कुरान तर्जुमा और तफसीर -सूरए बक़रह 2:222 तलाक

सूरए बक़रह की आयत नंबर २२२ और २२३ इस प्रकार है। (हे पैग़म्बर) वे तुमसे महिलाओं के मासिक धर्म के बारे में पूछते हैं। कह दो कि यह यातना (क...

सूरए बक़रह की आयत नंबर २२२ और २२३ इस प्रकार है।
(हे पैग़म्बर) वे तुमसे महिलाओं के मासिक धर्म के बारे में पूछते हैं। कह दो कि यह यातना (का कारण) है तो इन दिनों में महिलाओं को अलग रखो और उनके समीप न जाओ यहां तक कि उनका मासिक धर्म समाप्त हो जाए और वे स्वयं को पवित्र कर लें। तो जिस प्रकार ईश्वर ने तुम्हें आदेश दिया है उनके पास जाओ, निःसन्देह ईश्वर तौबा करने वालों और पवित्र रहने वालों को पसंद करता है। (2:222) तुम्हारी स्त्रियां, तुम्हारी खेतियों के समान हैं तो तुम जब चाहो अपनी खेतियों में जाओ और भला कर्म अपने से पहले भेजो तथा ईश्वर से डरो और जान लो कि प्रलय के दिन तुम उससे मिलने वाले हो और (हे पैग़म्बर! उस दिन के लिए) ईमान वालों को शुभ सूचना दो। (2:223)

 विवाह का एक लक्ष्य मानव जाति को बाक़ी रखना है। इस लक्ष्य की पूर्ति में स्त्री और पुरूष दोनों का भाग है परन्तु प्रकृति ने बच्चे के प्रशिक्षण का महत्वपूर्ण कर्तव्य, उसके जन्म से भी पूर्व माता को दिया है।
 पवित्र क़ुरआन ने अत्यंत सुन्दर शब्दों में महिला को फ़सल उगाने के लिए तैयार खेत की उपमा दी है जो पुरुष से बच्चे का बीज लेकर ९ महीनों तक अपने पूरे अस्तित्व से उसका पोषण करती है और फिर उसे एक नव अंकुरित पौधे के समान मानव समाज के बाग़ के हवाले कर देती है परन्तु इस खेत को बीच स्वीकार करने के लिए तैयारी की आवश्यकता होती है और महिलाओं का मासिक धर्म इसी तैयारी के लिए होता है। इसी कारण ईश्वर ने आदेश दिया है कि इन विशेष दिनों में महिलाओं के समीप नहीं जाना चाहिए क्योंकि यह उनके शरीर व मानस के लिए यातना व क्षति का कारण है और इन दिनों में वे संतान के लिए तैयार नहीं होती हैं।
 भले व पवित्र बच्चों के प्रशिक्षण तथा मानव समाज के बाग़ में सुगंधित फूल प्रस्तुत करने के विचार में रहो और जान लो कि प्रलय के न्यायालय में ईश्वर के समक्ष तुम्हें माता-पिता के रूप में अपने बच्चों के बारे में अपने उत्तरदायित्व का जवाब देना है।

सूरए बक़रह की आयत संख्या २२४ और २२५ इस प्रकार है।
हे ईमान वालो! ईश्वर को अपनी सौगंध के लिए निशाना न बनाओ जब तक तुम भलाई न करोगे, ईश्वर का डर रखोगे और लोगों के बीच सुधार का काम न करोगे, जान लो कि ईश्वर (सब कुछ) सुनने और जानने वाला है। (2:224) अलबत्ता ईश्वर बे सोचे-समझे खाई हुई सौगंधों पर नहीं पकड़ेगा बल्कि वो ध्यान से और सोच समझकर तुम्हारे हृदयों ने जो संकल्प किया, उसके कारण तुम्हें पकड़ेगा और ईश्वर अत्यंत क्षमाशील और सहनशील है। (2:225)
 तफ़सीर की किताबों में लिखा है कि पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के एक साथी की बेटी और दामाद के बीच कुछ अनबन हो गई। उन्होंने क़सम खाई कि दोनों के बीच मेल कराने के लिए वे कोई हस्तक्षेप नहीं करेंगे। ईश्वर ने ये आयत भेजी और कहा कि लोगों के बीच सुधार करने के अपने दायित्व से बचने के लिए सौगंध न खाओ और अनुचित सौगंधों द्वारा स्वयं को भले कर्मों से वंचित न करो बल्कि मूल रूप से इस प्रकार की सौगंधों का कोई मूल्य नहीं है और इन्हें तोड़ने के कारण ईश्वर किसी को दंडित नहीं करेगा बल्कि बिना सोचे समझे होने वाली इन ग़लतियों को क्षमा कर देगा
सूरए बक़रह की आयत संख्या २२६ तथा २२७ इस प्रकार है।
जो लोग (अपनी पत्नियों को यातना देने के उद्देश्य से) क़सम खाते हैं कि वे अपनी पत्नियों से दूर रहेंगे तो उनके पास चार महीने की मोहलत है तो यदि वे अपनी सौगंध से पलट आए तो ईश्वर क्षमाशील और दयावान है। (2:226) और यदि उन्होंने तलाक़ का निश्चय कर लिया है तो जान लो कि ईश्वर, सुनने और जानने वाला है। (2:227)
 इस्लाम से पूर्व अरबों की एक बुरी आदत यह थी कि वे अपनी पत्नियों को शारीरिक व मानसिक यातनाएं देने व दबाव में डालने के लिए सौगंध खाते थे कि वे अपनी पत्नियों के पास नहीं जाएंगे न उसे तलाक देकर स्वतंत्र करेंगे, न उसके लिए अच्छे पति बनेंगे।
 इस्लाम ने इस अप्रिय व्यवहार को रोकने के लिए घोषणा की कि जिसने भी इस प्रकार की क़सम खाई है उसके पास चार महीने की मोहलत है कि वह अपनी पत्नी के बारे में निर्णय करते, या अपनी क़सम से पलट आए और अपनी पत्नी के साथ जीवन जीवन व्यतीत करे या फिर उसे औपचारिक रूप से तलाक़ दे दे।
इन आयतों से मिलने वाले पाठः
 इस्लाम एक व्यापक धर्म है और उसने परिवार के गठन या संतान पैदा करने सहित सभी मामलों में मनुष्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति की है।
 धर्म के आदेश, सृष्टि व प्रकृति से समन्वित हैं। जो कार्य स्वयं या अन्य लोगों के लिए हानिकारक हो उसे धर्म ने वर्णित किया है ताकि समाज के सदस्यों की सुरक्षा को सुनिश्चित बनाया जा सके, चाहे वे पुरुष हों या महिलाएं।
 इस्लाम की दृष्टि में स्त्री एक बाग़ के समान है जो पति के लिए आराम का कारण भी है और अच्छी संतान तथा सुगंधित फूलों के प्रशिक्षण का साधन भी।
 सौगंध को भले काम में रुकावट नहीं बनाना चाहिए, ईश्वर के पवित्र नाम का सम्मान करना चाहिए तथा उसे हर तुच्छ तथा महत्वहीन काम में प्रयोग नहीं करना चाहिए।
 ईश्वर ही की भांति हमें भी दूसरों की उन बातों को क्षमा कर देना चाहिए जो उन्होंने क्रोध में या बिना सोचे समझे कही हैं।
मानव समाजों की भलाई और सुधार के लिए ईश्वरीय पैग़म्बरों का एक कर्तव्य, ग़लत परंपराओं तथा रीति-रिवाजों को समाप्त करना है।
यद्यपि घर चलाना पुरुष का दायित्व होता है परन्तु पति अपनी पत्नी से ज़बरदस्ती काम करवाने या उसे यातना देने का अधिकार नहीं रखता।
तलाक़ को इस्लाम उसकी समस्त कड़वाहटों के साथ स्वीकार करता है परन्तु पत्नी को अधर में रखने को नहीं स्वीकार करता। अलबत्ता इस्लाम उस तलाक़ को स्वीकार करता है जो परिवार की भलाई में हो न कि वह तलाक़ जो स्त्री या पुरुष की अनुचित इच्छाओं के कारण हो कि ऐसी दशा में उन्हें प्रलय में जवाब देना होगा।
सूरए बक़रह की आयत नंबर २२८ इस प्रकार है।
और तलाक़ पाने वाली स्त्रियां तीन बार मासिक धर्म आने तक स्वयं को प्रतीक्षा मे रखें और यदि वे ईश्वर तथा प्रलय पर ईमान रखती हें तो उनके लिए वैघ नहीं है कि वे (किसी और से विवाह करने के लिए) जिस वस्तु की ईश्वर ने उनके गर्भाशयों में सृष्टि की है, उसे छिपाएं अलबत्ता इस अवधि में उनके पति उन्हें लौटा देने का अधिक अधिकार रखते हैं यदि वे सुधार का इरादा रखते हों और (पुरुषों को जान लेना चाहिए कि) जितना दायित्व महिलाओं पर है उतना ही उनके लिए अच्छे अधिकार हैं, और (महिलाओं को जान लेना चाहिए कि घर चलाने में) पुरुषों को उन पर एक वरीयता प्राप्त है और ईश्वर प्रभुत्वशाली तथा तत्वदर्शी है। (2:228)
 परिवार और बच्चों की सुरक्षा के लिए यह आयत कहती है कि तलाक़ की दशा में महिला तीन महीनों तक धैर्य करे और किसी से निकाह न करे ताकि प्रथम तो यदि उसके गर्भ में बच्चा हुआ तो इस अवधि में स्पष्ट हो जाएगा और शिशु के अधिकारों की रक्षा होगी और शायद यही बच्चा दोनों की जुदाई को रोकने की भूमि समतल कर दे और दूसरे यह कि इस बात की भी संभावना पाई जाती है कि पति-पत्नी को अलग होने के अपने निर्णय पर पश्चाताप हो और वे पुनः संयुक्त जीवन बिताना चाहें कि स्वाभाविक रूप से इस दशा में पति को अन्य लोगों पर वरीयता प्राप्त है।
 अंत में यह आयत पति-पत्नी के बीच कटुता समाप्त करने तथा भलाई उत्पन्न करने के मार्ग के रूप में एक महत्वपूर्ण बात बताती है और वह यह है कि पहले पुरुषों से कहती है कि यद्यपि घर और परिवार के बारे में महिलाओं का कुछ दायित्व बनता है परन्तु उतना ही वे अपने बारे में तुम पर मानवीय अधिकार रखती हैं जिन्हें तुम्हें बेहतर ढंग से पूरा करना चाहिए।
 इसके पश्चात यह आयत महिलाओं को संबोधित करते हुए कहती है कि घर चलाना तथा उससे संबन्धित अन्य बातों की व्यवस्था पुरुषों के ज़िम्मे है और इस मार्ग में वे बेहतर ढंग से काम कर सकते हैं। अतः इस संबन्ध में उन्हें तुमपर वरीयता प्राप्त है।
सूरए बक़रह की आयत संख्या २२९ इस प्रकार है।
(हर पुरूष के लिए अपनी पहली पत्नी के पास लौटने और) तलाक़ (देने का अधिकार) दो बार है अतः (हर स्थिति में या तो) अपनी पत्नी को भले ढंग से रोक लेना चाहिए या भले ढंग से उसे छोड़ देना चाहिए और (तुम पुरूषों के लिए) वैध नहीं है कि जो कुछ तुम अपनी पत्नियों को दे चुके हो वो (उनपर कड़ाई करके) वापस लेलो, सिवाए इसके कि दोनों को भय हो कि वे ईश्वरीय आदेशों का पालन न कर सकेंगे तो यदि तुम भयभीत हो गए कि वे दोनों ईश्वरीय सीमाओं को बनाए न रख सकेंगे तो इस बात में कोई रुकावट नहीं है कि तलाक़ का अनुरोध पत्नी की ओर से होने की दशा में वे इसका बदला दें और अपना मेहर माफ़ कर दे। यह ईश्वरीय देशों की सीमाए हैं इनसे आगे न बढ़ो, और जो कोई ईश्वरीय सीमाओं से आगे बढ़े, तो ऐसे ही लोग अत्याचारी हैं। (2:229)
 पिछली आयत में कहा गया था कि तलाक़ के पश्चात पत्नी को तीन महीने तक किसी अन्य व्यक्ति से विवाह नहीं करना चाहिए ताकि यदि वह गर्भवती हो तो स्पष्ट हो जाए और यदि पति को तलाक़ पर पछतावा हो तो पत्नी को वापस बुलाने की संभावना रहे। उसके पश्चात यह आयत कहती है कि अलबत्ता पति केवल दो बार ही अपनी पत्नी को तलाक़ देने और उससे "रुजू" करने अर्थात उसके पास वापस जाने की अधिकार रखता है और यदि उसने अपनी पत्नी को तीसरी बार तलाक़ दिया तो फिर रुजू की कोई संभावना नहीं है।
इसके पश्चात यह आयत पुरूषों को घर चलाने के लिए एक अति आवश्यक सिद्धांत बताते हुए कहती है कि या तो जीवन को गंभीरता से लो और अपनी पत्नी के साथ अच्छे ढंग से जीवन व्यतीत करो और यदि तुम उसके साथ अपना जीवन जारी नहीं रख सकते तो भलाई और अच्छे ढंग से उसे स्वतंत्र कर दो। अलबत्ता तुम्हें उसका मेहर देना पड़ेगा।
 इसी प्रकार यदि पत्नी तलाक़ लेना चाहती है तो उसे अपना मेहर माफ़ करके तलाक़ लेना होगा परन्तु हर स्थिति में पति को यह अधिकार नहीं है कि वह अपनी पत्नी को सता कर उसे मेहर माफ़ करने और तलाक़ लेने पर विवश करे।
सूरए बक़रह की आयत संख्या २३०, २३१ और २३२ इस प्रकार है।
यदि (पति ने दो बार रुजू करने के पश्चात तीसरी बार अपनी पत्नी को) तलाक़ दे दी तो फिर वह स्त्री उसके लिए वैध नहीं होगी जब तक कि वह किसी दूसरे व्यक्ति से विवाह न कर ले, फिर यदि दूसरा पति उसे तलाक़ दे दे तो फिर इन दोनों के लिए एक दूसरे की ओर पलट आने में कोई दोष नहीं होगा। अलबत्ता उस स्थिति में, जब उन्हें आशा हो कि वे ईश्वरीय सीमाओं का आदर कर सकेंगे। यह अल्लाह की सीमाएं हैं जिन्हें वह उन लोगों के लिए बयान कर रहा है जो जानना चाहते हैं। (2:230) और जब तुम स्त्रियों को तलाक़ दो और वे "इद्दत" अर्थात अपने नियत समय की सीमा (के समीप) पहुंच जाए तो या तो उन्हें भले ढंग से अपने ही पास रोक लो या फिर अच्छे ढंग से उन्हें विदा और स्वतंत्र कर दो। उन्हें सताने के लक्ष्य से न रोको कि उनपर अत्याचार करो और जिसने भी ऐसा किया वास्तव में उसने स्वयं पर ही अत्याचार किया और ईश्वर की आयतों का परिहास न करो बल्कि सदैव याद करते हरो उस विभूति को जो ईश्वर ने तुम्हें दी है और किताब तथा हिकमत को जिसके द्वारा वह तुम्हें नसीहत करता है और ईश्वर से डरते रहो और जान लो कि वह हर बात का जानने वाला है। (2:231) और जब तुम अपनी स्त्रियों को तलाक़ दे चुको और वे अपनी "इद्दत" पूरी कर लें तो उन्हें अपने पुराने पतियों से पुनः विवाह करने से न रोको जबकि वे अच्छे ढंग से आपस में राज़ी हों। ईश्वर के इन आदेशों द्वारा तुम में से उन लोगों की नसीहत होती है जो ईश्वर और प्रलय पर ईमान रखते हैं। यह आदेश (तुम्हारी आत्मा की) पवित्रता के लिए अधिक प्रभावशाली तथा (समाज को पाप से) साफ़ करने के लिए अधिक लाभदायक है। ईश्वर (तुम्हारे भले को) जानता है और तुम नहीं जानते। (2:232)
 चूंकि इस्लाम वैध और स्वाभाविक इच्छाओं का सम्मान करता है और पति-पत्नी के एक-दूसरे के पास वापस आने और उनकी छाया में बच्चों के प्रशिक्षण व प्रगति का स्वागत करता है अतः उसने इस बात की अनुमति दी है कि यदि पत्नी ने किसी अन्य व्यक्ति से विवाह कर लिया और बाद में उससे भी अलग हो गई तथा पुनः अपने पहले पति के साथ जीवन बिताने पर सहमत हो गई तो वे पुनः विवाह कर सकते हैं। इस बात की बहुत अधिक संभावना है कि उनका जीवन आनंदमयी हो जाए। स्पष्ट सी बात है कि इस स्थिति में पति-पत्नी के अभिभावकों या अन्य लोगों को ये अधिकार नहीं है कि वे इस विवाह में बाधा डालें, बल्कि पुनः पति-पत्नी की सहमति ही विवाह के लिए पर्याप्त है।
आइए अब देखते हैं कि इन आयतों से हमने क्या सीखा।
पत्नी के मानवाधिकारों के साथ ही साथ उसके आर्थिक अधिकारों की भी रक्षा होनी चाहिए तथा पति को यह अधिकार नहीं है कि वह पत्नी की संपत्ति या उसके मेहर को अपने स्वामित्व में ले ले।
 आवश्यकता पड़ने पर यदि तलाक़ हो तो उसे भलाई के साथ होना चाहिए न कि द्वेष और प्रतिरोध के साथ।
 सौभाग्यपूर्ण परिवार वह है जिसके सदस्यों के संबन्ध ईश्वरीय आदेशों पर आधारित हों परन्तु यदि वे पाप के आधार पर जीवन जारी रखना चाहते हों तो बेहतर है कि वे तलाक ले लें।
पति के चयन में महिला की राय आवश्यक और सम्मानीय है तथा मूल रूप से विवाह का आधार अच्छे ढंग से दोनों पक्षों की आपस में सहमति है।
सूरए बक़रह की आयत नंबर २३३ इस प्रकार है।
माताएं अपनी संतानों को पूरे दो वर्ष दूध पिलाएंगी अलबत्ता वे माताएं जो पूरी अवधि तक दूध पिलाना चाहें और इस दौरान उनके खाने और पहनने की व्यवस्था संतान के पिता पर होगी। रीति के अनुसार किसी पर भी उसकी क्षमता से बाहर का भार लादा नहीं जाता और माता-पिता को एक-दूसरे से मतभेद होने की स्थिति में भी संतान को हानि पहुंचाने का अधिकार नहीं है और पिता के न होने की स्थिति में उत्तराधिकारी के ऊपर भी यही सब कुछ है और अगर माता-पिता एक दूसरे की इच्छा और सलाह से दो वर्ष से पहले ही दूध छुड़ाना चाहें तो उन पर कोई पाप नहीं है और अगर वे अपनी संतान के लिए दूध पिलाने वाली दाई का प्रबंध करना चाहें तो भी कोई बात नहीं है। ऐसी स्थिति में कि तुम माता का अधिकार भलि-भांति चुका चुके हो। अल्लाह से डरो और जान लो कि अल्लाह हर बात से अवगत है। (2:233)
 प्रत्येक समाज का स्तंभ परिवार होता है। परिवार में हर प्रकार की अस्थिरता, समाज को प्रभवित करती है। आपको याद होगा कि इससे पहले के कार्यक्रम में आने वाली आयत के अन्तर्गत हमने पति-पत्नी के अलगाव पर चर्चा की थी। आजके कार्यक्रम में तलाक़ के पश्चात संतान की स्थिति के बारे में क़ुरआन के दृष्टिकोण पर चर्चा करेंगे।
 इस आयत में मां के दूध के महत्व और संतान से उसके स्नेह व लगाव को ध्यान में रखते हुए संतान को दो वर्षों तक दूध पिलाने की सिफ़ारिश की गयी है। यहां तक कि अगर माता-पिता एक दूसरे से अलग हो गए हों या पिता का देहांत हो गया हो तब भी माता का यह कर्तव्य है कि अपनी संतान के इस अधिकार की उपेक्षा न करे।
 अलबत्ता दूसरी ओर पिता का भी कर्तव्य है कि माता और संतान के लिए उचित सुविधाओं तथा खान-पान की व्यवस्था करे और हर उस काम से बचे जिससे उन्हें नुक़सान पहुंच सकता हो।
इस आयत से हमें यह सीख मिलती है।
 संतान के अधिकारों पर ध्यान देना माता-पिता का परम कर्तव्य होता है और तलाक़ की दशा में भी संतान को माता-पिता के मतभेदों की बलि नहीं चढ़नी चाहिए।
 इस्लामी व्यवस्था में परिवारों की मूल आवश्यक्ताओं को पूरा करना पुरूष का कर्तव्य होता है और जीवन यापन हेतु साधर जुटाना महिला की ज़िम्मेदारी नहीं है।
सूरए बक़रह की आयत संख्या २३४ इस प्रकार है।
और जो लोग तुम में से मर जाते हैं और उनकी पत्नियां जीवित रहती हैं तो उन पत्नियों को चार महीने दस दिन तक प्रतीक्षा करनी चाहिए और जब यह अवधि समाप्त हो जाए तो फिर तुम पर कोई पाप नहीं है कि जो कुछ वह चाहें उसे उचित ढंग से करें और जान लो कि तुम जो भी करते हो अल्लाह उससे अवगत है। (2:234)
 तलाक़ के अतिरिक्त मृत्यु भी पति-पत्नी को अलग कर देती है। विभिन्न धर्मों और समुदायों में विधवा के प्रति अलग-अलग प्रकार के व्यवहार देखने को मिलते हैं। कुछ का विचार है कि पति की मृत्यु के पश्चात पत्नी को भी मर जाना चाहिए। कुछ लोग मृत पति के साथ जीवित पत्नी को भी जीवित गाड़ देते थे या फिर पत्नी सति हो जाती थी। इसी प्रकार कुछ अन्य समुदायों में पति के मरने के बाद पत्नी को पुनर्विवाह का अधिकार नहीं था जब कि कुछ समुदायों में पति के मरने के तुरन्त बाद पत्नी दूसरा विवाह कर सकती थी।
 इन असंतुलित रीति-रिवाजों के मुक़ाबले में इस्लाम ने मरने वाले पति के सम्मान को सुरक्षित रखने और महिला की गर्भावस्था के बारे में सही स्थिति स्पष्ट होने के लिए कुछ समय तक प्रतीक्षा को आवश्यक बताया है किंतु इस निर्धारित अवधि के बाद पत्नी को अधिकार होता है कि वह जिससे चाहे विवाह कर ले। पहली शादी के बाद दूसरे विवाह के लिए महिलाओं को कुंवारी युवतियों की भांति पिता या अभिभावक की अनुमति की आवश्यकता नहीं होती।
 इस्लाम एक प्राकृतिक धर्म है और प्रत्येक मनुष्य प्राकृतिक रूप से विवाह मं रुचि रखता है इसीलिए इस्लाम में न केवल यह कि इस इच्छा का विरोध नहीं किया बल्कि उसके लिए उचित और नैतिक वातावरण भी उत्पन्न किया है।
हमें विवाह से पहले विवाह के गुप्त वादों, वचनों अनुचित बातों और कामों से बचना चाहिए।
सूरए बक़रह की आयत संख्या २३५ इस प्रकार है।
और तुम पर पाप नहीं है अगर तुम निर्धारित अवधि बिताने वाली महिला से सांकेतिक रूप में विवाह का प्रस्ताव रख दो और अपने मन में इरादा बना लो। अल्लाह को पता है कि तुम इसे याद रखोगे किंतु कभी भी उनसे गुप्त रूप में कोई वादा न करो। यह और बात है कि तुम उनसे अच्छी बात करो और विवाह उस समय तक न करो जब तक निर्धारित अवधि समाप्त न हो जाए तो तुम अवज्ञा से बचो और जान लो कि अल्लाह क्षमा करने और क्रोध पर नियंत्रण करने वाला है। (2:235)
 इससे पहले वाली आयत के बाद कि जिसमें अल्लाह, तालक़ लेने वाली अथवा विधवा महिला को मनपसंद जीवनसाथी के चयन का अधिकार देता है। आयत कहती है कि हालांकि इस निर्धारित अवधि के दौरान विवाह सही नहीं है किंतु पुरुष द्वारा इस दौरान सामाजिक रूप से विवाह का प्रस्ताव देने में इस शर्त के साथ कोई आपत्ति नहीं है कि यह प्रस्ताव सामाजिक सिद्धांतों और महिला की मानसिक स्थिति पर ध्यान देते हुए दिया जाए।
सूरए बक़रह की आयत संख्या २३६ तथा २३७ इस प्रकार है।
अगर महिलाओं को तलाक़ दो तो अगर तुम उनके निकट नहीं गए हो या उनका मेहर निर्धारित नहीं किया है तो तुम पर कोई पाप नहीं है किंतु उन्हें कोई अच्छा सा उपहार देकर अलग करो। अलबत्ता धनवान अपने अनुसार और निर्धन अपने अनुसार कि यह अच्छा काम है। (2:236) लेकिन अगर तुमने पत्नी को निकटता से पहले और मेहर निर्धारित करने के बाद तलाक़ दिया तो निर्धारित महर का आधा भाग उन्हें देना आवश्यक है अलबत्ता अगर वे अपना अधिकार माफ़ कर दें या वह माफ़ कर दे कि जिसके अधिकार में उनका विवाह करना है तो कोई बात नहीं किंतु अगर तुम अच्छाई करो तो वह ईश्वर के निकट प्रशंसनीय है और आपस में दान व उपहार को मत भूलना और अल्लाह तुम्हारे कामों को देखने वाला है। (2:237)
 इन दोनों आयतों में पति की आर्थिक स्थिति पर तलाक़ के समय ध्यान देने पर बल दिया गया है और कहा जाता है कि अगर तुमने महर भी निर्धारित नहीं किया है तब भी अपनी आर्थिक स्थिति के अन्तर्गत उन्हें कोई अच्छा सा उपहार देकर अलगाव की कटुता को किसी सीमा तक कम कर दो कि यह अच्छे लोगों का तरीक़ा है।
 और अगर महर के रूप में कोई चीज़ निर्धारित कर दी है और पत्नी से निकटता भी की है तब पूरा महर अदा करो भले ही निकटता एक दिन ही की क्यों न हो। और अगर निकटता नहीं है तब अच्छा यही है कि मेहर की पूरी राशि अदा करो कि यह अच्छे लोगों का आचरण है और नहीं तो आधी रक़म देना आवश्यक है।
इन आयतों में हमने यह बातें सीखीं।
 क़ुरआनी परिवार वह है जो तलाक़ की दशा में भी नैतिक सिद्धांतों और मानवीय मूल्यों को नहीं भुलाता। तलाक़ के समय दोनों पक्षों को आवश्यक अधिकारों को अदा करने के साथ ही साथ शिष्टाचार और उदारता का प्रदर्शन करना चाहिए न कि द्वेष और घृणा के साथ।
सूरए बक़रह की आयत संख्या २३८ और २३९ आयतें इस प्रकार हैं।
समस्त नमाज़ों विशेषकर दिन के बीच की नमाज़ पर विशेष ध्यान दो और अल्लाह के आदेश के पालन हेतु नम्रता के साथ खड़े हो। (2:238) तो जब तुम्हें शत्रु या किसी अन्य वस्तु से ख़तरा हो तो पैदल या सवारी में नमाज़ पढ़ो और जब सुरक्षित हो जाओ तो अल्लाह को याद करो जैसाकि उसने तुम्हें उन चीज़ों की शिक्षा दी जिन्हें तुम नहीं जानते थे। (2:239)
 स्वस्थ और सही मनुष्य वही है जिसके शरीर और आत्मा को उचित आहार मिलता रहे। जिस प्रकार कुछ दिन हमारे शरीर में पौष्टिक आहार न पहुंचे तो हम कमज़ोर या बीमार हो जाते हैं, उसी प्रकार हमारी आत्मा भी है। आत्मा के विकास और सवास्थ्य के लिए सृष्टिकर्ता से निरंतर सम्पर्क बना रहना आवश्यक होता है इसीलिए प्रतिदिन के भोजन की भांति प्रतिदिन नमाज़ पढ़ना भी वाजिब अर्थात अनिवार्य किया गया है ताकि हमारा शरीर और हमारी आत्मा एक साथ विकसित हों और मन व आत्मा, बुराइयों से दूर रहें।
 इस आधार पर नमाज़ पढ़े जाने पर बल देने वाली यह आयतें हर दशा में यहां तक कि युद्ध के दौरान भी नमाज़ पढ़ने की आवश्यकता बताती है किंतु युद्ध में चूंकि पूर्णरूप और विधि-विधान के साथ यह संभव नहीं है इसलिए अल्लाह युद्ध या भय के समय यथासंभव दशा में उसे स्वीकार करता है।
इन आयतों से मिलने वाले पाठः 
नमाज़ न केवल अपनी सुरक्षा हेतु बाधा नहीं है बल्कि इससे लड़ने वाले के उत्साह और आत्मविश्वास मे वृद्धि होती है।
सूरए बक़रह की आयत संख्या २४०, २४१ तथा २४२ इस प्रकार है।
और तुम में से जो लोग, पत्नियां छोड़कर मर जाते हैं और वसीयत कर जाते हैं कि उनकी पत्नियों को एक वर्ष तक घर से बाहर न निकाला जाए और उनका ख़र्च उठाया जाए तो अगर वे स्वयं अपनी इच्छा से घर छोड़ दें तो तुम पर कोई गुनाह नहीं है और अल्लाह प्रभुत्वशाली और तत्वदर्शी है। (2:240) और तलाक पाने वाली महिलाओं के लिए भी एक लाभ है कि जो पति द्वारा दिया जाना चाहिए और यह अल्लाह से डरने वाले पुरुषों का कर्तव्य है। (2:241) और इस प्रकार अल्लाह अपनी निशानियों का तुम्हारे लिए वर्णन करता है कि शायद तुम चिंतन करो। (2:242)
 यह आयतें एक बार पुनः परिवार के विषय की ओर संकेत करते हुए उन महिलाओं के बारे में जो अपने पतियों से अलग हो गयी है, कुछ सिफ़ारिश करती है। आरंभ में कहा जाता है कि अगर पत्नी अपने पति के सम्मान में एक वर्ष तक पुनर्विवाह न करे और उसके घर में उसकी विधवा के रूप में रहना चाहे तो उसका ख़र्चा उचित रूप में दिया जाना चाहिए और किसी को उसके उसके मरे पति के घर से निकालने का अधिकार नहीं है। और इसी प्रकार अगर निर्धारित अवधि समाप्त हो जाने के बाद वह किसी से विवाह करना चाहे तो भी कोई उसे रोकने का अधिकार नहीं रखता वह अपने लिए उपयुक्त पति के चयन में स्वतंत्र है।
 इसके बाद क़ुरआन में आया है ईश्वर पर विश्वास रखने वाले पुरुष, अलगाव के समय महर के अतिरिक्त कोई अच्छा सा उपहार भी अपनी पत्नियों को देते हैं ताकि उसके दुखों में थोड़ी बहुत कमी हो जाए।
इन आयत से मिलने वाले पाठः
 इस्लाम ने परिवार मे महिलाओं के अधिकारों पर अत्यधिक ध्यान दिया है और उसके ख़र्च का यहां तक कि पति के मरने के पश्चात भी उचित प्रबंध किया है। 
 महिला अपने लिए उचित पति के चयन में स्वतंत्र है और उसे परिवार में सम्मान की दृष्टि से देखा जाना चाहिए।
सूरए बक़रह की आयत संख्या २४३ और २४४ इस प्रकार है।
क्या तुमने नहीं देखा उन हज़ारों लोगों का परिणाम जो मृत्यु के भय से अपने घर से निकल गए किंतु अल्लाह ने उनसे कहा मर जाओ तो मर गए, फिर अल्लाह ने उन्हें जीवित किया निःसन्देह, अल्लाह इसी प्रकार से लोगों पर कृपा करता है किंतु अधिकांश उसका शुक्र नहीं करते। (2:243) हे अल्लाह पर भरोसा रखने वालों, मृत्यु से डरो, उसके लिए जेहाद करो और जान लो कि अल्लाह सुनने और जानने वाला है। (2:244)
 यह आयतें आरंभ में उस समुदाय की दशा का वर्णन करती हैं जो अपने शत्रु के मुक़ाबले में अपने धर्म की रक्षा पर तैयार न हुआ हो और उसने मृत्यु के भय से अपना घरबार छोड़ दिया हो किंतु अल्लाह ने उन्हें यह समझाने के लिए कि मृत्यु केवल रणक्षेत्र में नहीं आती बल्कि किसी भी स्थान पर आ सकती है इसलिए उन्हें मार डाला फिर उन्हें जीवित कर दिया ताकि यह उनके बाद वालों के लिए एक चेतावनी हो जाए।
 उसके बाद मुसलमानों को संबोधित करके कहा जाता है कि इस कथा से पाठ सीखो और यह जान लो कि युद्ध से भागने का अर्थ मृत्यु से भागना नहीं है बल्कि यह भी संभव है कि इस भागने के कारण ईश्वरीय प्रकोप के शिकार हो जाओ।
इस आयत से मिलने वाले पाठः
 प्रलय के समय मुर्दों को जीवित करना असंभव नहीं है। अल्लाह ने इसी संसार में कई बार मुर्दों को जीवित किया है।
शायद रणक्षेत्र से भागा जा सकता हो किंतु अल्लाह के इरादे और निर्णय से भागने का कोई अर्थ नहीं है। 
इस्लामी जेहाद अल्लाह के धर्म की सुरक्षा के लिए है न कि देशों पर अधिकार या शक्ति प्रदर्शन के लिए।  
सूरए बक़रह की २४५वीं आयत इस प्रकार है।
कौन है जो अल्लाह को ऋण देगा? एक अच्छा ऋण ताकि उल्लाह उसे उसके लिए बहुत अधिक बढ़ा दे। (अल्लाह ही आजीविका को) बढ़ाता और घटाता है और तुम उसी की ओर लौटोगे। (2:245)
 इससे पहले के कार्यक्रमों में हमने जिन आयतों पर चर्चा की थी वे अल्लाह पर ईमान रखने वालों को उसकी राह में जेहाद पर प्रोत्साहित करती थीं और चूंकि युद्ध में लोगों की जान के साथ धन की भी आवश्यकता होती है इसीलिए यह आयत अत्यन्त सुन्दर शब्दों में अर्थात अल्लाह को ऋण देने का विषय केवल धर्मयुद्ध तक ही सीमित नहीं होता बल्कि समाज के निर्धन लोगों की हर प्रकार की सहायता और दान उस ऋण की भांति है जो मनुष्य अल्लाह को देता है और अल्लाह उसे लोक और परलोक में कई गुना बढ़ाकर चुकाएगा क्योंकि हमारी आजीविका उसके हाथ में है और जो कुछ भी हम उस की राह में दान कर देते हैं उसका वह हिसाब करता है ताकि अवसर आने पर मनुष्य को लौटा दिया जाए।
इस आयत से मिलने वाला पाठः
अगर हम आजीविका को अल्लाह के हाथ में मान लें तो बड़ी सरलता से उसकी राह में दान करेंगे या कम से कम दूसरों को क़र्ज की देंगे और इस कार्य में हम किसी पर एहसान नहीं जताएंगे क्योंकि इसपर इनाम हमें ईश्वर द्वारा प्राप्त होगा।
सूरए बक़रह की आयत संख्या २४६ और २४७ इस प्रकार है।
क्या तुमने बनी इस्राईल के नेताओं को नहीं देखा कि जिन्होंने मूसा के बाद अपने पैग़म्बर से कहा कि हमारे लिए एक शासक का चयन करो ताकि हम अल्लाह की राह में लड़ सकें तो पैग़म्बर ने कहा, क्या यह हो सकता है कि तुम्हें जेहाद का आदेश दिया जाए और तुम जेहाद न करो? उन्होंने कहा यह कैसे संभव है कि हम अल्लाह की राह में युद्ध न करें जबकि हमें हमारे घरों और बच्चों से दूर भगा दिया गया है। किंतु जब युद्ध उनके लिए लिख उठा तो कुछ लोगों को छोड़कर सभी ने अवज्ञा की और अल्लाह अत्याचारियों को जानता है। (2:246) और उनके पैग़म्बर ने उनसे कहा कि अल्लाह ने तालूत को तुम्हारे लिए शासक के रूप में चुन लिया है तो उन लोगों ने कहा यह कैसे संभव है जबकि हम शासन के लिए उससे बेहतर है उसके पास अधिक भी नहीं है। उनके पैग़म्बर ने उनसे कहा कि अल्लाह ने उसे तुम्हारे लिए चुन लिया और उसकी शारीरिक क्षमता और ज्ञान में वृद्धि कर दी है और अल्लाह जिसे चाहता है राजपाट देता है और अल्लाह अधिक देने और जानने वाला है। (2:247)
 बनी इस्राईल, पैग़म्बर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के बाद धन-दौलत और पेट पर अधिक ध्यान देने वाले होने के कारण एक बार पुनः अत्याचारी शासके के अधीन हो गए और अपनी भूमि से हाथ धो बैठे यहां तक कि उनके एक गुट ने इस दशा से छुटकारे और स्वतंत्रता हेतु युद्ध का निर्णय किया यही कारण था कि उन्होंने अपने काल के पैग़म्बर से मांग की थी कि वह उनके लिए एक सेनापति का चयन करें ताकि वह उसके नेतृत्व में क्रूर शासक से युद्ध कर सकें हालांकि पैग़म्बर को बनी इस्राईल के अतीत को देखते हुए ज्ञात था कि युद्ध इस समुदाय के बस की बात नहीं है किंतु उनके पास कोई बहाना न रहे इसलिए तालूत नामक एक निर्धन चरवाहे को उनका सेनापति नियुक्त कर दिया किंतु बनी इस्राईल को आशा थी कि उनके समुदाय का कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति ही सेनापति के पद के लिए चुना जाएगा। इसलिए उन्होंने तालूत के नेतृत्व को स्वीकार नहीं किया बल्कि यह दावा किया कि हम उससे अधिक योग्य हैं हालांकि युद्ध के लिए शक्तिशाली भुजाओं और अच्छी रणनीति की आवश्यकता होती है। यह विशेषताएं तालूत में उन सबसे अधिक थीं और यही कारण था कि अल्लाह ने तालूत को इस पद के लिए चुना था।
इन आयतों से मिलने वाले पाठः 
अपने परिवार या देश के लिए युद्ध, एक प्रकार का अल्लाह की राह में किया जाने वाला धर्मयुद्ध होता है। 
धर्म राजनीति से अलग नहीं है। इतिहास में बहुत से ईश्वरीय दूतों ने प्रजा को क्रूर शासकों से छुटकारा दिलाने और अच्छे लोगों को शासक बनाने के लिए बहुत प्रयास किये हैं।
किसी भी पद के लिए सही मानदंड उस काम को करने के लिए शारीरिक और बौद्धिक क्षमता होती है न कि धन और ख्याति की।
सूरए बक़रह की आयत संख्या २४८ इस प्रकार है।
उनके पैग़म्बर ने उनसे कहा कि इस युवक के नेतृत्व का चिन्ह यह है कि पवित्र संदूक़ तुम्हारे पास लौट आएगा ऐसी स्थिति में कि देवदूत उसे उठाए होंगे और वह सन्दूक़ तुम्हारे ईश्वर की ओर से तुम्हारे लिए शांति एवं मूसा व हारून के परिवार की बची हुई धरोहर है, और यही तुम्हारे लिए स्पष्ट प्रमाण है अगर तुम्हें अल्लाह पर भरोसा है। (2:248)
 जब बनी इस्राईल की हठधर्म जाति ने अपने पैग़म्बर की बात नहीं मानी तो उन्होंने कहा कि अल्लाह बनी इस्राईल का पवित्र संदूक़ तालूत द्वारा तुम्हें लौटा देगा। यह संदूक़ वही था जिसमे हज़रत मूसा की माता ने अपने नवजात शिशु को रखकर नील नदी में डाल दिया था और इस प्रकार हज़रत मूसा को फ़िरऔन के सैनिकों से छुटकारा मिला किंतु जब यह संदूक़ फ़िरऔन को प्राप्त हुआ तो फ़िरऔन और उसकी पत्नी के हृदय में इस शिशु के प्रति स्नेह उमड़ पड़ा और उन्होंने हज़रत मूसा को अपना बेटा बना लिया। इस संदूक़ को फ़िरऔन के दरबार में सुरक्षित रखा गया था और जब हज़रत मूसा को ईश्वरीय संदेश पहुंचाने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई तो आपने तौरेत की रख्तियों को उसमें रखा और मृत्यु के समय अपने कवच और अन्य सामग्रियों को उसी में रख दिया और अपने अनुयाइयों के हवाले कर दिया। इस संदूक़ को बनी इस्राईल पवित्र मानते थे और युद्ध के समय उसे सेना के आगे-आगे लेकर चलते थे ताकि इससे सैनिकों का उत्साह बढ़े किंतु यह संदूक़ शत्रुओं के हाथों लग गया जिससे बनी इस्राईल बहुत दुखी हुए। तालूत के काल में ईश्वरीय सहायता द्वारा यह संदूक़ बनी इस्राईल के पास वापिस आ गया।
इस आयत से हमने सीखा कि अपने देश के लिए प्राणों की आहूति देने में असमंजस का शिकार नहीं होना चाहिए और नेताओं के चयन में लोगों की नैतिकता व योग्यता पर ध्यान देना चाहिए न कि उनकी ख्याति और धन दौलत पर। 
पहले सूरए बक़रह की २४९वीं आयत इस प्रकार है।
और जब तालूत सेना को लेकर बाहर निकले तो उनसे कहा, अल्लाह तुम्हारी परीक्षा एक पानी से भरी हुई नहर से परीक्षा लेगा। जिसने भी उसका पानी पी लिया वह हममें से नहीं होगा और जो उसका पानी नहीं पियेगा वह हममें से है सिवाए उसके कि जो एक चुल्लू पानी पी ले। कुछ को छोड़कर सभी ने उसका पानी पी लिया। अतः जब वह और अल्लाह पर ईमान रखने वाले उनके साथी उस नहर से गुज़रे तो उन्होंने कहा कि आज हममें जालूत और उसकी सेना से मुक़ाबले की शक्ति नहीं है किंतु जिन्हें अल्लाह से भेंट का विश्वास था उन्होंने कहा कि कितने ऐसे छोटे गुट हैं जिन्होंने अल्लाह के आदेश से बड़े गुटों को हरा दिया और अल्लाह धैर्य करने वालों के साथ है। (2:249)
 इससे पहले के कार्यक्रम में हमने कहा था कि जब अल्लाह ने तालूत को बनी इस्राईल के सेनापति के रूप में चुना तो उस समुदाय के बड़े लोगों ने उसके नेतृत्व को स्वीकार नहीं किया और वे युद्ध से बचने के लिए बहाने पेश करने लगे।
 दूसरे चरण में, जिस गुट ने तालूत के नेतृत्व को स्वीकार कर लिया था, वह तालूत के साथ नगर के बाहर गया किंतु तालूत ने उनकी वफ़ादारी देखने के लिए एक नहर का सहारा लिया और कहा कि मेरे सच्चे साथी वे लोग हैं जो प्यास के बावजूद जी भरकर पानी न पियें। मात्र एक चुल्लू पानी पीकर ही संतोष कर लें।
 इस आयत में आया है कि इस परीक्षा में भी एक गुट ने पानी देखते ही नियंत्रण खो दिया उसके बाद जब शत्रु से लड़ने की बारी आई तो वे बौखला गए और जालूत की सेना से लड़ने में अपनी अक्षमता प्रकट करने लगे और केवल सच्चे साथी ही, कि अल्लाह ने जिनके दिलों को मज़बूत किया था अपनी जगह पर डटे रहे और शत्रु की भारी संख्या से भयभीत नहीं हुए।
इस आयत से मिलने वाले पाठः
खाने-पीने की वस्तुएं भी ईश्वरीय परीक्षाओं में से हैं। न केवल हराम अर्थात वर्जित बल्कि कभी-कभी हलाल अर्थात वैध चीज़ों से भी दूरी करनी होती है।
प्रलय और अल्लाह के वचनों पर विश्वास, कठिनाइयों के समय मनुष्य की सहनशीलता को बढ़ा देता है।
संघर्ष में दृढ़ता और उसे जारी रखने को बहुत महत्व प्राप्त है। 
तालूत और जालूत के क़िस्से में अत्याचारी के विरुद्ध युद्ध का नारा लगाने वाले तो बहुत थे किंतु शत्रु के आगे डट जाने वालों की संख्या बहुत ही कम थी।
सूरए बक़रह की आयत संख्या २५० इस प्रकार है।
सच्चे लोग जब जालूत और उसके सैनिकों के सामने आए तो कहा हे ईश्वर, हम पर धैर्य और दृढ़ता उतार और पैरों को जमा दे। हमें काफ़िरों पर विजय प्रदान कर। (2:250)
 जैसा कि हमने कहा कि बनी इस्राईल, जालूत की सेना को देखते ही डर गए और केवल तालूत के सच्चे साथी ही उनसे लड़ने पर तैयार हो सके किंतु उन्हें भी पता था कि ईश्वरीय सहायता के बिना इतनी बड़ी और शक्तिशाली सेना से जीतना संभव नहीं है इसीलिए उन्होंने अल्लाह से प्रार्थना की थी कि वह उन्हें शत्रु के सामने डटे रहने में सहायता करे।
इस आयत से मिलने वाले पाठः
प्रार्थना या दुआ संघर्ष और प्रयास के साथ ही उपयोगी होती है। ऐसा नहीं है कि दुआ को काम या प्रयास का स्थान दे दिया जाए। तालूत के साथी पहले रणक्षेत्र में आए उसके बाद उन्होंने विजय की दुआ की।
ईमान वालों का लक्ष्य, सत्य की असत्यता पर विजय होता है न कि किसी जाति या समुदाय की अन्य पर श्रेष्ठता। इसीलिए तालूत के साथियों ने ईश्वर के न मानने वालों के सामने अपनी विजय की प्रार्थना की थी।
सूरए बक़रह की आयत संख्या २५२-२५३ इस प्रकार है।
फिर अल्लाह की इच्छा से तालूत और उसके साथियों ने शत्रु की सेना को पराजित कर दिया और दाऊद ने जो तालूत की सेना में से थे, जालूत को मार दिया तो अल्लाह ने उन्हें ज्ञान व शासन प्रदान किया और जो चाहा उन्हें सिखाया। अगर अल्लाह कुछ लोगों की कुछ अन्य लोगों द्वारा सुरक्षा न करे तो पृथ्वी नष्ट हो जाएगी। किंतु अल्लाह, संसार वासियों पर उपकार और कृपा करने वाला है। (2:251) हे पैग़म्बर! यह अल्लाह की आयते हैं कि जिन्हें सत्य के साथ तुम्हारे लिए पढ़ते हैं और निःसन्देह तुम ईश्वरीय पैग़म्बर हो। (2:252)
 अंततः सत्यवादियों के संघर्ष और ईश्वरीय सहायता से यह छोटा सा गुट उस बड़ी सेना से जीतने में सफल हो गया और दाउद नामक कम आयु का एक साहसी नवयुवक जिसे ईश्वर पर विश्वास था, शत्रु के सेनापति को मारने में सफल हो गया।
 ईश्वर ने उस नवयुवक की वीरता पर उसे नुबुव्वत अर्थात प्रथ्वी पर ईश्वरीय दूत का पद प्रदान कर दिया और उसे ज्ञान व बुद्धि की और हज़रत सुलैमान पैग़म्बर जैसा बेटा देकर उन्हें अत्यधिक सम्मानित किया
 पांच आयतों में वर्णन की गयी यह कथा प्रोत्साहन और उन मुसलमानों को चेतावनी देती है जो इस्लाम के आरंभ में मक्के से निकलने पर विवश हो गए थे। उनके पास साधन नहीं थे और दूसरी और मक्के के नास्तिक कहते थे कि मुहम्मद हमसे किस मामले में श्रेष्ठ हैं कि हमारे पैग़म्बर हों जबकि मक्के में बहुत से प्रतिष्ठित और धनवान लोग मौजूद हैं।
इस आयत से मिलने वाले पाठः
जब तक कोई अपने आप से कोई योग्यता नहीं दिखाता उस समय तक वह ईश्वर की विशेष कृपा का पात्र नहीं बनता। अल्लाह के मार्ग में जेहाद करने से दाऊद को पैग़म्बरी का सम्मानीय पद मिला।
अगर शत्रुओं से युद्ध कर्तव्य न होता तो फिर संसार में बुराइयां ही बुराइयां होतीं।
इस घटना से हमें ज्ञात हुआ कि सही और योग्य नेता, सच्चे साथी, अल्लाह पर भरोसा, धैर्य, मनोबल तथा युद्ध में ईश्वरीय भावना जैसे विशेषताएं, सफलता के कारक होते हैं।
सूरए बक़रह की २५३वीं आयत इस प्रकार है।
उन पैग़म्बरों में से कुछ को हमने कुछ पर श्रेष्ठता प्रदान की। उनमें से कुछ ऐसे थे जिनसे अल्लाह ने बात की और अल्लाह ने उनमें से कुछ को उच्चतम स्थान प्रदान किया। और हमने मरियम के बेटे ईसा को स्पष्ट निशानियां दीं और उसकी रूहुलक़ुदस द्वारा पुष्टि की और अगर अल्लाह चाहता तो इन दूतों और उनके साथ आने वाले चिन्हों के बाद लोग आपस में न लड़ते किंतु उनमें मतभेद उत्पन्न हो गया तो कुछ लोग पैग़म्बरों पर ईमान ले आए आर कुछ लोगों ने उनका इन्कार कर दिया और यदि ईश्वर चाहता तो वे लोग आपस में झगड़ा न करते परन्तु अल्लाह जो चाहता है करता है। (2:253)
 इससे पहले वाली आयत में यह संकेत किया गया था कि अल्लाह ने हज़रत दाऊद को असीम बुद्धि और राज प्रदान किया था। इस आयत में ईश्वर के पैग़म्बरों के स्थानों की भिन्नता का उल्लेख किया गया है। अल्लाह के समस्त पैग़म्बर, समान पदों पर आसीन नहीं थे बल्कि कुछ को कुछ अन्य पर श्रेष्ठता प्राप्त थी। जैसा कि हज़रत मूसा ने बिना किसी मध्यस्थ के सीधे ईश्वर से बात की और हज़रत ईसा की सहायता हेतु हज़रत जिब्रईल रहते थे। जिब्रईल, ईश्वर के एक विशेष फ़रिश्ते का नाम है जिन्हें रूहुलक़ुदस भी कहा जाता है।
 इसके बाद अल्लाह लोगों के बारे में एक महत्वपूर्ण तथ्य की ओर संकेत करता है कि लोग अपने मार्ग के चयन के लिए स्वतंत्र हैं। चाहे अल्लाह पर विश्वास रखें या उसके अस्तित्व का इन्कार करें। अल्लाह किसी भी मनुष्य पर ज़बरदस्ती नहीं करता। लोग चाहें तो इन ईश्वरीय दूतों को माने और चाहे न मानें। निःसन्देह, अगर अल्लाह चाहता तो लोगों में मतभेद न उत्पन्न होने देता और सबको बलपूर्वक एक ही रास्ते पर लगा देता किंतु अल्लाह की शैली यह है कि लोग किसी धर्म को स्वीकार करने या न करने के बारे में स्वयं निर्णय लें।
इस आयत से मिलने वाले पाठः
धर्म का सिद्धांत यह है कि उसे स्वेच्छा से स्वीकार किया जाए। इस आधार पर लोगों में मतभेद स्वाभाविक है।
अल्लाह ने सदैव ही अपने दूतों को अपने चिन्हों के साथ भेजा है। कुछ लोगों द्वारा इन्हें स्वीकार न किये जाने का कारण कभी अनभिज्ञता तो कभी अपनी इच्छाओं की दासता होती है।
सूरए बक़रह की आयत संख्या २५४ इस प्रकार है।
हे ईमान वालो! हमने तुम्हें जो आजीविका दी है उसमें से दान करो इससे पहले कि वह दिन आ पहुंचे जिसमें न ख़रीदना होगा न बेचना और न ही उस दिन कोई मित्रता या रिश्तेदारी काम आएगी और इन्कार करने वाले ही अत्याचारी हैं। (2:254)
 यह आयत ईश्वर पर विश्वास रखने वालों के लिए चेतावनी है कि अवसर को अच्छा समझते हुए जब तक संसार में हैं, प्रलय के लिए कुछ प्रबंध कर लें। यहां पर अल्लाह के साथ व्यापार कर लें और अपने धन में से दूसरों को दान करें क्योंकि प्रलय के दिन लेन-देन नहीं होगा। यहां से वहां के लिए कुछ भेज दो ताकि दंड से बच सको अपने मित्रों और बड़ों के भरोसे न रहो कि वहां कोई काम नहीं आएगा
इस आयत से मिलने वाले पाठः
जो कुछ तुम्हारे पास है वह तुम्हारा नहीं है। उसे हमने तुम्हें प्रदान किया है। हमने कहा है कि धन का थोड़ा सा भाग दान करो न कि सारा धन।
यह दान परलोक में तुम्हारे हर मित्र और सगे संबन्धी से अच्छा सिद्ध होगा।
सूरए बक़रह की आयत संख्या २५५ इस प्रकार है।
अल्लाह के अतिरिक्त कोई भी पूज्य नहीं है। वह जीवित और सदैव रहने वाला है। उसे न नींद आती है न ही झपकी। जो कुछ भी पृथ्वी और आकाशों में है उसी का है। कौन है जो उसके आदेश के बिना किसी की सिफ़ारिश कर सकता है। वह जानता है कि उनके सामने क्या है और उनके पहले क्या था किंतु किसी को भी उसके ज्ञान के साधारण से भाग का भी पता नहीं लग सकता सिवाए उतने के कि जितना वह चाहे। उसने पृथ्वी और आकाशों को घेर रखा है और उसे संभालना उसके लिए कठिन नहीं है। वह महान एवं उच्च है। (2:255)
 इस आयत को आयतलकुर्सी कहते हैं। यह आयत हर दृष्टि से ईश्वर के एक व अनन्य होने को दर्शाती है। एकेश्वरवाद, सभी ईश्वरीय धर्मों का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है। एकेश्वरवाद मनुष्य को विभिन्न प्रकार की वस्तुओं की उपासना से बचाता है। एकेश्वरवाद स्वतंत्रता का मार्ग है और अत्याचारी शासकों से स्वतंत्रता का नाम है। इसकी सहायता से मनुष्य सफलता तक पहुंच जाता है। "ला इलाहा इल्लल्लाह" से प्रत्येक मुसलमान के कान परिचित होते हैं। हर रोज़ पांच बार अज़ान के समय वह इसे सुनता है। "ला इलाहा इल्लल्लाह" का अर्थ है उसके अतिरिक्त किसी में भी पूज्य होने की योग्यता ही नहीं है। समस्त अच्छी विशेषताएं उससे हैं और उसी ने अच्छों को अच्छाई का अत्यन्त साधारण भाग दान दे दिया है। तो फिर हम उसकी उपासना क्यों न करें जो समस्त अच्छाइयों और भलाइयों का स्रोत है। वास्तविक जीवन तो उसी के पास है जो ईश्वर है। उसके सिवा सब कुछ नश्वर है। केवल वही है जो किसी पर निर्भर नहीं है और उसके अतिरिक्त जो कुछ भी है उसी की ओर हाथ पसारे है। वह कभी भी नींद, झपकी या निर्बलता का शिकार नहीं होता क्योंकि अगर वह एक क्षण के लिए भी इस संसार को अपने हाल पर छोड़ दे तो कुछ भी बाक़ी नहीं बचेगा। ब्रह्माण्ड का स्वामी वही है। सबकुछ उसी की संपत्ति है। जब सब ही उसके दास हैं तो फिर क्यों एक दास दूसरे दास की उपासना करे? क्यों न हम अपने रचयिता और स्वामी की उपासना करें?
 इस आयत के अंत में कुर्सी शब्द का प्रयोग किया गया है जिसका अर्थ होता है सिंहासन। यह इसलिए है ताकि हमें पता चल जाए कि अल्लाह मात्र स्वामी ही नहीं अन्यथा इस ब्रह्माण्ड पर शासन करने वाला भी है और कोई भी वस्तु या जीव उसकी इच्छा और शक्ति से दूर नहीं है।
इस आयत से मिलने वाला पाठः
हमें ऐसे ईश्वर की उपासना करनी चाहिए जो ज्ञान, शक्ति और स्नेह सरीखी समस्त विशेषताओं का स्वामी है और हर प्रकार की कमी या कमज़ोरी से दूर है।
सूरए बक़रह की २५६वीं और २५७वीं आयतें इस प्रकार हैं।
धर्म (स्वीकार करने) में ज़बरदस्ती नहीं है क्योंकि सही मार्ग, पथभ्रष्टता से अलग व स्पष्ट है तो अब जो भी ताग़ूत अर्थात झूठे ख़ुदाओं का इन्कार करे और अल्लाह पर ईमान लाए निश्चित रूप से उसने मज़बूत रस्सी को पकड़ लिया है जिससे अलगाव नहीं है और अल्लाह सुनने तथा जानने वाला है। (2:256) अल्लाह विश्वास रखने वालों का स्वामी है और उन्हें अंधकारों से प्रकाश की ओर ले जाता है और इन्कार करने वालों के स्वामी झूठे ख़ुदा होते हैं जो उन्हें प्रकाश से निकाल कर अंधकार में ढकेल देते हैं। वे नरक वाले हैं जहां वे सदैव रहेंगे। (2:257)
 ईमान या धर्मविश्वास मन की एक ऐसी क्रिया है जो बलपूर्वक नहीं करवाई जा सकती बल्कि तर्क, उपदेश और शिष्टाचार वह तत्व हैं जो किसी भी व्यक्ति को किसी धर्म के अधीन कर देते हैं। अल्लाह ने मनुष्य के विकास और उसकी परिपूर्णता के लिए एक ओर तो पैग़म्बरों और आसमानी किताबों को भेजा ताकि मनुष्य को सही और ग़लत मार्ग की पहचान हो जाए और दूसरी ओर उसे यह अधिकार दिया कि वह जिसका चाहे चयन करे। यही कारण है कि ईश्वरीय दूतों ने भी किसी को ईमान लाने पर विवश नहीं किया क्योंकि ज़बरदस्ती के ईमान और विश्वास का कोई महत्व नहीं होता।
 अब अगर कोई पापी और अत्याचारी की अधीनता से निकल कर केवल अल्लाह का दास बन जाए तो वह ईश्वर के स्वामित्व में चला जाता है और ईश्वर स्वयं उसके मामलों की देखरेख करता है कुछ इस प्रकार कि जीवन के हर मोड़ पर सदैव उसका सत्य की ओर मार्गदर्शन करता है और उसे विभिन्न ख़तरों से सुरक्षित रखता है। किंतु दूसरी और यदि कोई ईश्वर को छोड़कर किसी अन्य से आशा बांधे और उसपर भरोसा करे तो उसे जान लेना चाहिए कि उसने अपने आप को अंधकार के हवाले कर दिया है और वह लोग प्रकाश का कोई छोटा सा झरोखा भी उसके लिए नहीं छोड़ेंगे।
इस आयत से मिलने वाले पाठः
उस धर्म का महत्व होता है जो जानकारी और पहचान पर आधारित हो तथा जिसे स्वंतत्रता एवं स्वेच्छा से ग्रहण किया गया हो।
सत्य का मार्ग प्रकाश है जो मार्गदर्शन, आशा और शांति का कारण होता है किंतु असत्य का मार्ग अंधकार है कि जो पथभ्रष्टता, अज्ञानता और व्याकुलता का कारण बनता है।
सूरए बक़रह की २५८वीं आयत इस प्रकार है।
हे पैग़म्बर! क्या तुमने नहीं देखा कि उसने ईश्वर द्वारा प्रदान किये गए राजपाट के बल पर किस प्रकार पैग़म्बर इब्राहीम से अपने स्वामी के बारे में बहस की। जब इब्राहीम ने उससे कहा कि मेरा ईश्वर वह है जो जीवित करता और मारता है तो उसने कहा कि मैं भी जीवित करता हूं और मारता हूं। इब्राहीम ने कहा कि मेरा ईश्वर वह है जो सूर्य को पूरब से निकालता है तो तू उसे पश्चिम से निकाल कर दिखा। वह नास्तिक अवाक रह गया और अल्लाह अत्याचारियों का मार्गदर्शन नहीं करता। (2:258)
 जैसा कि इतिहास में आया है कि नमरूद, इराक़ के बाबिल क्षेत्र का शासक था जो ईश्वर होने का दावा करता और लोगों को अपना दास समझता था। जब उसे पता चला कि हज़रत इब्राहीम लोगों को एक ईश्वर की ओर बुला रहे हैं तो वो उनसे बहस करने लगा और उसने उनसे कहा, जो काम भी तुम्हारा ईश्वर करेगा मैं भी उसे करके दिखाऊंगा। हज़रत इब्राहीम ने आरंभ में मनुष्य की मृत्यु और जीवन की ओर संकेत किया कि यह चीज़ ईश्वर के हाथ में है। नमरूद ने आदेश दिया कि दो क़ैदियों को लाया जाए उसमें से एक को उसने स्वतंत्र कर दिया और दूसरे की गर्दन उड़ाने का आदेश दिया और फिर कहा कि मैं भी जिसे चाहूं जीवित रखूं और जिसे चाहूं मार दूं। हालांकि उसकी यह बात तर्कहीन थी किंतु फिर भी हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने सूरज के पूरब से निकलने की बात कही और उससे पूछा कि क्या तू पश्चिम से सूर्य निकाल सकता है? इस बात का नमरूद के पास कोई उत्तर नहीं था किंतु इसके बावजूद उसने सत्यता को स्वीकार नहीं किया और जैसा कि आगामी आयतों में उल्लेख हुआ है नमरूद ने आदेश दिया कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को आग में जला दिया जाए।
इस आयत से मिलने वाले पाठः 
अगर किसी व्यक्ति में योग्यता नहीं होती और इसके बावजूद वह किसी पर पर पहुंच जाता है तो स्वयं को ईश्वर का दास समझने के बजाए स्वयं को ही परमात्मा बताने लगता है और घमण्ड में डूब जाता है।
ईश्वरीय दूत लोगों को तर्क के आधार पर ही धर्म की ओर बुलाया करते थे किंतु असत्य के पुजारी तर्कहीन बातों के सिवा कुछ नही कर पाते थे।
सूरए बक़रह की २५९वीं आयत इस प्रकार है।
या तुमने उस व्यक्ति का हाल सुना है जो एक ऐसे गांव से गुज़रा जिसकी छतें गिर चुकी थीं। उसने कहा, अल्लाह किस प्रकार से इन लोगों को पुनः जीवित करेगा? उसने कहा एक दिन या दिन के कुछ भाग से। अल्लाह ने उससे कहा, नहीं बल्कि तुम सौ वर्ष इसी प्रकार रहे हो अपनी खाने-पीने की वस्तुओं पर दृष्टि डालो बदली नहीं है और अपने गधे पर ध्यान दो और हम तुम्हें निश्चित ही एक चिन्ह बनाएंगे और गधों की हड्डियों को देखो कि हम उन्हें कैसे जोड़ते और उसपर मांस चढ़ाते हैं। जब उसके लिए यह स्पष्ट हो गया तो कहने लगा, मुझे पता है कि अल्लाह हर काम पर सक्षम है। (2:259)
 जैसा कि इन आयतों की व्याख्या में आया है कि उक्त घटना उज़ैर नामक एक पैग़म्बर के साथ घटी। वे एक वीरान नगर से गुज़र रहे थे। हालांकि उन्हें प्रलय पर पूर्ण विश्वास था किंतु अधिक संतोष के लिए उन्होंने अल्लाह से यह प्रार्थना की कि प्रलय के दिन मरे हुए लोगों को जीवित करना उन्हें दिखा दिया जाए। इस पूरी घटना में अल्लाह की शक्ति स्पष्ट है। ख़राब हो जाने वाली खाद्य सामग्री सौ वर्ष बीत जाने के बाद भी जूं की तूं थी किंतु मज़बूत हड्डियां बुरादा हो चुकी थीं जिसे अल्लाह ने अपनी शक्ति से पुनः प्रथम अवस्था में ला दिया और इन सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि स्वयं हज़रत उज़ैर सौ साल तक मरे होने के बावजूद उनके शरीर में कोई परिवर्तन नहीं आया और गहरी नींद में सोने वाले की भांति उठ गए।
इन आयतों से मिलने वाले पाठः
प्रलय में मुर्दों का जीवित होना कोई असंभव बात नहीं है। अल्लाह ने इसके कई उदाहरणों का प्रदर्शन इसी संसार में किया है। 
अलबत्ता संसार में अपनी शक्ति को विभिन्न रूपों और शैलियों में दिखाता है ताकि लोगों को यह पता चल जाए कि वह हर काम पर सक्षम है इसलिए प्रलय या मरने के बाद हिसाब-किताब लिए जाने को शंका की दृष्टि से न देखें।


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