरंतर प्रकोप में फंस गए और इन्कार करने वालों के लिए अपमानजनक दंड है। (2:90)
 यहूदियों को आशा थी कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम भी बनी इस्राईल के मूल से होंगे ताकि वे उन पर ईमान लाएं, परन्तु जब उन्होंने देखा कि ऐसा नहीं है तो वे जातीय द्वेष और ईर्ष्या के कारण इस्लाम नहीं लाए, यहां तक कि उन्होंने इस बात पर ईश्वर पर आपत्ति भी की।
 यहूदियों ने इस कार्य द्वारा घाटे का सौदा किया, क्योंकि वे पैग़म्बरे इस्लाम पर ईमान लाने के लिए लम्बी यात्राओं की कठिनाइयां झेलकर मदीने आए थे, और वे स्वयं इस्लाम के प्रचारक थे, परन्तु केवल हठ और ईर्ष्या के कारण वे काफ़िर हो गए और स्वयं को ईर्ष्या के दामों बेच दिया और अपना लक्ष्य प्राप्त न कर सके।
सूरए बक़रह की इकानवेवीं आयत इस प्रकार है।
और जब उनसे कहा जाता कि जो कुछ ईश्वर ने उतारा है उसपर ईमान ले आओ तो वे कहते कि हम केवल उसी बात पर ईमान लाएंगे जो हमारे (पैग़म्बर) पर उतरी है। और उसके अतिरिक्त बातों का इन्कार कर देते। जबकि ये (क़ुरआन) सत्य है और उनके पास ईश्वरीय आयतों में से जो कुछ है, उसकी पुष्टि करता है। हे पैग़म्बर उनसे कह दो यदि तुम उन बातों पर ईमान रखते जो तुम पर उतारी गई हैं तो इससे पहले तुम लोगों ने पैग़म्बरों की हत्या क्यों की। (2:91)
 यह आयत यहूदियों को संबोधित करते हुए कहती है, यदि अपने भूल का न होने के कारण तुम मोहम्मद पर ईमान नहीं लाए तो तुम उन पैग़म्बरों को क्यों झुठलाते और उनकी हत्या करते थे, जो तुम्हारे ही मूल के थे?
 अतः तुम सत्य के विरोधी हो और इसमें कोई अंतर नहीं है कि सत्य को तुम्हारे पैग़म्बर प्रस्तुत करें या पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम तुम्हारी तौरेत से आया हो या क़ुरआन में।
 मूल रूप से आसमानी किताबों में जो कुछ आया है वो एक ईश्वर की ओर से और सभी लोगों के लिए आया है तथा किसी भी जाति या मूल से विशेष नहीं है कि कोई ये कहे कि मैं केवल उसी बात पर ईमान रखता हूं जो हमारे पैग़म्बर लाए हैं और उसके अतिरिक्त किसी भी बात को नहीं मानता हूं।
क्योंकि आसमानी किताबों में जो बातें आई हैं वो सारी की सारी एक ही दिशा में है और एक दूसरे से समन्वित हैं, उनमें विपरीतता नहीं पाई जाती जैसा कि विश्व विद्यालय की पाठ्य पुस्तकें, कालेज की पाठ्य पुस्तकों से समन्वित और उनके अनुकूल होती हैं परन्तु अधिक परिपूर्ण रूप में।
सूरए बक़रह की बानवेवीं आयत इस प्रकार है।
निःसन्देह, मूसा तुम्हारे लिए अनके चमत्कार लाए, परन्तु तुम ने उनकी अनुपस्थिति में बछड़े को (ईश्वर के स्थान पर) मान लिया जबकि तुम अत्याचारी थे। (2:92)
 इस बात का दूसरा तर्क कि यहूदियों ने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के अरब होने को, उनपर ईमान ल जाने का एक बहाना बना रखा था ये था कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम स्वयं उन्हीं के मूल के थे और उनके लिए अनेक स्पष्ट चमत्कार लाए थे।
 परन्तु जब हज़रत मूसा नूर नामक पहाड़ पर तौरेत लेने के लिए गए तो बनी इस्राईल ने बछड़े की पूजा आरंभ कर दी और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के सारे कष्टों पर पानी फेर दिया। वास्तव में उन्होंने स्वयं पर भी और अपने नेता पर भी अत्याचार किया।
अब सूरए बक़रह की ९३ तिरानवेवीं आयत इस प्रकार है।
और याद को उस समय को जब हम ने तुमसे प्रतिज्ञा ली थी और तूर पहाड़ की चोटियों को तुम्हारे ऊपर उठा दिया था और तुम से कहा था कि जो कुछ हमने तौरेत और उसके आदेशों में से तुम्हें दिया है उसको मज़बूती से पकड़ो और सुनो। परन्तु उन्होंने कहाः हमने सुना और अवज्ञा की। अपने कुफ़्र के कारण उन्होंने अपने हृदय में बछड़े को बसा लिया। हे पैग़म्बर उनसे कह दो कि तुम्हारा ईमान तुम्हें जिस बात का आदेश देता है वो कितनी बुरी बात है, यदि तुम ईमान रखते हो। (2:93)
 हमने कहा था कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम पर ईमान न लाने के लिए यहूदी जाति का एक बहाना ये था कि वो बनी इस्राईल से नहीं हैं और हम केवल उसी पैग़म्बर पर ईमान लाएंगे जो हमारी जाति का हो, और हम केवल मूसा की किताब तौरेत का पालन करेंगे।
 क़ुरआन ने पिछली आयतों में कुछ उदाहरण देकर ये सिद्ध कर दिया है कि ये अपने पैग़म्बर हज़रते मूसा और उनकी किताब तौरे पर भी ईमान नहीं रखते और उसके विपरीत काम करते हैं, इस आयत में भी ऐसे ही एक उदाहरण का वर्णन हुआ है।
 ईश्वर ने तूर नामक पहाड़ पर बनी इस्राईल से कुछ बातों की प्रतिज्ञा ली थी और उनसे कहा था कि उन प्रतिज्ञाओं पर प्रतिबद्ध रहें, परन्तु उन लोगों ने सुनने के बाद भी अवज्ञा की।
 क्योंकि अनेकेश्वरवाद तथा संसारप्रेम, जिसका एक उदाहरण सामरी के सोने के बछड़े की उपासना थी, उनके हृदय में इतना अधिक रच बस गया था कि सोच विचार और ईमान के लिए कोई स्थान नहीं बचा था और रोचक बात ये है कि इतनी सारी अवज्ञा से बाद भी उन्हें ईमान का दावा था।
 क़ुरआन उनके उत्तर में स्वयं उन्हीं से एक प्रश्न करता है कि क्या तुम्हारा ईमान तुम्हें आदेश देता है कि तुम ईश्वर की प्रतिज्ञा तोड़ो, बछड़े की पूजा करो और ईश्वरीय पैग़म्बरों की हत्या करो? यदि ऐसा ही है तो तुम्हारा ईमान तुम्हें बुरे आदेश देता है।
आइए अब देखते हैं कि इन आयतों से हमने क्या बातें सीखीं।
 यदि हम देखते हैं कि आज यहूदी और ईसाई, इस्लाम स्वीकार नहीं करते तो हमें इस्लाम की सत्यता में सन्देह नहीं करना चाहिए, बल्कि उनमें से बहुत से ऐसे हैं जो सत्य को समझ चुके हैं परन्तु अहं और आत्मिक इच्छाओं के कारण उसे स्वीकार नहीं करते जैसा कि मदीने के यहूदी पैग़म्बरे इस्लाम को पहचान गए थे परन्तु उनपर ईमान नहीं लाए।
 ईर्ष्या कुफ़्र व इन्कार का कारण बनती है, बनी इस्राईल ने जब देखा कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम उनमें से नहीं हैं तो उन्होंने ईर्ष्या के कारण उनका इन्कार कर दिया और उन्हें झुठलाया।
 ईश्वर के अतिरिक्त किसी से भी हद से अधिक प्रेम ख़तरनाक है क्योंकि वह मनुष्य को वास्तविकताएं देखने नहीं देता। जब एक बछड़े की सोने की प्रतिमा ने बनी इस्राईल के हृदय में स्थान बना लिया, तो उनकी दृष्टि में ईश्वर, मूसा तथा तौरेत के आदेशों का महत्व समाप्त हो गया तथा उसके स्थान पर अनेकेश्वरवाद और मूर्तिपूजा ने जड़ पकड़ ली।

सूरए बक़रह; आयतें 94-98 (कार्यक्रम 38)
सूरए बक़रह की ९४वीं और ९५वीं आयतें इस प्रकार हैं।
हे पैग़म्बर! उन यहूदियों से कह दीजिए कि यदि प्रलय का घर स्वर्ग ईश्वर के पास तुम्हारे ही लिए है न कि अन्य लोगों के लिए तो यदि तुम सच्चे हो तो मृत्यु की आशा करो। (2:94) परन्तु हे पैग़म्बर उन्होंने जो बुरे कर्म स्वयं से पहले भेज रखे हैं उनके कारण वे कदापि मृत्यु की आशा नहीं करेंगे। और ईश्वर अत्याचारियों के कर्मों से पूर्णतः अवगत है। (2:95)
 यहूदी स्वयं को उत्तम समुदाय समझते रहे थे और उनका विचार था कि स्वर्ग को उन्ही के लिए बनाया गया है, नरक की आग उनके लिए नहीं है, वे ईश्वर के बच्चे और मित्र हैं।
 इन ग़लत विचारों के कारण एक ओर तो वे स्वतंत्रतापूर्वक हर प्रकार के अपराध, अत्याचार, पाप और विद्रोह करते थे और दूसरी ओर घमंड, स्वाभिमान और अहंकार में ग्रस्त रहते थे।
 यह आयत उनकी अंतरात्मा को फ़ैसले के लिए झिंझोड़ती है और कहती है कि यदि वास्तव में ऐसा ही जैसा तुम दावा करते हो और स्वर्ग केवल तुम्हारे लिए ही है तो तुम लोग मृत्यु की कामना क्यों नहीं करते कि जल्दी से स्वर्ग में चले जाओ, क्यों तुम लोग मौत से डरते हो और उससे भागते हो?
 मृत्यु के भय, यात्रा से वाहन चालक के भय के समान है, यात्रा से वो चालक भयभीत रहता है जो मार्ग को नहीं पहचानता या जिसके पास पेट्रोल नहीं होता या जिसने ट्रैफ़िक के क़ानून को तोड़ा होता है, या तस्करी का माल लेकर जा रहा होता है, या जिसका गंतव्य में कोई आवास नहीं होता। जबकि वास्तविक मोमिन रास्तें को भी पहचानता है और अच्छे कर्मों द्वारा रास्ते का ईंधन भी अपने पास रखता है। वो तौबा अर्थात पश्चाताप और प्राइश्चित द्वारा अपने उल्लंघनों की क्षतिपूर्ति भी कर देता है और उसके पास तस्करी का माल अर्थात पाप और अत्याचार भी नहीं होता है। प्रलय में उसके पास रहने का ठिकाना भी होगा जो कि स्वर्ग है।
 अधिकांश लोग जो मृत्यु से डरते हैं उनके भय का कारण इन दो बातों में से एक है। या तो वो मृत्यु को अंत समझते हैं और प्राकृतिक रूप से हर जीव अपने अंत से भयभीत रहता है, या वो प्रलय पर विश्वास रखते हैं परन्तु अपने बुरे कर्मों के कारण मृत्यु से डरते हैं क्योंकि वे मृत्यु को अपने कर्मों के फ़ैसले का आरंभ समझते हैं, इसीलिए वे चाहते हैं कि उनकी मृत्यु देर से आए।
 परन्तु पैग़म्बर और ईश्वरी दूत कि जो एक ओर मृत्यु को अंत नहीं बल्कि एक नए जीवन का आरंभ समझते हैं और दूसरी ओर उन्होंने विचार और व्यवहार में केवल अच्छी बातें की हैं, वे न केवल ये कि मृत्यु से नहीं डरते बल्कि उससे मिलने को उत्सुक रहते हैं।
 जैसा कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपने बारे में कहते हैं, ईश्वर की सौगंध अली को मृत्यु की चाह, दूध से शिशु की चाह से भी अधिक है।
सूरए बक़रह की ९६वीं आयत इस प्रकार है।
और (हे पैग़म्बर) तुम यहूदियों को सांसारिक जीवन के प्रति लोगों यहां तक कि अनेकेश्वरवादियों की तुलना में अधिक लोभी पाओगे, यहां तक कि उनमें से हर एक चाहता है कि हज़ार वर्ष की आयु बिताए, हलांकि यदि उन्हें ये लम्बी आयु दे भी दी जाए तो उन्हें दंड से नहीं रोक पाएगी और ईश्वर उनके कर्मों को देखने वाला है। (2:96)
 यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम को संबोधित करते हुए कहती है यहूदी जो ये दावा करते हैं कि स्वर्ग केवल उन्हीं के लिए है, न केवल ये कि मृत्यु की कामना नहीं करते कि शीघ्र ही स्वर्ग में चले जाएं बल्कि अन्य लोगों यहां तक कि अनेकेश्वरवादियों से भी अधिक इस संसार के जीवन का लोभ रखते हैं जबकि अनेकेश्वरवादी तो प्रलय को स्वीकार ही नहीं करते और मृत्यु को ही अपने जीवन का अंत समझते हैं।
 वे सांसारिक जीवन से इतना प्रेम करते हैं कि चाहते हैं इस संसार में हज़ार वर्षों तक जीवन व्यतीत करें, यहां तक कि वे दुर्भाग्य से पूर्ण अत्यंत तुच्छ जीवन व्यतीत करने के लिए भी तैयार हैं ताकि ईश्वरीय दंड और प्रकोप से भी बचे रहें और सांसारिक धन बटोरने का प्रयास भी करते रहें।
 परन्तु ईश्वर कहता है कि यदि उन्हें हज़ार वर्ष की आयु दे भी दी जाए तक भी वो ईश्वरीय दंड से उनकी मुक्ति का कारण नही बन सकती क्योंकि उनके सभी कर्म ईश्वर की दृष्टि में हैं और इन बचकाना आशाओं का कोई लाभ नहीं है।
सूरए बक़रह की ९७वीं और ९८वीं आयतें इस प्रकार हैं।
(हे पैग़म्बर उन लोगों से जो ये कहते हैं कि यिद जिब्रईल तुम्हारे लिए वहय अर्थात ईश्वरीय सन्देश लाते हैं, तो हम तुम पर ईमान नहीं लाएंगे क्योंकि हम जिब्रईल के शत्रु हैं) कह दो कि जो जिब्रईल का शत्रु है (वास्तव में वह ईश्वर का शत्रु है) क्योंकि जिब्रईल ने ईश्वर के आदेश से क़ुरआन को तुम्हारे हृदय पर उतारा है, वो क़ुरआन जो पहले की आस्मानी किताबों की पुष्टि करने वाला और ईमान वालों के लिए शुभ सूचना है। (2:97) और जो कोई भी ईश्वर, उसके फ़रिश्तों व पैग़म्बरों और जिब्रईल व मीकाईल का शत्रु है तो (वह जान ले कि) ईश्वर काफ़िरों का शत्रु है। (2:98)
 जब पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम मदीने आए तो यहूदियों का एक गुट अपने एक ज्ञानी के साथ उनके पास आया और उनसे कुछ प्रश्न किये, उन्होंने एक प्रश्न ये किया कि उस फ़रिश्ते का क्या नाम है जो आपके पास ईश्वरीय संदेश लेकर आता है। जब पैग़म्बरे इस्लाम ने कहा कि उसका नाम जिब्रईल है तो उन्होंने कहा कि यदि वो मीकाईल होता तो हम ईमान ले आते क्योंकि जिब्रईल हमारा शत्रु है और जेहाद अर्थात धर्मयुद्ध जैसे कड़े आदेश लाता है। 
 जब मनुष्य सत्य को स्वीकार न करना चाहे तो वो बहाने ढूंढता है, यहां तक कि वो किसी फ़रिश्ते पर बेजा कड़ाई का आरोप लगाने पर ही तैयार हो जाता है कि शायद सत्य को स्वीकार न करने का कोई मार्ग बचा रहे। बिल्कुल उस नटखट विद्यार्थी की भांति जो गणित के अध्यापक को बुरा और खेल के अध्यापक को अच्छा समझता है।
 नैतिक रूप से ईश्वरीय फ़रिश्ते चाहे जिब्रईल हों या मीकाईल, अपनी ओर से कोई आदेश नहीं लाते कि उनसे मित्रता या शत्रुता की जाए। वे ईश्वर के आदेश के अतिरिक्त कुछ नहीं करते वे केवल ईश्वर और उसके पैग़म्बरों के बीच केवल एक माध्यम हैं अतः यहूदियों की बातें इस्लाम स्वीकार न करने के लिए केवल एक बहाना थीं न कि इस्लाम स्वीकार करने के लिए कोई स्वीकारीय तर्क।
आइए अब देखते हैं कि इन आयतों से हमने क्या सीखा।
 मनुष्य को इस प्रकार जीवन व्यतीत करना चाहिए कि वो सदैव, हर पल मरने के लिए तैयार रहे। उसने अपने कर्तव्यों का ठीक से पालन किया हो और पापों की प्राइश्चित द्वारा भरपाई कर ली हो, इस दशा में मृत्यु से डरने का कोई कारण नहीं है। 
 लम्बी आयु महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि आयु की विभूति मूल्यवान है जो ईश्वर के सामिप्य में है। इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम एक प्रार्थना में कहते हैं, प्रभुवर यदि मेरी आयु तेरे आज्ञापालन का साधन हो तो उसे लंबा कर दे परन्तु यदि वो शैतान की शिकारगाह हो तो उसे समाप्त कर दे।
 धर्म कई बातों के एक समूह का नामक है तथा उसकी हर बात पर आस्था रखना आवश्यक है, ये नहीं कहा जा सकता मैं ईश्वर पर ईमान रखता हूं परन्तु इस फ़रिश्ते को शत्रु समझता हूं या उस पैग़म्बर पर विश्वास नहीं रखता। सच्चा मोमिन ईश्वर और उसके सभी पैग़म्बरों और फ़रिश्तों पर ईमान रखता है। 


�सूरए बक़रह की ९९वीं आयत इस प्रकार है।
(हे पैग़म्बर) हमने तुम्हारी ओर स्पष्ट आयतें भेजीं हैं कि जिनका इन्कार अवज्ञाकारियों के अतिरिक्त कोई नहीं करता। (2:99)

  मदीना नगर के यहूदी इस्लाम स्वीकार न करने के लिए विभिन्न प्रकार के बहाने बनाते थे उदाहरण स्वरूप उन्होंने कहा कि चूंकि जिब्रईल ने ये आयतें तुम पर उतारी हैं अतः हम तुम पर ईमान नहीं लाएंगे। इस आयत में उनके एक अन्य बहाने का उल्लेख हुआ है।
 वे कहते हैं कि हम इस किताब से कुछ नहीं समझते और इसकी बातें हमारे लिए अस्पष्ट हैं अतः हम तुम पर ईमान नहीं लाएंगे और क़ुरआन को तुम्हारे चमत्कार के रूप में स्वीकार नहीं करेंगे।
 जबकि क़ुरआन के अध्ययन तथा उसकी आयतों पर सोच विचार करके सरलता से पैग़म्बरे इस्लाम की नुबुव्वत अर्थात उनके ईश्वरीय दूत होने की सच्चाई और क़ुरआन की महानता को समझा जा सकता है, अलबत्ता इस वास्तविक्ता को केवल वही लोग समझ सकते हैं जिनके हृदय पाप के कारण अन्धकारमय न हो गए हों और जो सत्य को स्वीकार करने की योग्यता रखते हों।
 क्योंकि पाप, कुफ़्र का आधार है और मनुष्य अनुचित इच्छाओं के पालन द्वारा कुफ़्र की ओर झुकने लगता है और सत्य को छिपाने का प्रयास करता है, क्योंकि यदि वो सत्य को स्वीकार करले तो सरलता से पाप नहीं कर सकता। 
सूरए बक़रह की सौवीं आयत इस प्रकार है।
क्या ऐसा नहीं था कि हर बार जब उन यहूदियों ने ईश्वर से प्रतिज्ञा की तो उनमें एक गुट ने उसे तोड़ दिया और उसका विरोध किया, बल्कि इनमें से अधिकांश ईमान नहीं लाएंगे। (2:100)
 यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को सांत्वना देते हुए कहती है कि यदि यहूदी ईमान नहीं लाते तो तुम निराश मत हो क्योंकि ये वहीं समुदाय है जो अपने पैग़म्बर के प्रति भी वफ़ादार नहीं रहा है और इसने जब भी हज़रत मूसा से कोई प्रतिज्ञा की तो उसे अवश्य तोड़ दिया तथा बहाने बाज़ी और हठ में इनका बड़ा पुराना इतिहास है।
 जब पैग़म्बरे इस्लाम मदीने पहुंचे तो वहां के यहूदियों ने उनसे समझौता किया कि वे कम से कम उनके शत्रुओं की सहायता नहीं करेंगे परन्तु उन्होंने इस समझौते को भी तोड़ दिया और अहज़ाब नामक युद्ध में उन्होंने मुसलमानों के विरुद्ध मक्के के अनेकेश्वरवादियों का साथ दिया।
 आज भी ज़ायोनी इस्राईल में किसी भी अंतर्राष्ट्रीय समझौते या क़ानून पर प्रतिबद्ध नहीं हैं और यदि वे किसी समझौते पर हस्ताक्षर कर भी देते हैं तो शीघ्र ही उसका उल्लंघन कर देते हैं क्योंकि यहूदी एक जातिवादी और वशिष्टताप्रेमी समुदाय है।
अब सूरए बक़रह की आयत नंबर १०१ का अनुवाद प्रस्तुत करते हैं।
और जब (पैग़म्बरे इस्लाम) ईश्वरीय दूत के रूप में उनके पास आए, जिसकी निशानियां उनके पास मौजूद निशानियों के अनुकूल थीं तो उनमें से एक गुट ने, जिसके पास आस्मानी किताब थी, ईश्वर की किताब को इस प्रकार पीछे डाल दिया मानो उसके बारे में उन्हें कोई ख़बर ही न हो। (2:101)
 पैग़म्बरे इस्लाम के आगमन से पूर्व यहूदियों के धर्मगुरू लोगों को उनके आने की शुभ सूचना दिया करते थे और तौरेत में वर्णित उनकी निशानियों का उल्लेख करते थे परन्तु जब उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम को देखा तो इस प्रकार उनका इन्कार किया मानो उनके बारे में उन्हें कुछ भी ज्ञान नहीं हो।
 जी हां, पद प्रेम का ख़तरा, सभी लोगों विशेषकर ज्ञानियों को लगा रहता है। जब यहूदियों के ज्ञानियों और धर्मगुरूओं को ये आभास हुआ कि यदि वे पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की सत्यता को स्वीकार करलें तो उनका सांसारिक पद उनसे छिन जाएगा तो उन्होंने पैग़म्बर के ईश्वरीय दूत होने का इन्कार कर दिया।
 अलबत्ता पवित्र क़ुरआन जो न्याय के आधार पर इतिहास का वर्णन करता है, यहूदियों के अच्छे और पवित्र लोगों के अधिकारों को सुरक्षित रखता है और कहता है कि उनमें से अधिक्तर ने इन्कार किया, अर्थात उनके एक गुट ने सत्य को स्वीकार किया यद्यपि उनकी संख्या कम ही थी।
अब सूरए बक़रह की आयत नंबर १०२ का अनुवाद प्रस्तुत करते हैं।
यहूदियों ने तौरेत का अनुसरण करने के स्थान पर सुलैमान के काल में जो कुछ जादू टोने शैतान पढ़ा करते थे उसका अनुसरण किया जबकि सुलैमान ने कभी भी अपने हाथों को जादू टोने से दूषित नहीं किया और काफ़िर नहीं हुए बल्कि वो शैतान काफ़िर हुए जो लोगों को जादू टोना सिखाते थे। और यहूदियों ने शहर बाबिल के दो फ़रिश्तों हारूत और मारूत पर जो कुछ उतारा गया था उसका अनुसरण किया, यद्यपि वे दोनों लोगों को कुछ नहीं सिखाते थे, जब तक कि कह न देते थे कि हम तो बस तुम्हारी परीक्षा का माध्यम हैं तो तुम इसे सीख कर कुफ़्र में न पड़ता। तो ये लोग उनसे केवल वो चीज़ सीखते जिसके द्वारा पति पत्नी में फूट डाल सकें, यद्यपि यह लोग उससे ईश्वर के आदेश के बिना किसी को कोई हानि नहीं पहुंचा सकते थे, और ये वो चीज़ सीखते थे जो उनके लिए हानिकारक थी, लाभदायक नहीं थी। और वे भलि भांति जानते थे कि जो कोई इस चीज़ का ग्राहक हुआ उसका प्रलय में कोई भाग नहीं होगा, क्या ही बुरी चीज़ है जिसके बदले उन्होंने अपने प्राणों का सौदा किया, क्या ही अच्छा होता कि वे इसको जानते। (2:102)
 हज़रत सुलैमान पैग़म्बर के काल में जादू टोने का बहुत अधिक प्रचलन था अतः उन्होंने आदेश दिया कि सभी जादूगरों की पोथियों को एकत्रित किया जाए और उनकी देखभाल की जाए परन्तु उनके पश्चात एक गुट को वो पोथियां मिल गईं और उन्होंने समाज में जादू की शिक्षा और उसे फैलाना आरंभ किया।
 यह आयत कहती है कि बनी इस्राईल के कुछ लोगों ने तौरेत का अनुसरण करने के स्थान पर, जादू टोने की उन्ही किताबों का अनुसरण किया और अपने कार्य के औचित्य में कहा कि ये किताबें सुलैमान से संबंधित हैं और वे एक बहुत बड़े जादूगर थे।
 क़ुरआन उनके उत्तर में कहता है, सुलैमान कदापि जादूगर नहीं थे बल्कि वो ईश्वरीय दूत हैं और उन्होंने जो कुछ किया वो जादू नहीं चमत्कार था और तुम लोगों ने उन शैतानों का अनुसरण किया जो इन बातों को प्रचलित करते थे।
 अलबत्ता यहूदियों ने एक अन्य मार्ग से भी जादू सीखा था। वह इस प्रकार कि हारूत व मारूत नामक दो ईश्वरीय फ़रिश्ते मनुष्य के रूप में आकर बाबिल नगर के लोगों को जादू का तोड़ सिखाते थे।
 यद्यपि ये दो फ़रिश्ते लोगों को ये आदेश देते रहते थे कि उन्हें इस पद्धति का ग़लत प्रयोग नहीं करना चाहिए परन्तु वे लोग इस ज्ञान का दुरुपयोग करके अपने भौतिक हितों व लक्ष्यों की पूर्ति किया करते थे।
 बहरहाल यहूदियों ने इन दो मार्गों से जादू सीख लिया था और उसे अपने अनैतिक हितों के लिए प्रयोग कर रहे थे जबकि वे जानते थे कि जादू का परिणाम कुफ़्र के समान है और वो परिवार तथा समाज को नुक़सान पहुंचाता है।
 ये आयत बताती है कि जादू वास्तविक्ता रखता है और मानव जीवन में प्रभावशाली है, परन्तु चूंकि हर बात ईश्वर के हाथ में है अतः उससे शरण मांग कर तथा उसपर भरोसा करके और प्रार्थना और दान दक्षिणा द्वारा जादू के बुरे परिणामों से बचा जा सकता है।
 इसी प्रकार यह भी ज्ञात होता है कि ज्ञान सीखना भी सदैव लाभदायक नहीं होता यदि सीखने वाला अच्छा आदमी न हो तो वो ज्ञान द्वारा लोगों की सेवा के स्थान पर समाज में बुराई फैलाता है।
आइए अब देखते हैं कि इन आयतों से हमने क्या सीखा।
 यदि हम देखते हैं कि बहुत से मनुष्य ईमान लाने के लिए तैयार नहीं हैं तो हमें ईश्वरीय धर्मों में सन्देह नहीं करना चाहिए बल्कि ये समझना चाहिए कि पाप और अपराध मनुष्य की आत्मा पर इतना प्रभाव डालता है कि वो सत्य को स्वीकार करने की तत्परता खो बैठता है।
 केवल ज्ञान पर्याप्त नहीं है बल्कि सत्य को स्वीकार करने की भावना भी आवश्यक है। यहूदियों के ज्ञानियों को तौरेत के आधार पर पैग़म्बरे इस्लाम की सत्यता का ज्ञान था परन्तु न केवल ये कि वे स्वंय उनपर ईमान नहीं लाए बल्कि दूसरों को भी उनपर ईमान लाने से रोकते थे।
 ज्ञान सदैव लाभदायक नहीं है बल्कि वो एक तेज़ चाक़ू की भांति है कि यदि डाक्टर के हाथ में हो तो रोगी की मृत्यु से मुक्ति का कारण बनता है और यदि किसी हत्यारे के हाथ में हो तो स्वस्थ मनुष्य की मौत का कारण बनता है।
 शैतान, पति-पत्नी के बीच मतभेद उत्पन्न करने और समाज में फूट डालने का प्रयास करते हैं जबकि फ़रिश्ते पति-पत्नी के बीच सुधार व शांति चाहते हैं। मनुष्यों के भी दो गुट हैं एक गुट शैतान के मार्ग पर चलता है तथा दूसरा फ़रिश्तों के मार्ग पर।


सूरए बक़रह की आयत नंबर १०३ इस प्रकार है। 
यदि वे ईमान लाते और ईश्वर से भयभीत रहते तो निःसन्देह, उनके लिए ईश्वर के पास जो बदला है वो बेहतर था, यदि वे जानते होते। (2:103)
 पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि यहूदी जाति, तौरेत व अन्य आस्मानी किताबों का अनुसरण करने के स्थान पर जादू टोने से संबन्धित किताबों की ओर आकृष्ट हुई। अपने इस कार्य के औचित्य के लिए वे हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम को जादू टोने का स्रोत बताते थे, परन्तु क़ुरआन ने हज़रत सुलैमान को इस लांछन से दूर और पवित्र बताया।
 यह आयत कहती है कि यदि यहूदी वास्तविक ईमान रखते और इस प्रकार के अनुचित कार्यों और निराधार आरोपों से दूर रहते तो उनके लिए बेहतर था क्योंकि केवल ईमान ही पर्याप्त नहीं है बल्कि अपने कार्यों की देख-रेख और पवित्रता भी आवश्यक है।
 ईश्वर से भयभीत रहना केवल बुरे कार्यों से बचने का नाम नहीं है बल्कि ये एक आंतरिक शक्ति है जो मनुष्य को झूठ जैसे बुरे कार्य से भी रोकती है और नमाज़ जैसे अच्छे कार्य के लिए प्रेरित करती है।
आइए अब सूरए बक़रह की आयत क्रमांक १०४ इस प्रकार है।
हे ईमान लाने वालो, पैग़म्बर से मोहलत मांगने के लिए "राएना" शब्द मत कहो (क्योंकि यहूदियों के समीप ये एक प्रकार का अपशब्द है) बल्कि कहो, "उन्ज़ुरना" (अर्थात हमें समय या मोहलत दीजिए) इस बात को सुनो और जान लो कि काफ़िरों के लिए ख़तरनाक दण्ड है। (2:104)
 जब पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम भाषण कर रहे होते या ईश्वरीय आयतों की तिलावत कर रहे होते तो इस्लाम के उदय के समय के मुसलमान उनकी बातों को अच्छे ढंग से समझने के लिए, उनसे निवेदन करते कि वे उनकी स्थिति के अनुसार बात करें।
 अपना यह निवेदन वे "राएना" शब्द कहकर करते जिसका अर्थ है हमारा भी ध्यान रखें परन्तु इब्रानी या हिब्रू भाषा में इस शब्द का अर्थ मूर्खता है और यहूदी, मुसलमानों का परिहास करते थे कि तुम अपने पैग़म्बर से निवेदन करते हो कि वे तुम्हें मूर्ख बनाएं।
 अतः आयत आई कि "राएना" शब्द के स्थान पर "उन्ज़ुरना" शब्द कहो जिसका अर्थ भी वही है जो राएना का है ताकि शत्रु दुरुपयोग न कर सकें और इसे तुम्हारे और पैग़म्बर के परिहास का साधन न बनाएं, और मूल रूप से तुम्हें हर उस शब्द और कार्य से बचना चाहिए जो शत्रु के हाथ कोई बहाना दे।
 यह आयत बताती है कि इस्लाम, बड़े लोगों और अध्यापकों से बात करते समय उचित शब्दों का चयन और उनके सम्मान पर ध्यान देता है और मुसलमानों को हर उस कार्य से रोकता है जो पवित्र चीज़ों के अपमान या परिहास और शत्रु के द्वारा दुरूपयोग का कारण बनता हो।
आइए अब सूरए बक़रह की १०५वीं आयत है।
आसमानी किताब रखने वाले काफ़िर और इसी प्रकार अनेकेश्वरवादी नहीं चाहते कि तुम्हारे पालनहार की ओर से तुम्हारे लिए विभूति भेजी जाए जबकि ईश्वर जिसको चाहता है अपनी दया को उसके लिए विशेष कर देता है और वो महान कृपालु है। (2:105)
 यह आयत मोमिनों के प्रति काफ़िरों और अनेकेश्वरवादियों की शत्रुता और द्वेष का उल्लेख करती है कि वे ईर्ष्या के कारण ये नहीं देख सकते कि मुसलमानों के पास कोई आस्मानी किताब और पैग़म्बर हो और वे अन्य आसमानी किताब वालों की ग़लत बातों और उनके द्वारा की गई उलटफेर के विरुद्ध संघर्ष करें।
 इस आयत में ईश्वर कहता है कि वे अपनी दया व कृपा के आधार पर, जिसे बेहतर समझता है पैग़म्बर बनाता है और उसे लोगों की इन इच्छाओं से कुछ लेना- देना नहीं कि वो पैग़म्बर इस जाति का हो या उस जाति का, इस क़बीले का हो या उस क़बीले का।
सूरए बक़रह की आयत नंबर १०६ इस प्रकार है।
हम जिस आदेश या आयत को स्थगित करते हैं या उसके उतारने में विलंब करते हैं तो उस से बेहतर या उसी के समान ले आते हैं क्या तुम नहीं जानते कि ईश्वर इस बात की शक्ति व क्षमता रखता है। (2:106)
 आरंभ में मुसलमानों का क़िबला बैतुलमुक़द्दस की दिशा में था परन्तु चूंकि यहूदी इस बात को बहाना बनाकर कहते थे कि तुम मुसलमानों का कोई स्वाधीन धर्म नहीं है इसी कारण तुम लोग हमारे क़िबले की दिशा में खड़े होते हो, अतः ईश्वर के आदेश पर बैतुल मुक़द्दस के स्थान पर काबे को मुसलमानों का क़िबला बना दिया गया।
 इस बार यहूदियों ने दूसरी आपत्ति की कि यदि पहला क़िबला ठीक था तो उसे क्यों बदला गया? और दूसरा ठीक है तो तुम्हारे पहले के सारे कर्म बेकार हो गए।
 क़ुरआन उनकी इन आपत्तियों के उत्तर में कहता है कि हम किसी भी आदेश को स्थगित नहीं करते या उसमें विलंब नहीं करते सिवाए इसके कि उससे बेहतर या उसी के समान कोई विकल्प लाएं। क़िबले का परिवर्तन या काबे की मुसलमानों के क़िबले के रूप में घोषणा में विलंब के विभिन्न तर्क और लक्ष्य हैं जिनसे तुम अनभिज्ञ हो।
 चूंकि इस्लामी आदेश तर्क और युक्ति के अधीन हैं अतः समय, स्थान या परिस्थितियों के बदलने से संभावित रूप से कार्यों की युक्ति परिवर्तित हो सकती है तथा पिछला आदेश रद्द और उसके स्थान पर अन्य आदेश आ सकता है। अलबत्ता ईश्वरीय आदेशों की मूल नीतियां स्थिर हैं और उनमें परिवर्तन नहीं हो सकता परन्तु आंशिक बातों विशेषकर प्रशासनिक मामलों में ये कार्य स्वीकारीय है।
 यह आयत बताती है इस्लाम में कोई बंद गली नहीं है अर्थात इसमें हर समस्या का समाधान मौजूद है क्योंकि वो एक विश्वव्यापी और स्थाई धर्म है, स्थिर आदेशों के साथ ही इस्लाम के हितों के अनुकूल उसमें परिवर्तित होने वाले क़ानून भी हो सकते हैं।
सूरए बक़रह की आयत नंबर १०७ इस प्रकार है।
क्या तुम्हें नहीं मालूम कि धरती व आकाशों पर ईश्वर का राज्य व स्वामित्व है? और उसके अतिरिक्त तुम्हारा कोई भी सहायक और अभिभावक नहीं है? (2:107)
 पिछली आयत के पश्चात जिसमें कुछ ईश्वरीय आदेशों के स्थगन का उल्लेख हुआ था, यह आयत कहती है कि जो लोग ईश्वरीय आदेशों में परिवर्तन पर आपत्ति करते हैं क्या वे ईश्वर के संपूर्ण राज्य व स्वामित्व पर ध्यान नहीं देते? क्या वे नहीं जानते कि ईश्वर मनुष्य सहित सृष्टि की हर वस्तु का स्वामी है और उसे ये अधिकार प्राप्त है कि वो अपनी इच्छा और सलाह के अनुसार आदेशों और क़ानूनों में परिवर्तन करे।
 बनी इस्राईल के मन में ईश्वर के स्वामित्व और राज्य की ग़लत कल्पना थी और समझते थे कि ईश्वर अपने राज को लागू करने में अक्षम है, जबकि ईश्वर हर बात की क्षमता रखता है चाहे सृष्टि व रचना का मामला हो, चाहे क़ानून बनाने का या उन क़ानूनों में परिवर्तन का।
आइए अब देखते हैं कि इन आयतों से हमने क्या सीखा।
 केवल ईमान ही पर्याप्त नहीं है बल्कि अपने कर्मों की देखभाल और ईश्वर से भयभीत रहना भी आवश्यक है ताकि ईमान के वृक्ष को हर प्रकार की मुसीबत और ख़तरे से बचाया जा सके।
 शत्रु हमारी गतिविधियों यहां तक कि हमारे शब्दों पर भी दृष्टि रखे हुए है अतः हमें हर उस कार्य या बात से बचना चाहिए जो शत्रु के हाथ कोई ऐसा बहाना दे दे जिसे वह इस्लाम और मुसलमानों के विरुद्ध प्रयोग करे।
 इस्लाम के शत्रु चाहते हैं कि हर प्रकार की प्रगति और उन्नति उनके हाथ में रहे, उन्हें यह बात पसंद नहीं है कि कोई भी प्रगति या विभूति मुसलमानों को प्राप्त हो अतः उनपर भरोसा नहीं करना चाहिए और न ही उनमें कोई आशा रखनी चाहिए बल्कि केवल ईश्वर पर भरोसा करना चाहिए।
 आदेश बनाना या उनमें परिवर्तन और विलंब ईश्वर के हाथ में है और वह मानवता की स्थाई और परिवर्तनशील आवश्यकताओं को दृष्टि में रखकर, विवेक और मानव हितों के अनुसार कोई क़ानून बनाता या उसे परिवर्तित करता है।

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