नहजुल बलाग़ा ख़ुत्बा 59

जब आप ने ख़वारिज से जंग करने का इरादा ज़ाहिर किया, और आप से कहा गया कि वह नहरवान का पुल उबूर (पार) कर के उधर जा चुके हैं, तो आप ने फ़रमाया ]...

जब आप ने ख़वारिज से जंग करने का इरादा ज़ाहिर किया, और आप से कहा गया कि वह नहरवान का पुल उबूर (पार) कर के उधर जा चुके हैं, तो आप ने फ़रमाया ]

न के गिरने की जगह तो पानी के उसी तरफ़ है। ख़ुदा की क़सम ! उन मेंसे दस भी बच कर न जा सकेंगे, और तुम में से दस भी हलाक (आहत) न होंगे।

जब ख़वारिज मारे गए तो आप से कहा गया कि वह लोग सब के सब हलाक (आहत) हो गए। आप ने फ़रमाया, हरगिज़ नहीं अभी तो वह मर्दों की सुल्बों (शुक्राणु) में और औरतों के शिकमों (स्त्रियों के गर्भाशय) में मौजूद हैं (विधमान हैं) जब भी उन में कोई सरदार ज़ाहिर (प्रकट) होगा, तो उसे काट कर रख दिया जायेगा। यहां तक कि उन की आख़िरी फ़र्दें (अन्तिम वंशज) चोर और डाकू हो कर रह जायेंगी।”

[ इन्हीं ख़वारिज के बारे में प़रमाया ]

मेरे बाद ख़वारिज को क़त्ल न करना इस लिये कि जो हक़ का तालिब हो और उसे न पा सके वह वैसा नहीं है कि जो बातिल ही की तलब (खोज) में हो और फिर उसे पा भी ले।

( सैयिद रज़ी कहते हैं कि इस से मुराद मुआविया और उस के साथी हैं )

इस पेशीन गोई (भविष्यवाणी) को फ़रासत व साक़िब नज़री (चातुर्य एंव ज्योतिष ज्ञान) का नतीजा नहीं क़रार दिया जा सकता। क्योंकि दूर रस नज़रें (दूरदर्शी निगाहें) फ़त्हो शिकस्त (विजय पराजय) का अन्दाज़ा (अनुमान) तो लगा सकती है और जंग के नताइज (युद्ध के परिणामों) को भांप ले जा सकती हैं लेकिन दोनों फ़रीक़ (पक्ष) के मक़तूलीन (आहतों) की सहीह सहीह तअदाद से आगाह (सूचित) कर देना उस की हुदूदे पर्वाज़ (उड़ान सीमा) से बाहर है। यह उसी की बातिनबीं निगाहें हुक्म लगा सकती हैं (अन्तरदर्शी दृष्टि निर्णय दे सकती हैं) कि जो ग़ैब (परोक्ष) के पर्दे उलट कर आने वाले मंज़र (दृश्य) को अपनी आंखों से देख रहा हो, और इल्मे इमामत (इमामत के ज्ञान) की छूट मुस्तक़बिल के सफ़्हे (भविष्य के पट) पर उभरने वाले नुक़ूश (चिन्हों को) उस को दिखा रही हो। चुनांचे इस वारिसे इल्मे नुबुव्वत (नुबुव्वत के ज्ञान के उत्तराधिकारी) ने जो फ़रमाया (कहा) था वही हुआ और ख़वारिज में से नौं आदमियों के अलावा सब के सब मौत के घाट उतार दिये गए। जिन में से दौ उम्मान की तरफ़ दो सबहिस्तान की तरफ़, दौ किरमान की तरफ़ और दौ जज़ीरे की तरफ़ भाग गए और एक यमन में तल्लेमोरुन चला आया। और आप की जमाअत में से सिर्फ़ आठ आदमी शहीद हो गए जिन के नाम यह हैं :--

रुबा इब्ने दुब्रे बजल्ली, सईद इब्ने खालिद सबीई, अब्दुल्लाह इब्ने हम्मादे अजिनी, फ़य्याज़ इब्ने खलीले अज़्दी, कैसूम इब्ने सल्लेमह जिहनी, उबैद खौलानी, जमीइ इब्ने जअसमे किन्दी, हबीब इब्ने आसिमे असदी।

अमीरुल मोमिनीन का यह पेशीन गोई (भविष्यवाणी) भी हर्फ़ बहर्फ़ (अक्षरश :) पूरी हुई और खवारिज में जो सरदार भी उठा, तलवारों पर धर लिया गया। चुनांचे उन के चन्द (कुछ) सरदारों का ज़िक्र किया जाता है कि जो बुरी तरह मौत के घाट उतारे गए :--

नाफ़े इब्ने अज़रक़ :- खवारिज का सब से बड़ा गुरोह अज़ारेक़ा उसी की तरफ़ मन्सूब (सम्बन्धित) है। यह मुस्लिम इब्ने उबैस के लश्कर के मुक़ाबिले में सलामए बाहिली के होथ से मारा गया।

नज्दह इब्ने आमिर :- खवारिज का फिर्फ़ा नज्दात इंस की तरफ़ मन्सूब है। अबू फ़दैक खारिजी ने इसे क़त्ल करवा दिया।

अब्दुल्लाह इब्ने इबाज़ :- फ़िर्क़ए इबाज़िया इस की तरफ़ मन्सूब है। यह अब्दुल्लाह इब्ने मोहम्मद इब्ने अतीया के मुक़ाबिले में मारा गया।

अबू बैहिस हैसिम इब्ने जाबिर :- फ़िर्क़ए बैहिसया इसकी तरफ़ मंसूब है। उसमान इब्ने जबान वालिये मदीना ने पहले उस के हाथ पैर कटवाए और फ़िर उसे क़त्ल कर दिया।

उर्वा इब्ने ओवैया :- मुआविया के अहदे हुकूमत में ज़ियाद ने उसे क़त्ल किया।

क़तरी इब्ने फजाआ :- तबरस्तान के इलाक़े में जब सुफ़्यान इब्ने अबरु की फ़ौज का उस के लस्कर से टकराव हुआ तो सौरह इब्ने अब्जरे दारेमी ने उसे क़त्ल किया।

शौज़बे ख़ारिजी :- सईद इब्ने अमरे हर्षी के मुक़ाबले में मारा गया।

हौसरा इब्ने विदाए असदी :- बनी तय के एक शख़्स के हाथ से क़त्ल हुआ।

मुस्तौरद इब्ने अरफ़ :- मुआविया के अहद में मुफ़ज्ज़ल इब्ने क़ैस के हाथ से मारा गया।

शबीब इब्ने यज़ीदे ख़ारिजी :- दरिया में डूब कर मरा।

इमरान इब्ने हर्ब सरासिबी :- जंगे दूलाब में मारा गया।

ज़ह्हाफ़ इब्ने ताई :- बनू ताहिया के मुक़ाबिले में मारा गया।

अली इब्ने बशीर :- इसे हज्जाज ने क़त्ल करवाया।

ज़ुबैर इब्ने अली सलीती :- इताब इब्ने वर्क़ा के मुक़ाबिले में मारा गया।

उबैदुल्लाह इब्ने बशीर :- मोहल्लब इब्ने अबी सुफ़रा के मुक़ाबिले में मारा गया।

अब्दुल्लाह इब्ने अलमाहूज़ :- इताब इब्ने वर्क़ा के मुक़ाबिले में मारा गया।

अबुल वाज़े :- मक़बिरए बनी यशकर में एक शख़्स ने इस पर दीवार गिरा कर इसे ख़त्म कर दिया।

उबैदुल्लाह इब्ने यहया किन्दी :- मर्वान इब्ने मोहम्मद के अहद में इब्ने अतीया के हाथ से मारा गया।

क़त्ले ख़वारिज से रोकने की वजह यह थी कि चुंकि अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) की निगाहें देख रही थीं कि आप के बाद तसल्लुत (आधिपत्य) व इक़तिदार (सत्ता) उन लोगों के हाथ में होगा जो जिहाद के मौक़ा व महल से बे खबर होंगे, और सिर्फ़ अपने इक़तिदार को बाक़ी रखने के लिये तलवार चलायेंगे। और यह वो ही लोग थे जो अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) को बुरा कहने में खवारिज से भी बढ़े चढ़े हुए थे। लिहाज़ा जो खुद गुमकर्दा राह (पथभ्रष्ट) हों उन्हें दूसरे गुमराहों (पथभ्रष्टों) से जंगो क़िताल का कोई बक़ नहीं पहुंचता। और न जान बूझ कर गुमराहियों में पड़े रहने वाले इस के मजाज़ (अधिकारी) हो सकते हैं कि भूले से बेराह होने वालों के खिलाफ़ सफ़ आराई करें। चुनांचे अमारुल मोमिनीन (अ.स.) का यह इर्शाद वाज़ेह तौर (स्पष्ट रूप से) पर इस हक़ीक़त (यथार्थ) को वाशिगाफ़ (प्रकट) करता है कि खवारिज की गुमराही जान बूझ कर न थी। बल्कि शैतान के बहकाए में आकर बातिल (अधर्म) को हक़ (धर्म) समझने लगे और उसी पर अड़ गए। और मुआविया और उस की जमाअत की गुमारी की सूरत यह थी कि उन्हों ने हक़ को हक़ समझ कर ठुकराया और बातिल को बीतिल समझ कर अपना शिआर (ढंग) बनाये रहे। और दीन के मुआमले में उन की बेबाकियां इस हद तक बढ़ गई थीं न उन्हें ग़लत फ़हमी का नतीजा क़रार दिया जा सकता है और न उन पर खताए इजतिहादी का पर्दा डाला जा सकता है। जबकि वह अलानिया दीन के हुदूद (धर्म की सीमाओं) को तोड़ देते थे। चुनांचे इब्ने अबिल हदीद ने लिखा है कि पैग़म्बर (स.) के सहाबी अबू दर्दा ने मुआविया के हां सोना चान्दी के बर्तनों का इस्तेमाल (प्रयोग) देखा तो फ़रमाया कि मैंने रसूल अल्लाह (स.) को फ़रमाते हुए सुना है कि चान्दी और सोने के बर्तनों में पीने वाले पैट में दोज़ख (नर्क) का आग के शोले लपकेंगे।” तो मुआविया ने कहा कि “ मेरी राय में तो इस में कोई मुज़ायक़ा (हर्ज) नहीं। ” और इसी तरह ज़ियाद इब्ने अबीह को अपने से मिलाने के लिए क़ौले पैग़म्बर (स.) को ठुकरा कर अपने इजतिहाद को कार फ़रमा (प्रचलित) करना, मिंबरे रसूल पर अहले बैते रसूल (स.) को बुरा कहना, हुदूदे शरईया को पामाल करना, बेगुनाहों के खून से हाथ रंगना, और एक फ़ासिक़ को मुसलमानों की गर्दनों पर मुसल्लत कर के ज़िन्दिक़ा व इल्हाद की राहें खोलना, ऐसे वाक़िआत हैं कि उन्हें किसी ग़लत फ़हमी पर महमूल करना हक़ाइक़ से अदन चश्म पोशी करना है।

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