नमाज़ पढ़ने की जगह

नमाज़ पढ़ने की जगह की सात शर्तें हैं: पहली शर्त यह है कि वह मुबाह हो। 875. जो इंसान ग़स्बी जगह पर (चाहे वह क़ालीन, तख़्त और इसी तरह...


नमाज़ पढ़ने की जगह की सात शर्तें हैं:

पहली शर्त यह है कि वह मुबाह हो।
875. जो इंसान ग़स्बी जगह पर (चाहे वह क़ालीन, तख़्त और इसी तरह की दूसरी चीज़ें ही हों) नमाज़ पढ़ रहा हो, एहतियाते लाज़िम की बिना पर उसकी नमाज़ बातिल है। लेकिन ग़स्बी छत के नीचे और ग़स्बी ख़ैमे में नमाज़ पढ़ने में कोई हरज नही है।
876.जिस जगह का मुनाफ़ा किसी और की मिल्कियत हो वहाँ पर मुनाफ़े के मालिक की इजाज़त के बग़ैर नमाज़ पढ़ना ग़स्बी जगह पर नमाज़ पढ़ने के हुक्म में है। मसलन अगर किराये के मकान में, मालिके मकान या कोई दूसरा इंसान उस इंसान की इजाज़त के बग़ैर जिसने वह मकान किराये पर लिया है, नमाज़ पढ़े तो एहतियात की बिना पर उसकी नमाज़ बातिल है। इसी तरह अगर मरने वाले ने वसीयत की हो कि उसके माल का तीसरा हिस्सा फ़ुलाँ काम पर ख़र्च किया जाये तो जब तक तीसरे हिस्से को जुदा न किया जाये, उसकी जायदाद में नमाज़ नही पढ़ी जा सकती।
877.अगर कोई इंसान मस्जिद में बैठा हो और दूसरा इंसान उसे बाहर निकाल कर उसकी जगह क़ब्ज़ा ले और उस पर नमाज़ पढ़े तो उसकी नमाज़ सही है, अगरचे उसने गुनाह किया है।
878. अगर कोई इंसान किसी ऐसी जगह नमाज़ पढ़े, जिसके ग़स्बी होने का उसे इल्म न हो और नमाज़ के बाद उसे पता चले या ऐसी जगह नमाज़ पढ़े जिसके ग़स्बी होने को वह भूल गया हो और नमाज़ के बाद उसे याद आये तो उसकी नमाज़ सही है। लेकिन अगर कोई ऐसा इंसान जिसने वह जगह ख़ुद ग़स्ब की हो और वह भूल गया हो, वहाँ नमाज़ पढ़े तो उसकी नमाज़ एहतियात की बिना पर बातिल है।
879. अगर कोई इंसान जानता हो कि यह जगह ग़स्बी है और इसको इस्तेमाल करना हराम है, लेकिन उसे यह इल्म न हो कि ग़स्बी जगह पर नमाज़ पढ़ने में इशकाल है और वह, वहाँ नमाज़ पढ़े तो एहतियात की बिना पर उसकी नमाज़ बातिल है।
880. अगर कोई इंसान वाजिब नमाज़ सवारी की हालत में पढ़ने पर मजबूर हो और सवारी का जानवर या उसकी ज़ीन या नअल ग़स्बी हो तो उसकी नमाज़ बातिल है और अगर वह इंसान उस जानवर पर सवारी की हालत में मुस्तहब नमाज़ पढ़ना चाहे तो उसका भी यही हुक्म है।
881. अगर कोई इंसान किसी जायदाद में शरीक हो और उसका हिस्सा जुदा न हुआ हो तो वह दूसरे हिस्सेदारों की इजाज़त के बग़ैर न उस जायदाद को काम में ला सकता है और न ही उस पर नमाज़ पढ़ सकता है।
882. अगर कोई इंसान एक ऐसी रक़्म से जायदाद ख़रीदे जिसका ख़ुम्स उसने अदा न किया हो तो उसके लिए उस जायदाद को इस्तेमाल करना हराम है और उसमें उसकी नमाज़ जाइज़ नही है।
883. अगर किसी जगह का मालिक ज़बान से नमाज़ पढ़ने की इजाज़त दे दे और इंसान को इल्म हो कि वह दिल से राज़ी नही है तो उस जगह पर नमाज़ पढ़ना जाइज़ नही है और अगर ज़बान से इजाज़त न दे, लेकिन इंसान को यक़ीन हो कि वह दिल से राजी है तो नमाज़ पढ़ना जाइज़ है।
884. जिस मुतवफ़्फ़ी (मरने वाले) ने ज़कात और उस जैसे दूसरे माली वाजिबात अदा न किये हों तो उसकी जायदाद में तसर्रुफ़ करना, अगर वाजिबात की अदायगी में मानेअ न हो, मसलन उसके घर में वरिसों की इजाज़त से नमाज़ पढ़ी जाये तो इशकाल नही है। इसी तरह अगर कोई इंसान वह रक़्म जो मुतवफ़्फ़ी के ज़िम्मे हो अदा कर दे या यह ज़मानत दे कि वह अदा कर देगा तो उसकी जायदाद में तसर्रुफ़ करने में (यानी उसकी जायदाद को इस्तेमाल करने में) कोई हरज नही है।
885. अगर मुतवफ़्फ़ी (मरने वाला) लोगों का मक़रूज़ हो तो उसकी जायदाद में तसर्रुफ़ करना उस मुर्दे की जायदाद में तसर्रुफ़ के हुक्म में है जिसने ज़कात और उसके मानिंद दूसरे माली वाजिबात अदा न किये हों।
886. अगर मुतवफ़्फी के ज़िम्मे क़र्ज़ न हो लेकिन उसके कुछ वारिस कमसिन या मजनून या ग़ैर हाज़िर हों तो उनके वली की इजाज़त के बग़ैर उसकी जायदाद में तसर्रुफ़ हराम है और उसमें नमाज़ जाइज़ नही है।
887. किसी की जायदाद में नमाज़ पढ़ना उस सूरत में जाइज़ है जबकि उसका मालिक सरीहन इजाज़त दे या कोई ऐसी बात कहे, जिससे यह मालूम हो कि उसने नमाज़ पढ़ने की इजाज़त दे दी है। मसलन जैसे वह किसी को इजाज़त दे कि मेरी जगह पर बैठो और सोओ इससे समझा जा सकता है कि उसने नमाज़ पढ़ने की भी इजाज़त दे दी है। या इंसान को मालिक के राज़ी होने का दूसरे तरीक़ों से इतमीनान हो।
888. वसीअ व अरीज़ () ज़मीन में नमाज़ पढ़ना जाइज़ है चाहे उसका मालिक कमसिन या मजनून हो या वहाँ नमाज़ पढ़ने पर राज़ी न हो। इसी तरह जो ज़मीनें दरो दीवार के ज़रिये घिरी न हो उनमे भी मालिक की इजाज़त के बग़ैर नमाज़ पढ़ सकते हैं। लेकिन अगर मालिक कमसिन या मजनून हो या उसके राज़ी न होने का गुमान हो तो एहतियाते लाज़िम यह है कि वहाँ नमाज़ न पढ़ी जाये।
दूसरी शर्त
889. ज़रूरी है कि वाजिब नमाज़ों में नमाज़ी की जगह ऐसी न हो जो हिलने की वजह से नमाज़ी के खड़े होने या रूकूअ और सजदे करने में रुकावट बने, बल्कि एहतियाते लाज़िम की बिना पर उसके बदन के साकिन रहने में भी रुकावट न बने और अगर वक़्त की तंगी या किसी और वजह से ऐसी जगह, मसलन बस, ट्रक, कश्ती या रेलगाड़ी में नमाज़ पढ़े तो जिस क़दर मुमकिन हो बदन के ठहराव और क़िब्ले की सिम्त का ख़्याल रखे और अगर वह क़िब्ले की तरफ़ से से किसी दूसरी तरफ़ मुड़ जाए तो अपना मुँह क़िब्ले की तरफ़ मोड़ दे।
890. जब गाड़ी, कश्ती या रेलगाड़ी वग़ैरह खड़ी हुई हो तो उनमें नमाज़ पढ़ने में कोई हरज नही है। इसी तरह चलती हुई गाड़ी, रेल और किश्ती में नमाज़ पढ़ने में भी कोई हरज नही है, अगर वह इतनी न हिलजुल रही हो कि नमाज़ी के बदन के ठहराव में रुकावट बनें।
891. गेहूँ, जौ और उन जैसे दूसरी अनाज के ढेर पर, जो हिले जुले बग़ैर नही रह सकते, नमाज़ बातिल है। (बोरियों के ढेर मुराद नही हैं।)
तीसरी शर्त
ज़रूरी है कि इंसान ऐसी जगह नमाज़ पढ़े जहाँ नमाज़ पूरी पढ़ लेने का एहतेमाल हो। ऐसी जगह नमाज़ पढ़ना सही नही है जिसके बारे में उसे यक़ीन हो कि मसलन हवा और बारिश या भीड़ भाड़ की वजह से वहाँ पूरी नमाज़ न पढ सकेगा, चाहे वह इत्तेफ़ाक़ से पूरी पढ़ ले।
892. अगर कोई इंसान ऐसी जगह नमाज़ पढ़े, जहाँ ठहरना हराम हो( मसलन किसी ऐसी छत के नीचे जो अंक़रीब गिरने वाली हो) तो वह गुनाहगार तो होगा लेकिन उसकी नमाज़ सही है।
893. किसी ऐसी चीज़ पर नमाज़ पढ़ना सही नही है जिस पर खड़ा होना या बैठना हराम हो मसलन क़ालीन के ऐसे हिस्से पर जहाँ अल्लाह तआला का नाम लिखा हो। चूँकि यह क़स्दे क़ुरबत में मानेअ है इसलिए (नमाज़ पढ़ना) सही नही है।
चौथी शर्त
जिस जगह इंसान नमाज़ पढ़े उसकी छत इतनी नीची न हो कि सीधा खड़ा न हो सके और न ही इतनी कम हो कि रुकूअ और सजदे न किये जा सकें।
894. अगर कोई इंसान ऐसी जगह नमाज़ पढ़ने पर मजबूर हो जहाँ बिल्कुल सीधा खड़ा होना मुमकिन न हो तो उसके लिए ज़रूरी है कि बैठ कर नमाज़ पढ़े और अगर रूकूअ और सजदे अदा करने मुमकिन न हो तो उनके लिए सर से इशारा करे।
895. ज़रूरी है कि पैगम्बरे अकरम (स.) और आईम्मा ए अहलेबैत (अ.) की क़ब्र के आगे (अगर उनकी बेहुरमती होती हो तो) नमाज़ न पढ़े। इसके अलावा किसी और सूरत में कोई हरज नही है।
पाँचवी शर्त
अगर नमाज़ पढ़ने की जगह नजिस हो तो इतनी गीली न होनी चाहिए कि उसकी रुतूबत नमाज़ पढ़ने वाले के बदन या लिबास तक पहुँचे, लेकिन अगर सजदे में पेशानी रखने की जगह नजिस हो तो चाहे वह ख़ुश्क भी हो नमाज़ बातिल है और एहतियाते मुस्तहब यह है कि नमाज़ पढ़ने की जगह हरगिज़ नजिस न हो।
छटी शर्त
एहतियाते लाज़िम की बिना पर ज़रूरी है कि औरत मर्द के पीछे खड़ी हो और कम से कम इतने फ़ासले पर हो कि सजदा की हालत में उसके सजदा करने की जगह मर्द के घुटनों के बराबर हो।
896. अगर कोई औरत मर्द के बराबर या आगे खड़ी हो और दोनों एक साथ नमाज़ पढ़ने लगे तो ज़रूरी है कि दोबारा नमाज़ पढ़े। यही हुक्म उस सूरत में भी है जब कोई एक दूसरे से पहले नमाज़ के लिए खड़ा हो जाये।
897. अगर मर्द और औरत एक दूसरे के बराबर खड़ें हों या औरत आगे ख़ड़ी हो और दोनो नमाज़ पढ़ रहे हों लेकिन दोनों के बीच दीवार या पर्दा या कोई और ऐसी चीज़ हो कि एक दूसरे को न देख सकें या उनके बीच दस हाथ से ज़्यादा फ़ासला हो तो दोनों की नमाज़ सही है।
सातवीं शर्त
नमाज़ पढ़ने वाले की पेशानी रखने की जगह, घुटने और पाँव की उंगलीयाँ रखने की जगह से, चार मिली हुई उंगलीयों से ज़्यादा ऊँची या नीची न हो। इस मसले की तफ़सील सजदे के अहकाम में आयेगी।
898. ना महरम मर्द और औरत का ऐसी जगह पर जमा होना, जहाँ गुनाह में मुब्तला होने का एहतेमाल हो, हराम है। एहतियाते मुस्तहब यह है कि ऐसी जगह पर नमाज़ भी न पढ़ी जाये।
899. जिस जगह पर सितार बजाया जाता हो और उस जैसी दूसरी चीज़ें इस्तेमाल की जाती हों, वहाँ नमाज़ पढ़ना बातिल नही है, जबकि उनका सुनना और इस्तेमाल करना गुनाह है।
900. एहतियाते वाजिब यह है कि इख़्तियार की हालत में ख़ान –ए- काबा के अंदर और उसकी छत के ऊपर वाजिब नमाज़ न पढ़ी जाए। लेकिन मजबूरी की हालत में कोई हरज नही है।
901. ख़ान –ए- काबा के अंदर और उसकी छत के ऊपर नाफ़ेला नमाज़ें पढ़ने में कोई हरज नही है, बल्कि मुस्तहब है कि ख़ान –ए- काबा के अँदर हर रुक्न के मुक़ाबिल दो रकअत नमाज़ पढ़ी जाए।
वह मक़ामात जहाँ नमाज़ पढ़ना मुस्तहब है।
902. इस्लाम की मुक़द्दस शरीयत में बहुत ताकीद की गयी है कि नमाज़ मस्जिद में पढ़ी जाए। दुनिया भर की सारी मस्जिदों में सबसे बेहतर मस्जिदुल हराम और उसके बाद मस्जिदुन नबी(स.) है। उसके बाद मस्जिदे कूफ़ा और उसके बाद मस्जिदे बैतुल मुक़द्दस का दर्जा है। उसके बाद शहर की जामा मस्जिद और उसके बाद मोहल्ले की मस्जिद और उसके बाद बाज़ार की मस्जिद का नम्बर आता है।
903. औरतों के लिए बेहतर है कि नमाज़ ऐसी जगह पढ़ें जो नामहरम से महफ़ूज़ होने के लिहाज़ से दूसरी जगहों से बेहतर हो, चाहे वह जगह मकान या मस्जिद या कोई और जगह हो।
904. आईम्मा –ए- अहलेबैत (अ.) के हरमों में नमाज़ पढ़ना मुस्तहब है, बल्कि मस्जिद में नमाज़ पढ़ने से बेहतर है और रिवायत में है कि हज़रत अमीरूल मोमीनीन (अ.) के हरमे पाक में नमाज़ पढ़ना दो लाख नमाज़ों के बराबर है।
905. मस्जिद में ज़्यादा जाना और उस मस्जिद में जाना जो आबाद न हो (यानी जहाँ लोग बहुत कम नमाज़ पढ़ने आते हों।) मुस्तहब है। अगर कोई इंसान मस्जिद के पड़ोस में रहता हो और कोई उज़्र भी न रखता हो तो उसके लिए मस्जिद के अलावा किसी और जगह नमाज़ पढ़ना मकरूह है।
906. जो इंसान मस्जिद में न आता हो, मुस्तहब है कि इंसान उसके साथ मिलकर खाना न खाए, अपने कामों में उससे मशवेरा न करे, उसके पड़ोस में न रहे और उसके यहाँ शादी ब्याह भी न करे। (यानी उसका सोशल बायकाट करे)
वह जगहें जहाँ नमाज़ पढ़ना मकरूह है।
907. कुछ जगहों पर नमाज़ पढ़ना मकरूह है:
1- हम्माम
2- खारी ज़मीन
3- किसी इंसान के मुक़ाबिल
4- उस दरवाज़े के मुक़ाबिल जो खुला हो।
5- सड़कों पर, गली और कूचे में इस शर्त के साथ कि गुज़रने वालों के लिए बाईसे ज़हमत न हो और अगर उन्हें ज़हमत हो तो उनके रास्ते में रुकावट डालना हराम है।
6- आग और चिराग़ के मुक़ाबिल।
7- बावर्ची ख़ाने में हर उस जगह जहाँ आग की भट्टी हो।
8- कुएँ के और ऐसे गढ़े के मुक़ाबिल जिसमें पेशाब किया जाता हो।
9- जानवर की तस्वीर या मुजस्समे के सामने, मगर यह कि उसे ढाँप दिया जाये।
10- ऐसे कमरे में जिसमें जुनुब इंसान मौजूद हो।
11- जिस जगह फ़ोटो हो चाहे वह नमाज़ पढ़ने वाले के सामने न हो।
12- क़ब्र के मुक़ाबिल।
13- क़ब्र के ऊपर।
14- दो क़ब्रो के बीच ।
15- क़ब्रिस्तान में।
908. अगर कोई इंसान लोगों की आने जाने के रास्ते पर नमाज़ पढ़ रहा हो या कोई और इंसान उसके सामने खड़ा हो तो नमाज़ी के लिए मुस्तहब है कि अपने सामने कोई चीज़ रख ले और अगर वह चीज़ लकड़ी या रस्सी हो तो भी काफ़ी है।
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