कुरान तर्जुमा और तफसीर सूरए निसा ४:129-146- बहुत पत्नी

सूरए निसा की आयत संख्या 129  और तुम कितना ही चाहो, अपनी पत्नियों के बीच पूर्ण न्याय नहीं कर सकते तो केवल एक ही की ओर न झुक जाओ और दूसरी ...

सूरए निसा की आयत संख्या 129 
और तुम कितना ही चाहो, अपनी पत्नियों के बीच पूर्ण न्याय नहीं कर सकते तो केवल एक ही की ओर न झुक जाओ और दूसरी को अधर में छोड़ दो और (जान लो कि) यदि तुम समझौता कर लो और ईश्वर से डरते रहो तो निःसन्देह, ईश्वर अत्यंत क्षमाशील और दयावान है। (4:129)

 यह आयत उन पुरुषों को संबोधित करती है जिनकी कई पत्नियां हैं। पिछली आयत में सभी पुरूषों को अपने पारिवारिक जीवन में भलाई और सुधार की सिफ़ारिश करने के पश्चात इस आयत में ईश्वर कई पत्नियों वाले पुरूषों को न्याय की सिफ़ारिश करता है। इस आयत पर चर्चा से पूर्व हम आपका ध्यान कुछ महत्वपूर्ण बातों की ओर आकृष्ट करना चाहते हैं।
 प्रथम यह है कि इस्लाम ने कई पत्नियां रखने की कोई सिफ़ारिश नहीं की है बल्कि कुछ शर्तों के साथ इसको वैध माना है।
 दूसरे यह कि कुछ परिस्थितियां जैसे प्राकृतिक आपदाएं, युद्ध या सामाजिक स्थितियां, कई पत्नियां रखने की भूमि प्रशस्त करती हैं। ऐसी स्थिति में यदि वैध रूप से उनके लिए मार्ग न खोला जाए तो अवैध रूप से यह संबंध फैलने लगते हैं। इस प्रकार की बुराई आज पश्चिमी समाजों में देखने को मिलती है जहां पर कई पत्नियां रखने का मामला नहीं है किंतु वहां पर पुरुष बड़ी ही सरलता से कई महिलाओं से खुल्लम-खुल्ला या गुप्त संबंध रख सकते हैं और रखते हैं किंतु इसे नियंत्रित करने की कोई व्यवस्था नहीं है।
 इसी कारण इस्लाम ने कई पत्नियां रखने को वर्जित या प्रोत्साहित किये बिना ही कुछ विशेष शर्त निर्धारित करके इसे सीमित कर दिया है। इस्लाम ने न्याय को कई पत्नियां रखने के मामले में मूल शर्त बताया है। इसी सूरे की तीसरी आयत में हम पढ़ते हैं कि यदि तुम्हें इस बात का भय हो कि तुम न्याय नहीं कर सकते तो केवल एक ही पत्नी रखो।
 तीसरे यह कि क़ानून से अनुचित लाभ उठाने की संभावना हर स्थान पर है और हो सकता है कि कुछ पुरुष इस ईश्वरीय क़ानून से ग़लत लाभ उठाकर, बिना शर्त और योग्यता के ही कई विवाह कर लें, परन्तु स्पष्ट है कि कुछ लोगों द्वारा अनुचित लाभ उठाए जाने के कारण क़ानून को समाप्त नहीं किया जा सकता।
 अब इस आयत की संक्षिप्त व्यवस्था करते हैं। यह आयत पुरुषों से कहती है कि महिलाओं के साथ व्यवहार और उनके अधिकारों की पूर्ति में न्याय से काम लो ताकि तुम्हारा दोमुखी व्यवहार दूसरी पत्नी के असंतोष और अधर में रहने का कारण न बने, विशेषकर पत्नियों के बीच प्रेम और हार्दिक लगाव के संबंध में पूर्णतः न्याय करो।
 इस आयत से हमने सीखा कि पुरुष को किसी भी स्थिति में यह अधिकार नहीं है कि वह अपनी पत्नी को अधर में छोड़ दे। या तो पारिवारिक जीवन में उसके सभी अधिकारों की पूर्ति करे या फिर उसे तलाक़ दे दे ताकि वह अपने बारे में स्वयं कोई फ़ैसला कर सके।
 पति और पत्नी के बीच प्रेम व मित्रता तथा ईश्वरीय भय रखना, किसी भी परिवार की सुदृढ़ता का आधार है जिससे ईश्वरीय दया व कृपा प्राप्त होती है।
 सूरए निसा की आयत संख्या 130 
और यदि पति पत्नी एक दूसरे से अलग हो जाएं तो वे (ईश्वरीय कृपा से निराश न हों क्योंकि) ईश्वर दोनों को अपनी व्यापक कृपा से आवश्यकतामुक्त कर देगा और निःसन्देह, ईश्वर अतयंत समाई वाला और तत्वदर्शी है। (4:130)
 इस्लाम की महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक यह है कि वह परिवार तथा समाज की आवश्यकताओं तथा वास्तविकताओं के आधार पर व्यवहारिक और तर्कसंगत समाधान प्रस्तुत करता है। इस्लाम अपने अनुयाइयों को एक शुष्क व बिना लचक वाली विचारधारा की भांति बंद गली में नहीं छोड़ता और न ही उन्हें असंभ काम करने का आदेश देता है।
 समाज में बहुत अधिक सामने आने वाला एक विषय, तलाक़ है। इस्लाम युवाओं को विवाह के लिए जितना ही प्रोत्साहित करता है उन्हें तलाक़ के लिए उतना ही रोकता है। परन्तु कभी परिस्थितियां ऐसी हो जाती हैं कि पति और पत्नी का एक साथ रहना असंभव हो जाता है। ऐसे समय में दोनों को कुढ़-कुढ़ कर साथ रहने पर विवश नहीं किया जा सकता कि वे सदैव ही मानसिक दबाव का शिकार रहें।
 इस्लाम ने पति और पत्नी के लिए कुछ शर्तें रखकर उनसे अलग होने का मार्ग खुला छोड़ा है। इस्लाम उनसे कहता है कि एक विवाह के विफल हो जाने के कारण तुम सदा के लिए निराश न हो बल्कि ईश्वर की कृपा की आशा रखो और दूसरा जीवन गठित करने और दूसरे परिवार में ईश्वरीय दया प्राप्त करने का प्रयास करो क्योंकि ईश्वर के हाथ बंधे हुए नहीं हैं और उसकी कृपा केवल पिछले जीवन तक ही सीमित नहीं है।
 इस आयत से हमने सीखा कि एक मुसल्मान व्यक्ति के जीवन के मार्ग में कोई बंद गली नहीं है। यदि क्षमा, समझौता और ईश्वरीय भय, परिवार को सुरक्षित न रख सके तो फिर तलाक़ का मार्ग मौजूद है। अलबत्ता पहला क़दम सुधार है और अन्तिम कार्य तलाक़।
 तलाक़ हर स्थान पर बुरा नहीं है। ऐसी अनेक पारिवारिक समस्याएं हो सकती हैं जो आत्महत्या या अवैध संबंधों का कारण बनें।
 सूरए निसा की आयत संख्या 131 और 132
और जो कुछ आकाशों और धरती में है सब ईश्वर का है और हमने तुमसे पूर्व आसमानी किताब रखने वालों और तुमको भी ईश्वरीय भय रखने की सिफ़ारिश की है और यदि तुमने इन्कार किया तो जान लो कि जो कुछ आकाशों और धरती में है सब ईश्वर ही का है और निसन्देह, ईश्वर सदैव ही आवश्यकतामुक्त और प्रशंसा का अधिकारी है। (4:131) और ईश्वर ही का है जो कुछ आकाशों और धरती में है और भरोसे के लिए ईश्वर काफ़ी है। (4:132)
 पिछली आयतों में पुरुषों और महिलाओं को अपने जीवन विशेषकर पारिवारिक मामलों में पवित्रता और ईश्वरीय भय अपनाने की सिफ़ारिश करने के पश्चात आयतें कहती हैं कि यह सिफ़ारिश केवल तुमसे विशेष नहीं है बल्कि तुमसे पूर्व के सभी धर्मों के अनुयाइयों से भी यह सिफ़ारिश की गई है।
 और यह न सोचो कि यह सिफ़ारिश ईश्वर के लाभ में है क्योंकि उसे तुम्हारी कोई आवश्यक्ता नहीं है वह सभी आकाशों और धरती का मालिक है। उसको तुम्हारे अस्तित्व ही की कोई आवश्यकता नहीं है, तुम्हारा भय तो बड़ी बात है अतः यदि तुम और संसार के सभी लोग काफ़िर भी हो जाएं तब भी ईश्वर को कोई क्षति नहीं पहुंचेगी।
 रोचक बात यह है कि इन आयतों में ईश्वर के संपूर्ण स्वामित्व की बात तीन बार दोहराई गई है ताकि लोगों द्वारा उसके आदेशों के पालन के संबंध में उसकी आवश्यकता के बारे में कोई भ्रांति न रह जाए।
 इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वरीय धर्मों में विरोधाभास नहीं है बल्कि सभी ईश्वरीय धर्मों का स्रोत एक है और इन सब में ईश्वरीय आदेशों के पालन की बात कही गई है।
 केवल उसी से डरना चाहिए जो सभी मनुष्यों और ब्रह्माण्ड का स्वामी हो। उसके अतिरिक्त किसी से भी नहीं डरना चाहिए। उसी पर भरोसा करना चाहिए जो सभी आकाशों और धरती का स्वामी तथा सबसे अधिक शक्तिशाली और आवश्यकतामुक्त है।

सूरए निसा की आयत संख्या 133 
हे लोगो! यदि ईश्वर तुम्हारा अंत करके तुम्हारे स्थान पर दूसरे को लाना चाहे तो जान लो कि वह इसमें सक्षम है। (4:133)
 यह आयत कहती है कि तुम लोग यह न सोचो कि ईश्वर तुम्हें जो आदेश देता है उसकी उसे कोई आवश्यकता है। ईश्वर को तो तुम्हारी भी कोई आवश्यकता नहीं है। क्या जब तुम नहीं थे तो उस समय ईश्वर की कोई समस्या थी जो तुम्हारे आने से समाप्त हो गई? अतः ईश्वर के सामने घमण्ड और अकड़ से काम मत लो क्योंकि यदि वह चाहे तो तुम उद्दंडी लोगों का अंत करके तुम्हारे स्थान पर आज्ञाकारी लोगों को ला सकता है।
 इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर द्वारा काफ़िरों को अवसर देना उसकी कमज़ोरी व अक्षमता की निशानी नहीं है बल्कि इसका कारण उसकी दया व तत्वदर्शिता है।
 हमारे पास जो कुछ भी है वह ईश्वर की ओर से ही है। हमें यह सोच कर घमण्ड नहीं करना चाहिए कि जो कुछ हमारे पास है वह हमेशा रहेगा।
 सूरए निसा की आयत संख्या 134 
जो कोई संसार का बदला और पारितोषिक चाहता है वह जान ले कि लोक-परलोक का बदला और पारितोषिक ईश्वर के पास है और वह देखने वाला भी है और सुनने वाला भी। (4:134)
 यह आयत उन संकीर्ण दृष्टि के ईमान वालों की ओर संकेत करती है जो ईश्वर पर ईमान तो रखते हैं परन्तु केवल अपने सांसारिक एश्वर्य के चक्कर में रहते हैं। एसे लोग युद्ध में भी भाग लेते हैं परन्तु युद्ध से प्राप्त होने वाले भौतिक लाभों और परिणामों के विचार में रहते हैं। इन लोगों को संबोधित करते हुए ईश्वर कहता है कि तुम लोग जो ईश्वर पर ईमान रखते हो, केवल अपने संसार को ही ईश्वर से क्यों मांगते हो जबकि लोक और परलोक दोनों ही ईश्वर के पास है। क्या तुम यह सोचते हो कि यदि परलोक के ध्यान में रहोगे तो संसार से वंचित रह जाओगे? जबकि ईश्वर, ईमान वालों के लिए लोक-परलोक दोनों ही में कल्याण व मोक्ष चाहता है और एक के कारण दूसरे को छोड़ना घाटा है।
 इस आयत से हमने सीखा कि यदि भले कर्म करने से मनुष्य का लक्ष्य उसका सांसारिक परिणाम हो तो फिर उसने अपना बहुत घाटा किया है।
 इस्लाम एक व्यापक और वास्तविकता पर आधारित धर्म है और अपने अनुयाइयों को लोक-परलोक दोनों ही प्राप्त करने की सिफ़ारिश करता है।
सूरए निसा की आयत संख्या 135
हे ईमान वालो! सदैव न्याय क़ाएम करने और ईश्वर के लिए गवाही देने वाले बनो चाहे वह स्वयं तुम्हारे, तुम्हारे माता-पिता या परिजनों के विरुद्ध ही क्यों न हो, जिसके लिए गवाही देना है चाहे वह धनवान हो या दरिद्र, ईश्वर दोनों के मुक़ाबले में तुम्हारे लिए बेहतर है तो कदापि अपनी ग़लत आंतरिक इच्छाओं का अनुसरण न करना ताकि न्याय कर सको। और यदि तुमने गवाही देने में तोड़ मरोड़ से काम लिया या सत्य से विमुख हो गए तो जान लो कि तुम जो कुछ करते हो ईश्वर उससे अवगत है। (4:135)
 पिछली आयतों में पत्नियों और अनाथों के मामले में न्याय से काम लेने की सिफ़ारिश करने के पश्चात ईश्वर इस आयत में एक मूल व व्यापक सिद्धांत के रूप में सभी ईमानवालों को संबोधित करते हुए कहता है कि हर स्थिति में हर व्यक्ति के बारे में पूर्णतः न्याय करना चाहिए चाहे इसमें अपना, अपने परिजनों या मित्रों का घाटा ही क्यों न हो। चूंकि प्रायः मनुष्य अपने फ़ैसलों में रिश्तों या लोगों की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखता है और यह जानने के बावजूद कि ग़लती उसके परिजनों की है, उनके हित में गवाही देता है, या पैसों के लालच में धनवानों के हित में गवाही देता है या फिर ग़रीबों की दरिद्रता पर तरस खाकर उनके हित में गवाही देता है। अतः यह आयत कहती है कि फ़ैसलों और गवाही में केवल ईश्वर को ही दृष्टि में रखो न कि अपने रिश्तों या लोगों की आर्थिक स्थिति को।
 यह आदेश पूर्णतः स्पष्ट करता है कि इस्लाम ने इस मानवीय विषय पर कितना अधिक ध्यान दिया है और ईमान वालों को हर स्तर पर समाजिक न्याय के पालन की सिफ़ारिश की है।
 इस आयत से हमने सीखा कि न्याय, पैग़म्बरों के भेजे जाने का लक्ष्य और उनके अनुयाइयों के ईमान का अभिन्न अंग है तथा इसका मानदण्ड ईश्वर और ईश्वरीय आदेश है।
 जीवन के सभी पहलुओं में और सभी लोगों के साथ न्याय करना चाहिए चाहे कि किसी भी धर्म से संबंध रखते हों।
 क़ानून के सामने सब बराबर हैं। न्याय स्थापित करने में, ग़रीब और धनवान में कोई अंतर नहीं है, चाहे न्याय उसके हित में हो या उसके विरुद्ध।
 न्याय लागू करने की सबसे अच्छी ज़मानत ईश्वर और हमारे कर्मों से उसके अवगत होने पर ईमान अर्थात विश्वास है।
सूरए निया की आयत संख्या 136 
हे ईमान वालो! ईश्वर, उसके पैग़म्बर, उस किताब पर जो उसने अपने पैग़म्बर पर उतारी और उस किताब पर ईमान लाओ जो उनसे पूर्व उतारी गई है और जान लो कि जो, ईश्वर, उसके फ़रिश्तों, उसके पैग़म्बरों, उसकी किताबों और प्रलय के दिन का इन्कार करे, निःसन्देह, वह गहरी पथभ्रष्टता में जा गिरा है। (4:136)
 यह आयत ईमान वालों को अपने ईमान के विकसित करने और उसमे गहराई लाने का निमंत्रण देते हुए कहती है कि आगे बढ़कर ईमान के उच्च दर्जे प्राप्त करो, उसपर जमे रहो और उससे तनिक भी दूर मत जाओ।
 स्पष्ट सी बात है कि ईमान के विभिन्न स्तर और दर्जे हैं। जिस प्रकार से ज्ञात के अलग-अलग दर्जे होते हैं। एक वैज्ञानिक भौतिकशास्त्र या रसानयशास्त्र के किसी फ़ार्मूले से जो बात समझता है वह उससे कहीं अधिक व गहरी होती है जो कालेज का एक छात्र उसी फ़ार्मूले से समझता है। इसी कारण ईश्वर ईमान वालों को हर स्थिति में अपने ईमान को परिपूर्ण बनाने का निमंत्रण देता है जिसके लिए आवश्यक यह है कि ईश्वर के आदेशों का अधिक से अधिक पालन किया जाए।
 आगे चलकर आयत, एक महत्वपूर्ण ख़तरे की ओर संकेत करते हुए, जो ईमान वालों को लगा रहता है, कहती है कि यदि किसी ईमान वाले व्यक्ति का ईमान इतना कमज़ोर हो जाए कि वह धीरे-धीरे अपनी आस्थाओं का इन्कार कर दे तो वह बड़ी ही गहरी पथभ्रष्टता में फंस जाएगा जिससे निकलना अत्यंत ही कठिन होगा।
 इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय धर्म, एक स्कूल की कक्षाओं की भांति है और पैग़म्बर उसके शिक्षकों की भांति जिनका लक्ष्य एक है अतः सभी पैग़म्बरों और उनकी किताबों पर ईमान, ईश्वर पर ईमान के लिए अपरिहार्य है।
 ईमान की रक्षा और उसकी प्रगति का मार्ग उसमें वृद्धि और व्यापकता लाना है। ईमान वाले व्यक्ति को सदैव ईमान के उच्च दर्जों तक पहुंचने का प्रयास करना चाहिए।

सूरए निसा की आयत संख्या 137 की तिलावत सुनते हैं।
निसंदेह जो लोग ईमान लाए फिर काफ़िर हो गए, फिर दोबारा ईमान लाए (परन्तु) पुनः काफ़िर हो गए और अपने कुफ़्र में वृद्धि करते रहे तो ईश्वर उन्हें कदापि क्षमा नहीं करेगा और न ही सीधे रास्ते की ओर उनका मार्गदर्शन करेगा। (4:137)
 पिछली आयत में ईमान वालों और काफ़िरों के अंत के बारे में उल्लेख करने के पश्चात ईश्वर इस आयत में एसे लोगों के अंत के बारे में संकेत करता है जो हर दिन एक नए रंग में और हर क्षण एक नए रूप में दिखाई देते हैं। 
 यह लोग कभी ईमान वालों के साथ होते हैं तो कभी काफ़िरों के साथ। उनकी आस्था में यह परिवर्तन वास्तविकता को समझने और हक़ तक पहुंचने के लिए नहीं होता है बल्कि यह उनके दोमुखेपन और मिथ्या के कारण होता है।
 ऐसे लोग वास्तव में अपने भौतिक तथा सांसारिक हितों की पूर्ति के फेर में रहते हैं, इसी कारण उन्हें जहां कहीं और जिस ओर भी अपने लक्ष्यों की पूर्ति होती दिखाई देती है वे उसी ओर चले जाते हैं।
 स्वाभाविक है कि एसे लोग यदि इसी स्थिति में संसार से चले जाएं तो ईश्वरीय दया व क्षमा के पात्र नहीं बनेंगे और इसी प्रकार वे अपने इस दोमुखे व्यवहार के चलते ईश्वरीय मार्गदर्शन का द्वार भी अपने ऊपर बंद कर लेते हैं।
 इस आयत से हमने सीखा कि धर्मभ्रष्ट होने और धर्म से पलटने का ख़तरा हर ईमान वाले को लगा रहता है अतः अपने आज के ईमान पर घमण्ड न करते हुए सदा सतर्क रहना चाहिए।
 ईमान और आस्था में अस्थिरता, मनुष्य को पथभ्रष्टता और ईश्वरीय दया व मार्गदर्शन से दूर ले जाती है।

अब सूरए निसा की आयत संख्या 138 और 139 
(हे पैग़म्बर!) आप मिथ्याचारियों को कड़े दण्ड की (शुभ) सूचना दे दीजिए। (4:138) वे लोग जो ईमान वालों के बजाए काफ़िरों को अपना मित्र व अभिभावक बनाते हैं, क्या वे उनके पास सम्मान को खोजते हैं? (जबकि) निःसन्देह, सारा सम्मान और प्रतिष्ठा ईश्वर के लिए है। (4:139)
 मिथ्याचारियों की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि वे काफ़िरों को महान बताते हैं और सम्मान प्राप्त करने के लिए उनके पीछे-पीछे चलते हैं। वे यह सोचते हैं कि ईमान वालों के पीछे चलने और उनका अनुसरण करने से वे तुच्छ व अपमानित हो जाएंगे। इसी कारण स्वयं को ईमान वालों के गुट में बताने में उन्हें शर्म आती है।
 मूलतः वही सम्मान और प्रतिष्ठा स्थाई है जिसका स्रोत ईश्वरीय ज्ञान व शक्ति हो न कि धन व अत्याचार। चूंकि केवल ईश्वर ही के पास असीमित ज्ञान व शक्ति है अतः वास्तविक सम्मान भी ईश्वर से जुड़े रहने में ही है।
 इन आयतों से हमने सीखा कि ऐसे लोग जो काफ़िरों से जुड़े रहने में ही अपना सम्मान समझते हैं वे मिथ्याचारी हैं क्योंकि कोई भी ईमान वाला काफ़िरों के वर्चस्व के अपमान को सहन करना नहीं चाहता।

अब सूरए निसा की आयत संख्या 140 
ईश्वर ने (अपनी) किताब (क़ुरआन) में तुम्हें यह आदेश दिया है कि जब ईश्वर की आयतों के बारे में यह सुनो कि उनका इन्कार किया जा रहा है या मज़ाक़ उड़ाया जा रहा है तो कदापि उनके साथ न बैठो, यहां तक कि वे दूसरी बातों में व्यस्त हो जाएं अन्यथा तुम भी उन्हीं की भांति हो जाओगे। निःसन्देह, ईश्वर मिथ्याचारियों और काफ़िरों, सबको नरक में एकत्रित करने वाला है। (4:140)

 यह आयत मिथ्याचारियों की एक अन्य निशानी की ओर संकेत करते हुए कहती है कि प्रथम तो यह कि वे काफ़िरों और धर्म का विरोध करने वालों की बैठकों में भाग लेते हैं और दूसरे यह कि वे धर्म के विरुद्ध होने वाली बातों पर चुप रहते हैं जबकि एक ईमान वाले व्यक्ति का यह कर्तव्य है कि वह इन बातों को रोके या कम से कम पाप की बैठक से उठ जाए।
 इस आयत से हमने सीखा कि पाप की बैठकों में भाग लेना, पाप करने में भाग लेने के समान है चाहे बैठक में भाग लेने वाला चुप ही क्यों न रहे।
 काफ़िरों के साथ उठना-बैठना, उसी स्थिति में वैध है कि जब वे धर्म का अनादर न करें।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बहाने और लोगों से संबंध बढ़ाने तथा उनसे मेल-जोल के नाम पर धर्म के अनादर की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

सूरए निसा की आयत संख्या 141 
मिथ्याचारी वही लोग हैं जो सदैव इस बात की प्रतीक्षा में रहते हैं कि ईश्वर की ओर से तुम्हें कोई विजय या लाभ प्राप्त हो और वे कहें कि क्या हम तुम्हारे साथ नहीं थे? और यदि (लाभ में) कोई भाग काफ़िरों को प्राप्त हो जाए तो उनसे कहें कि क्या हमने तुम्हें (मुसलमानों से युद्ध के लिए) प्रोत्साहित नहीं किया और उनकी ओर से तुम्हें क्षति पहुंचाने से नहीं रोका? तो ईश्वर प्रलय के दिन तुम लोगों के बीच फ़ैसला करेगा और निःसन्देह, ईश्वर ने कदापि मुसलमानों पर काफ़िरों के वर्चस्व का कोई मार्ग नहीं रखा है। (4:141)
 अवसरवाद, मिथ्याचारियों की एक और निशानी है। वे हर अवसर को अपने हित में प्रयोग करना चाहते हैं। यदि ईमान वाले विजयी होते हैं तो वे कहते हैं कि हम भी तुम्हारे साथ थे और हमने तुम्हारी सहायता की है अतः युद्ध से होने वाले लाभों में हम भी भागीदार हैं और यदि शत्रु विजयी रहता है तो वे उससे कहते हैं कि हमने ही इस विजय की भूमि प्रशस्त की है। हमने ही तुम्हे मुसलमानों के विरूद्ध प्रोत्साहित किया और हम मुसलमानों के वारों को मोड़ते रहे।
 एसे लोग दोनों पक्षों के लिए जासूसी करने वालों की भांति, मिथ्या से काम लेते हैं, कभी कारवां के मित्र होते हैं तो कभी लुटेरों के साथी। आयत का अन्तिम भाग ईमान वालों को आशा दिलाता है कि पूरे इतिहास में सत्य और असत्य के बीच होने वाले युद्धों में सारे उतार-चढ़ावों के बावजूद, भला अंत ईमान वालों का ही है और ईश्वर कदापि इस बात की अनुमति नहीं देगा कि काफ़िर, ईमानवालों पर वर्चस्व जमा सकें।
 आज यदि यह देखा जाता है कि संसार के अधिकांश भाग पर कुफ़्र का शासन है तो यह इस कारण है कि अनेकानेक मोमिनों का ईमान, वास्तविक नहीं है और वह अपने धार्मिक दायित्वों पर कार्यबद्ध नहीं हैं न वे अपने व्यक्तिगत व्यहार में ईश्वर को दृष्टि में रखते हैं और न ही सामाजिक मामलों में उनके बीच एकता और समरस्ता है।
 ईश्वर का वादा सच्चा है परन्तु इस शर्त के साथ कि ईमान वाले भी अपने ईमान पर जमे रहें। एसी स्थिति में इस बात की कोई संभावना नहीं है कि काफ़िर उन पर वर्चस्व जाम सकें।
 इस आयत में हमने सीखा कि मिथ्या की एक निशानी अवसरवाद है। हमें सत्यवादी होना चाहिए अवसरवादी नहीं।
 इस्लामी देशों को काफ़िरों का वर्चस्व स्वीकार करने का अधिकार नहीं है। अन्य देशों के साथ राजनैतिक, आर्थिक व सांस्कृतिक संबंध उसी स्थिति में वैध हैं जब काफ़िरों के वर्चस्व और मोमिनों के अपमान का कारण न बनें और ईमान वालों की स्वाधीनता को क्षति न पहुंचाए।
 ऐसा काम करना चाहिए कि काफ़िर, ईमान वालों पर वर्चस्व जमाने की ओर से सदा के लिए निराश हो जाएं और हर दिन कोई नया षड्यंत्र न रचें।

सूरए निसा की आयत संख्या 142 की तिलावत सुनते हैं।
निसन्देह, मिथ्याचारी, ईश्वर को धोखा देना चाहते हैं और ईश्वर उन्हें धोखे में रखने वाला है, वे जब नमाज़ के लिए उठते भी हैं तो सुस्ती के साथ, और वह भी लोगों को दिखाने के लिए और ईश्वर को बहुत कम याद करते हैं। (4:142)
 पिछली आयतों में मिथ्याचारियों के विशेषताओं का वर्णन करने के पश्चात इस आयत में ईश्वर उनकी एक अन्य निशानी की ओर संकेत करते हुए कहता है कि जिनके हृदय में ईमान मज़बूत नहीं है अर्थात मिथ्याचारी जब भी नमाज़ के लिए खड़े होते हैं तो सुस्ती के साथ औन अनमने ढंग से खड़े होते हैं। वे नमाज़ को उसके सही समय पर नहीं पढ़ते बल्कि टालते रहते हैं और अन्तिम समय में बड़ी ही तीव्रता से पढ़ कर छुट्टी पा लेते हैं और सबसे बुरी बात तो यह है कि नमाज़ में ईश्वर को याद करने के स्थान पर वे लोगों को अपनी नमाज़ दिखाने के लिए उत्सुक रहते हैं।
 क़ुरआन कहता है कि मानो यह लोग यह सोचते हैं कि वे ईश्वर के साथ भी छल कर सकते हैं और स्वयं को अन्य ईमान वालों की भांति ईश्वर के समक्ष पेश कर सकते हैं। जबकि ईश्वर उनकी नीयत से भी अवगत है और उनके मिथ्यापूर्ण कर्म को भी देख रहा है। ईश्वर उनके साथ उन्हीं जैसा व्यवहार करता है, तो उन्हें मुसलमान कह कर आदेश देता है कि उनके साथ मुसलमानों जैसा व्यवहार किया जाए परन्तु प्रलय के दिन वह उन्हें काफ़िरों के साथ नरक में डालेगा क्योंकि मिथ्या, अनेकेश्वरवाद की निशानी है।
 इस आयत से हमने सीखा कि नमाज़ में सुस्ती, ईश्वर की याद से निश्चेतना, दिखावा तथा धोखा, मिथ्या की निशानियां हैं, हमें इनसे सचेत रहना चाहिए।
 ईश्वर का बदला हमारे कर्मों के अनुसार होगा, शायद संसार के लोगों को धोखा दिया जा सके परन्तु प्रलय में ईश्वरीय दण्ड से भागने का कोई मार्ग नहीं है।
 सूरए निसा की आयत संख्या 143 
(हे पैग़म्बर!) मिथ्याचारी कुफ़्र व ईमान के बीच डांवाडोल हैं, वे न इनके साथ हैं न उनके साथ, और जिसे ईश्वर पथभ्रष्ट कर दे उसके लिए आपको (मुक्ति का) कोई मार्ग नहीं मिलेगा। (4:143)
 मिथ्याचारियों की एक अन्य विशेषता जिसका इस आयत में उल्लेख किया गया है यह है कि उनका कोई स्थिर विचार, लक्ष्य, आस्था या ईमान नहीं होता, न वे ईमान वालों की पक्ति में आए हैं कि सदैव उनके साथ रहें और न उनमें इतना साहस होता है कि अपने अंदर के कुफ़्र को प्रकट करके काफ़िरों के साथ हो जाएं।
 वे प्रतिदिन किसी भी दिशा में चले जाते हैं और हवा में मौजूद वस्तुओं की भांति उसी ओर चल पड़ते हैं जहां उन्हें हवा ले जाती है। स्वाभाविक है कि जिसने स्वयं को एसी स्थिति में डाल रखा हो, उसका परिणाम पथभ्रष्टता के अतिरिक्त और कुछ नहीं होगा और यह संसार में ईश्वर की ओर से उनको दिया जाने वाला दण्ड है। 
 इस आयत से हमने सीखा कि, मिथ्या, की भावना, मनुष्य से वैचारिक स्वतंत्रता को छीन कर उसे दूसरों पर निर्भर बना देती है। 
सूरए निसा की आयत संख्या 144 
हे ईमान वालो! कदापि ईमान वालो के स्थान पर काफ़िरों को अपना मित्र व अभिभावक न बनाओ, क्या तुम चाहते हो कि ईश्वर के लिए अपने विरुद्ध स्पष्ट तर्क बना लो? (4:144)
 पिछली आयतों में मिथ्याचारियों की विशेषताओं का वर्णन करने के पश्चात ईश्वर इस आयत में ईमान वालों को सचेत करते हुए कहता है कि तुम मिथ्याचारियों की भांति कदापि काफ़िरों के साथ मित्रता और उनपर निर्भरता के प्रयास में न रहना। केवल ईमान वाले ही तुम्हारे मित्र और अभिभावक बनने के योग्य हैं। ईमान वालों को छोड़कर काफ़िरों से संबंध स्थापित करना, ईमान के अनुकूल नहीं है और यदि तुमने एसा किया तो ईश्वर के समक्ष तुम्हारे पास कोई उत्तर नहीं होगा और ईश्वर इस संबंध में तुमसे प्रश्न करने का अधिकार रखता है।
 इस आयत से हमने सीखा कि हर वह काम निंदनीय है जो इस्लामी समाज पर काफ़िरों के वर्चस्व का कारण बने। एसे हर समझौते से दूर रहना चाहिए जो ईमान वालों को काफ़िरों का वर्चस्व स्वीकार करने पर बाध्य करे।
 ईमान वालों के साथ मित्रता तथा काफ़िरों से दूरी, ईमान का अटूट अंग है।

सूरए निसा की आयत संख्या 145 और 146 
(हे पैग़म्बर!) निसन्देह, मिथ्याचारी, आग के सबसे नीचे कक्ष में होंगे और आप उनके लिए कदापि कोई सहायक नहीं पाएंगे। (4:145) सिवाय उन लोगों के जिन्होंने तौबा अर्थात प्रायश्चित कर लिया और अपने को सुधार लिया और ईश्वर (की रस्सी) को मज़बूती से पकड़े रहे और ईश्वर के लिए अपने धर्म को शुद्ध किया, कि यही लोग ईमान वालों के साथ हैं और ईश्वर भी शीघ्र ही ईमान वालों को महान बदला देगा। (4:146)
 इन आयतों से स्पष्ट होता है कि इस्लाम की दृष्टि में मिथ्या, कुफ़्र का सबसे बुरा उदाहरण है और मिथ्याचारी, ईश्वर के सबसे दूर रहने वाले बंदे हैं। अतः नरक में उनका ठिकाना भी आग का सबसे गहरा और निचला स्थान है और ऐसा होना भी चाहिए क्योंकि ऐसे लोग ईमान प्रकट करके शत्रु के भेदियों की भांति सदैव पीठ में छुरा घोंपते हैं। वास्तव में वे ऐसे ख़तरनाक शत्रु हैं जो मित्र के भेस में सामने आते हैं।
 परन्तु ईश्वर की दया के द्वार किसी पर भी यहां तक कि इस प्रकार के लोगों पर भी बंद नहीं हैं और यदि यह अपने पिछले कर्मों को छोड़ दें और सुधार योग्य कर्मों में सुधार ले आएं तथा अपने ईमान व कर्मों को दिखावे, तथा मिथ्या से पवित्र कर लें तो ईश्वर उन्हें ईमान वालों की पक्ति में स्वीकार करके उन्हीं की भांति पारितोषिक देगा।
 इन आयतों से हमने यह सीखा कि प्रलय में मुक्ति का कोई मार्ग नहीं है। यदि हम अपनी मुक्ति चाहते हैं तो उसे संसार में प्रायश्चित व भले कर्मों द्वारा प्राप्त करना चाहिए। 
 तौबा या प्रायश्चित का मार्ग सदैव और सबके लिए खुला हुआ है। ईश्वर के दरबार में निराशा का कोई अर्थ नहीं है। 
 लज्जित होने की केवल शाब्दिक अभिव्यक्ति का नाम तौबा नहीं है बल्कि एक व्यापक पुनर्विचार और पुनर्निर्माण का नाम तौबा या प्रायश्चित है।
 ईमान वाले लोग प्रायश्चित करने वालों का दिल से स्वागत करते हैं और उनके अतीत को भुला देते हैं। 

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