27 रजब के आमाल |

यह बड़ी मुताबर्रक रातों में से है क्योंकि यह रसूल अल्लाह (स:अ:व:व) के मोब'अस (तबलीग़ पर मामूर होने) की रात है और ईस रात के कुछ ख़ास अमाल...

348076_origयह बड़ी मुताबर्रक रातों में से है क्योंकि यह रसूल अल्लाह (स:अ:व:व) के मोब'अस (तबलीग़ पर मामूर होने) की रात है और ईस रात के कुछ ख़ास अमाल हैं 
1        मिस्बाह में शेख़ ने ईमाम अबू जाफ़र जवाद (अ:स) से नक़ल किया है की फ़रमाया : रजब महीने में एक रात हे की ईन सब चीज़ों से बेहतर है जिन पर सूरज चमकता है और वो 27 रजब की रात है की जिसकी सुबह रसूले आज़म (स:अ:व:व) मब'उस ब रिसालत हुए! हमारे पैरोकारों में जो ईस रात अमल करेगा तो इसको 60 साल के अमल का सवाब हासिल होगा! मैंने अर्ज़ किया, "ईस रात का अमल क्या है?" आप (अ:स) ने फ़रमाया : नमाज़े ईशा के बद सो जाए और फिर आधी रात से पहले उठ कर 12 रक्'अत नमाज़ 2-2 रक्'अत करके पढ़े और हर रक्'अत में सुराः अल-हम्द के बाद क़ुरान की आखरी मुफ़स्सिल सूरतों (सुराः मोहम्मद से सुराः नास) में से कोई एक सुराः पढ़े! नमाज़ का सलाम देने के बाद यह सारी सुराः पढ़े :
सुराः हम्द
7 मर्तबा
यू टयूब विडिय
सुराः फ़लक़
7 मर्तबा
यू टयूब विडियो
सुराः नास
7 मर्तबा
यू टयूब विडिय
सुराः तौहीद
7 मर्तबा
यू टयूब विडियो
सुराः काफेरून
7 मर्तबा
यू टयूब विडिय
सुराः क़द्र
7 मर्तबा
यू टयूब विडिय
आयतल कुर्सी
7 मर्तबा
यू टयूब विडिय
और ईन सब क़ो पढ़ने के बाद यह दुआ पढ़े : 
हम्द है ईस ख़ुदा के लिये जिस ने किसी क़ो अपना बेटा नहीं बनाया और न कोई इसकी हुकूमत में इसका शरीक है और न वो कमज़ोर है के कोई इसका हामी हो और तुम इसकी बड़ाई खूब ब्यान करो, ऐ माबूद! मै सवाल करता हूँ तुझ से अर्श पर तेरे इज़्ज़त के मक़ाम के वसते से और ईस इन्तेहाई रहमत के वास्ते से जो तेरे क़ुरान में है और वास्ता तेरे नाम का जो बहुत बड़ा, बहुत बड़ा और बहुत ही बड़ा है , ब वास्ता तेरे ज़िक्र के जो बुलंद'तर, बुलंद'तर और बहुत बुलंद'तर है और ब वास्ता तेरे कामिल कलमात के सवाली हूँ के तू हज़रत मोहम्मद और इनकी आल (अ:स) पर रहमत फ़रमा और मुझ से वो सुलूक फ़रमा जो तेरे शायाने शान है 
 
अलहम्दु लील'लाहिल लज़ी लम यात्ताखिज़' वालादन व लम याकुल'लहू शरीकुन फ़िल मुल्की व लम याकुल'लहू शरीकुन फ़िल मुल्की व लम याकुल'लहू वली'युन मिनज़'ज़ुल्ली व कब'बिरहु तक्बीरा, अल्लाहुम्मा इन्नी अस-अलुका बीमा-आकीदी इज्ज़िका अ'अला अर्कानी अर्शिका व मुन्तहर रहमती मिन किताबेका व बिस्मिकल आ'-ज़मील आ'-ज़मील आ'-ज़म व ज़िक'रिकल आ'-लल आ'-लल आ'-ला व बी-कलिमातिकत ताम्मातिका अन तू'सल्लिया अला मुहम्मदीन व आलीही व अन तफ़-अला बीमा अन्ता अहलुह
 
. अमीरुल मोमिनीन (अ:स) की ज़्यारत पढ़ना के जो ईस रात के तमाम अमाल से बेहतर व अफ़ज़ल है, ईस रात में ईमाम (अ:स) की तीन ज्यारातें हैं जिन का ज़िक्र बाद में आएगा! ख़्याल रहे की मशहूर सुन्नी आलिम अबू अब्दुल्लाह मोहम्मद इब्ने बतूता ने 600 साल पहले मक्का मोअज़'ज़मा और नजफ़'अशरफ़ का सफ़र किया और अमीरुल मोमिनीन के रौज़े पर हाज़िरी दी, इन्होंने अपने सफ़र नामा (रहला इब्ने बतूता) में मक्का से नजफ़-अशरफ़  में दाख़िल होने के बाद जो अमीरु मोमिनीन अली इब्ने अबी तालिब (अ:स) के रौज़े का ज़िक्र करते हुए एक वाक़या तहरीर किया है की ईस शहर के रहने वाले सब के सब राफ़ज़ी हैं, और ईस रौज़े से बहुत से करामत ज़हूर में आती हैं, यह लोग लैलातुल महया (जागने की रात) जो 27 रजब की शब् है, इसमें कूफ़ा, बसरा ख़ुरासान, और फारस व रोम वगैरा से हर बीमार, मफ्लूज, शल-शुदा, और ज़मीन्गीर क़ो यहाँ लाते हैं, जिनकी गिनती लगभग 30-40 होती है, वो लोग नमाज़े ईशा के बाद ईन अपाहिजों क़ो अमीरुल मोमिनीन (अ:स) की ज़रीहे-मुबारक पर ले जाते हैं जहां बहुत से लोग इनके इर्द गिर्द जमा  हो जाते हैं, इनमे से कुछ नमाज़, तिलावत और ज़िक्र में मशगूल होते हैं और कुछ सिर्फ़ ईन बीमारों क़ो ही देखते रहते हैं की वो कब तंदुरुस्त होकर उठ खड़े होंगे! जब आधी या दो तिहाई रात गुज़र जाती है तो जो मफ्लूज और ज़मीन्गीर हरकत भी न कर सकते थे वो ईस हालत में उठते हैं की इन्हें कोई बीमारी नहीं होती, और कलमा तैय्येबा "ला इलाहा इलल'लाह, अलीयुन वली'उल्लाह (لااِلہ اِلاّ الله محمّد رّسوْل اللهِ علِیّ ولِیّ اللهِ ) पढ़ते हुए वहाँ से रवाना हो जाते हैं! यह मशहूर करामत है, लेकिन मै खुद उस रात वहाँ मौजूद न था, लेकिन नेक और भरोसे वाले लोगों ने मुझे यह अपनी ज़बानी बताया है, इसी कारणवश मैंने अमीरुल मोमिनीन (अ:स) के रौज़ा-ए-अक़दस के क़रीब मौजूद मदरसा में तीन आदमी देखे जो अपाहिज ज़मीन पर पड़े थे इनमें से एक ईस'फ़हान का दूसरा ख़ुरासान का और तीसरा रोम से था! मैंने ईन से पूछा, " तुम लोग तंदुरुस्त क्यों नहीं हुए?" वो कहने लगे के, "हम 27 रजब क़ो यहाँ नहीं पहुँच सके, इसलिए अगले 27 रजब तक हम यहीं रहेंगे ताकि हमें शिफ़ा हासिल हो और फिर हम वापस जायेंगे" आख़िर में इब्ने बतूता कहते हैं की ईस रात दूर दराज़ शहरों के लोग ज़्यारत के लिये ईस रौज़े अक़दस पर जमा हो जाते हैं और यहाँ बहुत बड़ा बाज़ार लगता है जो दस दिन तक जमा रहता है! लिखने वाले यह कहते हैं की लोग ईस वाक़ये क़ो अजीब न समझें क्योंकि ईन मशाहिद मौशार्र्फा (शरीफ़ गवाह देने वाले) से इनती करामत ज़ाहिर हुई हैं जिन की गनती नहीं हो सकती! चुनान्चेह शव्वाल के महीने (1343 इसवी)में उम्मत आसी के ज़ामिन ईमाम सामिन यानी अबुल हसन ईमाम अली रज़ा (अ:स) के मशहद-अतहर में तीन मफ्लूज और ज़मीन्गीर औरतें लायी गयीं, जिन के इलाज से डाक्टर और हकीम परेशान हो गए थे! इनको वहाँ से शिफ़ा मिली और वो तंदुरुस्त होकर ईस हरम से वापस गयीं! ईस मशहद-ए-मुबारक के मोएज्ज़ात व करामात के ऐसे गवाह हैं, जैसे आसमान पर सूरज का चमकना, और बद'दुओं के लिये हरम-ए-नजफ़ के दरवाज़े का खुलना हर शक से परे है! ईन औरतों का वाक़ेया ऐसा ज़ाहिर व बाहर था कके जो हकीम/डाक्टर इनके इलाज में कामयाब न हो सके थे इन्होंने माना की हमारा ख़्याल यही था की यह औरतें सेहत नहीं पा सकती हैं, लेकिन इन्हें हरम-ए-मुतःहर से शिफ़ा मिल गयी है, फिर इन्होंने बा'कायेदा यह लिख कर भी दिया! अगर यहाँ जगह की कमी न होती तो और बहुत सारे वाकेयात यहाँ ब्यान किये जाते!
 
 
शेख़ कफ़'अमी ने बलादुल'आमीन में फ़रमाया है की बे'सत की रात (27 रजब की रात) यह दुआ भी पढ़ी जाए !
اللّهُمَّ إنِّي أَسْأَلُك بِالتَّجَلِّي الأَعْظَمِ
अल्लाहुम्मा इन्नी अस'अलुका बीत'तजल्ली अल-आज़मी
ऐ माबूद! मै तुझ से सवाल करता हूँ, तुझ से ब'वास्ता बहुत बड़ी नूरानियत के
فِي هذِهِ اللَّيْلَةِ مِنَ الشَّهْرِ الْمُعَظَّمِ،
फ़ि हाज़िहिल अल-लैलती मिनस-शहरी अल-मु'अज़-ज़मो
जो आज की रात ईस बुज़ुर्गतर महीने में ज़ाहिर हुई है
وَالْمُرْسَلِ الْمُكَرَّمِ،
वल मुरसली अल-मुकर-रमी
और ब'वास्ता इज़्ज़त वाले रसूल (स:अ:व:व) के ,
أَنْ تُصَلِّيَ عَلَى مُحَمَّدٍ وَآلِهِ
अन तू'सल्ले अला मोहम्मदीन व आलिहि
यह की तू मोहम्मद (स:अ:व:व) और इनकी आल (अ:स) पर रहमत फ़रमा
وَأَنْ تَغْفِرَ لَنَا مَا أَنْتَ بِهِ مِنَّا أَعْلَمُ،
व अन त्ग'फ़िर लना मा अन्ता बिही मिन्ना आ'लमू
और हैमें वो चीज़ें अता फ़रमा की तू इन्हें हम से ज़्यादा जानता है,
يَا مَنْ يَعْلَمُ وَلا نَعْلَمُ.
या मन या'लमू व ला ना'लमू
ऐ वो जो जानता है और हम नहीं जानते,
اللّهُمَّ بَارِكْ لَنَا فِي لَيْلَتِنَا هذِهِ
अल्लाहुम्मा बारीक लना फ़ी लै'लतीना हा'ज़िही
ऐ माबूद! बरकत दे हमें आज की रात में
الَّتِي بِشَرَفِ الرِّسَالَةِ فَضَّلْتَهَا،
अल-लती बे'शराफ़ी अल-रिसालती फज़ल'तहा
की जिसे तुने आगाज़े रिसालत से फ़ज़ीलत बख्शी ,
وَبِكَرَامَتِكَ أَجْلَلْتَهَا،
व बे करामातिका अजल'तहा
अपनी बुज़ुर्गी से इसे बरतरी दी ,
وَبِالْمَحَلِّ الشَّرِيفِ أَحْلَلْتَهَا.
व बिल'महल्ली अल-शरिफ़ी अहलल'तहा
और मोकाम बुलंद देकर ईस क़ो ज़ीनत बख्शी है!
اللّهُمَّ فَإنَّا نَسْأَلُكَ بِالْمَبْعَثِ الشَّرِيفِ،
अल्लाहुम्मा फ़'इन्ना नस'अलुका बिल'मब-असी अलश'शरिफ़ी
ऐ माबूद! बस हम तेरे सवाली हैं ब'वास्ता बेसत शरीफ़,
وَالسَّيِّدِ اللَّطِيفِ،
वल सैय'यदी अल-लतीफ़ी
और मेहरबान ,
وَالْعُنْصُرِ الْعَفِيفِ،
वल उन्सुरी अल'अफीफ़ी
और पाकीज़ा सरदार और पारसा ज़ात के 
أَنْ تُصَلِّيَ عَلَى مُحَمَّدٍ وَآلِهِ
अन तू'सल्ली अला मोहम्मदीन व आलिहि
यह के तू मोहम्मद (स:अ:व:व) और इनकी आल (अ:स) पर रहमत नाज़िल फ़रमा
وَأَنْ تَجْعَلَ أَعْمَالَنَا فِي هذِهِ اللَّيْلَةِ
व अन तज'अला अ'मलाना फ़ी हाज़िही अल'लैलती
और आज की रात और तमाम रातों में
وَفِي سَائِرِ اللَّيَالِي مَقْبُولَةً،
व फ़ी सा-इरी अल-लियाली मक़'बूलातन
हमारे अमाल क़ो क़बूल फ़रमा,
وَذُنُوبَنَا مَغْفُورَةً،
व ज़ुनुबाना मग़'फिरातुन
हमारे गुनाहीं क़ो बख्श दे,
وَحَسَنَاتِنَا مَشْكُورَةً،
व हसनातिना मशकू'रतन
हमारी नेकियों क़ो पसंदीदा क़रार दे,
وَسَيِّئَاتِنَا مَسْتُورَةً،
व सय्यी-आतिना मस्तुरतन
हमारी खताओं क़ो ढांप दे,
وَقُلُوبَنَا بِحُسْنِ الْقَوْلِ مَسْرُورَةً،
व क़ुलुब्ना बी'हुस्नी अल-कौली मसरू'रतन
हमारे दिलों क़ो अपने उम्दा कलाम से खुद सनद फ़रमा
وَأَرْزَاقَنَا مِنْ لَدُنْكَ بِالْيُسْرِ مَدْرُورَةً.
व अरज़क'ना मिन लादुनका बिल'युसरी मदरू'रतन
और हमारी रोज़ी में अपनी बारगाह से आसानी और इज़ाफा कर दे!
اللّهُمَّ إنَّكَ تَرَى وَلا تُرَى،
अलाहुमा इन्नका तरा ला वा तुरा
ऐ माबूद! तू देखता है और खुद नज़र नहीं आता
وَأَنْتَ بِالْمَنْظَرِ الأَعْلَى،
व अन्ता बिल-मंज़री अला'ला
की तू मोकामे नज़र से बाला व बुल्न्द्तर है
وَإنَّ إلَيْكَ الرُّجْعَى وَالْمُنْتَهَى،
व इन् इलैका अलर'रुजू-आ वल मुन्तहा
और जाए आख़िर व बाज़'गुज़श्त तेरी ही तरफ़ है
وَإنَّ لَكَ الْمَمَاتَ وَالْمَحْيَا،
व इन्ना लका अल-ममता वल महया
और मौत देना और ज़िंदा करना तेरे ही अखत्यार में है
وَإنَّ لَكَ الآخِرَةَ وَالأُولَى.
व इन्ना लका अल-आखीरता वल उला
और तेरे ही लिये है आगाज़ व अंजाम!
اللّهُمَّ إنَّا نَعُوذُ بِكَ أَنْ نَذِلَّ وَنَخْزَى،
अल्लाहुम्मा इन्ना ना-उज़ु बिका अन नाज़िल्ला व नाख्ज़ा
ऐ माबूद! हम ज़िल्लत व ख्वारी में पड़ने से तेरी पनाहके तालिब हैं
وَأَنْ نَأْتِيَ مَا عَنْهُ تَنْهَى.
व अन नतिया मा अन्हु तन्हा
और वो काम करने से जिससे तुने मना किया है!
اللّهُمَّ إنَّا نَسْأَلُكَ الْجَنَّةَ بِرَحْمَتِكَ،
अलाहुम्मा इन्ना नस'अलुका अल-जन्नता बी'रहमतिका
ऐ माबूद! हम तेरी रहमत के ज़रिये तुझ से जन्नत के तलबगार हैं
وَنَسْتَعِيذُ بِكَ مِنَ النَّارِ
व नस्ता'इज़ु बिका मीना अलं'नारी
और दोज़ख से तेरी पनाह चाहते हैं,
فَأَعِذْنَا مِنْهَا بِقُدْرَتِكَ،
फ़ा'आ इज़्ना मिन्हा बी'क़ुद-रतिका
तू हमें ईस से पनाह दे, अपनी क़ुदरत के साथ
وَنَسْأَلُكَ مِنَ الْحُورِ الْعِينِ
व नस'अलुका मिना अल्हुरी अल'इनी
और हम तुझ से ज़ेबा'तरीन हूरों की ख़्वाहिश करते हैं,
فَارْزُقْنَا بِعِزَّتِكَ،
फ़र'ज़ुक़ना बी'इज्ज़तिका
वो बा'वास्ता अपनी इज़्ज़त के अता फ़रमा
وَاجْعَلْ أَوْسَعَ أَرْزَاقِنَا عِنْدَ كِبَرِ سِنِّنَا،
वज'अल औसा'अ अर'ज़-क़ीना इन्दा किबरी सीन-नीना
और बुढापे के वक़्त हमारी रोज़ी में इज़ाफा फ़रमा,
وَأَحْسَنَ أَعْمَالِنَا عِنْدَ اقْتِرَابِ آجَالِنَا،
व अहसना अ'मालिना इन्दा अक़-तिरबी अजालिना
मौत के वक़्त हमारे अमाल क़ो पसंदीदा क़रार दे
وَأَطِلْ فِي طَاعَتِكَ،
व अतिल फ़ी ता'अतिका
हमें अपनी अता'अत और अपनी नज़दीकी के असबाब में तरक्क़ी अता फ़रमा दे
وَمَا يُقَرِّبُ إلَيْكَ،
व मा यु'क़र-रिबू इल्य्का
अपने यहाँ हिस्से और मंज़ेलत
وَيُحْظِي عِنْدَكَ،
व युह्ज़ी इनदका
की ख़ातिर हमारी उमरें दराज़ कर दे,
وَيُزْلِفُ لَدَيْكَ أَعْمَارَنَا،
व यूज़'लिफ़ु ल'दय्का आ'मरना
aतमाम हालात और तमाम मामलों में
وَأَحْسِنْ فِي جَمِيعِ أَحْوَالِنَا وَأُمُورِنَا مَعْرِفَتَنَا،
व अहसिन फ़ी जमी'ई अहवा'लीना व आ'उमुरिना मारे'फ़त-ना
हमें बेहतरीन मारेफ़त अता फ़रमा,
وَلا تَكِلْنَا إلَى أَحَدٍ مِنْ خَلْقِكَ فَيَمُنَّ عَلَيْنَا،
व ला तकिलना इला अहदीन मिन ख़लक़ीका फ़यामुन्न अलय्ना
हमें अपनी मख्लूक़ में से किसी के हवाले न फ़रमा की वो हम पर एहसान रखे .
وَتَفَضَّلْ عَلَيْنَا بِجَمِيعِ حَوَائِجِنَا لِلدُّنْيَا وَالآخِرَةِ،
व तफ़'ज़ल अल्य्ना बी'जमी'ई हवा'इजिना लिल्द'दनिया वल आखिरती
और दुन्या व आख़ेरत की तमाम ज़रूरतों और हाजतों के लिये हम पर एहसान फ़रमा.
وَابْدَأْ بِآبَائِنَا وَأَبْنَائِنَا
व'अब्दा बी'अबा'ईना व अब्ना'ईना
और हम ने तुझ से जिन चीज़ों का सवाल किया है इनकी अता में हमारे पहले बुज़ुर्गों, हमारी औलाद ,
وَجَمِيعِ إخْوَانِنَا الْمُؤْمِنِينَ
व जमी'ई इख्वा'नीना अल'मुमिनीना
और दीनी भाइयों क़ो भी ;
فِي جَمِيعِ مَا سَأَلْنَاكَ لأنْفُسِنَا
फ़ी जमी'ई मा-सा'अल'नका ली'अन्फुसिना
शामिल फ़रमा
يَا أَرْحَمَ الرَّاحِمِينَ.
या अर्हमर राहेमीना
ऐ सब से ज़्यादा रहम करने वाले!
اللّهُمَّ إنَّا نَسْأَلُكَ بِاسْمِكَ الْعَظِيمِ،
अल्लाहुम्मा इन्ना नस'अलोका ब'अस्मेका अल-अज़ीम
ऐ माबूद! हम सवाली हैं ब'वास्ता तेरे अज़ीम नाम
وَمُلْكِكَ الْقَدِيمِ،
व मुल्किका अल-क़दीमी
और तेरी अज़्ली हुकूमत के
أَنْ تُصَلِّيَ عَلَى مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ
अन तू'सल्ली अला मोहम्मदीन व आले मोहम्मदीन
की तू मोहम्मद (स:अ:व:व) और आले मोहम्मद (अ:स) पर रहमत फ़रमा
وَأَنْ تَغْفِرَ لَنَا الذَّنْبَ الْعَظِيمَ،
व अन त्ग'फ़िर लना अल्ज़'ज़नाबा अल-अज़ीम
और हमारे सारे के सारे गुनाह बख्श दे
إنَّهُ لا يَغْفِرُ الْعَظِيمَ إلاّ الْعَظِيمُ.
इन्नाहु ला'यग़-फ़िरू अल-अज़ीमा इल्ला अल-अज़ीमु
क्योंकि कसीर गुनाहों क़ो बुज़ुर्गतर ज़ात के इलावा कोई नहीं बख्श सकता!
اللّهُمَّ وَهذَا رَجَبٌ الْمُكَرَّمُ
अल्लाहुम्मा व हाज़ा रजब'बुन अल-मुकर'रमु
ऐ माबूद! यह इज़्ज़त वाला महीना रजब है
الَّذِي أَكْرَمْتَنَا بِهِ أَوَّلُ أَشْهُرِ الْحُرُمِ،
अल-लज़ी अकरम'तना बिही अवुलू अश'हरी अल-हुरुमी
जिसे तुने हुरमत वाले महीनों में
أَكْرَمْتَنَا بِهِ مِنْ بَيْنِ الأُمَمِ،
अक्रम्तना बिही मिन बेनी अला उमामी
अव्वालियत देकर हमें सर'फ़राज़ किया,
فَلَكَ الْحَمْدُ يَا ذَا الْجُودِ وَالْكَرَمِ،
फ़'लकल हम्दो या ज़ुल'जूदे वल करमे
तुने इसके ज़रिये हमें दूसरी उम्मतों में मुमताज़ किया
فَأَسْأَلُكَ بِهِ وَبِاسْمِكَ
फ़'अस-अलुका बिही व बिसमिका
बस तेरे ही लिये हम्द है ऐ अता , व बख्शीश करने वाले, बस तेरा सवाली हूँ, ब'वास्ता ईस माह के
الأَعْظَمِ الأَعْظَمِ الأَعْظَمِ،
अल-आ-ज़मी अल-आज़म अल-आज़म
और तेरे बहुत बड़े, बहुत बड़े और बहुत ही बड़े नाम के
الأَجَلِّ الأَكْرَمِ
अल-अजल्ली अल-अकरमी
जो रौशन व बुज़ुर्गी वाला है,
الَّذِي خَلَقْتَهُ فَاسْتَقَرَّ فِي ظِلِّكَ
अल-लज़ी खलक'तहु फ़'असता'क़र-रा फ़ी ज़िल्लिका
इसे तुने खलक किया वो तेरे ही ज़ेरे साया क़ायेम है,
فَلا يَخْرُجُ مِنْكَ إلَى غَيْرِكَ
फ़ला युख'रजो मिनका इला ग़ैरेका
बस वो तेरे यहाँ से दुसरे की तरफ़ नहीं जाता
أَنْ تُصَلِّيَ عَلَى مُحَمَّدٍ وَأَهْلِ بَيْتِهِ الطَّاهِرِينَ،
अनतू'साली अला मोहमादीन व अहली बैतेही अल-ताहेरीना
वास्ता इसके सवाली हूँ की तू हज़रत मोहम्मद (स:अ:व:व) और इनके पाकीज़ा अहलेबैत (अ:स) पर रहमत फ़रमा
وَأَنْ تَجْعَلَنَا مِنَ الْعَامِلِينَ فِيهِ بِطَاعَتِكَ،
व अन'तज'अल्ना मीना अल-आमेलीना फ़िही बे'ता-अतिका
यह की ईस महीने में हमें अपनी फरमाबरदारी में रहनेवाले
وَالآمِلِينَ فِيهِ لِشَفَاعَتِكَ.
वल अमिलिना फ़िही ली'शिफ़ा-अतिका
और अपनी शफ़ा'अत का उम्मीदवार क़रार दिया!
اللّهُمَّ اهْدِنَا إلَى سَوَاءِ السَّبِيلِ،
अलाहुमा अह्दिना इला सवा'ईस सबील
ऐ माबूद! हमें राहे रास्त की हिदायत दे
وَاجْعَلْ مَقِيلَنَا عِنْدَكَ خَيْرَ مَقِيلٍ،
व अज'अल मक़ीलना इनदका खैरा मक़ीलीन
और अपने यहाँ हमार क़याम बेहतरीन जगह पर
فِي ظِلٍّ ظَلِيلٍ،
फ़ी ज़िल'लीन ज़ली'लीन
अपने बुलंद साया
وَمُلْكٍ جَزِيلٍ،
व मुल्किन जज़ीलीन
और अपनी अज़ीम हुकूमत में क़रार दे,
فَإنَّكَ حَسْبُنَا وَنِعْمَ الْوَكِيلُ.
फ़ा इन्नका हस्बुना व नी'मा अल-वकीलो
बस ज़रूर तू हमारे लिये काफ़ी और बेहतरीन सरपरस्त है!
اللّهُمَّ اقْلِبْنَا مُفْلِحِينَ مُنْجِحِينَ
अलाहुमा अक़-लीबना मुफ़'लेहीना मुन्जिहिना
ऐ माबूद! हमें फ़लाह पाने और कामयाबी वाले बना दे
غَيْرَ مَغْضُوبٍ عَلَيْنَا وَلا ضَالّينَ
गैरा मग़'ज़ूबिन अलय्ना वला ज़ा'अ-अ-ल लीना
न हम पर ग़ज़ब किया जाए और न हम गुमराह हों,
بِرَحْمَتِكَ يَا أَرْحَمَ الرَّاحِمِينَ.
बे रहमतिका या अर्हमर राहेमीना
वास्ता है तेरी रहमत का ऐ सब से ज़्यादा रहम करने वाले!
اللّهُمَّ إنِّي أَسْأَلُك بِعَزَائِمِ مَغْفِرَتِكَ،
अल्लाहुमा इन्नी अस-अलुका बे'अज़ा'इमी मग़'फ़िरतिका
ऐ माबूद! मै सवाल करता हूँ तेरी यक़ीनी बख्शीश
وَبِوَاجِبِ رَحْمَتِكَ،
व बी'वाजिबी रहमतिका
और तेरी हतमी रहमत के वास्ते से
السَّلامَةَ مِنْ كُلِّ إثْمٍ،
अस-सलामता मिन कुल्ली इस्मीं
हर गुनाह से बचाए रखने,
وَالْغَنِيمَةَ مِنْ كُلِّ بِرٍّ،
वल ग़नी-मता मिन कुल्ली बिर्रिन
हर नेकी से हिस्सा पाने,
وَالْفَوْزَ بِالْجَنَّةِ،
वल फ़ौजा बिल जन्नती
जन्नत में दाखिले की कामयाबी,
وَالنَّجَاةَ مِنَ النَّارِ.
वन-नजाता मिनन-नारी
और जहन्नम से निजात पाने का!
اللّهُمَّ دَعَاكَ الدَّاعُونَ وَدَعَوْتُكَ،
अलाहुम्मा दा-अका अल्द-दा'ऊना व दा'वतुका
ऐ माबूद! दुआ करने वालों ने तुझ से दुआ की और मै भी दुआ करता हूँ!
وَسَأَلَكَ السَّائِلُونَ وَسَأَلْتُكَ،
व सा'लका अल'सायेलूना व सा'अल्तुका
सवाल किया तुझ से सवाल करने वालों ने, मै भी सवाली हूँ,
وَطَلَبَ إلَيْكَ الطَّالِبُونَ وَطَلَبْتُ إلَيْكَ.
व तलबा इल्य्का अल-तालेबूना व तलाब्तु इल्य्का
तुझ से तलब किया तलब करने वालों ने, मै भी तुझ से तलब करता हूँ,
اللّهُمَّ أَنْتَ الثِّقَةُ وَالرَّجَاءُ،
अलाहुमा अन्ता अल-सीक़-क़तू वल्र'रजा'ऊ
माबूद, तुही मेरा सहारा और उम्मीदगाह है
وَإلَيْكَ مُنْتَهَى الرَّغْبَةِ فِي الدُّعَاءِ.
व इलय्का मुन्तहा अल-रग़'बती फ़िद'दुआ'ई
और दुआ में तेरी ही तरफ़ इन्तेहाई रगबत है,
اللّهُمَّ فَصَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَآلِهِ
अलाहुमा फ़'सल्ली अला मोहम्मदीन व आलिहि
ऐ माबूद! बस तू मोहम्मद (स:अ:व:व) और इनकी आल (अ:स) पर रहमत नाज़िल फ़रमा,
وَاجْعَلِ الْيَقِينَ فِي قَلْبِي،
वज'अली अल-यक़ीना फ़ी क़ल्बी
और मेरे दिल में यक़ीन,
وَالنُّورَ فِي بَصَرِي
वन'नूरा फ़ी बसारी
मेरी आँखों में नूर, 
وَالنَّصِيحَةَ فِي صَدْرِي،
वन नसी'हता फ़ी सदरी
मेरे सीने में नसीहत, 
وَذِكْرَكَ بِاللَّيْلِ وَالنَّهَارِ عَلَى لِسَانِي،
वज़' ज़िक्रका बिल'लैली वन नहारी अला लिसानी
मेरी ज़बान पर दिन रात अपना ज़िक्र व अफ़कार क़रार दे,
وَرِزْقاً وَاسِعاً غَيْرَ مَمْنُونٍ وَلا مَحْظُورٍ فَارْزُقْنِي،
व रिज़'क़न वासे'अन गैरा मम्नूनिन व ला महज़ू'रिन फ़र'ज़ुक़नी
किसी के एहसान और किसी रुकावट के बगैर ज़्यादा रोज़ी दे,
وَبَارِكْ لِي فِيمَا رَزَقْتَنِي،
व बारीक ली फ़ीमा रज़क़तनी
बस जो रिज्क़ तुने मुझे दिया
وَاجْعَلْ غِنَايَ فِي نَفْسِي،
वज'अल ग़ीना'ई फ़ी नफ्सी
इसमें मेरे लिये बरकत अता कर
وَرَغْبَتِي فِيمَا عِنْدَكَ
व र-ग़-बती फ़ीमा इनदका
और मेरे दिल क़ो सैर फ़मा दे,
بِرَحْمَتِكَ يَا أَرْحَمَ الرَّاحِمِينَ.
बी'रहमतिका या अर्हमर राहेमीन
वास्ता तेरी रहमत का ऐ सब से ज़्यादा रहम करनेवाले
फिर सजदे में जाएँ और ईस दुआ क़ो 100 मर्तबा पढ़ें:
الْحَمْدُ لِلّهِ الَّذِي هَدَانَا لِمَعْرِفَتِهِ،
अलहम्दु लील'लाहिल लज़ी हदाना ले'मारे'फ़तेही
हम्द है ईस ख़ुदा के लिये जिसने अपनी मारेफ़त  की,
وَخَصَّنَا بِوِلايَتِهِ،
व ख़ास'सना बी'विलायातेही 
अपनी सर'परस्ती में ख़ास किया ,
وَوَفَّقَنَا لِطَاعَتِهِ،
व वफ़'फ़क्ना ली'ता-अतेही
और अपनी इता'अत की तौफीक़ दी.
شُكْراً شُكْراً.
शुक्रण शुक्रण
शुक्र है इसका बहुत बहुत शुक्र.
जब सजदा पूरा हो जाए तो अपना सर उठायें और पढ़ें :
اللّهُمَّ إنِّي قَصَدْتُكَ بِحَاجَتِي،
अलाहुम्मा इन्नी क़सद'तुका बे'हाजती
ऐ माबूद! मै अपनी हजात लिये तेरी तरफ़ आया और अपने सवाल में तुझ पर भरोसा किया है, मै अपने इमामों (अ:स) और सरदारों के ज़रिया तेरी तरफ़ मुतवज्जाह हुआ! ऐ माबूद! हमें इनके मुक़ाम तक पहुंचा दे, हमें इनकी रीफ़ाक़त अता कर, और हमें इनके साथ जन्नत में दाख़िल फ़रमा, वास्ता तेरी रहमत का ऐ सब से ज़्यादा रहम करने वाले
وَاعْتَمَدْتُ عَلَيْكَ بِمَسْأَلَتِي،
व-अ तमाद्तु इलैका बे'मस'अलाती
وَتَوَجَّهْتُ إلَيْكَ بِأَئِمَّتِي وَسَادَتِي.
व तवज'जह्तु इलैका बे'अ-इम्माती व सा'दती
اللّهُمَّ انْفَعْنَا بِحُبِّهِمْ،
अलाहुम्मा अनफ़ा'अना बे'हुबबे'हिम
وَأَوْرِدْنَا مَوْرِدَهُمْ،
व औ'रिदना मौ'रादाहुम
وَارْزُقْنَا مُرَافَقَتَهُمْ،
वर'ज़ुक़ना मोरा'फ़क़'तहुम
وَأَدْخِلْنَا الْجَنَّةَ فِي زُمْرَتِهِمْ
व अद्खिलना अल जन्नता फ़ी ज़ूम'रतिहीम
بِرَحْمَتِكَ يَا أَرْحَمَ الرَّاحِمِينَ.
बे'रहमतिका या अर्हमर राहेमीन



































































































































































































































































































































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