क़ुरआन नहजुल बलाग़ा के आईने में

लेख:मुहम्मद फ़ूलादी अनुवाद : सैयद नजमुल हसन नक़वी (यह मक़ाला हज़रत आयतुल्लाह मिस्बाह यज़दी और "क़ुरआन और आईन ए नहजुल बलाग़ा ”से एक इन्...


लेख:मुहम्मद फ़ूलादी

अनुवाद : सैयद नजमुल हसन नक़वी

(यह मक़ाला हज़रत आयतुल्लाह मिस्बाह यज़दी और "क़ुरआन और आईन ए नहजुल बलाग़ा ”से एक इन्तेख़ाब है)
(1) क़ुरआने करीम की अहमियत व मौक़ेईयत:
इस वक्त क़ुरआन करीम ही एक आसमानी किताब है जो इन्सान की दस्तरस में है।
नहजुल बलाग़ा में बीस (20)से ज़ियादा ख़ुतबात हैं जिन में क़ुरआने मजीद का तआर्रुफ़ और उस की अहमियत व मौक़ेईयत बयान हुई है बाज़ औक़ात आधे से ज़्यादा खु़त्बे में क़ुरआने करीम की अहमियत, मुसलमानों की ज़िन्दगी में इस की मौक़ेईयत और उस के मुक़ाबिल मुसलमानों के फ़राइज़ बयान हुए हैं। यहां हम सिर्फ़ बाज़ जुमलों को तौज़ी व तशरीह पर इकतेफ़ा करेंगे।
अमीरुल मोमिनीन (अ) ख़ुत्बा 133 में इर्शाद फ़रमाते हैं (व किताबल्लाहे बेना अज़्हरोकुम नातिक़ ला याई लिसानहो) तर्जुमा : और अल्लाह की किताब तुम्हारी दस्तरस में है जो क़ुव्वते गोयाई रखती है और उस की ज़बान गुंग नहीं।
क़ुरआन आसमानी किताबों तौरात व इन्जील व ज़बूर के बरखिलाफ़ तुम्हारी दस्तरस में है। यह बात तवज्जोह तलब है उम्मतों ख़ुसुसन यहूद व बनी इसराईल के अवाम के पास न थी बल्कि इस के कुछ नुस्ख़े उलामा ए यहूद के पास थे यानी आम्मतुन नास के लिये तौरात की तरफ़ रुजू करने का इम्कान न था। इन्जील के बारे में तो वज़ईयत इस से ज़्यादा परेशान कुनिन्दा है क्यों कि वह इन्जील जो आज ईसाईयों के पास है यह वह इन्जील नहीं जो हज़रत ईसा (अ) पर नाज़िल हुई थी बल्कि मुख़्तलिफ़ अफ़राद के जमा शुदा मतालिब हैं और चार अनाजील के तौर पर मअरूफ़ हैं। पस गुज़िश्ता उम्मतें आसमानी किताबों तक दस्तरसी न रखती थीं। लेकिन क़ुरआने करीम को ख़ुदा वन्दे मुतआल ने ऐसे नाज़िल फ़रमाया और पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने उसे इन्सानों तक ऐसे पहुंचाया कि आज लोग बड़ी आसानी से उसे सीख और हिफ़्ज़ कर सकते हैं।
इस आसमानी किताब की एक दूसरी ख़ुसूसियत यह है कि ख़ुदा वन्दे मुतआल ने उम्मते मुस्लेमा पर यह अहसान फ़रमाया है कि इस की हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी ख़ुद अपने ज़िम्मे ली है कि यह किताब हर तरह के इन्हेराफ़ या मुक़ाबिला आराई से महफ़ूज़ रहे। ख़ुद आँ हज़रत (स.) ने इस के सीख़ने और इसकी आयात के हिफ़्ज़ करने की मुसलमानों को इस क़द्र ताकीद फ़रमाई कि बहुत सारे मुसलमान आपके ज़माने में ही हाफ़िज़े क़ुरआन थे जो आयत तद्रीजन नाज़िल हुई थीं तो हज़रत (स) मुसलमानों के लिये बयान फ़रमाते थे इस तरह मुसलमान उन को हिफ़्ज़ करते, लिखते, और उन को आगे बयान करते। इस तरिक़े से क़ुरआन पूरी दुनिया में फ़ैलता गया। मौला ए कायनात फ़रमाते हैं : अल्लाह की किताब तुम्हारे दरमियान और तुम्हारे इख़्तियार में है, ज़रूरत है कि हम इस जुम्ले में ज़्यादा ग़ौर करें “नातेक़ुन ला यअई लिसानहू” यह किताब बोलने वाली है और इस की ज़बान कभी गुंग या कुन्द नहीं हुई। यह बोलने से ख़स्तगी का अहसास नहीं करती और न कभी इस में लुक्नत पैदा हुई है इस के बाद आप इर्शाद फ़रमाते हैं “व बयता ला तह्दमो अर्कानहु व अज़्ज़ा ला तह्ज़मो अअवानहु”यह एक ऐसा घर है जिसके सुतून कभी मुन्हदिम होने वाले नहीं हैं और ऐसी इज़्ज़त व सर बलन्दी है जिस के यार व अन्सार कभी शिकस्त नहीं खाते।
(2)  यह किताब नातिक़ है और सामित भी।
हज़रत अली (अ) एक तरफ़ तो फ़रमाते हैं कि यह किताब नातिक़ है जब कि दूसरे मक़ाम पर फ़रमाते हैं यह किताब सामित है नातिक़ नहीं इस को बोलने पर आमादा करना चाहिये और यह मैं हूँ जो क़ुरआन को तुम्हारे सामने बयान करता हूं। ख़ुत्ब ए 147 में यह तअबीर इस्तेमाल हुई है “यअनी क़ुरआन साकित व ख़ामोश है दर आन हालि कि नातिक़ व गुफ़्तगू करने वाला है पस इस का क्या मअना हुआ ?
ग़ालेबन क़ुरआने हकीम के बारे में यह दो नुक़्त ए नज़र हैं। एक यह कि क़ुरआन एक मुक़द्दस किताब है लेकिन ख़ामोश, गोशा नशीं, जिस का किसी से कोई राबेता नहीं और न ही यह किताब किसी से हम कलाम होती है। इसके मुक़ाबिल दूसरी निगाह है जिस के मुताबिक़ यह किताब नातिक़ व गोया है जो हस इन्सानों से मुखा़तिब है और अपनी पैरवी व इत्तेबाअ का हुक्म देती है अपने मानने वालों को खुशबख़्ती और सआदत का पैग़ाम देती है।
पस अगर इस किताब को हम फ़क़्त मुक़द्दस तसव्वुर करें तो इस का मतलब यह है कि एक ऐसी किताब है जिस के कलेमात, जुम्ले और आयात सफ़ह ए क़िरतास पर नक़्श बाँधे हुए हैं जिन का मुसलमान बहुत एहतिराम करते हैं। इस को बोसे देते हैं और घर में इन्तेहाई बेहतरीन जगह पर इस को रखते हैं। बाज़ औक़ात अपनी मजालिस व महाफ़िल में इसकी हक़ीक़त व मअना पर ग़ौर व ताअम्मुल किये बग़ैर तिलावत करते हैं एक ऐसी ख़ामोश किताब है जो किसी महसूस व मल्मूस आवाज़ से गुफ़तगू नहीं करती जो इस नज़रिये का क़ायल है वह हरगिज़ क़ुरआने करीम से हम कलाम नहीं हो सकता, क़ुरआन की आवाज़ को नहीं सुन सकता और क़ुरआने मजीद भी उसकी किसी मुश्किल हो हल नहीं फ़रमाता।
बिनाबर ईन हमारा फ़रीज़ा है कि हम क़ुरआन को किताब समझें और ख़ुदा वन्दे आलम के हुज़ूरे इन्तेहाई ख़ुशू व ख़ुज़ू और जज़्ब ए तसलीम व रज़ा के साथ इस किताब से कलाम सुनने के लिये अपने आप को आमादा करें। यह किताब सरासर आईन ए ज़िन्दगी है। इस सूरत में यह किताब नातिक़ भी है क़ुव्वते गोयाई भी रखती है इन्सानों से हम कलाम भी होती है और ज़िन्दगी के तमाम शोअबो में रहनुमाई भी करती है।
इन दो नुक्त ए नज़र के अलावा क़ुरआन के सामित व नातिक़ होने के एक तीसरा मअमा भी है जो इस से ज़्यादा गहरा व अमीक़ है और हज़रत का मन्ज़ूरे नज़र भी यही मअना है वह मअना यह है कि क़ुरआन साकित व सामित है इस को गुफ़्तगू पर आमादा करना चाहिये और यह मैं हूं जो क़ुरआन को तुम्हारे लिये बयान करता हूं गोया अगरचे क़ुरआने करीम ख़ुदा वन्दे आलम का कलाम है और इस कलामे इलाही के सद्रे नुज़ूल की हक़ीक़त इस तरह है कि हम इन्सानों के लिये क़ाबिले शिनाख्त नहीं जबकि दूसरी तरफ़ नुज़ूले क़ुरआन का हदफ़ इन्सानों की हिदायत है तो यह कलाम कलेमात, जुम्लों और आयात की सूरत में इस तरह नाज़िल हुआ कि बशर के लिये पढ़ने और सुनने के क़ाबिल हो जाए इस के बावजूद ऐसा नहीं है कि तमाम तर आयात के मज़ामीन व मफ़ाहीम आम इन्सानों के लिये क़ाबिले फ़हम हों। पस लोग भी पैग़म्बरे इसलाम (स.) आइम्मा (अ.स.) और रासेख़ूना फ़िल इल्म की तफ़सीर व तशरीह के बग़ैर आयात के मक़ासिद को नहीं पा सकते।
(3) मुफ़स्सेरीने वहीए इलाही की ज़रूरत :--
पैग़म्बरे इसलाम (स.) की एक ज़िम्मे दारी उम्मते मुस्लेमा के लिये आयाते इलाही की तफ़सीर व तशरीह है जैसा कि इर्शाद होता है : “व अन्ज़लना अलेइका ज़िक्रा लेतबीना लिन्नासे मा नज़ाला अलेहिम”नेहल 44>
तर्जुमा : हम ने आप की तरफ़ क़ुरआन नाज़िल किया ताकि आप लोगों की तरफ़ जो कुछ नाज़िल हुआ है बयान करें। पस क़ुर्आने करीम के अज़ीम मआरिफ़ के बयान की ज़िम्मेदारी पैग़म्बरे इसलाम (स) पर है क्योंकि इस के मआरिफ़ इस क़द्र अमीक़ व गहरे हैं कि तमाम लोग इसका इदराक नहीं कर सकते।
हज़रत ख़ुत्ब ए 158 में इर्शाद फ़रमाते हैं  : ख़ुत्बा लिख लेना
तर्जुमा : इस क़ुरआन से चाहो कि तुम से कलाम करे और यह हरगिज़ तुम से हम कलाम नहीं होगा लेकिन मैं तुम्हें इस से आगाह करूँगा याद रखो यक़ीनन इस में मुस्तक़बिल के उलूम और माज़ी के हालात हैं और तुम्हारे अमराज़ की दवा है और जो कुछ तुम्हारे माबैन है उसके बारे में नज़मो ज़ब्त की राहनुमाई पाई जाती है।
पस मासूमीन (अ.स.) की ज़बाने मुबारक से इस के बारे में आशनाई हासिल करनी चाहिये। उलूमे क़ुरआन को उन से हासिल करना चाहिये। क़ुरआने करीम इलाही मआरिफ़ का समन्दर है इस बहरे बेकराँ में ग़ोता ज़नी और इन्सान साज़ी के नायाब गौहरों की तलाश करना इन हस्तियों के बस की बात है जो आलमे ग़ैब से दाइमी तौर पर इर्तेबात में हैं। ख़ुदा वन्दे आलम ने भी यही चाहा है कि इन हस्तीयों से राबेता और तवस्सुल के ज़रिए और इन की राहनुमाई के तवस्सुत से क़ुरआनी उलूम व मआरिफ़ से राहनुमाई हासिल करो।
(2) क़ुरआने करीम का मअ��िरती ज़िन्दगी में अहम किरदार :
(1) क़ुरआने करीम हर दौर की दवा है :
हज़रत तमाम मुशकिलात के हल के लिये क़ुरआने करीम का तआरुफ़ फ़रमाते हैं। क़ुरआन ही वह शफ़ा बख़्श दवा है जो तमाम दर्दों का दरमान और परेशानियों के लिये मरहम है। अलबत्ता यह वाज़ेह है कि दर्द की शिनाख्त और अहसास के बग़ैर इलाज या दरमान की बात करना बे फ़ाएदा है। पस इब्तेदाई तौर पर ज़रूरी है कि क़ुरआने करीम की आयात में गहरे ग़ौरो फ़िक्र के साथ इन्फ़ेरादी तौर और मआशिरती दर्दों की शिनाख़्त और मुतालेआ किया जाए इस के बाद इस शिफ़ा बख़्श नुस्खे कीमीया पर अमल किया जाए।
ख़ुत्बा 198 में फ़रमाते हैं:  “व दवाओ लेसा बादहू दा”यअनी क़ुरआने मजीद ऐसी दवा है कि जिस के बाद कोई दर्द रह नहीं जाता यह दवा भी यक़ीनन उस वक्त अपना असर दिखाएगी जब हज़रत (अ.स.) के इस फ़रमान और क़ुरआने हकीम के शफ़ा बख़्श होने पर ईमान हो बाअल्फ़ाज़े दीगर हमे अपने पूरे वुजूद के साथ बावर करना चाहिये कि हमारा तमाम तर इन्फ़िरादी व इज्तेमाई दर्दों और मुश्किलात का हक़ीक़ी इलाज क़ुरआने हकीम में है। शायद हमारे मआशरे की सब से बड़ी मुशकिल यही ईमान की कमज़ोरी है कि अभी तक बहुत सारी मुश्किलात बाक़ी हैं।
(2) मआशिरती मुश्किलात का बेहतरीन हल : 
इस सिलसिले में हज़रत (अ.स.) पैग़म्बरे इस्लाम (स.) का क़ौल नक़्ल फ़रमाते हैं कि आप फ़रमाते हैं : हदीस लिख लेना
तर्जुमा : जब कभी सियाह रात की मान्निद तुम्हें फ़ितने घेर लें तो क़ुरआन का दामन थामना।
पस इज़्तिराब, परेशान, मुश्किलात, नाहम आहंगियाँ और बे सरो सामानियाँ तुम्हारे मआशिरे पर जब स्याह रात की मान्निद साया फ़ेग़न हों तो इन के हल के लिये कहीं और न जाना बल्कि क़ुरआन से रुजू करना इसकी निजात बख्श राहनुमाई को मेआर व कसौटी क़रार देना। क़ुरआन के उम्मीद बख्श फ़रामीन मुश्किलात पर क़ाबू पाने और दिलों में ख़ुशबख़्ती व सआदत की उम्मीद को ज़िन्दा करते हैं। अलबत्ता यह वाज़ेह है कि हर कामयाबी के पीछे इन्सान की कोशिश और जिद्दो जहद का बुनियादी किरदार है। पस अगर हम चाहते हैं कि अपनी आज़ादी और इस्तक़्लाल की हिफ़ाज़त करें और ख़ुदाए ज़ुल जलाल के साया ए रहमत व पनाह में हर साज़िश से महफ़ूज़ रहें तो चारा ही नही कि अपने खालिक़ और क़ुरआने करीम के निजात बख्श अहकाम की तरफ़ लौट जाएँ इस सिलसिले में आज तक जिस नाशुक्री और बे ऐहतेरामी के मुरतकिब हुए हैं इस पर तवज्जो व निदामत की राह लें।
(3) मआशिरती उमूर में नज़्मो ज़ब्त :
हज़रत फ़रमाते हैं : “नज़्मो माबैनाकुम”  यानी मुसलमानों के माबैन रवाबित व नज़्मो ज़ब्त को सरोसामान बख़्शने वाला क़ुरआने हकीम है हर सियासी नज़्मो ज़ब्त में बड़ा हदफ़ मआशिरती नज़्मो ज़ब्त और अमनो आमान का क़ाएम करना होता है और यह बात क़तअन क़ाबिले इन्कार नहीं है। अलबत्ता समाजी व मआशिरती ज़िन्दगी में हदफ़ की अहमियत भी असासी है क्योंकि यही हदफ़ है जो ख़ास तरह के आमाल व किरदार का तक़ाज़ा करता है। हर मआशिरे के अफ़राद अपने आमाल व किरदार से इसी हदफ़ को पाना चाहते हैं। यह अम्र भी निहायत रौशन है कि हदफ़ का सरचश्मा इस मआशिरे के तमद्दुन, सक़ाफ़त, तारीख़ और लोगों के अक़ाएद होते हैं। यही सबब है कि इस्तेअमारी ताक़तें मिल्लतों के असली व हक़ीक़ी सक़ाफ़त व तमद्दुन को छीन कर या ख़ोखला कर के इन को अपने अहदाफ़ व अग़राज़ और अपने मफ़ादात की तरफ़ धकेल देती हैं।
दीनी सक़ाफ़त या तमद्दुन का सरचश्मा क़ुरआने हकीम और तौहीदी नज़रिया काएनात है यह तमद्दुन एक ऐसे नज़्मो सियासत का तक़ाज़ा करता है जिस में ख़िलक़त के हदफ़ का हसूल और इन्सान की दुनिया व आख़िरत में सआदत व ख़ुशबख्ती कार फ़रमा है।
बाइसे अफ़सोस है बाज़ मग़रिब ज़दा रौशन फ़िक्र मुसलमान मआशिरती नज़्म को फ़क़्त मग़रिबी जमहुरियत में देखते हैं जब कि उस की बुनियाद ला दीनीयत का अक़ीदा है पस दीनी और क़ुरआनी तमद्दुन में इन्सान की न फ़क़्त माद्दी रफ़ाह और फ़लाह शामिल बल्कि उखर्वी सआदत व तआमुल भी मौरिदे तवज्जोह व अहमियत है इस अम्र की तरफ़ तवज्जोह बहुत ज़रूरी है कि क़ुरआने करीम उस सूरत में शिफ़ा बख़्श है जब उस की हिदायत और फ़रामीन को महज़ अख़्लाक़ी नसीहतें तसव्वुर न किया जाए बल्कि तमाम तर मआशिरे और हुकूमत की कुल्ली सियासत, अमल और प्रग्रोमों में क़ुरआने करीम की हिदायात की हिदायत को नाफ़ेज़ुल अमल किया जाए।
(4) क़ुरआने करीम से वाबस्तगी बेनियाज़ी का बाइस है। 
इसी ख़ुत्बे में हज़रत (अ.स.) इर्शाद फ़रमाते हैं>:  “यक़ीन करो क़ुरआने करीम ऐसा नसीहत करने वाला और मौऐज़ा करने वाला है जो अपने पैरोंकारों से ख़्यानत नहीं करता ऐसा हादी है जो गुमराह नहीं करता ऐसा कलाम करने वाला है जो झूट नहीं बोलता और जो कोई क़ुरआन का हम नशीन हुआ और उस में तदब्बुर व तफ़क्कुर करे तो जब उठेगा तो उस की हिदायत व सआदत में इज़ाफ़ा हो जब कि उस की गुमराही में कमी वाक़े हो गई” ।
इस के बाद इर्शाद फ़रमाते हैं :
तर्जुमा: यक़ीन के साथ जान लो कि कोई भी क़ुरआन के बाद फ़ाक़ा कशी नहीं और इस से क़ब्ल कोई ग़नी नहीं पस अपने अमराज़ की शफ़ा उस से तलब करो और अपने ठिकानों और पनाह गाहों के लिये उस से मदद तलब करो पस यक़ीनन उस में सब से बड़े अमराज़ की शफ़ा है और वह क़ुफ़्र, निफ़ाक़, जहालत, और ज़लालत व गुमराही है। मआशिरे में क़ुरआन की हाकिमीयत के होते हुए इन्सान की कोई ऐसी ज़रूरत नहीं जो पूरी न हो क्योंकि ख़ुदा वन्दे मुतआल ने तौहीद परस्तों की दुनिया व आख़िरत में सआदत की ज़मानत दी है। पस क़ुरआन को नमुना ए अमल क़रार देने से इस्लामी मअशिरा हर चीज़ और हर कस व नाकस से बेनियाज़ हो जाएगा।
इस के साथ ही साथ हज़रत (अ.स.) एक संजीदा मतलब की तरफ़ इशारा फ़रमाते हैं: “वला हद्दे क़ब्लल क़ुर्आन मिन ग़नी”यानी कोई भी क़ुरआन के बग़ैर बेनियाज़ नहीं हो सकता। मतलब यह है कि अगर इन्सान के उलूम व तजुर्बे में कितना ही इज़ाफ़ा हो जाए मआशिरती मुश्किलात और कमियां दूर करने के जितने भी फ़ारमूले तैयार कर ले, अदल व इन्साफ़ के तक़ाज़ों को जितना भी पूरा कर ले और अख़्लाक़ी व इन्सानी इक़्तिदार को राएज करे लेकिन क़ुरआन के बग़ैर उन उमूर से उहदा बरआ नहीं हो सकता यानी यह कि इन्सान क़ुरआन से बेनियाज़ नहीं हो सकता हर आक़िल उस का इक़रार करता है कि इन्सान की तमाम तर इल्मी तरक़्क़ी उसके मजहूलात के समन्दर के मुक़ाबिले में क़तरे से ज़्यादा नहीं।
(5) क़ुरआने करीम आफ़ताब की तरह आलमताब है
ख़ुत्बए :  198  में इस्लाम और पैग़म्बरे इसलाम (स.) के औसाफ़ बयान करने के बाद फ़रमाते हैं :
तर्जुमा : परवरदिगार ने क़ुरआन को उस सूरत में अपने हबीब पर नाज़िल फ़रमाया कि यह एक नूर है जिसके चिराग़ हर गिज़ बुझने वाला नहीं, ऐसा आफ़ताब है जिसकी रौशनी कभी ख़त्म होने वाली नहीं और एक ऐसा गेहरा समन्दर जिस की गहराई को कोई पा नहीं सकता।
इस ख़ुत्बे में क़ुरआने करीम के लिये आप ने तीन तशबीहात इस्तेमाल फ़रमाई हैं सब से पहले तो क़ुरआन की अज़मत से मुसलमानों के क़ुलूब को आशना फ़रमाते हैं फ़िर उस अज़ीम सरमाय ए इलाही की तरफ़ मुतावज्जेह फ़रमाते हैं जो मुसलमानों के पास के फ़रमाते हैं दरआँ हालांकि क़ुरआन नूर है अल्लाह ताला ने पैग़म्बर (स.) पर नाज़िल फ़रमाया लाकिन यह नूर बाक़ी अनवार से मुख़्तलिफ़ है इस ख़ुसूसियत के साथ कि इस के नूर फ़ैलाने वाले चराग़ हरगिज़ न बुझेंगे। इस की ताबिश कभी ख़त्म न होगी जो इन्सानों को, इन्सानी समाज, मुतालाशीयों को ख़ुशबख़्ती के राहियों को मुन्हरिफ़ रास्तों, सुक़ूत हौलनाक दरों से निजात दिलाई है। पस राहे हक़ हमेशा के लिये मुस्तक़ीम व रौशन है। एक और मक़ाम पर हज़रत फ़रामाते हैं कि तारीकी उस के मुक़ाबिले में ठहर नहीं सकती क्योंकि उस के चिराग़ हमेशा राहे सआदत व हिदायत को रौशन रखते हैं यह चराग़ और मुफ़स्सीराने वही ए इलाही आइम्मा ए अतहार (अ.स.) हैं।
(6) क़ुरआनी आईने और चराग़ :
हदीसे सक़लैन की रौशनी में “क़ुरआन और इतरत”ऐसे दो इलाही अतिये हैं जो एक दूसरे की तकमील करने वाले हैं।
हिकमत व रविशे इलाही इस तरह क़रार पाई है कि लोग अहले बैत (अ.स.) के ज़रीए से मआरिफ़े क़ुरआन से आशना हों। बिनाबर ईन अल्लाह ने तालिबाने सआदत के लिये इमामत का एक दाइमी रास्ता मुक़र्रर फ़रमाया। क़ुरआनी मआरिफ़ इस क़द्र गहरे वसीअ व अमीक़ हैं इन्सान जिस क़द्र अहले बैत (अ.स.) के उलूम में तफ़क्कुर व तदब्बुर करे इतना ही क़ुरआन की अज़मत और मारिफ़त व इरफ़ान के चश्मे फ़ूटने शुरु हो जाते हैं।
तौहीद के इस समुन्दर से जितना पीते जाएं तो सैराब होने के बजाए इन्सान तिशनातर होता जाता है।
(7) क़ुरआने करीम के पैरोकार के लिये इस्लाह व सआदत :
यह ज़िन्दगी क्योंकि आख़िरत की खेती है लिहाज़ा इन्सान का तमाम हम्म व ग़म आख़िरत की सआदत होना चाहिये। बस इन्सान अपने आमाल व किरदार को क़ुरआने करीम और अहले बैत (अ.स.) के मआरिफ़ व उलूम के मुताबिक़ बनाए तो दुनिया व आख़िरत की इज़्ज़त सर बलन्दी हासिल कर सकता।
ईमाम (अ.स.) ख़ुत्ब ए  176 में इर्शाद फ़रमाते हैं :
तर्जुमा : अल्लाह तअला से क़ुरआन के ज़रिए सवाल करो और परवरदिगार की तरफ़ उस की मुहब्बत के ज़रिए से मुतवज्जेह हो जाओ और मख़लूक़े ख़ुदा से मांगने के लिए क़ुरआन को ज़रिए क़रार न दो क्योंकि इन्सान भी अपने और ख़ुदा के माबैन क़ुरआन जैसा वास्ता नहीं रखते। यक़ीन के साथ जान लो कि क़ुरआन ऐसा शिफ़ाअत करने वाला है जिस की शिफ़ाअत क़ुबूल शुदा है यह ऐसा बोलने वाला है जिस की तस्दीक़ की जाती है। क़यामत के दिन जिस की शिफ़ाअत क़ुरआन ने की तो यह शिफ़ाअत उस के हक़ में क़ुबूल की जाएगी और क़यामत के दिन जिस की मज़म्मत क़ुरआन ने की तो मुआमिला उस के नुक़्सान में होगा।
(8) क़ुरआन ख़ैरख्वाह और नसीहत करने वाला है :
ईमाम अली (अ.स.) फ़रमाते हैं :
लोगों! क़ुरआन के जमा करने वालों और पैरोकारों में से हो जाओ और उस को अपने परवरदिगार के लिये दलील क़रार दो।
अल्लाह को उस के कलाम के पहचानों। परवरदिगार के औसाफ़ को क़ुरआन के ज़रिए पहचानों क़ुरआन ऐसा राहनुमा है जो तुम्हें अल्लाह की तरफ़ राहनुमाई करता है। उस राहनुमाई के ज़रिए उस के भेजे हुए रसूल की मअरिफ़त हासिल करो और उस अल्लाह पर ईमान ले आओ जिस का तआरुफ़ क़ुरआन करता है।  “वस्तन्साहू अला अन्फ़ोसेकुम”
क़ुरआन को अपना नासेह क़रार दो और उस की ख़ैरख्वाहना नसीहतों पर अमल करो क्योंकि तुम इन्सान एक दिल सोज़, ख़ैरख्वाह के मोहताज हो जो तुम्हें ज़रूरी मक़ामात पर नसीहत करे।
तर्जुमा : बेशक यह क़ुरआन तुम्हें इन्तेहाई मुस्तहकम व पाएदार रास्ते की तरफ़ राहनुमाई करता है और जो मोमिनीन अअमाले सालेह बजा लाते हैं उन को बशारत देदो कि उन के लिये यक़ीनन बहुत बड़ा अज्र है।
यहाँ सब से अहम नुक्ता इस आयते मुबारका पर क़ल्बी ऐतेक़ाद है क्योंकि इन्सान जब तक यह अक़ीदा न रखता हो, अपने आप को ख़ुदा के हवाले न कर दे और ख़ुद को ख़्वाहिशाते नफ़सानी से पाक न करे तो हर वक़्त यह ख़तरा मौजूद है कि शैतानी वस्वसे का शिकार हो जाए। क़ुरआने करीम का कोई भी हुक्म इन्सानी हैवानी व नफ़्सानी ख़्वाहिशात से साज़गार नहीं है जो शख़्स अपनी ही ख़्वाहिशात को मद्दे नज़र रखता है उस की ख़्वाहिश होती है कि क़ुरआन भी उस के रुजहानात, ख़्वाहिशात के मुताबिक कलाम करे और जैसे ही कोई आयत उस की ख़्वाहिशात व तरग़ीबात के मुताबिक़ नज़र आए तो उस का भर पूर इस्तिक़बाल करता है पस अक़्ल का तक़ाज़ा है कि इन्सान ख़ाली ज़हन और ख़ाली दामन हो कर फ़क़्त इश्क़े इलाही का जज़्बा लेकर क़ुरआन की बारगाह में हाज़िरी दें।
(ज) क़ुरआने करीम की शिनाख़्त उस के मुख़ालिफ़ीन की शिनाख़्त में मुज़मर है।
गुज़श्ता गुफ़तगू की रौशनी में यह सवाल उठता है कि क्या क़ुरआने करीम से इस्तेफ़ादे का तरीक़ा ए कार यही है कि हम फ़क़्त मज़कूरा बाला फ़रामीन पर अमल करें ?
इस सवाल के जवाब में अगर हम कुरआने मजीद को वसीअ नज़र से देखें तो उस के मुक़ाबिले में मुन्हरिफ़ अफ़्कार नज़र आएंगे। इस मुन्हरिफ़ अफ़्कार ने हमेशा से इन्सान को गुमराही और बातिल की तरफ़ धकेला है। पस क़ुरआनी तमद्दुन को नाफ़िज़ करने और मआशिरे में दीनी अक़ाइद को राइज करने के लिये ज़रूरी है कि मुख़ालेफ़ीन क़ुरआन के अफ़्कार और उन की साज़िशों से मअरिफ़त हासिल की जाए जबकि यह नुक्ता ग़ालेबन ग़फ़लत का बाइस हो जाता है हक़ और बातिल क्योंकि हमेशा एक दूसरे के बिल मुक़ाबिल रहे हैं लिहाज़ा हमे हक़ की शिनाख़्त व मआरिफ़ के साथ साथ बातिल की भी पहचान करनी चाहिये इस चीज़ के पेशे नज़र ईमाम अली (अ.स.) फ़रमाते हैं।
तर्जुमा : यक़ीन के साथ जान लो कि तुम राहे हिदायत को हरगिज़ नहीं पहचान सकते जब तक उस को ना पहचानों जिस ने हिदायत को तर्क कर दिया है और तुम हर गिज़ पैमाने इलाही (क़ुरआन) पर अमल पैरा नहीं हो सकते जब तक तुम पैमान शिकन अहद शिकन को ना पहचान लो।
यानी यह कि तुम क़ुरआन के हक़ीक़ी पैरोकार उस वक़्त तक नहीं बन सकते जब तक तुम क़ुरआन की तरफ़ पुश्त करने वालों की मअरिफ़त हासिल ना कर लो, हज़रत अली (अ.स.) के इस फ़रमान में बड़े वाज़ेह तौर पर दुश्मन शिनासी पर ज़ोर दिया गया है। उस से उलामा ए इल्मे दीन का फ़रीज़ा बहुत ज़्यादा सन्जीदा हो जाता है बिल ख़ुसूस ऐसे हालात में जब कि इन्हेराफ़ी अफ़्कार और मुल्हदीन के शुब्हात अवाम खुसूसन नौजवानों को इन्हेराफ़ात का शिकार कर रहे है।
हज़रत इमामे अली (अ.स.) की पेंशनगोई और तन्बीह।
अगरचे हज़रत का मौरिदे ख़िताब आम्मातुन नास हैं लेकिन बहुत सारे मवारिद में मुआशिरे के ख़ास अफ़राद या खास गिरोहों को मौरिदे ख़िताब क़रार देते हैं क्योंकि यही लोग हैं जो मुआशिरे की तहज़ीब व सक़ाफ़त पर असर अन्दाज़ होते हैं। वह लोग हैं जो अपने दुनियावी अहदाफ़ व अग़राज़ की ख़ातिर ख़ुदा व उस के रसूल की तरफ़ झूठ व दुरूग़ गोई की निस्बत देते हैं, क़ुरआन और दीन की तफ़सीर बिर राय करते हैं और लोगों को गुमराही की तरफ़ ख़ींचते हैं।
अवाम के बारे में फ़रमाते हैं : इस ज़माने के लोग भी ऐसे ही हैं अगर क़ुरआने करीम की सहीह व हक़ीक़ी तफ़्सीर व तशरीह हो तो उन के नज़दीक सब से ज़्यादा बेक़ीमत चीज़ है लेकिन अगर उन की नफ़्सानी ख़्वाहिशात के मुताबिक़ हो तो ऐसी तफ़्सीर के दिल दादाह हैं। ऐसे ज़माने में शहरों में दीनी व इलाही और ग़ैरे दीनी इक़दारान के लिये महबूब होंगी इस ख़ुत्बे के आख़िर में इर्शाद फ़रमाते हैं।
तर्जुमा : इस ज़माने के लोगों ने इफ़्तेराक़ व इख़्तेलाफ़ पर इज्तेमाअ कर लिया है इन्होंने जमाअत से अलाहिदगी इख़्तियार कर ली है यह लोग ऐसे हैं जैसे क़ुरआन के के इमाम व रहबर हों जब कि क़ुरआन उन का इमाम नहीं है।
गोया इमाम अली (अ.स.) की मुराद यह है कि उन्हों ने इज्तेमाअ कर लिया है कि क़ुरआने करीम का हक़ीक़ी मुफ़स्सीर पैदा ही ना हों यह लोग आलम नुमा जाहिलों की पैरवी करते हैं जो ख़ुद को क़ुरआन का रहबर जानते हैं और क़ुरआन की अपनी ख़्वाहिशाते नफ़्सानी के मुताबिक़ तफ़सीर करते हैं इन्हों ने हक़ीक़ी मुसलमानों, उलामा और मुफ़स्सेरीन से जुदाई इख़्तियार कर ली है। यह लोग अमलन क़ुरआन को अपना रहबर नहीं मानते बल्कि ख़ुद उस के रहबर हैं
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