नहजुल बलाग़ा ख़ुत्बा 36-37-38-39-40-41-42-43

ख़ुत्बा-36 [ अहले नहर वान को उन के अंजाम से डराते हुए फ़रमाया ] मैं तुम्हें मुतनब्बेह (सचेत) कर रहा हूं कि तुम लोग इस नहर के मोड़ों और इस न...

ख़ुत्बा-36

[ अहले नहर वान को उन के अंजाम से डराते हुए फ़रमाया ]

मैं तुम्हें मुतनब्बेह (सचेत) कर रहा हूं कि तुम लोग इस नहर के मोड़ों और इस नशेव (गहराई) की हमवार (बराबर) ज़मीनों पर क़त्ल हो कर गिरे हुए होगे इस आलम (दशा) में कि न तुम्हारे पास अल्लाह के सामने (उज़्र करने के लिये) कोई वाज़ेह दलील (स्पष्ट तर्क) होगी और न कोई रोशन सुबूत (ज्वलन्त प्रमाण) इस तरह तुम अपने घरों से बे घर हो गए और फिर क़ज़ाए इलाही (अल्लाह के निर्णय) ने तुम्हें अपने फन्दे में जकड़ लिया। मैं ने तो पहले ही तुम्हें इस तहकीम से रोका था। लेकिन तुम ने मेरा हुक्म मानने से इनकार कर दिया। यहां तक कि (विवश होकर) मुझे भी अपनी राय को उधर मोड़ना पड़ा जो तुम चाहते थे। तुम एक ऐसा गुरोह हो जिस के अफ़राद के सर अक़्लों से ख़ाली, और फ़हमो दानिश से आरी हैं। ख़ुदा तुम्हारा बुरा करे, मैंने तुम्हें न किसी मुसीबत में फंसाया है, न तुम्हारा बुरा चाहा था।

जंगे नहरवान की वजह यह हुई कि जब तहकीम की क़रारदाद (प्रस्ताव) अमीरुल मोमिमीन कूफ़े की तरफ़ पलट रहे थे, तो जो लोग तहकीम के मनवाने में पेश पेश थे, यह कहने लगे कि अल्लाह के अलावाह किसी को हकम (निर्णायक) ठहराना कुफ़्र है, और मआज़ल्लाह अमीरुल मोमिनीन तहकीम को मान कर काफ़िर हो गए हैं। चुनांचे उन्होंने “ला हकमुन इल्लल्लाह ” (हकम अल्लाह के लिये मख़सूस है) को ग़लत मअनी पहना कर सीधे सीधे मुसलमानों को अपना हम खयाल बना लिया और अमीरुल मोमिनीन से कट कर कूफ़े के क़रीब मक़ामे हरुरा में डेरे डाल दिये। अमीरुल मोमिनीन को इन रेशा दावानियों (षडयंत्रों) का इल्म हुआ तो आप ने सअसअह इब्ने सौहान और ज़ियाद इब्ने नज़रे हारिसी को इब्ने अब्बास के हमराह उन की तरफ़ रवाना किया और बाद में खुद उन की कियाम गाह तक तशरीफ़ ले गए, और उन्हें समझा बुझा कर मुन्तशिर कर दिया।

जब यह लोग कूफ़े पहुंचे तो यह मशहूर करना शुरुउ कर दिया कि अमीरुल मोमिनीन ने तहकीम के मुआहदे को तोड़ डाला है और वह फिर से शामियों के मुक़ाबिले को आमादा हैं। हज़रत को मअलूम हुआ तो आप ने इस की तरदीद फ़रमाई जिस पर यह लोग फ़ित्ना अंगेज़ी (उग्रवाद) के लिये उठ खड़े हुए और बग़दाद से बाहर मील के फ़ासिले पर नहर के नशेबी हिस्से (निचले भाग) में जिसे नहरवान कहा जाता है, पड़ाव डाल दिया।

इधर अमीरुल मोमिनीन तहकीम का फ़ैसला सुन कर सिपाहे शाम (शाम की सेना) से लड़ने के लिये उठ खड़े हुए और खवारिज को तहरीर किया (लिखा) कि हकमैन ने किताब व सुन्नत के बजाय ख्वाहिशे नफ़सानी से काम लेते हुए जो फ़ैसला किया है वह हमें मन्ज़ूर नहीं है। लिहाज़ा हमने उन से लड़ने की ठान ली है तुम भी हमारा साथ दो ताकि दुश्मन की सरकोबी की जाय। मगर ख्वारिज ने इस का यह जवाब दिया कि आप ने जब तहकीम मान ली थी, तो आप बमारे नज़दीक काफ़ीर हो गए थे, अब अगर आप अपने कुफ़्र का इक़रार करते हुए तौबा करें तो हम इस मुआमले में ग़ौर करेंगे और सोचेंगे कि हमें क्या करना चाहिये। हज़रत ने उन के जवाब से समझ लिया कि इन की सरकशी और गुमराही बहुत शदीद हो गई है अब इन से किसी क़िस्म की उम्मीद रखना बेकार है। लिहाज़ा आप ने उन्हें नज़र अन्दाज़ कर के शाम की तरफ़ कूच करने के लिये वादिये नुखैला में पड़ाव डाल दिया। जब लशकर तर्तीब दिया जा चुका, तो हज़रत को मअलूम हुआ कि लशकर के लोग यह चाहते हैं कि पहले अहले नहरवान से निपट लें और बाद में शाम का रुख करें। मगर हज़रत ने फ़रमाया अभी उन लोगों को उन के हाल पर छोड़ो, पहले शाम की तरफ़ बढ़ो इन्हें देख लिया जायेगा। लोगोंने कहा कि हम आप के हुक्म की तअमील के लिये बदिलो जान हाज़िर हैं ख्वाह इधर चलिये या उधर बढ़िये। लेकिन अभी लशकर ने हरकत न की थी कि ख्वारिज की शोरिश अंगेज़ीयों (आतंकवाद) की खबरे आने लगीं और मअलूम हुआ कि उन्हों ने आमिले नहरवान (नहरवान के प्रशासक) अब्दुल्लाह इब्ने खबाब और उन की कनीज़ (दासी) को उस बच्चे समेत जो उस के शिकम (गर्भ) में था ज़ब्ह कर डाला है, और बनी तय की तीन औरतों और उम्मे सिनाने सैदानिया को भी क़त्ल कर दिया है। अमीरुल मोमिनीन ने हारिस इब्ने मुर्रह को तहक़ीक़े हाल के लिये रवाना किया, लेकिन यह भी उन के हाथ से मारे गए। बज उन की शोरिश अंगेज़ीयां (उपद्रव) इस हद तक बढ़ गई तो उन्हें झिंझोंड़ना ज़रुरी हो गया। चुनांचे लश्कर ने नहरवान का रुख किया और वहां पहुंच कर हज़रत ने उन्हें कहला भेजा कि जिन लोगों ने इब्ने खबाब और बेगुनाह औरतों को क़त्ल किया है उन्हें हमारे हवाले करो ताकि हम उन से खून का क़िसास लें। मगर उन लोगों ने इस का जवाब यह दिया कि हम सब ने मिल कर उन को मारा है और हमारे नज़दीक तुम सब का खून मुबाह है। इस पर भी अमीरुल मोमिनीन ने जंग में पहल न की बल्कि हज़रत ने अबू अय्यूबे अन्सारी को पैग़ामे अमन (शान्ति का सन्देश) दे कर उन की तरफ़ भेजा। चुनांचे उन्हों ने पुकार कर उन से कहा कि जो शख्स इस झन्डे के निचे आ जायेगा या इस जमाअत से कट कर कूफ़ा या मदायन चला जायेगा उस के लिये अमान (शरण) है और उस से कोई बाज़ पुर्स (पूछगछ) नहीं की जायेगी। चुनांचे इस का यह असर हुआ कि फ़र्वह इब्न नौफ़ले अशजई ने कहा कि हमें नहीं मअलूम की हम किस बुनियाद (आधार) पर अमीरुल मोमिनीन से आमादए पैकार हुए हैं और यह कह कर पांच सौ आदमियों के साथ अलग हो गए और यूं ही लोग गुरोह दर गुरोह छटना शुरुउ हो गए और कुछ लोग अमीरुल मोमिनीन से आ मिले। जो लोग बाक़ी रह गए उन की तअदाद (संख्या) चार हज़ार थी (और तबरी की रिवायत की बिना पर दौ हज़ार आठ सौ थी) यह लोग किसी सूरत में दअवते हक़ की पूकार सुनने के लिये तैयार न थे और मरने मारने पर उतर आए थे। हज़रत ने इस मौक़े पर भी जंग के हौलनाक (भयावह) नताइज (परिणामों) और उस के अंजामे बद से उन्हें आगाह किया, और यह ख़ुत्बा भी उसी ज़ज्रो तौबीख (डांट फटकार) के सिलसिले में है। लेकिन वह इस तरह जोश में भरे बैठे थे कि यक लख़्त सिपाहे अमीरुल मोमिनीन पर टूट पड़े। यह हमला इतना बेपनाह था कि पियादों के क़दम उखड़ गए। लेकिन पिर इस तरह जमे कि तीरो सिनान के हमले उन्हें अपनी जगह से न हटा सके और देखते ही देखते ख्वारिज का इस तरह सफ़ाया किया कि नौ आदमीयों के अलावा, जिन्हों ने भाग कर अपनी जान बचा ली थी, एक मुतनफ्फ़िस भी ज़िन्दा न बचा। अमीरुल मोमिनीन के लश्कर में सिर्फ़ आठ आदमी शहीद हुए। यह जंग 9 सफ़र सन् 38 हिज्री में वाक़े हुई।

ख़ुत्बा-37

मैंने उस वक्त अपने फ़राइज़ अंजाम दिये जब कि और सब इस राह में क़दम बढ़ाने की जुरअत (हिम्मत) न रखते थे, और उस वक्त सर उठा कर सामने आया जब कि दूसरे गोशों (कानों) में छिपे हुए थे, और उस वक्त ज़बान खोली जब कि दूसरे गुंग (गूंगे) नज़र आते थ। और उस वक्त नूरे खुदा की रौशनी में जब कि दूसरे ज़मीं गीर (ज़मान पर ढेर) हो चुके थे। गो (हालांकि) मेरी आवाज़ उन सब से धीमी थी। मगर सब्क़त पैश क़दमी (पहल व आगे बढ़ने) में मैं सब से आगे था। मेरा इस तहरीक (आन्दोलन) की बाग थामना था, कि वह उड़ सी गई और सिर्फ़ मैं था जो इस मैदान में बाज़ी ले गया। मअलूम होता था जैसे पहाड़ जिसे न तुन्द हवायें जुंबिश दे सकती हैं, और न तेज़ झक्कड़ अपनी जगह से हिला सकते हैं। किसी के लिये भी मुझ में ऐबगीरी का मौक़ा और हर्फ़ीरी की गुंजाइश न थी। दबा हुआ, मेरी नज़रों में, ताक़तवर, मेरे यहां, कमज़ोर है, जब तक कि मैंउस से दूसरे का हक़ न दिला लूं। हम क़ज़ाए इलाही (अल्लाह के फ़ैसले) पर राज़ी हो चुके हैं, और उसी को सारे उमूर सौंप दिये हैं। क्या तुम यह गुमान करते हो कि मैं रसूलल्लाह पर झूट बांधता हूं। खुदा की क़सम! मैं वोह हूं जिस ने सब से पहले आप की तसदीक़ (पुष्टि) की, तो आप पर किज़्ब तराशी में किस तरह से पहल करुंगा ? मैंने अपने हालात पर नज़र की तो देखा कि मेरे लिये हर क़िस्म की बैअत से इताअते रसूल (स.) मुक़द्दर थी और उन से किये हुए अह्दो-पैमान का जुवा मेरी गर्दन में था।

ख़ुत्बा-38

शुब्हा को शुब्हा इसी लिये कहा जाता है कि वह हक़ से मुशाबिहत रखता है। तो जो दोस्ताने खुदा होते हैं उन के लिये शुब्हात (के अंधेरो में) यक़ीन उजाले का और हिदायत की सम्त रहनुमा का काम देता है, और जो दुश्मनाने खुदा हैं वह उन शुब्हात में गुमराही की दअवत व तब्लीग़ (प्रचार) करते हैं और कोरी (अंधापन) व बेबसरी (नेत्रहीनता) उन की रहबर (पथप्रदर्शक) होती हैं। मौत (मृत्यु) वह चीज़ है कि डरने वाला उस से छुटकारा नहीं पा सकता, और हमेशा की ज़िन्दगी (अमर जीवन) चाहने वाला हमेशा की ज़िन्दगी हासिल (प्राप्त) नहीं कर सकता।

ख़ुत्बा-39

मेरा ऐसे लोगों से साबिक़ा (पाला) पड़ा है जिन्हें हुक्म देता हूं तो मानते नहीं, बुलाता हूं तो आवाज़ पर लब्बैक (आ गया) नहीं कहते। तुम्हारा बुरा हो, अब अपने अल्लाह की नुसरत (सहायता) करने में तुम्हें किस चीज़ का इन्तिज़ार है ? क्या दीन (धर्म) तुम्हें एक जगह इखट्टा (एकत्र) नहीं करता और ग़ैरत व हमीयत (लज्जा व आत्मसम्मान) तुम्हें जोश में नहीं लाती ? मैं, तुम से खड़ा होकर चिल्लाता हूं और मदद (सहयोग) के लिये पुकारता हूं लेकिन तुम न मेरी कोई बात सुनते हो, न मेरा कोई हुक्म मानते हो। यहां तक कि नाफ़रमानियों के नताइज (अवज्ञाओं के परिणाम) खुल कर सामने आ जायें, न तुम्हारे ज़रीए (द्वारा) खून का बदला लिया जा सकता है। मैं ने तुम को तुम्हारे ही भाइयों की मदद के लिये पुकारा था, मगर तुम उस ऊँट की तरह बिलबिलाने लगे जिस की नाफ़ (नाभी) में दर्द हो रहा हो, और उस लाग़र (जीर्ण शीर्ण) व कमज़ोर शुतर (ऊँट) की तरह ढीले पड़ गए जिस की पीठ ज़ख्मी हो। फिर मेरे पास तुम लोगों की छोटी सी मुतज़लज़ल (हिलती कांपती) व कमज़ोर (दुर्बल) फ़ौज आई, इस आलम (दशा) में कि गोया (जैसे) उसे उस की आंखों के सामने मौत (मृत्यु) की तरफ़ ढकेला जो रहा हो।

सैयिद रज़ी फ़रमाते हैं कि इस ख़ुत्बे में जो लफ़्ज़ “मुतज़ाइब ” आया है उस के मअनी मुज़तरिब (विचलित) के हैं। जब हवायें बल खाती हुई चलती हैं तो अरब इस मौक़े पर “तज़ाइबतुर्रीह” बोलते हैं और भेड़िये को भी “ज़ेअब” इसी वजह से कहते हैं कि उसकी चाल में एक इज़तिराबी कैफ़ीयत होती है। मुआविया ने मक़ामे ऐनुत्तमर पर धावा बोलने के लिये दो हज़ार सिपाहियों का एक दस्ता नोमान इब्ने बशीर की सरकर्दगी में भेजा। यह जगह कूफ़े के क़रीब अमीरुल मोमिनीन का एक दिफा़ई मोर्चा थी जिस के निगरां (संरक्षक) मालिक इब्ने कअबे अर्जई थे। उन के मातहत एक हज़ार जंगजू अफ़राद थे मगर इस मौक़े पर सिर्फ़ सौ आदमी वहां मौ़जूद थे। जब मालिक ने हमला आवर लशकर को बढ़ते देखा तो अमीरुल मोमिनीन को कुमक के लिये लेखा। जब अमीरुल मोमिनीन को यह पैग़ाम मिला, तो आपने लोगों को उन की इमदाद (सहायता) के लिया कहा, मगर सिर्फ़ तीन सौ आदमी आमादा हुए। जिस से हज़रत बहुत बद दिल हुए और उन्हें ज़ज्रो तौबीख (लानत मलामत) करते हुए यह ख़ुत्बा इरशाद फ़रमाया। हज़रत ख़ुत्बा देने के बाद जब मकान पर पहुंचे तो अदी इब्ने हातिम आप की खिदमत में हाज़िर हुए और कहा कि या अमीरुल मोमिनीन ! मेरे हाथ में बनी तय के एक हज़ार अफ़राद हैं अगर आप हुक्म दें तो उन्हें रवाना कर दूं। हज़रत ने फ़रमाया कि यह अच्छा नहीं मअलूम होता कि दुश्मन के सामने एक ही क़बीले के लोग पेश किये जायें। तुम वादिए नुखैला में जा कर लशकर बन्दी करो। चुनांचे उन्हों ने वहां पहुंच कर लोगों को जिहाद की दअवत दी, तो बनी यह के अलावा एक हज़ार और जंग आज़मा जमअ हो गए। यह अभी कूच की तैयारीयां कर ही रहे थे कि मालिक इब्ने कअब का पैग़ाम आ गया कि अब मदद की ज़रुरत नहीं है। क्योंकि हमने दुश्मन को मार भगाया है।

इस की वजह यह हुई थी कि मालिक ने अब्दुल्लाह इब्ने जौज़ा को क़र्ज़ इब्ने कअब और मखनफ़ इब्ने सलाम के पास दौड़ा दिया था कि अगर कूफ़ा से मदद आने में ताखीर (देर) हो तो यहां से बर वक्त इमदाद मिल सके। चुनांचे अब्दुल्लाह दोनों के पास गया मगर क़र्ज़ से कोई इमदाद न मिल सकी। अलबत्ता मखनफ़ इब्न सलाम ने पचास आदमी अब्दुर्रहमान इब्न मखनफ़ के हमराह तैयार किये, जो अस्त्र के क़रीब वहां पहुंचे। उस वक्त तक यह दो हज़ार आदमी मालिक के सौ आदमियों को पस्पा न कर सके थे जब नोमान ने इन पचास आदमियों को देखा तो यह खयाल किया कि अब फ़ौजें आना शुरुउ हो गई हैं लिहाज़ा वह मैदान से भाग खड़ा हुआ। मालिक ने उनके जाते जाते भी अक़ब (पीछे) से हमला कर के उन के तीन आदमीयों को मार डाला।

ख़ुत्बा-40

[ जब आप ने ख़वारिज का क़ौल, “ला हुक्मा इल्ला लिल्लाह ” (हुक्म अल्लाह ही के लिये मख़सूस है) सुना तो फ़रमाया ]

यह जुमला (वाक्य) तो सहीह है मगर जो मतलब वह लेते हैं, वह ग़लत है। हां बेशक हुक्म अल्लाह ही के लिये मख़सूस है। मगर यह लोग तो यह कहना चाहते हैं कि हुकूमत भी अल्लाह के अलावा किसी की नहीं हो सकती। हालांकि लोगों के लिये एक हामिक का होना ज़रुरी है ख़्वाह (चाहे) वह अच्छा हो या बुरा हो। (अगर अच्छा होगा तो) मोमिन उस की हुकूमत में अच्छे अमल (कर्म) कर सकेगा और (बुरा होगा तो) काफ़िर उस के अहद में लज़ाइज़ से बहरा अन्दोज़ होगा। और अल्लाह उस निज़ामे हुकूमत में हर चीज़ को उस की आख़िरी हदों तक पहुंचा देगा। इसी हाकिम की वजह से माल (ख़िराज व ग़नीमत) जमअ होता है, दुशमन से लड़ा जाता है, रास्ते पुर अमन रहते हैं और क़वी (शक्तिशाली) से कमज़ोर का हक़ दिलाया जाता है। यहां तक कि नेक हाकिम मर कर या मअज़ूल (अपदस्थ) हो कर राहत पाए, और बुरे हाकिम के मरने या मअज़ूल (अपदस्थ) होने से दूसरों को राहत पहुंचे।

एक दूसरी रिवायत में इस तरह है कि जब आप ने तहकीम के सिलसिले में (उन का क़ौल) सुना तो फ़रमाया कि मैं तुम्हारे बारे में हुक्मे ख़ुदा का ही मुन्तज़िर हूं। फिर फ़रमाया कि हुकूमत अगर नेक हो तो उस में मुत्तक़ी व पर्हेज़गार अच्छे अमल करते हैं और बुरी हुकूमत हो तो उस में बदबख्त लोग जी भर कर लुत्फ़ अन्दोज़ होते हैं यहां तक कि उन का ज़माना खत्म हो जाए और मौत उन्हें पाले।

ख़ुत्बा-41

वफ़ाए अहद और सच्चाई दोनों का हमेशा हमेशा का साथ है, और मेरे इल्म में इस से बढ़ कर हिफ़ाज़त की और कोई सिपर (ढाल) नहीं। जो शख्स (व्यक्ती) अपनी बाज़गश्त (पलट कर जाने) की हक़ीक़त जान लेता है वह कभी ग़द्दारी नहीं करता। मगर हमारा ज़माना ऐसा है जिस में अक्सर (अधिकांश) लोगों ने ग़द्रो फ़रेब (ग़द्दारी व धोकाधड़ी) को अक़्ल व फ़रासत (बुद्धिमता व चालाकी) समझ लिया है और झाहिलों ने उन की (चालों) को हुस्त्रे तदबीर (सुव्यवस्था) से मन्सूब कर दिया है। अल्लाह उन्हें ग़ारत करे। उन्हें क्या हो गया है। वह शख्स जो ज़माने की ऊंच नीच देख चुका है और उसके हेर फेर से आगाह है वह कभी कोई तद्बीर अपने लिये देखता है, मगर अल्लाह के अवामिर व नवाही (आज्ञा एंव मनाही) उस का रास्ता रोक कर खड़े हो जाते हैं, तो वह इस हीला व तद्बीर (उपाय) को अपनी आंखों से देखने और उस पर क़ाबू पाने के बावजूद छोड़ देता है। और जिसे कोई दीनी एहसास (धार्मिक भावना) सद्दे राह (पथ अवरोधक) नहीं है वह उस मौक़े से फ़ाइदा उठा ले जाता है।

ख़ुत्बा-42

ऐ लोगों ! मुझे तुम्हारे बारे में सब से ज़ियादा दो बातों का डर है। एक ख़्वाहिशों की पैरवी (इच्छाओं का अनुसरण) और दूसरे उम्मीदों का फैलाव (आकांक्षाओं का विस्तार) ख़्वाहिशों की पैरवी वह चीज़ है जो हक़ रोक देती है और उम्मीदों का फैलाव आख़िरत (परलोक) को भुला देता है। तुम्हें मअलूम होना चाहिये कि दुनिया तेज़ी से जा रही है और उस में से कुछ बाक़ी नही रह गाय है, मगर इतना है कि जैसे कोई उंडेलने वाला बर्तन को उंडेले तो उस में कुछ तरी बाक़ी रह जाती है। और आख़िरत इधर का रुख़ किये हुए आ रही है। और दुनिया व आख़िरत दोनों वाले, ख़ास लोग होते हैं। तुम तो फ़र्ज़न्दे आख़िरत बनो और अबनाए दुनिया न बनो ! इस लिये कि हर बेटा रोज़े क़ियामत अपनी मां से मुन्सलिक (संलग्न) होगा। आज अमल (कर्म) का दिन है और हिसाब नहीं है, और कल हिसाब का दिन होगा, अमल न हो सकेगा।

ख़ुत्बा-43

[ जब अमिरुल मोमिनीन ने जरीर इब्ने अब्दुल्लाहे बजल्ली को मुआविया के पास (बैअत लेने के लिये) भेजा तो आप के असहाब ने आप को जंग की तैयारी का मशविरा दिया। जिस पर आप ने फ़रमाया ]

मेरा जंग के लिये मुस्तइद व आमादा होना, जब कि जरीर अभी वहीं है, शाम का दरवाज़ा बन्द करना है। और वहां के लोग बैअत का इरादा भी करें, तो उन्हें इस इरादए ख़ैर से रोक देना है। बेशक मैंने जरीर के लिये एक वक्त मुक़र्रर कर दिया है। उस के बाद वह ठहरेगा तो या उन से फ़रेब में मुब्तला हो कर या (अमदन) सरताबी (जानबूझ कर अवज्ञा) करते हुए। सहीह राय का तक़ाज़ा सब्र व तवक़्क़ुफ़ (धैर्य एंव प्रतीक्षा) है। इसलिये अभी ठहरे रहो। अलबत्ता इस चीज़ को मैं तुम्हारे लिये बुरा नहीं समझता कि (दर पर्दा) जंग का साज़ो सामान करते रहो।

मैंने इस बात को अच्छी तरह से परख लिया है और अन्दर बाहर से देख लिया है। मुझे तो जंग के अलावा कोई चारा नज़र नहीं आता। या यह कि रसूल (स.) की दी हुई ख़बरों से इनकार कर दूं। हक़ीक़त यह है (मुझ से पहले) इस उम्मत पर एक ऐसा हुक्मरान (शासक) था जिस ने दीन (धर्म) में बिद्अतें (असंवैधानिक बातें) फैलाई, और लोगों को ज़बाने तअन (कटाक्ष की ज़बान) खोलने का मौक़ा दिया। पहले तो लोगों ने उसे ज़बानी कहा सुना फिर उस पर बिगड़े, और आख़िर सारा ढ़ांचा बदल दिया।

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