कुरान तर्जुमा और तफसीर -सूरए बक़रह 2:44-74

सूरए बक़रह की आयत संख्या ४४ इस प्रकार है। क्या तुम लोगों को भलाई का आदेश देते हो और अपने आपको भूल जाते हो जबकि तुम ईश्वरीय किताब भी पढ़त...

सूरए बक़रह की आयत संख्या ४४ इस प्रकार है।
क्या तुम लोगों को भलाई का आदेश देते हो और अपने आपको भूल जाते हो जबकि तुम ईश्वरीय किताब भी पढ़ते हो, क्या तुम चिंतन नहीं करते? (2:44)


यह आयत  यहूदियों के विद्वानों एवं धर्मगुरुओं को संबोधित करते हुए कहती है कि पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के आने से पूर्व तुम उनके आने की शुभ सूचना देते थे और लोगों को उन पर ईमान लाने के लिए आमंत्रित करते थे तो स्वयं तुम उनपर ईमान क्यों नहीं लाते जबकि तुम्हें ईश्वरीय किताब तौरेत के बारे में अधिक ज्ञान है?

इस आयत में संबोधन यद्यपि बनी इस्राईल तथा उनके धर्म गुरुओं से है किंतु आयत का परिप्रेक्ष्य बहुत व्यापक है जिसमें हर धर्म के प्रचारक सम्मिलित हैं। इस संबन्ध में पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पौत्र इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम कहते हैं कि भलाई की ओर लोगों को अपनी ज़बान से नहीं बल्कि कर्मों से आमंत्रित करो।

इसी प्रकार हज़रत अली अलैहिस्सलाम कहते हैं कि हे लोगो, ईश्वर की सौगंध किसी भी कार्य के लिए मैं तुम्हें तब तक प्रोत्साहित नहीं करता जब तक स्वयं पहले उसे कर नहीं लेता और किसी भी कार्य से तुम्हें तब तक नहीं रोकता जब तक तुमसे पूर्व मैं स्वयं उसे छोड़ नहीं देता।
क़ुरआने मजीद ने भी सूरए जुमआ की पांचवीं आयत में अपने ज्ञान के अनुसार कर्म न करने वाले विद्वान को ऐसे गधे की उपमा दी है जिसपर किताबों का बोझ लदा हुआ हो। अन्य लोग उस किताब से लाभ उठाते हैं किंतु वह स्वयं उससे कोई लाभ नहीं उठा पाता।
इस आयत से मिलने वाले पाठः
दूसरों को भलाई की ओर आमंत्रित करने का सबसे उत्तम मार्ग, ज़बान से नहीं बल्कि व्यवहार व कर्मों के माध्यम से आमंत्रित करना है। दूसरों को किसी बात के लिए प्रोत्साहित करने से पूर्व स्वयं वह कार्य करना चाहिए।
जो व्यक्ति किसी कार्य पर स्वयं कटिबद्ध नहीं है उसे उस कार्य के लिए दूसरों को आदेश देने पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता।


सूरए बक़रह की आयत संख्या ४५ इस प्रकार है।
और नमाज़ तथा संयम के माध्यम से ईश्वर से सहायता चाहो और निश्चित रूप से ईश्वर से डरने वालों को छोड़कर सभी के लिए यह कार्य अत्यंत कठिन है। (2:45)

बाहरी संकटों और आंतरिक इच्छाओं के मुक़ाबले में प्रतिरोध तथा संयम, जीवन में मनुष्य का सबसे अच्छा सहायक है जो उसे शक्ति व क्षमता प्रदान करता है ताकि वह ईश्वर के समक्ष नतमस्तक होकर उसकी उपासना करे तथा केवल उसी के आदेशों का पालन करे।
यद्यपि पवित्र क़ुरआन के कुछ व्याखायाकारों का कहना है कि इस आयत में संयम से तात्पर्य रोज़ा है किंतु संयम का अर्थ बहुत व्यापक है जिसका एक रूप रोज़ा है। जैसा कि पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का कथन है कि संयम तीन प्रकार का होता है। कठिनाइयों और दुखों पर संयम, पाप के प्रति संयम तथा ईश्वर की उपासना और उसके आदेशों के पालन के संबन्ध में संयम।
इसी प्रकार पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पौत्र इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम कहते हैं कि जब भी तुम्हें कोई सांसारिक दुख हो तो वुज़ू करके मस्जिद चल जाओ, नमाज़ पढ़ो तथा प्रार्थना करो कि ईश्वर ने आदेश दिया है कि नमाज़ के माध्यम से सहायता चाहो।
यहां यह भी उल्लेखनीय है कि ईश्वर से डरने वालों तथा पवित्र लोगों की दृष्टि में ही नमाज़ का यह स्थान है और जो लोग ईश्वर से नहीं डरते वे नमाज़ को एक बोझ समझते हैं और उस पर ध्यान देने के स्थान पर उससे दूर भागते हैं।

सूरए बक़रह की आयत संख्या ४६ इस प्रकार है।
ईश्वर का भय रखने वाले वे लोग हैं जो ये विश्वास रखते हैं कि वे अपने पालनहार से भेंट करने वाले तथा उसी की ओर लौट कर जाने वाले हैं। (2:46)

प्रलय तथा ईश्वर की ओर वापसी पर विश्वास रखने से मनुष्य में ईश्वर से भयभीत रहने तथा जिम्मेदारी की भावना जीवित होती है और इस कारण मनुष्य का जीवन एक ऐसे न्यायालय का दृश्य प्रस्तुत करता है जिसमें उसे अपने हर कार्य का जवाब देना होता है।
ईश्वर से भेंट करने से तात्पर्य, प्रलय में उससे भौतिक भेंट नहीं है क्योंकि ईश्वर का कोई शरीर नहीं है कि उसे आंखों से देखा जाए बल्कि इसका उद्देश्य दंड और प्रतिफल देने में उसकी शक्ति के लक्षणों को देखना है।
इस प्रकार से देखना कि मनुष्य को एक प्रकार का हार्दिक व आंतरिक दर्शन प्राप्त हो। जैसे वह ईश्वर को अपने हृदय की आंखों से देख रहा है और उसके अस्तित्व के बारे में उसे कोई संदेह नहीं है।
हज़रत अली अलैहिस्सलाम के एक साथी ने आपसे पूछा कि क्या आपने अपने ईश्वर को देखा है? आपने उसके उत्तर में कहा कि क्या मैं ऐसे ईश्वर की उपासना करूं जिसे मैंने देखा न हो? इसके बाद आपने अपनी बात को स्पष्ट करते हुए कहा कि विदित आंखें उसे नहीं देख सकतीं किंतु ईमान के प्रकाश के साथ हृदय उसका आभास करते हैं।

इस आयत से मिलने वाले पाठः 
न केवल प्रलय पर आस्था और विश्वास बल्कि उसके बारे में केवल कल्पना भी मनुष्य को हर प्रकार के पाप और बुराई से रोकने के लिए पर्याप्त है।
जो व्यक्ति अपने ईश्वर को मन की आंखों से भी न देख पाए, वह अपने आपको आंखों वाला कैसे कह सकता है?

सूरए बक़रह की आयत संख्या ४७ इस प्रकार है।
हे बनी इस्राईल! मैंने जो अनुकंपाए तुम्हें प्रदान की हैं उन्हें याद करो। यह मैं ही था जिसने तुम्हें पूरे संसार पर प्राथमिकता प्रदान की। (2:47)

यहूदी जाति पर ईश्वर की कृपाओं में से एक, उन्हें फ़िरऔन के वर्चस्व से मुक्त कराना था, जिसके बाद बनी इस्राईल को मिस्र का शासन प्राप्त हो गया तथा उन्हें अत्यधिक भौतिक अनुकंपाएं व विभूतियां मिलीं। यह आयत उस समय के लोगों पर बनी इस्राईल की श्रेष्ठता का वर्णन करते हुए उनसे कहती है कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के नेतृत्व एवं मार्गदर्शन की छाया में प्राप्त होने वाली इस महान अनुकंपा को ईश्वरीय कृपा के रूप में देखें और इस पर ईश्वर के कृतज्ञ रहें।

इस आयत से मिलने वाले पाठः
ईश्वरीय पैग़म्बरों के नेतृत्व की छाया में मनुष्य को न केवल प्रलय में स्वर्ग प्राप्त होगा बल्कि संसार में भी उसे भौतिक विभूतियां प्राप्त होती हैं और वह अन्य लोगों से श्रेष्ठ हो जाता है। 
ईश्वर पर यदि सच्चा ईमान हो तो वह लोक-परलोक दोनों में श्रेष्ठता प्रदान करता है। 



 सूरए बक़रह की आयत संख्या ४८ इस प्रकार है।
और उस दिन से डरो जिस दिन कोई भी किसी के दण्ड में से कोई वस्तु कम नहीं कर सकेगा और उस दिन किसी की सिफ़ारिश स्वीकार नहीं की जाएगी, किसी के स्थान पर किसी से तावान नहीं लिया जाएगा और न ही उनकी सहायता की जा सकेगी। (2:48)

यह आयत प्रलय के बारे में लोगों के चार ग़लत विचारों तथा अनुचित आशाओं की ओर संकेत करके उनके उत्तर देती है। यहूदी सोचते थे कि उनके पूर्वज, ईश्वरीय दण्ड को उनसे दूर कर सकते हैं, उनके धर्मगुरु ईश्वर से उनके पापों को क्षमा करने की सिफ़ारिश कर सकते हैं, उनके मित्र उनकी सहायता कर सकते हैं और वे तावान भर कर प्रलय के दण्ड को दूर कर सकते हैं।
उनके उत्तर में क़ुरआने मजीद कहता है कि प्रलय के दिन कोई भी व्यक्ति या वस्तु पापी को दिये जाने वाले दण्ड को रोक नहीं सकेगी बल्कि वहां पर हर व्यक्ति केवल अपनी मुक्ति के प्रयास में होगा अतः किसी को भी ईमान और भले कर्म के अतिरिक्त किसी से कोई आशा नहीं रखनी चाहिए। अलबत्ता ईश्वर अपनी कृपा और दया के चलते वापसी का मार्ग बंद नहीं करता तथा उनके संसार में तौबा और प्रलय में प्रिय बंदों की ओर से पापों को क्षमा किये जाने की सिफारिश का मार्ग खोलकर पापियों को आशा प्रदान की है।
महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि तौबा तथा सिफ़ारिश की कुछ शर्तें हैं जो न केवल पाप के संबन्ध में दुस्साह का कारण नहीं बनती बल्कि पापों की पुनरावृत्ति को रोकने का कारण बनती है। इसी कारण यह आयत यहूदियों की बिना शर्त की सिफ़ारिश की आस्था को रद्द करती है, इसी प्रकार क़ुरआने मजीद के अनुसार ईसाइयों का यह विश्वास भी स्वीकार्य नहीं है कि हज़रत ईसा मसीह ने अपने प्राणों का बलिदान दिया ताकि उनका ख़ून उनके अनुयाइयों के पापों का तावान बन जाए।

इस आयत से मिलने वाले पाठः
अपनी दिनचर्या में प्रलय को दृष्टिगत रखना चाहिए और मित्र, पद, व्यापार अथवा किसी अन्य कारण से पाप नहीं करना चाहिए क्योंकि उस दिन कोई भी किसी के काम नहीं आएगा।
प्रलय के दिन सांसारिक धन-संपत्ति तथा शक्ति काम नहीं आएगी बल्कि उस दिन केवल भले कर्म ही मनुष्य को लाभ पहुंचाएंगे

सूरए बक़रह की आयत संख्या ४९ इस प्रकार है।

और हे बनी इस्राईल! याद करो उस समय को जब हमने तुम्हें फ़िरऔन के लोगों से मुक्ति दिलाई कि जो सदैव तुम्हें अत्यन्त बुरी यातनाएं देते थे, तुम्हारे पुत्रों की हत्याएं करते थे तथा तुम्हारी महिलाओं को दासियां बनाने के लिए जीवित रखते थे और इस प्रकरण में तुम्हारे लिए अपने पालनहार की ओर से बड़ी परीक्षा थी। (2:49)

 फ़िरऔन अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए विभिन्न बहानों से बनी इस्राईल के युवाओं तथा पुरुषों की हत्या करवाता था तथा उनकी महिलाओं को अपनी दासियां बना देता था ताकि उनमें उसके विरुद्ध सिर उठाने का भी साहस न रह जाए। क़ुरआने मजीद की दृष्टि में कठिनाइयों और दुख तथा स्वतंत्रता और आराम दोनों ही, परीक्षा का साधन हैं ताकि मनुष्य अपनी निष्ठा का प्रदर्शन करके प्रगति एवं परिपूर्णता प्राप्त करे।

इस आयत से मिलने वाले पाठः
फ़िरऔनी विचारधारा रखने वालों का पहला लक्ष्य, युवा होते हैं। आज के विश्व में भी साम्राज्यवादी शक्तियां, मादक पदार्थों को प्रचलित करके युवाओं के मन व शरीर को मौत के घाट उतारती हैं तथा अपनी उपभोग की वस्तुओं के प्रचार के लिए महिलाओं और किशोरियों को माध्यम बना कर पुरूषों की वासना का निशाना बनाती है।
संसार में मिलने वाले आराम पर घमण्ड नहीं करना चाहिए बल्कि इसे अपने लिए परीक्षा का साधन समझना चाहिए।

सूरए बक़रह की आयत संख्या ५० इस प्रकार है।
हे बनी इस्राईल! याद करो उस समय को जब हमने समुद्र को तुम्हारे लिए फाड़ दिया तो तुम्हें मुक्ति दिलाई और हमने फ़िरऔन के लोगों को ऐसी स्थिति में (नील में) डुबा दिया कि तुम देख रहे थे। (2:50)

 यह आयत ईश्वर द्वारा बनी इस्राईल को फ़िरऔन के चुंगल से मुक्ति दिलाए जाने की घटना की ओर संकेत करती है जो एक ईश्वरीय चमत्कार है। हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को ईश्वर की ओर से यह आदेश मिला कि वे अपनी जाति के लोगों को मिस्र से बाहर ले जाएं किंतु वे लोग जैसे ही नील नदी के निकट पहुंचे तो उन्होंने देखा कि फ़िरऔन, उनका पीछा करते हुए अपनी सेना के साथ आ रहा है। यह देखा बनी इस्राईल के लोग बहुत ही भयभीत और चिन्तित हो गए। ईश्वर के आदेश से हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने अपनी लाठी को नील नदी के पानी पर मारा तो पानी बीच से फट गया और उसमें कई मार्ग बन गए। बनी इस्राईल के लोगों ने उन मार्गों पर चल कर नील नदी को पार कर लिया। फ़िरऔर तथा उसकी सेना बनी इस्राईल का पीछा करते हुए जैसे ही नील नदी के बीच में पहुंचे बीच में रुका हुआ पानी पुनः एक-दूसरे से मिल गया और वे सबके सब मारे गए। इस प्रकार बनी इस्राईल के लोगों ने ईश्वरीय चमत्कार द्वारा अपनी मुक्ति भी देखी और अपने शत्रु का विनाश भी देखा। इससे बढ़कर ईश्वरीय कृपा और क्या हो सकती है?

इस आयत से मिलने वाले पाठः
अत्याचारियों से मुक्ति, ईश्वर की सबसे बड़ी कृपाओं में से एक है और ईमान वालों को इसे प्राप्त करने के लिए प्रयास करने चाहिए।
यदि लोग अत्याचारियों से अपनी मुक्ति के लिए प्रयास करें तो उन्हें ईश्वर की गोपनीय सहायता प्राप्त होगी।

सूरए बक़रह की आयत संख्या ५१ इस प्रकार है।
और (हे बनी इस्राईल, याद करो उस समय को) जब हमने (हज़रत) मूसा से चालीस रातों का वादा ठहराया (और वे ईश्वरीय आदेश लेने के लिए निर्धारित स्थान तक पहुंचे) किंतु उनके जाने के पश्चात तुम लोग बछड़े की पूजा करने लगे और (अपने इस कार्य द्वारा) तुमने स्वयं पर (ही) अत्याचार किया। (2:51)

फ़िरऔन के चुंगल से बनी इस्राईल को मुक्ति दिलाने के पश्चात हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को ईश्वर की ओर से आदेश मिला कि वे तौरेत को प्राप्त करने के लिए अपनी जाति को छोड़ कर "तूर" नामक पर्वत की ओर जाएं किंतु इस अल्पावधि में ही बनी इस्राईल के समक्ष एक बड़ी परीक्षा आ गई। सामेरी नामक एक धूर्त व्यक्ति ने लोगों के आभूषणों से बछड़े की ऐसी प्रतिमा बनाई जिसमें से गाय की आवाज़ आती थी। इस प्रतिमा को देख कर लोग आश्चर्य चकित रह जाते थे सामेरी ने लोगों को उस विचित्र एवं स्वर्णिम प्रतिमा की पूजा करने का निमंत्रण दिया और अधिकांश लोग उसके झांसे में आ गए। अपने इस काम द्वारा उन्होंने स्वयं अपने ऊपर भी अत्याचार किया और ईश्वर के स्थान पर बछड़े की पूजा की तथा अपने नेता और पैग़म्बर हज़रत मूसा पर भी अत्याचार किया जिन्होंने उन्हें फ़िरऔन तथा उसके लोगों से मुक्ति दिलाने के लिए अत्यधिक कठिनाइयां सहन की थीं। अलबत्ता "तूर" पर्वत से हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के वापस आने के बाद लोगों को अपने ग़लत काम का आभास हो गया और ईश्वर ने उन्हें अपनी दया का पात्र बनाते हुए उनके पाप को क्षमा कर दिया।

इस आयत से मिलने वाले पाठः

समाज के मार्गदर्शन में ईश्वरीय नेताओं की अत्यंत ही महत्वपूर्ण भूमिका है। हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम केवल चालीस दिनों तक ही अपनी जाति के लोगों से दूर थे तो वे लोग पथभ्रष्ट हो गए, यदि ईश्वर संपूर्ण मानव इतिहास में अपने पैग़म्बरों को भेजता ही नहीं तो मनुष्य की स्थिति क्या होती?
अपनी दिनचर्या में हमें प्रलय को दृष्टिगत रखना चाहिए और किसी ही मित्रता अथवा पद की प्राप्ति के लिए पाप नहीं करना चाहिए क्योंकि उस दिन कोई भी किसी को लाभ नहीं पहुंचा सकता और सांसारिक पूंजी व शक्ति से प्रलय के दण्ड को नहीं रोका जा सकता।

सूरए बक़रह की आयत संख्या ५२ इस प्रकार है।
फिर हमने उस (बड़ी पथभ्रष्टता) के बाद तुम्हें क्षमा कर दिया कि शायद तुम कृतज्ञ रह सको। (2:52)

अपने बंदों पर ईश्वर का एक उपकार यह है कि वह उन्हें पाप करते ही दंडित नहीं करता बल्कि वह उन्हें इस बात का अवसर देता है कि अपने कर्मों के संबन्ध में उससे क्षमा मांगें और तौबा व प्रायश्चित करें।
हज़रत मूसा तथा बनी इस्राईल के प्रकरण में भी ईश्वर ने बनी इस्राईल के पाप को क्षमा कर दिया और इस प्रकार उसने हज़रत मूसा के नेतृत्व की अनुकंपा के प्रति बनी इस्राईल के कृतज्ञ रहने का मार्ग प्रशस्त किया।
इस आयत से मिलने वाले पाठः
फ़िरऔनी प्रवृत्ति वाले षड्यंत्रकारियों का पहला लक्ष्य युवा होते हैं। आज के संसार में भी साम्राज्यवादी शक्तियां, उच्छृंखलता तथा मादक पदार्थों की लत को फैला कर युवाओं के शरीर और मानस को मृत्यु की ओर ले जा रही हैं।
अत्याचारियों के प्रभुत्व से स्वंतत्रता, ईश्वर की सबसे बड़ी अनुकंपाओं में से एक है और ईमान वालों को इसकी प्राप्ति के लिए प्रयास करना चाहिए क्योंकि इस स्थिति में उन्हें ईश्वरीय सहायता भी प्राप्त होगी।

सूरए बक़रह की आयत नंबर ५३ इस प्रकार है।
और (हे बनी इस्राईल याद करो उस समय को) जब हमने (हज़रत) मूसा को तौरेत व फ़ुरक़ान प्रदान किया कि शायद तुम सही मार्ग पर आ जाओ। (2:53)

 इस आयत में प्रयोग होने वाले शब्द फ़ुरक़ान का अर्थ वह वस्तु है जो सत्य को असत्य से अलग कर दे और चूंक आसमानी किताबों और पैग़म्बों द्वारा प्रस्तुत किये गए चमत्कार सत्य तथा असत्य के बीच अंतर का कारण बनते हैं अतः उन्हें फ़ुरक़ान अर्थात अंतर डालने वाला कहा जाता है। ईश्वर ने लोगों के मार्गदर्शन के लिए आसमानी किताबें भी भेजी हैं, सही मार्ग दिखाने वाले पैग़म्बर भी भेजे हैं और एसी आयतें तथा चमत्कार भी भेजे हैं जिनके माध्यम से लोग सच्चे और झूठे के बीच अंतर कर सकते हैं। इस प्रकार से ईश्वर ने सभी लोगों के मार्गदर्शन के लिए आवश्यक संपूर्ण साधन उपलब्ध करा दिये हैं।

इस आयत से मिलने वाले पाठ इस प्रकार हैं।
यदि मनुष्य वास्तव में मार्गदर्शन पाप्त करना चाहे तो ईश्वर उसकी सहायता करता है और उसे सत्य तथा असत्य के बीच अंतर की क्षमता प्रदान करता है

सूरए बक़रह की आयत संख्या ५४ का अनुवाद इस प्रकार है।
और (हे बनी इस्राईल याद करो उस समय को) जब (हज़रत) मूसा ने अपनी जाति (के लोगों) से कहा कि हे मेरी जाति (वालो) तुमने (पूजा के लिए) बछड़े का चयन करके अपने (ही) ऊपर अत्याचार किया है तो अपने रचयित से (क्षमा मांग कर) तौबा करो और (प्रायश्चित स्वरूप) अपने आप को मार डालो कि तुम्हारे पालनहार के निकट यही तुम्हारे लिए बेहतर है। तो वह तुम्हारी तौबा को स्वीकार कर लेगा और निश्चित रूप से वह अत्यंत तौबा स्वीकार करने वाला तथा बहुत अधिक दयावान है। (2:54)


जब हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने चालीस दिनों के बाद तूर पर्वत से वापस लौटे और अपनी जाति के लोगों के बीच बछड़े की पूजा के प्रचलन को देखा तो उनसे दो बातें कहीं। प्रथम यह की इस कार्य द्वारा उन्होंने स्वयं अपने ऊपर अत्याचार किया है और ईश्वर के स्थान पर बछड़े का चयन करके मानवीय प्रतिष्ठा व सम्मान को रौंद दिया है और दूसरे यह कि उनका पाप काफ़िरों से भी बड़ा है क्योंकि वे सत्य को समझ कर उसपर ईमान ला चुके थे और फिर उसे छोड़कर काफ़िर हो गए। इस प्रकार वे अधर्मी हो गए। अधर्मी का दण्ड मौत है। यद्यपि ईश्वर लोगों से सबसे अधिक प्रेम व उनपर दया करने वाला है किंतु सदभावना व स्नेह रखने वाले प्रशिक्षक की भांति वह कभी कभी कड़ा दण्ड भी देता है ताकि दूसरे उससे पाठ सीखें और धर्म से खिलवाड़ न करें। साथ ही समाज से बुरे व अप्रिय कर्मों के प्रभाव भी समाप्त हो जाएं। बछड़े या प्रतिमा की पूजा की ओर रुझान कोई सरल सी बात नहीं है जो केवल ज़बान से तौबा करने के बाद क्षमा योग्य हो और वह भी ऐसे लोगों की ओर से जिन्होंने ईश्वर के बड़े-बड़े चमत्कारों तथा अनुकंपाओं को देखा हो और उन पर ईमान ला चुके हों।

इस आयत से मिलने वाले पाठ इस प्रकार हैं।
पापी, ईश्वर पर नहीं बल्कि स्वयं अपने ऊपर अत्याचार करता है।
मनुष्य की वासतविकता उसकी आत्मा है न कि उसका शरीर। पाप मनुष्य की आत्मा को दूषित एवं कमज़ोर बनाता है यहां तक कि अधिक पाप के कारण आत्मा मर जाती है और मनुष्य में एक पाश्विक शरीर के अतिरिक्त कुछ अन्य नहीं बचता।
हर पाप की तौबा उस पाप के अनुपात में होनी चाहिए। ईश्वर की पूजा के स्थान पर बछड़े की पूजा की तौबा, रोना या क्षमा मांगना नहीं है बल्कि इसके लिए अपनी मृत्यु पर तैयार रहना चाहिए।

सूरए बक़रह की आयत संख्या ५५ इस प्रकार है।
और (हे बनी इस्राईल याद करो उस समय को) जब तुमने कहा कि हे मूसा कदापि तुम पर ईमान नहीं लाएंगे सिवाए इसके कि ईश्वर को स्पष्ट रूप से अपनी आखों से देख लें तो बिजली तुम्हें ऐसी स्थिति में आ लिया कि जब तुम उसे देख रहे थे। (2:55)

इस आयत में बनी इस्राईल के लोगों की एक अन्य पथभ्रष्टता का उल्लेख किया गया है। एक बार उन्होंने बछड़े की पूजा करना आरंभ किया था और दूसरी बार उन्होंने हज़रत मूसा से एक अत्यंत अनुचित मांग की और कहा कि हम ईश्वर को अपनी आखों से देखना चाहते हैं ताकि तुम्हारी कही हुई बातों पर ईमान ला सकें।
ईश्वर ने इसके उत्तर में उन्हें यह दिखाने के लिए कि उनकी आखें, उसे तो क्या बहुत से अन्य जीवों को भी देखने में अक्षम हैं, उनपर एक बिजली गिराई जिसकी ख़तरनाक चमक और गरज के कारण वे सबके सब मर गए और धरती पर गिर पड़े।

सूरए बक़रह की आयत संख्या ५६ इस प्रकार है।
फिर हमने तुम्हारी मृत्यु के पश्चात तुम्हें जीवित करके उठाया कि शायद तुम अनुकंपाओं पर कृतज्ञ रहो। (2:56)

ईश्वर की ओर से बिजली गिराए जाने की घटना में बनी इस्राईल के सत्तर प्रतिष्ठित लोगों के मारे जाने के पश्चात हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने ईश्वर से प्रार्थना की थी कि वह उन्हें पुनः जीवित कर दे। ईश्वर ने उनकी इस प्रार्थना को स्वीकार किया और वे लोग जीवित हो गए। इस चमत्कार से ईश्वर ने अपनी शक्ति पर उनके तथा बनी इस्राईल के अन्य लोगों के ईमान लाने का मार्ग प्रशस्त कर दिया।
इस आयत से हमें यह पाठ मिलता है।
ईश्वर के लिए मरे हुए लोगों को जीवित करना कोई असंभव कार्य नहीं है। उसने इसी संसार में कई बार मरे हुए लोगों को जीवित किया है। उदाहरण स्वरूप बिजली गिरने के कारण बनी इस्राईल के सत्तर प्रतिष्ठित लोग हज़रत मूसा की प्रार्थना से पुनः जीवित हो गए।
मरे हुए व्यक्ति को पुनः जीवित करने जैसे लगभग असंभव कार्य के लिए पैग़म्बर जैसे अत्यंत पवित्र व्यक्ति का ईश्वर से प्रार्थना करना आवश्यक है।
इस आयत से मिलने वाले पाठ इस प्रकार हैं।
कुछ लोगों का यह कहना है कि जब तक हम ईश्वर को देख नहीं लेंगे उस समय तक उसपर ईमान नहीं लाएंगे। यह बात या तो उनकी अज्ञानता के कारण है या फिर उनकी हठधर्मी के चलते क्योंकि ईश्वर कोई भौतिक वस्तु तो है नहीं जिसे आंखों से देखा जा सके किंतु सृष्टि के कण-कण में उसके असितत्व का आभास किया जा सकता है।
धर्म के संबन्ध में हठधर्मी का ईश्वर, कड़ा दण्ड देता है और कभी-कभी इस दण्ड में मनुष्य को अपनी जान भी गंवानी पड़ती है।


सूरए बक़रह; आयतें ५७-६०
सूरए बक़रह की आयत संख्या ५७ इस प्रकार है।

और (हे बनी इस्राईल के लोगो!) हमने तुम्हारे ऊपर बादलों की छाया की और तुम्हारे लिए (दो प्रकार के उत्कृष्ट भोजन) मन्न व सलवा भेजे (और कहा) कि हमने तुम्हें जो पवित्र रोज़ी दी है उसमें से खाओ (किंतु तुमन कृतघ्नता से काम लिया) हमने उनपर अत्याचार नहीं किया बल्कि उन्होंने स्वयं अपने ऊपर अत्याचार किया। (2:57)

ईश्वर ने बनी इस्राईल को फ़िरऔन व उनके लोगों के चुंगल से मुक्ति दिलाने के पश्चात उन्हें आदेश दिया कि वे फ़िलिस्तीन की पवित्र धरती में प्रविष्ट हो जाएं किंतु उन्होंने यह बहाना बनाकर वहां जाने से इन्कार किया कि वहां पर अत्याचारी शासक राज कर रहे हैं। उनकी इस उद्दंडता के कारण उन्हें ईश्वरीय कोप का स्वाद चखना पड़ा और वे चालीस वर्षों तक सीना नामक मरुस्थल में भटकते रहे। इस अवधि में बनी इस्राईल के बहुत से लोगों को अपने काम पर पश्चाताप हुआ और उन्होंने ईश्वर से क्षमा याचना की। ईश्वर ने एक बार फिर उन्हें अपनी दया का पात्र बनाया और उनके लिए अपनी अनुकंपाएं भेजीं। इस आयत में उनमें से कुछ अनुकंपाओं का उल्लेख किया गया है। ईश्वर ने उस शुष्क एवं तपते मरुस्थल में बादलों को उनके लिए छत के समान ठहरा कर उनके लिए छाया का प्रबंध किया तथा उन्हें दो प्रकार के भोजन उपलब्ध कराए। एक, मधु के समान तरल पेय था जिसे मन्न कहा जाता था और दूसरा, कबूतर के समान एक पक्षी था जिसे क़ुरआने मजीद में सलवा कहा गया है।


इस आयत से मिलने वाले पाठः
ईश्वर ने मनुष्य को उसकी आजीविका उपलब्ध कराई है किंतु हम पशु नहीं हैं कि केवल अपना पेट भरने के प्रयास में रहें और जहां से जैसा भी भोजन मिले उसे खाते रहें। हमको पवित्र एवं हलाल आजीविका प्राप्त करने का प्रयास करते रहना चाहिए।
ईश्वर द्वारा दर्शाए गए वैध मार्गों से यदि हम आजीविका प्राप्त नहीं करेंगे तो स्वयं अपने ऊपर ही अत्याचार करेंगे।

सूरए बक़रह की आयत संख्या ५८ इस प्रकार है।
और याद करो उस समय को जब हमने कहा कि इस बस्ती अर्थात बैतुल मुक़द्दस में प्रविष्ट हो जाओ और इसकी अनुकंपाओं में से जिस प्रकार चाहो आनंद के साथ खाओ तथा बैतुल मुक़द्दस के उपासनागृह में सजदा करते हुए प्रविष्ट हो और कहो कि प्रभुवर! हमारे पापों को झाड़ दे (ताकि) हम तुम्हारे पापों को क्षमा कर दें और हम भलाई करने वालों के प्रतिफल में शीघ्र ही वृद्धि कर देंगे। (2:58)


 सीना मरुस्थल में चालीस वर्ष व्यतीत करने के पश्चात ईश्वर ने बनी इस्राईल को आदेश दिया कि वे अपने पापों को क्षमा करवाने के लिए बैतुल मुक़द्दस के उपासना स्थल में प्रवेष करें और क्षमा याचना के लिए "हित्तह" शब्द को दोहराते रहें। इस शब्द का अर्थ होता है कि प्रभुवर हमारे पापों को झाड़ दे और हमें क्षमा कर दे।
 ईश्वर ने वचन दिया कि यदि वे उपासना स्थल में प्रवेष करते समय सच्चे मन से यह शब्द कहें तो वह उनके पापों को क्षमा करके उनकी तौबा व प्रायश्चित को स्वीकार कर लेगा साथ ही वह भलाई करने वालों के पारीतोषिक में भी वृद्धि कर देगा। आज भी बैतुल मुक़द्दस में स्थित मस्जिदुल अक़सा के एक द्वार का नाम हित्तह द्वार है।

इस आयत से मिलने वाले पाठः
पवित्र स्थलों में प्रवेश के लिए विशेष आदर की आवश्यकता होती है। प्रार्थना तथा तौबा अर्थात प्रायश्चित की पद्धति हमें ईश्वर से सीखनी चाहिए कि पापों को क्षमा कराने के लिए क्या कहें और कैसे कहें।
ईश्वर पापों को क्षमा करता है किंतु तौबा के स्वीकार होने की कुछ शर्ते हैं जैसे कि सच्चे मन से क्षमा चाहना, अपने किये पर लज्जित होना और भविष्य में पाप न करने का निश्चय करना।

सूरए बक़रह की आयत संख्या ५९ इस प्रकार है।
तो अत्याचारी लोगों ने उस कथन को (जो क्षमा तथा प्रायश्चित के शब्द के रूप में) उन्हें बताया गया था, परिवर्तित कर दिया और (हित्तह के स्थान पर हिंतह कहा) तो हमने अत्याचारियों पर उनके द्वारा की गई उद्दंडता के कारण, आकाश से दंड उतारा। (2:59)
बनी इस्राईल के कुछ लोगों ने ईश्वर द्वारा तौबा स्वीकार करने हेतु कहे जाने वाले शब्द "हित्तह" अर्थात प्रभुवर हमें क्षमा कर दे, के स्थान पर परिहास स्वरूप "हिंतह" शब्द कहा जिसका अर्थ होता है गेहूं। ईश्वरीय आदेश का परिहास करने के कारण बनी इस्राईल के लोगों को ईश्वर के कोप में ग्रस्त होना पड़ा और उनके बीच महामारी का रोग फैल गया किंतु जैसाकि आयत कहती है कि यह दंड केवल अत्याचारियों के लिए था और बनी इस्राईल के सभी लोग इस रोग में ग्रस्त नहीं हुए।

इस आयत से मिलने वाले पाठः
जब कभी समाज के लोगों में द्वेष, हठधर्म, तथा सत्य के विरोध जैसी भावनाएं व्याप्त हो जाएं तो इसी संसार में ईश्वरीय कोप के आने का मार्ग प्रशस्त हो जाता है।
उपासना में पूर्ण रूप से ईश्वरीय आदेशों के प्रति नतमस्तक रहना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि जिस प्रकार से ईश्वर ने कहा है उसी प्रकार से उपासना करनी चाहिए अन्यथा उसे उपासना नहीं बल्कि ईश्वरीय आदेश के प्रति उद्दंडता कहा जाएगा।

सूरए बक़रह की आयत संख्या ६० का अनुवाद इस प्रकार है।
और (याद करो उस समय को) जब मूसा ने अपनी जाति के लोगों के लिए जल की प्रार्थना की तो हमने कहा कि अपनी लाठी को पत्थर पर मारो तो उससे बारह सोते उबल पड़े। बनी इस्राईल के सभी (क़बीलों के) लोगों ने अपने पानी पीने के स्थान को भलि भांति पहचान लिया। (हमने कहा कि) ईश्वर की (ओर से प्रदान की गई) आजीविका से खाओ और पियो तथा धरती में बुराई फैलाने वाले न बनो। (2:60)

हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम, बनी इस्राईल के पैग़म्बर थे और उनका दायित्व अपनी जाति के लोगों तक ईश्वरीय संदेश को पहुंचाना था किंतु ईश्वरीय दूत, लोगों के आराम और सुख का भी ध्यान रखते हैं। इसी कारण हज़रत मूसा ने ईश्वर से अपनी जाति के लोगों के लिए पेयजल की आपूर्ति की प्रार्थना की थी। ईश्वर ने उनकी प्रार्थना को स्वीकार कर लिया और एक चमत्कार द्वारा उन्हें पेयजल प्रदान किया। उसने आदेश दिया कि मूसा अपनी उसी लाठी को इस पत्थर पर मारें, जिसके नील पर मारने से रास्ता प्रकट हो गया था, ताकि उस पत्थर से पानी निकलने लगे और बनी इस्राईल के लोग समझ लें कि मूसा का ईश्वर हर काम में सक्षम है।
बनी इस्राईल जाति में बारह क़बीले और गुट थे। ईश्वरीय इच्छा से पत्थर की उस चट्टान से बारह सोते फूटे ताकि हर क़बीले का पानी पीने का अपना अलग स्थान हो और किसी को भी पानी की कमी न हो। इस प्रकार ईश्वर ने एक ओर तो बनी इस्राईल को खाने हेतु मन्न व सलवा प्रदान किया और दूसरी ओर उन्हें पर्याप्त मात्रा में पानी भी दिया ताकि वे सुख समृद्धि से रह सकें और पाप, द्वेष, बुराई एवं हठधर्म में ग्रस्त न हों।
इस आयत से मिलने वाले पाठः
ईश्वरीय दूत लोगों की भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के विचार में रहते हैं और इस संबन्ध में वे लोगो के बीच भेदभाव नहीं करते बल्कि संभावनाओं के वितरण में पूर्ण रूप से न्याय से काम लेते हैं।
ईश्वर हर काम की क्षमता रखता है। यदि वह चाहे तो पत्थर में से पानी निकाल कर पूरी जाति को तृप्त कर सकता है।



सूरए बक़रह की आयत संख्या ६१ इस प्रकार है।

और याद करो उस समय को जब तुमने कहा कि हे मूसा, हम एक ही प्रकार के भोजन पर संतोष नहीं कर सकते तो अपने पालनहार से प्रार्थना करो वह हमारे लिए धरती से उगने वाले साग, ककड़ी, लहसुन, मसूर और प्याज़ उगाए। मूसा ने कहा कि क्या तुम उत्तम को तुच्छ से परिवर्तित करना चाहते हो। (इसके लिए तुम इस मरूस्थल से बाहर निकलो और) किसी (भी) नगर में चले जाओ (वहां) तुम्हें निश्चित रूप से वह सब मिल जाएगा जो तुमने मांगा है। और (इन बहानों के कारण) उनपर अपमान और मोहताजी की मार पड़ी तथा वे ईश्वरीय कोप में ग्रस्त हो गए। यह (दंड) इसलिए था कि वे लोग ईश्वरीय निशानियों का इन्कार करते थे और पैग़म्बरों की अकारण हत्या करते थे। ये (वे बुरे कर्म) इसलिए करते थे कि वे ईश्वरीय आदेशों का उल्लंघन तथा अत्याचार करने वाले थे। (2:61)

 यद्यपि ईश्वर ने तपते मरुस्थल में बनी इस्राईल की भोजन तथा जल की आवश्यकता की पूर्ति कर दी थी किंतु एक ओर इस जाति की कृतघ्नता और दूसरी ओर इसके लोगों का आलस्य एवं ऐश्वर्य प्रेम इस बात का कारण बना कि वे हज़रत मूसा से कुछ अन्य खानों की मांग करें। हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने उनके उत्तर में कहा कि प्रथम तो तुम आकाश से आने वाले उत्तम भोजन को धरती से उगने वाली वस्तुओं से, जो उसकी तुलना में तुच्छ हैं, परिवर्तित करना चाहते हो। दूसरे यह कि यदि तुम इस प्रकार के खाने चाहते हो तो इस मरूस्थल से निकल कर अपने शत्रुओं से युद्ध करो और किसी नगर में प्रविष्ट हो जाओ ताकि तुम्हें यह खाने मिल जाएं। एक ओर तो तुम संघर्ष नहीं करना चाहते और दूसरी ओर ऐसी सुविधाएं चाहते हो जो केवल नगर वासियों को ही मिलती हैं। तुम्हारा यह आलस्य और ऐश्वर्य प्रेम तुम्हें अपमानित करेगा और ईश्वरीय कोप में ग्रस्त कर देगा। तुम लोगों ने अपनी इन अनुचित मांगों से ईश्वरीय निशानियों और चमत्कारों की अनदेखी ही नहीं की बल्कि अपने भौतिक एवं सांसारिक हितों की प्राप्ति के लिए तुमने ईश्वरीय पैग़म्बरों की हत्या तक की है।
इस आयत से मिलने वाले पाठ।
आलस्य और ऐश्वर्य प्रेम मनुष्य के पतन का कारण है। हमें हर प्रकार के ऐश्वर्य प्रेम से दूर रहना चाहिए क्योंकि यह मनुष्य के अपमान का कारण बनता है।
ईश्वर द्वारा प्रदान की गई अनुकंपाओं पर अन्य वस्तुओं को प्राथमिकता देना, ईश्वर के प्रति कृतघ्नता है।

सूरए बक़रह की आयत संख्या ६२ इस प्रकार है।

निःसन्देह, जो लोग (विदित रूप से) ईमान लाए और इसी प्रकार यहूदी, ईसाई और साबेई (अर्थात सितारों की पूजा करने वाले) हैं उनमें से जो वास्तव में ईश्वर और प्रलय के दिन पर ईमान लाएंगे और भले कर्म करेंगे उन्हीं के लिए उनके पालनहार के पास प्रतिफल है और न तो उन्हें कोई भय होगा और न ही वे दुखी होंगे। (2:62)
 सभी आसमानी धर्मों में ईश्वरीय पारितोषिक का मानदंड, ईमान तथा सदकर्म रहा है। ईश्वर व प्रलय के दिन पर ईमान और ईश्वरीय आदेशों का पालन। इस क़ानून में मुसलमानों, इसाइयों, यहूदियों और अन्य ईश्वरीय धर्मों के अनुयाइयों में कोई अंतर नहीं है। अलबत्ता क़ुरआने मजीद की अनेक आयतों में यहूदियों और इसाइयों को इस्लाम धर्म स्वीकार करने का निमंत्रण दिया गया है और सूरए आले इमरान की आयत नंबर ८५ में कहा गया है कि जो कोई, इस्लाम के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म को अपने लिए चुनेगा तो उसकी यह बात स्वीकार नहीं की जाएगी। इस आधार पर अन्य धर्मों के जिन अनुयाइयों ने अपने काल के पैग़म्बर तथा आसमानी किताब पर ईमान लाकर उनके आदेशों के अनुसार कर्म किया होगा उन्होंने अपने दायित्व का निर्वाह कर दिया है और उन्हें ईश्वरीय पारितोषिक प्राप्त होगा किंतु इस्लाम के आ जाने के बाद उसके अतिरिक्त किसी अन्य धर्म के पालन को ईश्वर स्वीकार नहीं करेगा।
 इस आयत में जिन धर्मों के अनुयाइयों का उल्लेख किया गया है उनमें से एक साबेई हैं। साबेई, हज़रत नूह, हज़रत इब्राहीम या फिर हज़रत यहया अलैहिमुस्सलाम में से किसी एक ईश्वरीय पैग़म्बर के अनुयाई थे। यह लोग धार्मिक आस्थाओं और कर्मों में विभिन्न प्रकार की पथभ्रष्टताओं में ग्रस्त हो गए थे और सितारों को पूजनीय समझने लगे थे। वे यह मानते थे कि सितारे ही मानव जीवन को चलाते हैं।
इस आयत से मिलने वाले पाठ।
सभी आसमानी धर्म, एकेश्वरवाद तथा प्रलय के सिद्धांत पर एकमत हैं और मनुष्य के कल्याण एवं मोक्ष को अनुचित शिक्षाओं व आशाओं पर नहीं बल्कि ईमान तथा कर्म पर निर्भर समझते हैं।
वास्तविक शांति केवल ईश्वर व प्रलय पर ईमान की छाया में ही प्राप्त होती है। इन दोनों पर आस्था मनुष्य को उज्जवल भविष्य की शुभ सूचना देती है।


सूरए बक़रह की आयत संख्या ६३ का अनुवाद इस प्रकार है।
और याद करो उस समय को जब हमने तुमसे (तौरेत पर कटिबद्ध रहने की) प्रतिज्ञा ली और तूर पर्वत को तुम्हारे ऊपर उठा दिया (और कहा कि) जो कुछ हमने तुम्हें (तौरेत के रूप में) प्रदान किया है उसे दृढ़ता से पकड़े रहो और जो कुछ उसमें है उसे याद रखो (और उस पर कार्यबद्ध रहो) ताकि शायद इस प्रकार ईश्वर से डरने लगो। (2:63)

 जब हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को तौरेत दी गई तो ईश्वर ने बनी इस्राईल से प्रतिज्ञा ली कि वे उसपर कटिबद्ध रहेंगे, आलस्य को छोड़ देंगे तथा ईश्वर से डरते रहेंगे। ईश्वर ने बनी इस्राईल के समक्ष एक अन्य चमत्कार प्रस्तुत किया ताकि वे अपनी प्रतिज्ञा पर कटिबद्ध रहें और वह यह था कि उसने तूर पर्वत को उनके ऊपर उठा दिया ताकि वे ईश्वर की शक्ति को भी देखें और ईश्वरीय आदेश के विरोध से भी डरें।
इस आयत से मिलने वाले पाठ।
धर्मावलंबियों को अपने धार्मिक सिद्धातों की रक्षा के संबन्ध में दृढ़ संकल्प रहना चाहिए और धार्मिक आदेशों का परिहास नहीं करना चाहिए।
कुछ लोग ईश्वर द्वारा दिखाए गए स्पष्ट चमत्कारों को देखने के बाद भी उसपर ईमान नहीं लाते।

सूरए बक़रह की आयत संख्या ६४ का अनुवाद इस प्रकार है।

फिर तुमने इस सबके बाद भी मुंह मोड़ लिया, तो यदि तुमपर ईश्वर की कृपा और उसकी दया न होती तो निश्चित रूप से तुम सब घाटा उठाने वालों में से होते। (2:64)

 यद्यपि ईश्वर ने बनी इस्राईल से ठोस प्रतिज्ञा ली थी किंतु इस उद्दंड जाति ने ईश्वर से की गई प्रतिज्ञा की अनेदखी कर दी और उसकी ओर से मुंह मोड़ लिया किंतु ईश्वर ने उसपर पुनः कृपा की और उसे उसकी स्थिति पर छोड़ दिया।

इस आयत से मिलने वाले पाठ।
ईश्वर ने आंतरिक बुद्धि वे प्रवृत्ति के माध्यम से भी और अपने विशेष संदेश वहि के माध्यम से भी मनुष्य से प्रतिज्ञा ली है कि वह आस्था और कर्म में केवल सत्य और भलाई की ओर ही उन्मुख होगा और विचार व कर्म में हर प्रकार की बुराई दूर रहेगा।
यदि ईश्वर, मनुष्य के संबन्ध में अपनी दया व कृपा से काम न ले तो निश्चित रूप से मनुष्ट घाटा उठाएगा।


सूरए बक़रह; आयतें ६५-६९ (कार्यक्रम 32)
सूरए बक़रह की ६५वीं और ६६वीं आयतें इस प्रकार हैं।
وَلَقَدْ عَلِمْتُمُ الَّذِينَ اعْتَدَوْا مِنْكُمْ فِي السَّبْتِ فَقُلْنَا لَهُمْ كُونُوا قِرَدَةً خَاسِئِينَ (65) فَجَعَلْنَاهَا نَكَالًا لِمَا بَيْنَ يَدَيْهَا وَمَا خَلْفَهَا وَمَوْعِظَةً لِلْمُتَّقِينَ (66)
हे बनी इस्राईल! निश्चय ही तुम्हें अपने उन लोगों का हाल मालूम ही है जिन्होंने शनिवार के दिन ईश्वरीय आदेशों का उल्लंघन किया। हम ने इस उल्लंघन के कारण उनसे कहा कि धिक्कारे हुए बंदरों की भांति हो जाओ। (2:65) फिर हमने इस घटना को उस काल तथा आने वाले समय के लोगों के लिए एक पाठ तथा डर रखने वाले लोगों के लिए नसीहत बनाया। (2:66)
 इन आयतों में बनी इस्राईल की एक अन्य घटना का उल्लेख किया गया है। ईश्वर ने शनिवार के दिन को उनके लिए काम से छुटटी का दिन घोषित किया था, परन्तु उनका एक गुट जो नदी के समीप जीवन व्यतीत करता था, एक प्रकार के बहाने द्वारा शनिवार को भी मछली का शिकार करता था।
 उन लोगों ने नदी के किनारे छोटे-२ हौज़ बना रखे थे और जब मछलियां उनमें आ जाती थीं तो वे उनका रास्ता बंद कर देते थे और रविवार को उन्हें हौज़ों में से पकड़ लेते और इस प्रकार वो ईश्वर के आदेश को तोड़ मरोड़ देते या परिवर्तित कर देते थे।
 ईश्वर ने उनकी इस दुष्टता और ईश्वरीय आदेशों के परिहास के कारण उनका चेहरा बदल दिया तथा मनुष्य से बंदर बना दिया ताकि उनके लिए दंड और अन्य लोगों के लिए सीख हो।
 अलबत्ता पशु, ईश्वर की दया से दूर नहीं हैं परन्तु मनुष्य का मानव स्तर से गिर कर पशुओं की श्रेणी में पहुंचना भी, ईश्वर के दरबार तथा उसकी दया से उसके दूर होने की निशानी है।
सूरए बक़रह की ६७वीं आयत इस प्रकार है।
وَإِذْ قَالَ مُوسَى لِقَوْمِهِ إِنَّ اللَّهَ يَأْمُرُكُمْ أَنْ تَذْبَحُوا بَقَرَةً قَالُوا أَتَتَّخِذُنَا هُزُوًا قَالَ أَعُوذُ بِاللَّهِ أَنْ أَكُونَ مِنَ الْجَاهِلِينَ (67)
और याद करो उस समय को जब मूसा ने अपनी जाति वालों से कहा कि ईश्वर ने तुम्हें आदेश दिया है कि तुम एक गाय ज़िब्ह करो, उन्होंने कहा कि क्या तुम हमारा परिहास कर रहे हो, मूसा ने कहा कि मैं ईश्वर से पनाह चाहता हूं कि मैं जाहिलों में से हो जाऊं। (2:67)
 बनी इस्राईल की गाय की घटना का सारांश, जिसके कारण इस सूरे का नाम सरए बक़रह रखा गया है, ६७ से ७३ तक की आयतों में उल्लेख किया गया है जो इस प्रकार है।
 बनी इस्राईल में एक ऐसा मृतक मिला जिसके हत्यारे के बारे में ज्ञात नहीं था कि कौन है। क़बीलों के बीच मतभेद उत्पन्न हो गया और हर गुट ने दूसरे गुट पर हत्या का आरोप लगाना आरंभ किया। फ़ैसले के लिए ये विषय हज़रत मूसा के पास ले जाया गया।
 चूंकि सामान्य मार्ग से इस समस्या का समाधान संभव नहीं था अतः हज़रत मूसा ने चमत्कार द्वारा समस्या का समाधान किया। उन्होंने कहा कि ईश्वर ने आदेश दिया है कि तुम एक गाय ज़िब्ह करो और उसका एक टुकड़ा मृतक व्यक्ति के शरीर पर लगाओ तो वह जीवित हो उठेगा और अपने हत्यारे को परिचित करा देगा।
 उन्होंने ये सुनकर हज़रत मूसा से कहा कि क्या तुम हमारा परिहास कर रहे हो और इस प्रकार का समाधान बता रहे हो। परन्तु हज़रत मूसा ने कहा कि परिहास करना जाहिलों का कार्य है और ईश्वरीय दूत कभी ये काम नहीं करता, अगर तुम्हें हत्यारा चाहिए तो ये कार्य करो।
 ये आयत हमको सिखाती है कि यदि ईश्वरीय आदेश हमारी बुद्धि में न आए तो भी हमें उनका इन्कार नहीं करना चाहिए या उसे महत्त्वहीन नहीं समझना चाहिए।
 यद्यपि ईश्वर अपने विशेष ज्ञान द्वारा हज़रत मूसा को हत्यारे का नाम बता सकता था परन्तु गाए को ज़िब्ह करने का आदेश इस बात की निशानी है कि इस जाति में बछड़े की पूजा तथा गाए के प्रति श्रद्धा की भावना मौजूद थी तथा ईश्वर इस भावना को समाप्त करना चाहता था।
सूरए बक़रह की ६८वीं आयत इस प्रकार है।
قَالُوا ادْعُ لَنَا رَبَّكَ يُبَيِّنْ لَنَا مَا هِيَ قَالَ إِنَّهُ يَقُولُ إِنَّهَا بَقَرَةٌ لَا فَارِضٌ وَلَا بِكْرٌ عَوَانٌ بَيْنَ ذَلِكَ فَافْعَلُوا مَا تُؤْمَرُونَ (68)
बनी इस्राईल ने हज़रत मूसा से कहा कि अपने पालनहार से कहो कि वो हमें स्पष्ट रूप से बता दे कि वो गाय कैसी हो? मूसा ने कहा, ईश्वर कहता है वो गाय न बूढ़ी हो और न बछिया, बल्कि इन दोनों के बीच की (पक्की आयु) की हो, तो जो कुछ तुम्हें आदेश दिया गया है उसको यथाशीघ्र पूरा करो। (2:68)
 जब बनी इस्राईल के लोग समझ गए कि गाय को ज़िब्ह करने का आदेश गंभीर है तो उन्होंने बहाना बनाना आरंभ कर दिया कि हम कैसी गाए को ज़िब्ह करें। शायद ये बहाने वास्तविक हत्यारे की ओर से लोगों को समझाए जा रहे थे कहीं ऐसा न हो कि उसे अपमानित होना पड़े और लोग उसे पहचान जाएं।
 यद्यपि प्रश्न, किसी विषय को समझने के लिए किया जाता है परन्तु बनी इस्राईल इस प्रकार के प्रश्न करके ईश्वर के आदेश के पालन से बचाना चाहते थे, उसे समझना नहीं चाहते थे। इसी कारण उन्होंने अपने प्रश्नों को अत्यंत अशिष्टता के साथ प्रस्तुत किया और कहा कि, हे मूसा तुम अपने ईश्वर से पूछो। मानो मूसा का ईश्वर और उनका ईश्वर अलग हो।
अब सूरए बक़रह की ६९वीं आयत इस प्रकार है।
قَالُوا ادْعُ لَنَا رَبَّكَ يُبَيِّنْ لَنَا مَا لَوْنُهَا قَالَ إِنَّهُ يَقُولُ إِنَّهَا بَقَرَةٌ صَفْرَاءُ فَاقِعٌ لَوْنُهَا تَسُرُّ النَّاظِرِينَ (69)
बनी इस्राईल ने एक बार फिर कहाः हे मूसा अपने पालनहार से कहो कि वो हमें स्पष्ट रूप से बताए कि उस गाए का रंग क्या हो? मूसा ने कहाः ईश्वर कहता है, विशुद्ध पीले रंग की गाय जिसका रंग, देखने वालों को भला लगे। (2:69)
 यद्यपि गाए को ज़िब्ह करने का आदेश पुनः दिया गया परन्तु मानो वे यह कार्य नहीं करना चाहते थे अतः उन्होंने एक बार फिर एक नया प्रश्न किया कि उस गाए का रंग क्या हो? जबकि पहले तो आदेश में गाए के रंग की कोई भूमिका नहीं थी और दूसरे यदि आवश्यक होता तो पहले आदेश में ही उसका उल्लेख हो जाता।
 ईश्वर ने उस गाय के लिए पीले रंग का निर्धारण किया ताकि इस संबन्ध में उनके पास कोई बहाना न रहे और वो ये भी जान ले कि वो ईश्वर के आदेश से जिसे ज़िब्ह कर रहे हैं उसे बुरा और महत्वहीन नहीं होना चाहिए बल्कि स्वस्थ, बीच की आयु का और सुन्दर और आखों को भले लगने वाले रंग का होना चाहिए।
इन आयतों से मिलने वाले पाठः
 ईश्वरीय आदेशों के पालन में हमें बहाने और धोके से काम नहीं लेना चाहिए तथा विदित रूप से धर्म के पालन के नाम पर, ईश्वरीय आदेशों के मूल तत्व को जो उस आदेश का आधार है, नहीं बदलना चाहिए क्योंकि धर्म के चेहरे को परिवर्तित करने से मानवता का चेहरा परिवर्तित हो जाता है जैसा कि शनिवार के दिन मछली पकड़ने वालों के साथ हुआ।
 ईश्वरीय दंड केवल प्रलय से विशेष नहीं है बल्कि ईश्वर कुछ पापों का दंड संसार में भी देता है ताकि उस काल व आने वाले समय के लोगों के लिए शिक्षा सामग्री रहे।
 ईश्वरीय आदेशों का परिहास नहीं करना चाहिए और न ही उन्हें अतर्क व अकारण समझना चाहिए बल्कि ईश्वरीय आदेशों के समक्ष हमें पूर्ण रूप से नतमस्तक रहना चाहिए क्योंकि जो कुछ ईश्वर ने कहा है वह हमारी और मानव समाज की भलाई के लिए है। यद्यपि हत्यारे की खोज के लिए गाए का वध विदित रूप से लाभरहित दिखाई पड़ता है परन्तु यह कार्य बनी इस्राईल में गाय को ईश्वर का रूप समझकर गौपूजा की भावना को भी समाप्त करता है और ईश्वर की शक्ति को भी स्पष्ट करता है कि किस प्रकार वह एक मरे हुए जानवर के मांस के स्पर्श से, एक अन्य मरे हुए व्यक्ति को जीवित करता है।



सूरए बक़रह की ७०वीं और ७१वीं आयतें इस प्रकार हैं।
बनी इस्राईल ने मूसा से कहाः हे मूसा तुम अपने पालनहार से कहो कि वो हमें स्पष्ट रूप से बताए कि वो गाए कैसी हो क्योंकि हमारे लिए ये गाए संदिग्ध हो गई है और यदि ईश्वर ने चाहा तो अब हम उसका पता पा लेंगे। मूसा ने उनके उत्तर में कहाः ईश्वर कहता है वो गाय न भूमि जोतने के लिए सधाई गई हो और न खेत में सिंचाई करती हो, वो स्वस्थ हो, बिल्कुल एक रंग हो और उसमें किसी दूसरे रंग की मिलावट न हो। बनी इस्राईल ने कहा अब तुम ने स्पष्ट बात बता दी, फिर उन्होंने उसे ज़िब्ह किया और समीप था कि वे ऐसा न करते। (2:70, 71)
 गत कार्यक्रमों में हमने कहा था कि हत्यारे को पहचनवाने के लिए ईश्वर ने आदेश दिया कि बनी इस्राईल एक गाए को ज़िब्ह करें, बनी इस्राईल का एक गुट बहाने बाज़ी करने लगा और उसने परिहास करते हुए गाए का रंग और उसकी आयु पूछी।
 यह आयत भी बनी इस्राईल की बहाने बाज़ियों का उल्लेख करते हुए कहती है कि यद्यपि ईश्वर ने गाय का रंग और उसकी आयु बता दी थी परन्तु उन्होंने कहा कि हे मूसा उसकी और अधिक विशेषताएं और निशानियां बताओ ताकि हम उसे पहचान सकें।
 जब हज़रत मूसा ने गाए की अन्य निशानियां बताईं तो वे विवश हो गए और उन्होंने गाए को ज़िब्ह किया परन्तु वे इस कार्य से बचने के प्रयास में थे।
 ये आयत बताती है कि स्वार्थ और हठ की भावना मनुष्य को यहां तक पहुंचा देती है कि वो केवल उन्हीं बातों को ठीक समझता है जो उसकी दृष्टि में उचित हो और ईश्वरीय पैग़म्बर से अभद्र शब्दों में कहता है कि अब तुम ने सत्य कहा, मानो इस से पहले असत्य पर रहे थे।
अब सूरए बक़रह की ७२वीं और ७३वीं आयतें इस प्रकार हैं।
وَإِذْ قَتَلْتُمْ نَفْسًا فَادَّارَأْتُمْ فِيهَا وَاللَّهُ مُخْرِجٌ مَا كُنْتُمْ تَكْتُمُونَ (72) فَقُلْنَا اضْرِبُوهُ بِبَعْضِهَا كَذَلِكَ يُحْيِي اللَّهُ الْمَوْتَى وَيُرِيكُمْ آَيَاتِهِ لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ (73)
और याद करो उस समय को जब तुम ने एक व्यक्ति की हत्या कर दी और फिर हत्यारे के बारे में तुम में मतभेद हो गया परन्तु अल्लाह उस बात को स्पष्ट करने वाला है जो तुम लोग छिपाते हो। फिर हमने कहा गाए का एक टुकड़ा मृतक को मारो ताकि वो जीवित हो जाए और अपने हत्यारे को पहचनवाए। इस प्रकार ईश्वर मरे हुए लोगों को जीवित करता है और अपनी निशानियां तुम्हें दिखाता है ताकि तुम सोच विचार करो। (2:72, 73)
 पिछली आयतों में बनी इस्राईल की बहाने बाज़ी का विस्तार से उल्लेख किया गया। इन दो आयतों में एक बार फिर हत्या की घटना का संक्षेप में वर्णन किया गया है। आयत कहती है कि तुमने हत्या की और हत्यारे को छिपाया परन्तु ईश्वर ने चमत्कार द्वारा तुम्हारे उल्लंघनों से पर्दा उठाया। अतः तुम जान लो कि ईश्वर पापी को अपमानित करने में समर्थ है।
 ये आयत मरे हुए लोगो को जीवित करने में ईश्वर की शक्ति का उल्लेख करती है ताकि अन्य लोग ईश्वर की शक्ति की निशानियों को देखकर प्रलय के बारे में सोच विचार करें और जान लें कि यदि ईश्वर चाहे तो एक मुर्दे को दूसरे मुर्दे पर मारने से जीविन प्रकट हो सकता है।

आइए अब सूरए बक़रह की ७४वीं आयत इस प्रकार हैं।
इस घटना के पश्चात तुम्हारे हृदय पत्थरों या उनसे भी अधिक कठोर हो गए क्योंकि कुछ पत्थरों में से नहरें फूट निकलती हैं और कुछ ईश्वर के भय से पहाड़ पर से गिर पड़ते हैं, परन्तु तुम्हारे हृदय पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता और ईश्वर तुम्हारे कार्यों की ओर से निश्चेत नहीं है। (2:74)

 ४९वीं आयत से लेकर इस आयत तक बनी इस्राईल के लिए ईश्वर के अनेकों चमत्कारों और उपहारों का उल्लेख किया गया है जैसे फ़िरऔन के लोगों के चुंगल से मुक्ति, नदी की धारा का फटना, बछड़े की पूजा के पश्चात तौबा स्वीकार होना, आसमानी आहार का आना और बादलों का छाया करना।
 अंतिम चमत्कार, हत्यारे का पता लगाना था, परन्तु वे लोग इतनी सारी निशानियों और चमत्कार देखने के बाद भी ईश्वर के आदेश के सामने नहीं झुके और बहाने ढूंढते रहे कि जिसे क़ुरआन ने हृदय की कठोरता कहा है।
 कभी कभी मनुष्य का पतन इतना अधिक होता है कि वह पशु या उससे भी तुच्छ, जैसे जड़, वस्तुओं या उनसे ही अधिक कठोर हो जाता है। ये आयत कहती है कि कठोर पत्थर भी कभी-२ फट जाता है और उस में से पानी निकलता है या कम से कम अपने स्थान से हट जाता है और नीचे की ओर गिर पड़ता है।
 परन्तु कुछ लोगों के हृदय पत्थर से भी अधिक कठोर होते हैं कि न तो प्रेम से पिघलते हैं कि अच्छे कार्यों और दूसरों के साथ भलाई के बारे में सोचें और न ही ईश्वर के भय से पिघलते हैं कि भय के कारण ईश्वरीय आदेशों के सामने झुकें।
 आइए अब देखते हैं कि इन आयतों से हमने क्या बातें सीखीं।
 ईश्वरीय आदेशों के समक्ष बहाने बाज़ी नहीं करनी चाहिए और उनसे बचने के लिए अनुचित प्रश्न नहीं करने चाहिए क्योंकि प्रश्न सदैव खोज और ज्ञान प्राप्ति की भावना का सूचक नहीं होता बल्कि कभी-२ कर्तव्य के पालन से बचने के लिए भी प्रश्न किया जाता है।
 ईश्वर के मार्ग में जो जानवर ज़िब्ह किया जाता है उसे स्वस्थ और दोष रहित होना चाहिए। जैसा कि हज पर जाने वाले को बक़रीद के दिन स्वस्थ जानवर ज़िब्ह करना चाहिए।
 ईश्वर हमारे सभी कार्यों से परिचित है चाहे वो गुप्त हों या स्पष्ट, और यदि वो चाहे तो हमारे कार्यों का भंडा फोड़ कर हमें लज्जित कर सकता है अतः हमें उसके समक्ष पाप नहीं करना चाहिए या अपने पापों को दूसरों के गले नहीं मढ़ना चाहिए।
 ईश्वर ने इसी संसार में कई बार मुर्दों को जीवित किया है ताकि हमें अपनी शक्ति दिखाए और हमें सोच विचार द्वारा प्रलय के विषय पर ध्यान देना चाहिए।
 सृष्टि की सभी वस्तुएं यहां तक कि कठोर और निर्जीव पत्थर भी ईश्वर द्वारा इस संसार के संचालन के लिए बनाए गए क़ानूनों के प्रति नतमस्तक हैं अतः यदि कोई मनुष्य ईश्वरीय आदेशों का उल्लंघन करता है तो उसका हृदय पत्थर से भी अधिक कठोर और तुच्छ है।


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