फिर एक हुसैन चाहिए ज़ुल्म और नफरत मिटाने के लिए |

इस्लामी माह शाबान की तीसरी तारीख को पैगम्बरे इस्लाम हजरत मुहम्मद (स.) के प्यारे नवासे हजरत इमाम हुसैन का यौमे विदालत मनाया जाता है |हज...

इस्लामी माह शाबान की तीसरी तारीख को पैगम्बरे इस्लाम हजरत मुहम्मद (स.) के प्यारे नवासे हजरत इमाम हुसैन का यौमे विदालत मनाया जाता है |हज़रत इमाम हुसैन (अ.) हज़रत अली (अ.) व हजरत मुहम्मद (स.अ.व) की बेटी  हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.) के दूसरे बेटे हैं |आपका जन्म 3 शाबान, सन 4 हिजरी,  8 जनवरी 626 ईस्वी को पवित्र शहर मदीना, सऊदी अरब) में हुआ था और आपकी शहादत 10 मुहर्रम 61 हिजरी (करबला, इराक) 10 अक्टूबर 680 ई. में  हुई|

जब पैग़म्बरे इस्लाम (सल्लल्लाहो अलैहेवसल्लम ) उनके पैदा होने की ख़बर मिली तो वह हज़रत अली (अ.) के घर आये और बच्चे को मँगाया। असमा बच्चे को एक सफ़ेद कपड़े में लपेट कर लाई और पैग़म्बरे इस्लाम (स.) की गोद में दे दिया। पैग़म्बरे इस्लाम (सल्लल्लाहो अलैहेवसल्लम) ने उनके दाहिने कान में अज़ान व बायें कान में इक़ामत कही। पैदाइश के पहले या सातवें दिन जिब्रईले अमीन नाज़िल हुए और कहा कि ऐ अल्लाह के रसूल ! आप पर अल्लाह का सलाम हो। इस बच्चे का नाम हारून के छोटे बच्चे के नाम पर शब्बीर रखना। क्योंकि अली आपके लिए हारून बिन मूसा की मिस्ल है, इस फ़र्क़ के साथ कि आपके बाद कोई नबी नही है। शब्बीर को अरबी में हुसैन कहते हैं। इस तरह हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.) के दूसरे बेटे का नाम अल्लाह की तरफ़ हुसैन रखा गया।    आपके जनम के पश्चात हजरत जिब्रील (अस) ने अल्लाह के हुक्म से हजरत पैगम्बर (स) को यह सूचना भेजी के आप पर एक महान विपत्ति पड़ेगी, जिसे सुन कर हजरत पैगम्बर (स) रोने लगे थे और कहा था अल्लाह तेरी हत्या करने वाले पर लानत करे।


इतिहासकार मसूदी ने उल्लेख किया है कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम छः वर्ष की आयु तक हज़रत पैगम्बर(स.) के साथ रहे। तथा इस समय सीमा में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को सदाचार सिखाने ज्ञान प्रदानकरने तथा भोजन कराने का उत्तरदायित्व स्वंम पैगम्बर(स.) के ऊपर था। पैगम्बर(स.) इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से अत्यधिक प्रेम करते थे। वह उनका छोटा सा दुखः भी सहन नहीं कर पाते थे। इमाम हुसैनअलैहिस्सलाम से प्रेम के सम्बन्ध में पैगम्बर(स.) के इस प्रसिद्ध कथन का शिया व सुन्नी दोनो सम्प्रदायों के विद्वानो ने उल्लेख किया है। कि पैगम्बर(स.) ने कहा कि हुसैन मुझसे हैऔर मैं हुसैन से हूँ। अल्लाह तू उससेप्रेम कर जो हुसैन से प्रेम करे। हज़रत पैगम्बर(स.) के स्वर्गवास के बाद हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम तीस (30)  वर्षों तक अपने पिता हज़रत इमामइमाम अली अलैहिस्सलाम के साथ रहे। और सम्स्त घटनाओं व विपत्तियों में अपने पिताका हर प्रकार से सहयोग करते रहे। हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम की शहादत के बाद दस वर्षों तक अपने बड़े भाई इमाम हसन के साथ रहे। तथा सन् पचास (50) हिजरी में उनकी शहादत के पश्चात दस वर्षों तक घटित होने वाली घटनाओं काअवलोकन करते हुए मुआविया का विरोध करते रहे । जब सन् साठ (60) हिजरी में मुआविया का देहान्त हो गय, व उसके बेटे यज़ीद ने गद्दी पर बैठने के बाद हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से बैअत (आधीनतास्वीकार करना) करने के लिए कहा, तो आपने बैअत करने से मना कर दिया।और इस्लामकी रक्षा हेतु वीरता पूर्वक लड़ते हुए शहीद हो गये।


प़ैग़म्बरे इस्लाम (सल्लल्लाहो अलैहेवसल्लम ) ने हज़रत इमाम हुसैन (अ.) से जिस तरह मुहब्बत की उससे लोग तीसरे इमाम हज़रत हुसैन (अ.) की अज़मत से अच्छी परिचित हो गये। सलमाने फ़ार्सी कहते हैं कि मैंने देखा है कि प़ैग़म्बरे इस्लाम (सल्लल्लाहो अलैहेवसल्लम ) ने इमाम हुसैन (अ.) को अपने ज़ानू पर बैठा रखा था और कह रहे थे "आप ख़ुद मोहतर हो, मोहतरम बाप के बेटे हो और मोहतरम बेटों के बाप हो, आप इमाम हो, इमाम के बेटे हो और इमामों के बाप हो। आप अल्लाह की हुज्जत हो, अल्लाह की हुज्जत के बेटे हो, और अल्लाह की हुज्जत के बाप हो, आपके नौ बेटे अल्लाह की हुज्जत होंगे जिनमें से आख़िरी क़ाइम (इमामे ज़मान (अज.) होगा।" अनस बिन मालिक कहते हैं कि जब पैग़म्बरे इस्लाम (सल्लल्लाहो अलैहेवसल्लम ) से पूछा गया कि आप अपने अहलेबैत में से सबसे ज़्यादा किसे चाहते हो तो उन्होंने जवाब दिया कि हसन व हुसैन को। पैग़म्बरे इस्लाम (सल्लल्लाहो अलैहेवसल्लम ) अक्सर हसन व हुसैन को सीने से लगाकर प्यार करते थे। अबू हुरैरा जो कि मुआविया आदमी है और अहलेबैत अलैहिमुस सलाम का दुश्मन है, वह भी इस बात को कहता है कि " मैंने देखा कि पैग़म्बरे इस्लाम (सल्लल्लाहो अलैहेवसल्लम ) हसन व हुसैन को अपने काँधों पर बैठाये हुए हमारी तरफ़ आ रहे थे, जब वह हमारे पास पहुँचे तो कहा कि "जिसने मेरे इन दोनों बेटों से मुहब्बत की उसने मुझसे मुहब्बत की और जिसने इन से दुश्मनी की उसने मुझसे दुश्मनी की।" 

आज पूरी दुनिया दो हिस्सों में बंट चुकी है। कुछ मुल्क जो अपने अन्दर सारी दुनिया की ताकत समेट लेना चाहते हैं। और उनके मुकाबले में दूसरी तरफ अनेक गरीब मुल्क हैं जहाँ लोग जिंदगी की बुनियादी जरूरतों रोटी, कपड़ा और मकान के लिए तरस रहे हैं। यहां तक कि उन्हें ताजी हवा और साफ पानी भी मयस्सर नहीं है। चन्द ताकतवर मुल्क इन गरीब मुल्कों पर अपनी दादागिरी चमकाना चाहते हैं। यहां के ज़खीरों का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करना चाहते हैं। अपनी बात न मानने पर इन गरीब मुल्कों को सबक सिखाने की धमकी देते हैं। इनके लिए पेट्रोल इन्सानी खून से ज्यादा कीमती है। ये अपने बनाये हथियारों के टेस्ट के लिए हरे भरे जंगलों को बरबाद कर रहे हैं। अपनी फैक्ट्रियों से निकला कचरा ठिकाने लगाने के लिए गरीब मुल्कों को कूड़ेदान बना रहे हैं। कभी जापान अमेरिका के एटमी हमलों से थर्रा उठा था। उस मुल्क को लगभग तबाह और बरबाद कर दिया गया था। आज वही छोटा सा मुल्क अमेरिका को बराबरी की टक्कर दे रहा है।इसकी वजह सिर्फ एक है कि वहां के बाशिंदों ने सब्र और हिम्मत के साथ कड़ी मेहनत की। दिन को दिन और रात को रात नहीं समझा। परोक्ष रूप से उन्होंने हुसैन (अ.) के पैगाम पर अमल किया और आखिरकार पूरी दुनिया को अपनी टेक्नालाजी के सामने झुकने पर मजबूर कर दिया।

हज़रत इमाम हुसैन (अ.) की ज़िन्दगी, उनकी शहादत, उनका बात चीत का अंदाज़ और उनके किरदार का हर पहलु न केवल यह कि इतिहास के एक महान इंसान को हमारे लिए पेश करता है, बल्कि वह तमाम फ़ज़ीलतों, तमाम बड़ाईयों, तमाम क़ुर्बानियों, वह अल्लाह को चाहने व अल्लाह को पाने का आईना है। वह तन्हा इंसानियत की सआदत (कल्याण) का ज़ामिन बन सकते है। उनकी ज़िन्दगी व शहाद, दोनों ने ही इंसान की मानवियता व फ़ज़ीलत (आध्यात्म व उच्चता) को महान बनाया है।
तुम  मिटे , लेकिन  तुम्हें  मिटने  ना  देंगे  एय  हुसैन
वोह  तुम्हारा  काम  था , और  यह  हमारा  काम  है
..राही मासूम रज़ा
कुछ  दिन  पहले मैंने इमाम हुसैन (ए.स) कोश्रधांजलि देते हुए एक पोस्ट मैं यह बताने कि कोशिश कि थीकि धर्म कोई भी हो जब यह राजशाही , बादशाहों, नेताओं का ग़ुलाम बन जाता है तो ज़ुल्म और नफरत फैलाता है और जब यह अपनी असल शक्ल मैं रहता है तो, पैग़ाम ए मुहब्बत "अमन का पैग़ाम " बन जाता है.
अवश्य पढ़ें


विलादत इमाम हुसैन (अ.स) मुबारक - एस एम् मासूम

I pray that the Shahadat of Imam Hussain become the catalyst for us to remove our differences and come together for peace, security and prosperity of Muslims and every human being.Mike Ghouse
close your eyes and reflect on all men and women who stood up for righteousness, we are all beneficiaries of such a gift of sacrifice on their part. And make a small commitment to yourselves that you will stand up for the rights of others regardless of who they are,  and the least you can do is to speak up, or write a comment when you read,
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