कुरान तर्जुमा और तफसीर -सूरए बक़रह 2:260-286

सूरए बक़रह की आयत क्रमांक 260 इस प्रकार है। और (हे पैग़म्बर! याद कीजिए उस समय को) जब इब्राहीम ने कहा हे प्रभु! मुझे तू दिखा दे कि किस प्...

सूरए बक़रह की आयत क्रमांक 260 इस प्रकार है।
और (हे पैग़म्बर! याद कीजिए उस समय को) जब इब्राहीम ने कहा हे प्रभु! मुझे तू दिखा दे कि किस प्रकार मरे हुए लोगों को जीवित करता है। ईश्वर ने कहा क्या तुम्हें विश्वास नहीं है? इब्राहीम ने कहा, क्यों नहीं किंतु मैं मन को संतुष्ट करना चाहता हूं। अल्लाह ने कहा, तो फिर चार पक्षियों को लाओ और उनके टुकड़े-टुकड़े करके उनके मांस को मिला दो, फिर हर पहाड़ पर थोड़ा-2 भाग रख दो। फिर चारों पक्षियों को उनके नामों से पुकारो ताकि वे तत्काल तुम्हारे पास आ जाएं। और जान लो कि अल्लाह महा शक्तिशाली और अत्यंत युक्तिपूर्ण है। (2:260)
हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने ऐसा ही किया और चार पक्षियों को लेकर उनके टुकड़े-टुकड़े किए और उनके मांस को मिला कर दस पहाड़ियों पर रख दिया। उसके बाद चारों पक्षियों को उनके नाम से बुलाया। ईश्वर की शक्ति से पहाड़ की विभिन्न चोटियों पर रखे हुए उस पक्षी के मांस टुकड़े उड़ उड़ कर आते और आपस में जुड़ जाते और वह पक्षी पहले के भांति जीवित हो जाता और इस प्रकार हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया।
इस आयत से मिलन वाले पाठः
प्रलय के दिन मनुष्य को पुनः जीवित करना शारीरिक होगा। ईश्वर प्राकृतिक नियमों को अपने नियंत्रण में रखता है न यह कि वह उनके नियंत्रण में रहे। इस आधार पर प्रलय के दिन शरीर के टुकड़ों को जोड़ कर मनुष्य को जीवित करना कोई असंभव काम नहीं है।
तर्क मनुष्य को संतुष्ट कर देता है किंतु आवश्यक नहीं है कि मन को भी शांति प्राप्त हो जाए। हमें मन में विश्वास व शांति उत्पन्न करना चाहिए जो ईश्वर की अनगिनत अनुंपाओं पर विचार करके हाथ आ सकती है।
सूरए बक़रह की आयत क्रमांक 261 इस प्रकार है।
उन लोगों का उदाहरण जो ईश्वर के मार्ग में दान करते हैं उस दाने की भांति है जिससे सात बालियां फूटी हों और प्रत्येक बाली में सौ दाने हों और ईश्वर जिसके लिए चाहता है बढ़ोतरी कर देता है और ईश्वर तो बढ़ोतरी करने वाला और जानने वाला है। (2:261)
इस आयत से लेकर बाद वाली चौदह आयतों में दान व सूद के बारे में बात की गई है। आपको ज्ञान है कि हर समाज में स्वाभाविक रूप से लोगों की आय में अंतर होता है। इन समाजों में बाढ़, भूकंप, अकाल और सूखे आदि जैसी आपदाएं या फिर चोरी, डकैती जैसी दुर्घटनाओं के कारण समाज में कुछ लोग नौकरी व आय से वंचित हो जाते हैं और उनके लिए जीवन यापन कठिन हो जाता है।
इस समस्या का समाधान क्या है? क्या इन लोगों को इनके हाल पर छोड़ देना चाहिए कि जो चाहें करें, हम से क्या मतलब। या यह कि ये बेचारे धनवानों से सूद पर ऋण लेकर पेट भरें। यह जो कहा जाता है कि सूदख़ोरी समाज की बीमारी है, वह इस लिए धनवान सूद ले लेकर अधिक धनवान होता जाता है और क़र्ज़दार सूद तथा मूल राशि लौटाते-2 अधिक ग़रीब हो जाता है जिससे समाज में अमीर व ग़रीब के बीच अंतर बढ़ता जाता है।
इस्लाम में सूद लेना और देना दोनों ही हराम अर्थात पाप और वर्जित है। इसके स्थान पर इस्लाम में समाज के सदस्यों और मुसलमानों के बीच भाईचारे की भावना को जागृत करने के लिए उन्हें दान के लिए प्रोत्साहित किया गया है। और चूंकि सूद पर धन देने वालों का लक्ष्य अपने धन में वृद्धि करना होता है अतः ईश्वर इस आयत में कहता है कि जो ईश्वर के मार्ग में दान करता है उसके धन में भी वृद्धि होती है और वह सात सौ गुना तक बढ़ जाता है। इससे तुम भी आगे बढ़ोगे और तुम्हारा धन भी और समाज से निर्धनता दूर हो जाएगी।
इस आयत से मिलने वाले पाठः
समाज के निर्धन लोगों की सहायता यदि ईश्वर के लिए हो तो न केवल यह कि इससे धन में कोई कमी नहीं होती बल्कि यह चीज़ समाज के विकास का कारण भी बनती है।
ईश्वरीय कृपा की कोई सीमा नहीं है और हर कोई अपने प्रयास व क्षमता के अनुसार ईश्वरीय अनुकंपा से लाभान्वित होता है।
सूरए बक़रह की आयत नंबर 262 इस प्रकार है।
जो लोग अपना धन ईश्वर के मार्ग में दान करते हैं और उसके बाद न एहसान जताते हैं और न ही दुखी करते हैं उनका पुरस्कार उनके पालनहार के पास है, न उन्हें कोई चिंता होगी और न ही वे दुखी होंगे। (2:262) अच्छी बात और क्षमा उस दान से अच्छी होती है जिसके बाद यातना हो और अल्लाह आवश्यकतामुक्त तथा संयमी है। (2:263)
इससे पहले वाली आयत में लोगों को दान करने के लिए प्रोत्साहित किया गया था जिसके बाद इस आयत में लोगों को दान करने की सही शैली से अवगत कराया जा रहा है। आयत कहती है कि यदि तुमने ईश्वर के मार्ग में निर्धनों को कोई चीज़ दान की तो न उस पर यह जताओ कि तुमने उन्हें कुछ दिया है और न ही अपनी करनी व कथनी द्वारा उन्हें दुखी करो। जान लो कि जो कुछ तुमने उन्हें दिया है वह तुम्हारा नहीं था कि तुम उसके बल पर इतराओ, वह ईश्वर का था जो तुम्हें प्रदान किया गया था बल्कि निर्धनों का तुम पर एहसान है कि उन्होंने तुम्हें इस बात का अवसर दिया कि तुम ईश्वर के आदेश का पालन करते हुए उसे प्रसन्न कर सको। यदि कोई ईश्वर के मार्ग में दान करता है तो उसे किसी से फल या आभार की आशा नहीं रखनी चाहिए। ऐसे लोग अपने अच्छे कर्मों पर पश्चाताप का आभास नहीं करते क्योंकि ईश्वर ने दान देने वाले के भविष्य को अच्छा करने की ज़मानत दी है। उनके पास यदि दान करने के लिए कुछ न हो तब भी वे अच्छे और नम्र शब्दों के साथ निर्धनों से व्यवहार करते हैं और यह चीज़ उस धनदान से कहीं अच्छी है जिसके पश्चात एहसान जताया जाए या लेने वाले को दुखी किया जाए।
इस आयत से मिलने वाले पाठः
जो काम हमने ईश्वर के लिए आरंभ किया है उस पर अत्यधिक ध्यान दिया जाना चाहिए ताकि हमारे भीतर घमंड, आशा और एहसान जताने जैसे रोग पैदा न होने पाएं कि फिर उस काम का महत्व ही न रह जाए।
किसी के मान की रक्षा उसकी शारीरिक व आर्थिक आवश्यकताओं को पूरा करने से अधिक अच्छा काम है। प्रयास किया जाए कि दूसरों के आत्म सम्मान को ठेस न लगे।
सूरए बक़रह की आयत संख्या २६४ तथा २६५ इस प्रकार है।
हे ईमान लाने वालो! अपने दान को जताकर और दुखी करके नष्ट न करो उस व्यक्ति की भांति कि जो लोगों को दिखाने के लिए दान देता है और अल्लाह तथा प्रलय पर ईमान नहीं रखता। उसका उदाहरण उस कठोर और समतल पत्थर की भांति है कि जिसपर मिट्टी की एक परत हो और जैसे ही तेज़ वर्षा हो तो चट्टान साफ़ हो जाती है। वह व्यक्ति अपने किए का कोई लाभ उठाने में सक्षम नहीं होता और ईश्वर, इन्कार करने वालों का मार्गदर्शन नहीं करता। (2:264) और उन लोगों का उदाहरण कि जो अल्लाह को प्रसन्न करने और अपनी आत्मा को दृढ़ करने के लिए दान करते हैं उस उद्यान की भांति होता है कि जो ऊंचे स्थान पर हो और सदैव वर्षा होती रहे जिससे उसमें दुगने फल हों और अगर भारी वर्षा न भी हो तो भी फुहार पड़ती रहे और तुम जो कुछ भी करते हो अल्लाह उससे अवगत है। (2:265)
 इन आयतों में लोगों को दान की ओर प्रोत्साहित करने के बाद सही दान और ग़लत दान दोनों को उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया गया है। आयत में दिखावे के लिए दान करने वाले के काम का उदाहरण उस नर्म भूमि से दिया जाता है जिसके नीचे कठोर पत्थर होता है और जिसपर कुछ भी उगना संभव नहीं है। उसका दान भी हालांकि दूसरों के लिए लाभदायक होता है किंतु उसे उसका कोई लाभ नहीं प्राप्त होता और इसी प्रकार उन लोगों के दान का उदाहरण जो पवित्र भावना और मानव प्रेम के अन्तर्गत काम करते हैं उस बीज की भांति है जो ऊंची और उपजाऊ भूमि में बोया गया हो। वर्षा चाहे तेज़ हो या हल्की न केवल यह कि उस बीज को नहीं धोता बल्कि उसके कई गुना बढ़ने का कारण बन जाती है क्योंकि भूमि उपजाऊ होती है वर्षा का पानी भली भांति सोख लेती है और पौधे की जड़ें गहराई तक चली जाती हैं।
इस आयत से मिलने वाले पाठः
उस अच्छे काम का महत्व होता है जो पवित्र भावना के साथ किसा जाए और उसके बाद कोई ऐसा काम न किया जाए जिससे उस अच्छे काम को आघात पहुंचे।
ईश्वर की प्रसन्नता अच्छी विशेषताओं को बढ़ाना आदि मानव सेवा के लिए सही भावनाए हैं।
दिखावा और पाखण्ड, अल्लाह तथा प्रलय पर वास्तविक ईमान न रखने का चिन्ह है।
सूरए बक़रह की आयत संख्या २६६ इस प्रकार है।
क्या तुममें से कोई यह चाहता है कि उसके लिए खजूर और अंगूर का बाग़ हो जिसके नीचे से नहर बहती हो उसके लिए उसमें हर फल उपलब्ध हो और फिर वह बूढ़ा हो जाए और उसकी संतान भी कमज़ोर हों और आंधी आए और उस बाग़ में आग लग जाए। और अल्लाह इसी प्रकार निशानियों का तुम्हारे लिए वर्णन करता है कि शायद तुम चिंतन करो। (2:266)
 यह आयत उन लोगों के लिए एक उदाहरण देती है जो अच्छा काम करते हैं किंतु दिखावा करके या जताकर अपने अच्छे काम को प्रभावहीन कर देते हैं। निर्धन और आवश्यकता रखने वालों की सहायता करना समाज के बाग़ में एक वृक्ष लगाने की भांति है कि जिसके लिए अत्यधिक परिश्रम करना पड़ता है अगर इस काम को सतर्कता से न किया जाए तो यह वृक्ष घमण्ड और दिखावे जैसे रोगों का शिकार होकर बहुत जल्दी सूख जाएगा और फिर पश्चाताप के अतिरिक्त कुछ भी बाक़ी नहीं बचेगा।
 इतिहास में उल्लेख है कि पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने कहा है कि अल्लाह के नाम का जप करो कि हर जप के साथ स्वर्ग में तुम्हें एक वृक्ष प्रदान किया जाएगा। उपस्थित लोगों में से एक ने पूछाः तो फिर स्वर्ग में हमारे कई बाग़ होंगे। पैग़म्बर सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने कहा अलबत्ता लोग कभी उसी ज़बान से जिससे अल्लाह के नाम का जप किया है दूसरों की पीठ पीछे बुराई भी करते है कि जिसकी आग समस्त वृक्षों को भस्म कर देती है।
 बहरहाल प्रलय के दिन कि जब मनुष्य को अच्छे कर्म की आवश्यकता होगी यह देखना बहुत कठिन होगा कि हमारे अच्छे कर्मों को दिखावे और घमण्ड में नष्ट कर डाला है।
इस आयत से मिलने वाले पाठः
अच्छे काम हमें घमण्डी न बना दें। ऐसा भी हो सकता है कि हम अपने अच्छे कर्मो को दूसरे ग़लत काम करके नष्ट कर दें। बाग़ लगाने के बाद वृक्षों के बड़े होने और फल देने में वर्षों लग जाते हैं किंतु एक क्षण में लगने वाली आग सब कुछ भस्म कर देती है।
सूरए बक़रह की आयत संख्या २६७ इस प्रकार है।
हे ईमान वालो! अपने कमाए हुए पवित्र धन और जो कुछ हमने धरती से तुम्हें प्रदान किया है, दान करो और अपवित्र और ग़लत धन के पीछे न जाओ कि तुम स्वयं उसे लेना पसंद नहीं करते सिवाए इसके कि उपेक्षा और अनदेखी से काम लो और जान लो कि अल्लाह, आवश्यकतामुक्त एवं प्रशंसनीय है। (2:267)
 मुसलमान सदैव ही पैग़म्बर सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम से यह पूछा करते थे कि निर्धनों को दान में क्या दिया जाना चाहिए। इस आयत में दान करने के लिए एक सामूहिक मानदंड बता दिया है कि पवित्र चीज़ें दान करो वह चाहे जो कुछ भी हो। चाहे धन-दौलत हो कि जो व्यापार या नौकरी से प्राप्त होता है या फिर खाद्य सामग्री या धरती से उगने वाली कोई अन्य वस्तु हो। महत्वपूर्ण बात यह है कि वह हलाल और पवित्र धन से हो और उचित हो ऐसा न हो कि जो कपड़ा या खाना फेंकने योग्य हो जाए उसे दान कर दिया जाए। जैसाकि पैग़म्बर सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के काल में मदीने में कुछ लोग अच्छी खजूरें स्वयं रखते थे और ख़राब तथा सूखी हुई खजूरें निर्धनों में बांट दिया करते थे। इस आयत में ऐसे ही लोगों की ओर संकेत के साथ पूछा गया है कि यदि कोई तुम्हें यह देता तो क्या तुम उसे स्वीकार कर लेते?
इस आयत से मिलने वाले पाठः
दान के समय निर्धनों के मान-सम्मान की सुरक्षा करनी चाहिए। बेकार और ख़राब चीज़ों का दान न यह कि कोई प्रभाव नहीं रखता बल्कि लेने वाले का अपमान करता है।
दान करने का उद्देश्य कंजूसी से बचना है न कि फ़ालतू पड़ी हुई चीज़ों से छुटकारा प्राप्त करना।
मनुष्य की अंतरात्मा, दूसरों के साथ उसके व्यवहार की सबसे अच्छी कसौटी है जो व्यवहार उसे अपने साथ नापसंद हो वही काम उसे दूसरों के साथ नहीं करना चाहिए।
सूरए बक़रह की आयत संख्या २६८ तथा २६९ इस प्रकार है।
दान के समय शैतान तुम्हें निर्धनता से डराता है और ग़लत कामों का आदेश देता है और ईश्वर तुम्हें क्षमा और वृद्धि का वचन देता है और अल्लाह सुनने तथा जानने वाला है। (2:268) जिसे चाहता है अपार बुद्धि दे देता है और जिसे अपार बुद्धि दे दी गई उसे अत्याधिक अच्छाई प्रदान कर दी गई और बुद्धिमानों के अतिरिक्त कोई याद नहीं रखता। (2:269)
 शैतान या शैतान के अनुयाई दुष्ट प्रवृत्ति के लोग विभिन्न रूपों में लोगों को निर्धनों की सहायता करने से रोकते हैं। वे कभी तो यह कहते हैं कि तुमको आगे चलकर स्वयं इस पैसे की आवश्यकता होगी और कभी यह समझाते हैं कि जब मेहनत तुम कर रहे हो तो पैसे उसे क्यों दे रहे हो। अल्लाह चाहता तो उसे भी धन देता और वह निर्धन न होता।
 ऐसे लोग एक ओर तो लोगों को दान देने से रोकता है और उन्हें धन बटोरने का प्रलोभन देते हैं तथा दूसरी ओर मनुष्य को भविष्य में निर्धन होने से डराते हैं। हालांकि प्रलय के दिन ईश्वरीय दान की हमें इससे कहीं अधिक आवशयकता होगी जितनी इस समय संसार में है। इसके अतिरिक्त अल्लाह ने दान देने वाले के भविष्य की ज़मानत ली है और वस्तुतः उसे निर्धनता से सुरक्षित रखने का वचन दिया है।
 किंतु खेद की बात है कि बहुत से लोग इन बातों पर कोई ध्यान न देते हुए दुष्ट लोगों और शैतान की बात माल लेते हैं। ऐसे लोग केवल धन-संपत्ति को अच्छाई समझते हैं हालांकि वास्तविक अच्छाई सही पहचान और विचार का स्वामी होने में है ताकि मनुष्य ईश्वरीय वचनों पर ध्यान देते हुए शैतानी बहकावे में न आए।
 इस आयत से हम यह सीखते हैं कि निर्धनता के भय से हमें कंजूसी नहीं करनी चाहिए क्योंकि यह शैतानी बहकावा है। इस भय के मुक़ाबले में हमें ईश्वरीय कृपा और दया को याद रखना चाहिए तथा अपने भीतर भरोसे की भावना को जीवित रखना चाहिए।
सही बुद्धि का चिन्ह, ईश्वरीय वचनों को शैतानी वचनों पर प्राथमिकता देना है। धार्मिक दृष्टिकोण से बुद्धिमान वह होता है जो ईश्वर के आदेशों का पालन करता हो न कि अपनी या अन्य लोगों की इच्छाओं का।
बुद्धिमान वह होता है जो ईश्वर पर आदेशों का पालन करता हो न कि अपनी या अन्य लोगों की इच्छाओं का।
सूरए बक़रह की आयत संख्या २७० तथा २७१ इस प्रकार है।
तुमने जो भी दान किया है या मन्नत मानी है निःसन्देह अल्लाह उससे अवगत है और अत्याचारियों का कोई सहायक नहीं होगा। (2:270) अगर दान सबके सामने दो तो अच्छा है किंतु यदि उसे छिपा कर निर्धनों को दो तो यह तुम्हारे लिए अधिक अच्छा होगा और यह तुम्हारे कुछ पापों को कम कर देगा और अल्लाह तुम्हारे समस्त कर्मों से अवगत है। (2:271)
 समाज में दान के मार्ग की एक बाधा यह भी है कि दान देने वाले को आशा होती है कि उसके प्रति आभार प्रकट किया जाए। यह आयत कहती है कि भले ही तुम्हारे अच्छे कामों या दान देने को अन्य लोग न देखें किंतु क्या तुमने अल्लाह के लिए दान नहीं दिया है? तो फिर क्यों लोगों से आभार की आशा रखते हो? अगर मनुष्य को विश्वास हो कि वह जो कुछ भी करता है अल्लाह उसे देख रहा है तो स्वयं यह विश्वास अच्छे काम के लिए एक प्रेरणा होता है। इस आधार पर निर्धनों की उपेक्षा क़ुरआन के शब्दों में वह अत्याचार है कि जो प्रलय के दिन मनुष्य को हर सहायक से वंचित कर देता है।
 दन की शैली के बारे में भी जैसा कि किताबों में उल्लेख हुआ है अनिवार्य दान कि जिसे ज़कात कहा जाता है सबके सामने देना चाहिए और इसके अतिरिक्त जो कुछ भी निर्धनों को दे उसे छिपा कर देना अच्छा होता है। संभवतः इसका कारण यह है कि इस प्रकार से दिये जाने वाले दान में दिखावे की भावना उत्पन्न होने की संभावना कम होती है।
इस आयत से मिलने वाले पाठः
अलल्लाह को हमारे दान का ज्ञान है अतः हमें अच्छे धन को अच्छी भावना के साथ दान करना चाहिए।
दान कभी सबके सामने दें और कभी छिप कर। सबके सामने दान करने से अन्य लोगों को भी इसका प्रोत्साहन होता है और गुप्त दान मनुष्य को दिखावे से दूर रखने के साथ-साथ दान देने वाले के सम्मान को सुरक्षित रखता है।
दान पापों के धुलने का साधन है। प्रायश्चित के लिए कभी धन का मोह त्याग देना चाहिए ताकि हमारे पापों में कुछ कमी हो।
सूरए बक़रह की आयत संख्या २७२ इस प्रकार है।
(हे पैग़म्बर!) लोगों को सही मार्ग पर लगा देना तुम्हारा कर्तव्य नहीं है बल्कि अल्लाह जिसे चाहता है रास्ते पर लगा देता है और तुम जो भी नेकी लोगों में बांटते हो वह तुम्हारे लिए होती है और तुम अल्लाह को प्रसन्न करने के अतिरिक्त किसी अन्य उद्देश्य से दान नहीं करते और तुम जो भी दान करते हो तुम्हें लौटा दिया जाएगा और तुम पर अत्याचार नहीं होगा। (2:272)
 जैसाकि पवित्र क़ुरआन की विभिन्न व्याख्याओं में आया है कि मुसलमानों को ईश्वर का इन्कार करने वालों को दान देने में असमंजस होता था जब उन्होंने पैग़म्बर से इस बारे में पूछा तो यह आयत उतरी कि जिसमें कहा गया है कि धर्म ग्रहण करना बल पूर्वक नहीं होना चाहिए कि निर्धन धन के लिए इस्लाम ले आएं ताकि इस प्रकार उन्हें मुसलमान दान दें कि जो उस समय मदीने के बहुसंख्यक थे। बल्कि जिस प्रकार इस संसार में अल्लाह की दी हुई नेमतों से सभी मनुष्य चाहे वह किसी भी धर्म से संबन्ध रखता हो लाभान्वित होते हैं, उसी प्रकार उसके मानने वालों को भी दान के लिए धर्म या समुदाय पर ध्यान नहीं देना चाहिए यह सोच कर कि सभी अल्लाह के बंदे और उसके दास हैं। उन्हें दान देना चाहिए कि इसका बदला अल्लाह देगा।
इस आयत मिलने वाले पाठः
धर्म को बलपूर्वक ग्रहण नहीं कराया जाना चाहिए यहां तक कि पैग़म्बर को भी यह अधिकार नहीं होता कि वह किसी को धर्म ग्रहण करने पर विवश करे।
इस्लाम मानवप्रेमी धर्म है और निर्धनता को ग़ैर मुस्लिम लोगों के लिए भी पसंद नहीं करता।
अगर दान देने के पीछे ईश्वर को प्रसन्न करने की भावना हो तो मनुष्य को अपने इस अच्छे काम का बदला लोक-परलोक दोनों में मिलेगा।
सूरए बक़रह की आयत संख्या २७३ तथा २७४ इस प्रकार है।
दान उन निर्धनों के लिए है जो अल्लाह की राह में कठिनाई का शिकार हुए हों और आजीविका के लिए कहीं की यात्रा पर सक्षम न हों। जानकारी न रखने वाला उनके आत्म सम्मान के कारण उन्हें धनवान समझता है किंतु तुम उन्हें उनके चेहरे से पहचानते हों। वे लोगों से कोई वस्तु आग्रह के साथ नहीं मांगते और तुम जो भी अच्छी वस्तु दान करते हो निःसन्देह अल्लाह उससे अवगत है। (2:273) जो लोग अपना धन, रात में दिन में और खुल्लम खुल्ला या छिपा कर दान करते हैं उनका बदला अल्लाह के पास है। उन्हें न कोई डर है और न दुख। (2:274)
 इससे पहले कहा गया कि इस्लाम ने इस्लामी समाज में संतुलन बनाए रखने के लिए बहुत सी सिफ़ारिशें की हैं जिनमे दान ही सम्मिलित है। अर्थात धनवानों को अपने धन में से ग़रीबों की सहायता करनी चाहिए। यह आयत दान के एक महत्वपूर्ण पात्र उन पलायनकार्ताओं और मुजाहिदयों की ओर संकेत करती है जिन्होंने जेहाद और पलायन के दौरान अपना घर-बार छोड़ दिया और परदेस में उनके पास न तो धन है और न ही कमाने का कोई साधन। ऐसे लोग इस प्रकार की दशा के बावजूद अपने आत्म सम्मान के कारण लोगों से कुछ नहीं मांगते हैं। यही कारण है कि लोग उन्हें धनवान समझते हैं। मोमिनों को अपने इस प्रकार के भाइयों का ध्यान रखना चाहिए ताकि उन्हें कठिनाइयों का सामना न करना पड़े।
 इतिहास में मिलता है कि इस्लाम के आरंभ में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के कुछ अनुयाइयों ने आपके साथ ही मक्के से मदीने की ओर पलायन किया। मदीने में उनके पास न तो भूमि थी और न ही घर। इस्लाम स्वीकार कर लेने के कारण मक्के के लोगों ने इन मुसमलानों के घर और उनकी संपत्ति ज़ब्त कर ली थी। मदीने के लोगों ने उनमें से कुछ लोगों को अपने घर मे रखकर उनका ख़र्च उठाया किंतु अधिकांश लोग पैग़म्बर द्वारा बनाई गई मस्जिद के निकट सुफ़्फ़ा नामक एक स्थान में रहते थे। आयत में उन्हीं लोगों की सहायता की ओर संकेत किया गया है।
इस आयत से हम यह सीखते हैं कि अल्लाह ने धनवानों के धन में ग़रीबों का भी कुछ हिस्सा रखा है।
इस्लामी समाज में इससे पूर्व कि निर्धन अपनी आवश्यकता बताए उसकी ज़रूरत पूरी करके उसके मान को सुरक्षित रखना चाहिए।
पवित्र क़ुरआन की दृष्टि में ग़रीब वह है जो बाढ़ या भूकंप जैसी आपदाओं या फिर युद्ध जैसी घटनाओं के कारण जीवन यापन की क्षमता खो बैठ हो। इसके बावजूद मान-सम्मान की रक्षा करना भौतिक सुख से अधिक आवश्यक बताया गया है। जो लोग सबके सामने आकर आग्रह के साथ पैसे मांगते हैं वह ग़रीबों में नहीं है।
ईश्वर ने अपनी राह में दान करने वाले मनुष्य को ग़रीबी से बचाने का वचन दिया है और ऐसे लोगों को कोई चिंता नहीं होनी चाहिए अतः उन्हें भी अल्लाह पर भरोसा रखते हुए कभी भी उचित दान से नहीं बचना चाहिए।
सूरए बक़रह की आयत संख्या २७५-२७६ इस प्रकार है।
जो लोग सूद या व्याज खाते हैं वह जब भी उठते हैं, उस व्यक्ति की भांति उठते हैं जिस पर शैतान की परछाईं पड़ गयी हो। यह इस लिए है कि वे कहते हैं कि व्यापार भी सूद की ही भांति है और अल्लाह ने व्यापार को वैध और सूद को हराम या वर्जित किया है। तो जो भी अल्लाह की सिफ़ारिश के बाद रुक गया तो जो कुछ ले चुका है उसका है और उसका मामला अल्लाह देख लेगा किंतु जो लौट गए तो वही नरक वाले हैं जिसमें वे सदैव रहेंगे। (2:275) अल्लाह सूद के धन को मिटाता है और दान के धन को बढ़ाता है और कोई भी इन्कार करने वाला पापी, ईश्वर को पसंद नहीं है। (2:276)
 यहां पर यह उल्लेख करना उचित होगा कि अल्लाह ने सूरए बक़रह की चार आयतों में निरंतर लोगों को दान की ओर प्रोत्साहित किया और उसके व्यक्तिगत और सामूहिक प्रभावों का वर्णन किया है ताकि एक ओर लोगों में दान की भावना को जीवित किया जाए और दूसरे उनके हृदयों से संसार प्रेम को कम किया जा सके। दूसरी और सामाजिक अंतर को यथासंभव कम करते हुए समाज में भाईचारे और बराबरी का वातावरण बनाया जा सके।
 इसके पश्चात अल्लाह सूद के बारे में कहता है कि सूद समाज के आर्थिक संतुलन के साथ ही सूदख़ोर के संतुलन को भी समाप्त कर देता है। एक ओर सूद लेना इस बात का कारण बनता है कि ग़रीबों में धनवानों के प्रति घृणा जन्म ले और समाज, एक विस्फ़ोटक स्थिति की ओर बढ़ने लगे तथा दूसरी ओर इससे सूदख़ोरों में एक प्रकार का पागलपन पैदा हो जाता है अर्थात वह ऐसा हो जाता है जैसे उस पर किसी प्रेतात्मा का प्रभाव हो और वह पैसे तथा सोने-चांदी के अतिरिक्त कुछ पहचानता ही नहीं और मानवीय मूल्यों का भी पैसे से सौदा करता है।
 सूदख़ोर अपने धन द्वारा उत्पादन या समाज में सुविधा की चिंता और किसी प्रकार का परिश्रम किये बिना केवल लोगों को पैसा क़र्ज देकर अपना धन बढ़ाना चाहता है। इसके परिणाम स्वरूप ग़रीब अधिक ग़रीब हो जाता है तथा धनवान अधिक धन बटोरता चला जाता है और यह किसी भी समाज के निर्धनों पर सबसे बड़ा अत्याचार है। यही कारण है कि समस्त ईश्वरीय धर्मों में सूद वर्जित है और सूदख़ोर के लिए दण्ड निर्धारित किया गया है।
 हालांकि देखने में सूद, धन में वृद्धि करता है और दान उसमें कमी किंतु धन में वृद्धि अल्लाह के हाथ में है इसीलिए जो धन सूद द्वारा प्राप्त किया जाता है वह बजाए इसके कि सूदख़ोर के लिए सफलता और सुख का कारण बने निर्धनों की घृणा के साथ होने के कारण सूदख़ोर की जान व माल को ख़तरे में डाल देता है। कभी-कभी तो यह मूल पूंजी के विनाश का कारण भी बन जाता है जैसाकि दान देने वाला समाज में अपनी लोकप्रियता के कारण सुख व शांति के साथ जीवन व्यतीत करता है और विकास व उन्नति के मार्ग उसके लिए खुले रहते हैं।
इस आयत से मिलने वाले पाठः
सूदख़ोरी लोगों के मानसिक संतुलन के बिगड़ जाने का कारण होती है। इसी प्रकार सूद से समाज में आर्थिक असंतुलन उत्पन्न होता है और समाज में प्रेम के स्थान पर घृणा और न्याय के स्थान पर अत्याचार आम हो जाता है।
 इस्लाम व्यापकता को महत्व देने वाला एक व्यापक धर्म है। यही कारण है कि लोगों की अर्थव्यवस्था के लिए भी उसके पास योजना है। ऐसा नहीं है कि इस्लाम ने लोगों को केवल उपासना का ही आदेश दिया और दूसरों मामलों में उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया हो।
 सूदख़ोरी एक प्रकार से ईश्वर के उपकारों को भुला देने के समान है। अल्लाह ने जो धन हमको दिया है वह हमारे पास एक धरोहर की भांति है और इस धन में से निर्धनों को दान न करना अल्लाह की अनुकंपाओं पर अकृतज्ञता प्रकट करने जैसा है कि जो धन के विनाश का कारण भी बनती है।
सूरए बक़रह की आयत संख्या २७७ इस प्रकार है।
निःसन्देह, जो लोग ईमान लाए और अच्छे काम करते हैं, नमाज़ पढ़ते हैं और ज़कात देते हैं उनका बदला उनके अल्लाह के पास है। वे न तो भयभीत होते होंगे और न ही दुखी। (2:277)
 यह आयत सच्चे मोमिन या अल्लाह पर विश्वास रखने वाले की विशेषताएं बताती हैं कि जो नमाज़ और उपासना द्वारा ईश्वर से संबन्ध स्थापित करने के साथ ही साथ उसके शब्दों से भी संबन्ध बनाने की सोचते हैं और धर्म को शुष्क कर्तव्यों में ही सीमित नहीं समझते बल्कि सदैव दूसरों को भी चिंता करते हैं। {
सूरए बक़रह की आयत संख्या २७८ तथा २७९ इस प्रकार है।
हे अल्लाह पर ईमान रखने वालो! अल्लाह से डरो और सूद का जो बचा भाग है उसे छोड़ दो अगर तुम मोमिन हो। (2:278) तो यदि तुमने ऐसा नहीं किया तो तुमने अल्लाह और उसके पैग़म्बर के साथ युद्ध की घोषणा कर दी है। और यदि तुमने पश्चाताप कर लिया तो मूल धनराशि पर तुम्हारा अधिकार है, न अत्याचार करोगे और न ही अत्याचार सहन करोगे। (2:279)
 सूद के हराम होने से संबन्धित आयतें जब उतरीं तो कुछ मुसलमानों की सूद पर दी हुई रक़म लोगों के पास थी। उन्होंने पैग़म्बर इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम से इस बारे में प्रश्न किया तो पैग़म्बर सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने मुसलमानों को संबोधित करते हुए उक्त आयतों की ओर संकेत किया और कहा कि सूदख़ोरी के सारे ही समझौते रद्द हो गए हैं और सबसे पहले मेरे संबन्धियों को सूद छोड़ देना चाहिए।
 इससे पहले वाली आयत में हमने पढ़ा था कि निर्धनों की सहायता और उन्हें ऋण देना, अल्लाह को ऋण देने की भांति है और उसका बदला अल्लाह देगा। यह आयतें भी उन लोगों को चेतावनदी देती हैं जो सूद लेकर लोगों पर अत्याचार करते हैं कि अगर सूदख़ोरी नहीं छोड़ी तो अल्लाह और उसके पैग़म्बर निर्धनों की सहायता करेंगे और सूदख़ोर को पैग़म्बर से युद्ध करना होगा।
इस आयत से मिलने वाले पाठः
ईमान का अर्थ केवल नमाज़ रोज़ा ही नहीं है बल्कि हराम धन से दूरी, ईमान की शर्त और अल्लाह से भय का चिन्ह है।
इस्लाम स्वामित्व को सम्मान देता है किंतु धनवानों को शोषण की अनुमति नहीं देता।
वर्चस्व जमाना और उसे स्वीकार करना दोनों ही आलोचनीय कार्य हैं। सूद खाना भी पाप है और सूद देना भी।
सूरए बक़रह की आयत २८० से २८१ इस प्रकार है।
अगर क़र्ज़ लेने वाला कठिनाई में हो तो समृद्धि तक प्रतीक्षा है। और अगर तुम दान दो तो वह तुम्हारे लिए अधिक उचित है, अगर तुम्हें ज्ञात होता। (2:280) और उस दिन से डरो जब तुम अल्लाह की ओर लौटाए जाओगे। उस दिन जिसने जो कमाया है उसे लौटा दिया जाएगा और उनपर अत्याचार नहीं होगा। (2:281)
 गत आयतों को जारी रखते हुए जिसमें मोमिनों को सूद खाने से रोका गया था और दान करने पर प्रोत्साहित किया गया था यह आयत एक महत्वपूर्ण शिष्टाचारिक पहलू की ओर संकेत करती है और वह इस प्रकार है कि न केवल ऋण में सूद नहीं लेना चाहिए बल्कि अगर निर्धारित अवधि के अन्दर क़्रर्ज़ लेने वाले में चुकाने की क्षमता न हो तो उसे मोहलत दो और उससे अच्छा यह है कि उसे दान कर दो और जान लो कि तुम्हारा यह दान, बेकार नहीं जाएगा और अल्लाह प्रलय के दिन बिना कुछ काम किये तुम्हें लौटा देगा।
 निश्चय ही अगर धर्म की इन शिक्षाओं का पूर्ण रूप से पालन किया जाए तो समाज में कितनी सदभावना होगी? निर्धनों की आवश्यकताएं तो दूर होंगी ही साथ में धनवार की कंजूसी और लोभ से सुरक्षित रहेंगे और धनी तथा निर्धन के मध्य दीवार छोटी होती चली जाएगी।
इन आयतों से मिलने वाले पाठः
दान और क़र्ज़ में बुनियादी बात वंचित वर्ग को सुविधा पहुंचाना है इसलिए ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए कि वे क़र्ज़ अदा करते समय फिर से निर्धनता का शिकार हो जाएं।
इस्लाम शोषित वर्ग का वास्तविक समर्थक है और सूद को हराम तथा दान की ओर प्रोत्साहित करके समाज की आर्थिक त्रुटियों का अंत करता है।
वंचित लोगों और अल्लाह को प्रसन्न करना बहुत अधिक कमाने से बेहतर है।
सूरए बक़रह की आयत नंबर २८२ इस प्रकार है।
हे ईमान लाने वालो! जब भी तुम निर्धारित समय के क़र्ज़ का लेन-देन करो तो उसे लिख लो और तुम्हारे मध्य उसे एक अन्य लिखने वाला न्याय के साथ लिखे और जिसे लिखना आता हो उसे अल्लाह ने जैसा बताया है लिखने से इन्कार नहीं करना चाहिए। तो जिसकी गर्दन पर अधिकार हो उसे समझौते के शब्द बोलने चाहिए और लिखने वाला उसे लिख ले और अपने दाता अल्लाह से डरे और कोई चीज़ लिखने से न छोड़े। और अगर जिसके ज़िम्मे कुछ हो वह पागल या बुद्धिहीन हो या समझौते शब्द बोल नहीं सकता तो उसके निरीक्षक को न्याय के साथ बोलकर लिखवाना चाहिए। और दो पुरुषों को गवाह बना लो और अगर दो पुरूष न हों तो एक पुरुष और दो महिलाएं, जिनकी गवाही से तुम सहमत हो ताकि अगर उनमें से कोई एक भूल जाए तो उसे दूसरा याद दिलाए और अगर गवाहों को गवाही के लिए बुलाया जाए तो उन्हें इन्कार नहीं करना चाहिए। और थोड़ी हो या अधिक उसकी अवधि लिखने में दुखी न हो कि यह अल्लाह के निकट न्याय से अधिक निकट, गवाही के लिए अधिक ठोस और शंका न होने के अधिक निकट है सिवाए इसके कि लेन-देन नगद हो कि जिसके तुम आपस में लेन-देन करते हो कि इस दशा में अगर तुमने उसे नहीं लिखा तो कोई पाप नहीं है लेकिन इसके बावजूद लेने-देन के समय गवाह का प्रबंध कर लो और लिखने वाले और गवाही देने वाले को कोई नुक़सान नहीं पहुंचाया जाना चाहिए कि यह तुम्हारी अवज्ञा का चिन्ह होगा, अल्लाह से डरो और अल्लाह तुम्हें सिखाता है और अल्लाह हर चीज़ जानता है। (2:282)
 यह क़ुरआन मजीद की सबसे बड़ी आयत है। इस आयत में लोगों के अधिकारों के बारे में चर्चा की गई है। इससे पहले की आयत में इस्लाम के आर्थिक आदेशों की शिक्षा के बाद कि जो लोगों को दान और क़र्ज़ देने पर प्रोत्साहित करने से आरंभ हुई और सूदख़ोरी को हराम बताते हुए समाप्त हुई। इस आयत में लेनदेन का सही तरीक़ा बताया जाता है ताकि लोगों का व्यापार हर प्रकार के घाटे से सुरक्षित रहे और किसी भी पक्ष को क्षति न पहुंचे। इस आयत ने लेन-देन के लिए जो शर्तें बताई हैं उनका सारांश यह हैः-
हर प्रकार के क़र्ज़ के लिए चाहे वह कम हो या अधिक लिखित रूप में प्रमाण होना आवश्यक है।
दोनो पक्षों से अलग एक अन्य व्यक्ति लिखित प्रमाण तैयार करे किंतु वह उसके कहने पर लिखेगा जो क़र्ज़ ले रहा हो। कर्ज़दार और लिखने वाले को अल्लाह से डरना चाहिए और कोई चीज़ कम नहीं करनी चाहिए।
लिखने के साथ ही दो गवाहों का होना भी आवश्यक है जिनपर दोनो पक्षों को भरोसा हो।
नगद लेन-देन में लिखना ज़रूरी नहीं है केवल ग्राहकों का प्रबंध ही काफ़ी है।
इस आयत से मिलने वाले पाठः
इस्लाम एक व्यापक और व्यापकताप्रेमी धर्म है। यह धर्म व्यक्तिगत मामलों और लोगों के आध्यात्मिक विकास के साथ ही साथ समाज के आर्थिक व क़ानूनी मामलों पर भी गंभीरता से ध्यान देता है।
ऐसे समय में लिखने की बात करना जब अधिकांश लोगों को लिखना पढ़ना नहीं आता था, लोगों की शिक्षा की ओर धर्म द्वारा ध्यान दिये जाने का चिन्ह है।
लिखित प्रमाण तैयार करने का आदेश लोगो के मध्य विश्वास करने के लिए है। यह लोगों पर भरोसा न करने का चिन्ह नहीं है क्योंकि ग़लती या इन्कार समाज की शांति को भंग कर सकता है।
लेन-देन को पूरी तरह से लिखने के तीन लाभ हैं। पहला तो यह कि इस प्रकार से न्याय होना निश्चित है, दूसरे यह कि लेन-देन के गवाहों की पुष्टि होती है और तीसरा लाभ यह है कि समाज में इस प्रकार अविश्वास और भ्रांति नहीं उत्पन्न होती।
सूरए बक़रह की आयत संख्या 283 इस प्रकार है।
और अगर तुम यात्रा पर हो और लिखने वाला कोई न मिले तो क़र्ज़ देते समय कोई वस्तु गिरवी रख लो और अगर तुममे से कोई एक-दूसरे को अमानतदार समझता है तो जिसे अमानतदार समझा जाए वह निर्धारित समय पर क़र्ज़ लौटा दे और अल्लाह से डरे। गवाही को मत छिपाओ और जिसने छिपाया उसका दिल पापी हुआ और तुम जो भी करते हो अल्लाह उससे अवगत है। (2:283)
 जैसा कि हमने पिछले कार्यक्रम में कहा था कि इस्लाम लोगों के आर्थिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए कुछ सिफ़ारिशें करता है वह यह है कि किसी भी प्रकार के ग़ैर नगदी लेन-देन या क़र्ज़ में लिखित प्रमाण तैयार करना चाहिए और यह काम दो गवाहों की उपस्थिति में हो ताकि भूलने या किसी पक्ष के इन्कार की स्थिति में समस्या उत्पन्न न होने पाए।
 इस ओर इस्लाम ने इतना अधिक ध्यान दिया है कि उसका आदेश है कि यदि तुम यात्रा पर हो तब भी यह काम करो और अगर यात्रा के दौरान कोई लिखने वाला न मिले तो क़र्ज़दार से कोई वस्तु लेकर लेन-देन को ठोस बना दो लेकिन क़र्ज़ देने और लेने वाले को यह जानना चाहिए कि उनक पास जो कुछ है वह धरोहर है और उसे सही समय पर मालिक को लौटा देना चाहिए।
 क़र्ज़ देने वाले के पास जो वस्तु गिरवी होती है वह भी धरोहर है और उससे अनुचित लाभ नहीं उठाया जा सकता ताकि क़र्ज़ लेने वाले का कोई नुक़सान न हो बल्कि गिरवी लेने वाले का प्रयास होना चाहिए कि जब ऋणी उसका ऋण अदा करे तो भी उसकी धरोहर को जैसे लिया था वैसे ही लौटा दे।
 इस आयत में क़र्ज़ लेने वाले को भी अमीन या धरोहर रखने वाला कहा गया है। इसलिए उसे भी अमानत अर्थात क़र्ज़ को सही समय पर लौटा देना चाहिए ताकि क़र्ज़ देने वाले का कोई नुक़सान न हो। विशेषकर उस समय जब क़र्ज़ देने वाले ने उसपर विश्वास करते हुए बिना कोई चीज़ गिरवी लिए ही क़र्ज़ दे दिया हो। ऐसी स्थिति में अल्लाह से डरना चाहिए कि कहीं किसी के अधिकार का हनन न हो जाए।
 आयत के अंत में भी समस्त मोमिनों से सिफ़ारिश की जाती है कि लोगों के अधिकारों के वर्णन और उन्हें व्यक्त करने से जी न चुराएं क्योंकि अल्लाह तुम्हारे मन में जो भी विचार आता है उससे अवगत है और सत्य का छिपाना भले दिखने में केवल चुप रह जाना लगता है और मनुष्य कुछ करता ही नहीं कि उसे पाप का आभास हो किंतु वस्तुतः यह बहुत बड़ा पाप है क्योंकि इससे मनुष्य का मन अपवित्र हो जाता है।
इस आयत से मिलने वाले पाठः
ग़ैर नक़द लेन-देन ज़बानी तौर पर नहीं करना चाहिए बल्कि लिख कर दो गवाह बना कर और आवश्यकता पड़ने पर गिरवी ले कर लेन-देन को दृढ़ बनाना चाहिए।
लोगों के क़र्ज़ को सही समय पर अदा करना चाहिए ताकि अविश्वास उत्पन्न न हो और समाज की आर्थिक सुरक्षा के लिए ख़तरा न हो जाए।
सूरए बक़रह की आयत संख्या २८४ इस प्रकार है।
जो कुछ भी आकाशों और धरती पर है अल्लाह का है और अपने मन की बातें चाहें तुम छिपाओ या बताओ, अल्लाह उसके अनुसार तुम्हारा हिसाब लेगा। जिसे चाहेगा क्षमा कर देगा और जिसे चाहेगा दंड देगा और अल्लाह हर चीज़ पर सक्षम है। (2:284)
 यह आयत मोमिनों को चेतावनी देती है कि वे यह न सोचें कि केवल वह पाप जो शरीर के हाथ, पैर, आंख आदि जैसे अंगों से किये जाते हैं उन्ही का हिसाब लिया जाएगा। बल्कि अल्लाह जो कुछ तुम्हारे मन में है उससे भी अवगत है और उसका भी तुम से हिसाब लिया जाएगा।
 अलबत्ता यहां पर आशय उन पापों से है जो मन व विचार से संबन्धित है या विचार या मन द्वारा किये जाते हैं जैसे नास्तिक विचार रखना या किसी की ओर से सत्य की गवाही को छिपा कर चुप्पी साध लेना आदि। किंतु अगर किसी व्यक्ति को शैतान भड़काए और वह कोई पाप करने का निर्णय भी कर ले तो भी उसने कोई पाप नहीं किया है और तुम्हें इसकी सज़ा उस समय तक नहीं मिल सकती जब तक वह काम कर न ले। अलबत्ता इस प्रकार के विचारों से मन की पवित्रता धूमिल होती है।
इस आयत से मिलने वाले पाठः
मनुष्य को न केवल यह कि अपनी आंख और कान की ओर से सतर्क रहना चाहिए बल्कि मन की ओर से भी सचेत रहना चाहिए ताकि वह बुराइयों का घर न बनने पाए क्योंकि ऐसी स्थिति में शैतान का प्रभाव गहरा होता है और मनु्ष्य के लिए पाप का मार्ग प्रशस्त होता है।
सूरए बक़रह की आयत संख्या २८५ इस प्रकार है।
पैग़म्बर ने जो कुछ उनपर अल्लाह की ओर से उतारा गया उसपर विश्वास किया और जो मोमिन उनके साथ थे वह भी ईमान लाए। सब अल्लाह उसके फ़रिश्तों, किताबों और पैग़म्बरों पर ईमान ले आए। वे कहते हैं हमारे लिए पैग़म्बरों में अंतर नहीं है और उन्होंने कहाः हमने सुना और पालन किया, तेरी क्षमा के इच्छुक हैं। हे अल्लाह! और तेरी ओर ही जाना है। (2:285)
 इस्लाम की दृष्टि में संसार उस पाठशाला की भांति है जहां सदैव अल्लाह ने पैग़म्बरों के रूप में शिक्षकों को भेजा है। इन पैग़म्बरों ने इस पाठशाला की किसी एक कक्षा में मानव जाति को शिक्षा दी और उसके मानसिक विकास को बढ़ाया है यहां तक कि मानव की बुद्धि और विचार इस योग्य हो गए कि वह अल्लाह क सबसे अधिक सुव्यवस्थित कार्यक्रम को समझ सके तो फिर अल्लाह ने अपने अन्तिम दूत हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को पैग़म्बरी प्रदान की।
 इस आधार पर एक मुसलमान सभी पैग़म्बरों और उन समस्त आसमानी किताबों पर ईमान रखता है जिन्हें अल्लाह ने इन पैग़म्बरों पर उतारा है। उसके निकट ईश्वरीय दूतों के मध्य कोई अंतर नहीं है।
सूरए बक़रह की आयत क्रमांक २८६ कि जो इस सूरे की अंतिम आयत है इस प्रकार है।
अल्लाह किसी पर भी उसकी क्षमता से अधिक कार्य अनिवार्य नहीं करता, जो वह अच्छा करता है वह उसके हित में है और जो बुरा करता है उसके नुक़सान में है। हे ईश्वर! अगर हम कुछ भूल गए हो या हमसे ग़लत हो गई हो तो तू हमसे उसका हिसाब न लेना। हे अल्लाह जिस प्रकार तूने हमसे पहले वालों पर भारी कर्म अनिवार्य किये थे हमपर न करना। हे अल्लाह! हम पर वह चीज़ अनिवार्य न करना जिस की शक्ति हममें न हो। हमें क्षमा कर दे, हमारे पापों को माफ़ कर दे और हम पर दया कर तू ही हमारा निरीक्षक है तो इन्कार करने वालों के मुक़ाबले में हमारी सहायता कर। (2:286)
 ईश्वर ने मनुष्य को भांति-भांति का बनाया है। कोई अत्यन्त मेधावी, चतुर और योग्य तो कोई क्षीण बुद्धि वाला तथा अयोग्य होता है। कोई शक्तिशाली तो कोई दुर्बल होता है। कोई काला तो कोई गोरा। कोई पुरूष तो कोई महिला, किंतु इन समस्त अंतरों के बावजूद यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि इस प्रकार के कुछ अंतर, सृष्टि और मानवजाति के असितत्व के लिए आवश्यक है और कुछ अंतर मनुष्यों पर मनुष्यों द्वारा किये जाने वाले अत्याचारों का परिणाम है।
स्वभाविक सी बात है कि इस प्रकार के अंतर चाहे ग़लत हो या सही शारीरिक और वैचारिक स्थिति पर अत्याधिक प्रभाव डालते हैं और यदि अल्लाह सारे मनुष्यों से उनके मध्य समस्त अंतरों के बावजूद एक ही प्रकार के काम की आशा रखता है तो यह अत्याचार होता।
 इसीलिए आयत में ईश्वर की एक महत्वपूर्ण विशेषता अर्थात न्याय की ओर संकेत किया गया है कि अल्लाह किसी पर भी किसी ऐसे काम को करना अनिवार्य नहीं करता जो उसके बस से बाहर है और उसकी क्षमता से अधिक ईश्वर को उससे आशा नहीं है।
 इस आधार पर दंड या अच्छा बदला भी कि जो अनिवार्य आदेशों के पालन पर निर्भर है विभिन्न है और अल्लाह प्रलय के दिन हरएक से धार्मिक शिक्षाओं के प्रति उसकी जानकारी और उसके मानसिक स्तर के अनुसार हिसाब लेगा। इसीलिए यदि कोई व्यक्ति ग़लती से उसके किसी आदेश का पालन भूल गया हो या अन्जाने में कोई पाप कर बैठा हो तो अल्लाह, अपने न्याय के कारण उसे दंडित नहीं करेगा। अल्लाह केवल उन गुनाहों का दंड देता है जो जान-बूझ कर किये गए हों।
इस आयत से हमें यह सीख मिलती है।
इस्लाम सरलता का धर्म है। इसमें क्षमता से बाहर कोई वस्तु अनिवार्य नहीं की गई है जैसाकि पैग़म्बर ने कहा है कि मैं सरल धर्म के साथ भेजा गया हूं।
सज़ा या इनाम कर्म के आधार पर होता है और कर्म इरादे तथा भावना के अधीन होता है। इसी लिए जो काम ग़लती या भूल से हुआ हो उसको दंड नहीं दिया जाएगा।
मनुष्य के साथ अल्लाह का व्यवहार कृपा व क्षमा पर आधारित है। इसी लिए अगर मनुष्य प्रायश्चित कर ले तो उसके गुनाहों को क्षमा कर देता है और उसका मन पवित्र हो जाता है।

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