इत्तेहादे बैनुल मुसलेमीन अस्रे हाज़िर की सबसे बड़ी और अहम ज़रूरत है।

जिससे कोई भी साहिबे अक़्ल व फ़हम इंकार नही कर सकता। तरक़्क़ी के इस दौर में जहाँ दुनिया चाँद सितारों पर कमंदें डाल के उसेपूरी तरह से तसख़ीर क...

safina1जिससे कोई भी साहिबे अक़्ल व फ़हम इंकार नही कर सकता। तरक़्क़ी के इस दौर में जहाँ दुनिया चाँद सितारों पर कमंदें डाल के उसेपूरी तरह से तसख़ीर करने के मंसूबे बना रही है, बाज़ तंग नज़र और कोताह फ़िक्र मुसलमान उसी फ़ितना व फ़साद में ग़र्क़ रह कर दूसरे इंसानो के इरतेक़ा की राह में रख़ना अन्दाज़ी करने में मशग़ूल हैं और मुसलसल उनकी रेशा दवानियाँ ज़ोर पकड़ती जा रही हैं। मुख़्तलिफ़ हीलों बहानों और हरबों के इस्तेमाल से वह पुराने हथियारों की रोग़न माला कर रहे हैं ताकि सीधे साधे, सादा लौह मुसलमानों को राहे हक़, राहे मुस्तक़ीम और राहे निजात से दूर रख सकें। उनके पास नये दलाएल और एतिराज़ तो हैं नही, लिहाज़ा उनही कोहना और फ़रसूदा बातों को नये लिबास से आरास्ता करके लोगों की बे इल्तेफ़ाती और बे तवज्जोही से फ़ायदा उठाने की फ़िक्र में है।

ज़रूरत इस बात की है कि जैसे जैसे फ़ितना परदाज़ों की दसिसा कारियों में तुन्दी और तेज़ी आ रही है वैसे वैसे हक़ परस्तों को अपनी रफ़्तार बढ़ानी होगी। उन्हे भी ख़ुद को हर तरह से आरास्ता करना होगा ताकि वक़्ते ज़रूरत मुक़ाबले में उन्हे नाकामी का सामना न करना पड़े।

आज सिर्फ़ बाज़ नासमझ और नादान मुसलमान ही नही बल्कि दुनिया की बड़ी बड़ी हुकुमतें, ताक़तें, शख़्सियतें इस बात के दरपै हैं कि मुसलमानों में किसी तरह से इत्तेफ़ाक़ और हमदिली की फ़िज़ा हमवार न होने पाये। इस लिये कि ये उनके मंसूबों को अमली जामा पहनने से रोकने का बाइस होगा। इसी लिये वह इस अम्र के तहक़्क़ुक़ के लिये जान व माल या साज़िश व फ़ितना, किसी भी तरह के हरबे इस्तेमाल करने से बाज़ नही आते।

और मुसलमानों की ये सादा लौही है कि वह उन्हे अपना दोस्त व हमदम समझते हैं जिनसे दोस्ती के लिये उन्हे क़ुरआने मजीद और अक़वाले मासूमीन (अ) में बार बार रोका गया और मना किया गया है।

बाज़ लोग ये ख़्याल करते हैं कि इत्तेहाद बैनुल मुसलेमीन का मतलब ये है कि हम अपने अक़ाएद व अहकाम से दस्त बरदार हो कर उनके मसलक व मज़हब को अपना ले या क़बूल कर लें और उनके मज़हब के मुताबिक़ आमाल बजा लाने लगें। ऐसा हरगिज़ नही है और अगर कोई इसका ये मतलब समझता है तो ये उसका ख़्याले ख़ाम है और कुछ नही।

बाज़ हज़रात ये भी कहते हैं कि हम तो इत्तेहाद करने के लिये राज़ी हैं और दिल से इत्तेहाद करना चाहते हैं मगर हमारे मुख़ालिफ़ जब इस अम्र में कोई दिलचस्पी नही लेते या हमारी तरह हमारे ख़िलाफ़ साज़िशों से हाथ नही खींचते तो हमें भी क्या ज़रूरत है कि हम उन्हे इसकी दावत दें और इस पर इसरार करें ?

तो मैं ऐसे लोगों और उन भाईयों से ये कहना चाहूँगा कि इसके लिये हमें भी पैग़म्बरे इस्लाम (स) और मासूमीन (अ) की सीरत से दर्स लेना चाहिये और उनकी तास्सी करना चाहिये। पैग़म्बरे इस्लाम (स) को मालूम है कि ये काफ़िर ईमान लाने वाले नही हैं मगर फिर भी आप (स) बार बार दावते तौहीद देते हैं ताकि उनके दिल अल्लाह के दीन की तरफ़ माएल हो जायें।

आँ हज़रत (स) के वह ख़ुतूत जो आपने अपने ज़माने के बादशाहों को तहरीर फ़रमाये हैं वह भी इसी बात का सुबूत हैं कि हक़ परस्तों को इबलाग़ में पहल और सबक़त करनी चाहिये और इस बात से मायूस नही होना चाहिये कि नतीजा क्या होगा ? पैग़म्बरे इस्लाम (स) की रेहलत के बाद एक तवील मुद्दत तक मौला ए काऍनात (अ) का सुकूत करना इस बात की अलामत थी कि इस्लाम का शीराज़ा बिखरने से बच जाये। जैसे भी हो अस्ले इस्लाम पर आँच न आने पाये आँ हज़रत (स) की मेहनत ज़ाया न होने पाये। क्या आज के मुसलमान इस्लामी फ़िरक़ो के आपसी शीराज़े को बिखरने से बचाने के लिये इतना भी नही कर सकते कि एक दूसरे की तरफ़ दोस्ती का हाथ बढ़ायें और तमाम इस्लामी फ़िरक़ व मज़ाहिब अपने इख़्तेलाफ़ात पर सुकूत अख़्तियार करके अमन व अमान के साथ मुत्तहिद हो जाये ताकि अस्ले इस्लाम बदनाम न हो।

क्या आज हम ऐसा नही कर सकते कि तंग नज़र व कोताह फ़िक्र मुसलमानों को जिनकी फ़िक्रें मुन्जमिद हैं या कर दी गयी हैं, आगे बढ़ कर उन्हे अपना भाई होने का यक़ीन दिलायें, वह हमारे भाई हैं, ख़ुद से क़रीब लायें, तअस्सुब की ऐनक को किनारे करें और मंतिक़ी गुफ़्तुगू और वाज़ेह दलाएल से एक दूसरे के मज़हब को समझें। मेहर व मोहब्बत से रिफ़ाक़त की फ़िज़ा ईजाद करें। ठंढे दिल व दिमाग़ और निहायत सब्र व हौसले से उनकी बातें, उनकी गुफ़्तुगू और उनकी दलीलें सुनें उसका मुनासिब और नर्मी से जवाब दें।

अगर वह “बदा” “तक़य्या” “मुता” “तहरीफ़े क़ुरआन” वग़ैरा पर एतिराज़ करते हैं, उन्हे बुरा समझते हैं उनके हवाले से हमारे क़ुलूब को मजरूह करते हैं, हम पर तोहमत लगाते हैं तो उसका इलाज ये है कि हम उन्हें धुतकार कर भगा दें, नही बल्कि उसका इलाज ये है कि हम उन्हे बतायें कि भाई जैसा आप समझ रहें हैं वैसा नही है। हक़ीक़त कुछ और है।

वह हम पर उन अक़ाएद की वजह से इल्ज़ाम व इत्तेहाम लगाते हैं मगर क्यों ? इसलिये कि उन्होनें उसे समझा नही है, हम में से किसी ने उन्हे बताया नही है वह अपने ज़ामे नाक़िस पर फ़ैसला कर लेते हैं कि ये सब बातिल है, मगर जब मज़बूत और मुतक़न दलाएल से सामना होता है तो उनमें से बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो क़ुबूल करते हैं और हक़ परस्तों के क़ाफ़िले के सफ़ीर बन जाते हैं।

जब सारे इस्लामी फ़िर्क़े एक जगह पर जमा होगें और ख़ुशगवार और दोस्ताना फ़िज़ा में मुबाहिसा और मुनाज़िरा करेगें तो यक़ीनन उनके ऊपर बहुत सी बातें आशकार होगीं, जिन्हे वह उससे पहले तक नही जानते थे, ये अम्र उनकी फ़िक्र व नज़र में तबदीली या नर्मी व शिद्दत का सबब होगी। बहुत मुम्किन है कि नज़रियों का तसादुम नाब और ख़ालिस इस्लाम का चेहरा लोगों के सामने पेश कर दे।

वह इस्लाम जिसे आज से चौदह सौ साल क़ब्ल आँ हज़रत (स) ने पेश किया था तो दुनिया ने देखा कि ख़ूख़ाँर दरिन्दा सिफ़त अरब, जो इस्लाम से पहले दौलत, बदकारी, ज़ुल्म व सितम और क़त्ले आम का हरीस था। बाप दौलत बचाने के लिये अपने हाथों बेटी का गली दबा कर फ़ख्र से गर्दन उठाता था। एक क़बीले का ऊँट दूसरे क़बीले के सरदार के हौज़ में एक घूँट पानी पी लेता था तो चालीस साल तक इंसानी ख़ून बरसता रहता था मगर तशफ़्फ़ी न होती। क़त्ल पर सुकून न था क़ातिल मक़तूल का ख़ून पीता था। सीना चाक करके दिल व जिगर कच्चा चबाता था। आँख, कान, नाक, हाथ, पैर काट कर हार बना कर पहनता था और ख़ुश होता था और देखने वाले उसकी मदह व ताज़ीम करते थे। लेकिन यही अरब मुसलमान होकर इंसान बन जाता है। इस्लाम का नबी उजड़े मोहाजिर को मदीने के बसे हुए अंसारी का भाई बनाते हैं तो दौलत का पुजारी अरब, जो दौलत के लिये बेटी को ज़िन्दा दफ़न करता था, आज इतना बदला हुआ नज़र आता है कि मालदार अंसारी लुटे हुए मोहाजिर को अपनी आधी जायदाद की पेशकश करता है। सोचिये इस्लाम कितना बड़ा इंकेलाब लाया था। इस्लाम ने हुकूमत के बजाय इंसानी किरदार की तामीर की थी, इस्लाम का तरीक़े कार बुराई मिटाने में बुरे को मिटाना न था बल्कि बुरे को अछ्छा बना कर बुराई मिटाई जा रही थी लिहाज़ा तल्वार की ज़रूरत न थी, सीरत की ज़रूरत थी और इस्लाम यूँ इन्क़िलाब सा ला रहा था कि दिमाग़ वही थे मगर अंदाज़े फ़िक्र बदल गया था। आँखे वही थी मगर अंदाज़ बदल गया था। ज़बान वही थी मगर गुफ़्तार बदल गयी थी। क़दम वही थे मगर गफ़्तार बदल गयी थी। दिल वही थे मगर जज़्बात व मोहब्बत व नफ़रत के सोते और धारे बदल गये थे। इस्लाम ने इंसान को इंसान के बराबर कर दिया था ।

क्या आज के मुसलमान के दरमियान वही उख़ुव्वत और बिरादरी का रिश्ता क़ायम नही हो सकता जो आँ हज़रत (स) ने मुसलमानों के दरमियान क़ायम किया था ? क्या इस राह की शुरुआत इत्तेहाद और वहदत व हमदिली की दावत के ज़रिये मुम्किन है? या इत्तेहाद के अलावा कोई और रास्ता है जो इस मक़सद की तकमील में मोआविन साबित हो सकता हो। उसके ज़रिये से दावत दी जाये।?

लिहाज़ा मालूम हुआ कि आज भी इस दुखी दुनिया का इलाज इस्लाम ही है और सिर्फ़ मोहम्मद (स) का इस्लाम जिसने कल दरिन्दा सिफ़त अरब को आदमी बनाया था आज वह ख़ूँख़ार यूरोप व अमरीका को आदमी बना सकता है मगर कायनात का सबसे अज़ीम नुक़सान ये है कि वह इस्लाम आज 73 फ़िरक़ों में बटा हुआ है। इस्लाम दूसरों के दर्द का दरमान कैसे बने जो मुसलमानो का दर्दे सर बना हुआ है।

अफ़सोस मुसलमान कल के जाहिल अरब और आज के ख़ूँख़ार यूरोप और अमरीका की तरह दरिन्दा सिफ़त है इस पर फ़रेब ये है कि इस्लाम की तारीख़ में एक फ़िरक़े का इस्लाम दूसरे फ़िरक़े के इस्लाम के लिये ख़ूँख़ार दरिन्दा सिफ़त नज़र आ रहा है। लिहाज़ा आज अगर ऐसी कोई कोशिश की जाती है जिससे वह हक़ीक़ी और इस्लामी मालूम हो सके जो आलमे इंसानियत का निजात दहिन्दा था और है और अपने निजात दहिन्दा होने का कामयाब इम्तेहान अरब के अहदे जाहेलियत में दे चुका है तो ऐसी कोशिश तख़फ़ीफ़े असलहा की क़ाबिले क़द्र कोशिश से हज़ार गुना ज़्यादा ममदूह है औऱ फ़लाहे इंसानियत के लिये इस ज़हरीले अहद में तिरयाक़ की हैसियत रखती है ।

मगर ये इस्लाम मालूम न होगा जब तक इस्लाम के तमाम फ़िरक़ों की छान फटक न होगी। तहक़ीक़े मज़हब की इस मुफ़ीद और तिरयाक़ी कोशिश को जब “रवादारी” की सूली पर फाँसी दी जाती है और सच्चे इस्लाम को उजागर करने को जब “फ़िरक़ा वारियत” फैलाने का मज़मूम इल्ज़ाम दिया जाता है तो सिसकती इंसानियत की आहें बुलंद होती हैं मगर कौन दिल है जो इन आहों को सुनें। आह इंसानियत जो इंसानो के हाथों ज़िन्दा गोर है। काश तेरा हमदर्द जल्द ज़ुहूर करता।

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