हज़रत फ़ातेमा ज़हरा (स) की इबादतों पर हक़्क़ानीयत को नाज़ है

अल्लाह  ने तमाम आलमें इंसानियत की  हिदायत के लिये इस्लाम में कई ऐसी हस्तियों को पैदा किया जिन्होने अपने आदात व अतवार, ज़ोहद व तक़वा, पाकी...

अल्लाह  ने तमाम आलमें इंसानियत की  हिदायत के लिये इस्लाम में कई ऐसी हस्तियों को पैदा किया जिन्होने अपने आदात व अतवार, ज़ोहद व तक़वा, पाकीज़गी व इंकेसारी, जुरअतमंदी, इबादत, रियाज़त, सख़ावत और फ़साहत व बलाग़त से दुनिया ए इस्लाम पर अपने गहरे नक्श छोड़े हैं, उन में बिन्ते रसूल (स), ज़ौज ए अली और मादरे गिरामी शब्बर व शब्बीर अलैहिमुस सलाम भी उन ख़ुसूसियात की हामिल हैं, जिन पर दुनिया ए इस्लाम को फ़ख़्र है हज़रत फ़ातेमा ज़हरा (स) की इबादतों पर हक़्क़ानीयत को नाज़ है, उन की पाकीज़गी पर इस्मत को नाज़ है, उन के किरदार पर मशीयत को नाज़ है और इंतेहा यह है कि उन की शख़्सियत पर रिसालत को नाज़ है और मुख़्तसर यह कि उन पर शीईयत को नाज़ है।




फ़ातेमा ज़हरा (अ) वह ख़ातून है जिन के लिये ख़ुद रसूले ख़ुदा, ख़ातमुल अंबिया, अहमद मुजतबा हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा का फ़रमान है: फ़ातेमतो बज़अतुम मिन्नी, फ़ातेमा मेरे जिगर का टुकड़ा है। फ़ातेमा ज़हरा (स) जब कभी अपने बाबा की ख़िदमते अक़दस में हाज़िर हुईं तो एक कम एक लाख चौबीस हज़ार अंबिया के सरदार, बीबी की ताज़ीम के लिये खड़े हो जाते और उन्हे सफ़क़त से अपने पहलू में इनायत करते और निहायत ही मुहब्बत से उन से गुफ़तुगू फ़रमाते हैं। फ़ातेमा ज़हरा (स) की तारीख़े विलादत के बारे में मुवर्रेख़ीन की मुख़्तलिफ़ राय हैं कुछ मुवर्रेख़ीन ने रसूले ख़ुदा (स) की बेसत के एक साल बाद उन की पैदाईश दर्ज है।


बहवाल ए इब्ने ख़शाब दर्ज है कि हज़रत फ़ातेमा ज़हरा (स) की विलादत का वक़्ते बेसत के पांच साल बाद (यअनी 615 हिजरी) क़रीब आया तो क़बीले के दस्तूर के मुताबिक़ हज़रत ख़दीजतुल कुबरा ने मदद के लिये औरतों को बुलवाया मगर औरतों ने यह कर आने से इंकार कर दिया कि अब हमारी बिरादरी से तुम्हारा क्या वास्ता? तुम ने सब से पयाम को रद्द कर के मुहम्मद (स) से शादी की है और हमारे मअबूदों को बुरा भला कहा है, क़बीले की औरतों का यह जवाब सुन कर हज़रत ख़दीजा (स) परेशान हो गई मगर उसी वक़्त अल्लाह की रहमत नाज़िल हुई और ग़ैब से चार औरतें घर में नमूदार हुईं। यह ख़्वातीन हज़रत सारा, हज़रत कुलसूम, हज़रत आसिया और हज़रत मरियम थीं। विलादत के बाद हुज़ूर ने अपनी चहेती बेटी को गोद में ले कर फ़रमाया: ख़दीजा यह तुम्हारी मेहनतों का सिला है मेरी बेटी फ़ातेमा ब रोज़े क़यामत मेरी उम्मत की सिफ़ारिश करेगी और गुनाहगारों को दोज़ख़ की आग से बचायेगी।



जैसे जैसे हज़रत फ़ातेमा (स) बड़ी होती गई उन के औसाफ़ व कमालात नुमायां होते चले गये, दुनिया ने हुस्न व हया और पाकीज़गी के पैकर को ख़ान ए रसूल (स) में बनते और सँवरते देखा। चुनाचे सुन्नी मुवर्रीख़ अपनी किताब फ़ातेमा ज़हरा में लिखता है कि अनस बिन मालिक से रिवायत है कि उन की वालिदा बयान करती थीं कि फ़ातेमा ज़हरा (स) चौदहवीं के चाँद और आफ़ताब के मानिन्द थीं। उस के अलावा ग़ैर मुस्लिम ख़्वातीन ने भी ऐतेराफ़ किया है। डाक्टर ऐथीनो कम, कनाडा की एक माहिर फ़लसफ़ी ख़ातून हैं वह अपने मज़मून में खा़तूने जन्नत फ़ातेमा ज़हरा (स) के बारे में लिखती हैं कि फ़ातेमा मुहम्मद की बेटी व आली शान ख़ातून हैं जिन के बारे में ख़ुद ख़ुदा ने बयान फ़रमाया कि आप पाकीज़ा ख़ातून हैं।


मिस वरकन हौल, न्यूयार्क की एक ख़ातून हैं वह अपनी मशहूर व मारुफ़ किताब (the holy daughter of holy prophet) कि जिस का तर्जुमा मुक़द्दस पैग़म्बर (स) की मुक़द्दस बेटी में लिखती हैं कि वह पैग़म्बर (स) की महबूब बेटी थीं जिन के अंदर अपने बाप के तमाम औसाफ़ व कमालात जमा थे। फ़ातेमा ज़हरा वह आली मक़ाम ख़ातून थीं जिन के फ़रिश्ते भी नौकर थे, कभी फ़रिश्ते आप की चक्की चलाने आते, कभी आप के बेटों का झूला झुलाने आते। ख़ातूने जन्नत ने रिसालत के साये में परवरिश पाई। कई हज़रात ने आप से निकाह की ख़्वाहिश ज़ाहिर की मगर हुज़ूर अकरम (स) ने जवाब में ख़ामोशी ज़ाहिर की लेकिन जब हज़रत अली (अलैहिस सलाम) ने अपने ख़्वाहिश ज़ाहिर की तो उस वक़्त आमँ हज़रत (स) ने इरशाद फ़रमाया कि ख़ुद मुझे ख़ुदा ने हुक्म दिया है कि हम ने फ़ातेमा की शादी आसमान पर अली से कर दी है लिहाज़ा तुम भी फ़ातेमा की शादी ज़मीन पर अली से कर दो। उस वक़्त रसूले ख़ुदा (स) ने यह भी इरशाद फ़रमाया कि अगर अली न होते तो फ़ातेमा का कोई हमसर (कुफ़्व) न होता।


चुनाचे ब हुक्मे ख़ुदा वंदे आलम रसूले आज़म (स) ने अपनी बेटी का निकाह हज़रत अली (अ) से कर दिया, यह शादी जिस अंदाज़ में हुई उस की मिसाल सारे आलम में नहीं मिलती। आज हम अपने नाम व नमूद के लिये, अपनी शान व शौकत के लिये, अपने रोब व दबदबे के इज़हार के लिये अपनी बेटियों की शादी में हज़ारो लाखों रूपये नाच गाने, डेकोरेशन, मुख़्तलिफ़ खाने और न जाने कितनी ग़ैर इस्लामी रस्मो रिवाज पर बे धड़क ख़र्च कर देते हैं, लड़कियों के जहेज़ में अपनी शान व शौकत को मलहूज़े ख़ातिर रखते हैं, जब दीन व इस्लाम गवाह है कि दीन की सब से आली मकतबत शख़्सीयत ने अपनी बेटी को जहेज़ के नाम पर एक चक्की, एक चादर, एका चारपाई, खजूर के पत्तों से भरा हुआ एक गद्दा, मिट्टी के दो घड़े, एक मश्क, मिट्टी का कूज़ा, दो थैलियां और नमाज़ पढ़ने के लिये हिरन की खाल दी बस यह कुल असासा था जो बीबी ए दो आलम अपने जहेज़ में ले कर हज़रत अली (अ) के घर आईं।


घर के सारे काम ख़ुद अपने कामों से अंजाम देतीं थी, हज़रत अली (अ) घर का पानी भरते और जंगल की लकड़ी वग़ैरह लाते थे और हज़रत ज़हरा (स) अपने हाथों से चक्की चला कर आटा पीसतीं, जारूब कशी करतीं, खाना पकाती, कपड़े धोती, शौहर की ख़िदमत अंजाम देतीं और बच्चों की हिफ़ाज़त व परवरिश करतीं मगर उस के बावजूद कभी अपने शौहर से शिकायत नही की, जब कि अगर वह चाहतीं तो सिर्फ़ एक इशारे की देर होती जन्नत की हूरें और ग़ुलामान, दस्त बस्ता उन की ख़िदमत में हाज़िर हो जाते मगर उन्होने कभी ऐसा नही किया क्यो कि उन्हे अपने बाबा के चमन की आबयारी करनी थी, अपने हर अमल को दीन के मानने वालों के लिये मशअले राह बनाना था। चुनाचे एक मरतबा हुज़ूर अक़दस की ख़िदमत में बहुत से जंग में असीर किये क़ैदी पेश किये जिन में कुछ औरतें भी शामिल थीं। हज़रत अली (अ) ने इस बात की इत्तेला हज़रत ज़हरा (स) को देते हुए फ़रमाया कि तुम भी अपने लिये एक कनीज़ मांग तो ता कि काम में आसानी हो जाये, बीबी ने पैग़म्बरे अकरम (स) की ख़िदमत में अपना मुद्दआ पेश किया तो हुज़ूर ने अपनी लाडली बेटी की बात सुन कर इरशाद फ़रमाया कि मैं तुम को वह बात बताना चाहता हूँ कि जो ग़ुलाम और कनीज़ से ज़्यादा नफ़अ बख़्श है तब हुज़ूर ने अपनी बेटी को एक तसबीह की तालीम फ़रमाई जो आज सारे आलमे इस्लाम में मशहूर है जिसे तसबीहे हज़रत फ़ातेमा ज़हरा कहते हैं। 


अल्लाह के रसूल ख़ातमुल मुरसलीन (स) ने अपनी लाडली बेटी को बतूल, ताहिरा, ज़किय्या, मरज़िया, सैयदतुन निसा, उम्मुल हसन, उम्मे अबीहा, अफ़ज़लुन निसा और ख़ैरुन निसा के अलक़ाब से नवाज़ा। सुन्नी मुवर्रिख़ अपनी किताब में लिखता है कि अल्लाह के रसूल (स) ने इरशाद फ़रमाया कि फ़ातेमा क्या इस बात पर ख़ुश नही हो कि तुम जन्नत की औरतों की सरदार हो। आप की सख़ावत की मिसाल सारे जहान में ढ़ूढ़ने से नही मिलती। यह बात तो हदीसों की किताबों में नक़्ल हैं लेकिन ग़ैर मुस्लिम मुबल्लेग़ा, अंग़्रज़ी अदब की मशहूर किताब (GOLDE DEEDS) के सफ़हा नंबर 115 पर तहरीर करती हैं कि जिस की तर्जुमा यह है कि एक मर्तबा मैं यूरोप का तबलीग़ी दौरा कर रही थी जब मैं मानचेस्टर पहुचीं तो कुछ ईसाई औरतों ने मेरे सामने बाज़ मुख़य्यरा व सख़ी मसतूरात की तारीफ़ में मुबालेग़े से काम लिया तब मैं ने कहा कि यह ठीक है कि दुनिया में सख़ावत करने वालों की कमी नही है लेकिन मुझे तो रह रह कर एक अरबी करीमा याद आती है कि जिस का नाम फ़ातेमा है उस की सख़ावत का आलम यह था कि मांगने वाले दरे अक़दस पर हाज़िर होता तो जो कुछ घर में मौजूद होता उस आने वाले को दे देती और ख़ुद फ़ाक़े में ज़िन्दगी बसर करती, उस के हालात में सख़ावत व करीमी की ऐसी मिसालें हैं जिन को पढ़ कर इंसानी अक़्ल दंग रह जाती है। और मैं यह सोचने पर मजबूर हूँ कि जैसी ख़ैरात फ़ातेमा ज़हरा (स) ने की वह यक़ीनन बशरी ताक़त से बाहर है। एक जापानी ख़ातून चायचिन 1954 ईसवी में तमाम आलमी ख़्वातीन के हालत पर तबसेरा करते हुए अपनी किताब काले साचिन में कि जिस का अरबी और फ़ारसी ज़बान में भी तर्जुमा हो चुका है, लिखती है कि फ़ातेमा ज़हरा अरब के मुक़द्दस रसूल की इकलौती साहिबज़ादी थीं जो बहुत ही ज़ाहिदा, आबिदा, पाकीज़ा, ताहिरा और साबिरा थीं। उन के शौहर मालदार नही थे जो भी मुशक़्क़त कर के कमाते वह फ़ातेमा ख़ैरात कर देतीं और मासूम बच्चे भी इसी तरह ख़ैरात करते, ऐसा लगता है कि अली, फ़ातेमा और उन के बच्चों को ज़िन्दगी की ज़रुरियात की एहतियाज नही थी और यह नूरानी हस्तियां पोशाक व ख़ोराक भी ग़ैब से पातीं होगीं, वर्ना इंसानी लवाज़ेमात इस अम्र के मोहताज होते हैं कि जब भी माली मुश्किलात हायल हों तो सख़ावत से दस्त कशी की जाये। मगर फ़ातेमा के घर महीना महीना भर चूल्हा गर्म नही होता था अकसर सत्तू या चंद खजूरें खा कर और पानी पी कर घर के सारे लोगरह जाया करते थे, इसी लिये फ़ातेमा ने मख़दूम ए आलम का लक़्ब पाया।


हज़रत फ़ातेमा ज़हरा (स) फ़साहत व बलाग़त में भी आला दर्जे पर फ़ायज़ थीं। जैसा कि मशहूर है कि आप की कनीज़ जनाबे फ़िज़्ज़ा जो कि हबशी थीं, उन्होने क़ुरआन के लब व लहजे में बीस साल बात की, अब आप अंदाज़ा लगायें कि शहज़ादी की क्या मंज़िलत होगी। आप की पाँच औलाद थीं इमाम हसन, इमाम हुसैन, जनाबे मोहसिन, जनाबे उम्मे कुलसूम और जनाबे ज़ैनब। आप की इस्मत व तहारत का यह आलम था कि आप ने वक़्ते आख़िर वसीयत की थी मेरा जनाज़ा रात की तारीकी में उठाना। आप की इबादत का यह हाल था कि आप ने हुजर ए इबादत ही में इंतेक़ाल फ़रमाया। आप की वफ़ात यक शंबा 3 जमादिस सानिया 11 हिजरी को हुई। आप का किरदार तमाम आलमे इंसानियत की औरतों के लिये नमून ए अमल है और यह ऐसा अहसान है जो क़यामत तक उम्मत की तमाम औरतों पर रहेगा।
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